हरियाणा के शम्भू और बसताड़ा टोल प्लाजा पर देने होंगे ज्यादा पैसे

राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर बसताड़ा और शंभू टोल प्लाजा से गुजरने वाले यात्रियों को 1 सितंबर से अधिक पैसे देने होंगे क्योंकि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) ने टोल फीस में बढ़ोतरी कर दी है.

इन टोल प्लाजों पर गाड़ियों की कटैगरी के हिसाब से 10 से लेकर 140 रुपये तक की बढ़ोतरी की गई है.

इसके अलावा, 10-किलोमीटर और 20-किलोमीटर के दायरे में रहने वाले यात्रियों को छोड़कर, वाहनों के महीने के पास के शुल्क में भी बढ़ोतरी की गई है.

बसताड़ा में कारों, जीपों और वैन की एकल यात्रा के लिए टोल शुल्क में 20 रुपये, हल्के वाणिज्यिक वाहनों, ट्रक / बस और टू-एक्सल वाहनों के लिए टोल में क्रमशः 30 रुपये, 55 रुपये और 90 रुपये की वृद्धि होगी. शम्भू टोल प्लाजा पर कारों, जीप, वैन श्रेणी, एलसीवी, ट्रक/बस श्रेणी और दो एक्सल श्रेणी की एकल यात्रा शुल्क में क्रमशः 10 रुपये, 15 रुपये, 35 रुपये, 50 रुपये की बढ़ोतरी की गई है.

बसताड़ा टोल पानीपत-जालंधर छह लेन खंड पर एनएच -44 (96 किमी से 387 किमी) पर तीन प्लाजा में से एक है, जिसकी टोल फीस 1 सितंबर से संशोधित की गई है. बसताड़ा टोल प्लाजा के अलावा, एनएचएआई ने शम्भू टोल प्लाजा और लाडोवाल में टोल प्लाजा की टोल फीस में बढ़ोतरी की है. बसताड़ा टोल प्लाजा के प्रबंधक शिव कुमार चौधरी ने कहा, हम 1 सितंबर से बस्तर में अपने टोल प्लाजा पर संशोधित शुल्क लागू करेंगे.

गौरतलब है कि ये टोल प्लाजे किसान आंदोलन के दौरान किसानों ने बंद रखे थे और इन टोल प्लाजों से यही कहकर धरना उठाया था कि आंदोलन खत्म होने के बाद इनकी फीस न बढ़ाई जाए.

ग्रामीण इलाकों में सर्पदंश पीड़ितों में से महज 30 प्रतिशत ही अस्पताल पहुंच पाते हैं: ICMR

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने सांप के काटने की घटना, मृत्यु दर, मौतों की संख्या और देश पर इसका सामाजिक आर्थिक बोझ को लेकर एक अध्ययन जारी किया है. अध्ययन के मुताबिक सांप के काटने से भारत में हर साल 46,000 से अधिक लोगों की जान चली जाती है। जबकि केवल 30 प्रतिशत पीड़ित ही चिकित्सा उपचार के लिए अस्पतालों में पहुंचते हैं.

भारत के रजिस्ट्रार जनरल- मिलियन डेथ स्टडी (आरजीआई-एमडीएस) के अनुसार, भारत में जहरीले सर्पदंश से होने वाली मौतों की संख्या प्रति वर्ष 46,900 है. यह अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जहरीले सर्पदंश के कारण हर साल होने वाली मात्र 10 से 12 मौतों की तुलना में काफी ज्यादा है. जबकि कम आबादी वाले ऑस्ट्रेलिया में शायद सांपों की अधिक जहरीली प्रजातियां रहती हैं.

अध्ययन से पता चलता है कि ग्रामीण भारत में सर्पदंश पीड़ितों में से केवल 20 से 30 प्रतिशत ही अस्पतालों में इलाज कराते हैं. अध्ययन में कहा गया है कि सर्पदंश की घटनाओं के कम दर्ज होने और मृत्यु दर और सामाजिक-आर्थिक बोझ पर आंकड़ों की कमी से स्थिति के वास्तविक प्रभाव को समझना मुश्किल हो जाता है.

भारत में अपनी तरह का यह पहला अध्ययन, भारत के पांच क्षेत्रों और 840 लाख की आबादी के हिमाचल प्रदेश सहित 13 राज्यों में सर्पदंश की घटनाओं पर केंद्रित है. जिनमें राजस्थान, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और त्रिपुरा इसमें शामिल हैं.

यह अध्ययन अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिका प्लॉस वन में प्रकाशित किया गया है. आईसीएमआर के इस अध्ययन में  प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी एंड पॉपुलेशन हेल्थ साइंसेज, अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च सेंटर के प्रमुख शोधकर्ता डॉ जयदीप सी मेनन, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, हिमाचल प्रदेश सरकार के राज्य महामारी विशेषज्ञ डॉ ओमेश भारती शामिल हैं.

