तर वत्तर सीधी बिजाई धान, भूजल-पर्यावरण संरक्षण व खेती लागत बचत के लिए वरदान

फसल विविधीकरण किसान हितैषी वैकल्पिक फसल चक्र से ही सम्भव है. बारिश के मौसम में आधा पंजाब व हरियाणा प्रदेश जल भराव से ग्रस्त होने से, धान फसल का कोई व्यवहारिक विकल्प किसानों के पास नहीं है. क्योंकि मक्का व दलहन जल भराव के कारण गल जाती हैं और धान के मुकाबले आधा लाभ देती हैं. इसलिए अब भूजल बर्बादी वाली धान की रोपाई पर, क़ानूनी प्रतिबंध 15 जून की बजाय पहली जुलाई तक बढाकर, भूजल व खेती लागत बचत वाली तर- वत्तर सीधी बिजाई धान तकनीक को प्रोत्साहन दिया जाए. वैसे भी धान फसल किसान हितैषी (40,000 रूपये/एकड लाभ) होने के साथ-साथ, राष्ट्रीय हित में भी है, जो भारत की खाद्य सुरक्षा के साथ 63,000 करोड़ रूपये का वार्षिक निर्यात भी सुनिश्चित करती है . 

धान फ़सल से लगातार हो रही भूजल बर्बादी एक गंभीर समस्या जरूर है, लेकिन लाइलाज नहीं है. इस समस्या को किसान हितैषी व वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित “तर-वत्तर सीधी बिजाई धान” तकनीक को  अपनाकर आसानी से हल किया जा सकता है. पिछले साल पंजाब में लगभग सात लाख हेक्टर (यानि प्रदेश के कुल धान क्षेत्र के चौथाई हिस्से) और हरियाणा में लगभग 2 लाख हेक्टर भूमि पर सफलता से बहुत बड़े स्तर पर अपनायी गई और लगभग 28 किवंटल प्रति एकड़ की दर से रोपाई धान के बराबर ही पैदावार मिली. तर-वत्तर सीधी धान तकनीक अपनाने से धान रोपाई के बेकार के झंझटों (बुआई से पहले खेत में पानी खड़ा करके पाड़े काटना/ कद्दु करना, पौध बोना, उखाड़ना और फिर से लगाना और तीन महीने खेत में पानी खड़ा रखना आदि) से मुक्ति मिलती है और फसल का झंडा/बकानी रोग से भी प्रभावी बचाव होता है. तर- वत्तर सीधी बिजाई धान तकनीक में बुआई मूँग व गेंहू आदि फ़सलों की तरह बिल्कुल आसान है. जिसे इच्छुक किसान निम्नलिखित विधि अपनाकर, आने वाली पीढ़ियों के भूजल-पर्यावरण संरक्षण और खेती की लागत में भारी बचत कर सकते हैं. 

तर-वत्तर सीधी बीजाई धान तकनीक

1) किस्में : धान की सभी किस्में कामयाब हैं.  

2) बुआई का समय:  25 मई से 5 जून तक अच्छी नमी वाले तर-वत्तर खेत मे करें (मानसून आगमन से एक महीना पहले बुआई करें) यानि सीधी बीजाई धान की बुआई रोपाई धान की पौध नर्सरी की बुआई के समय पर ही करनी है.

3) खेत की तैयारी: पहले खेत को समतल बनाएं, फिर गहरी सिचांई, जुताई व तर-वत्तर (अच्छी नमी) तैयार कर खेत मे शाम के समय बुआई करें.

4) बीज की मात्रा व उपचार: बुआई से पहले बीज उपचार बहुत ज़रुरी है. एक एकड के लिए 8 किलो बीज को 12 घंटे 25 लीटर पानी मे डूबोएं, फिर 8 घंटे छाया मे सुखाकर, 2 ग्राम बाविस्टीन और एक मि.ली. क्लोरोपायरीफास प्रति किलो बीज उपचार करें. 

5) बुआई का तरीका: लाईन से लाईन की दूरी: 8-9 इंच, बीज की गहराई: मात्र एक इंच रखें.  बुआई बीज मशीन के अलावा छींटा विधि से भी हो सकती है. बुआई के बाद खेत की नमी बचाने के लिए हलका पाटा(सुहागा) लगाएं.

5) खरपतवार नियंत्रण: खरपतवार ज़माव रोकने को, बुआई के तुरंत बाद 1.5 लीटर पेंडामेथेलीन प्रति एकड 200 लीटर पानी मे  छिडकाव ज़रूर करें और आवश्कता पड़ने पर 20- 25 दिन बाद 100 लीटर पानी प्रति एकड मे 100 मि. ली. नामिनी गोल्ड (बिस्पाईरीबेक सोडीयम), या 400 मि.ली. राईस स्टार (फेनोक्सापरोप पी ईथाइल) या 8 ग्राम अलमिक्स (क्लोरीम्यूरान ईथाइल मेटसल्फूरान मिथाइल) या 90 ग्राम कौंसील एकटीव (ट्राईमाफोन 20: एथोक्सीसल्फूरान 10) य़ा 250 ग्राम  2,4- डी 80 प्रतिशत सोडीयम साल्ट का छिडकाव करें.

6)सिंचाई: पहली सिंचाई देर से 21 दिन के बाद और बाद की सिंचाई 10 दिन के अंतराल पर गीला-सूखा प्रणाली से वर्षा आधारित करें. बुआई के बाद अगर पहले सप्ताह में बे-मौसम वर्षा से भूमि की ऊपरी सतह पर करंड (मिट्टी सख्त हो), तो तुरंत हलकी सिचाई करें, वर्ना धान के उगे नये पौधे भूमि की सतह से बाहर नहीं निकल पायेंगे.

7) खाद की मात्रा: रोपाई धान की अनुमोदित दर और विधि से ही करें. धान फसल मे प्रति एकड सामान्यता 40 किलो नाईट्रोजन, 16 किलो फासफोरस और 8-10 किलो पोटाश की ज़रूरत होती है. नाईट्रोजन की एक तिहाही और फासफोरस की पूरी मात्रा बुआई के समय प्रयोग करें, जो एक बेग डी.ए. पी. प्रति एकड से पूरी हो जाती  है. यूरिया और म्यूरेट आफ पोटाश (MOP) उर्वरकों का प्रयोग मशीन के खाद बक्से में नहीं रखना चाहिए. इन उर्वरकों का प्रयोग टाप ड्रेसिंग के रुप में पहली सिंचाई यानि 21 दिन बाद करना  चाहिए, उसी समय 10 किलो ज़िंक सल्फेट प्रति एकड भी डालना  चाहिए. इस विधि से ऊगाई धान फसल की शुरुवाती अवस्था में अक्सर, आयरन की कमी से पौधो मे पीलापन देखा जाता है. उसके लिए, एक प्रतिशत आयरन सल्फेट का छिडकाव एक सप्ताह अंतराल पर दो बार करें. फसल मे बालिया निसरने पर एक किलो  घूलनशील इफको उर्वरक 13:0:45 प्रति एकड छिडकाव करें.

8) कीट-बिमारीयां प्रबंधन: रोपाई धान की अनुमोदित दर और विधि से ही करें, लेकिन ध्यान रखें कि रसायनिक दवाओं का प्रयोग  अनुमोदित दर से ज्यादा कभी नहीं करें. तने की सुंडी (गोभ के  कीडे) के 25-35 दिन के फसल अवस्था पर 8 किलो कारटेप रेत में  मिलाकर तथा पत्ता लपेट/ तना छेदक के लिए 200 मि.ली. मोनोक्रोटोफास या कलोरोपायरीफास या 400 मि.ली. क्वीनलफास 100 लीटर पानी में प्रति एकड प्रयोग करें. धान  निसरने के समय, ह्ल्दी रोग या ब्लास्ट से बचाव के लिए 200 ग्राम  कार्बेंडाज़िम या प्रोपीकानाजोल (टिलट) 200 लीटर पानी प्रति एकड छिडकाव करें. शीट ब्लाईट के लिए 400 मि. ली. वैलिडामाईसिन (अमीस्टार/लस्टर आदि) 200 लीटर पानी प्रति  एकड छिडकाव करें. फसल में दीमक की शिकायत होने पर, एक  लीटर कलोरोपायरीफास प्रति एकड सिंचाई पानी के साथ चलायें.

9) सीधी बिजाई तकनीक के बारे में सावधानियां 

– अगर बुआई के बाद पहले सप्ताह में, बेमौसम वर्षा हो जाए तो  भूमि की उपरी सख्त सतह तोडने के ह्ल्की सिंचाई करें, वरना धान के नये उगे पौधे भूमि  की सतह से बाहर नहीं आ पायेंगे.

– इस विधि से बोयी गई फसल रोपाई धान के मुकाबले पहले 40 दिन हलकी नजर आयेंगी, इसलिए किसान हौंसला बनाए रखें.

– सीधी बुआई धान खारे पानी और सेम व लवनीय भूमि मे खास सफल नहीं है. ऐसे क्षेत्रों मे किसान रोपाई धान ही लगाएं. 

