SYL मुद्दे पर हरियाणा-पंजाब बातचीत से हल निकालें- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों को सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर के विवादास्पद मुद्दे का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने के लिए मिल-बैठकर बातचीत करने को कहा. न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय से दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाने को कहा है. इस मुद्दे पर हुई ज्यादा जानकारी के साथ एक रिपोर्ट के साथ बेंच ने मामले को 15 जनवरी तक के लिए आगे बढ़ा दिया है.

न्यायमूर्ति कौल ने कहा, “पानी एक प्राकृतिक संसाधन है केवल व्यक्तिगत हितों को ध्यान में नहीं रखा जा सकता है.” वहीं जब बेंच ने दोनों राज्यों की बातचीत के लिए एक टेबल पर लाने के लिए केंद्र सरकार पर फटकार लगाई तो अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि केंद्र ने अप्रैल में पंजाब के नए मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई, 2020 को पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों से इस मुद्दे का बातचीत से समाधान निकालने का प्रयास करने को कहा था. हरियाणा सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और अतिरिक्त महाधिवक्ता अनीश गुप्ता ने हरियाणा के पक्ष में फरमान लागू करने की मांग करते हुए कहा कि कई दौर की बातचीतविफल रही है.

पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जेएस छाबड़ा ने शीर्ष अदालत को आश्वासन दिया कि वह समस्या का बातचीत से समाधान निकालने की ओर कदम बढाएगी. पंजाब, केंद्र की मदद से दोनों राज्यों के बीच बातचीत से समझौता करने की मांग कर रहा है, जबकि हरियाणा का कहना है कि उसके पक्ष में डिक्री होने के बावजूद उसे अनिश्चित काल तक इंतजार करने के लिए नहीं कहा जा सकता है.

वहीं इस मामले को लेकर केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की ओर से कई बैठकें बुलाई गई थी. बैठक में दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों ने भाग लिया था लेकिन बैठकों में कोई नतीजा नहीं निकला. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही केंद्र, पंजाब और हरियाणा सरकार को अपनी बातचीत जितनी जल्दी हो सके समाप्त करने को कहा है वहीं ऐसा नहीं करने पर वह इस मामले पर फैसला करने के लिए आगे बढ़ेगा.   

बड़बोले बयानों के चलते सुप्रीम कोर्ट की रामदेव को फटकार!

सुप्रीम कोर्ट ने हरिद्वार में पतंजलि योगपीठ के संचालक रामदेव को फटकार लगाई है. सुप्रीम कोर्ट ने रामदेव द्वारा आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा प्रणाली पर अपमानजनक टिप्पणी करने के मामले में फटकार लगाई है. इस मुद्दे पर खुद चीफ जस्टिस एन वी रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई करते हुए कहा, “वह आयुर्वेद को लोकप्रिय बनाने के लिए अभियान चला सकते हैं, लेकिन अन्य चिकित्सा प्रणालियों की आलोचना नहीं करनी चाहिए.”  

चीफ जस्टिस एन वी रमण ने टिप्पणी करते हुए कहा “बाबा रामदेव एलोपैथी डॉक्टरों पर आरोप क्यों लगा रहे हैं? उन्होंने योग को लोकप्रिय बनाया, अच्छा है. लेकिन उन्हें अन्य प्रणालियों की आलोचना नहीं करनी चाहिए. इस बात की क्या गारंटी है कि वे जो कुछ भी करेंगे, वह सब कुछ ठीक कर देगा?”

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणी की है. जिसमें एलोपैथिक दवाओं, उनके डॉक्टरों और कोविड -19 टीकाकरण के खिलाफ अभियान का आरोप लगाया गया था. वहीं साथ ही पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी कर आईएमए की याचिका पर जवाब मांगा है.

पिछले साल, जब देश में हजारों लोगों की मौत हो गई, तो कोविड की दूसरी लहर के रूप में, रामदेव को एक वीडियो में यह कहते हुए सुना गया था,  “लाखों लोग एलोपैथिक दवाओं के कारण मारे गए हैं, जो मरने वालों की तुलना में कहीं अधिक हैं क्योंकि उन्हें इलाज या ऑक्सीजन नहीं मिला” रामदेव ने कथित तौर पर एलोपैथी को “बेवकूफ और दिवालिया” विज्ञान भी कहा था. साथ ही रामदेव ने यह भी दावा किया था कि भारत में कई डॉक्टरों की कोरोना वैक्सीन की दोनों खुराक मिलने के बाद भी मौत हो गई.

