फरीदाबाद: खोरी गांव के विस्थापित परिवारों में से केवल 5.5 फीसदी को ही मिले मकान!

पिछले साल जून में फरीदाबाद के खोरी गांव में 10 हजार से ज्यादा लोगों के मकान गिराए गए थे. सुप्रीम कोर्ट ने खोरी गांव की इस कॉलोनी में रहने वाले लोगों के मकानों को अवैध बताकर जमीन खाली करवाने का आदेश दिया था. जिसके बाद फरीदाबाद प्रशासन ने 10 हजार परिवारों के मकानों पर बुलडोजर चलाकर जमीन खाली करवा ली थी. इस विध्वंस के बाद विस्थापित हुए लगभग 10 हजार परिवारों में से केवल 550 परिवारों को ही पुनर्वास के लिए मकान दिए गए हैं.

खोरी गांव की करीबन 150 एकड़ से ज्यादा वन क्षेत्र को खाली करवाने के लिए फरीदाबाद नगर निगम द्वारा इन इन परिवारों का यहां से हटाने का अभियान चलाया गया था. विस्थापित परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया पिछले साल जुलाई में शुरू की गई थी लेकिन सरकार की अनेक शर्तों और कठिन प्रक्रिया के चलते अबतक केवल 5.5 प्रतिशत प्रभावित परिवारों का पुनर्वास किया गया है.

वहीं फरीदाबाद नगर निगम का कहना है कि पात्र पाए गए 4,100 में से 1,009 आवेदकों को आवंटन पत्र जारी किए गए हैं जबकि उनमें से 550 को कब्जा मिल गया. पुनर्वास योजना के तहत पात्र आवेदकों को 20 साल के लिए 10 हजार रुपये की एकमुश्त राशि जमा करवानी होगी और 1,950 रुपये की मासिक किस्त का भुगतान करना होगा.

वहीं अधिकतर लोग दस हजार की एकमुश्त राशि जमा करवाने और अन्य खर्च का भुगतान करने में असमर्थ रहे तो कई परिवार दस्तावेजों की कमी के कारण पुनर्वास की प्रक्रिया से बाहर हो गए.

हरियाणा: CAG ने उजागर किया 183 करोड़ का घोटाला!

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) ने हरियाणा के फरीदाबाद में एक बड़े जमीन घोटाले का खुलासा किया है. सीएजी के अनुसार करीबन 183 करोड़ रूपये की कीमत वाली संरक्षित और अधिसूचित फॉरेस्ट लैंड पर बहु-मंजिला इमारत के अवैध निर्माण की अनुमति दी गई थी. हरियाणा विधानसभा में पेश की गई सीएजी की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि फरीदाबाद नगर निगम ने पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (पीएलपीए), 1900 के तहत संरक्षित और अधिसूचित जमीन को एक निजी रियल एस्टेट कंपनी गोदावरी शिल्पकला प्राइवेट लिमिटेड को दे दी. रियल एस्टेट कंपनी को यह जमीन दो बार में दी गई है, पहली बार 5.5 एकड़ और दूसरी बार 3.93 एकड़ यानि कुल 9.43 एकड़ जमीन प्राइवेट रियल एस्टेट कंपनी को दी गई. फरीदाबाद नगर निगम की मिलीभगत के साथ इस 9.43 एकड़ संरक्षित फॉरेस्ट लैंड पर “पिनेकल बिजनेस टॉवर” खड़ा किया गया.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि फरीदाबाद नगर निगम के अधिकारियों ने वन संरक्षित क्षेत्र में प्राइवेट डेवलपर को अवैध तरीके से जमीन का आवंटन किया. अधिकारियों ने सीएलयू समझौते के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए जमीन के कमर्शियल यूज के लिए निर्माण संबंधी एनओसी जारी की हैं. सरकारी अधिकारियों द्वारा अधिसूचित क्षेत्र पर एनओसी जारी करवाई गई जो ऐसा करने के लिए अधिकृत नहीं हैं.

