CM खट्टर के गांव के सरकारी स्कूल में अंग्रेजी पढ़ा रहा चपरासी, छात्रों ने स्कूल को ताला जड़ा

मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के पैतृक गांव निंदाना के राजकीय कन्या वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय में शिक्षकों की कमी के चलते एक चपरासी अंग्रेजी पढ़ा रहा है.

यह आरोप स्कूल के छात्रों ने लगाया, जिन्होंने कल यानी 27 सितंबर को स्कूल में ताला लगाकर शिक्षकों की कमी के खिलाफ धरना दिया. स्कूल के प्रिंसीपल सुरेंद्र कुमार ने कहा कि चपरासी को छात्रों को पढ़ाने के लिए इसलिए नियुक्त किया गया था क्योंकि उसके पास योग्यता थी. प्रिंसीपल ने बताया, “उस चपरासी के पास बीए और बीएड की डिग्री है, और उसने एचटीईटी परीक्षा पास की है. इसलिए, वह शिक्षकों की कमी के कारण वैकल्पिक उपाय के रूप में छठी कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी पढ़ा रहा है.”

खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) बिजेंद्र हुड्डा ने हालांकि, स्कूल में छात्रों को पढ़ाने के लिए एक चपरासी की तैनाती से इनकार किया. हुड्डा ने कहा कि “स्कूल में टीचिंग स्टाफ की कमी है, लेकिन कोई चपरासी छात्रों को पढ़ा नहीं रहा है. स्कूल में शिक्षकों की कमी जल्दी ही पूरी की जाएगी. ”

हरियाणा में अध्यापकों की कमी के चलते आए दिन सरकारी स्कूलों के सामने ग्रामीणों और छात्रों के प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं. सीएम सिटी करनाल के गांव पिचौलिया में भी ग्रामीण, बच्चों के साथ गांव के सरकारी स्कूल के सामने शिक्षकों की कमी के विरोध में प्रदर्शन करने के लिए इकट्ठा हुए थे और ग्रामीणों ने अपनी मांग को लेकर सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए स्कूल के मुख्य गेट पर ताला जड़ दिया था.

हरियाणा सरकार एक ओर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधारने का दावा कर रही है लेकिन वहीं दूसरी ओर बच्चे सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने से ही कतरा रहे हैं. देश के सरकारी स्कूलों में ग्यारहवीं कक्षा में दाखिलों में भारी गिरावट सामने आई है. स्कूल शिक्षा विभाग के आंकड़ो के अनुसार पिछले साल की तुलना में इस साल 38,976 दाखिले कम हुए हैं. वहीं दसवीं कक्षा के मामले में भी लगभग यही स्थिति रही है.

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले सत्र में प्रदेश के सरकारी स्कूलों में ग्यारहवीं कक्षा में कुल 2,00,946 छात्रों का नाम दर्ज था लेकिन इस सत्र में यह संख्या घटकर 1,61,970 रह गई है. इसी तरह, सरकारी स्कूलों में पिछले साल दसवीं कक्षा में 2,01,962 छात्रों का प्रवेश हुआ था जबकि इस सत्र में यह आंकड़ा 1,84,106 है.

बारिश ने किसानों की नींद हराम की, सरकार अभी चैन की नींद सो रही

हरियाणा में लगातार हो रही बारिश ने सूबे के किसानों की चिंता बढ़ा दी है. धान की फसल पकने के समय इतनी अधिक बारिश होने से किसान काफी चिंतित हैं. किसानों ने कहा कि अगर बारिश ऐसे ही जारी रही तो वे बिल्कुल तबाह हो जाएंगे. नुकसान तो हो ही चुका है.

सोनीपत और पानीपत जिले के गोहाना, मुंडलाना और कथुरा ब्लॉक में खेतों में सबसे अधिक जलभराव देखने को मिला है और धान की खड़ी फसल चौपट हो गई है..

सोनीपत जिले के कथुरा ब्लॉक के भैंसवां खुर्द गांव के किसान भगत सिंह ने कहा , “हमारे इलाके में अधिकांश धान देर से बोया जाता है और यह फूल अवस्था में होता है. खेतों में करीब एक फुट दो फुट पानी है और धान की फसल चौपट हो गई है.”

कृषि विभाग के विषय विशेषज्ञ (एसएमएस) देवेंद्र कोहाड़ ने कहा कि सोनीपत में 2.25 लाख एकड़ में धान की फसल बोई गई थी और 90 प्रतिशत किसानों ने धान की देर से बुवाई की थी.

उन्होंने कहा, “जिले के तीन ब्लॉक- कथुरा, मुंडलाना और गोहाना में जलभराव की समस्या है, इसलिए हमने किसानों को सलाह दी है कि जब तक बारिश नहीं रुकती, तब तक क्षेत्र में कपास और बाजरा की कटाई बंद कर दें.”

पानीपत में कृषि विभाग के उप निदेशक वजीर सिंह ने कहा कि 95 प्रतिशत किसानों ने जिले में लगभग 1.80 लाख एकड़ में बासमती धान की किस्मों की बुवाई की थी, जबकि 5-7 प्रतिशत संकर फसल की थी. उन्होंने कहा कि क्षेत्र में पिछले तीन दिनों से लगातार बारिश के कारण संकर फसल को नुकसान हुआ है.

मूसलाधार बारिश ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है जिससे कई गांवों के किसान परेशान हैं. किसान विशेष गिरद्वारी (नुकसान सर्वेक्षण) की मांग भी उठा रहे हैं.