डॉ भारती ने कहा यह अध्ययन देश में पहली बार सर्पदंश के मामलों, मृत्यु दर, मौतों की संख्या और सर्पदंश के सामाजिक आर्थिक बोझ पर वास्तविक आंकड़े जारी करेगा, जिससे नीति निर्माताओं को भारत में सर्पदंश को रोकने और नियंत्रित करने में मदद मिलेगी। देश अभी भी वास्तविक सर्पदंश के बोझ को नहीं जानता है, इसलिए जब नीति बनाने की बात आती है तो आंकड़ों का अभाव होता है.

शोधकर्ताओं ने बताया कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया में सर्पदंश के मामलों का सर्वेक्षण करने के लिए तैयार किया गया पहला ऐसा अध्ययन है. हालांकि श्रीलंका ने यह किया है, लेकिन उन्होंने केवल 1 प्रतिशत की आबादी को कवर किया, जबकि हमारा अध्ययन 6.12 प्रतिशत की आबादी को कवर करेगा.

वर्तमान में देश के छह भौगोलिक क्षेत्रों के 31 जिलों में सर्पदंश मामले का अध्ययन किया जा रहा है, जिसमें 13 राज्यों में पश्चिम, मध्य, दक्षिण, पूर्व, उत्तर और उत्तर-पूर्व शामिल हैं. हिमाचल प्रदेश के तीन जिले- कांगड़ा, चंबा और ऊना भी इसमें शामिल हैं.

सर्पदंश की घटनाओं को जानने के लिए ‘अध्ययन प्रोटोकॉल’ पर लेख के अनुसार, यह संभवतः नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिजीज (एनटीडी) या उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों  को सबसे अधिक नजरअंदाज किया जाता रहा है.

दुनिया भर में हर साल जहरीले सर्पदंश से होने वाली लगभग एक लाख मौतों में से आधी भारत में होती हैं. भारत में उपलब्ध सर्पदंश पर एकमात्र आंकड़े आरजीआई-एमडीएस अध्ययन (भारत के रजिस्ट्रार जनरल- 1 मिलियन डेथ स्टडी) और बिहार राज्य से मृत्यु दर पर एक अन्य अध्ययन से मृत्यु दर के आंकड़ों पर है. जबकि पश्चिम बंगाल में सर्पदंश की घटनाओं के केवल दो जिलों के आंकड़े उपलब्ध हैं.

सर्पदंश की घटनाओं और बोझ के लिए आईसीएमआर के अध्ययन प्रोटोकॉल में कहा गया है कि सर्पदंश के प्रवेश और एएसवी (एंटी-स्नेक वेनम) के उपयोग पर अस्पताल आधारित आंकड़ों को कम करके आंका गया है. क्योंकि ग्रामीण भारत में अधिकांश पीड़ित वैकल्पिक उपचार विधियों पर अधिक निर्भर हैं, जिनको राष्ट्रीय रजिस्ट्रियों में दर्ज नहीं किया जाता है.

साभार-डाउन-टू-अर्थ

यूनिवर्सिटियों में मोदी सरकार की योजनाएं, योग, वैदिक गणित, नैतिक शिक्षा जैसे विषय पढ़ाए जाएंगे!

उत्तर भारत की कई यूनिवर्सिटियों में छात्रों के बीच आलोचनात्मक सोच विकसित करने के लिए अपने पाठ्यक्रम में 24 वैल्यू एडेड कोर्स शुरू करने की योजनाएं बन रही हैं. इन कोर्सों में भावनात्मक बुद्धिमत्ता, खुश रहने की कला और भारतीय वैदिक साहित्य जैसे विषय शामिल हैं. यूनिवर्सिटियों में शुरू किए जा रहे ये कोर्सेज अंडरग्रेजुएट करिकुलम फ्रेमवर्क -2022 (यूजीसीएफ) का हिस्सा हैं, जिन्हें 2022-23 में शुरू हो रहे नए बैच में पढ़ाया जाएगा.

इन नए विषयों का उद्देश्य छात्रों में आलोचनात्मक सोच विकसित करना है, जिसके तहत  स्वच्छ भारत, फिट इंडिया, डिजिटल इंडिया, डिजिलॉकर, ई-अस्पताल, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत ई-पाठशाला, भीम और कौशल शिक्षा जैसे 24 विषय इस बार दिल्ली यूनिवर्सिटी के ग्रेजुएशन के छात्रों को पढाए जाने हैं, जिन्हें विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद ने मंजूरी भी दे दी है.