वहीं आईएमए ने मीडिया में बयान देते हुए कहा था कि, “केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को रामदेव पर कार्रवाई करनी चाहिए और महामारी रोग अधिनियम के तहत मुकदमा चलाना चाहिए क्योंकि उन्होंने “अनपढ़” बयान देकर लोगों को गुमराह किया और वैज्ञानिक दवा को बदनाम किया.”

भारतीय डॉक्टरों के सर्वोच्च संघ ने कहा कि, “जब वे महामारी के दौरान जीवन बचाने का प्रयास कर रहे थे रामदेव एलोपैथी और आधुनिक चिकित्सा के डॉक्टरों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रहे थे.”

इससे हफ्तेभर पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी रामदेव को आयुर्वेद पर भ्रामक टिप्पणी करने से बचने को कहा था. सुप्रीम कोर्ट की पीठ, डॉक्टरों के अलग अलग संगठनों द्वारा रामदेव के खिलाफ दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कथित रूप से पतंजलि के कोरोनिल के कोविड -19 के उपयोग के संबंध में गलत सूचना फैलाने के आरोप लगाए गये थे.

जब पीठ को यह जानाकरी दी गई कि रामदेव ने अमेरिका के राष्टरपति का उदाहरण देते हुए कहा था कि, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को कोविड का टीका लगाया गया था फिर भी वो कोविड के शिकार हो गए थे. इस पर न्यायमूर्ति अनूप जयराम ने टिप्पणी करते हुए कहा कि, “इस तरह के बयान अन्य देशों के साथ देश के संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं, इसके अलावा आयुर्वेद की प्रतिष्ठा भी कम कर सकते हैं.”

इंसाफ के लिए आवाज उठाना कोई जुर्म नहीं, यह जुर्म हम बार-बार करेंगे – हिमांशु कुमार

2009 में छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के गोमपाड़ में 16 आदिवासियों के मारे जाने के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जांच की मांग ख़ारिज कर दी है। जस्टिस एएम खानविलकर और जे बी पारदीवाला की पीठ ने गोमपाड़ में 16 आदिवासियों के मारे जाने के मामले की जांच की मांग ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ता हिमांशु कुमार पर पांच लाख रुपये का जुर्माना भी लगा दिया है.

साल 2009 में सुकमा जिले के गोमपाड़ में पुलिस ने 16 माओवादियों के मारे जाने का दावा किया था. लेकिन इस मामले में घायल हुई एक आदिवासी महिला ने दावा किया था कि सुरक्षाबलों ने गांव के निर्दोष लोगों की फर्जी मुठभेड़ में हत्या की है. इसके बाद इस मामले में दंतेवाड़ा में रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने अपने अन्य साथियों के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

लगभग 13 सालों तक चली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित करने की भी बात कही थी. लेकिन स्वतंत्र जांच की बात टल गई. लेकिन इसी साल अप्रैल में केंद्र सरकार द्वारा हिमांशु कुमार और अन्य याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ़ अदालत में आवेदन दिया गया और याचिकाकर्ताओं के ख़िलाफ ही जांच की मांग की गई.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद याचिकाकर्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने अपने एक इंटरव्यू में कहा, “यह आदिवासियों के न्याय मांगने के अधिकार पर बड़ा हमला है. इस फैसले के बाद आदिवासी न्याय मांगने में डरेगा.  इससे तो यही साबित होता है कि पहले से ही अन्याय से जूझ रहा आदिवासी अगर अदालत का रुख करेगा तो उसे सजा दी जाएगी. इसके साथ-साथ जो भी आदिवासियों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं, उन लोगों के भीतर डर पैदा करेगा.”

