CMIE रिपोर्ट: हरियाणा बेरोजगोरी में एक बार फिर पहले नंबर पर!

देश में बेरोजगारी दर अगस्त में एक साल के उच्चस्तर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गयी है. इस दौरान रोजगार पिछले महीने की तुलना में 20 लाख घटकर 39.46 करोड़ रह गया. वहीं इस बीच हरियाणा बेरोजगारी में एक बार फिर पहले स्थान पर रहा है. आंकड़ों के मुताबिक अगस्त के दौरान हरियाणा में सबसे ज्यादा 37.3 प्रतिशत बेरोजगारी थी. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में बेरोजगारी दर 6.8 प्रतिशत और रोजगार 39.7 करोड़ था.

देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर जुलाई में 6.1 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 7.7 प्रतिशत हो गई. वहीं रोजगार दर 37.6 प्रतिशत से गिरकर 37.3 प्रतिशत पर आ गई. सीएमआईई की ओर से जारी बयान में कहा गया कि, “आमतौर पर शहरी बेरोजगारी दर आठ फीसदी रहती है, जबकि ग्रामीण बेरोजगारी दर लगभग सात फीसदी होती है. इस साल अगस्त में शहरी बेरोजगारी दर बढ़कर 9.6 फीसदी और ग्रामीण बेरोजगारी दर बढ़कर 7.7 फीसदी हो गई है. अनियमित वर्षा ने बुवाई गतिविधियों को प्रभावित किया है और यह ग्रामीण भारत में बेरोजगारी बढ़ने का एक मुख्य कारण है.”

वहीं विपक्ष की ओर से कांग्रेस नेता दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने सरकार पर निशाना साधते हुए ट्विट में लिखा “भर्ती के नाम पर घोटालों पर घोटाले, बेरोजगार युवाओं से लाखों की अवैध वसूली,बिन भर्ती पद खत्म करने व निवेश की बजाए नशे को बढावा देने की नीति का नतीजा है 37.3% बेरोजगारी. कांग्रेस कार्यकाल मे जो हरियाणा विकास के हर पैमाने पर अन्य राज्यो से आगे था,वो आज बेरोजगारी-भ्रष्टाचार मे आगे”

बता दें कि अगस्त के दौरान हरियाणा में सबसे ज्यादा 37.3 प्रतिशत बेरोजगारी रही. इसके बाद जम्मू-कश्मीर में बेरोजगारी 32.8 प्रतिशत, राजस्थान में 31.4 प्रतिशत, झारखंड में 17.3 प्रतिशत और त्रिपुरा में 16.3 प्रतिशत बेेरोजगारी दर थी. वहीं आंकड़ो के अनुसार छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी दर सबसे कम 0.4 फीसदी रही

अग्निवीर की तर्ज पर बैंकों में भी होगी भर्ती, अब SBI में ठेके पर रखे जाएंगे कर्मचारी!

सेना में अग्निवीरों की तर्ज पर अब बैंकों में भी कर्मचारियों की नियुक्ति होगीं. अब बैंक में भी कॉन्ट्रेक्ट पर कर्मचारी रखे जाएंगे. देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक भारतीय स्टेट बैंक अपना खर्च कम करने के लिए मानव संसाधन संबंधित मुद्दों के लिए एक अलग कंपनी शुरू करने जा रहा है. स्टेट बैंक की ऑपरेशन और सपोर्ट सब्सिडियरी को हाल ही में आरबीआई (रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया) से सैद्धांतिक अनुमति दे दी है. शुरुआत में यह कंपनी ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में भारतीय स्टेट बैंक की शाखाओं में कर्मचारियों का प्रबंधन देखेगी.