ये विषय राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत दिल्ली यूनिवर्सिटी में इस चार वर्षीय ग्रेजुएट प्रोग्राम (एफवाईयूपी) का हिस्सा होंगे. राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत शुरू किए गए इन विषयों को ‘रोजगार बढ़ाने’ के रूप में प्रचारित किया गया जा रहा है. इन विषयों में से छात्र प्रत्येक सेमेस्टर में अपनी पसंद का कम से कम एक विषय चुनना पड़ेगा और हर कोर्स में दो क्रेडिट्स होंगे और ऐसे 24 विषयों में से जितने चाहें उतने चुन सकते हैं.

ये 24 वैल्यू एडेड कोर्स प्रोफेसर निरंजन कुमार की अध्यक्षता वाली वैल्यू एडिशन कोर्स कमेटी द्वारा तैयार किए गए हैं. इनमें से कुछ कोर्स इमोशनल इंटेलिजेंस, आर्ट ऑफ बीइंग हैप्पी, फाइनेंशियल लिटरेरी एंड एथिक्स, वैदिक मैथमेटिक्स और वैल्यू ऑफ इंडियन ट्रेडिशन सिस्टम भी हैं. प्रोफेसर कुमार ने मीडियो को दिए अपने ब्यान में कहा, “यह पहली बार है जब डीयू जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय ने इस तरह के पाठ्यक्रम शुरू किए हैं.. वे सामाजिक-निर्माण के मामले में गेम-चेंजर के रूप में कार्य करेंगे.”

जैसा कि नई शिक्षा नीति के ढांचे में उल्लेख किया गया है, इन पाठ्यक्रमों के माध्यम से प्राप्त क्रेडिट को छात्र के अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट में जोड़ा जाएगा.

ये विषय सिर्फ दिल्ली यूनिवर्सिटी में ही लागू नहीं किए जा रहे बल्कि उत्तर भारत की कई यूनिवर्सिटियों में इन्हें लागू किया जा रहा है. चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी में भी इन्हें लागू करने के लिए कमेटी बना दी गई है. नाम न छापने की शर्त पर पंजाब यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने बताया, “यूनिवर्सिटी ने इन विषयों को लागू करवाने के लिए एक कमेटी बनाई है. अभी सारे विषय तय नहीं किए गए हैं, लेकिन योगा, वैदिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा जैसे विषयों पर ही विचार चल रहा है.”

हालांकि दबे स्वर में वैल्यू एडेड कोर्स में विषयों के चुनाव की आलोचना भी यूनिवर्सिटियों के कई प्रोफेसर कर रहे हैं. उनका कहना है कि ये पाठ्यक्रम छात्रों को रोजगार पाने के दृष्टिकोण से शिक्षित करने के लिए नहीं बनाए गए हैं, इनका कोई और ही मकसद है. डीयू की एकेडमिक काउंसिल के सदस्य एसोसिएट प्रोफेसर मिथुनराज धूसिया ने कोर्स के विषय तय करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए बताया, “ये पाठ्यक्रम कैसे तय किए गए? शुरुआत में अलग-अलग विभागों ने वीएसी के लिए केंद्र द्वारा नियुक्त समिति को अपनी जरूरत के हिसाब से सुझाव दिए थे. इन विषयों के चुनाव को अलग-अलग विभागों की स्वायत्तता पर छोड़ देना चाहिए था.”

इन वैल्यू एडेड कोर्स के जरिए कौनसे सब्जेक्ट पढ़ेंगे छात्र

इन वैल्यू एडेड कोर्स में एक विषय फिट इंडिया है जिसमें मोदी सरकार की पहल, शारीरिक गतिविधि, स्वास्थ्य और फिटनेस और फिटनेस के संकेतकों का अध्ययन शामिल है. इस विषय पर एक आवश्यक पठन सूची में सरकार की ‘फिट इंडिया’ वेबसाइट शामिल है. ‘वैदिक गणित’ पर पाठ्यक्रम के तहत छात्रों को ‘वैदिक गणित’ का उपयोग करके जोड़, घटा और भाग सिखाया जाएगा. पेपर के व्यावहारिक घटक में छात्रों के दिमाग से गणित के डर को दूर करने में मदद करने के लिए ‘वैदिक गणित’ पर कार्यशालाएं आयोजित की जाएंगी. ‘स्वच्छ भारत’ के तहत, छात्र “स्वच्छ भारत अभियान का महत्व” सीखेंगे. छात्र घरों (2014 बनाम 2022) और खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) गांवों में स्वच्छता कवरेज का भी अध्ययन करेंगे. आवश्यक पठन सूची में योजना पर सरकारी साहित्य पढ़ना शामिल है.

सेब किसानों के आंदोलन के बीच अडानी ने फिर घटाए सेब के दाम!