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हिमांशु कुमार ने अपना बयान भी जारी किया है, हिमांशु कुमार ने अपने ब्यान में कहा, ” चंपारण में गांधी जी से जज ने कहा तुम्हें सौ रुपये के जुर्माने पर छोड़ा जाता है. गांधी जी ने कहा मैं जुर्माना नहीं दूंगा. कोर्ट ने मुझसे कहा पांच लाख जुर्माना दो तुम्हारा जुर्म यह है तुमने आदिवासियों के लिए इंसाफ मांगा. मैं जुर्माना नहीं दूंगा. जुर्माना देने का अर्थ होगा मैं अपनी गलती कबूल कर रहा हूं. मैं दिल की गहराई से मानता हूं कि इंसाफ के लिए आवाज उठाना कोई जुर्म नहीं है. यह जुर्म हम बार-बार करेंगे.”

लखीमपुर हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट की योगी सरकार को फटकार, कहा- जांच से संतुष्ट नहीं!

3 अक्तूबर को उत्तर प्रदेश के लखीमपुर में हुए हत्याकांड पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले पर सरकार का पक्ष जानते हुए सुनवाई की. सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर खीरी की घटना पर यूपी पुलिस की जांच से नराजगी जाहिर करते हुए कहा कि हम यूपी सरकार की जांच से संतुष्ट नहीं हैं. चीफ जस्टिस एनवी रमना, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हेमा कोहली की पीठ ने लखीमपुर मामले में केस दर्ज करने, घटना में शामिल दोषियों को सजा देने की मांग को लेकर सुनवाई की.

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखने के लिए अधिवक्ता हरिश साल्वे पेश हुए. साल्वे ने कोर्ट को जानकारी देते हुए कहा कि मुख्य आरोपी आशिष मिश्रा को कल 11 बजे तक पेश होने के लिए नोटिस भेजा गया है. साल्वे ने आरोप स्वीकार हुए कहा “मुझे बताया गया था कि पोस्टमार्टम में गोली के घाव नहीं दिखे हैं. इसलिए 160 सीआरपीसी के तहत नोटिस भेजा गया था. लेकिन जिस तरह से कार चलाई गई, आरोप सही हैं और 302 का मामला दर्ज किया गया है.”

इसके जवाब में चीफ जस्टिस ने कहा, “अगर कोई बुलेट इंजरी नहीं है तो भी यह गंभीर अपराध नहीं है क्या?”

चीफ जस्टिस ने यूपी सरकार पर सवाल उठाते हुए पूछा कि हत्या के मामले में आरोपी से अलग व्यवहार क्यों हो रहा है? हम एक जिम्मेदार सरकार और जिम्मेदार पुलिस देखना चाहते हैं. सीजेआई ने कहा कि अगर 302 यानी हत्या का मामला दर्ज होता है तो ऐसे हालात में पुलिस क्या करती है? सीजेआई ने पूछा कि मामले की जांच सीबीआई से करने के बारे में क्या सरकार या किसी और कि ओर से कहा गया है?

चीफ जस्टिस ने आदेश में कहा,”उत्तर प्रदेश सरकार की स्टेट्स रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं है राज्य सरकार ने जो एक्शन लिया है इस मामले में उससे हम संतृष्ट नहीं.” साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने डीजीपी को मामले से जुड़े सभी सबूत सुरक्षित रखने को कहा.

खोरी गांव में पुलिस ने एक बार फिर किया लाठीचार्ज,कईं सामाजिक कार्यकर्ता गिरफ्तार!

फरीदाबाद के खोरी गांव में पुलिस ने आज फिर लाठीचार्ज किया है. गांव वालों पर लाठीचार्ज करने के साथ पुलिस ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार किया है. पुलिस ने सोशल एक्टिविस्ट प्रभाकर, सार्थक, इंकलाबी मजदूर केंद्र के नितेश और गांव की कईं महिलाओं को गिरफ्तार किया है.

पिछले कईं दिनों से खोरी गांव छावनी में तब्दील है. गांव में हजारों की संख्या में पुलिसबल तैनात है. बुधवार को पुलिस प्रशासन ने बुल्डोजर चलाकर 300 घरों को गिरा दिया था. बारिश तेज होने के कारण घर ढहाने की कार्रवाई बीच में रोकनी पड़ी जिसके बाद प्रशासन आज फिर से घर ढहाने के लिए पहुंचा था. लेकिन खोरी गांव के लोगों ने एकजुट होकर पुलिसबल का रास्ता रोक लिया. खोरी गांव के लोगों ने गांव की ओर बढ़ते पुलिस बल के रास्ते में बैठकर सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की.