हिंदी समाचार पत्र ‘हिंदुस्तान न्यूज’ में छपि खबर के अनुसार बैंकिग क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि यह कदम उठाकर बैंक अपना कॉस्ट-टू-इनकम रेश्यो कम करना चाहता है, जो अभी इंडस्ट्री स्टैंडर्ड के हिसाब से बहुत ज्यादा है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पूरे देश में एसबीआई ने बैंक शाखाओं का एक बहुत बड़ा नेटवर्क स्थापित कर रखा है. चालू वित्तीय वर्ष 2022-23 की पहली तिमाही में एसबीआई के कुल ऑपरेशन खर्च में वेतन का हिस्सा करीब 45.7 फीसदी था और सेवानिवृत्ति लाभ व अन्य प्रोविजन की हिस्सेदारी 12.4 फीसदी है.

वहीं ऑल इण्डिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के संयुक्त सचिव डीएन त्रिवेदी ने अखबार को बताया, “स्टेट बैंक ऑपरेशन सपोर्ट सर्विसेस जिन कर्मचारियों की नियुक्ति करेगी वो सभी नियुक्तियां अनुबंध के आधार पर होंगी. अनुबंध के आधार पर नियुक्त होने वाले कर्मचारियों को एसबीआई के स्थायी कर्मियों को मिलने वाले सभी लाभ नहीं मिल सकेंगे.”

दूसरे बैंक भी उठा सकते हैं कदम

इस नई व्यवस्था का असर पूरी बैंकिंग क्षेत्र पर पड़ सकता है. एसबीआई ऑपरेशन सपोर्ट सर्विसेस भारतीय बैंकिंग जगत में अपनी तरह की पहली सब्सिडियरी होगी. हालांकि अब अन्य बैंक भी इस दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं. इससे पहले कई बैंक आरबीआई के पास इस तरह की सब्सिडियरी बनाने के लिए प्रस्ताव दे चुके हैं लेकिन तब आरबीआई ने इसकी अनुमति नहीं दी थी. लेकिन अब एसबीआई को अनुमति मिलने के बाद अन्य बैंक भी अपने पुराने प्रस्तावों को एक बार फिर आगे बढ़ाने के लिए आरबीआई से ऐसी सब्सिडियरी के लिए मंजूरी मांग सकते हैं. इस तरह बैंक में भी अग्निवीर योजना की तर्ज पर एक नई योजना शुरू हो सकती है.

ग्रामीण रोजगार सृजन में आई 50 फीसदी की गिरावट!

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत मिलने वाले काम में भारी कमी आई है. इसकी एक वड़ी वजह कृषि और गैर-कृषि कार्यों में तेजी को भी माना जा रहा है. नरेगा में मिलने वाला काम पहले की तुलना में जुलाई में लगभग आधा हो गया है. यानी नरेगा के तहत मिलने वाले काम में 50 फीसदी की कमी दर्ज की गई है. वहीं मजदूरों के गांव वापस लौटकर आने की संख्यां में भी कमी इसका एक कारण है. 

वहीं पिछले आंकड़ों को देखे तो पता चलता है कि हर साल वित्त वर्ष के पहले तीन महीनों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत मिलने वाले काम में बढ़ोतरी दर्ज की गई है लेकिन इस वित्त वर्ष में रोजगार सृजन में गिरावट आई है.

अगस्त में आए आंकड़ों के नरेगा के तहत अप्रैल में केवल 22 करोड़ लोगों को रोजगार मिला जिससे लगभग 2 करोड़ परिवारों तक लाभ पहुंचा था वहीं मई में 43 करोड़ लोगों को रोजगार मिला था जससे करीबन 2.5 करोड़ परिवारों को लाभ पहुंचा था. इस वित्तीय वर्ष में नरेगा के तहत काम में लगातार कमी आ रही है.