एक ओर सेब किसान और बागवान सेब की कम कीमत मिलने के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं. वहीं इस बीच अडानी की कंपनी एग्रोफ्रेस ने एक बार फिर सेब के दाम घटा दिए हैं. इस बार सेब के दाम में 2 रुपए प्रतिकिलो की कमी की गई है. पिछले एक माह से सेब बागवान विभिन्न मुद्दों को लेकर आंदोलनरत हैं. पहले बागवानों ने जीएसटी की दरों और पैकेजिंग मेटेरियल में बढ़ोतरी को लेकर सरकार के खिलाफ सचिवालय का घेराव किया था. इसके बाद बागवानों ने जेल भरो आंदोलन किया और उनपर एफआईआर तक भी हुई. इन सबके बीच में सरकार ने बागवानों के आंदोलन को देखते हुए सेब के दामों को तय करने के लिए एक हाई पावर कमेटी का गठन किया, लेकिन प्रदेश में सेब बागवानी से जुड़ी बड़ी कंपनी अडानी ने हाईपावर कमेटी के गठन वाले दिन ही सेब खरीद के दाम जारी कर दिए थे.

हिमाचल प्रदेश के किसान अलग-अलग मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. कंपनी की ओर से जारी ताजा दामों में ईईएस (एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा स्माल) श्रेणी के सेब का खरीद मूल्य 60 रुपये से घटाकर 58 रुपये प्रतिकिलो हो गया है. वहीं मंडियों में सेब के दाम 200 से 300 रुपये प्रति पेटी कम हुए हैं. कंपनियों की ओर से सेब के दाम मे गिरावट का कारण खराब मौसम बताया जा रहा है. सेब कीमतों में बढ़ोतरी की मांग के लिए आंदोलनरत संयुक्त किसान मंच ने दाम घटाने के फैसले पर नाराजगी जताई है.

पिछले हफ्ते शिमला फल मंडी में सेब का प्रति पेटी औसत रेट 1400 से 2000 रुपए था. इस हफ्ते के आखिर में दाम घटकर 1100 से 1800 रुपये पहुंच गए हैं. सेब की एक पेटी में 25 किलो सेब आता है. दूसरी ओर अदाणी कंपनी इससे पहले ईएल (एक्सट्रा लार्ज) और पित्तू (ग्रेड से छोटा आकार) के सेब का दाम भी दो रुपए प्रतिकिलो कम कर चुकी है. अदाणी कंपनी ने इस महीने 15 अगस्त से अपने तीन कंट्रोल्ड एटमोसफेयर स्टोरों पर सेब खरीद शुरू की थी. जिसके खिलाफ किसान आंदोलन कर रहे हैं.

शुरुआत में कंपनी ने एक्स्ट्रा लार्ज सेब के 52 रुपये, लार्ज मीडियम स्माल के 76, एक्स्ट्रा स्माल के 68, एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा स्माल के 60 और पित्तू सेब के 52 रुपये प्रतिकिलो खरीद दाम तय किए थे. एक हफ्ते बाद कंपनी ने एक्स्ट्रा लार्ज और पित्तू आकार के सेब के रेट 52 से घटाकर 50 कर दिए. अब एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा स्माल श्रेणी के सेब के दामों में भी दो रुपये की कटौती कर दी है. सेब के दामों मे कटौती से आदोलन कर रहे किसान बहुत रोष में है.

NCRB रिपोर्ट: आत्महत्या करने वालों में हर चौथा व्यक्ति दिहाड़ी-मजदूर!

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2014 के बाद से देश में आत्महत्या से मरने वालों में दिहाड़ी मजदूरों की संख्या पहली सबसे ज्यादा दर्ज की गई है. 2021 के दौरान दर्ज 1,64,033 आत्महत्या करने वाले पीड़ित हर रोज मजदूरी करके जीवनयापन करने वाले थे.  

रिपोर्ट में सामने आया है कि 2021 में आत्महत्या करने वाले समूह में दैनिक मजदूरी करके गुजारा करने वाला सबसे बड़ा व्यवसाय समूह रहा. रिपोर्ट के अनुसार कुल आत्महत्या करने वाले पीड़ितों में से 42,004 मजदूर थे जो कि कुल आंकड़े का करीबन 25.6 फीसदी रहा. वहीं 2020 में दर्ज की गई कुल 1,53,052 आत्महत्याओं में से 37,666 यानी 24.6 प्रतिशत आत्महताएं दैनिक वेतनभोगी मजदूरों ने की हैं, साथ ही 2019 में कोरोनाकाल से पहले 1,39,123 दैनिक वेतन भोगी मजदूरों ने आत्महत्या की जो कि कुल आत्महताओं का 23.4 प्रतिशत था.

राष्ट्रीय स्तर पर देखे तो साल 2020 से 2021 तक  आत्महत्याओं की संख्या में 7.17 प्रतिशत की वृद्धि हुई है वहीं इस अवधि के दौरान दैनिक वेतन भोगी समूह में आत्महत्याओं की संख्या में 11.52 प्रतिशत की वृद्धि हुई. रिपोर्ट में खेतिहर मजदूरों की संख्या को अलग से रखा गया है, जिन्हें “कृषि क्षेत्र में लगे लोगों” की श्रेणी के तहत एक उप-श्रेणी में बांटा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 में कृषि क्षेत्र में लगे लोगों के समूह में 10,881 आत्महत्याएं दर्ज की गईं, जिनमें 5,318 किसान और 5,563 कृषि मजदूर शामिल हैं.