कृषि विभाग के सूत्रों ने कहा, “भारी बारिश के कारण जलभराव के कारण कपास, बाजरा, ज्वार और धान की खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचा है.” हजारों हेक्टेयर से अधिक भूमि पर पानी 3 फीट से 4 फीट तक जमा हो गया है.

गुघेरा गांव के एक किसान राजकुमार ओहल्यान ने कहा कि बाजरे और धान जैसी फसलें, जो कटाई के लिए तैयार थीं, फसल के चपटे होने से बड़ा नुकसान हुआ था. कटाई में देरी अंततः कई क्षेत्रों में गेहूं की बुवाई में बाधा उत्पन्न कर सकती है. उन्होंने कहा कि किसान नुकसान को लेकर चिंतित हैं, इसलिए सरकार को एक सर्वेक्षण का आदेश देना चाहिए और प्रभावित गांवों में पानी की निकासी सुनिश्चित करने के अलावा राहत राशि जारी करनी चाहिए. बंचारी गांव के किसान अजीत कहते हैं, ”बारिश के कारण कई एकड़ में कपास की फसल बर्बाद हो गई है. यह मामला संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में पहले ही लाया जा चुका है.”

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार शनिवार सुबह तक पलवल खंड में 120 मिमी, होडल में 96 मिमी, हथीन में 52 मिमी और हसनपुर उपमंडल में 34 मिमी बारिश दर्ज की गई है. दावा किया गया है कि बारिश ने लगभग 61,000 हेक्टेयर में खड़ी फसलों को प्रभावित किया है. इसमें 18,140 हेक्टेयर में कपास, 25,183 हेक्टेयर में धान, 14,307 हेक्टेयर में ज्वार, 4,000 में बाजरा और 4,640 हेक्टेयर में गन्ना शामिल है. कृषि विशेषज्ञ डॉ महवीर मलिक कहते हैं, “लगभग सभी खरीफ फसलों को नुकसान के साथ, खेतों में खड़े पानी को जल्द से जल्द हटाने की जरूरत है ताकि आगे नुकसान से बचा जा सके.”

दक्षिण हरियाणा के अहिरवाल क्षेत्र में किसानों के बाजरे की फसल में भी काफी नुकसान हुआ है. बाजरे की खड़ी फसल तेज हवा के साथ हुई बारिश के कारण गिर भी गई है. रेवाड़ी के एक अधिकारी ने बताया कि कृषि विभाग ने अपनी फसल का बीमा करवाने वाले किसानों को 72 घंटे के भीतर नुकसान की सूचना विभाग को देने को कहा है. उन्होंने कहा कि किसान फार्म भरकर जमा करें, ताकि बीमा कंपनी को हुए नुकसान की जानकारी मिल सके.

हिसार में नहर में दरार

भारी बारिश के कारण भिवानी जिले के रोहनात गांव के पास नहर में दरार आने से ओवरफ्लो हो गया है. इससे कई हजार एकड़ में खड़ी फसल जलमग्न हो गई है. ग्रामीणों ने कहा कि सुंदर शाखा में दरार आ गई है. एक वरिष्ठ कृषि अधिकारी ने कहा कि बारिश से उन फसलों को नुकसान होगा जिनकी कटाई होने वाली थी.

कॉटन बेल्ट सबसे ज्यादा प्रभावित, क्योंकि गुलाबी बॉलवॉर्म ने पहले कहर बरपाया था. हिसार में शुक्रवार से हो रही भारी बारिश से कपास, धान, बाजरा, ग्वार और मूंग की खरीफ फसलों को व्यापक नुकसान हुआ है.

कपास किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है क्योंकि पिछली बार बारिश और पिंक बॉलवर्म ने पहले ही फसल को काफी नुकसान पहुंचाया है. हिसार, भिवानी, फतेहाबाद और सिरसा वाले क्षेत्र को कपास की पट्टी के रूप में जाना जाता है. इसके अलावा, इस क्षेत्र में धान, बाजरा और ग्वार की फसलें भी उगाई जाती हैं. खरीफ की फसल की कटाई होने वाली है और बारिश ने फसलों को चोपट कर दिया है. हिसार में खेतों में पानी भर गया है.

पिछले पांच दिनों से हो रही भारी बारिश करनाल और कैथल जिलों के किसानों की रातों की नींद हराम कर रही है क्योंकि इससे उनकी खड़ी धान की फसल को ‘व्यापक’ नुकसान हुआ है. बारिश के कारण जिन खेतों में फसल पक चुकी है, वहां जलभराव हो गया है, जिसको निकालने के लिए किसान हाथ-पांव मार रहे हैं.

पके धान के रंगहीन दाने।

कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार करनाल जिले में करीब 90,000 एकड़ और कैथल जिले में करीब 4,000 एकड़ में जलभराव की सूचना है. अब तक, अधिकारी करनाल जिले में लगभग 10-15 प्रतिशत और कैथल जिले में 5 प्रतिशत नुकसान की उम्मीद कर रहे हैं. किसानों ने कहा कि मुख्य रूप से कम अवधि की पूसा-1509 और पीआर-126 जैसी किस्मों को नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि नमी की मात्रा अधिक होने से भविष्य में बाजार में कीमतों में गिरावट आ सकती है.

