पंजाब के खेत मजदूरों को अपने मुख्यमंत्री से मिलने के लिए करना पड़ा दो दिन प्रदर्शन

पंजाब के संगरूर और मानसा जिले के लगभग 3000 खेत मजदूरों ने 29 मई को संगरूर में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के घर का घेराव किया. मजदूर अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री से मिलने के लिए आए थे. क्रांतिकारी पेंडु(देहाति) मजदूर यूनियन के आह्वान पर मजदूरों ने 29 मई को सुबह ही मुख्यमंत्री के घर के बाहर नारेबाजी शुरू कर दी. जब कोई मिलने नहीं आया तो 12 बजे मुख्यमंत्री के घर के बाहर ही स्टेज लगाकर अपना कार्यक्रम शुरू कर दिया.

स्थाई मोर्चा लगता देख करीब 4 बजे अधिकारी, मजदूरों से मिलने स्टेज पर ही आए. मुख्यमंत्री से मुलाक़ात करवाने का आश्वासन मजदूर नेताओं को दिया. एक सरकारी चिट्ठी भी दी जिसमें लिखा हुआ था कि 13 जून को मजदूर नेताओं की मुख्यमंत्री से मुलाक़ात कारवाई जाएगी. इस आश्वासन पर मजदूरों ने धरना खत्म कर दिया.

मुख्यमंत्री से मिलने के लिए पास की जरूरत होती है. 30 मई को जब मजदूर नेता पास लेने के लिए दोबारा अधिकारियों से मिले. अधिकारी मुख्यमंत्री से मिलवाने वाली बात से मुकर गए. मजदूर नेताओं को लगा कि उनके साथ धोखा हुआ है. उसी समय आस पास के मजदूरों को संगरूर पहुंचने का आह्वान नेताओं की ओर से किया गया. इसके बाद मजदूरों ने शाम को 6 बजे ही फिर से धरना शुरू कर दिया. इस दौरान उनकी वहां मौजूद पुलिस से हाथापाई भी हुई. करीब 6 घंटे चले इस संघर्ष के बाद रात को 12 बजे अधिकारी मजदूरों से फिर मिले. इस बार मुख्यमंत्री से मिलने का पास मजदूर नेताओं को दिया. मजदूर नेताओं की मुख्यमंत्री से मुलाक़ात 7 जून को होगी.

यूनियन के प्रवक्ता प्रगट कला झार ने बताया कि वो 7 जून को मुख्यमंत्री से मिलकर मजदूरों की समस्याओं के बारे में बात करेंगे.

यह हैं मजदूरों की मुख्य मांग

  1. धान की लवाई 6 हजार रुपए प्रति एकड़ की जाए.
  2. मजदूर की दिहाड़ी 700 रुपए की जाए.
  3. गांव के मजदूरों के सामाजिक बहिष्कार के प्रस्ताव पारित करने वाले चौधरियों के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज किया जाए.
  4. धान की सीधी बिजाइ से मजदूरों के खत्म हुए रोजगार की भरपाई की जाए.
  5. पंचायती जमीन के तीसरे हिस्से को दलित मजदूरों को कम रेट पर देना यकीनी (पुख्ता) बनाया जाए. डमी बोली लेने और देने वाले पर कार्यवाही की जाए और रिजर्व कोटे वाली जमीन की बोली दलित चौपाल में लगवाई जाए.
  6. भूमि सुधार कानून लागू करके बची हुई जमीन बेजमीने किसान और खेत मजदूरों को दी जाए.
  7. जरूरतमंद मजदूर परिवारों को 10-10 मरले के प्लाट, घर बनाने के लिए 5 लाख रुपए और कूड़ा डालने की जगह दी जाए.
  8. नजूल ज़मीनों का मालकाना हक मजदूरों को दिया जाए.
  9. बेजमीने मजदूरों पर चढ़े माइक्रोफ़ाइनेंस, सरकारी और गैर सरकारी कंपनियों के कर्जों को माफ किया जाए, मजदूरों को बैंकों से कम ब्याज दर पर और लंबे समय के लिए बिना गारंटी का कर्ज दिया जाए.
  10. डीपो सिस्टम को सुचारु बनाया जाए और जरूरत की सारी चीज़ें सस्ते रेट पर दी जाए.
  11. बेजमीने खेत मजदूरों को सहकारी समितियों का सदस्य बनाया जाए और सब्सिडी के तहत कर्ज दिए जाए.
  12. मोदी सरकार द्वारा किए गए श्रम कानूनों में संशोधन को रद्द करवाने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया जाए.
  13. मनरेगा के तहत पूरे परिवार को पूरे साल काम दिया जाए, दिहाड़ी 600 रुपए की जाए और धांधली करने वाले अधिकारियों पर जरूरी कार्यवाही की जाए.
  14. बेजमीने मजदूरों के लिए पक्के रोजगार का प्रबंध किया जाए और सरकारी संस्थानों का निजीकरण बंद किया जाए.
  15. खेत मजदूरों के बकाया बिजली के बिल माफ किए जाए और बकाया बिल की वजह से उखाड़े गए बिजली के मीटर वापस लगाए जाए.
  16. विधवा, बुढ़ापा और विकलांग पेंशन 5000 रुपए की जाए और बुढ़ापा पेंशन की उम्र महिलाओं की 55 और पुरुषों की 58 साल की जाए.
  17. संघर्षों के दौरान मजदूरों और किसानों पर दर्ज किए गए केस वापस लिए जाए.
    नोट : नजूल जमीन: जो जमीन 1956 में दलितों को दी गई, जिसमें बरानी, सरप्लस, खाली पड़ी जमीन और जिनके मालिक माइग्रेट कर गए थे, उसको नजूल कहा गया.

केंद्र सरकार नहीं कर रही कृषि पर खर्च, राज्य सरकारों पर पड़ रहा बोझ- रिपोर्ट

फाउंडेशन ऑफ अग्रेरियन स्टडीज (एफएएस) के अध्ययन में यह दावा किया गया है कि पिछले एक दशक के दौरान कृषि पर भारत का सार्वजनिक खर्च घट गया है. अध्ययन के अनुसार जहां 2010-11 में कृषि पर भारत का सार्वजनिक खर्च 11% हुआ करता था वहीं यह 2019-20 में घटकर यह मात्र 9.5% ही रह गया है.

भारत में कृषि के विकास के लिए जहां इस खर्च को बढ़ाया जाना चाहिए था वहीं केंद्र सरकार ने इसपर होने वाले खर्चे को कम कर दिया है.

अध्ययन में पाया गया कि भारत के कुल ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) में कृषि का हिस्सा 2010 से 2020 की अवधि में 18.2 प्रतिशत से गिरकर 17.8 प्रतिशत हो गया. इस प्रकार देश की अर्थव्यवस्था में कृषि के महत्व की तुलना में कृषि पर सार्वजनिक खर्च में तेजी से गिरावट आई है.

ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) जिसे हिंदी में सकल मूल्य वर्द्धन कहते हैं, किसी देश की अर्थव्यवस्था में सभी क्षेत्रों, जिसमें प्राथमिक क्षेत्र (कृषि से सम्बंधित), द्वितीय क्षेत्र (विनिर्माण से सम्बंधित) और तृतीयक क्षेत्र (सेवाओं से सम्बंधित) द्वारा किया गया कुल अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन का मौद्रिक मूल्य होता है.

साधारण शब्दों में कहा जाए तो जीवीए से किसी अर्थव्यवस्था में होने वाले कुल निष्पादन और राजस्व का पता चलता है. उदाहरण के लिये अगर कोई कंपनी 20 रुपये में ब्रेड का पैकेट बेचती है और इसे बनाने में 16 रुपये इनपुट और कच्चे माल की लागत आई है तो उस स्थिति में जीवीए का संग्रहण 4 रुपये माना जाएगा.

इस अध्ययन के शोधकर्ताओं ने कहा कि 2011-12 से 2018-19 तक केंद्र और राज्य सरकारों के बजट के विश्लेषण से यह पता चलता है कि कृषि में जीवीए के हिस्से के रूप में कृषि पर सरकारी खर्च में पिछले एक दशक में काफी गिरावट आई है.