रिपोर्ट से पता चला है कि कुल दर्ज आत्महत्याओं में “कृषि क्षेत्र में लगे लोगों” की हिस्सेदारी 2021 के दौरान 6.6 प्रतिशत थी. देश में कुल आत्महत्याओं में खुद का रोजगार करने वालों में भी वृद्धि हुई है यह 2020 में 11.3 प्रतिशत से बढ़कर 2021 में 12.3 प्रतिशत रही. वहीं 2021 के दौरान “हाउस वाइफ” श्रेणी में कुल आत्महत्याओं का 14.1 प्रतिशत हिस्सा रहा. घर का काम करने वाली महिलाओं द्वारा आत्महत्या करने के मामले में भी बढ़ोतरी हुई है. उनकी संख्या 2020 में 22,374 से 3.6 प्रतिशत बढ़कर 2021 में 23,179 हो गई.

वहीं रिपोर्ट के अनुसार 2021 में 13,089 छात्रों ने आत्महत्या की थी जबकि 2020 में आत्महत्या करने वाले छात्रों की संख्या 12,526 थी. रिपोर्ट के अनुसार, पारिवारिक समस्याएं विवाह संबंधी समस्याओं के अलावा 33.2 प्रतिशत, विवाह संबंधी समस्याओं के कारण 4.8 प्रतिशत और किसी बीमारी के चलते 18.6 प्रतिशत लोगों ने आत्महत्याओं की है.

पत्रकार सिद्दीकी कप्पन की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का योगी सरकार को नोटिस!

पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को अक्टूबर 2020 में उत्तर प्रदेश के हाथरस जाते समय गिरफ्तार किया गया था, जहां कथित तौर पर सामूहिक बलात्कार के बाद एक दलित युवती की मौत हो गई थी, पत्रकार कप्पन को हाथरस जाते वक्त मथुरा से गिरफ्तार किया गया था. जिसके बाद उनपर यूएपीए लगाकर जेल भेज दिया गया था. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस महीने की शुरुआत में उनकी जमानत याचिका को खारिज कर दिया था.

वहीं अब चीफ जस्टिस यू यू ललित और जस्टिस एस रवींद्र भट की पीठ ने मामले के निपटारे के लिए 9 सितंबर की तारीख दी है और उत्तर प्रदेश सरकार को 5 सितंबर तक जवाब दाखिल करने के लिए कहा है.

कप्पन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, “पत्रकार कप्पन 6 अक्टूबर 2020 से जेल में बंद हैं. उनपर आरोप है कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने आतंकवादी गतिविधियों के लिए उनके खाते में 45 हजार रुपए डाले है. इसका कोई सबूत नहीं है,यह केवल आरोप है.”

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि कप्पन का संगठन से कोई लेना-देना नहीं है और वह अपने पेशेवर काम के लिए हाथरस गए थे. वहीं सिब्बल ने कप्पन की ओर से कहा, “मेरा इस तरह के संगठन से कोई लेना-देना नहीं है. मैं रिपोर्टिंग के लिए हाथरस गया था.”

पीठ ने सिब्बल से कप्पन के साथ कार में सवार अन्य यात्रियों के बारे में पूछा. सिब्बल ने कहा कि उनमें से एक को पहले ही जमानत मिल चुकी है. उन्होंने कहा, और पीएफआई एक आतंकवादी संगठन नहीं है. यह प्रतिबंधित संगठन भी नहीं है. उन्होंने कहा कि कई और पत्रकार भी हाथरस जा रहे थे और इसलिए वह भी गए.

वहीं उत्तर पर्देश सरकार की ओर से पेश होते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता गरिमा प्रसाद ने कहा कि मामले में आठ आरोपी हैं और उनमें से एक दिल्ली दंगों और दूसरा बुलंदशहर दंगों में आरोपी था. उन्होंने कहा इस केस में दो गवाहों को भी धमकाया गया और दोनों गवाह एक हलफनामा दाखिल करेंगे.

कप्पन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखित याचिका में कहा गया है कि उच्च न्यायालय के फैसले ने जमानत देने के संबंध में सिद्धांतों की पूरी तरह से अनदेखी की है, और बिना किसी ठोस कारण के, जमानत याचिका को खारिज कर दिया है. जबकि कप्पन ने दावा किया कि वह बलात्कार-हत्या की घटना पर रिपोर्ट करने के लिए हाथरस जा रहा था, यूपी पुलिस ने तर्क दिया कि उन्हें एक आतंकवादी गिरोह द्वारा समाज में अशांति फैलाने के लिए वहां जाने के लिए पैसा दिया गया था.