गांव वालों ने पुलिस प्रशासन को गांव के अंदर नहीं घुसने दिया. जिसके चलते पुलिस ने खोरी गांव के लोगों पर लाठीचार्ज कर दिया. लाठीचार्ज के दौरान कई लोगों को चोटें आई हैं और कईं लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

इससे पहले 30 जून को किसान नेताओं के खोरी गांव में पंचायत करने के लिए पहुंचने से पहले भी पुलिस ने लोगों पर लाठीचार्ज किया था जिसमें कईं लोगों को गंभीर चोटें आई थी.

बता दें कि खोरी गांव के मकानों को हटाने के पीछे सुप्रीम कोर्ट ने खोरी गांव के वन विभाग की जमीन पर गैर कानूनी तरीके से बसे होने की दलील दी है. कई सामाजिक संगठनों ने मिलकर इस मामले में पुनर्विचार याचिका भी दायर की थी मगर सुप्रीम कोर्ट ने उसको खारिज करते हुए 6 हफ्तों के भीतर प्रशासन को गांव खाली करवाए जाने का आदेश दिया है.  

घर गिराए जाने से सदमे में खोरी गांव के लोग, मजदूरी छूटने से नमक के साथ रोटी खाने को मजबूर हुआ परिवार!

फरीदाबाद के खोरी गांव में करीब दस हजार घर ढहाए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से गांव के लोग परेशान है. प्रशासन ने खोरी गांव में पानी और बिजली की सप्लाई बंद कर रखी है. गांव के लोग पीने के पानी तक के लिए तरस रहे हैं. पढ़िए खोरी गांव से ‘गांव सवेरा’ के पत्रकार अभिमन्यू बेनर्जी की वीडियो स्टोरी के अंश.

खोरी गांव में रहने वाली  कल्पना देवी के पति पांच साल पहले गुजर चुके हैं. कल्पना देवी खोरी गांव के आस-पास के इकाले में दिहाड़ी-मजदूरी करके अपने बच्चों के साथ गुजर बसर कर रहीं हैं. कल्पना देवी ने थाली में रखी रोटी और नमक दिखाते हुए कहा ” हम नमक के साथ रोटी खा रहे हैं, लेकिन ये भी सरकार को हजम नहीं हो रही. सरकार यही छीनने पर लग गई है. हमारे घर छीन रही है. हम कहां जाएं. अब ऊपर से जो मकान हैं, सरकार उसको भी गिरा रही है. अगर मकान ही नहीं रहेगा तो मैं अपने छोटे-छोटे बच्चों तो कहां लेकर जाऊंगी.”

खोरी गांव में रहने वाले मुहमम्मद मुख्तार ने अपने गांव की जमीन बेचकर और जिंदगी की पूरी कमाई लगाकर मकान बनाया है, मुहमम्मद मुख्तार ने गांव सवेरा को बताया,“सरकार या तो हमें जिंदा रखे या एक-दो बंम या मिसाइल लाकर हम गरीबों पर छोड़ दे. सब मर जाएंगे, न हम रहेंगे और न जमीन लेंगे. सरकार की चीज सरकार के हवाले हो जाएगी.”

अपने घर के आंगन में बैठी करीबन 70 साल की बुजुर्ग महिला ने कहा,“पूरे गांव में बिजली, पानी की सप्लाई बंद कर रखी है. पीने तक का पानी नहीं है. जहां चार बार पानी पीते थे अब केवल एक बार पानी पी रहे हैं वो भी ताकि पानी के बिना दम न निकल जाए.”