अध्ययन में यह भी पाया गया कि जहां कृषि पर कुल खर्च में केंद्र सरकार का हिस्सा कम हुआ है, वहीं राज्य सरकारों द्वारा इस खर्च के हिस्से में वृद्धि हुई है. कहने का मतलब यह है कि केंद्र सरकार ने कृषि पर खर्च करने से खुद के हाथ सीमित कर लिए हैं. जिस कारण राज्य सरकारों को इस खर्च को वहन करना पड़ रहा है.

20 मई को फाउंडेशन ऑफ अग्रेरियन स्टडीज (एफएएस) द्वारा जारी रिपोर्ट, फसल उत्पादन, पशुधन, मत्स्य पालन, वानिकी, सिंचाई और ग्रामीण विकास सहित कृषि क्षेत्र पर सरकार (केंद्र और राज्यों दोनों) के खर्च के आंकड़ों पर आधारित थी.

इस अध्ययन में कृषि से जुड़े खर्च के संबंध में, खर्चों का बड़ा हिस्सा कृषि व्यवस्था और खाद्य भंडारण पर हुआ है, जिसके खर्च में तेज गिरावट देखी गई है.

अध्ययन कहती है कि कृषि में सार्वजनिक खर्च सीधे उत्पादन के समर्थन से, आय समर्थन और ऋण-आधारित सहायता की ओर बढ़ गया है. शोध में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया कि कैसे भारत का कृषि विकास ऐतिहासिक रूप से सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा किए गए निवेश पर निर्भर था, जो कि अब ऋण-आधारित निवेश पर निर्भर होता जा रहा है.

इन निष्कर्षों के अलावा, अध्ययन में यह भी पाया गया कि जैविक खेती (आर्गेनिक फार्मिंग) की ओर ध्यान देने के बावजूद, वास्तव में, पिछले दशक में पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ कृषि के प्रति सार्वजनिक खर्च का हिस्सा कम और स्थिर ही रहा है.

विमुक्त घुमंतू जनजातियों को लेकर राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग ने फिर जारी किया योगी सरकार को नोटिस!

उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा विमुक्त घुमंतू और अर्धघुमंतू जनजातियों को सरकारी योजनाओं से वंचित रखने की शिकायत पर संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उत्तरप्रदेश की योगी सरकार को एक बार फिर नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. इससे पहले अगस्त 2021 में राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग ने विमुक्त घुमंतू और अर्धघुमंतू जनजातियों संबंधी शिकायत पर संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर मामले में कार्रवाई न करने पर कानूनी दंढ भुगतने की चेतावनी जारी की थी. 

इस मामले में उत्तर प्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ता मोहित तंवर ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को यूपी सरकार के खिलाफ शिकायत की है. मोहित तंवर ने अपनी शिकायत में सरकार द्वारा विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों को सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंचाने का आरोप लगाया है.

दरअसल उत्तर प्रदेश में 29 जातियों को विमुक्त घुमंतू जनजाति का दर्जा प्राप्त है. फिलहाल ये जनजातियां अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं. जिसके चलते इन जातियों को डीएनटी (डिनोटिफाईड ट्राईब्स)  को मिलने वाली योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है.

इन जनजातियों को अब तक विमुक्त घुमंतू जाति के प्रमाणपत्र भी जारी नहीं किये गए हैं. जाति प्रमाण पत्र न होने के कारण इन जनजातियों को सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिल रहा है.  

इन जातियों को न केवल उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं का बल्कि केंद्र सरकार की योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल पा रहा है. डीएनटी प्रमाण पत्र बनाने की मांग को लेकर कईं सामाजिक संगठन लगातार मांग कर रहे हैं.

दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार ने विमुक्त जातियों को मिलने वाली योजनाओं के लाभ को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के साथ मिला रखा है. ऐसे में अगर विमुक्त घुमंतू जनजाति का कोई अभ्यर्थी दावेदार नहीं मिलता है तो उनके बजट का पूरा लाभ अपने आप अनुसूचित जातियों के खाते में ट्रांसफर हो जाता है. विमुक्त जाति के प्रमाण पत्र के अभाव में विमुक्त जाति के छात्र और अभ्यर्थी अपने हक का दावा नहीं कर पा रहे  हैं.

इससे पहले भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव से इस मामले में दो हफ्ते के भीतर विमुक्त जातियों को जाति प्रमाण पत्र जारी करने का कड़ा निर्देश देते हुए फटकार लगाई थी लेकिन कोई कर्रवाई नहीं हुई. एक बार फिर से राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने यूपी सरकार को चार सप्ताह के भीतर विमुक्त घुमंतू समुदाय संबधी शिकायत दूर करने के निर्देश दिए हैं. 

चौधरी चरण सिंह – असली भारत की सबसे बुलंद आवाज

भारत के महान नायक पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की आज पुण्यतिथि है। उनके जन्मदिवस 23 दिसंबर को हर साल किसान दिवस के रूप में किसान भी मनाते हैं और सरकार भी।
यह सिलसिला 1978 में चौधरी साहब के जन्म दिन पर बोट क्लब पर हुए किसानों के विशाल जमावड़े से आरंभ हुआ। उस दिन को भारत के किसान जागरण के इतिहास में काफी अहम माना जाता है। वैसे तो किसानों के हक में कई नेताओं ने कई अहम फैसले किए लेकिन चौधरी साहब इन सबसे अलग रहे क्योंकि जीवन भर किसानों का कल्याण उनके एजेंडे में रहा। ग्रामीण भारत के कायाकल्प में उनकी ओर से की गयी कोशिशें आज के भारत को खड़ा करने में काफी अहम और कारगर रही हैं।

चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर, 1902 को गाजियाबाद के नूरपुर गांव में एक छोटे शील किसान परिवार में हुआ। यह गांव आज के हापुड़ जिला मुख्यालय के पास बाबूगढ़ छावनी के समीप है। जब उनकी उम्र महज छह साल की थी तो पिता चौधरी मीर सिंह मेरठ के पास जानीखुर्द गांव में बस गए। वहीं बालक चरण सिंह ने प्राइमरी की पढ़ाई की। फिर मेरठ जाकर हाईस्कूल की परीक्षा दी। इस बीच पिता अपने चार भाइयों के साथ हापुड़ के पास भदौला गांव में आ बसे। चौधरी साहब का परिवार क्रांतिकारी पृष्ठभूमि का था और उनके पितामह बादाम सिंह 1857 की क्रांति के महान नायक बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह के काफी करीबी सहयोगी थे। जब बल्लभगढ़ अंग्रेजों के कब्जे में आ गया तो उनका परिवार पहले बुलंदशहर, फिर नूरपुर गांव पहुंचा था। काफी कष्टों में जीवन बिताया।

चौधरी साहब मेरठ में स्कूली शिक्षा हासिल करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए आगरा कालेज, आगरा गए और 1923 में स्नातक बनने के बाद 1925 में इतिहास में एमए किया और उसी साल विवाह बंधन में भी बंध गए। 1927 में मेरठ कालेज से कानून की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की 1928 में गाजियाबाद में वकालत शुरू कर दी। उनकी वकालत चल निकली। लेकिन उस दौरान वे आजादी के आंदोलन में कूद गए और राजनीतिक और सामाजिक जीवन में ऐसी व्यस्तता बढ़ी कि वकालत छोड़ने का फैसला कर लिया। 1929 में ही कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में हुए पूर्ण स्वराज्य के उद्घोष से प्रभावित युवा चरण सिंह ने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। 1930 में महात्मा गाँधी के आह्वान पर हिंडन नदी पर नमक बना कर कानून तोड़ा और छह माह की सजा हुई। 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भी वे गिरफ्तार हुए तो अक्तूबर 1941 में मुक्त हो सके। 1942 में चरण सिंह ने भूमिगत रह कर गाजियाहाद, मेरठ, सरधना और बुलंदशहर के गांवों में गुप्त क्रांतिकारी संगठन तैयार किया। उनके नाम का अंग्रेजों में इतना आतंक हो गया था कि मेरठ प्रशासन ने उनको देखते ही गोली मारने का आदेश दे रखा था।