नीलोखेड़ी ब्लॉक के किसान इंद्रजीत सिंह ने कहा, “मैंने 25 एकड़ में बासमती और पीआर किस्में अपने पांच किलों में उगाई थी. भारी बारिश ने न केवल मेरी फसल को चौपट कर दिया है, बल्कि खेतों में जलभराव भी कर दिया है. इससे फसल को नुकसान होगा, ”

जो लोग अपनी फसल काट कर अनाज मंडियों में पहुंच चुके हैं, वे आढ़तियों की जारी हड़ताल के कारण अपनी उपज नहीं बेच पा रहे हैं. करनाल के नरुखेड़ी गांव के किसान सुनील ने कहा कि वह अपनी उपज बेचने के लिए पांच दिनों से यहां अनाज मंडी में इंतजार कर रहे थे, लेकिन आढ़तियों की हड़ताल के कारण कोई भी इसे खरीदने के लिए आगे नहीं आया. इसके अलावा, बारिश ने उनकी उपज को नुकसान पहुंचाया है क्योंकि अनाज मंडी में अपर्याप्त व्यवस्था थी. करनाल के उप निदेशक कृषि (डीडीए) आदित्य डबास ने कहा कि 4.15 लाख एकड़ में धान की फसल की खेती की गई थी, जिसमें से 97,500 एकड़ में बासमती, 10,000 एकड़ में डुप्लीकेट बासमती (मुछल) और 3,07,500 एकड़ गैर-बासमती किस्मों की खेती की गई थी.

आदित्य डबास ने बताया, “पानी का ठहराव अनाज को फीका कर सकता है. ऐसी स्थितियों में कीड़े भी हमला करते हैं, ”

कैथल के डीडीए करम चंद ने कहा कि कैथल जिले में 4 लाख एकड़ में धान की खेती की गई थी, जिसमें 1.25 लाख एकड़ में बासमती, जबकि 2.75 लाख एकड़ में गैर-बासमती किस्मों की खेती की गई थी.

बीकेयू ने की किसानों के लिए राहत की मांग

भारतीय किसान संघ (सर छोटू राम) राज्य कोर कमेटी के सदस्य जगदीप सिंह औलख ने मांग की कि सरकार को एक विशेष गिरदावरी (सर्वेक्षण) करना चाहिए और किसानों को राज्य भर में पिछले दिनों हुई भारी बारिश के कारण हुई फसल के नुकसान की भरपाई करनी चाहिए.

शहरों में बारिश से झमाझम, देहात में फसलें बरबाद

पिछले 72 घंटों में तेज हवाओं के साथ हुई बरसात ने हरियाणा-पंजाब और देश के कई हिस्सों में किसानों की धान की फसल चौपट कर दी है, जिससे किसान समुदाय में मायूसी पसरी हुई है.

हरियाणा में सबसे अधिक नुकसान करनाल जिले में देखने को मिला है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, करनाल में पिछले तीन दिनों में लगभग 122 मिमी बारिश हुई है. मंगलवार की सुबह से शुरू हुई बारिश गुरुवार की शाम तक जारी रही. इससे कहीं-कहीं पक चुकी फसलों को नुकसान पहुंचा है. यमुना पट्टी से लगे गन्ने के खेतों में भी पानी भर जाने की खबर है. लगभग हर जगह धान की फसल में भी पानी खड़ा हो गया है. इन परिस्थितियों के बीच, किसानों को डर है कि खड़ी धान की फसल की कटाई में लगभग 10 दिनों की देरी हो सकती है.

आईसीएआर के पूर्व प्रमुख वैज्ञानिक डॉ वीरेंद्र लाठेर ने कहा कि बासमती की शुरुआती किस्मों और मोटे अनाज की किस्मों जैसे पीबी-1509, पीआर-126 और अन्य को बड़ा नुकसान हुआ है. उन्होंने मानसून की देरी से वापसी को किसानों को होने वाले संभावित नुकसान के पीछे एक प्रमुख कारण माना. उन्होंने कहा कि तेज बारिश के साथ तेज हवाएं चलने से फसलें चौपट हो गई हैं, जो पक चुकी थीं.

डॉ लाठर ने कहा कि पकी हुई फसल के दौरान बेमौसम बारिश से अनाज का रंग फीका पड़ सकता है क्योंकि जिले के विभिन्न हिस्सों में एक कवक रोग पहले ही आ चुका है और बारिश के बीच किसान फफूंदनाशकों का छिड़काव नहीं कर सकते.

धान में पहले से ही बौनी बीमारी की चुनौती का सामना कर रहे किसान बारिश से होने वाले इस अतिरिक्त नुकसान से चिंतित हैं.

निसिंग ब्लॉक के किसान मनदीप सिंह ने पत्रकारों को बताया, “पहले धान में बौनेपन की बिमारी फैल गई थी, जिसे स्टंटिंग के नाम से जाना जाता था. पहले बौनेपन ने उन्हें नुकसान पहुंचाया और अब, हवाओं के साथ बेमौसम बारिश उनकी फसल के लिए खतरा बन रही है.”

एक अन्य किसान अमन ने कहा, “धान की कटाई शुरू होने में सिर्फ 10-15 दिन बचे हैं, इस बेमौसम बारिश ने न केवल खड़ी फसल को नुकसान हुआ है, बल्कि मौसमी सब्जियों, विशेष रूप से आलू और सरसों की बुवाई में भी देरी हुई है.”

