सोमवार, 03 अक्टूबर 2022
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घर गिराए जाने से सदमे में खोरी गांव के लोग, मजदूरी छूटने से नमक के साथ रोटी खाने को मजबूर हुआ परिवार!



खोरी गांव की कल्पना देवी ने थाली में रखी रोटी और नमक दिखाते हुए कहा " हम नमक के साथ रोटी खा रहे हैं, लेकिन ये भी सरकार को हजम नहीं हो रही. सरकार यही छीनने पर लग गई है. हमारे घर छीन रही है. हम कहां जाएं." वहीं घर के आंगन में बैठी करीबन 70 साल की एक बुजुर्ग महिला ने कहा,“पूरे गांव में बिजली, पानी की सप्लाई बंद कर रखी है. पीने तक का पानी नहीं है. जहां चार बार पानी पीते थे अब केवल एक बार पानी पी रहे हैं वो भी ताकि पानी के बिना दम न निकल जाए.”

फरीदाबाद के खोरी गांव में करीब दस हजार घर ढहाए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से गांव के लोग परेशान है. प्रशासन ने खोरी गांव में पानी और बिजली की सप्लाई बंद कर रखी है. गांव के लोग पीने के पानी तक के लिए तरस रहे हैं. पढ़िए खोरी गांव से ‘गांव सवेरा’ के पत्रकार अभिमन्यू बेनर्जी की वीडियो स्टोरी के अंश.

खोरी गांव में रहने वाली  कल्पना देवी के पति पांच साल पहले गुजर चुके हैं. कल्पना देवी खोरी गांव के आस-पास के इकाले में दिहाड़ी-मजदूरी करके अपने बच्चों के साथ गुजर बसर कर रहीं हैं. कल्पना देवी ने थाली में रखी रोटी और नमक दिखाते हुए कहा ” हम नमक के साथ रोटी खा रहे हैं, लेकिन ये भी सरकार को हजम नहीं हो रही. सरकार यही छीनने पर लग गई है. हमारे घर छीन रही है. हम कहां जाएं. अब ऊपर से जो मकान हैं, सरकार उसको भी गिरा रही है. अगर मकान ही नहीं रहेगा तो मैं अपने छोटे-छोटे बच्चों तो कहां लेकर जाऊंगी.”

खोरी गांव में रहने वाले मुहमम्मद मुख्तार ने अपने गांव की जमीन बेचकर और जिंदगी की पूरी कमाई लगाकर मकान बनाया है, मुहमम्मद मुख्तार ने गांव सवेरा को बताया,“सरकार या तो हमें जिंदा रखे या एक-दो बंम या मिसाइल लाकर हम गरीबों पर छोड़ दे. सब मर जाएंगे, न हम रहेंगे और न जमीन लेंगे. सरकार की चीज सरकार के हवाले हो जाएगी.”

अपने घर के आंगन में बैठी करीबन 70 साल की बुजुर्ग महिला ने कहा,“पूरे गांव में बिजली, पानी की सप्लाई बंद कर रखी है. पीने तक का पानी नहीं है. जहां चार बार पानी पीते थे अब केवल एक बार पानी पी रहे हैं वो भी ताकि पानी के बिना दम न निकल जाए.”

गोद में बच्चे को लिए जयंती झा ने बताया कि हम 15-20 साल से खोरी गांव में रह रहे हैं. सरकार को दिखाई नहीं दे रहा कि हमारे पास पानी तक नहीं है. घर में न पैसा है, न खाने को चावल है. दिनभर मजदूरी करने के बाद 300 रुपये मिलते हैं. अब मजदूरी के बिना वो भी नहीं मिलते. सोचा था बच्चों को पढ़ाएंगे, अब न स्कूल चालू है और न हमारी इतनी औकात है कि बच्चों को मोबाइल से पढ़ा सकें. ऊपर से सरकार हमारे मकान भी छीन रही है. मकान नहीं होंगे तो हम लोग कहां जाएंगे. आखिर सरकार को हम लोग क्यों नहीं दिखते हैं.”       

वहीं आंखों पर नजर का चश्मा लगाए घर के बाहर बैठीं 75 साल की बुजुर्ग रजिया आर्फा घर में एकेली सदस्य हैं.रजिया आर्फा जब 32 साल की थीं तो उनके पति का देहांत हो गया था. उनकी पांच बेटियां है जिनकी शादी हो चुकी है. बुजुर्ग रजिया आर्फा ने सरकार पर ताना कसते हुए कहा, “यहां जंगल की जमीन में फार्म हाउस हैं, होटल हैं, यहां तक की पुलिस थाने की इमारत भी है, तो क्या सरकार को जंगल की जमीन पर बसने का हक है. जहां मन किया कुछ भी बनना दे और हम गरीबों का मकान तोड़कर हमें सड़कों पर फेंक दें.”