तीस के दशक में उनका राजनीतिक जीवन मेरठ जिला परिषद की सदस्यता से आरंभ हुआ। 1937 में वे विधान सभा के सदस्य बने और उसके बाद पीछे मुड़ कर नहीं देखा। विधायक बनने के बाद से चौधरी साहब के एजेंडे पर किसानों का कल्याण रहा। किसानों के हित में उन्होंने लगातार काम किया। 1939 में ऋण निर्मोचन विधेयक पास करा कर चौधरी साहब ने लाखों गरीब किसानों को कर्जे से मुक्ति दिलायी। इसी साल निजी सदस्यों के संकल्प के तहत उन्होंने कृषि उत्पादन मंडी विधेयक पेश किया, जिसमें किसानों को बिचौलियों के मुक्त करा कर वाजिब दाम दिलाने का प्रावधान था। इसी मसले पर उन्होंने 31 मार्च और 1 अप्रैल, 1932 को हिंदुस्तान टाइम्स में एग्रीकल्चर मार्केटिंग पर अनूठा लेख लिखा, जिसकी देश भर में चर्चा हुई। उनके सुझावों को कई सरकारों ने क्रियान्वित किया। इसमें पहला राज्य पंजाब था उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इसे स्वीकारा लेकिन देर से। अपने राजनीति के आरंभ से ही चौधरी साहब सरदार वल्लभ भाई पटेल और गोविदं वल्लभ पंत के काफी प्रिय रहे।

यह श्रेय चौधरी साहब को ही जाता है कि उन्होंने देश में सबसे बेहतरीन जमींदारी उन्मूलन कानून पारित कराया। 1952 में भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन कानून पारित होने के बाद चकबंदी कानून और 1954 में भूमि संरक्षण कानून बनवाया जिससे वैज्ञानिक खेती और भूमि संरक्षण को मदद मिली। चौधरी साहब की कई मसलों पर अलग सोच थी और वे अपने विचारों के प्रति अडिग रहे। वे जातिवाद के कट्टर विरोधी थे और उनके प्रयासों का असर था कि 1948 में उत्तर प्रदेश में राजस्व विभाग ने सरकारी कागजों में जोत मालिकों की जाति नहीं लिखने का फैसला लिया। उन्होंने गोविंद बल्लभ पंत को पत्र लिख 1948 में मांग की थी कि अगर शैक्षिक संस्थाओं के नाम से जातिसूचक शब्द नहीं हटाए जाते तो उऩका अनुदान बंद कर दिया जाये। हालांकि यह मसला टलता रहा लेकिन जब वे 1967 में खुद मुख्यमंत्री बने सरकारी अनुदान लेने वाली शिक्षा और सामाजिक संस्थाओं को अपने नामों के आगे से जातिसूचक शब्द हटाने पड़े। इसकी चपेट में सबसे अधिक जाटों और राजपूतों की संस्थाएं आयीं, फिर भी उन्होंने ऐसा किया।

चौधरी साहब का पूरा जीवन पारदर्शी रहा और उनके व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में कोई अंतर नही था। वे जिस पद पर वे रहे एक मानक स्थापित किया। वे साहसी इस कदर थे उस दौर में पंडित जवाहर लाल नेहरू का विरोध किया जब उनकी तूती बोलती थी। चौधरी साहब सहकारी खेती के रूसी माडल के सख्त खिलाफ थे। 1959 में नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में चौधरी साहब ने उनके सहकारी खेती के प्रस्ताव का खुला विरोध कर भारत के संदर्भ में इसे एकदम अव्यावहारिक करार दिया। हालांकि यह प्रस्ताव पास हो गया था लेकिन पंडित नेहरू ने समझ लिया कि इसे आगे बढ़ाना नए विवादों का जन्म देना होगा, लिहाजा आगे उन्होंने इसमें रुचि नहीं ली।

राष्ट्रीय नेता तो चौधरी साहब उत्तर प्रदेश में ही बन गए थे लेकिन केंद्रीय राजनीति में वे पहली बार 1977 में आए। जनता पार्टी को बनाने में उनका ही आधार और किसान शक्ति सबसे अधिक काम आयी। जनता पार्टी के नेताओं, जिसमें आज की भाजपा और तबका जनसंघ भी शामिल था उसने चौधरी चरण सिंह की पार्टी के चुनाव चिह्न पर ही लोकसभा चुनाव लड़ा था। लेकिन बड़े आधार के बावजूद चौधरी साहब की जगह मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। चौधरी साहब इस सरकार में केंद्रीय गृह मंत्री बने। लेकिन उनकी मोरारजी से नहीं पटी क्योंकि उनका किसान एजेंडा मोरारजी को नापसंद था। फिर भी चौधरी साहब के कारण जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में कृषि को सबसे अधिक प्राथमिकता और किसानों को उपज के वाजिब दाम का भी वायदा किया गया। गांव के लोहार और बुनकर से लेकर कुम्हारों औऱ अन्य कारीगरों को उत्थान का खाका भी बुना गया। 1979 में वित्त मंत्री और उप प्रधानमंत्री रहने के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना करायी और किसानों के हित में कई कदम उठाए। कृषि जिंसों की अन्तर्राज्यीय आवाजाही पर लगी रोक हटा दी। वे प्रधानमंत्री बने तो ग्रामीण पुनरूत्थान मंत्रालय की स्थापना भी की।

चौधरी चरण सिंह ने खुद अपना मतदाता वर्ग खुद तैयार किया। उत्तर भारत में किसान जागरण किया और उनको अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना सिखाया। किसानों के चंदे से ही उनकी राजनीति चलती थी। बैल से खेती करने वाले किसान के लिए चंदे की दर एक रुपया और ट्रैक्टर वाले किसान से 11 रुपए उऩ्होंने तय की थी। कभी बड़े उद्योगपतियों से पैसा नहीं लेने का उनका संक्ल्प था और उन्होंने दिशानिर्देश बना रखा था कि अगर यह साबित हुआ कि उनके किसी सांसद-विधायक ने पूंजीपतियों से चंदा लिया है तो उसे दल छोड़ना पड़ेगा। वे जीवन भर ईमानदारी और सादगी से रहे। मंत्री रहे तो बच्चे पैदल या साइकिल से स्कूल जाते थे।

चौधरी चरण सिंह समाज सुधारक, अर्थशास्त्री, यथार्थवादी दृष्टा और विचारक होने के साथ स्वाधीनता सेनानी थे। व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों के धनी चौधरी साहब की कथनी और करनी में भेद नही था। उन्होंने गांधीजी के ग्राम स्वराज्य के स्वप्न को मूर्तरूप देने के लिए रोजी-रोटी, कपड़ा, शिक्षा और मकान के साथ स्वास्थ्य जैसी जरूरतों को हमेशा प्रमुखता दी। गांव और गरीब के भूगोल को बखूबी जानने के नाते वे आजीवन उसके प्रवक्ता बने रहे और उनके उत्थान के लिए जीवन भर लड़ते रहे।

अगर बारीकी से देखें तो पता चलता है कि उनकी सर्वोच्च सत्ताओं की उम्र बहुत कम रही है। पहली बार वे मुख्यमंत्री बने तो महज 11 महीने की सत्ता थी, जबकि दूसरी बार आठ महीने की। प्रधानमंत्री के रूप में उनको केवल 170 दिन मिले। फिर भी इन सीमित समयों में भी उन्होंने यथासंभव बेहतर काम करने की कोशिश की। चौधरी साहब ने हमेशा धारा के खिलाफ एक अनूठी और जनहितैषी राजनीति की। खास तौर पर ग्रामीण भारत पर जो ठोस और मौलिक सोच दी, इस नाते वे कभी भी राजनीतिक धारा से अप्रासंगिक नहीं हो सके।