जींद: अधिकारियों ने खड़ी फसल में चलवाया ट्रैक्टर, सदमे में आकर किसानों ने खाया जहर,एक की मौत!

जींद में नरवाला के बडनपुर गांव के दो किसानों ने अधिकारियों के रवैये से तंग आकर जहर खा लिया जिसके चलते किसान इंद्र सिंह की मौत हो गई. किसानों और परिजनों ने मृतक किसान का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया है. किसान मृतक किसान के शव के साथ नरवाना के बद्दोवाल टोल प्लाजा पर बैठ गए हैं. किसानों ने अधिकारियों को बर्खास्त करने की मांग की है.

दरअसल रविवार को नरवाना के बडनपुर गांव में अधिकारियों ने दो किसानों के खेत में खड़ी फसल को ट्रैक्टर चलवाकर नष्ट कर दिया था. मृतक किसान के परिजनों ने आरोप लगाया कि हमारे पास कोर्ट के सारे कागजात हैं हमने अधिकारियों को सारे कागजात दिखाए लेकिन वो नहीं माने और खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलवा दिया.

वहीं भारतीय किसान किसान यूनियन (चढ़ूनी) के प्रवक्ता ने बताया कि देह शामलात और जुमला मालकान जमीन से जुड़े मामले में किसान की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने आया बीडीओ और अन्य पंचायत अधिकारियों ने तैयार फसल पर ट्रैक्टर चलवा दिया जिसके दो किसानों ने सल्फ़ास दवाई खा ली जिसमें किसान इंद्र सिंह की मौत हो गई.

करनाल में 31 अगस्त को मनाया जाएगा विमुक्ति दिवस!

करनाल के मंगल सेन सभागार में अखिल भारतीय विमुक्त घुमंतू जनजाति वैलफेयर संघ, हरियाणा द्वारा एक प्रेसवार्ता आयोजित की गई. प्रेसवार्ता में संघ की ओर से 31 अगस्त को विमुक्ति दिवस मनाये जाने सम्बंधी जानकारी दी गई. संघ के अध्यक्ष मास्टर जिले सिंह ने बताया कि यह कार्यक्रम हमारे लिए एक त्योहार की तरह है और इस बार समस्त विमुक्त घुमंतू समाज की ओर से 71वां विमुक्ति दिवस 31 अगस्त को करनाल के मंगल सेन सभागार में धूमधाम से मनाया जाएगा.

अध्यक्ष ने बताया 31 अगस्त को विमुक्ति दिवस के मौके पर मुख्य अथिति के तौर पर करनाल से सांसद संजय भाटिया और अति वशिष्ट अतिथि के तौर पर कुरुक्षेत्र से सांसद नायब सैनी और राज्यसभा सांसद कृष्ण पंवार शिरकत करेंगे. वहीं साथ ही शाहबाद से विधायक रामकरण, घरौंडा से विधायक हरविंद्र सिंह कल्याण, विधायक लक्षमण नापा, रतिया, इंद्री से विधायक रामकुमार कश्यप, नीलोखेड़ी से विधायक धर्मपाल गोंदर, करनाल से मेयर रेणु बाला गुप्ता और डीएनटी बॉर्ड के चैयरमेन डॉ बलवान सिंह वशिष्ट अतिथि के तौर पर कार्यक्रम में शामिल होंगे.

वहीं अखिल भारतीय विमुक्त घुमंतू जनजाति वैलफेयर संघ के राष्ट्रीय महासचिव बालक राम ने इन विमुक्त घुमंतू जनजातियों का इतिहास बताते हुए कहा, गोरिल्ला युद्ध में निपुणता के चलते अंग्रेजों के खिलाफ अभियान छेड़ने वाली इन जनजातियों पर दबिश डालने के लिए 1871 में अंग्रेजी हुकूमत ने जैराइम पेशा काला कानून (क्रीमिनल ट्राइब एक्ट) लगा दिया. इन जनजातियों पर काला कानून लगाकर, समाज में इनके प्रति नफरत फैलाने के मकसद से अंग्रेजों ने इनकों जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया. कानून के तहत इन लोगों को गाँव व शहर से बाहर जाने के लिए स्थानीय मजिस्ट्रेट के यहां अपना नाम दर्ज करवाना अनिवार्य कर दिया गया था ताकि पता रहे कि ये लोग कहां, क्यों और कितने दिनों के लिए जा रहे हैं. सबसे पहले इस कानून को उत्तर भारत में लागू किया गया.