सीएजी ने रिपोर्ट में हरियाणा सरकार को, डवलेपर और सरकारी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश के साथ डेवलपर से मुआवजे की राशि वसूल करने के भी सुझाव दिये हैं. वहीं पिछले महीने ही सुप्रीम कोर्ट ने पीएलपीए में संशोधन करने के लिए हरियाणा सरकार की ओर से की गई अपील को खारिज करते हुए कहा था कि कानूनी ढांचे ने अरावली रेंज की रक्षा की है, जो दिल्ली, गुरुग्राम और आसपास के क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण में बड़ी भूमिका निभा रही है. दरअसल हरियाणा सरकार लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट के जरिए अरावली वन क्षेत्र में वैध खनन का रास्ता निकालने की फिराक में है.

वहीं इस मामले में सबसे पहले 12 मार्च 1992 को फरीदाबाद के टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के निदेशक द्वारा रियल एस्टेट डेवलपर को जमीन के कमर्शियल यूज के लिए एनओसी दी गई थी. यह एनओसी फरीदाबाद के सूरजकुंड के लक्करपुर गांव में स्थित 5.5 एकड़ यानि 44 कनाल जमीन के लिए जारी की गई थी. ‘गैर-खेती योग्य पहाड़ियों’ के रूप में वर्गीकृत जमीन पर हॉटल और अन्य मनोरंजन से जुड़े कॉमपलेक्स बनाने की अनुमति दी गई. वहीं दो साल बाद, नवंबर 1994 में गोदावरी शिल्पकला ने पार्किंग, भूनिर्माण और फाइव स्टार होटल के विस्तार के लिए पहले वाली 5.5 एकड़ जमीन के बराबर में लगती 3.93 एकड़ जमीन लेने का अनुरोध किया.

मई 1995 में, राज्य सरकार की अनुमति के बाद फरीदाबाद प्रशासन ने कैग को जानकारी दिये बिना 20 लाख प्रति एकड़ के हिसाब से प्राइवेट कंपनी को 3.93 एकड़ जमीन आवंटित कर दी. हालांकि भूमि उपयोग में परिवर्तन ने स्पष्ट रूप से निर्धारित किया है कि साइट को किसी भी परिस्थिति में उप-विभाजित नहीं किया जाएगा.

3.93 एकड़ जमीन के सीएलयू के साथ निर्माण की अनुमति नहीं दी गई थी लेकिन फरीदाबाद प्रशासन ने 2007 में डेवलपर को बहु-मंजिला इमारत बनाने के लिये अवैध तरीके से अनुंमति दी गई. इसके तहत कमर्शियल दफ्तरों के लिए नौ मंजिल, हॉल के लिए तीन और जमीन के ऊपर कार पार्किंग के लिए दो मंजिल वाले 16 मंजिला टावर बनाने की सहमति दी गई थी.

दिसंबर, 2020 में शिकायत के आधार पर एक जिला नगर आयुक्त ने 25 मार्च, 2021 को डेवलपर को कारण बताओ नोटिस जारी किया. जिसका जवाब न मिलने पर आयुक्त ने भूमि के उपयोग, भूमि के उपखंड, और भवन की अवैध बिक्री और नियमों के उल्लंघन के चलते पिनेकल बिजनेस टॉवर को सील करने का आदेश दे दिया. वहीं जब कैग की ऑडिट टीम ने दिसंबर 2021 को फरीदाबाद नगर निगम के अधिकारियों के साथ साइट विजिट किया, तो उन्होंने पाया कि पिनेकल बिजनेस टॉवर को सील नहीं किया गया था.

कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि नौ साल तक चले अवैध निर्माण के खिलाफ फरीदाबाद प्रशासन और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग द्वारा कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की गई. वहीं हरियाणा सरकार के शीर्ष अधिकारियों, जैसे शहरी स्थानीय निकाय विभागों के प्रमुख सचिव, वन विभाग और राजस्व विभाग के वित्तीय आयुक्त ने पिछले फैसलों का बचाव किया है.

खोरी गांव में पुलिस ने एक बार फिर किया लाठीचार्ज,कईं सामाजिक कार्यकर्ता गिरफ्तार!

फरीदाबाद के खोरी गांव में पुलिस ने आज फिर लाठीचार्ज किया है. गांव वालों पर लाठीचार्ज करने के साथ पुलिस ने कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार किया है. पुलिस ने सोशल एक्टिविस्ट प्रभाकर, सार्थक, इंकलाबी मजदूर केंद्र के नितेश और गांव की कईं महिलाओं को गिरफ्तार किया है.