करनाल के उप निदेशक कृषि आदित्य डबास ने पत्रकारों को बताया, “अभी तक हमें नुकसान की कोई रिपोर्ट नहीं मिली है, लेकिन क्षेत्र के अधिकारियों को स्थिति का आकलन करने और एक रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दिया गया है ताकि आगे की प्रक्रिया शुरू की जा सके.”

बेमौसम बारिश से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी नुकसान देखने को मिला है. मौसम विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पश्चिमी विक्षोभ का असर 27 सितंबर तक रहेगा. शामली कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. विकास मलिक ने बताया कि शीतकालीन गन्ने की बुवाई का समय चल रहा है. सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ के कारण बुवाई पिछड़ रही है. बारिश से खड़ी गन्ने की फसल को कोई नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन कटे हुए धान का दाना कमजोर और काला हो गया है.

कल 22 सितंबर को 8:30 से 5:30 के दौरान हिमाचल प्रदेश के अधिकांश हिस्सों, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली, पश्चिम मध्य प्रदेश, पूर्वी राजस्थान, तेलंगाना और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कई हिस्सों में बादल बरसे या गरज के साथ बौछारें पड़ी.

कल 22 सितंबर को 8:30 से 5:30 के दौरान अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के कार-निकोबार में 10 सेमी, पश्चिम मध्य प्रदेश के गुना में 9 सेमी, पश्चिम उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में 6 सेमी, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली हर जगह 6 सेमी बारिश दर्ज की गई.

हिसार में भीम आर्मी और पुलिस का टकराव, 25 घायल

हरियाणा के हिसार जिले में भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं पर 21 सितंबर की शाम को हिसार पुलिस ने मिनी सचिवालय घेरने के चलते लाठीचार्ज कर दिया. लाठीचार्ज से गुस्साए प्रदर्शनकारियों ने कथित तौर पर पुलिस कर्मियों पर पथराव किया, जिसमें भीम आर्मी के करीब 20 कार्यकर्ता और कुछ पुलिसकर्मी घायल हो गए. घायल पुलिसकर्मियों को यहां सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि घायल प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने तीतर-बीतर कर दिया.

डीएसपी नारायण चंद ने अपने एक ब्यान में कहा कि प्रदर्शनकारियों ने मिनी सचिवालय में जबरन घुसने की कोशिश की और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया.

पुलिस अफसरों के ब्यान के उल्ट भीम आर्मी के जिला प्रवक्ता संत लाल अंबेडकर का कहना है कि पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, जिससे उनके 20-25 कार्यकर्ता घायल हो गए. उन्होंने कहा कि असामाजिक तत्व पथराव में शामिल हैं. उन्होंने पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं की रिहाई की मांग की.

यह घटना उस समय की है जब बिजली मंत्री रंजीत सिंह मिनी सचिवालय में बैठक कर रहे थे. उस समय लगभग 100 प्रदर्शनकारियों ने कापड़ो गांव में मृत पाए गए व्यक्ति की हत्या का मामला दर्ज करने की मांग को लेकर सिविल अस्पताल से मिनी सचिवालय तक विरोध मार्च निकाला. अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाला विक्रम करीब 14 दिन पहले कापड़ो गांव के पास मृत पाया गया था.

प्रदर्शनकारियों ने उपायुक्त को एक ज्ञापन सौंपने की योजना बनाई और शहर में मार्च निकाला. जब वे मिनी सचिवालय के पास पहुंचे तो पुलिस ने उन्हें रोक लिया. डीएसपी नारायण चंद ने पत्रकारों को बताया, “पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को 10 मिनट इंतजार करने को कहा था ताकि एक प्रशासनिक अधिकारी वहां आकर ज्ञापन स्वीकार कर सके और उनसे बातचीत कर सके. हालांकि, प्रदर्शनकारियों ने मिनी सचिवालय में जबरन घुसने की कोशिश की और पुलिस पर पथराव शुरू कर दिया. घटना में करीब 10-15 पुलिसकर्मियों को चोटें आई हैं.”

एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि यह एक पूर्व नियोजित हमला था क्योंकि प्रदर्शनकारी अपने साथ पत्थर और कांच की बोतलें ले जा रहे थे.

इस प्रदर्शन में शामिल रहे साहिल ने बताया, “हम लोग डीसी साहब को बस ज्ञापन सौपंना चाहते थे, लेकिन पुलिस ने हमें मिनी सचिवालय तक भी नहीं पहुंचने दिया और पहले ही रोक लिया. जब हमने ज्ञापन की बात की तो पुलिस ने हमारे ऊपर लाठीचार्ज कर दिया और हमें जातिसूचक गालियां देते हुए हमारी पिटाई की. हमारे साथी सरकारी अस्पताल जाना चाहते थे ताकि मेडिकल करवाया जा सके, लेकिन पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. हमारी मांग है कि गिरफ्तार किए गए प्रदर्शनकारियों को रिहा किया जाए.”

सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने वाले छात्रों की संख्या में भारी गिरावट, 11वीं में करीबन 40 हजार छात्र घटे!

हरियाणा सरकार एक ओर सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर सुधारने का दावा कर रही है लेकिन वहीं दूसरी ओर बच्चे सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने से ही कतरा रहे हैं. देश के सरकारी स्कूलों में ग्यारहवीं कक्षा में दाखिलों में भारी गिरावट सामने आई है. स्कूल शिक्षा विभाग के आंकड़ो के अनुसार पिछले साल की तुलना में इस साल 38,976 दाखिले कम हुए हैं. वहीं दसवीं कक्षा के मामले में भी लगभग यही स्थिति रही है.