पिछले महीने संख्या में गिरावट मुख्य रूप से कृषि गतिविधियों में तेजी के कारण हुई, क्योंकि खरीफ की खेती के लिए श्रम की मांग बढ़ी है. ग्रामीण क्षेत्रों में सार्वजनिक कार्यों के लिए श्रमिकों की मांग में वृद्धि और अधिकांश श्रमिकों की औद्योगिक शहरों में वापसी,  महामारी के चरम के दौरान देखे गए रिवर्स माइग्रेशन के निकट अंत के कारण, कम लोगों को काम की तलाश में भी प्रेरित किया गया।

द इकॉनोमिक टाइम में छपी रिपोर्ट के अनुसार योजना श्रम विशेषज्ञ केआर श्याम सुंदर ने कहा, “ऐसा लगता है कि आर्थिक गतिविधियों में तेजी ने श्रम बाजार को स्थिर कर दिया है.” सुंदर ने कहा, “हालांकि, औद्योगिक उत्पादन में निरंतरता की कमी और रुपये के कमजोर होने से विनिर्माण उत्पादन प्रभावित हो सकता है जो श्रम बाजार को प्रभावित कर सकता है.”

कार्य सृजन में गिरावट योजना के तहत काम की मांग में गिरावट के अनुरूप है और ग्रामीण भारत में बेरोजगारी दर में आई गिरावट भी नये काम सृजन में कमी का एक कारण है.

8 साल में 22 करोड़ ने मांगी सरकारी नौकरी, मिली केवल 7 लाख 22 हजार को!

हर साल दो करोड़ युवाओं को नौकरी दने के वादे के साथ 2014 में केंद्र की सत्ता में आई सरकार ने बुधवार को संसद में जो आंकड़े पेश किए हैं, वे मोदी द्वारा 2014 में किए वादों की पोल खोल रहे हैं. हैरान करने वाली बात है कि सरकार इन आठ सालों में औसतन हर साल एक लाख युवाओं को भी पक्की नौकरी नहीं दे सकी है. लोकसभा में सरकार की ओर से पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक मई 2014 में प्रधानमंत्री मोदी के सत्ता संभालने से लेकर अब तक अलग-अलग सरकारी विभागों में केवल 7 लाख 22 हजार 311 आवेदकों को सरकारी नौकरी दी गई है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सबसे कम नौकरी 2018-19 में केवल 38,100 लोगों को नौकरी मिली, जबकि उसी साल सबसे ज्यादा यानी 5,करोड़ 9 लाख 36 हजार 479 लोगों ने नौकरी के लिए आवेदन किया था. वहीं साल 2019-20 में सबसे ज्यादा यानी 1 लाख 47 हजार 96 युवा सरकारी नौकरी पाने में कामयाब हुए. हर साल दो करोड़ नौकरी देेने का वादा करने वाली सरकार केवल एक फीसदी यानी हर साल दो लाख नौकरियां देने में भी नाकामयाब रही है.

वहीं इन पिछले आठ साल में सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने वालों की संख्या बताती है कि देश में बेरोजगारी का स्तर बहुत ज्यादा है. इस दौरान कुल 22 करोड़ 6 लाख लोगों ने आवेदन किया था. सरकार की और से यह जानकारी भी दी गई है कि हर साल कितने लोगों ने आवेदन किये हैं.

पिछले महीने ही प्रधानमंत्री दफ्तर ने अगले डेढ़ साल में 10 लाख नौकरियां देने का दावा किया है. पीएमओ इंडिया ने ट्वीट करते हुए सभी मंत्रालयों में अगले डेढ़ साल के भीतर 10 लाख लोगों की भर्ती करने के निर्देश दिए थे.

वहीं बेरोजगारी के मुद्दे पर मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए राहुल गांधी ने कहा

वहीं CMIE यानी सेंटर फॉर इकनॉमिक डाटा एंड एनालिसिस की एक रिपोर्ट के अनुसार 2020 में भारत की बेरोजगारी दर 7 फीसदी को पार कर 7.11 फीसदी हो गई थी. मुंबई स्थित सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के आंकड़ों के मुताबिक तब से देश में बेरोजगारी दर 7 प्रतिशत से ऊपर ही बनी हुई है. वहीं रिपोर्ट के अनुसार बेरोजदारी के मामले में पूरे देश में हरियाणा पहले स्थान पर है.