पिछले कईं दिनों से खोरी गांव छावनी में तब्दील है. गांव में हजारों की संख्या में पुलिसबल तैनात है. बुधवार को पुलिस प्रशासन ने बुल्डोजर चलाकर 300 घरों को गिरा दिया था. बारिश तेज होने के कारण घर ढहाने की कार्रवाई बीच में रोकनी पड़ी जिसके बाद प्रशासन आज फिर से घर ढहाने के लिए पहुंचा था. लेकिन खोरी गांव के लोगों ने एकजुट होकर पुलिसबल का रास्ता रोक लिया. खोरी गांव के लोगों ने गांव की ओर बढ़ते पुलिस बल के रास्ते में बैठकर सरकार और पुलिस प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी की.

गांव वालों ने पुलिस प्रशासन को गांव के अंदर नहीं घुसने दिया. जिसके चलते पुलिस ने खोरी गांव के लोगों पर लाठीचार्ज कर दिया. लाठीचार्ज के दौरान कई लोगों को चोटें आई हैं और कईं लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

इससे पहले 30 जून को किसान नेताओं के खोरी गांव में पंचायत करने के लिए पहुंचने से पहले भी पुलिस ने लोगों पर लाठीचार्ज किया था जिसमें कईं लोगों को गंभीर चोटें आई थी.

बता दें कि खोरी गांव के मकानों को हटाने के पीछे सुप्रीम कोर्ट ने खोरी गांव के वन विभाग की जमीन पर गैर कानूनी तरीके से बसे होने की दलील दी है. कई सामाजिक संगठनों ने मिलकर इस मामले में पुनर्विचार याचिका भी दायर की थी मगर सुप्रीम कोर्ट ने उसको खारिज करते हुए 6 हफ्तों के भीतर प्रशासन को गांव खाली करवाए जाने का आदेश दिया है.  

घर गिराए जाने से सदमे में खोरी गांव के लोग, मजदूरी छूटने से नमक के साथ रोटी खाने को मजबूर हुआ परिवार!

फरीदाबाद के खोरी गांव में करीब दस हजार घर ढहाए जाने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से गांव के लोग परेशान है. प्रशासन ने खोरी गांव में पानी और बिजली की सप्लाई बंद कर रखी है. गांव के लोग पीने के पानी तक के लिए तरस रहे हैं. पढ़िए खोरी गांव से ‘गांव सवेरा’ के पत्रकार अभिमन्यू बेनर्जी की वीडियो स्टोरी के अंश.

खोरी गांव में रहने वाली  कल्पना देवी के पति पांच साल पहले गुजर चुके हैं. कल्पना देवी खोरी गांव के आस-पास के इकाले में दिहाड़ी-मजदूरी करके अपने बच्चों के साथ गुजर बसर कर रहीं हैं. कल्पना देवी ने थाली में रखी रोटी और नमक दिखाते हुए कहा ” हम नमक के साथ रोटी खा रहे हैं, लेकिन ये भी सरकार को हजम नहीं हो रही. सरकार यही छीनने पर लग गई है. हमारे घर छीन रही है. हम कहां जाएं. अब ऊपर से जो मकान हैं, सरकार उसको भी गिरा रही है. अगर मकान ही नहीं रहेगा तो मैं अपने छोटे-छोटे बच्चों तो कहां लेकर जाऊंगी.”

खोरी गांव में रहने वाले मुहमम्मद मुख्तार ने अपने गांव की जमीन बेचकर और जिंदगी की पूरी कमाई लगाकर मकान बनाया है, मुहमम्मद मुख्तार ने गांव सवेरा को बताया,“सरकार या तो हमें जिंदा रखे या एक-दो बंम या मिसाइल लाकर हम गरीबों पर छोड़ दे. सब मर जाएंगे, न हम रहेंगे और न जमीन लेंगे. सरकार की चीज सरकार के हवाले हो जाएगी.”

अपने घर के आंगन में बैठी करीबन 70 साल की बुजुर्ग महिला ने कहा,“पूरे गांव में बिजली, पानी की सप्लाई बंद कर रखी है. पीने तक का पानी नहीं है. जहां चार बार पानी पीते थे अब केवल एक बार पानी पी रहे हैं वो भी ताकि पानी के बिना दम न निकल जाए.”