शिक्षा विभाग सरकारी स्कूलों में ग्यारहवीं और दसवीं कक्षा में दाखिलों में आई गिरावट के कारणों का पता लगाने में जुटा है. वहीं शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड के बाद निजी स्कूलों में छात्रों की वापसी और आईटीआई और पॉलीटेक्निक कॉलेजों में नौकरी दिलाने वाले पाठ्यक्रमों की ओर युवाओं का रुझान इसकी एक वजह हो सकती है.

आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, पिछले सत्र में प्रदेश के सरकारी स्कूलों में ग्यारहवीं कक्षा में कुल 2,00,946 छात्रों का नाम दर्ज था लेकिन इस सत्र में यह संख्या घटकर 1,61,970 रह गई है. इसी तरह, सरकारी स्कूलों में पिछले साल दसवीं कक्षा में 2,01,962 छात्रों का प्रवेश हुआ था जबकि इस सत्र में यह आंकड़ा 1,84,106 है.

शेर हमेशा चीतों की जान ले लेता है!

भारत में नामीबिया के चीतों को बसाए जाने से कुछ लोग उत्साह में है। जाहिर है कि जानवरों के बारे में हमारी समझ बहुत ही भोथरी है। और हम उस समझ को बदलना भी नहीं चाहते। न ही इस बारे में कुछ पढ़ना-समझना चाहते हैं। यही कारण है कि कुछ पत्रकार इस तरह की खबरें चला रहे हैं कि भारत में शेर अब चीता लेकर आया है। लेकिन, उन्हें शायद पता नहीं कि जंगल में शेर जब भी मौका मिले चीते को मार देते हैं।

मांसाहारी जीव एक दूसरे को पसंद नहीं करते हैं। जब भी मौका मिलेगा एक बाघ किसी तेंदुए को मार देगा। जब भी मौका मिलेगा एक शेर चीते को मार डालेगा। जब भी मौका लगेगा बाघ और शेर में एक दूसरे को मारने की लड़ाई छिड़ जाएगी। वे एक दूसरे को पसंद नहीं करते हैं। यहां तक कि स्पाटेड हायना भी शेरों के बच्चों को मारने की फिराक में लगे होते हैं। शेर भी जहां मौका लगे हायना (लकड़बग्घा) को मार डालते हैं। हाथी को भी अगर मौका मिल जाए तो वो शेरों को बच्चों को मार डालते हैं।

इसके पीछे कुल मिलाकर मतलब पारिस्थितिक संतुलन बनाने से है। मांसाहारी जानवर एक-दूसरे की जान के पीछे पड़े रहते हैं। किसी चीते या लकड़बग्घे को मारने के बाद शेर उसे खाता नहीं है। क्योंकि, चीता या लकड़बग्घा उसके लिए खाना नहीं है। उसके लिए वह प्रतिद्वंद्वी है। दुश्मन है। आज अगर उसे नहीं मारा गया तो कल वह उसके शिकारों पर हमला करेगा। उसके साथ भोजन साझा करना पड़ेगा। इसीलिए वह जब भी मौका लगे वह उसे मार डालता है। इसलिए कृपया शेर लाया चीता जैसे मुहावरे का इस्तेमाल नहीं करें। इससे सिर्फ यही पता चलता है कि आप वन्यजीवों के मामले में कितने बड़े अनपढ़ हैं।

फिर गूंजी चीते की दहाड़ भी गलत है। क्योंकि, चीते दहाड़ते नहीं है। इसकी बजाय यह कहा जा सकता है कि भारत में फिर से फर्राटा भरेंगे चीते। क्योंकि, रफ्तार के ही वे प्रतीक हैं। रफ्तार ही उनका सबकुछ है। उनकी दहाड़ में जान नहीं है। उनकी रफ्तार में जान है।

इसलिए जैसे ही आप कहते हैं कि फिर गूंजेगी चीते की दहाड़, आप अपने आप को फिर से अनपढ़, जाहिर और अहमक सिद्ध करते हैं।

चित्र इंटरनेट से लिया गया है। इसमें एक शेरनी चीते की हत्या कर रही है। अफ्रीका के जंगलों में हत्या के ऐसे मामले अक्सर ही सामने आते रहते हैं।

भाजपा की जेजेपी में सेंधमारी, उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के विशेष सहायक समेत 200 कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल!

भाजपा ने जजपा में सेंधमारी करते हुए जजपा के कईं नेताओं समेत सैकड़ों कार्यकर्ताओं को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश धनखड़ ने उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के विशेष सहायक रहे रमेश चौहान समेत जजपा (जननायक जनता पार्टी) के करीबन 200 कार्यकर्ताओं को बीजेपी में शामिल करवाया है.

भाजपा ने अपनी सहयोगी जननायक जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को जिस तरह पार्टी में शामिल कराया है, संगठन के तौर पर दोनों पार्टियों के बीच तल्खी बढ़ती दिखाई दे रही है हालांकि उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की ओर से इस पूरे घटनाक्रम पर कोई बयान नहीं आया है. लेकिन बीजेपी की इस सेंधमारी से दोनों सहयोगी दलों के राजनीतिक रिश्तों पर असर पड़ना तय है.