गोद में बच्चे को लिए जयंती झा ने बताया कि हम 15-20 साल से खोरी गांव में रह रहे हैं. सरकार को दिखाई नहीं दे रहा कि हमारे पास पानी तक नहीं है. घर में न पैसा है, न खाने को चावल है. दिनभर मजदूरी करने के बाद 300 रुपये मिलते हैं. अब मजदूरी के बिना वो भी नहीं मिलते. सोचा था बच्चों को पढ़ाएंगे, अब न स्कूल चालू है और न हमारी इतनी औकात है कि बच्चों को मोबाइल से पढ़ा सकें. ऊपर से सरकार हमारे मकान भी छीन रही है. मकान नहीं होंगे तो हम लोग कहां जाएंगे. आखिर सरकार को हम लोग क्यों नहीं दिखते हैं.”       

वहीं आंखों पर नजर का चश्मा लगाए घर के बाहर बैठीं 75 साल की बुजुर्ग रजिया आर्फा घर में एकेली सदस्य हैं.रजिया आर्फा जब 32 साल की थीं तो उनके पति का देहांत हो गया था. उनकी पांच बेटियां है जिनकी शादी हो चुकी है. बुजुर्ग रजिया आर्फा ने सरकार पर ताना कसते हुए कहा, “यहां जंगल की जमीन में फार्म हाउस हैं, होटल हैं, यहां तक की पुलिस थाने की इमारत भी है, तो क्या सरकार को जंगल की जमीन पर बसने का हक है. जहां मन किया कुछ भी बनना दे और हम गरीबों का मकान तोड़कर हमें सड़कों पर फेंक दें.”          

खोरी गांव में मजदूरों के घर ढहाए जाने पर बरसे किसान नेता, खोरी में पंचायत करने का किया एलान

फरीदाबाद के सुरजकुंड से सटी अरावली की पहाड़ियों के पास बसे खोरी गांव के 10 हजार मजदूर परिवारों के घर उजड़ने की कगार पर हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन इन घरों को हटाने की जुगत में है. घर गिराए जाने के नोटिस से परेशान खोरी गांव के लोग किसान आंदोलन के नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी के पास पहुंचे. गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने इन परिवारों का साथ देने की बात कही. किसान नेता चढ़ूनी ने गरीब परिवारों के घर ढहाए जाने के फरमान के खिलाफ खोरी गांव में पंचायत बुलाने का एलान किया. साथ ही किसान नेता चढूनी ने पूरे हरियाणा और देश की जनता से खोरी गांव के लोगों का साथ देने की भी अपील की.   

खोरी गांव में मजदूरों के घर ढहाए जाने के आदेश पर गुरनाम सिंह चढूनी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “क्या खोरी गांव की उसी जमीन पर जंगल बनाना जरूरी है जहां पिछले कईं दशकों से लोग रह रहे हैं, क्या खाली पड़ी जमीनों पर जंगल नहीं बनाए जा सकते, जब कॉलोनी काटी जा रही थी, लोग अपने मकान बना रहे थे तब सरकार और प्रशासन कहां था.”

किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा सरकार को चेतावनी देते हुए कहा, “जहां लोग रह रहे हैं उनको वहां से उजाड़कर उसी जगह पर पेड़ लगाना कौन-सा कानून है. सरकार को हमारी चेतावनी है कि इन लोगों को वहां से न हटाया जाए. अगर हटाना है तो सरकार पहले इन लोगों को दूसरी जगह मकान बनाकर दिए जाएं वरना इन परिवारों को हटाने का कोई मतलब नहीं बनता है.

अगर खोरी गांव के लोगों के साथ छेड़छाड़ की गई तो इन एक लाख लोगों को भी कुंडली बॉर्डर जारी किसानों के धरने पर लेकर आएंगे. कुंडली बॉर्डर पर ही इन लोगों की खाने-पीने और रहने की व्यवस्था होगी और खोरी गांव के लाखों लोग भी हमारे साथ धरने में शामिल होंगे.     

बता दें कि इन घरों को हटाने के पीछे सुप्रीम कोर्ट ने खोरी गाँव के वन विभाग की ज़मीन पर गैर क़ानूनी तरीके से बसे होने की दलील दी है. कई सामाजिक संगठनों ने मिलकर इस मामले में पुनर्विचार याचिका भी दायर की थी मगर सुप्रीम कोर्ट ने उसको खारिज करते हुए 6 हफ्तों के भीतर प्रशासन को गाँव खाली करवाए जाने के आदेश दिया है.