गोद में बच्चे को लिए जयंती झा ने बताया कि हम 15-20 साल से खोरी गांव में रह रहे हैं. सरकार को दिखाई नहीं दे रहा कि हमारे पास पानी तक नहीं है. घर में न पैसा है, न खाने को चावल है. दिनभर मजदूरी करने के बाद 300 रुपये मिलते हैं. अब मजदूरी के बिना वो भी नहीं मिलते. सोचा था बच्चों को पढ़ाएंगे, अब न स्कूल चालू है और न हमारी इतनी औकात है कि बच्चों को मोबाइल से पढ़ा सकें. ऊपर से सरकार हमारे मकान भी छीन रही है. मकान नहीं होंगे तो हम लोग कहां जाएंगे. आखिर सरकार को हम लोग क्यों नहीं दिखते हैं.”       

वहीं आंखों पर नजर का चश्मा लगाए घर के बाहर बैठीं 75 साल की बुजुर्ग रजिया आर्फा घर में एकेली सदस्य हैं.रजिया आर्फा जब 32 साल की थीं तो उनके पति का देहांत हो गया था. उनकी पांच बेटियां है जिनकी शादी हो चुकी है. बुजुर्ग रजिया आर्फा ने सरकार पर ताना कसते हुए कहा, “यहां जंगल की जमीन में फार्म हाउस हैं, होटल हैं, यहां तक की पुलिस थाने की इमारत भी है, तो क्या सरकार को जंगल की जमीन पर बसने का हक है. जहां मन किया कुछ भी बनना दे और हम गरीबों का मकान तोड़कर हमें सड़कों पर फेंक दें.”          

खोरी गांव में मजदूरों के घर ढहाए जाने पर बरसे किसान नेता, खोरी में पंचायत करने का किया एलान

फरीदाबाद के सुरजकुंड से सटी अरावली की पहाड़ियों के पास बसे खोरी गांव के 10 हजार मजदूर परिवारों के घर उजड़ने की कगार पर हैं. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद प्रशासन इन घरों को हटाने की जुगत में है. घर गिराए जाने के नोटिस से परेशान खोरी गांव के लोग किसान आंदोलन के नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी के पास पहुंचे. गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने इन परिवारों का साथ देने की बात कही. किसान नेता चढ़ूनी ने गरीब परिवारों के घर ढहाए जाने के फरमान के खिलाफ खोरी गांव में पंचायत बुलाने का एलान किया. साथ ही किसान नेता चढूनी ने पूरे हरियाणा और देश की जनता से खोरी गांव के लोगों का साथ देने की भी अपील की.   

खोरी गांव में मजदूरों के घर ढहाए जाने के आदेश पर गुरनाम सिंह चढूनी ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “क्या खोरी गांव की उसी जमीन पर जंगल बनाना जरूरी है जहां पिछले कईं दशकों से लोग रह रहे हैं, क्या खाली पड़ी जमीनों पर जंगल नहीं बनाए जा सकते, जब कॉलोनी काटी जा रही थी, लोग अपने मकान बना रहे थे तब सरकार और प्रशासन कहां था.”

किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा सरकार को चेतावनी देते हुए कहा, “जहां लोग रह रहे हैं उनको वहां से उजाड़कर उसी जगह पर पेड़ लगाना कौन-सा कानून है. सरकार को हमारी चेतावनी है कि इन लोगों को वहां से न हटाया जाए. अगर हटाना है तो सरकार पहले इन लोगों को दूसरी जगह मकान बनाकर दिए जाएं वरना इन परिवारों को हटाने का कोई मतलब नहीं बनता है.

अगर खोरी गांव के लोगों के साथ छेड़छाड़ की गई तो इन एक लाख लोगों को भी कुंडली बॉर्डर जारी किसानों के धरने पर लेकर आएंगे. कुंडली बॉर्डर पर ही इन लोगों की खाने-पीने और रहने की व्यवस्था होगी और खोरी गांव के लाखों लोग भी हमारे साथ धरने में शामिल होंगे.     

बता दें कि इन घरों को हटाने के पीछे सुप्रीम कोर्ट ने खोरी गाँव के वन विभाग की ज़मीन पर गैर क़ानूनी तरीके से बसे होने की दलील दी है. कई सामाजिक संगठनों ने मिलकर इस मामले में पुनर्विचार याचिका भी दायर की थी मगर सुप्रीम कोर्ट ने उसको खारिज करते हुए 6 हफ्तों के भीतर प्रशासन को गाँव खाली करवाए जाने के आदेश दिया है.