वहीं बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ओपी धनखड़ ने अपने बयान में कहा कि बीजेपी की विचारधारा का सम्मान करने वाला कोई भी व्यक्ति बीजेपी में शामिल हो सकता है. धनखड़ ने कहा कि ऐसे कईं मौके आए, जब जेजेपी ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को अपनी पार्टी में शामिल कराया है. इसलिए यदि जेजेपी का कोई कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल होता है तो इसमें कुछ गलत नहीं है.

वहीं इसपर जेजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अंनत राम तंवर ने कहा कि हमारे पहले भी कईं साथी बीजेपी में शामिल हुए थे लेकिन बीजेपी में जाने के बाद उन लोगों की कोई पूछ नहीं हो रही है.

हरियाणा में फिर टले पंचायत चुनाव, अब नवंबर के बाद होंगे चुनाव!

हरियाणा में पंचायत चुनाव और आगे टल गए हैं. पंचायत चुनाव अब नवंबर के बाद होने की संभावना है. प्रदेश सरकार की ओर से आरक्षित सीटों का ब्योरा नहीं दे पाने के कारण पंचायत चुनाव टले हैं. राज्य चुनाव आयोग ने आरक्षित सीटों पर डेटा की कमी का हवाला देते हुए 30 सितंबर तक चुनाव कराने में असमर्थता जाहीर की है. चुनाव आयोग ने विकास एवं पंचायत विभाग को पत्र लिखकर 22 सितंबर तक आरक्षित सीटों का ब्योरा मुहैया कराने की बात कही है. ऐसे में अगर पंचायत विभाग 22 सितंबर तक चुनाव आयोग को जानकारी नहीं दे पाया तो 30 सितंबर तक चुनाव होने की कोई संभावना नहीं है.

वहीं पंचायत विभाग द्वारा अब तक आरक्षित सीटों का पूरा ब्योरा देने के चलते राज्य चुनाव आयोग ने भी सरकार को जानकारी देते हुए 30 सितंबर तक चुनाव करवाने में असमर्थता जाहिर की है. बता दें कि राज्य सरकार ने इस साल जुलाई में एक अधिसूचना जारी की थी जिसके अनुसार राज्य चुनाव आयोग को 30 सितंबर तक पंचों, सरपंचों और पंचायत समितियों और जिला परिषदों के सदस्यों के आम चुनाव कराने थे.

बता दें कि पंचायती राज चुनाव फरवरी 2021 में होने थे. बीसी-ए आरक्षण, महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें, सम-विषम आधार पर सीटें आरक्षित करने को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न याचिकाएं विचाराधीन होने के कारण चुनाव टलते गए. इसी साल मार्च-अप्रैल में हाईकोर्ट ने चुनाव को हरी झंडी दी थी जिसके बाद सरकार ने राज्य चुनाव आयोग को चुनाव कराने की तैयारी करने के निर्देश दिए थे. जिसके बाद सितंबर के आखिर तक चुनाव कराने की समय सीमा भी तय की गई थी लेकिन अब पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा बीसी-ए को आरक्षण देने संबंधी रिपोर्ट सरकार को सौंपने के कारण मुख्य देरी हो रही है.

फासीवादियों की देशभक्ति नहीं, उनकी दूसरों से घृणा उन्हें परिभाषित करती है!

अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में होने वाले जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल से कुछ लेखकों, बुद्धिजीवियों ने अपना नाम वापस ले लिया है. ऐसा उन्होंने एक सत्र में भारतीय जनता पार्टी की एक नेता को आमंत्रित किए जाने पर अपना ऐतराज़ जताने के लिए किया है.

यह स्वाभाविक ही है कि भाजपा नेता ने उनके इस कदम को उदारवादियों की असहिष्णुता का एक उदाहरण बतलाया है और कहा है कि इससे मालूम होता है कि ख़ुद से भिन्न विचारों के लिए उनके मन में कितनी घृणा है. उत्सव में आमंत्रित युगांडा के अध्यापक और लेखक महमूद ममदानी ने कहा है कि वे इसमें ज़रूर शामिल होंगे. किसी के विचार से सख़्त असहमति के बावजूद उसकी उपस्थिति के कारण किसी कार्यक्रम का बहिष्कार उनकी दृष्टि में ग़लत है.

लेखक सुचित्रा विजयन ने याद दिलाया कि इस्राइल के संदर्भ में ऐसा नहीं सोचते. वहां वे बहिष्कार की नीति का समर्थन करते हैं. ममदानी का तर्क होगा कि इस्राइल तक़रीबन नस्लभेदी नीति पर आधारित राष्ट्र बन गया है. क्या भारत की तुलना इस्राइल से की जा सकती है? क्या भारत की संघीय सरकार का नेतृत्व जो राजनीतिक दल कर रहा है, उसकी राजनीतिक विचारधारा इस्राइल से तुलनीय है?

भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा है. आरएसएस तक़रीबन 100 साल पुराना फ़ासिस्ट संगठन है. इसका मक़सद भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का है. हिंदू राष्ट्र का अर्थ है या तो मुसलमानों और ईसाइयों का पूरी तरह सफ़ाया या वह मुमकिन न होने पर उन्हें स्थायी तौर पर दूसरे दरजे के शहरियों में में तब्दील कर देना.