– 15 जून के बाद धान की सीधी बिजाई नहीं करे और तब रोपाई विधि से धान की खेती फायदेमन्द रहेगी.

-बुआई समय पर कम तापमान व फसल पकाई समय पर मानसून वर्षा के कारण साठी धान (मार्च-अप्रैल बुआई) में सीधी बिजाई तकनीक कामयाब नहीं है .

10) सुगम पराली (फसल अवशेष) प्रबंधन : सीधी बिजाई धान फसल आमतौर पर रोपाई धान के मुकाबले 7-10 दिन पहले पकती है, ज़िससे किसानों को पराली प्रबंधन मे धान कटाई के बाद ज्यादा समय मिलने से भी पराली प्रबंधन मे सहायता मिलती है. इस विधि मे किसान जल्दी पकने वाली कम अवधी (125 दिन) की किस्मों पूसा बासमती-1509, पी.आर -126 आदि की खेती से, धान फसल की कटाई सितम्बर महीने में कर सकते हैं. ज़िससे फसल अवशेष (पराली) को भूमि मे दबाकर, गेंहू फसल की बुआई से पहले ढ़ेंचा या मूँग की हरी खाद के लिए फसल ली ज़ा सकती है. जो भूमि ऊर्वरा शक्ति बढाने और पराली जलाने से उत्पन होने वाले वायु प्रदूषण को रोकने में भी रामबाण साबित होगी.

(डॉ वीरेन्द्र सिंह लाठर, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, भारतीय कृषि  अनुसंधान संस्थान, नई  दिल्ली [email protected])

क्यों अटके पड़े हैं हरियाणा के पंचायत चुनाव?

23 फरवरी 2021 को हरियाणा में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल पूरा हो चुका है. सरकार ने सभी ग्राम पंचायतें भंग की हुई हैं. पंचायतों को भंग किए हुए साल से ऊपर हो चुका है. लेकिन अभी तक पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं. कब होंगे इस सवाल का अभी कोई जवाब सरकार के पास नहीं है.

क्यों अटके हुए हैं पंचायत चुनाव?

हरियाणा सरकार ने 2020 में पंचायती राज अधिनियम में संशोधन किया था.  इस संशोधन के तहत पंचायती राज में आठ फीसद सीटें बीसी-ए वर्ग के लिए आरक्षित की गई हैं और यह तय किया गया है कि एक पंचायत में इस वर्ग के लिए दो से कम सीटें नहीं होनी चाहिए. इसका मतलब है कि किसी भी पंचायत में कम से कम दो सदस्य तो बी सी-ए वर्ग से होने ही चाहिए. लेकिन यह कैसे लागू किया जायेगा इस पर सरकार ने अधिनियम में कुछ नहीं लिखा और न ही अभी तक बताया है. ग्राम पंचायत में किस प्रक्रिया के तहत यह आरक्षण लागू होगा, पंचायत समिति और जिला परिषद में कैसे? इस बारे में सरकार कुछ नहीं बता रही है. न ही इस बात को समझाया गया है कि यह 8% आरक्षण ब्लॉक स्तर पर तय होगा, जिला स्तर पर होगा या फिर राज्य स्तर पर.

सरकार ने कोर्ट में अर्जी दायर कर कहा है कि बीते दिनों कोरोना के प्रकोप के चलते चुनाव न करवाने का सरकार ने निर्णय लिया था. अब स्थिति बेहतर हो गई है इसलिए चुनाव करवाए जा सकते हैं. सरकार दो फेज में चुनाव करवाना चाहती है, पहले फेज में ग्राम पंचायत और दूसरे फेज में पंचायत समिति और जिला परिषद के चुनाव का प्रस्ताव है. कोविड को ध्यान में रखते हुए सरकार की ओर से कोर्ट में कहा गया था कि निकट भविष्य में सरकार चुनाव नहीं करवाएगी. ऐसे में अब चुनाव करवाने के लिए न्यायालय की अनुमति आवश्यक है.

दूसरी तरफ चुनाव आयोग का कहना है कि उनकी तैयारी पूरी है जैसे ही सरकार नोटिफ़िकेशन निकालेगी आयोग चुनाव करवा देगा. 

सरकार ने कोर्ट से जल्द चुनाव की अनुमति मांगी थी जिसपर हाईकोर्ट ने सरकार को राहत नहीं दी थी. ऐसे में बिना हाईकोर्ट की अनुमति के चुनाव संभव नहीं है.

गुरुग्राम के प्रवीण चौहान व अन्य ने 15 अप्रैल 2021 को हरियाणा पंचायती राज अधिनियम 2020 में किए गए संशोधन को भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक बताते हुए कोर्ट में चुनौती दी थी. याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया कि अधिनियम में संशोधन कर अब सीटों का 8 प्रतिशत बीसी-ए श्रेणी के लिए आरक्षित कर दिया गया है और न्यूनतम 2 सीटों का आरक्षण अनिवार्य है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बहुत सारे गांव ऐसे हैं जिनमें पंचायत सदस्यों की संख्या ही 4 से 5 हैं। अगर सरकार के नए कानून के हिसाब से चलें तो कम से कम दो सीट बीसी-ए वर्ग की होंगी, ऐसे में यह आरक्षण 8% न होकर 50% हो जायेगा  और कुल आरक्षण 70% से भी ऊपर पहूंच जायेगा जो कानून सम्मत नहीं है. याचिककर्ताओं के अनुसार हरियाणा में 8 प्रतिशत के हिसाब से केवल छह जिले हैं, जहां 2 सीटें आरक्षण के लिए बचती हैं. 18 जिलों में केवल 1 सीट आरक्षित की जानी है जबकि सरकार नए प्रावधानों के अनुसार न्यूनतम 2 सीटे अनिवार्य हैं। हाईकोर्ट ने कहा था कि सरकार अगर चाहे तो आरक्षण के नए प्रावधान को निलंबित कर पुराने नियमों के तहत चुनाव करवा सकती है. लेकिन सरकार इसके लिए तैयार नहीं हुई. सरकार ने कोर्ट में अंडरटेकिंग दी है कि जब तक याचिका पर फैसला नहीं होता तब तक सरकार निकट भविष्य में चुनाव नहीं करवा रही है. कोर्ट ने सरकार को अंडरटेकिंग पर रुख स्पष्ट करने या पुराने नियमों के तहत चुनाव करवाने का आदेश दिया था.  अभी 25 अप्रैल को कोर्ट में तारीख थी जिसमें कोई परिणाम नहीं निकला. अब हाई कोर्ट में अगली सुनवाई 4 मई को होगी. उम्मीद है इस सुनवाई के दौरान शायद कोई परिणाम निकले.

चुनाव नहीं होने से क्या दिक्कत आ रही है?

गाँव कोहला के एक बुजुर्ग किसान ने पंचायत चुनाव न होने पर कहा, “सरकार कोर्ट केस का बहाना बनाकर पंचयात चुनाव से बच रही है. चुनाव होंगे तो सरपंच बनेंगे और सरपंच बनेंगे तो सरकार को ग्रांट देनी पड़ेगी लेकिन सरकार ग्रांट देना नहीं चाहती, पिछले एक साल में सरकार बहुत सारा पैसा बचा चुकी है. इसकी वजह से गांवों का विकास कार्य रुका हुआ है. जब ग्रांट ही नहीं आएगी तो विकास कार्य कैसे होगा?”  

गाँव नूरण खेड़ा के एक मनरेगा मजदूर ने बताया, “पंचायत चुनाव न होने से मनरेगा का काम भी प्रभावित हुआ है. कुछ तो पहले ही कम काम मिलता था अब और भी ज्यादा दिक्कत हो रही है. मज़दूरों को अगर काम चाहिए तो उसके लिए मनरेगा डिमांड फार्म सरपंच को देना होता है जिसे लेने के लिए सरपंच ही नहीं हैं. जब पुराने सरपंच के पास जाते हैं तो कहता है कि उसके पास चार्ज ही नहीं है. जब ब्लॉक में जाते हैं तो वो सरपंच का काम बताकर टाल देते हैं. ऐसे में काम के लिए बड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है. या तो सरकार पुराने सरपंच को चार्ज दे या फिर जल्द चुनाव करवाए.”

गांव गढ़ी सराय नामदार खां में सरपंच पद के उम्मीदवार विष्णु सैनी ने बताया, “चुनाव न होने की वजह से ग्राम पंचायत का पुराना फ़ंड भी गांव के विकास कार्यों में नहीं लग पा रहा है. हर साल गांव में गलियों एवं सरकारी भवनों की मरम्मत करनी होती है जो रुकी हुई है. इस से गलियों की निकासी भी प्रभावित है और अन्य विकास कार्य भी रुके हुए हैं.”  

डीएनटी वॉच: सपेरा जनजाति के बेघर परिवारों पर जीवन जीने का संकट! 

बीती रात आए तेज अंदड की वजह से करनाल के कस्बे असन्ध में जींद बाईपास पर रह रहे सपेरा जनजाति की झुग्गी-झोपड़ियां तहस-नहस हो गईं. दिन के करीबन 11 बजे हैं और सुरजीत नाथ सपेरा अपनी पत्नी के साथ टुटी हुई झोपड़ी को ठीक करने में लगे हुए हैं.