फरीदाबाद के खोरी गांव में जान देकर आवास की कीमत चुका रहे मजदूर

फरीदाबाद के खोरी गांव में करीबन 10 हजार परिवारों के सर से छत छिन जाने का खतरा मंडराया हुआ है. इन परिवारों को सुप्रीम कोर्ट ने भी झटका दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फरीदाबाद के खोरी गांव के करीब 10 हजार घरों को छह हफ्ते के भीतर ढहाने के अपने पूर्व आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया है. एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस दिनेश महेश्वरी की पीठ ने यह आदेश दिया है. याचिका में घरों को ढहाने की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की गई थी. इन परिवारों के घरोंं को गिराए जाने के आदेश के विरोध में बंधुआ मुक्ति मोर्चा समेत कईं सामाजिक संगठनों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विरोध दर्ज कराया. सामाजिक संगठनों ने खोरी गांव के प्रवासी मज़दूरों के लिए पुनर्वास की मांग की.

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि, “अगर खोरी गांव जंगलात की जमीन पर बसा हुआ है इसलिए उससे बेदखल किया जा रहा है किंतु इसी जंगलात की जमीन पर बने हुए फार्म हाउस एवं होटल्स को बेदखली का सामना नहीं करना पड़ रहा है यह असमानता सत्ता के गलियारों में क्यों है? कानूनों एवं नियमों के मुताबिक वैश्विक महामारी के दौरान विस्थापन न्यायोचित नहीं है.”

सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने भी पुनर्वास नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि “देश में कई राज्यों में शहरी गरीबों के पुनर्वास हेतु नीतियां बनी हुई हैं, राज्य की जिम्मेदारी है कि उन नीतियों में संशोधन करें और यह संशोधन शहरी गरीबों को सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में होना चाहिए जिसकी आज हरियाणा में अत्यंत आवश्यकता है, उन्होने कहा कि “जब राज्य सरकार पूंजीपति वर्ग को जमीन देने की घोषणा कर रही है तो फिर खोरी गांव में रहने वाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को इस महामारी के दौरान बिना पुनर्वास किए कैसे विस्थापित किया जा रहा है.”

बंधुआ मुक्ति मोर्चा के जनरल सेक्रेटरी निर्मल गोराना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करते वक्त सरकार की जिम्मेदारी है कि वो पुनर्वास की योजना बनाकर पूर्ण संवेदनशीलता के साथ मजदूरों को पुनर्वास करें ताकि सरकार एवं न्यायालय से मजदूरों का विश्वास और भरोसा न टूटे.”

एडवोकेट अनुप्रधा सिंह ने कहा कि कोर्ट के आदेश के अनुसार हरियाणा सरकार खोरी गांव के घरों को तोड़ने के लिए तैयार हैं लेकिन साथ ही मजदूरों को पुनर्वास नीति 2010 के तहत पुनर्वास किया जाना चाहिए.  

हरियाणा के फरीदाबाद में अरावली की पहाड़ियों में पिछले 50 साल से बसा खोरी गांव आज उजड़ने की कगार पर है परंतु सरकार पुनर्वास का नाम तक नहीं ले रही है. खोरी गांव में बंगाली कॉलोनी, सरदार कॉलोनी, चर्च रोड, इस्लाम चौक, हनुमान मंदिर, लेबर चौक, पुरानी खोरी नाम से अलग-अलग कॉलोनियां बसी हुई हैं. ये सभी घर असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों के परिवारों के हैं. गांव में सभी सम्प्रदाय के मजदूर परिवार रहते हैं.

खोरी गांव, सूरजकुंड पर्यटक स्थल के पास है और इन्ही अरावली की पहाड़ियों में 50 फार्म हाउस और कई होटल्स बने हुए हैं लेकिन इन इमारतों को हाथ लगाने की हिम्मत आज तक न तो हरियाणा सरकार को हुई और न ही फरीदाबाद प्रशासन की. वहीं दूसरी ओर इस मामले में अब तक लगभग 20 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी हैं जिनमें से दो लोग जेल में बंद हैं तो घर उजड़ने की चिंता में दो लोगों ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली है.