चौधरी साहब के भीतर गांव और किसान हमेशा बसा रहा। वे कहते थे कि मेरे संस्कार उस गरीब किसान के संस्कार हैं, जो धूल, कीचड़ और छप्परनुमा झोपड़ी में रहता है। वे हमेशा इस बात को सगर्व कहते थे कि उनका संबंध एक छोटे किसान परिवार से है। चौधरी साहब कई पुस्तकों के लेखक हैं जिनको पढ़े बिना ग्रामीण भारत को समझा नहीं जा सकता। किसान जागरण के लिए ही उन्होंने 13 अक्तूबर 1979 से असली भारत साप्ताहिक अखबार शुरू किया था। कई बार उनसे मिलने गांवों के लोग आते तो वे उनसे कहते थे कि किराये पर इतना पैसा खर्च करने की जगह यही बात एक पोस्टकार्ड पर लिख देते तो तुम्हारा काम हो जाता। आज जो जागृत किसान खड़ा है, उसका आधार चौधरी चरण चरण सिंह ने ही तैयार किया था।

कमरतोड़ महंगाई की वजह खुदरा महंगाई है, न की वैश्विक कारण – आरबीआई रिपोर्ट

केंद्र सरकार बेशक से बढ़ती महंगाई के लिए रूस यूक्रेन युद्ध, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और सप्लाई चैन में बाधाएं जैसे वैश्विक कारणों को जिम्मेदार ठहरा रही हो, लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक ने शुक्रवार 27 मई 2022 को जारी की गई अपनी सालाना रिपोर्ट में बढ़ती महंगाई के पीछे इन वैश्विक कारणों का योगदान बहुत कम बताया है.

रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि थोक महंगाई दर एक साल से भी अधिक समय से लगातार दहाई अंकों में बनी हुई है. जिसका असर खुदरा महंगाई दर पर भी पड़ने का खतरा है.

थोक मूल्य सूचकांक (होलसेल प्राइस इंडेक्स) थोक पर वस्तुओं की औसत कीमतों में परिवर्तन को दर्शाता है. इस के अंतर्गत बड़ी कंपनियों और संस्थाओं में होने वाले व्यापारिक लेनदेन की गतिविधियों की गणना की जाती है. ऐसे में जब थोक महंगाई में इज़ाफा होगा तो जाहिर है खुदरा महंगाई पर भी इस का असर पड़ेगा.

रिज़र्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में बढ़ती महंगाई पर सेंसटिविटी एनालिसिस (संवेदनशील विश्लेषण) किया. इस विश्लेषण में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमोडिटी (वस्तुओं) की कीमतों के बढ़ने का खुदरा महंगाई पर मामूली असर होता है.  खुदरा महंगाई पर थोक महंगाई का असर ज्यादा है.

रिज़र्व बैंक की सेंसटिविटी एनालिसिस में अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमोडिटी के दाम एक फ़ीसदी बढ़ते हैं तो खुदरा महंगाई दर पर उसका असर सिर्फ 0.02% ही होता है. वहीँ थोक महंगाई अगर एक फ़ीसदी बढ़ती है तो खुदरा महंगाई पर उसका असर 0.26 फ़ीसदी पड़ता है.

यह विश्लेषण बताता है कि खुदरा महंगाई पर अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में थोक महंगाई का असर अधिक होता है. यानी सप्लाई की दिक्कतें, टैक्स तथा अन्य स्थानीय कारण खुदरा बाजार में दाम बढ़ाने में ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

खुदरा महंगाई पिछले महीने आठ साल में सबसे ऊंचे स्तर 7.79% पर पहुंच गई थी. रिजर्व बैंक को खुदरा महंगाई 2% से 6% के बीच रखनी होती है लेकिन बीते चार महीने से यह लगातार 6% से ऊपर ही बनी हुई है. वहीँ अप्रैल में, ईंधन से लेकर सब्जी और खाना पकाने के तेल सभी की बढ़ती कीमतों की वजह से थोक महंगाई 15.08% के नए रिकॉर्ड ऊँचाई पर पहुंच गई थी.

रिज़र्व बैंक के इस विश्लेषण से यह साफ है कि सरकार सप्लाई की दिक्कतें दूर करने में नाकाम रही है जिसकी वजह से खुदरा महंगाई लगातार आसमान छू रही है.

लेकिन इन सब के बावजूद केंद्र सरकार महंगाई को नियंत्रित करने में वैश्विक कारणों को अधिक जिम्मेदार बताती है जबकि उनकी अपनी भूमिका को वह दरकिनार कर रही है.

याद हो तो लागत को नियंत्रण से बाहर होने से बचाने के लिए ही सरकार ने हाल ही में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क कम कर दिया था. साथ ही स्टील और प्लास्टिक उद्योगों में इस्तेमाल होने वाले कई कच्चे माल पर आयात शुल्क को माफ कर दिया गया था. इसके अलावा, आयरन ओर (लोह अयस्क) और आयरन पेलेट्स पर निर्यात शुल्क बढ़ाया गया, गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया, चीनी निर्यात को मुक्त से रेस्ट्रिक्टेड कैटेगरी में डाला गया और दो साल तक 20-20 लाख टन क्रूड सोयाबीन और सनफ्लावर ऑयल (सूरजमुखी तेल) आयात पर ड्यूटी न लगाने का फैसला किया है.

रेत खनन: 16 महीनों में 400 से अधिक मौत, पर्यावरण के साथ जान का भी नुकसान

आमतौर पर नदियों से होने वाले अवैध और अवैज्ञानिक रेत खनन को पर्यावरण और जलीय जीवों पर खतरे के रूप में देखा जाता है. लेकिन इसका एक और स्याह पक्ष भी है, जो न तो सरकारी फाइलों में दर्ज होता है और न कहीं इसकी सुनवाई होती है. ये है रेत खनन के चलते हर साल जान गंवाने वाले सैकड़ों लोग और इसके चलते बिखरने वाले उनके परिवार. 

हरियाणा निवासी धर्मपाल को इस स्याह पक्ष को अब ताउम्र भोगना होगा. साल 2019 के जुलाई महीने में उनके बेटे संटी (18 साल) और भतीजे सुनील (15 साल) की सोम नदी में डूबने से मौत हो गई. यमुनानगर ज़िले के कनालसी गांव के रहने वाले धर्मपाल के भाई तेजपाल के मुताबिक दोनों भाई नदी में नहाने गए थे. नदी में खनन की वजह से कई गहरे गड्ढे बन गए थे. किसी को पता नहीं था कि यहां खनन हो रहा है. 

उन्होंने मोंगाबे-हिंदी से कहा, “हमने दो महीने तक पुलिस-प्रशासन के चक्कर काटे. ज़िलाधिकारी के पास भी गए. हमारी शिकायत नहीं सुनी गई. बच्चों की मौत पर मुआवजा भी नहीं मिला. हम मज़दूर हैं. कितने दिन काम छोड़कर जाते. उस दिन के बाद से हम अपने बच्चों को नदी की तरफ जाने ही नहीं देते.” धर्मपाल के पास अब भी बेटे की मौत से जुड़े दस्तावेज़ संभाल कर रखे हुए हैं. वह अदालत में केस दाखिल करने की तैयारी में हैं. परिजनों के मुताबिक जिलाधिकारी ने कहा कि दोनों बच्चे बालिग नहीं थे. वे खुद नदी में नहाने गए थे. इसलिए गलती उनकी थी. इस मामले में कुछ नहीं किया जा सकता.

कनालसी गांव के पास यमुना, सोम और थपाना नदियों का संगम है. इसी गांव के रहने वाले और यमुना स्वच्छता समिति से जुड़े किरनपाल राणा बताते हैं कि 2014 में उनके क्षेत्र में खनन शुरू हुआ. तब से सिर्फ उनके गांव से ही पांच बच्चों की मौत नदी में डूबने से हो चुकी है. वह बताते हैं कि सोम नदी में तो खनन की अनुमति भी नहीं है. वहां चोरी-छिपे खनन होता है. 