गतिरोध की अवस्था की ओर बढ़ रही है भारतीय अर्थव्यवस्था

एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डों को यह ख्याल बहुत डराता था कि पूंजीवाद कहीं एक ‘अचल अवस्था’ में न पहुंच जाए. अचल अवस्था से उनका आशय था शून्य वृद्धि दर की एक स्थिर अवस्था. इस प्रकार की अवस्था को सूचित करने के लिए मार्क्स ‘सरल पुनरुत्पादन’ की संज्ञा का प्रयोग करते थे. यह ऐसी अवस्था का सूचक है जहां उत्पादन क्षमता में कोई शुद्ध इजाफा नहीं होता है और अर्सा दर अर्सा अर्थव्यवस्था पहले वाले स्तर पर ही अपने को पुनरुत्पादित करती रहती है. भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसी ही अवस्था की ओर बढ़ती लग रही है.

आर्थिक बहाली का दावा प्रतिव्यक्ति जीडीपी में गिरावट

मोदी सरकार की प्रचार मशीनरी, जैसाकि उसका कायदा है, सवाया-ड्योढ़ा जोर लगाकर, अर्थव्यवस्था की रंगी-चुनी तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रही है. लेकिन, सच्चाई इससे ठीक उल्टी है. सरकार के इस प्रचार में एक सरल सी गणितीय तिकड़म का इस्तेमाल किया जा रहा है. तिकड़म यह है कि अगर उत्पाद, 100 इकाई से घटकर 90 इकाई रह जाता है, हम कहेंगे कि 10 फीसद गिरावट हुई है. लेकिन, अगर वही उत्पाद फिर से बढक़र 100 इकाई हो जाता है, गणित के हिसाब से उसमें 11.1 फीसद बढ़ोतरी होगी क्योंकि इस बढ़ोतरी को घटे हुए आधार पर रखकर मापा जा रहा होगा. अब चूंकि बढ़ोतरी का 11.1 फीसद का यह आंकड़ा, गिरावट के 10 फीसद के आंकड़े से ज्यादा होता है, इसके सहारे यह झूठा दावा किया जा सकता है कि अर्थव्यवस्था ने वृद्धि की पटरी पर दौड़ना शुरू कर दिया है, जबकि वास्तव में दोनों वर्षों को मिलाकर देखें तो, अर्थव्यवस्था में कोई वृद्धि दर्ज नहीं हुई होगी. इस समय सरकार ठीक ऐसे ही एक झूठे दावे का सहारा ले रही है.

आइए, हम 2020-21 के वर्ष को बिल्कुल भूल ही जाते हैं, जब महामारी का प्रकोप बहुत भयंकर था और सिर्फ उससे पहले तथा बाद के वर्षों को ही हिसाब के लिए ले लेते हैं. 2019-20 और 2021-22 के बीच, वास्तविक मूल्य में सकल घरेलू उत्पाद में सिर्फ 1.5 फीसद की बढ़ोतरी हुई है, जो कि इन दो वर्षों के बीच आबादी में हुई बढ़ोतरी, 2 फीसद से कम है. इस तरह, 2021-22 में प्रतिव्यक्ति वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), 2021-22 की तुलना में घटकर रहा था.

