शुक्रवार, 27 जनवरी 2023
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फरीदाबाद के खोरी गांव में जान देकर आवास की कीमत चुका रहे मजदूर



सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि, "अगर खोरी गांव जंगलात की जमीन पर बसा हुआ है इसलिए उससे बेदखल किया जा रहा है किंतु इसी जंगलात की जमीन पर बने हुए फार्म हाउस एवं होटल्स को बेदखली का सामना नहीं करना पड़ रहा है यह असमानता सत्ता के गलियारों में क्यों है? कानूनों एवं नियमों के मुताबिक वैश्विक महामारी के दौरान विस्थापन न्यायोचित नहीं है."

फरीदाबाद के खोरी गांव में करीबन 10 हजार परिवारों के सर से छत छिन जाने का खतरा मंडराया हुआ है. इन परिवारों को सुप्रीम कोर्ट ने भी झटका दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को फरीदाबाद के खोरी गांव के करीब 10 हजार घरों को छह हफ्ते के भीतर ढहाने के अपने पूर्व आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया है. एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस ए एम खानविलकर और जस्टिस दिनेश महेश्वरी की पीठ ने यह आदेश दिया है. याचिका में घरों को ढहाने की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की गई थी. इन परिवारों के घरोंं को गिराए जाने के आदेश के विरोध में बंधुआ मुक्ति मोर्चा समेत कईं सामाजिक संगठनों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर विरोध दर्ज कराया. सामाजिक संगठनों ने खोरी गांव के प्रवासी मज़दूरों के लिए पुनर्वास की मांग की.

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा कि, “अगर खोरी गांव जंगलात की जमीन पर बसा हुआ है इसलिए उससे बेदखल किया जा रहा है किंतु इसी जंगलात की जमीन पर बने हुए फार्म हाउस एवं होटल्स को बेदखली का सामना नहीं करना पड़ रहा है यह असमानता सत्ता के गलियारों में क्यों है? कानूनों एवं नियमों के मुताबिक वैश्विक महामारी के दौरान विस्थापन न्यायोचित नहीं है.”

सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने भी पुनर्वास नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि “देश में कई राज्यों में शहरी गरीबों के पुनर्वास हेतु नीतियां बनी हुई हैं, राज्य की जिम्मेदारी है कि उन नीतियों में संशोधन करें और यह संशोधन शहरी गरीबों को सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में होना चाहिए जिसकी आज हरियाणा में अत्यंत आवश्यकता है, उन्होने कहा कि “जब राज्य सरकार पूंजीपति वर्ग को जमीन देने की घोषणा कर रही है तो फिर खोरी गांव में रहने वाले असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को इस महामारी के दौरान बिना पुनर्वास किए कैसे विस्थापित किया जा रहा है.”

बंधुआ मुक्ति मोर्चा के जनरल सेक्रेटरी निर्मल गोराना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करते वक्त सरकार की जिम्मेदारी है कि वो पुनर्वास की योजना बनाकर पूर्ण संवेदनशीलता के साथ मजदूरों को पुनर्वास करें ताकि सरकार एवं न्यायालय से मजदूरों का विश्वास और भरोसा न टूटे.”

एडवोकेट अनुप्रधा सिंह ने कहा कि कोर्ट के आदेश के अनुसार हरियाणा सरकार खोरी गांव के घरों को तोड़ने के लिए तैयार हैं लेकिन साथ ही मजदूरों को पुनर्वास नीति 2010 के तहत पुनर्वास किया जाना चाहिए.  

हरियाणा के फरीदाबाद में अरावली की पहाड़ियों में पिछले 50 साल से बसा खोरी गांव आज उजड़ने की कगार पर है परंतु सरकार पुनर्वास का नाम तक नहीं ले रही है. खोरी गांव में बंगाली कॉलोनी, सरदार कॉलोनी, चर्च रोड, इस्लाम चौक, हनुमान मंदिर, लेबर चौक, पुरानी खोरी नाम से अलग-अलग कॉलोनियां बसी हुई हैं. ये सभी घर असंगठित क्षेत्र में कार्यरत मजदूरों के परिवारों के हैं. गांव में सभी सम्प्रदाय के मजदूर परिवार रहते हैं.

खोरी गांव, सूरजकुंड पर्यटक स्थल के पास है और इन्ही अरावली की पहाड़ियों में 50 फार्म हाउस और कई होटल्स बने हुए हैं लेकिन इन इमारतों को हाथ लगाने की हिम्मत आज तक न तो हरियाणा सरकार को हुई और न ही फरीदाबाद प्रशासन की. वहीं दूसरी ओर इस मामले में अब तक लगभग 20 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी हैं जिनमें से दो लोग जेल में बंद हैं तो घर उजड़ने की चिंता में दो लोगों ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली है.