वर्ष 2019 में संटी और सुनील की सोम नदी में बने कुंड में डूबने से मौत हुई थी. दोनों चचेरे भाई थे. मृतक की तस्वीर के साथ तेजपाल और उनकी पत्नी.

किरनपाल कहते हैं, “प्रशासन मानने को तैयार नहीं है कि खनन के लिए खोदे गए गड्ढ़ों में डूबने से बच्चों की मौत हुई है. उन बच्चों को नहीं पता था कि मशीनों से नदी में 30 फुट तक गहरे गड्ढे खोद दिए गए हैं. न ही वहां चेतावनी के लिए कोई बोर्ड था. खनन विभाग, यमुनानगर प्रशासन और हरियाणा सरकार ने उनकी कोई मदद नहीं की. उन बच्चों का पोस्टमार्टम तक नहीं कराया गया. बच्चे गांव के घाटों पर खेलने और तैरने के लिए जाते थे. अब उन बच्चों को यही नदी डराने लगी है.” हरियाणा में नदी में रेत खनन की सीमा तीन मीटर गहराई तक ही तय है.

वहीं हरियाणा हाईकोर्ट में वकील सुनील टंडन कहते हैं, “मेरे पास इस समय कनालसी गांव और इसके नजदीक के दो गांवों के तीन केस हैं जिनमें छः किशोरों की मौत हुई है. इन मौतों की सबसे बड़ी वजह खनन है. साथ ही सिंचाई विभाग की लापरवाही भी है. नदी के किनारों को भी सुरक्षित नहीं बनाया गया है. नदी कहीं 10 फुट गहरी है तो कहीं 30 फुट. खनन हो रहा है तो वहां कोई सिक्योरिटी गार्ड या नोटिस बोर्ड होना चाहिए. ताकि नदी किनारे रह रहे लोगों को सतर्क किया जा सके.”

रेत की मांग काफी अधिक है. वैश्विक स्तर पर सालाना पांच हजार करोड़ मीट्रिक टन रेत और बजरी का इस्तेमाल होता है. चीन के साथ भारत भी ऐसा देश है जहां रेत बनने की गति से अधिक इसका खनन होता है. अधिक मांग की वजह से भारत को कंबोडिया और मलेशिया जैसे देशों से रेत आयात करना पड़ता है. रेत की मांग अधिक होने की वजह से इसका खनन, खासकर अवैध खनन काफी फल फूल रहा है.

भारत सरकार ने वर्ष 2016 में टिकाऊ खनन के मद्देनजर एक दिशा-निर्देश प्रकाशित किया था. हालांकि इस दिशा-निर्देश का गंभीरता से पालन नहीं होता. 

जानलेवा बनता रेत खनन 

गैर-सरकारी संस्था साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल (एसएएनडीआरपी) ने दिसंबर 2020 से मार्च 2022 तक, 16 महीने में रेत खनन की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं और हिंसा के मामलों का मीडिया रिपोर्टिंग के आधार पर अध्ययन किया है. 

इसके मुताबिक इस दौरान रेत खनन से जुड़ी वजहों के चलते देशभर में कम से कम 418 लोगों की जान गई है. 438 घायल हुए हैं. इनमें 49 मौत खनन के लिए नदियों में खोदे गए कुंड में डूबने से हुई हैं. ये आंकड़े बताते हैं कि खनन के दौरान खदान ढहने और अन्य दुर्घटनाओं में कुल 95 मौत और 21 लोग घायल हुए. खनन से जुड़े सड़क हादसों में 294 लोगों की जान गई और 221 घायल हुए हैं. खनन से जुड़ी हिंसा में 12 लोगों को जान गंवानी पड़ी और 53 घायल हुए हैं. अवैध खनन के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले कार्यकर्ताओं/पत्रकारों पर हमले में घायल होने वालों का आंकड़ा 10 है. जबकि सरकारी अधिकारियों पर खनन माफिया के हमले में 2 मौत और 126 अधिकारी घायल हुए हैं. खनन से जुड़े आपसी झगड़े या गैंगवार में 7 मौत और इतने ही घायल हुए हैं.

दिसंबर 2020 से मार्च 2022 के बीच देश के उत्तरी राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, पंजाब, दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और चंडीगढ़ में सबसे ज्यादा 136 मौत हुई हैं. इनमें से 24 मौत खनन के लिए खोदे गए गड्ढों में डूबने से हुई हैं.

यमुना स्वच्छता समिति से जुड़े कनालसी गांव के किरणपाल राणा दिखाते हैं कि यमुना में तय सीमा से कहीं अधिक गहराई में खनन के लिए कुंड खोदे गए हैं

नदियों को खनन से बचाने के लिए आंदोलनरत हरिद्वार के मातृसदन आश्रम ने 29 अप्रैल को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नाम ज्ञापन भेजा. इसमें कहा गया, “हरिद्वार में खनन का माल ले जाने वाले डंपर की चपेट में आने और खनन के लिए बनाए गए गड्ढ़ों में गिरने से आए दिन लोग मर रहे हैं. हालिया आंकड़े 50 से भी ज्यादा हैं. बीते 10 सालों में कितनी मौत हुईं, यह अनुमान लगाना भी कठिन है.”

मातृसदन के ब्रह्मचारी सुधानंद बताते हैं कि स्थानीय मीडिया रिपोर्टिंग के आधार पर हमने ये आकलन किया. गंगा के किनारे कई जगह 30-30 फीट गहरे ग़ड्ढ़े हैं. इनमें नदी का पानी भरा रहता है. अनजाने में लोग इन ग़ड्ढ़ों में गिरते हैं और दुर्घटनाएं होती हैं.

ये आंकड़े इससे कहीं ज्यादा भी हो सकते हैं क्योंकि इसमें सिर्फ अंग्रेजी भाषा के अखबारों में छपी खबरें ही शामिल हैं. क्षेत्रीय या भाषाई अखबारों में छपी खबरें नहीं. इस अध्ययन को करने वाले एसएएनडीआरपी के एसोसिएट कॉर्डिनेटर भीम सिंह रावत कहते हैं, “खनन के चलते होने वाली मौत या सड़क दुर्घटनाओं को नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) सामान्य सड़क दुर्घटना के रूप में दर्ज करता है. जबकि खनन के मामले में तेज़ रफ्तार में वाहन चलाना, पुलिस चेकपोस्ट से बचने की कोशिश, गलत तरह से सड़क किनारे खड़े किए गए रेत-बजरी से लदे ट्रकों के चलते हादसे हो रहे हैं. नदी में बहुत ज्यादा खनन से बने कुंड में डूबने से होने वाली मौत को भी एनसीआरबी को अलग से देखने की जरूरत है.”

एनसीआरबी की रिपोर्ट में सड़क दुर्घटना, तेज़ रफ्तार, ओवर-लोडिंग, डूबने या दुर्घटनाओं जैसी श्रेणियां होती हैं. लेकिन खनन के चलते होने वाली दुर्घटनाओं को अलग श्रेणी में नहीं रखा जाता. 

उत्तराखंड के स्टेट क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एससीआरबी) में दुर्घटनाओं से जुड़ा डाटा तैयार कर रही सब-इंस्पेक्टर प्रीति शर्मा बताती हैं, “हम डाटा में उल्लेख करते हैं कि प्रकृति के प्रभाव के चलते डूबने से मौत हुई. खनन के चलते बने कुंड में डूबने, बाढ़ या अन्य वजह से डूबने की श्रेणी निर्धारित नहीं है.”

एनसीआरबी के लिए सड़क दुर्घटनाओं का डाटा तैयार करने वाले सब-इंस्पेक्टर मनमोहन सिंह बताते हैं कि सड़क हादसे में होने वाली मौत के मामलों में ओवर-लोडिंग और तेज़ रफ्तार जैसी करीब 35 श्रेणियां होती हैं. ऐसी कोई श्रेणी नहीं है जिसमें हम ये दर्ज करें कि खनन से जुड़े वाहन के चलते दुर्घटना हुई. इस बारे में एनसीआरबी के अधिकारियों का ईमेल के जरिए पक्ष जानने की कोशिश की गई. उनका जवाब मिलने पर इस खबर को अपडेट किया जाएगा.