इस गतिरोध के लिए जिम्मेदार घटक पड़ताल के हकदार हैं. उपभोग यानी वास्तविक मूल्य में निजी अंतिम उपभोग खर्च 2019-20 की तुलना में, 2021-22 में करीब 1.5 फीसद ज्यादा रहा था, जबकि वास्तविक मूल्य के लिहाज से कुल स्थिर पूंजी निर्माण यानी इन्वेंटरियों में बढ़ोतरी को निकाल कर, वास्तविक मूल्य के लिहाज से कुल निवेश, 3.75 फीसद बढक़र रहा था. उपभोग के मुकाबले, निवेश की दर में वृद्धि का किसी हद तक बढ़कर रहना, लॉकडाउन के चलते स्थगित हुई निवेश परियोजनाओं के नयी परियोजनाओं के साथ इकठ्ठा हो जाने की वजह से था. बहरहाल जो भी हो, इस निवेश की अपेक्षाकृत बढ़ी हुई दर को ज्यादा समय तक बनाए नहीं रखा जा सकता है. जैसे-जैसे निवेश में वृद्धि की दर नीचे आएगी, वैसे-वैसे उपभोग में वृद्धि की दर भी नीचे आएगी. यह उस कारक के चलते होगा, जिसे अर्थशास्त्री ‘गुणनकारी’ प्रभाव कहते हैं यानी ऐसा इसलिए होगा कि निवेश घटकर रहने से उत्पाद तथा इसलिए रोजगार तथा उपभोग मांग भी घट रहे होंगे. और यह अर्थव्यवस्था को और भी प्रबल तरीके से एक अचल अवस्था की ओर या सरल पुनरुत्पादन की अवस्था की ओर धकेल देगा. इस तरह अर्थव्यवस्था, जो पहले ही करीब-करीब गतिरोध की तथा प्रतिव्यक्ति जीडीपी के लिहाज से पीछे खिसकने की अवस्था में है, मजबूती से शुद्ध गतिरोध की ओर तथा इसलिए प्रतिव्यक्ति जीडीपी के लिहाज से और ज्यादा पीछे खिसकने की ओर बढ़ेगी.

इस गतिरोध से निकलना मुश्किल

और जब अर्थव्यवस्था ऐसे शुद्घ गतिरोध की अवस्था में पहुंच जाती है, उसके लिए इस अवस्था से निकलना बहुत मुश्किल हो जाता है. इसका कारण एकदम सरल है. कुल जीडीपी अनिर्वायत:, निजी अंतिम उपभोग खर्च, सकल निवेश, शुद्घ निर्यात (यानी मालों व सेवाओं का आयात घटाकर निर्यात) और सरकारी उपभोग के योग के बराबर होता है. आइए, एक क्षण को हम आखिर के दो आइटमों को अनदेखा कर देते हैं. आइए, हम निवेश के उस हिस्से को भी अनदेखा कर  देते हैं, जो निर्यात बाजार के लिए मालों व सेवाओं का उत्पादन करने के लिए ही है. तब, अगर अर्थव्यवस्था गतिरोध का सामना कर रही हो, तो उपभोग के बढऩे का कोई कारण नहीं है, क्योंकि यह आय के स्तर पर निर्भर करता है. इसलिए, अर्थव्यवस्था में गतिरोध ही बना रहेगा. निवेश भी इसलिए नहीं बढ़ेगा क्योंकि फर्मों के अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने का कोई कारण ही नहीं होगा क्योंकि अर्थव्यवस्था तथा इसके चलते घरेलू बाजार, गति-अवरोध की अवस्था में बने हुए होंगे. इसलिए, खर्च के जिन तीन आइटमों को हम यहां तक अनदेखा कर रहे थे, उनमें से कम से कम एक में स्वायत्त उछाल यानी घरेलू बाजार से स्वायत्त रूप से उछाल नहीं आता है, तब तक अर्थव्यवस्था गतिरोध की अवस्था में ही बनी रहेगी या जब तक गतिरोध की अवस्था तक नहीं पहुंच जाती है, उसमें ऋणात्मक वृद्घि भी बनी रह सकती है.