सपेरा जनजाति के करीबन दस परिवार पिछले दो साल से इन झुग्गियों में रह रहे हैं इससे पहले सपेरा जनजाति के ये परिवार इसी कस्बे के दूसरे छोर पर रहते थे. वहां से हटा दिए जाने के बाद ये लोग जींद बाईपास के नए ठिकाने पर अपना ठोर-ठिकाना जमाए हुआ हैं. 

अपनी झुग्गी ठीक कर रहे सुरजीत नाथ ने बताया, “एक महीने पहले कार में बैठकर एक सरदार जी और एक मैडम आई थीं. मैडम सर्वे कर के ले गई लेकिन अब तक तो हमे कुछ भी नहीं मिला.”

रोजगार के सवाल पर सुरजीत ने बताया, “हम लोग पहले बीन बजाकर गांव-देहात में सांप का खेल-तमाशा दिखाकर अपना रोजगार चलाते थे लेकिन सरकार ने सब बंद करवा दिया. सरकार ने नये कानून बना दिये. अब हम अपने साथ सांप नहीं रख सकते हैं और न ही साप का खेल-तमाशा दिखा सकते हैं. कुछ दिन पहले सांप रखने के आरोप में जंगल के गार्ड हमारे एक बंदे को उठाकर ले गए और 30 हजार रुपये जुर्माना लगा दिया.”

सुरजीत ने आगे बताया, “यहां रहने वाले सपेरा जनजाति के लोग अब कूड़ा बीनने का काम करते हैं. कूड़े में से कांच और प्लास्टिक की बोतलें निकालकर बेचते हैं उसी से दो सौ, तीन सौ रुपये की दिहाड़ी बन जाती हैं. अब कमाई का कोई और साधन नहीं रहा, सरकार ने सब खत्म कर दिया.”

नेताओं से मदद से सावल पर सुरजीत ने कहा, “सब वोट मांगने आते हैं. वोट लेने के बाद कोई नहीं पूछने आता. हमें यहां से भी हटने को कह रहे हैं. अब यहां से झुग्गी उठाकर कहीं और जाएंगे. सरकार से एक ही मांग है कि हम लोगों को रहने के लिए कोई जगह दे ताकि हम भी अपना घर बना सकें. बच्चों को स्कूल भेज सके. मेरे साथ बच्चे भी कूड़ा बीनने के लिए जाते हैं कोई रहने का पक्का ठिकाना होता तो हम भी अपने बच्चों को स्कूल भेज देते लेकिन अब क्या करें आज यहां है तो कल का पता नहीं कहां होंगे.”

वहीं सरकारी सुविधाएं मिलने के सवाल पर सुरजीत ने कहा, “राशन कभी-कभी मिलता है. पहले सरसों का तेल मिल जाता था अब वो भी नहीं मिलता है ऊपर से इतना महंगा हो गया है तो बताओ अब क्या खांए.”   

दोपहर का वक्त है झोपड़ियों के अधिकतर लोग कूड़ा बीनने के लिए गए हुए हैं. सुरजीत के पास वाली झोपड़ी में रहने वाली प्रकाशो के पति पिछले कईं दिनों से बीमार हैं जिसके चलते वो अब कूड़ा बीनने नहीं जा रहे हैं. प्रकाशों ने बताया, “सरकार को हम लोगों के बारे में भी सोचना चाहिए. हम कब तक इस तरह की जिंदगी जीते रहेंगे. आंधी-तूफान, बारिश सब हमारे ऊपर से गुजर रही है. अब इस प्लॉट का मालिक भी हमें यहां से हटा रहा है. बोल रहा है या तो किराया दो वरना जगह खाली करो.”

ये लोग सरकार की हर योजना से महरूम है. सरकार की प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पक्के मकान बनाने की स्कीम भी उन लोगों तक पहुंच सकती है जिनके पास अपनी जमीन हो लेकिन इस समुदाय के पास तो अपनी जमीन तक नहीं है ऐसे में पक्का मकान कहां बनाएं.             

रैनके कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार देशभर में विमुक्त घुमंतू जनजाति के 50 फीसदी से ज्यादा लोग बेघर और करीबन 90 फीसदी बिना किसी दस्तावेज के रह रहे हैं.  सपेरा विमुक्त घुमंतू जनजाति है. हरियाणा में इनकी अच्छी खासी आबादी है, सपेरा जनजाति के कुछ लोगों के पास अपने मकान हैं लेकिन सुरजीत नाथ और प्रकाशों जैसे भी हैं जो आज भी सिर पर छत होने की उम्मीद लगाए बैठे हैं.

विद्यार्थियों के मुंह पर ताले जड़ते विश्वविद्यालय

हरियाणवी में एक कहावत है, “ठाड्डा मारै भी और रोण भी ना दे.” जिसका मतलब है, ताकतवर कमजोर को पीटता भी है और रोने भी नहीं देता. लेकिन क्या हो अगर ताकतवर इस से भी आगे बढ़कर कहे कि पीटेंगे भी और अगर रोना भी है तो कैसे रोना है यह भी वह खुद ही तय करेंगे?

पिछले कुछ समय में उत्तर भारत के कई विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं की कुछ इसी तरह की घेराबंदी हुई है. पहले विश्वविद्यालय प्रशासन फीस बढ़ाता है और जब विद्यार्थी इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाते हैं तो कहा जाता है कि बिना अनुमति के आप धरने-प्रदर्शन नहीं कर सकते. अगर करेंगे तो विश्वविद्यालय प्रशासन तय करेगा कि किस हिसाब से होगा और कहां होगा.

 22 अप्रैल को दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोक्टर कार्यालय ने एक नोटिस जारी कर कहा है, “अगर कोई भी संगठन यूनिवर्सिटी कैंपस में प्रदर्शन, धरना, रैली या किसी भी तरह का प्रोग्राम करना चाहता है, तो उसे लिखित में प्रॉक्टर ऑफिस से आज्ञा लेनी होगी.” जिस प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन करना है उसी प्रशासन से अनुमति लेनी है.

डीयू प्रॉक्टर द्वारा जारी किए गए इस नोटिस में कहा गया है कि किसी भी प्रकार के जुटान, प्रतिरोध या प्रदर्शन के लिए छात्रों को विश्वविद्यालय प्रशासन से 24 घण्टे पहले अनुमति लेनी आवश्यक है. साथ ही आयोजक छात्रों छात्राओं को अपनी पूरी अकादमिक जानकारी देनी होगी. प्रशासन के इस नोटिस के ख़िलाफ़ छात्र संगठनों द्वारा संयुक्त रूप से 25 अप्रैल को डीएसडब्ल्यू को ज्ञापन सौंपा गया है. छात्र संगठनों का आरोप है कि 22 अप्रैल को नई शिक्षा नीति के खिलाफ़ छात्र संगठनों और अध्यापक संगठनों ने मिलकर एक बड़ा प्रदर्शन किया था, कैम्पस में इस तरह की आवाज़ों को उठने से रोकने के लिए ही प्रशासन ने यह नोटिस इस प्रोग्राम के तुरंत बाद ही निकाला है.

इस से पहले भी सर्वोच्च न्यायालय के वकील प्रशांत भूषण के कार्यक्रम को प्रशासन बिलकुल शुरू होने से पहले ही रद्द कर चुका है. बीती 25 मार्च को “भारतीय संविधान के सामने चुनौतियां” नाम से यह प्रोग्राम होना था, जिसे शुरू होने से ठीक पहले रद्द कर दिया गया. ऐसा ही एक कार्यक्रम 19 अप्रैल को भगत सिंह छात्र एकता मंच ने रखा था, जिसको रद्द करने की पूरी कोशिश की गई और अंत में सिर्फ चर्चा तक इस कार्यक्रम को सीमित कर दिया गया.

24 अप्रैल को रविवार के दिन हरियाणा में रोहतक के महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय (एमडीयू) के रजिस्ट्रार ने भी इसी तरह का आदेश जारी किया है, जिसमें उन्होंने कहा है, “वीसी के आवास,सचिवालय, परीक्षा सदन, पुस्तकालय, शिक्षण खंड, टैगोर सभागार, आरके सभागार, छात्रावास परिसर और विश्वविद्यालय के गेटों के 100 मीटर के दायरे में किसी भी संघ/संगठन/व्यक्तियों के समूह द्वारा कोई धरना/प्रदर्शन नहीं किया जाएगा.”  अप्रत्यक्ष तौर पर प्रशासन कहना चाहता है कि विश्वविद्यालय में कहीं भी धरना प्रदर्शन नहीं कर सकते. अगर करना है तो 72 घण्टे पहले अनुमति लेनी होगी. मदवि के छात्र संगठनों ने कहा है कि वे 26 अप्रैल को इस फैसले की प्रति जलाकर विरोध करेंगे. छात्र एकता मंच से नरेश, छात्र युवा संघर्ष समिति से लोकेश, दिशा छात्र संगठन से इंद्रजीत अरविन्द, वाल्मीकि छात्र महासभा से रमन ने संयुक्त रूप से कहा,”हमें संगठित होकर विरोध करने का हक संविधान में मिला है जिसे प्रशासन खत्म कर रहा है. यह विद्यार्थियों की आवाज़ दबाने का प्रयास है जिसे हम सहन नहीं करेंगे.“ 

इस साल मदवि प्रशासन ने अलग-अलग तरह की फ़ीसों में दो से ढाई गुना तक बढ़ोतरी की है. विद्यार्थी बढ़ी हुई फ़ीसों के खिलाफ़ संघर्ष कर रहे हैं. 19 अप्रैल को छात्र संगठनों ने प्रदर्शन कर चेतावनी दी थी कि अगर फीस कम नहीं की गई, तो 25 अप्रैल को स्थाई धरना शुरू करेंगे. धरना शुरू करने से ठीक एक दिन पहले प्रशासन ने यह नोटिस निकाला गया है. इसके बावजूद विद्यार्थी लाइब्रेरी के पास धरने पर बैठे हुए हैं.