यमुना किनारे रेत खनन का असर स्थानीय लोगों के जीवन पर भी पड़ रहा है.

एसएएनडीआरपी के कोऑर्डिनेटर हिमांशु ठक्कर खनन के लिए स्थानीय समुदाय को साथ लेकर निगरानी समिति बनाने का सुझाव देते हैं. इनका कहना है, “सरकारी अधिकारियों को कैसे पता चलेगा कि खनन किस तरह हो रहा है. इसमें लोगों की भागीदारी जरूरी है. नदी किनारे रहने वाले लोगों को पता होता है कि खनन वैध है या अवैध. दिन या रात, मशीन या लोग, बहती नदी या नदी किनारे, किस स्तर तक खनन हो रहा है. स्थानीय लोग अहम कड़ी हैं. वे निगरानी में शामिल होंगे तभी इसका नियमन ठीक से किया जा सकेगा.”

जवाबदेही तय हो!

वेदितम संस्था से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता सिद्धार्थ अग्रवाल कहते हैं, “खनन से जुड़े मामलों में पारदर्शिता लाना सबसे ज्यादा जरूरी है. ये सार्वजनिक होना चाहिए कि देशभर में रेत खनन के लिए कहां-कहां अनुमति दी गई है. अवैध या अनियमित खनन पर केंद्र या राज्य स्तर पर क्या कार्रवाई की जा रही है. मुश्किल ये है कि खनन से जुड़े मामलों में सरकार की तरफ से कोई दृढ़ इच्छाशक्ति नहीं दिखाई देती.”

रीवर ट्रेनिंग नीति के मुताबिक हर साल बरसात के बाद नदी में कितना रेत-बजरी-पत्थर और मलबा जमा होता है इसी आधार पर ये तय किया जाता है कि अक्टूबर से मई-जून तक खनन के दौरान नदी से कितना उपखनिज निकाला जा सकता है. वन विभाग हर वर्ष ये खनन रिपोर्ट तैयार करता है. आईआईटी कानपुर में डिपार्टमेंट ऑफ अर्थ साइंस में प्रोफेसर राजीव सिन्हा मानते हैं कि नदी में तय सीमा से अधिक गहराई में खनन होता ही है. “हमने हल्द्वानी में गौला नदी के अंदर सर्वे किया. खनन की मात्रा के आकलन का बेहतर वैज्ञानिक तरीका तैयार करने पर हम काम कर रहे हैं. लेकिन ये कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला भी है. नदी में खनन से बने कुंड से होने वाली मौत इसका एक नतीजा हैं. साथ ही इससे नदी का पूरा इकोसिस्टम बदल जाता है.” सर्वे का काम अभी जारी है.

सरकार ने रेत खनन की मॉनीटरिंग और लगातार निगरानी से जुड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अपने एक आदेश में कहा था कि दिशा-निर्देशों के होते हुए भी ज़मीनी स्तर पर अवैध खनन हो रहा है और ये सबको अच्छी तरह पता है.

साभार: MONGABAY

(वर्षा सिंह मोंगाबे में रिपोर्टर हैं और खेती बाड़ी और ग्रामीण भारत से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर लिख चुकी हैं.)

छोटी जोत के बावरिया समाज के किसानों तक नहीं पहुंच रही सरकारी योजनाएं

करनाल से करीबन 25 किलोमीटर दूर करनाल-मतलोडा रोड पर मुख्य सड़क से करीबन दो किलोमीटर अन्दर
बरसाती नहर के बराबर में बावरिया समाज के डेरे हैं। इस डेरे में बावरिया समाज के 10 से 12 परिवार रह रहे हैं।

बंटवारे के बाद पकिस्तान से भारत आये बावरिया समाज के बुजुर्गों ने यहां सरकारी जमीन किश्तों पर लेकर खेती करना शुरू किया था। लेकिन वक्त के साथ बावरिया परिवारों की आर्थिक स्थिति में कोई खासा सुधार नहीं हुआ। यहां रहने वाले सभी बावरिया परिवार छोटी जोत के किसान हैं।

विमुक्त घुमंतू जनजाति समूह में आने वाली बावरिया जनजाति के लोगों की मीडिया द्वारा एक नकारात्मक छवि गढ़ी गई है। मीडिया के इस रवैया पर बात करने पर सरवन बावरिया ने बताया कि हम ऐसा काम नहीं करते हैं। हम केवल खेत में मेहनत-मजदूरी कर के घर चला रहे हैं।

करीबन पचासेक साल के सरवन सिंह के पास केवल 4 कनाल 8 मर्ले जमीन हैं। परिवार में दो बेटे, पत्नी और बुजुर्ग माँ हैं।

सरवन बावरिया के परिवार पर मुसीबत का पहाड़ तब टूट पड़ा जब पिछले महीने गेंहू के सीजन के दौरान खेत में आग लगने से काफी नुकसान हो गया।
आग की वजह डेरे में रहने वाले छोटी जोत के बावरिया किसानों का भारी नुकसान हो गया। आग की वजह से लगभग 15 ट्राली का भूसा जल कर राख हो गया साथ ही सरवन सिंह के पड़ोसी किसान की 3 एकड़ में खड़ी भिन्डी की फसल भी नष्ट हो गई। आग की वजह से यहां छोटी जोत के किसानों का कईं लाखों का नुकसान हुआ है।

सरवन सिंह ने बताया आग लगने की घटना के एक दिन बाद तहसीलदार और दूसरे अफसर भी आये थे फोटो खींच कर ले गए। अफसरों ने आर्थिक मदद पहुंचाने का अश्ववासन दिया था लेकिन अब तक कुछ मदद नहीं मिली।

वहीं सरवन सिंह बावरिया ने प्रधानमंत्री किसान निधि योजना का लाभ लेने के लिये आवेदन किया था। इस योजना के तहत सरकार की ओर से छोटी जोत के किसानों को किश्तों में आर्थिक मदद करने का दावा किया गया है। छोटी जोत के किसानों को अब तक दस किश्तें मिल चुकी हैं लेकिन सरवन बावरिया के खाते में अब तक एक भी किश्त नहीं आई है।

इस मसले पर सरवन ने संबंधित विभाग में भी गुहार लगाई लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। सभी कागजात की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी घुमंतू समाज से आने वाली बावरिया जनजाति के किसान प्रधानमंत्री किसान योजना से वंचित हैं।

वहीं करीबन 30 साल के राजू ने बतया कि हमारे डेरे में बिजली की बहुत बड़ी समस्या है आस पास के सभी डेरों में बिजली रहती है लेकिन हमारे 10-12 घरों में पूरे दिन में मुश्किल से 4-5 घंटे लाइट आती है। ऊपर से धान का सीजन है तो बिना बिजली के खेत में पानी कैसे देंगे।

वहीं 62 साल की करतार कौर ने भी अपनी समस्या बताते हुए कहा कि जनवरी में बुढ़ापा पेंशन का फॉर्म भरा था फॉर्म भरे हुए पांच महीने पूरे होने को हैं लेकिन अब तक पेंशन नहीं बंधी। वोटर कार्ड और आधार कार्डके अनुसार करतार कौर की उम्र 60 साल से ज्यादा हो चुकी है लेकिन अब तक उन्की बुढ़ापा पेंशन नहीं बन पाई है। करतार कौर के परिवार में उन्के पति और केवल एक बेटी है।

9 करोड़ लोगों को नहीं मिल रहा डिपो का सस्ता राशन, बच्चों पर सबसे बुरा असर

खाद्य असुरक्षा से निपटने के लिए भारत सरकार ने अपने लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) योजना से 9 करोड़ से भी अधिक लोगों को बाहर कर दिया है.

आसान भाषा में इसका मतलब यह है कि भारत में करीब 9 करोड़ से अधिक लोगों को डिपो का सस्ता राशन नहीं मिलता है.