अब शुद्घ निर्यातों में तो एकाएक बढ़ोतरी होने वाली नहीं है क्योंकि विश्व अर्थव्यवस्था तो खुद ही गतिरोध में फंसी हुई है. इसलिए, भारतीय मालों की विदेशी मांग में अचानक बढ़ोतरी हो जाने का कोई कारण नहीं बनता है. दूसरी ओर, नवउदारवादी निजाम के चलते सरकार, भारत के आयातों को घटाने के लिए एकाएक न तो इन आयातों पर ऊंचे तटकर लगाने जा रही है और न अन्य संरक्षणात्मक कदम उठाने जा रही है. ठीक इसी वजह से, निवेश बाजारों के लिए या आयात की जगह लेने के लिए किए जाने वाले निवेशों में कोई उछाल नहीं आने जा रहा है. रही बात सरकारी खर्चों की तो, चूंकि वर्तमान सरकार, जीडीपी के अनुपात में राजकोषीय घाटे पर अंकुश लगाए रखने के लिए कसम खाए हुए है, अगर जीडीपी के अनुपात के रूप में कर राजस्व में ही एकाएक बढ़ोतरी नहीं हो जाती है, तो सरकार के खर्चों का रुझान भी जीडीपी जैसा ही रहने जा रहा है.

इस पहलू से भी, अगर जीडीपी के अनुपात मे रूप में कर राजस्व में अप्रत्यक्ष कराधान के चलते बढ़ोतरी होती भी है, जिसकी चोट मुख्यत: निजी उपभोग पर ही पडऩे जा रही है, तो शुद्घ मांग में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी. ऐसी सूरत में जीडीपी के अनुपात के रूप में सरकारी उपभोग में जो बढ़ोतरी होगी भी, उसे जीडीपी के अनुपात के रूप में निजी उपभोग में गिरावट द्वारा बराबर कर दिया जाएगा. यही बात सरकारी खर्चे में ऐसी बढ़ोतरी पर लागू होती है, जिसके लिए वित्त जुटाने के लिए आबादी के उस हिस्से पर अतिरिक्त प्रत्यक्ष कर लगाया जा रहा हो, जो अपनी आय का अधिकांश हिस्सा उपभोग पर खर्च कर देता है.

उपाय तो हैं, पर उल्टा है नवउदारवाद का रास्ता

इसलिए, सरकारी खर्चों में सिर्फ ऐसी बढ़ोतरी ही गतिरोध की अवस्था से उबारने का काम कर सकती है, जिसके लिए वित्त या तो जीडीपी के अनुपात के रूप में राजकोषीय घाटा बढ़ाने के जरिए जुटाया जाए या धनी तबके पर प्रत्यक्ष कर की दरों में बढ़ोतरी के जरिए, इसके लिए वित्त जुटाया जाए. बाद वाले उपाय में कार्पोरेट आमदनियों पर पहले से ज्यादा कर लगाना या निजी संपदा पर ज्यादा कर लगाना, दोनों शामिल हैं. लेकिन, वर्तमान सरकार को इन उपायों का सहारा लेना ही तो किसी भी तरह मंजूर नहीं है. मौजूदा सरकार राजकोषीय घाटे की तय सीमा से कमाबेश बंधी ही रही है और धनिकों पर कर बढ़ाने की बात तो दूर रही, वह तो कारपोरेट क्षेत्र को कर रियायतें ही देती रही है और ऐसा इस गलतफहमी में करती आयी है कि इस तरह की रियायतों से, निजी निवेश में बढ़ोतरी के जरिए, अर्थव्यवस्था में नये प्राण फूंके जा सकेंगे.

यह विश्वास दो कारणों से भ्रमपूर्ण है. पहला कारण तो यह कि, अगर बहस के लिए हम यह मान भी लें कि इस तरह की कर रियायतों से कारपोरेट निवेश में बढ़ोतरी होती है, तब भी इस बढ़ोतरी को सरकारी राजस्व में कमी के चलते, सरकारी खर्चों में होने वाली कटौती बराबर कर देगी और इस तरह सकल मांग में कोई शुद्ध बढ़ोतरी नहीं होगी और इसलिए, अर्थव्यवस्था में नयी जान पडऩा बाधित ही रहेगा. दूसरी वजह यह है कि कारपोरेट निवेश तो किसी भी अर्थव्यवस्था में मांग में बढ़ोतरी पर निर्भर होते हैं, न कि कर रियायतों पर. अगर अर्थव्यवस्था में मांग नहीं बढ़ रही हो, तो पूंजीपतियों को जो भी कर रियायतें दी जाएंगी, वे उन्हें हजम कर जाएंगे और कोई अतिरिक्त निवेश नहीं करेंगे.