एक ऐसा ही आदेश चंडीगढ़ के पंजाब विश्वविद्यालय के प्रशासन ने 20 अप्रैल को निकाला था. पंजाब विश्वविद्यालय प्रशासन ने बढ़ी हुई फीस का विरोध कर रहे विद्यार्थियों को रोकने के लिए नोटिस निकाला था कि उन्हें हर समय अपने पहचान पत्र साथ रखने होंगे. अगर प्रदर्शन में शामिल कोई भी विद्यार्थी पहचान पत्र नहीं दिखाता है, तो उसको एक हफ्ते के लिए विभाग से सस्पैंड कर दिया जाएगा.

सिर्फ इतना ही नहीं है, अगर कोई विद्यार्थी वाइस चांसलर से मिलना चाहता है तो यह अब मुश्किल होने के साथ-साथ नामुमकिन होता जा रहा है. एमडीयू के छात्र सुमित कुमार ने गांव सवेरा को बताया, “एमडीयू वीसी ने छात्रों से मिलकर उनकी समस्या सुनने की परपंरा और कर्तव्य से पूरी तरह पल्ला झाड लिया है. सिक्योरिटी गार्डस को वीसी की तरफ से आदेश है कि छात्रों को मेरे ऑफिस में ना भेजा जाए. इस आदेश की पालना में गार्ड छात्रों के साथ बदतमीजी तक उतर आते हैं. कई दफे तो वीसी से मिलने आए छात्रों को घसीट कर ऑफिस से बाहर निकाला गया है.”

सुमित ने बताया कि एमडीयू के वीसी से मिलने के लिए 5 दरवाजों से होकर गुजरना पड़ता है और हर दरवाजे पर पूछताछ की जाती है. ऐसे में कोई आम छात्र तो वीसी से मिलने की सोच भी नहीं सकता. छात्र संगठनों के साथ भी वीसी का यही रवैया रहता है. जब छात्र संगठन विरोध-प्रदर्शन करते हुए वीसी से मिलने जाते है तो गार्डस का एक ही सुर निकलता है “V. C नहीं मिला करता और बता दो किसतै मिलना है”.

छात्र युवा संघर्ष समिति के लोकेश कुमार हमें ने बताया, “वीसी का यह बर्ताव केवल उन्हीं छात्र संगठनों के साथ होता है जो लगातार छात्र हितों की आवाज उठाते रहते हैं. ऐसे छात्र संगठन एमडीयू प्रशासन की आंख की किरकिरी बने हुए हैं. इसके उल्ट भाजपा की छात्र विंग एबीवीपी व अन्य छात्र संगठन जो वीसी की जी हुजूरी में लगे रहते हैं, उनको एमडीयू वीसी का पूरा स्पोर्ट रहता है. बीती 23 मार्च को ऐसे ही एक छात्र संगठन के कार्यक्रम मे एमडीयू वीसी ने स्वयं मुख्य अतिथि के तौर पर शिरकत की थी. वीसी ऑफिस में छात्रों को मोबाइल ले जाने की मनाही है. बाहर ही गार्ड द्वारा उनके मोबाईल ले लेते हैं, जबकि वीसी के चहेते छात्र संगठन एबीवीपी के कार्यकर्ता वीसी ऑफिस में मोबाइल भी लेकर जाते है और उनके साथ फोटो भी खिंचवाते है और सुबह अखबार में खबर भी छपी मिलती है. यह दोगला व्यवहार छात्रों के साथ एमडीयू वीसी सरेआम करते हैं.”

यही हाल दिल्ली विश्वविद्यालय का भी है. डीयू के राजनीति विज्ञान विभाग के छात्र दीपक ने गाँव सवेरा को बताया, “कोई भी साधारण छात्र या छात्रा वीसी से नहीं मिल सकता. वीसी से मिलना इतना आसान नहीं है. अपने ऑफिस में वह आते जरूर हैं लेकिन साधारण छात्र-छात्राओं की परेशानी से उन्हें कोई सरोकार नहीं है.”

छात्र अधिकार कार्यकर्ता और पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र गगन बताते हैं, “पिछले चार साल में वाइस चांसलर एक बार भी नहीं मिले हैं. भाजपा के आने के बाद ज़्यादातर वाइस चांसलर या तो संघ की पृष्ठभूमि से आ रहे हैं या फिर उसकी विचारधारा से प्रभावित. पहले अथॉरिटी और विद्यार्थियों के बीच एक चर्चा चलती रहती थी, लेकिन अब यह चर्चा रुक गयी है. सारी शक्तियां वाइस चांसलर ने खुद तक सीमित कर ली हैं और खुद विद्यार्थियों से मिलते भी नही हैं. वाइस चांसलर ने अपने घर के चारों तरफ ऐसी तार पुरवा रखी है, जैसे अफगानिस्तान में अमेरिकन एंबेसी हो.“ 

आखिर क्यों हो रहा है यह सब?

द कैरवैन पत्रिका के संपादक हरतोष सिंह बल ने अप्रैल 2019 में एक रिपोर्ताज “सोच पर कब्जा: RSS की बौद्धिक जगत में घुसपैठ” के नाम से लिखा था. इस रिपोर्ताज में वह समझाने कि कोशिश करते हैं कि कैसे शिक्षा जगत में संघ अपनी विचारधारा के अधिपत्य को स्थापित करने के उद्देश्य से काम कर रहा है.

इसी तरह की राहुल संपाल की एक स्टोरी जुलाई 2020 में द प्रिंट में छप चुकी है, जिसमें वह बताते हैं कि किस तरीके से देश के प्रमुख शैक्षणिक, कला और सांस्कृतिक संस्थानों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के लोगों को बैठाया जा रहा है.  

तोशाम के डाडम में फिर हुए दो हादसे, दो दिन में दो मौत और प्रशासन मौन

बीती 24 अप्रैल, इतवार के दिन भिवानी के डाडम खनन क्षेत्र में पहाड़ गिरने के कारण दो मजदूरों की मौत हो गई और एक मजदूर गंभीर रूप से घायल हो गया. पीड़ितों की पहचान ड्रिल मशीन ऑपरेटर का काम करने वाले गांव के ही निवासी सोनू कुमार (35) और खनन क्षेत्र में ड्राइवर का काम करने वाले भिवानी जिले के दुल्हेड़ी गांव के भीम सिंह के रूप में हुई है.

इतवार को काम के दौरान पहाड़ के नीचे दब गए सोनू की सात महीने पहले शादी हुई थी और वह अपने परिवार में अकेला ही कमाने वाला था. पत्थरों के नीचे दबे सोनू को हिसार के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. उससे एक दिन पहले शनिवार को भीम सिंह की भी पत्थरों के तले दबने की इसी तरह की घटना के कारण खदान में मौत हो गई थी.

इस मामले में डाडम निवासी जयपाल कुमार, जिनके खेत खनन क्षेत्र के पास हैं, ने तोशाम पुलिस स्टेशन में ठेकेदारों के खिलाफ औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें उन्होंने अंधाधुंध अवैध खनन के कारण हुई मौतों का आरोप लगाया. जयपाल ने पत्रकारों को बताया, “1 जनवरी की घटना के बाद, डाडम खनन क्षेत्र के एक हिस्से को खतरनाक घोषित कर बंद कर दिया गया था, लेकिन कंपनी ने प्रतिबंधित गड्ढे संख्या 12 पर अवैध रूप से खनन कार्य जारी रखा.

ठेका कंपनी गोवर्धन माइंस के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि ताजा घटनाएं उनके खेतों के काफी नजदीक हुईं हैं और कंपनी मजदूरों से बिना सुरक्षा उपकरण के काम करवा रही है. सभी कानूनों का पालन करने का दावा करने वाली कंपनी के झूठ को पकड़ने के लिए उनकी सही से जांच होनी चाहिए.

खनन में ही काम करने वाले एक मजदूर ने बताया,  “खनन कंपनी ने दो मृतकों के परिवारों को उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं करने के बदले में मोटी रकम देने की बात कर रही है. सोनू, पिछली बार, जब नए साल पर पहाड़ गिरा तो बच गया था. उस दौरान पांच मजदूरों की मौत हुई थी. लेकिन इस बार मौत ने उसे लील लिया. हम हर वक्त मौत के मुंह में खड़े होकर काम कर रहे हैं.”