26 मई को जारी रिपोर्ट ‘प्रॉमिस एंड रियालिटी’ 2021 में जनसंख्या की गणना के आधार पर दूसरी बार चुनी गई भाजपा सरकार की तीसरी सालगिरह को चिह्नित करते हुए प्रकाशित किया गया है.

रिपोर्ट में यह दावा किया गया है, “पीडीएस स्कीम के तहत इस का लाभ उठाने वाले लोगों की संख्या का आधार साल 2011 की भारत की जनगणना है. जिस वजह से साल 2011 के बाद आबादी का एक बड़ा हिस्सा स्कीम का लाभ नहीं उठा पा रहा है. जिस के अनुसार कम से कम 12% आबादी अपने क़ानूनी अधिकारों से बाहर हो गई है.”

यानि साल 2011 के बाद अभी तक भारत की जनसँख्या का 12% हिस्से को डिपो का सस्ता राशन नहीं मिलता है.

केंद्र की भाजपा सरकार ने अभी तक उस जनगणना की प्रक्रिया को शुरू नहीं किया है जो पिछले साल तक खत्म हो जानी चाहिए थी.

‘वादा ना तोडो अभियान’ (डब्ल्यूएनटीए) द्वारा प्रकाशित नागरिकों की रिपोर्ट के अनुसार देश में खाद्य असुरक्षा को दूर करने के लिए पीडीएस सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक होने के बावजूद, लाभार्थियों की पहचान से जुड़ी परेशानियां, पूरी योजना के असर को कम कर रही हैं.

सरकार के वायदों को ट्रैक करने के लिए साल 2005 में नागरिक समाज संगठनों द्वारा वादा ना तोड़ों अभियान (डब्ल्यूएनटीए) की शुरुआत हुई थी.

अधिकतर राज्यों ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 की टीपीडीएस योजना में जरुरतमंद लोगों को जोड़ने के लिए समावेशी और बहिष्करण दोनों ही मापदंडों का इस्तेमाल किया है. लेकिन उसके बावजूद कई महिलाएं, सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग, ट्रांसजेंडर, विकलांग लोगों और वृद्ध नागरिकों को टीपीडीएस (डिपो का सस्ता राशन) का लाभ लेने के लिए योजना के लिए पास (सफल) नहीं हो पाते हैं.

राजस्थान, सिक्किम, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में इनमें से किसी भी जनसंख्या समूह को टीपीडीएस योजना में अपने आप शामिल ही नहीं किया जाता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ज्यादातर राज्यों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को स्वचालित रूप से शामिल ही नहीं किया जाता है.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मई 2021 में केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया था ताकि यह पक्का किया जा सके कि कोई भी योग्य व्यक्ति प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना से अछूता न रह जाए, जिसका उद्देश्य कोविड-19 महामारी के दौरान गरीब परिवारों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराना था. लेकिन महामारी के दौर में राशन लेने के लिए लोगों के बायोमेट्रिक (ऊँगली के छाप) में समस्याओं की वजह से कई परिवार राशन के अधिकार से अछूते रह गए थे.

डब्ल्यूएनटीए की रिपोर्ट में नीति आयोग के तकनीकी सहयोग से ‘डलबर्ग एडवाइजर्स’ और ‘कांतार पब्लिक’ द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन का हवाला दिया गया, जिसमें यह पाया गया कि लगभग 30 लाख बच्चे महामारी के बाद से कमजोर हो गए हैं.

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के पांचवें दौर के निष्कर्षों से यह भी पता चला है कि 6-23 महीने की शुरूआती उम्र के 89% बच्चों को “न्यूनतम स्वीकार्य आहार” (मिनिमम एक्सेप्टेबल डाइट) नहीं मिलता है.

साथ ही, जनसंख्या समूह में पांच साल से कम उम्र के बच्चों, किशोर लड़कियों और लड़कों, गर्भवती महिलाओं के साथ  सभी लोगों की बढ़ती संख्या एनीमिया (खून की कमी) से प्रभावित हो रही है. 2015-16 में किए गए पिछले सर्वेक्षण में 58.6% की तुलना में कम से कम 67% बच्चों जिनकी उम्र 6-59 महीने की है, में एनीमिया के लक्षण देखें गए हैं. वयस्कों में 57% महिलाओं और 25% पुरुषों (15-49 साल समूह) में एनीमिया है. महिलाओं में यह 2015-16 में 53% से बढ़कर 2019-21 में 57% हो गया है. पुरुषों में यह 23% से बढ़कर 25% हो गया है.

‘प्रॉमिस एंड रियलिटी’ रिपोर्ट इस बात पर भी प्रकाश डालती है कि अधिकांश राज्य खाद्य आयोग वित्तीय स्वायत्तता से ग्रस्त हैं और राज्य सरकारें जिला शिकायत निवारण अधिकारियों (डीजीआरओ) को नामित करने और सतर्कता समितियों के गठन से आगे नहीं बढ़ी हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, “आज तक किसी भी राज्य सरकार ने सतर्कता समितियों के सदस्यों या कानून में किसी अन्य एजेंसी/ अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करने के लिए कोई पहल नहीं की है.”

हसदेव अरण्य: साढ़े चार लाख पेड़ों को निगल जाएगा अडानी का माइनिंग कारोबार

देश के सबसे घने जंगलों में से एक छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य में माइनिंग के लिये पेड़ काटे जाने पर ‘फ्रेंड्स ऑफ हसदेव अरण्य’ द्वारा (बधुवार) 25 मई को दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस वार्ता आयोजित किया गया. छत्तीसगढ़ के सरगुजा, सूरजपुर और कोरबा जिलों में विशाल क्षेत्र में फैले हसदेव अरण्य जिसे ‘छत्तीसगढ़ के फेफड़े’ भी कहा जाता है, में कोयला खनन का मुद्दा देश ही नहीं अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठने लगा है.

बीते कुछ दिन पहले 23 मई सोमवार को हसदेव अरण्य में कोयला खनन का मुद्दा लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में उठा जब वहां पहुंचे राहुल गांधी से एक स्टूडेंट ने इसके बारे में सवाल किया. जवाब में राहुल गांधी ने कहा, वे इस मुद्दे पर पार्टी के भीतर बात कर रहे हैं और जल्दी ही इसका नतीजा भी दिखेगा.

इसी सिलसिले में बुधवार की प्रेस वार्ता में वक्ताओं ने अपनी बात रखी. इस वार्ता को छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के नेता आलोक शुक्ला, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद, पर्यावरण शोधकर्ता कांची कोहली, पीयूसीएल से कविता श्रीवास्तव समस्त आदिवासी समूह के डॉ. जितेंद्र मीणा, अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव और संयुक्त किसान मोर्चा के नेता हन्नान मोल्लाह और एनएपीएम के नेता राजेंद्र रवि ने संबोधित किया.

हसदेव अरण्य में कोयला खनन के लिए जंगल की कटाई का विरोध पिछले 10 सालों से लगातार चल रहा है. इस मामले पर हम से बात करते हुए आलोक शुक्ला ने बताया कि, “हसदेव अरण्य को बचाने के लिए स्थानीय आदिवासियों ने हर तरह से संघर्ष किया है. 2014 में जब यहां के कोयला ब्लॉक का आवंटन (अलोटमेंट) हुआ था तब यहां की ग्राम सभाओं ने इनका विरोध किया था. उसके बाद जंगल की ज़मीन पर ग्राम सभाओं ने माइनिंग का विरोध लगातार किया. साल 2015, 2017 और 2018 में भी लगातार प्रदर्शन किया. लेकिन फर्जी ग्राम सभाएं प्रस्ताव जारी कर माइनिंग के लिए स्वीकृति हांसिल की गई. 2019 में आदिवासियों ने लगातार 75 दिनों तक प्रदर्शन जारी रखा, जिसे सरकार और प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों पर झूठे मुक़दमे दायर कर आन्दोलन को जबरदस्ती समाप्त करवाया. कोयला खनन के विरोध में आदिवासियों ने मदनपुर से चलकर रायपुर तक आदिवासियों ने 10 दिनों तक 300 किलोमीटर की पैदल यात्रा की और अपना विरोध जताया.”