इसका अर्थ यह है कि जब कोई अर्थव्यवस्था सरल पुनरुत्पादन के चक्र में फंस जाती है, तो उसके लिए नवउदारवादी व्यवस्था के दायरे में रहते हुए, इस गतिरोध से निकलना बहुत ही मुश्किल हो जाता है. यह कोई खासतौर पर वामपंथ की ही दलील नहीं है. यह दलील तो ऐसे सभी को स्वीकार करनी पड़ेगी जिनकी दिलचस्पी सिर्फ विचारधारात्मक कारणों से धुंधलका फैलाने में नहीं हो. अचरज की बात नहीं है कि कुछ ईमानदार उदारतावादी अर्थशास्त्री भी ठीक यही बात कहते आए हैं.

कृषि क्षेत्र भी उबार नहीं पाएगा

किसी को ऐसा लग सकता है कि चूंकि कृषि क्षेत्र का उत्पादन, मांग के पहलू से संचालित नहीं होता है बल्कि स्वायत्त तरीके से ही तय होता है, मांग के मुकाबले फालतू उत्पाद सरकारी भंडारों के लिए उठाए जाने के चलते, कृषि उत्पाद में बढ़ोतरी समग्रता में अर्थव्यवस्था में आर्थिक वृद्धि का स्वायत्त स्रोत जोड़ सकती है और यह संबंधित अर्थव्यवस्था को सरल उत्पादन के चक्र में फंसने बचा सकता है. बेशक, इसे एक तार्किक संभवना तो कहना ही होगा. लेकिन, 2019-20 और 2021-22 के बीच जीडीपी में वृद्घि के जो आंकड़े हमने शुरू में दिए हैं, उनमें कृषि क्षेत्र की वृद्घि भी शामिल है. इसलिए, अगर कृषि क्षेत्र में एकाएक तेजी से बढ़ोतरी नहीं हो रही हो तो, यह गतिरोध टूटने वाला नहीं है. और नवउदारवादी व्यवस्था में, जिसकी एक मूलभूत विशेषता ही किसानी खेती का ज्यादा से ज्यादा निचोड़ा जाना है, यह उम्मीद करने का कोई कारण नहीं है कि कृषि की वृद्धि में स्वायत्त तेजी आएगी. इसलिए, सरल पुनरुत्पादन के चक्र में गिर जाने की अर्थव्यवस्था की प्रवृत्ति कोई कमी आने नहीं जा रही है.

और अगर किसी कारण से, अर्थव्यवस्था के सरल पुनरुत्पादन में फंसे रहते हुए, आय वितरण में और गिरावट आती है, इससे अर्थव्यवस्था के सरल उत्पादन के चक्र से बाहर निकलने की बात तो दूर, मंदी ही पैदा हो रही होगी. इसकी वजह यह है कि अगर कोई ऋणात्मक वृद्घि दर आती है, तो वह अर्थव्यवस्था को सरल पुनरुत्पादन के एक और नये स्तर पर ही धकेल रही होगी, जहां बेरोजगारी की दर और ज्यादा होगी. ऐसा इसलिए होगा कि आय वितरण में उल्टी दिशा में यह बदलाव, उपभोग में कमी के जरिए, सकल मांग के स्तर को घटाने का ही काम करेगा. इसकी वजह यह है कि गरीब ही अपनी इकाई आय का कहीं बड़ा हिस्सा उपभोग पर खर्च करते हैं.

नवउदारवादी निजाम में भारतीय अर्थव्यवस्था का सरल पुनरुत्पादन की ओर खिसकने की प्रवृत्ति प्रदर्शित करना, इसी तथ्य की ओर इशारा करता है कि नवउदारवाद, अंधी गली में पहुंच गया है और यह भारत के लिए ही नहीं पूरी दुनिया के लिए ही सच है.

