मंगलवार, 07 फ़रवरी 2023
खेत-खलिहान

तर वत्तर सीधी बिजाई धान, भूजल-पर्यावरण संरक्षण व खेती लागत बचत के लिए वरदान



किसान हितैषी टिकाऊ खेती तकनीक: एक तिहाही भूजल सिंचाई, खेती की लागत, श्रम, डीज़ल, बिजली आदि की बचत और झंडा रोग मुक्त फसल व पूरी पैदावार.

फसल विविधीकरण किसान हितैषी वैकल्पिक फसल चक्र से ही सम्भव है. बारिश के मौसम में आधा पंजाब व हरियाणा प्रदेश जल भराव से ग्रस्त होने से, धान फसल का कोई व्यवहारिक विकल्प किसानों के पास नहीं है. क्योंकि मक्का व दलहन जल भराव के कारण गल जाती हैं और धान के मुकाबले आधा लाभ देती हैं. इसलिए अब भूजल बर्बादी वाली धान की रोपाई पर, क़ानूनी प्रतिबंध 15 जून की बजाय पहली जुलाई तक बढाकर, भूजल व खेती लागत बचत वाली तर- वत्तर सीधी बिजाई धान तकनीक को प्रोत्साहन दिया जाए. वैसे भी धान फसल किसान हितैषी (40,000 रूपये/एकड लाभ) होने के साथ-साथ, राष्ट्रीय हित में भी है, जो भारत की खाद्य सुरक्षा के साथ 63,000 करोड़ रूपये का वार्षिक निर्यात भी सुनिश्चित करती है . 

धान फ़सल से लगातार हो रही भूजल बर्बादी एक गंभीर समस्या जरूर है, लेकिन लाइलाज नहीं है. इस समस्या को किसान हितैषी व वैज्ञानिक तौर पर प्रमाणित “तर-वत्तर सीधी बिजाई धान” तकनीक को  अपनाकर आसानी से हल किया जा सकता है. पिछले साल पंजाब में लगभग सात लाख हेक्टर (यानि प्रदेश के कुल धान क्षेत्र के चौथाई हिस्से) और हरियाणा में लगभग 2 लाख हेक्टर भूमि पर सफलता से बहुत बड़े स्तर पर अपनायी गई और लगभग 28 किवंटल प्रति एकड़ की दर से रोपाई धान के बराबर ही पैदावार मिली. तर-वत्तर सीधी धान तकनीक अपनाने से धान रोपाई के बेकार के झंझटों (बुआई से पहले खेत में पानी खड़ा करके पाड़े काटना/ कद्दु करना, पौध बोना, उखाड़ना और फिर से लगाना और तीन महीने खेत में पानी खड़ा रखना आदि) से मुक्ति मिलती है और फसल का झंडा/बकानी रोग से भी प्रभावी बचाव होता है. तर- वत्तर सीधी बिजाई धान तकनीक में बुआई मूँग व गेंहू आदि फ़सलों की तरह बिल्कुल आसान है. जिसे इच्छुक किसान निम्नलिखित विधि अपनाकर, आने वाली पीढ़ियों के भूजल-पर्यावरण संरक्षण और खेती की लागत में भारी बचत कर सकते हैं. 

तर-वत्तर सीधी बीजाई धान तकनीक

1) किस्में : धान की सभी किस्में कामयाब हैं.  

2) बुआई का समय:  25 मई से 5 जून तक अच्छी नमी वाले तर-वत्तर खेत मे करें (मानसून आगमन से एक महीना पहले बुआई करें) यानि सीधी बीजाई धान की बुआई रोपाई धान की पौध नर्सरी की बुआई के समय पर ही करनी है.

3) खेत की तैयारी: पहले खेत को समतल बनाएं, फिर गहरी सिचांई, जुताई व तर-वत्तर (अच्छी नमी) तैयार कर खेत मे शाम के समय बुआई करें.

4) बीज की मात्रा व उपचार: बुआई से पहले बीज उपचार बहुत ज़रुरी है. एक एकड के लिए 8 किलो बीज को 12 घंटे 25 लीटर पानी मे डूबोएं, फिर 8 घंटे छाया मे सुखाकर, 2 ग्राम बाविस्टीन और एक मि.ली. क्लोरोपायरीफास प्रति किलो बीज उपचार करें. 

5) बुआई का तरीका: लाईन से लाईन की दूरी: 8-9 इंच, बीज की गहराई: मात्र एक इंच रखें.  बुआई बीज मशीन के अलावा छींटा विधि से भी हो सकती है. बुआई के बाद खेत की नमी बचाने के लिए हलका पाटा(सुहागा) लगाएं.

5) खरपतवार नियंत्रण: खरपतवार ज़माव रोकने को, बुआई के तुरंत बाद 1.5 लीटर पेंडामेथेलीन प्रति एकड 200 लीटर पानी मे  छिडकाव ज़रूर करें और आवश्कता पड़ने पर 20- 25 दिन बाद 100 लीटर पानी प्रति एकड मे 100 मि. ली. नामिनी गोल्ड (बिस्पाईरीबेक सोडीयम), या 400 मि.ली. राईस स्टार (फेनोक्सापरोप पी ईथाइल) या 8 ग्राम अलमिक्स (क्लोरीम्यूरान ईथाइल मेटसल्फूरान मिथाइल) या 90 ग्राम कौंसील एकटीव (ट्राईमाफोन 20: एथोक्सीसल्फूरान 10) य़ा 250 ग्राम  2,4- डी 80 प्रतिशत सोडीयम साल्ट का छिडकाव करें.