ऐसा कई प्रकार से किया जाता है. यह तो कहा ही जाता है कि भारत पर पहला अधिकार हिंदुओं का है. इसलिए उनकी जीवन पद्धति ही भारतीय जीवन पद्धति होगी. जो हिंदू नहीं हैं, उन्हें यह जीवन पद्धति अपना लेने में क्यों ऐतराज़ होना चाहिए?

इससे आगे जाकर ऐसे क़ानून बनाए जाते हैं जिनसे मुसलमानों और ईसाइयों के जीवन के अलग-अलग पक्षों को नियंत्रित किया जा सके. ऐसे क़ानून जो गोमांस पर प्रतिबंध लगाते हैं. मुसलमान पुरुषों के हिंदू स्त्रियों से संबंध बनाने या विवाह करने को जुर्म ठहराते हैं. मुसलमानों के जन्म को ही भारत और हिंदुओं के ख़िलाफ़ साज़िश माना जाता है. इसलिए उनके जनसंख्या नियंत्रण के उपाय सुझाए जाते हैं.

ऐसे प्रशासनिक आदेश देश के अनेक हिस्सों में जारी किए गए हैं जो मुसलमानों के ज़मीन ख़रीदने या मकान बनाने पर प्रतिबंध लगाते हैं. सार्वजनिक जगहों में वे चाहे स्कूल हों या मॉल, मुसलमान पहचान के चिह्नों पर ऐतराज़ किया जाने लगा है. कश्मीर में मुसलमान कर्मचारियों को सरकार बिना कारण बताए बर्खास्त कर सकती है. सिर्फ़ राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर.

क़ानूनों के अलावा मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ सरकारी और सड़क की हिंसा रोज़ाना की बात है. उनकी नमाज़, मस्जिदों पर हमले अब आम हो चुके हैं. यह सरकार तो करती ही है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा से संगठन और लोग हिंदू त्योहारों में और यूं भी मस्जिदों पर, मुसलमान मोहल्लों पर हमले कर सकते हैं. अब सरकार खुले आम उनके घर, दुकान बुलडोज़र से ढहा दे सकती है. असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, दिल्ली में ऐसी घटनाएं अब लगातार हो रही हैं.

मुसलमान किसी विरोध-प्रदर्शन में काफ़ी ख़तरा उठाकर ही शामिल हो सकते हैं. मुसलमान पत्रकार का जीवन जोखिम से भरा है. कश्मीर के पत्रकारों, सिद्दीक़ कप्पन या मोहम्मद ज़ुबैर के साथ जो हुआ, वह सबके सामने है.

क़ानूनी तौर पर मुसलमानों के जीवन को अवैध ठहराने और उन पर रोज़ाना हिंसा के अलावा एक तीसरा तरीक़ा है उन्हें हिंदुओं के बीच लगातार बदनाम करना. भारत का मीडिया इस काम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन की तरह ही काम कर रहा है. मुसलमान बच्चे पैदा करके अपनी आबादी बढ़ाने का षड्यंत्र कर रहे है, वे सरकारी नौकरियों में घुसने की साज़िश कर रहे हैं, वे ज़मीन ख़रीदने की साज़िश कर रहे हैं, वे हिंदू लड़कियों को भरमाकर उनसे रिश्ता बनाने की साज़िश कर रहे हैं. ऐसी साज़िशों का अंत नहीं है.

मुसलमान जो कुछ भी करें उसे जिहाद कहकर हिंदुओं में उनकी एक डरावनी तस्वीर बनाई जाती है. हिंदुओं में उनके प्रति भय पैदा करके उनके ख़िलाफ़ हिंसा को जायज़ ठहराया जाता है. मुसलमान बाहरी हैं, हमलावरों की संतान हैं, दीमक की तरह देश को चाट रहे हैं, हिंदुओं के संसाधनों में हिस्सा ले रहे हैं, उनकी औरतों को छीन रहे हैं: ऐसी बातें अब खुलेआम, बिना किसी लिहाज़ के की जाती हैं.

यह सब कुछ भारतीय जनता पार्टी के छोटे-बड़े नेता करते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से औपचारिक, अनौपचारिक तौर पर जुड़े संगठन करते हैं. मसलन विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, दुर्गा वाहिनी,आदि. उसके अलावा हिंदू मुन्नानी, राम सेने, अभिनव भारत, हिंदू युवा वाहिनी जैसे सैकड़ों संगठन पूरे भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संरक्षण या शह पर सिर्फ़ मुसलमानों ही नहीं बल्कि ईसाइयों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार, घृणा अभियान और हिंसा करते ही रहते हैं.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए शैक्षिक संगठन, जैसे विद्या भारती, सरस्वती शिशु मंदिर, एकल विद्यालय हज़ारों स्कूल चलाते हैं जो बच्चों और किशोरों में मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ ज़हर भरते रहते हैं. इससे लगातार एक बड़ी आबादी मुसलमान और ईसाई विरोधी घृणा में दीक्षित होती रहती है. इससे मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा की ज़मीन तैयार होती रहती है.

ये सारी बातें भारत में जानी हुई हैं. फिर भी ऐसे बुद्धिजीवी हैं जो आरएसएस को फ़ासिस्ट संगठन कहने पर नाराज़ हो उठते हैं. उनका तर्क है कि वह देशभक्त संगठन है. देशभक्ति क्या है? क्या देश में रहने वाली आबादियों के ख़िलाफ़ घृणा पैदा करते हुए, उनके ख़िलाफ़ हिंसा करते हुए की जा सकती है?