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के खनन मंत्री मूलचंद शर्मा ने बताया है कि ठेका कंपनी ने एक जनवरी की घटना में मारे गए लोगों के परिजनों को 10 लाख रुपये से 15 लाख रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की थी.

इस साल एक जनवरी को हुई घटना के बाद भिवानी के तोशाम क्षेत्र में खनन क्षेत्र के उस हिस्से में खान एवं सुरक्षा महानिदेशालय द्वारा सभी कार्य गतिविधियों पर रोक लगा दी गई थी, जिसकी भरपाई के लिए ठेकेदार खुले क्षेत्रों में सुरक्षा नियमों की अनदेखी कर आक्रामक रूप से पहाड़ी की खुदाई कर रहे हैं. गांव वालों ने यह भी बताया कि 19 अप्रैल को एक पोपलैन मशीन पर एक पत्थर गिर गया था और उसे कुचल दिया था, लेकिन गनीमत रही कि घटना के वक्त चालक वाहन के अंदर नहीं था.

पत्रकारों ने भिवानी के उपायुक्त आरएस ढिल्लों से बार बार संपर्क करने के प्रयास किए, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया.

गौरतलब है कि तोशाम खनन क्षेत्र में बीती 1 जनवरी को डाडम पहाड़ के पिट नंबर 37-38 में भारी हादसा हुआ था, जिसमें पहाड़ के दरकने की वजह से 10 से अधिक मजदूर दब गए थे, जिनमें पांच की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे. उस समय डाडम पहाड़ के माइनिंग माफिया 4 पोकलेन, 2 ड्रिल, अनेकों डंपर और बहुत सारे माइनिंग के कर्मचारियों से 40 मीटर के खतरनाक बेंच के नीचे गैरकाननूनी ढंग से जबरदस्ती काम करवा रहे थे.

भिवानी जिला के खानक और डाडम के डाडम पहाड़ में अवैध तरीके से माइनिंग काफी समय से जारी है. डाडम में अवैध खनन के विरोध में काम कर रहे एक एक्टिविस्ट ने पत्रकार राजेश कुंडु से बातचीत करते हुए बताया,” जिस प्रकार अनसाइंटिफिक तरीके से डाडम में खनन हो रहा था इसकी लिखित में शिकायत वहां के तत्कालिक जिला उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक, माइनिंग इंजीनियर और डायरेक्टर माइन्स को कई बार दे चुका हूं, लेकिन कार्यवाही के नाम पर मात्र लीपापोती की गई. मैंने उन्हें लिखित में आगाह किया था कि जिस तरीके से खनन हो रहा है कभी भी पहाड़ दरक कर कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है लेकिन इस पर कोई भी कार्यवाही नहीं की गई जिसका अंजाम इस साल हुए अनेकों हादसों के रूप में बहुत सारे परिवारों को भुगतना पड़ रहा है. इस माइनिंग के खेल में लगभग दस से ज्यादा बड़े खिलाड़ी शामिल है जिनमें माफिया के अलावा सत्ता पक्ष, विपक्ष के नेता एवं दिल्ली में बैठे कुछ बहुत ही शक्तिशाली लोग भी है.”

फेल साबित हुए खाद्य सब्सिडी पर हमला बोलने वाले पीडीएस विरोधी अर्थशास्त्री

लगातार दो साल तक महामारी और लॉकडाउन की मार झेलने के बाद इस साल आम जनता पर महंगाई की मार पड़ रही है। खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर निर्माण सामग्री, ईंधन और दैनिक उपयोग की लगभग सभी वस्तुओं के दामों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। गत मार्च महीने में थोक महंगाई दर चार माह के उच्चतम स्तर 14.55% थी जबकि खुदरा महंगाई दर 17 माह में सबसे ज्यादा 6.95% फीसदी रही है। थोक महंगाई साल भर से हर महीने 10 फीसदी के ऊपर बनी हुई है और पिछले साल के मुकाबले लगभग दोगुनी हो गई है। पिछले तीन दशक में यह महंगाई का सबसे भीषण दौर है जिसने आम जनता की कमर तोड़ दी है।

इस बेतहाशा महंगाई में सबसे ज्यादा चिंताजनक खाने-पीने की वस्तुओं की बढ़ती कीमतें हैं। महंगाई के साथ-साथ बढ़ती बेरोजगारी और आय में कमी देश की खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता का सबब है। पेट्रोलियम और खाद्य तेलों जैसी जिन वस्तुओं के लिए देश आयात पर निर्भर है उनके दाम तो बढ़ ही रहे हैं लेकिन गेहूं जैसी जिन चीजों से देश के भंडार भरे पड़ रहते हैं उनकी महंगाई भी लोगों की रसोई का बजट बिगड़ रही है। खाने-पीने की चीजों में महंगाई का सिलसिला लॉकडाउन के दौरान ही शुरू हो गया था जो लगातार जारी है। महंगाई से निपटने के लिए जमाखोरी और कालाबाजारी पर अंकुश लगाना भी जरूरी था। इसलिए कृषि कानूनों के तहत जिस आवश्यक वस्तु अधिनियम को केंद्र सरकार निष्प्रभावी कर चुकी थी, आखिरकार उसी कानून का सहारा लेना पड़ा। जबकि बाजारवादी अर्थशास्त्री कृषि को बाजार के हवाले करने की पैरवी कर रहे थे।

कमरतोड़ महंगाई के लिए यूक्रेन-रूस युद्ध को प्रमुख वजह बताया जा रहा है। लेकिन घरेलू मोर्चे पर नीतिगत खामियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। बढ़ती महंगाई के पीछे जमाखोरी और कालाबाजारी पर अंकुश लगाने में सरकार की नाकामी भी एक बड़ी वजह है। इसके अलावा पेट्रोल-डीजल और गैस पर ऊंची टैक्स दरों के जरिये ज्यादा से ज्यादा राजस्व जुटाने की नीति ने भी देश को महंगाई की आग में झोंक दिया है। वो तो भला हो देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खाद्यान्न की सरकारी खरीद व्यवस्था का, जिसके कारण देश के करोड़ों लोगों का पेट भर पाया।

बाजार समर्थन अर्थशास्त्री इसी पीडीएस सिस्टम की आलोचना करते हुए किसानों को कम अनाज उगाने और सरकार को अनाज की कम खरीद करने का सुझाव दिया करते थे। लेकिन कोविड काल में यही पीडीएस सिस्टम काम आया। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत देश भर में 5 किलो अतिरिक्त अनाज विधानसभा चुनावों में भी भाजपा की जीत की बड़ी वजह बना। मतलब, किसानों को बेहतर दाम और खरीद का भरोसा देकर खाद्यान्न उत्पादन व सरकारी भंडार बढ़ाने की नीति राजनीति और अर्थशास्त्र दोनों ही लिहाज से कारगर थी।

कृषि बाजार को निजी क्षेत्र के हवाले करने की दलीलें दी जा रही थी, अगर सरकार उस रास्ते पर चली होती तो सोचिये क्या होता? 80 करोड़ लोगों को 5 किलो अनाज कैसे मिलता? इस तरह देखा जाए तो आंदोलनकारी किसान गलत नीतियों के खिलाफ और देश की खाद्य सुरक्षा के हित में संघर्ष कर रहे थे। जबकि प्रो-मार्केट अर्थशास्त्री देश को जिस दिशा में ले जाना चाहते थे, उससे देश की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती थी। यह सरकार के लिए बड़ा सबक है।

पिछले तीन वर्षों में गेहूं और धान की सरकारी खरीद करीब डेढ़ गुना बढ़ी है। इसी के बूते करोड़ों लोगों को पीडीएस का अतिरिक्त अनाज मिल सका। क्योंकि भारत में कृषि उत्पादों के दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार से कम थे। लेकिन इस साल हालात बदल गये हैं। मार्च-अप्रैल में ज्यादा गर्मी की वजह से गेहूं उत्पादन में कमी का अनुमान है। अगर मानसून ने गड़बड़ी की तो धन की उपज भी घट सकती है। दूसरी तरफ यूक्रेन संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की मांग बढ़ गई है। इन दो कारणों से इस साल गेहूं की सरकारी खरीद कम रहने का अनुमान है। इस सीजन में अब तक गेहूं की सरकारी खरीद पिछले साल के मुकाबले करीब 25% कम है। इसका सीधा असर केंद्रीय पूल में गेहूं के स्टॉक सरकार द्वारा मुफ्त में अनाज देने की योजना पर भी पड़ सकता है। अभी तक गेहूं की ज्यादातर खरीद पंजाब और हरियाणा में हुई है। यही दो राज्य देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूती दे रहे हैं।

इस बीच केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को सितंबर तक बढ़ा दिया है। इसकी पूर्ति के कारण अगले साल तक केंद्रीय भंडार में बफर स्टॉक के आसपास ही अनाज बचेगा। यानी सितंबर के बाद अतिरिक्त राशन की योजना को जारी रखना मुश्किल होगा। यूक्रेन-रूस युद्ध के कारण दुनिया भर में उर्वरकों की आपूर्ति भी बाधित हुई है। इसका असर भी कृषि उत्पादन और कीमतों पर पड़ रहा है जिससे खाद्य वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं। ऐसे में अगर कोरोना के केस बढ़ते हैं और फिर से लॉकडाउन की नौबत आती है तो स्थिति विकट होगी।