फरीदाबाद के खोरी गांव में जान देकर आवास की कीमत चुका रहे मजदूर

फरीदाबाद के खोरी गांव में करीबन 10 हजार परिवारों के सर से छत छिन जाने का खतरा मंडराया हुआ है. इन परिवारों को सुप्रीम कोर्ट ने भी झटका दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फरीदाबाद के खोरी गांव के करीब 10 हजार घरों को छह हफ्ते के भीतर ढहाने के अपने पूर्व आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया है. एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस दिनेश महेश्वरी की पीठ ने यह आदेश दिया है. याचिका में घरों को ढहाने की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की गई थी. इन परिवारों के घरोंं को गिराए जाने के आदेश के विरोध में बंधुआ मुक्ति मोर्चा समेत कईं सामाजिक संगठनों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विरोध दर्ज कराया. सामाजिक संगठनों ने खोरी गांव के प्रवासी मज़दूरों के लिए पुनर्वास की मांग की.

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि, “अगर खोरी गांव जंगलात की जमीन पर बसा हुआ है इसलिए उससे बेदखल किया जा रहा है किंतु इसी जंगलात की जमीन पर बने हुए फार्म हाउस एवं होटल्स को बेदखली का सामना नहीं करना पड़ रहा है यह असमानता सत्ता के गलियारों में क्यों है? कानूनों एवं नियमों के मुताबिक वैश्विक महामारी के दौरान विस्थापन न्यायोचित नहीं है.”

सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने भी पुनर्वास नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि “देश में कई राज्यों में शहरी गरीबों के पुनर्वास हेतु नीतियां बनी हुई हैं, राज्य की जिम्मेदारी है कि उन नीतियों में संशोधन करें और यह संशोधन शहरी गरीबों को सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में होना चाहिए जिसकी आज हरियाणा में अत्यंत आवश्यकता है, उन्होने कहा कि “जब राज्य सरकार पूंजीपति वर्ग को जमीन देने की घोषणा कर रही है तो फिर खोरी गांव में रहने वाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को इस महामारी के दौरान बिना पुनर्वास किए कैसे विस्थापित किया जा रहा है.”

बंधुआ मुक्ति मोर्चा के जनरल सेक्रेटरी निर्मल गोराना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करते वक्त सरकार की जिम्मेदारी है कि वो पुनर्वास की योजना बनाकर पूर्ण संवेदनशीलता के साथ मजदूरों को पुनर्वास करें ताकि सरकार एवं न्यायालय से मजदूरों का विश्वास और भरोसा न टूटे.”

एडवोकेट अनुप्रधा सिंह ने कहा कि कोर्ट के आदेश के अनुसार हरियाणा सरकार खोरी गांव के घरों को तोड़ने के लिए तैयार हैं लेकिन साथ ही मजदूरों को पुनर्वास नीति 2010 के तहत पुनर्वास किया जाना चाहिए.  

हरियाणा के फरीदाबाद में अरावली की पहाड़ियों में पिछले 50 साल से बसा खोरी गांव आज उजड़ने की कगार पर है परंतु सरकार पुनर्वास का नाम तक नहीं ले रही है. खोरी गांव में बंगाली कॉलोनी, सरदार कॉलोनी, चर्च रोड, इस्लाम चौक, हनुमान मंदिर, लेबर चौक, पुरानी खोरी नाम से अलग-अलग कॉलोनियां बसी हुई हैं. ये सभी घर असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों के परिवारों के हैं. गांव में सभी सम्प्रदाय के मजदूर परिवार रहते हैं.

खोरी गांव, सूरजकुंड पर्यटक स्थल के पास है और इन्ही अरावली की पहाड़ियों में 50 फार्म हाउस और कई होटल्स बने हुए हैं लेकिन इन इमारतों को हाथ लगाने की हिम्मत आज तक न तो हरियाणा सरकार को हुई और न ही फरीदाबाद प्रशासन की. वहीं दूसरी ओर इस मामले में अब तक लगभग 20 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी हैं जिनमें से दो लोग जेल में बंद हैं तो घर उजड़ने की चिंता में दो लोगों ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली है.