उसके बाद 1876 में क्रीमिनल ट्राइब एक्ट को बंगाल प्रांत पर भी लागू किया गया और 1924 तक आते-आते इस कानून को पूरे भारत में रहने वाली सभी करीबन 193 जनजातियों पर थोप दिया गया. 15 अगस्त 1947 को देश तो आजाद हो गया लेकिन ये लोग आजादी के पांच साल बाद तक भी गुलामी का दंश झेलते रहे और गांव के नंबरदार और पुलिस थाने में हाजिरी लगाने के लिए मजबूर रहे. आखिरकार 1948 में बैठाई गई क्रीमिनल ट्राइब एक्ट इन्क्वारी कमेटी ने 1949-50 में सरकार को रिपोर्ट सौंपी जिसमें देश की ऐसी 193 जातियों को है 31 अगस्त सन 1952 को संसद में बिल पास होने के बाद इस दंश से मुक्त किया गया. उस दिन से इन जनजातियों को विमुक्त जाति अर्थात डिनोटिफाइड ट्राइब्स के नाम से जाना जाता है. 1871 में क्रिमिनल ट्राइब एक्ट लगने से लेकर 31 अगस्त 1952 तक यानी करीबन 82 साल तक आजाद भारत में भी ये लोग गुलामी का दंश झेलते रहे. पूरे देश में विमुक्त घुमंतू जनजाति की आबादी करीबन 20 से 25 करोड़ है इनमें से अधिकतर लोग आज भी खुले आसमान, पुलों के नीचे, सीवरेज के पाइपों, तिरपालों में अपना जीवन व्यतीत करने को मजबूर हैं.

विमुक्त एवं घूमन्तु कर्मचारी वैलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष रोशन लाल माहला ने विमुक्त घुमंतू जनजाति के लोगों से विनम्र अपील की है कि अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए 31 अगस्त को अधिक से अधिक संख्यां में मुक्ति दिवस के महोत्सव में शामिल होकर अपने अधिकारों की लड़ाई में हिस्सा लें.

एयर क्वालिटी ट्रैकर: अंबाला-नंदेसरी सहित देश के पांच शहरों में खराब रही हवा, जानिए अन्य शहरों का हाल

यदि दिल्ली-एनसीआर की बात करें तो यहां की वायु गुणवत्ता ‘मध्यम’ श्रेणी में है। दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स 113 दर्ज किया गया है। पिछले दिनों बारिश होने के कारण यहां की हवा की गुणवत्ता में सुधार हो गया था। दिल्ली के अलावा फरीदाबाद में एयर क्वालिटी इंडेक्स 131, गाजियाबाद में 112, गुरुग्राम में 103, नोएडा में 111 पर पहुंच गया है। 

देश के अन्य प्रमुख शहरों से जुड़े आंकड़ों को देखें तो मुंबई में वायु गुणवत्ता सूचकांक 63 दर्ज किया गया, जो प्रदूषण के ‘संतोषजनक’ स्तर को दर्शाता है। जबकि कोलकाता में यह इंडेक्स 57, चेन्नई में 61, बैंगलोर में 46, हैदराबाद में 60, जयपुर में 105 और पटना में 86 दर्ज किया गया।  

देश के इन शहरों की हवा रही सबसे साफ

देश के जिन 38 शहरों में वायु गुणवत्ता सूचकांक 50 या उससे नीचे यानी ‘बेहतर’ रहा, उनमें आगरा 46, आइजोल 24, अमरावती 38, बागलकोट 43, बेंगलुरु 46, बेतिया 42, ब्रजराजनगर 49, चामराजनगर 37, चिकबलपुर 41, चिक्कामगलुरु 31, कोयंबटूर 32, दमोह 30, दावनगेरे 26, एर्नाकुलम 49, गडग 40, गांधीनगर 46, गंगटोक 20, गुवाहाटी 43, हसन 25, झांसी 48, कानपुर 46, मदिकेरी 22, मैहर 29, मंडीखेड़ा 34, मैसूर 45, नारनौल 48, पंचकुला 36, पानीपत 46, पुदुचेरी 40, राजमहेंद्रवरम 35, सासाराम 49, शिलांग 22, शिवमोगा 42, श्रीनगर 38, तिरुवनंतपुरम 36, थूथुकुडी 38, तिरुपति 41 और वाराणसी 36 आदि शामिल रहे।