साभार: News Click

(प्रभात पटनायक एक भारतीय मार्क्सवादी अर्थशास्त्री और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं.)

हरियाणा 34.5 फीसदी बेरोज़गारी दर के साथ फिर पहले स्थान पर

CMIE की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा सर्वाधिक बेरोजगारी दर के साथ एक बार फिर से पहले स्थान पर रहा. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने 2 मई को पूरे देश के बेरोज़गारी के आंकड़े जारी किए. मार्च महीने में भी हरियाणा 26.7% की बेरोज़गारी दर के साथ पहले स्थान पर था. वहीं अप्रैल महीने में 34.5 फीसदी की बेरोजगारी दर के साथ पहले स्थान पर है. CMIE की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में पिछले महीने की तुलना में करीबन 8 फीसदी बेरोजगारी दर बढ़ी है.

निम्न राज्यों में रही सबसे ज्यादा बेरोजगारी दर
हरियाणा 34.5%
राजस्थान 28.8%
बिहार 21.1%
जम्मू और कश्मीर 15.6%
गोवा 15.5%

देश में सबसे कम बेरोज़गारी दर हिमाचल प्रदेश की रही जो महज 0.2 फीसदी है. पिछले महीने सबसे कम बेरोजगारी दर छतीसगढ़ की रही थी जो अब दूसरे स्थान पर सबसे कम है.

निम्न राज्यों में रही सबसे कम बेरोजगारी दर
हिमाचल प्रदेश0.2%
छत्तीसगढ़ 0.6%
असम 1.2%
उड़ीसा 1.5%
गुजरात 1.6%

फ़रवरी महीने में बेरोज़गारी दर में हरियाणा दूसरे स्थान पर चला गया था लेकिन मार्च में फिर से ऊपर आ गया. संस्थान हर महीने पूरे देश की बेरोजगारी के आंकड़े जारी करता है. इस महीने पूरे देश के स्तर पर बेरोज़गारी दर 7.83 फीसदी रही जो पिछली बार 7.6 फीसदी थी. शहरों में बेरोजगारी दर 9.22 फीसदी रही जो पिछली बार 8.6 फीसदी थी. वहीं ग्रामीण बेरोजगारी दर 7.18 फीसदी रही जो पिछली बार 7.8 फीसदी थी. जम्मू और कश्मीर पिछले महीने 25 फीसदी की बेरोजगारी दर के साथ दूसरे स्थान पर था जो अबकी बार 15.6 फीसदी के साथ चौथे स्थान पर चला गया है. फ़रवरी में राष्ट्रीय बेरोज़गारी दर 8.1% थी जो मार्च में घटकर 7.6% हो गई थी. लेकिन अप्रैल में बेरोजगारी दर फिर से बढ़ गई है.

बेरोज़गारी दर कैसे निकालते हैं

श्रम बाज़ार में उपलब्ध रोजगाररत और बेरोजगार श्रमिकों के औसत के आधार पर बेरोजगारी दर निकाली जाती है. बेरोजगारी दर उस श्रम बल का एक हिस्सा है जिसके पास वर्तमान में रोजगार नहीं है लेकिन उन्हें मिल सकता है.बेरोजगार वो हैं जो काम करने के इच्छुक हैं और व्यक्त सक्रिय श्रम बल के प्रतिशत के रूप में नौकरी की तलाश में हैं. जो बेरोजगार हैं और नौकरी की तलाश में नहीं हैं उनकी संख्या को बेरोजगारी दर निकालने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता. ऐसी आबादी लगातार बढ़ी है जिसने नौकरी की तलाश ही बंद कर दी है.  नवभारत टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार 45 करोड़ लोग नौकरी की तलाश छोड़ चुके हैं. अगर इस आबादी को भी शामिल कर लिया जाये तो बेरोजगारी दर के आंकड़े अलग ही होंगे.