इस तरह खाद्य सुरक्षा के मामले में सरकार को कई मोर्चों पर जूझना पड़ेगा। निर्यात को नियंत्रित करने, सरकारी खरीद को बढ़ाने या फिर जमाखोरी पर अंकुश लगाने जैसे बेहद सीमित उपाय सरकार के सामने हैं। ऐसे में बहुत कुछ अच्छे मानसून और कोरोना की स्थिति पर भी निर्भर करेगा। लेकिन एक बात तो तय है कि खाद्य मुद्रास्फीति का यह दौर जल्द थमता नजर नहीं आता है।

बैंक अधिकारियों की मिलीभुगत से दुष्यंत चौटाला के जीजा ने कोड़ियों के भाव हड़पी किसान की जमीन

करनाल के जलाला गाँव के किसान रसपाल सिंह (58) के घर उस समय मातम पसर गया, जब उन्हें पता चला कि इलाहाबाद बैंक ने उनकी सवा दो एकड़ जमीन नीलाम कर दिया. रसपाल की सवा दो एकड़ जमीन को साल 2016 में जजपा नेता देवेंदर काद्यान ने बैंक से सिर्फ 17 लाख रुपए में खरीद लिया, जबकि बैंक ने किसान को नीलामी की कोई जानकारी नहीं दी. उस समय इस जमीन की कीमत 56 लाख रुपए थी, लेकिन जजपा नेता काद्यान ने बैंक अधिकारियों की मिलीभुगत के चलते जमीन के वास्तिक मूल्य से 300 प्रतिशत कम दाम में खरीद लिया था.

किसान रसपाल के बेटे गगनदीप (36) ने हमें बताया, “मेरे पिताजी ने साल 2007 में अपनी सवा दो एकड़ जमीन पर इलाहाबाद बैंक से डेयरी के लिए 11 लाख रुपए का लोन लिया था. डेयरी पालन में 6 गायों की बीमारी की वजह से मौत हो गई. इन पशुओं का बीमा भी हमने करवाया था, जिसकी भरपाई बैंक ने आज तक नहीं की. मेरी मां को भी तब कैंसर हो गया, जिसकी वजह से हमारे हालात और भी बिगड़ गए.”

रसपाल ने लगभग तीन लाख रुपए लोन के भरे भी, लेकिन पशुओं की मौत से हुए नुकसान और घर के बिगड़े हालातों की वजह से सारा लोन नहीं चुका सके. ब्याज के कारण धीरे-धीरे इस लोन की राशि 17 लाख रुपए हो गई. बैंक ने बिना नोटिस और बिना कोई जानकारी दिए जमीन को नीलाम कर दिया, जिसे जजपा नेता कादयान ने 17 लाख रुपए में खरीद लिया.

रसपाल के बेटे गगनदीप ने गांव सवेरा को बताया, “बैंक ने हमें नीलामी की कोई जानकारी नहीं दी. हमें खुद तहसील में काम करने वाले हमारे एक जानकार से काफी दिनों बाद पता चला. साल 2017 में मामला सुलटाने के लिए हम चंडीगढ़ बैंक के बड़े अधिकारियों से भी मिले. अधिकारी ने हमें सारी कागजी कार्यवाई के साथ दस लाख रुपए में मामला खत्म करने की बात कही.”

किसान के पास जमीन बेचकर इस मामले को खत्म करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था. इसीलिए उसने तय किया कि वह एक एकड़ जमीन बेचकर लोन चुका देगा और कुछ पैसे अपनी पत्नी की बीमारी के लिए रख लेगा. लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाया, क्योंकि सवा दो एकड़ जमीन का कानूनी मालिक अब जजपा नेता देवेन्द्र काद्यान बन गया था.

गगनदीप ने हमें बताया, “बीती 16 अप्रैल को देवेन्द्र काद्यान के परिवार के लोग और उनका वकील कोर्ट के आदेशों के हवाले से जमीन पर कब्जा लेने के लिए पुलिस फोर्स के साथ आए थे. लेकिन हमारे आसपास के किसान इकट्ठा हो गए और वे कब्जा नहीं ले पाए.

इस मामले में किसान का साथ दे रहे भारतीय किसान यूनियन (चौ छोटू राम) के किसान नेता जगदीप सिंह औलख ने हमें बताया, “जजपा नेता देवेंदर काद्यान ने अधिकारियों के साथ मिलकर धोखाधड़ी से जमीन अपने नाम करवाई है. जमीन की बोली की सूचना किसान को नहीं दी गई और न ही जमीन बिकने पर किसान को सूचित किया गया. इतना ही नहीं, पटवारी और तहसीलदार को भी कोई जानकारी नहीं दी गई. न ही कोई मुनादी करवाई गई.”

जगदीप ने आरोप लगाया कि बैंक ने जमीन की बोली इस तरीके से लगवाई कि किसी को पता ही न चल पाए. बैंक ने नीलामी की खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में निकलवाई जोकि अंग्रेजी अखबार है. आम किसान और ग्रामीण को न तो ई-नीलामी की जानकारी मिली और न ही अखबार में दिए गए विज्ञापन की. यह सब सिर्फ खानापूर्ति के लिए किया गया ताकि जमीन देवेंदर काद्यान खरीद सके.

बैंक के अधिकारियों के साथ मिलीभुगत कर आखिरकार किसान की जमीन देवेंदर ने खरीद ली. किसान को यह जानकारी न तो बैंक की तरफ से दी गई और न तहसील के किसी अन्य अधिकारी की तरफ से. जमीन खरीदने के बाद देवेंदर काद्यान ने कोर्ट में कब्जे के लिए केस कर दिया और कोर्ट आदेश आने के बाद 16 अप्रैल को पुलिस की मदद से कब्जा लेना चाहा.

काद्यान के इस कदम की वजह से इलाके के किसान गुस्सा हो गए और उन्होंने बीती 18 अप्रैल को करनाल डीसी कार्यालय पर प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारी किसानों ने देवेंदर काद्यान एवं बैंक कर्मियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता कि धारा 420 के तहत मुक़द्दमा दर्ज़ करने की मांग की. जगदीप ने बताया कि किसान के नीलामी से संबन्धित किसी भी कागज पर हस्ताक्षर नहीं हैं.

किसान नेता जगदीप औलख ने बताया, “यह जमीन देवेन्दर काद्यान ने अपने भाई दीपक काद्यान के नाम करवा रखी है, लेकिन सारी डील खुद करता है. देवेन्दर रिश्ते में उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के जीजा भी हैं.”

इस मामले में करनाल उपायुक्त अनीश यादव ने सहायक जिला उपायुक्त सतीश कुमार के नेतृत्व में जांच कमेटी का गठन कर मामले की जांच के आदेश दे दिए हैं.

किसान परिवार के साथ हुए इस अन्याय के खिलाफ प्रदेशभर में आवाज उठ रही हैं. 20 अप्रैल को भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के नेता राकेश टिकैत किसान से मिलने के लिए आए थे और 21 अप्रैल को भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) से गुरनाम सिंह चढ़ूनी भी आए थे. दोनों किसान नेताओं ने यह आश्वासन दिया है कि किसान के साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा.    

हरियाणा पुलिस ने किसान को थप्पड़ मार 2 ट्राली तूड़ी गौशाला में खाली करवाई, गोशालाओं में तूड़ी डालने के लिए धक्केशाही कर रहे अफसर

21 अप्रैल की रात हरियाणा के हिसार-फतेहाबाद रोड़ पर अपने पशुओं के लिए तूड़ी ले जा रहे एक किसान को गांव धांगड़ में पुलिसकर्मियों ने थप्पड़ मारकर तूड़ी से भरी दो ट्रालियों को 500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब में जबरदस्ती धांगड़ की गोशाला में खाली करवा लिया. यह मामला सिर्फ एक किसान का नहीं है. बल्कि पिछले तीन दिनों से सैंकड़ों किसान प्रशासन की इस जबरदस्ती की मार झेल रहे हैं.

तूड़ी एसोसिएशन के सदस्य रामपाल बिश्नोई ने हमें बताया, “फतेहाबाद जिले के अफसर और पुलिस उनकी ट्रालियों को जबरदस्ती रुकवा रहे हैं और किसानों के साथ हाथापाई कर जबरन 500 रुपये के हिसाब से तूड़ी गोशाला में डलवा दे रहे हैं. जो किसान मारपीट के बाद भी नहीं मान रहा, उसके व्हीकल का 50 हजार से लेकर डेढ लाख रुपए का चलान काट दे रहे हैं.”