वहीं अगरतला, अहमदाबाद, अलवर, अमृतसर, अंकलेश्वर, अररिया, आरा, आसनसोल, औरंगाबाद (बिहार), औरंगाबाद (महाराष्ट्र), बागपत, बल्लभगढ़, बरेली, बठिंडा, बेगूसराय, बेलगाम, भागलपुर, भिवानी, भोपाल, बिहारशरीफ, बिलासपुर, चंडीगढ़, चंद्रपुर, चरखी दादरी, चेन्नई, देवास, एलूर, फतेहाबाद, फिरोजाबाद, गया, गोरखपुर, हाजीपुर, हल्दिया, हापुड़, हावेरी, हिसार, हावड़ा, हुबली, हैदराबाद, इंफाल, इंदौर, जबलपुर, जालंधर, जींद, कैथल, कल्याण, कन्नूर, करनाल, कटनी, खन्ना, किशनगंज, कोलकाता, कोल्लम, कोप्पल, कोटा, कोझिकोड, कुरुक्षेत्र, लखनऊ, लुधियाना, मंडीदीप, मानेसर, मैंगलोर, मुरादाबाद, मोतिहारी, मुंबई, मुजफ्फरनगर, मुजफ्फरपुर, नागपुर, नवी मुंबई, पाली, पलवल, पटियाला, पटना, पीथमपुर, प्रयागराज, रायचुर, राजगीर, रतलाम, रूपनगर, सागर, सतना, सिलीगुड़ी, सिंगरौली, सिरसा, सोलापुर, सोनीपत, तालचेर, ठाणे, उज्जैन, वातवा, विशाखापत्तनम और वृंदावन आदि 92 शहरों में हवा की गुणवत्ता संतोषजनक रही, जहां सूचकांक 51 से 100 के बीच दर्ज किया गया। 

क्या दर्शाता है यह वायु गुणवत्ता सूचकांक, इसे कैसे जा सकता है समझा?

देश में वायु प्रदूषण के स्तर और वायु गुणवत्ता की स्थिति को आप इस सूचकांक से समझ सकते हैं जिसके अनुसार यदि हवा साफ है तो उसे इंडेक्स में 0 से 50 के बीच दर्शाया जाता है। इसके बाद वायु गुणवत्ता के संतोषजनक होने की स्थिति तब होती है जब सूचकांक 51 से 100 के बीच होती है। इसी तरह 101-200 का मतलब है कि वायु प्रदूषण का स्तर माध्यम श्रेणी का है, जबकि 201 से 300 की बीच की स्थिति वायु गुणवत्ता की खराब स्थिति को दर्शाती है।

वहीं यदि सूचकांक 301 से 400 के बीच दर्ज किया जाता है जैसा दिल्ली में अक्सर होता है तो वायु गुणवत्ता को बेहद खराब की श्रेणी में रखा जाता है। यह वो स्थिति है जब वायु प्रदूषण का यह स्तर स्वास्थ्य को गंभीर और लम्बे समय के लिए नुकसान पहुंचा सकता है।

इसके बाद 401 से 500 की केटेगरी आती है जिसमें वायु गुणवत्ता की स्थिति गंभीर बन जाती है। ऐसी स्थिति होने पर वायु गुणवत्ता इतनी खराब हो जाती है कि वो स्वस्थ इंसान को भी नुकसान पहुंचा सकती है, जबकि पहले से ही बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए तो यह जानलेवा हो सकती है।

साभार: डाउन टू अर्थ

सरकार ने गेंहू के बाद अब गेहूं के आटे के निर्यात पर भी लगाई रोक!

सरकार ने गेहूं के आटे के दाम में तेजी पर लगाम लगाने के लिए इसके निर्यात पर रोक लगाने का फैसला लिया. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया है. आधिकारिक बयान के तहत मंत्रिमंडल के इस निर्णय से अब गेहूं के आटे के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति होगी. इसके पीछे सरकार का मानना है कि आटे की बढ़ती कीमतों पर रोक लगेगी और समाज के सबसे कमजोर तबके के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी.

रूस और यूक्रेन गेहूं के प्रमुख निर्यातक हैं. दोनों देशों की वैश्विक गेहूं व्यापार में लगभग एक-चौथाई हिस्सेदारी हैं. दोनों देशों के बीच युद्ध से गेहूं की आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई है. जिसके चलते भारतीय गेहूं की मांग बढ़ गई है और इसके कारण घरेलू बाजार में गेहूं के दाम में तेजी देखने को मिली है.

इस से पहले सरकार ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मई में गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी थी. इससे गेहूं के आटे की विदेशी मांग में उछाल आया है. भारत से गेहूं आटे का निर्यात इस साल अप्रैल-जुलाई में सालाना आधार पर 200 फीसदी बढ़ा है.

बयान के अनुसार, इससे पहले गेहूं के आटे के निर्यात पर रोक या कोई प्रतिबंध नहीं लगाने की नीति थी. ऐसे में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और देश में गेहूं आटे की बढ़ती कीमतों पर रोक लगाने के लिए इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया है. सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है. आर्थिक मामलों की समिति ने गेहूं के आटे पर निर्यात प्रतिबंध के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.’

2021-22 में भारत ने 24.6 करोड़ डॉलर के गेहूं के आटे का निर्यात किया. चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून अवधि के दौरान निर्यात लगभग 12.8 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया है. वहीं मई में गेहूं के निर्यात पर पाबंदी लगाने के बाद सरकार ने चीनी के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाया था.