6)सिंचाई: पहली सिंचाई देर से 21 दिन के बाद और बाद की सिंचाई 10 दिन के अंतराल पर गीला-सूखा प्रणाली से वर्षा आधारित करें. बुआई के बाद अगर पहले सप्ताह में बे-मौसम वर्षा से भूमि की ऊपरी सतह पर करंड (मिट्टी सख्त हो), तो तुरंत हलकी सिचाई करें, वर्ना धान के उगे नये पौधे भूमि की सतह से बाहर नहीं निकल पायेंगे.

7) खाद की मात्रा: रोपाई धान की अनुमोदित दर और विधि से ही करें. धान फसल मे प्रति एकड सामान्यता 40 किलो नाईट्रोजन, 16 किलो फासफोरस और 8-10 किलो पोटाश की ज़रूरत होती है. नाईट्रोजन की एक तिहाही और फासफोरस की पूरी मात्रा बुआई के समय प्रयोग करें, जो एक बेग डी.ए. पी. प्रति एकड से पूरी हो जाती  है. यूरिया और म्यूरेट आफ पोटाश (MOP) उर्वरकों का प्रयोग मशीन के खाद बक्से में नहीं रखना चाहिए. इन उर्वरकों का प्रयोग टाप ड्रेसिंग के रुप में पहली सिंचाई यानि 21 दिन बाद करना  चाहिए, उसी समय 10 किलो ज़िंक सल्फेट प्रति एकड भी डालना  चाहिए. इस विधि से ऊगाई धान फसल की शुरुवाती अवस्था में अक्सर, आयरन की कमी से पौधो मे पीलापन देखा जाता है. उसके लिए, एक प्रतिशत आयरन सल्फेट का छिडकाव एक सप्ताह अंतराल पर दो बार करें. फसल मे बालिया निसरने पर एक किलो  घूलनशील इफको उर्वरक 13:0:45 प्रति एकड छिडकाव करें.

8) कीट-बिमारीयां प्रबंधन: रोपाई धान की अनुमोदित दर और विधि से ही करें, लेकिन ध्यान रखें कि रसायनिक दवाओं का प्रयोग  अनुमोदित दर से ज्यादा कभी नहीं करें. तने की सुंडी (गोभ के  कीडे) के 25-35 दिन के फसल अवस्था पर 8 किलो कारटेप रेत में  मिलाकर तथा पत्ता लपेट/ तना छेदक के लिए 200 मि.ली. मोनोक्रोटोफास या कलोरोपायरीफास या 400 मि.ली. क्वीनलफास 100 लीटर पानी में प्रति एकड प्रयोग करें. धान  निसरने के समय, ह्ल्दी रोग या ब्लास्ट से बचाव के लिए 200 ग्राम  कार्बेंडाज़िम या प्रोपीकानाजोल (टिलट) 200 लीटर पानी प्रति एकड छिडकाव करें. शीट ब्लाईट के लिए 400 मि. ली. वैलिडामाईसिन (अमीस्टार/लस्टर आदि) 200 लीटर पानी प्रति  एकड छिडकाव करें. फसल में दीमक की शिकायत होने पर, एक  लीटर कलोरोपायरीफास प्रति एकड सिंचाई पानी के साथ चलायें.

9) सीधी बिजाई तकनीक के बारे में सावधानियां 

– अगर बुआई के बाद पहले सप्ताह में, बेमौसम वर्षा हो जाए तो  भूमि की उपरी सख्त सतह तोडने के ह्ल्की सिंचाई करें, वरना धान के नये उगे पौधे भूमि  की सतह से बाहर नहीं आ पायेंगे.

– इस विधि से बोयी गई फसल रोपाई धान के मुकाबले पहले 40 दिन हलकी नजर आयेंगी, इसलिए किसान हौंसला बनाए रखें.

– सीधी बुआई धान खारे पानी और सेम व लवनीय भूमि मे खास सफल नहीं है. ऐसे क्षेत्रों मे किसान रोपाई धान ही लगाएं. 

– 15 जून के बाद धान की सीधी बिजाई नहीं करे और तब रोपाई विधि से धान की खेती फायदेमन्द रहेगी.

-बुआई समय पर कम तापमान व फसल पकाई समय पर मानसून वर्षा के कारण साठी धान (मार्च-अप्रैल बुआई) में सीधी बिजाई तकनीक कामयाब नहीं है .

10) सुगम पराली (फसल अवशेष) प्रबंधन : सीधी बिजाई धान फसल आमतौर पर रोपाई धान के मुकाबले 7-10 दिन पहले पकती है, ज़िससे किसानों को पराली प्रबंधन मे धान कटाई के बाद ज्यादा समय मिलने से भी पराली प्रबंधन मे सहायता मिलती है. इस विधि मे किसान जल्दी पकने वाली कम अवधी (125 दिन) की किस्मों पूसा बासमती-1509, पी.आर -126 आदि की खेती से, धान फसल की कटाई सितम्बर महीने में कर सकते हैं. ज़िससे फसल अवशेष (पराली) को भूमि मे दबाकर, गेंहू फसल की बुआई से पहले ढ़ेंचा या मूँग की हरी खाद के लिए फसल ली ज़ा सकती है. जो भूमि ऊर्वरा शक्ति बढाने और पराली जलाने से उत्पन होने वाले वायु प्रदूषण को रोकने में भी रामबाण साबित होगी.

(डॉ वीरेन्द्र सिंह लाठर, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक, भारतीय कृषि  अनुसंधान संस्थान, नई  दिल्ली [email protected])