यह कहा जाता है कि आरएसएस भारत से प्रेम करने वालों का संगठन है. तो क्या इस्राइली जियानवादी उस देश से प्रेम नहीं करते? या क्या जर्मन और इतालवी फ़ासिस्ट अपने देशों से प्रेम नहीं करते थे? फ़ासिस्ट की देशभक्ति नहीं, उसकी दूसरों से घृणा उसे परिभाषित करती है.

यह आश्चर्य की बात नहीं कि गांधी की हत्या का इरादा ज़ाहिर करने और उस पर उल्लास मनाने वाले आरएसएस को लोग सभ्य संगठन मानते हैं और ऐसा न करने पर दूसरों की भर्त्सना करते हैं. यह भी कहा जाता है कि आरएसएस ने किसी भी दूसरे संगठन के मुक़ाबले देश को जोड़ने का काम कहीं अधिक किया है. क्या सचमुच? उसने भारत प्रेम को मुसलमान और ईसाई घृणा का पर्याय बना दिया है.

आरएसएस को ही आदरणीय नहीं माना जाता, लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्र पुरुष के रूप में प्रचारित किया जाता है. किसी भी दूसरे सभ्य देश में आडवाणी पर हिंसा का प्रचार करने और भड़काने के लिए मुक़दमा चलता और सजा होती. भारत की अदालतें भी इसे बहुत गंभीर मसला नहीं मानतीं.

दुख की बात यह है कि भारत में मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा और हिंसा को असभ्य नहीं माना जाता. ऐसा करने वाला सम्माननीय बना रहता है. उसे जनता को चुनाव में जिताती ही है, बुद्धिजीवी भी मुसलमान विरोधी घृणा के विचार को विचारणीय मानते हैं. व

ममदानी इस्राइल के मामले में दुनिया के सारे देशों से बहिष्कार की नीति की मांग करते हैं. लेकिन भारत में उसी प्रकार की राजनीति को एक और ऐसा विचार मानते हैं, जिससे मेज़ पर असहमति ज़ाहिर की जानी चाहिए. उनके मुताबिक़ असहमत होते हुए भी मुसलमान विरोधी विचार को मंच दिया जाना चाहिए.

ममदानी अकादमिक व्यक्ति हैं, शोध को महत्त्व देते होंगे. फिर वे नस्लकुशी के अध्येता ग्रेगरी डैंटन की चेतावनी को क्यों नज़रअंदाज़ करना चाहते हैं कि भारत अब नस्लकुशी के काफ़ी क़रीब पहुंच चुका है? इस नस्लकुशी की राजनीति करने वालों के साथ मंच साझा करना किस प्रकार बौद्धिकता के लिए उपयोगी और क्यों आवश्यक है?

साभार- द वायर

सोमवार से आढ़तियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल, किसानों की चिंता बढ़ी!

प्रदेशभर के आढ़तियों ने अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का एलान कर दिया है. इससे पहले प्रदेशभर के आढ़तियों ने 18 सितंबर तक अपनी मांगों पर विचार करने की चेतावनी दी थी लेकिन सरकार की ओर से आढ़तियों की मांगों पर कोई विचार नहीं किया गया है. इसी के चलते अब प्रदेशभर के आढ़तियों ने 19 सितंबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने का फैसला किया है. आढ़ती 19 सितंबर को मंडी स्तर पर और 20 सितंबर को विधायकों के आवास पर विरोध प्रदर्शन करेंगे. वहीं 21 सितंबर को करनाल में राज्य स्तरीय विरोध मार्च निकाला जाएगा, जिसमें आढ़ती मुख्यमंत्री कार्यालय का घेराव करेंगे.

आढ़तियों के हड़ताल पर जाने के फैसले ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. मंडियों में धान की फसल की आवक शुरू हो चुकी है. आने वाले एक हफ्ते के भीतर धान की आवक और बढ़ जाएगी. ऐसे में मंडियों में आढ़तियों की हड़ताल जारी रही तो किसान अपनी फसल को कैसे बेचेगा.

आढ़तियों की मुख्य मांगें

फसलों की खरीद व भुगतान पर पूरी आढ़त मिलनी चाहिए. आढ़त 2.5% होनी चाहिए जबकि सरकार इसे कम कर रही है. भुगतान सीधा खाते में नहीं होना चाहिए. सीमांत किसानों की फसलें पोर्टल पर रजिस्टर्ड होने के बाद भी सरकार उन्हें खरीद नहीं रही है. मार्किट फीस व एचआरडीएफ फीस को घटाया जाए. सरकार की ओर से मंडियों में ऑनलाइन प्रणाली तीन साल पहले ही शुरू कर दी गई है. इसके तहत गेट पास कटने के बाद ही किसान की फसल को मंडी में बेचा जा सकता है. इस प्रक्रिया में फसल खरीदने वाले आढ़ती व बेचने वाले किसान का नाम सरकारी खरीद के पोर्टल पर दर्ज होता है, लेकिन अब ई-नेम प्रणाली में फसल की ढेरी की फोटो ऑनलाइन डालने से देश का कोई भी व्यापारी किसान की फसल को खरीद सकेगा. आढ़ती इसी बात का विरोध कर रहे हैं. आढ़ती एसोसेएशन का कहना है कि ऐसे में स्थानीय स्तर पर आढ़ती को नुकसान होगा. दूसरा ऑनलाइन खरीद के तहत उठान व भुगतान में भी समस्या आएगी.