आलोक शुक्ला ने बताया कि समय समय पर हसदेव अरण्य से सम्बंधित अध्ययन हुए हैं, जिसमे यह साफ़ कहा गया है कि हसदेव में माइनिंग नहीं की जानी चाहिए. “यह इलाका संविधान के 5वी अनुच्छेद में भी आता है जिसके तहत यहां की ग्रामसभाओं के अपने अधिकार हैं. फिर चाहे वह जमीन अधिग्रहण का मामला हो या जंगल की जमीन पर खनन का मामला हो, जब तक ग्राम सभाएं इनकी मंजूरी नहीं देती तब तक ऐसा कुछ भी लागू नहीं किया जा सकता.”

आलोक शुक्ला ने आगे बताया कि 6,500 एकड़ से अधिक सुंदर प्राचीन जंगलों में 4.5 लाख से ज्यादा पेड़ कटने की संभावना है. खबर यह भी है कि पर्यावरणविदों, नौजवानों और नागरिक समाज द्वारा बड़े विरोध के बावजूद एक तीसरी खनन परियोजना – के एक्सटेंशन – को मंजूरी दी जा रही है, जिससे कई लाख और पेड़ों को काटे जाने की संभावना है. साफ़ कहें तो, ये सभी परियोजनाएँ एक समृद्ध, प्राचीन पारिस्थितिक तंत्र (इकोसिस्टम) को पूरी तरह से बर्बाद कर देगी. आलोक शुक्ला ने बताया कि वे हसदेव अरण्य जंगल कटाई के लिए जिम्मेदार केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारें हैं. वे बताते हैं कि “देश के संघीय ढाँचे होने की वजह से केंद्र और राज्य दोनों कि जिम्मेदारियां और जवाबदेही है. कोयला ब्लॉक का आवंटन यदि केंद्र ने किया है तो जमीन और जंगल की जवाबदेही राज्य सरकार की है. इन दोनों सरकारों का विरोध तो है ही साथ ही खनन कंपनी के एमडीओ अडानी ग्रुप का भी विरोध कर रहे हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि अडानी को फायदा पहुँचाने के लिए दोनों ही सरकारों ने हसदेव अरण्य जंगल को तबाह करने की ठान ली है.”

हरियाणा: देहातियों की जमीनों के पैसे डकारती अफसरशाही!

हरियाणा में ग्राम पंचायतों की जमीन से होने वाली करोड़ों रुपए की कमाई में हेराफेरी का मामला सामने आया है. पंचायतों की आय तो हुई लेकिन यह पैसा पंचायत खाते में जमा करवाने की बजाय अफसरों ने ही आपस में बाँट लिया. राज्य के बाढ़डा, भिवानी, पलवल, दादरी सहित दर्जनों ब्लॉक में इस तरह की घटना हुई हैं. अब पूरे प्रदेश में इसकी जांच होगी. सभी ब्लॉक से पंचायती जमीनों और इनसे होने वाली सालाना आय का रिकार्ड विकास एवं पंचायत मंत्री ने अपने ऑफिस में मंगवाया है.

ग्राम पंचायतों की आय का बड़ा हिस्सा पंचायती जमीनों से आता है. पंचायती जमीनों को हर साल खेती के लिए ठेके पर दिया जाता है. प्रदेश में ठेके के रेट अलग-अलग एरिया और जमीन के हिसाब से अलग-अलग हैं. सोनीपत में ठेके का रेट प्रति एकड़ सालाना 30 से 50 हजार है. जीटी रोड बेल्ट पर यह 50 से 70 हजार और अहीरवाल एरिया में 15 से 30 हजार रुपये तक है. जिस एरिया में पानी का पूरा प्रबंध है और सालाना दो से तीन फसलें ली जा सकती हैं, वहां रेट काफी अधिक है. यह ठेका बोली के जरिए छोड़ा जाता है.

नियमों के हिसाब से ठेकों से आने वाला पैसा पंचायतों के खातों में जमा होना चाहिए. सैकड़ों की संख्या में ग्राम पंचायतें ऐसी हैं, जिनकी जमीन तो ठेके पर दी गई लेकिन पैसा उनके खाते में नहीं आया. आरोप है कि यह पैसा अफसर लोग ही जीम (डकार) गए. इससे जुड़ी हुई काफी संख्या में शिकायतें चंडीगढ़ पहुंची हैं. विकास एवं पंचायत मंत्री देवेंद्र सिंह बबली ने नोटिस लेते हुए पूरे प्रदेश का रिकार्ड मंगवाया है. पंचायतों को जमीन के अलावा भी जो आय हुई है उसका ब्योरा और बैंक खातों का ब्योरा भी मंत्री ने मांगा है.

इससे पहले भी पंचायत विभाग में कई घोटाले सामने आए हैं. पिछले महीने पलवल जिले में 25 करोड़ रुपये से अधिक के गबन का मामला सामने आ चुका है. यहां विकास कार्यों के लिए 60 करोड़ रुपये के करीब खर्च किए गए. इसमें से 30 से 40 प्रतिशत ऐसे काम हैं, जो ग्राउंड पर हुए ही नहीं. कागजों में काम दिखाए गए और बिल पास करके अधिकारियों ने पैसे हजम कर लिए.

पंचायत मंत्री ने इस मामले में दर्जन अधिकारियों व कर्मचारियों पर एफआईआर दर्ज करवाई है. एक ओर केस दर्ज करवाने की तैयारी विभाग की ओर से चल रही है ताकि संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों से गबन किए गए पैसे की रिकवरी हो सके. मुख्यमंत्री कार्यालय के संज्ञान में आने के बाद इसकी जांच पलवल के ए.डी.सी. को सौंप दी गई. मंत्रालय ने इस पर नाराज़गी जताते हुए अधिकारियों से पूछा है कि यह फैसला किस स्तर पर और किन नियमों के तहत लिया गया. मंत्रालय इस मामले की जांच विजीलैंस से करवाना चाहते हैं.

इसके अलावा मनरेगा कार्यों में भी घोटाला हुआ है. अधिकारियों और ग्राम सचिवों ने सरपंचों के साथ मिलकर आर्थिक तौर पर मजबूत और अपने यारे प्यारों के जॉब कार्ड बनाए. मनरेगा का काम पास किया गया. यह काम हकीकत की बजाय सिर्फ कागजों में हुआ. इस काम के पैसे अधिकारियों, ग्राम सचिवों और सरपंचों ने आपस में बाँट लिए. इस मामले की भी जांच अभी चल रही है.

इसी तरह की एक घटना कैथल के पंचायत विभाग में भी सामने आई. कैथल में सफाई का ठेका विभाग की तरफ से एक कंपनी को दिया गया. इस ठेके में 5 करोड़ से अधिक का घोटाला सामने आया है.

सिरसा में पौने चार करोड़ का स्ट्रीट लाइट घोटाला और हिसार व भिवानी जिले में भी विकास कार्यों में करोड़ों रुपये के घोटाले हुए हैं. भिवानी के नगर परिषद के अनेकों कर्मचारियों को तो जेल में जाना पड़ा है.

इस सब पर विकास एवं पंचायत मंत्री, देवेंदर सिंह बबली ने मीडिया को बताया, “मैंने अधिकारियों को कह दिया था कि विभाग में धांधली नहीं चलेगी. सिस्टम में 10 प्रतिशत लोग भ्रष्ट हैं, जो पूरे विभाग को बदनाम कर रहे हैं. पंचायत विभाग में ‘ऑपरेशन क्लीन’ शुरू हो चुका है. मुख्यमंत्री के निर्देशों पर विभाग को चुस्त-दुरुस्त किया जाएगा. पंचायती जमीनों की बोली के पैसों में धांधली सामने आई है. पूरे प्रदेश का रिकार्ड तलब किया है. इसकी जांच होगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.”