फतेहाबाद और सिरसा जिले के प्रशासन ने किसानों को बाहर तूड़ी लाने-ले जाने पर रोक लगा रखी है और किसानों की धरपकड़ शुरू कर रखी है. गोशालाओं में तूड़े की कमी को पूरा करवने के लिए जिला प्रशासन, पुलिस और गोशालाओं की टीमें तूड़ी ढो रहे किसानों की ट्रालियों को रोक रहे हैं और किसानों के साथ बदसलूकी कर उनसे उनका तूड़ा छीन लिया जा रहा है.

बीते दिन, 22 अप्रैल को तूड़ी एसोसिएशन के सदस्यों की बैठक भी हुई, लेकिन न प्रशासन ने उनकी कोई बात मानी, न ही किसान झुके. बिश्नोई ने हमें बताया, “हम 800 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से तूड़ी खरीद रहे हैं, ढुलाई और भरवाई का खर्च रह गया वह अलग. ये अफसर जबरदस्ती 500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से खाली करवा रहे हैं. किसान तो अबके पहले ही कम पैदावार की मार झेल रहा है, ये और आ गए तंग करने. हमारे पशुओं का भूखा मारेंगे क्या?”

किसान संगठनों के सदस्य भी लगातार इस मामले में प्रशासन से मिलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बड़े अफसर नरारद हैं. किसान नेता मनदीप नथवान ने हमें बताया, “शुक्रवार को हम आला अधिकारियों से मिलने गए थे. लेकिन डीसी, एसडीएम और एसपी, तीनों बड़े अफसरों से मुलाकात नहीं हो पाई. आज हम 700-800 किसानों के साथ जिला सचिवालय जाएंगे. जिन किसानों से जबरन तूड़ा खाली करवाया है, उनके मुआवजे की भी बात करेंगे और जिन पुलिस अधिकारियों ने किसानों के साथ मारपीट की है उनपर केस दर्ज करवाएंगे.”

इस मामले को लेकर फतेहाबाद के डीसी प्रदीप कुमार ने गांव सवेरा को बताया, “गौशाला के पशुओं का पेट भी भरना जरूरी है, जो कुछ कमी-पेशी मिलेगी, उसको दूर कर देंगे. जिन किसानों को कम पैसे मिले हैं, उस गैप को पूरा करने की कोशिश करेंगे. किसान के साथ मारपीट की बात नहीं हो सकती. अधिकारी पुलिस के साथ होते हैं.”

पशुपालकों के प्रधान राजकुमार ने पत्रकारों का बताया, “वीरवार रात दो ट्राली धांगड़ गोशाला में धक्के से डलवाकर किसानों का चालान भी काटा है. इस समय प्रशासन ने 50 से ज्यादा ट्रालियां अपने कब्जे में ले रखी हैं जिसकी वजह से किसानों को 20 लाख रुपये तक का नुकसान हो सकता है. कई किसान प्रशासन को तूड़ी नहीं लेने दे रहे हैं, उन किसानों को अफसर क्रेन से ट्राली उठा ले जाने की धमकी दे रहे हैं, जिसे हम सहन नहीं करेंगे.”

फतेहाबाद पुलिस गश्त कर लगातार किसानों की ट्रॉलियां जब्त कर रही है. रतिया के थाना प्रभारी रुपेश चौधरी की टीम ने फतेहाबाद से राजस्थान तूड़ी ले जा रहे किसानों की ट्रालियों को भी जब्त किया है. ओवरलोडेड और ओवर हाइट का मामला बनाकर पुलिस ने तीन ट्रैक्टर ट्राली को नंदीशाला में खाली करवा लिया है और दो अभी जब्त करके रखा है.”

राजस्थान के भादरा से विधायक बलवान पूनिया ने पशुपालकों की गाड़ियां सीज करने के फैसले की निंदा की है और फौरन यह प्रतिबंध हटाए जाने की मांग की है.

हरियाणा में 5 लाख एकड़ भूमि पर होगा डीकंपोजर दवा का छिड़काव, कृषि वैज्ञानिक ने बताया अव्यहवारिक

हरियाणा सरकार ने पराली प्रबंधन के लिए 5 लाख एकड़ भूमि में बायो डीकंपोजर का छिड़काव करने का फैसला लिया है. सरकार ने फैसला लिया है कि एक लाख एकड़ जमीन पर कृषि विभाग और चार लाख एकड़ जमीन पर सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी) फंड के तहत यूपीए कंपनी द्वारा दवा का छिड़काव किया जाएगा.

बृहस्पतिवार को चंडीगढ़ में मुख्य सचिव संजीव कौशल की अध्यक्षता में हुई बैठक में किसानों से बिना आग लगाए पराली नष्ट करवाने के लिए यह फैसला लिया गया है. मुख्य सचिव ने बताया गया कि डीकंपोजर के छिड़काव से धान की पराली आसानी से खेत में ही गल जाएगी और प्रदूषण नहीं फैलेगा.

सरकार के इस फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कृषि वैज्ञानिक डॉ. विरेन्द्र लाठर ने हमें बताया, “सरकार ने यह गलत फैसला लिया है. पूसा की खुद की रिसर्च डीकंपोजर को नकार चुकी है. इस संबंध में मैंने गवर्नर का पत्र लिखकर इस फैसले को वापस लेने की मांग भी की है.

पढ़िए डॉ विरेन्दर का पूरा तर्क उन्हीं की कलम से

मुझसे यह एक सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क़्या धान पराली जलाने के इलावा कोई समाधान नहीं है? सरकार ने सब्सिडी के साथ, पिछले वर्षों में कई अव्यहवारिक योजना इस दिशा में चलाई हैं, जिसमें पराली को विशेष मशीनों की मदद से जमीन में मिलाकर जैविक खाद बनाया जाता है. लेकिन भारी सरकारी आर्थिक सहायता के बावजूद, ज़्यादातर क़िसानों ने इसे नहीं अपनाया. इसी तरह, अब सरकार एक बार फिर से डिकंपोजर के छिड़काव से खेत में ही पराली को गलाने जैसी अव्यहवारिक नीति क़िसानो के लिए लेकर आई है. हमें यह समझने की जरूरत है कि धान कटाई से गेंहू फसल की बुआई के बीच किसान को मात्र बीस दिन का समय मिलता है और बीस दिन के इतने कम समय में कोई भी डिकंपोजर खुले खेत में कम तापमान पर धान की पराली को नहीं गला सकता है.

धान की पराली जलाने की समस्या के समाधान के रूप में डीकंपोजर को बढ़ावा देना गलत है. यह गलत तरीके से दावा किया जा रहा है कि पूसा डीकंपोजर 15-20 दिनों के भीतर धान की पराली को खुले खेत में गला सकता है. यहां तक कि आईसीएआर-आईएआरआई ने भी इसका दावा नहीं किया, लेकिन स्पष्ट रूप से कहा कि ‘पूसा डीकंपोजर की बायोऑगमेंटेड प्रक्रिया प्रयोगशाला में नियंत्रित प्रायोगिक परिस्थितियों में पराली को ’60 दिनों के भीतर’ परिपक्व खाद बना सकती है. पूसा डीकंपोजर टीम द्वारा आगे की टिप्पणियों में कहा गया था कि “जैव-अपघटन की तीव्र प्रक्रिया के दौरान, तापमान” पहले 10-15 दिनों के लिए 50 डिग्री सेल्सियस से अधिक तक बढ़ गया था”. पूसा बायोडीकंपोजर के छिड़काव के दो सप्ताह में ही यह हानिकारक सिद्ध हो जाएगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि इस तरह का उच्च तापमान (50C) सर्दियों की फसलों गेहूं, चना, सरसों, आलू आदि के बीज अंकुरण को बुरी तरह प्रभावित करेगा. इन्हें लगभग 20 डिग्री सेल्सियस के औसत परिवेश के तापमान की आवश्यकता होती है. ICAR-IARI अनुसंधान दल ने यह भी पुष्टि की कि ‘माइक्रोबियल डीकंपोजर सर्दियों के मौसम में कम तापमान पर 90 दिनों के भीतर धान की पराली को गलाकर खाद बनाता है.

सभी अध्ययनों ने सुझाव दिया है कि धान की पराली को कृत्रिम जैव-अपघटक के साथ या उसके बिना इन-सीटू अपघटन के तहत इसके गलकर खाद बनने के लिए 60 से 90 दिनों की आवश्यकता होती है. यह उन किसानों के लिए उपयुक्त नहीं है, जिन्हें धान की कटाई और अगली फसल की बुवाई के बीच केवल 20 दिन का समय मिलता है.

फिर पराली का समाधान क्या हो सकता है?

पंजाब और हरियाणा में लगभग एक करोड़ एकड़ भूमि पर धान फसल उगाई जाती है, जिससे धान अनाज निकलने के बाद लगभग बीस करोड़ क्विंटल पराली बनती है. किसान के पास अगली फसल बुआई के लिए समय कम होने की वजह और वैकल्पिक व्यवस्था के अभाव में, ज़्यादातर पराली जलाई जाती है, जिससे वायु प्रदूषण तो होता ही है उसके साथ भूमि की उर्वरक शक्ति भी क्षीण होती है. जबकि दूसरी तरफ़, देश में पचास करोड़ पशुधन को सूखे चारे की समस्या हमेशा बनी रहती है. जो देश के सूखे क्षेत्र में जनवरी से मई महीने तक ज़्यादा गंभीर हो जाती है, जहा पशु पालकों को अभाव में मजबूरन सूखा चारा औसतन 800 रुपये प्रति किवंटल में ख़रीदना पड़ता है. पशु विज्ञान विशेषज्ञों के अनुसार देश में वार्षिक 25% सूखे चारे की कमी रहती है, जो मौसमी सूखा पड़ने पर विभिन्न क्षेत्रों में ज़्यादा बढ़ जाती है. इसलिए, सरकार को धान की पराली को आपदा न मानकर, इसे अवसर में बदलने की पहल करनी चाहिए. इसके लिए सरकार राष्ट्रीय सूखा चारा बोर्ड की स्थापना करे, जो राजधानी व पड़ोसी राज्यों के क्षेत्र के क़िसानो से 200- 300 प्रति क्विंटल पराली मात्र 5000 करोड़ रूपये वार्षिक में ख़रीद कर सूखा चारा बैंक बनाए और इसे सूखे क्षेत्र के पशु पालकों को 500-600 रूपये प्रति क्विंटल बेचकर, वायु प्रदूषण और सूखे चारे की कमी की समस्या का समाधान कर सकती है. इसी तरह पराली को बिजली पैदा करने में प्रयोग किया जा सकता है. पंजाब में सुखबीर एग्रो ने पराली से बिजली बनाने की शुरुआत की है, ऐसी ही पहल सरकार धान पैदा करने वाले हर ज़िले में कर सकती है. इससे किसान को पाँच हज़ार रुपये प्रति एकड़ कमाई होगी और ग्रामीण क्षेत्र में रोज़गार के नए अवसर भी बनेंगे और किसान-सरकार के बीच के क़ानूनी टकराव से भी बचा जा सकेगा.

धान की पराली के नाम पर हर साल बवाल खड़ा कर किसानों को बदनाम करने की साजिश की जाती है और असली गुनहगारों को सरकार और मीडिया बचा लेती है. इसके साथ ही गलत प्रबंधन, दिल्ली राजधानी क्षेत्र के तीन करोड़ से ज़्यादा जनता से अन्याय करते हुए उन्हें नर्क का जीवन जीने पर मजबूर करता है. केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट (2018) के अनुसार दिल्ली के प्रदूषण में, वाहन से 41%, स्थानीय धुल से 21.5%, उद्योग से 18% व बाकी 20% दूसरे कारण से योगदान होता है. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री श्री प्रकाश जावेडकर के अनुसार 4 अक्टूबर 2020 को दिल्ली के प्रदूषण में धान पराली जलने का योगदान मात्र 4% था. सफ़र वायु गुणवत्ता मीटर, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अनुसार 10 अक्टूबर से 10 नवम्बर के बीच, दिल्ली के वायु प्रदूषण में, पराली का योगदान औसतन 15% रहता है, जो गेंहु की बुआई के साथ लगभग 15 नवम्बर के बाद फिर 4% से क़म पर आ जाता है. इसी तरह पंजाब कृषि विश्वविधालय लुधियाना के मौसम विभाग के वैज्ञानिको ने प्रमाणित किया है कि अक्तूबर-नवम्बर महीने में वायु की कम गति के कारण (5 किलो मीटर प्रति घंटा से कम), पंजाब की पराली का धुआँ दिल्ली जाने की कोई सम्भावना नहीं है. जिससे ज़ाहिर होता है की वर्ष भर दिल्ली प्रदूषण ज़्यादातर स्थानीय कारणों से होता है, जिसका समाधान भी स्थानीय प्रदूषण फैलाने वाले कारण को ठीक करने ही हो सकता है. फिर दिल्ली प्रदूषण के लिए, असली स्थानीय रसूखदार गुनाहगारों को बचाकर, किसान को प्रताड़ित और बदनाम क्यों किया जा रहा है और उनपर पूसा डीकंपोजर से धान की पराली को खुले खेत में गलाने का अव्यवहारिक तरीका क्यों थोपा जा रहा है.

82.05% चुनावी चंदा अकेले भाजपा को

वित्तीय वर्ष 2020 21 में 7 चुनावी ट्रस्टों को कॉर्पोरेट और व्यक्तिगत दानों से कुल 258.4915 करोड़ रुपए चंदा मिला है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स द्वारा चुनावी चंदे पर 21 अप्रैल को जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, कुल चंदे में से 258.4301 करोड़ रु (99.976%) चुनावी ट्रस्टों ने अलग-अलग पार्टियों को बाँट भी दिया है, जिसमें से 212.05 करोड़ रुपए यानि कुल चंदे का 82.05% अकेले भाजपा को मिला है.

फ्युचर गेमिंग एंड होटल सेर्विसेज ने सबसे ज्यादा 100 करोड़ रु का दान दिया है. इसके बाद हल्दीया एनर्जी इंडिया लिमिटेड ने 25 करोड़ और मेघा इंजीनियरिंग एंड इनफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने 22 करोड़ रुपए का चंदा दिया है.

वित्त वर्ष 2020-21 में इलेक्टोरल ट्रस्टों में 159 व्यक्तियों ने चंदा दिया है. 2 व्यक्तियों ने प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट को 3.50 करोड़ रुपये, 153 व्यक्तियों ने स्मॉल डोनेशन इलेक्टोरल ट्रस्ट को 3.202 करोड़ रूपये, 3 व्यक्तियों ने आइंजिगर्टिग इलेक्टोरल ट्रस्ट को कुल 5 लाख रुपये और 1 व्यक्ति ने इंडिपेंडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट को 1100 रुपये का चंदा दिया है. शीर्ष 10 दानदाताओं ने इलेक्टोरल ट्रस्टों को 223.00 करोड़ रुपये का चंदा दिया है, जो वित्त वर्ष 2020-21 के दौरान ट्रस्टों द्वारा प्राप्त कुल चंदे का 86.27% है.

प्रूडेंट चुनाव ट्रस्ट ने भाजपा को 209.00 करोड़ रुपये का चंदा दिया, जबकि वित्त वर्ष 2019-20 में 217.75 करोड़ रुपये का चंदा दिया था.

एक अन्य चुनावी ट्रस्ट जयभारत इलेक्टोरल ट्रस्ट ने वित्त वर्ष 2020-21 में अपनी कुल आय का 2.00 करोड़ रुपये भाजपा को दिया किया था.

प्रूडेंट चुनाव ट्रस्ट ने भाजपा, जदयू, कांग्रेस, राकांपा, राजद, आप और लोजपा जैसे प्रमुख दलों सहित 7 राजनीतिक दलों को दान दिया है. लेकिन, सभी राजनीतिक दलों के मुकाबले अकेले बीजेपी को 212.05 करोड़ रुपये इलेक्टोरल ट्रस्टों से मिला है जोकि कुल चंदे का 82.05 प्रतिशत है.  

जदयू को सभी सात चुनावी ट्रस्टों से सभी पार्टियों को मिले कुल चंदे का 27 करोड़ रुपये यानी कि 10.45 फीसदी मिला है.

INC, NCP, AIADMK, DMK, RJD, AAP, LJP, CPM, CPI और लोक तांत्रिक जनता दल सहित अन्य 10 राजनीतिक दलों को सामूहिक रूप से कुल 19.3801 करोड़ रुपये का चंदा मिला है.

केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार, चुनावी ट्रस्टों को कुल मिले चंदे का कम से कम 95% वितरित करना जरूरी होता है. 2013 से कुल 23 चुनावी ट्रस्ट रजिस्टर्ड हैं जिनमें से सिर्फ 14 ही हर साल अपनी रिपोर्ट चुनाव आयोग को देते हैं. इस साल 16 ने अपने चंदे का रिकार्ड जमा किया था, जिनमें से केवल 7 ट्रस्टों ने विभिन्न कॉर्पोरेट घरानों और व्यक्तियों से चंदा प्राप्त करने की घोषणा की है. अकेले प्रुडेंट चुनाव ट्रस्ट ने ही सभी 8 सालों(2013-2014 से 2020-2021) में अपनी रिपोर्ट जमा करवाई है. 8 चुनाव ट्रस्टों का चुनाव आयोग कि वैबसाइट पर अपने रजिस्ट्रेशन से लेकर अब तक का कोई ब्यौरा नहीं है.  

जून, 2014 में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग ने 2013 के बाद गठित चुनावी ट्रस्टों को मिलने वाले चंदे की रिपोर्ट जमा करने के लिए पत्र संख्या 56/इलेक्टोरल ट्रस्ट/2014/पीपीईएमएस 6 के तहत दिशानिर्देश जारी किए थे, ये दिशानिर्देश जनवरी, 2013 के बाद बने 7 इलेक्टोरल ट्रस्टों को जारी किए गए थे जिनके नाम सत्य/प्रुडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट, प्रतिनिधि इलेक्टोरल ट्रस्ट, पीपुल्स इलेक्टोरल ट्रस्ट, प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट, जनहित इलेक्टोरल ट्रस्ट, बजाज इलेक्टोरल ट्रस्ट, जनप्रगति इलेक्टोरल ट्रस्ट हैं.