लखीमपुर हिंसा के अहम गवाह पर जानलेवा हमला

भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के जिला अध्यक्ष और लखीमपुर हिंसा के गवाह दिलबाग सिंह संधू पर दो अज्ञात लोगों ने हमला कर दिया. दिलबाग सिंह पर हमला मंगलवार 31 मई की रात को गोला कोतवाली क्षेत्र के बदेहड़ गांव के पास हुई. लेकिन दिलबाग सिंह हमलावरों के हमले से बाल बाल बच गए.

बता दें दिलबाग सिंह संधू पिछले साल हुई 3 अक्टूबर की लखीमपुर हिंसा के मुख्य गवाह हैं जिसमें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी का बेटा आशीष मिश्रा टेनी मुख्य आरोपी है.

एक वायरल वीडियो में दिलबाग सिंह ने बताया कि उन पर यह हमला रात को 9.30 बजे तब हुआ जब वह अपने दो दोस्तों, जीतेन्द्र और विपिन को उनके घर, गांव बदेहड़ में छोड़ कर अपने घर लौट रहे थे. तभी उनकी गाड़ी के पीछे दो लोग बाइक पर आए. उन्होंने दिलबाग सिंह की कार पर गोलियां चलाईं जिससे उनकी गाड़ी का एक टायर फट गया. दिलबाग सिंह ने अपनी कार रोकी और हमलावर उनके पास आए और उनकी गाड़ी का दरवाज़ा खोलने का प्रयास करने लगे. जब वे दरवाजा नहीं खोल सके तो उन्होंने फिर दो गोलियां चलाईं, जिसके बाद वह भाग गए.

उन्होंने बताया कि हमलावरों की मंशा भांपते हुए उन्होंने ड्राइविंग सीट को मोड़ दिया और नीचे की ओर झुक गए. क्योंकि विंडो पर काली फिल्म चढ़ी थी और बाहर से कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, इसलिए हमलावर गाड़ी में उनकी हालत देख नहीं सके और अपनी बाइक पर भाग निकले.

दिलबाग सिंह ने कहा कि उन्होंने अपने आधिकारिक गनमैन को छुट्टी पर भेज दिया था क्योंकि उसका बेटा अचानक बीमार पड़ गया था. सिंह ने इस हमले के तुरंत बाद गोला कोतवाली थाना में शिकायत दर्ज कराई और इस घटना के बारे में भारतीय किसान यूनियन (टिकैत) के प्रवक्ता राकेश टिकैत को जानकारी दे दी है.

इस मामले पर गांव सवेरा से बात करते हुए गोला थाना के सीओ संजय नाथ तिवारी ने बताया कि दिलबाग सिंह की शिकायत पर उन्होंने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की संबंधित धाराओं के तहत अज्ञात के नाम एफआईआर दर्ज की है और फॉरेंसिक टीम को घटनास्थल पर भेजा गया है. उन्होंने कहा कि पुलिस इस मामले की जांच कर रही है और हमलावरों की पहचान करने का प्रयास जारी है.

इस घटना पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर बीजेपी सरकार पर हमला बोला है. उन्होंने ट्वीट करके कहा “लखीमपुर किसान नरसंहार घटना में किसानों की न्याय की आवाज बने लोगों पर गोली चलाने वाले ये कौन लोग हैं? ये किसके सरंक्षण में काम कर रहे हैं? क्या बीजेपी सरकार ‘बुलेटराज’ बनाने वाले इन लोगों पर कानून व्यवस्था का बुलडोजर चलाएगी?”

दिलबाग सिंह संधू पर हुए इस हमले से 1 दिन पहले सोमवार को किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत पर बेंगलुरू में एक कार्यक्रम के दौरान स्याही फेंकी गई थी. राकेश टिकैत बेंगलुरू के प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे. जिस समय टिकैत प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले थे, उसी समय एक अज्ञात शख्स ने उनके ऊपर स्याही फेंक दी. इसके बाद राकेश टिकैत के समर्थकों ने भी स्याही फेंकने वाले शख्स को पकड़ लिया और प्रेस क्लब में धक्का मुक्की हुई. राकेश टिकैत पर स्याही फेंकने वाले लोग इस दौरान ‘मोदी-मोदी’ के नारे भी लगा रहे थे.

हरियाणा पंचायत चुनाव में अति पिछड़ा वर्ग(बीसी-A) आरक्षण का पूरा मामला क्या है?

हरियाणा सरकार द्वारा पंचायती राज एक्ट में संशोधन कर 7 दिसम्बर 2020 को नोटिफिकेशन जारी किया गया. इस नोटिफिकेशन के तहत ग्राम पंचायत, ब्लॉक समिति, और जिला परिषद में अति पिछड़ा वर्ग(बीसी-A) को 8 % आरक्षण देना सुनिश्चित किया गया और 29 नवम्बर 2020 को कोरोना काल में हिसार के गवर्नमेंट कॉलेज के मैदान में एक वर्चुअल रैली के माध्यम से हरियाणा के डिप्टी स्पीकर रणबीर गंगवा की अध्यक्षता में इस 8 % आरक्षण की घोषणा की गई. भाजपा और जजपा सरकार ने इस कानून के नाम पर खूब वाहवाही लूटी खुद को पिछड़ों के सच्चे हितैषी के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया. अति पिछड़ों में भी एक उम्मीद जगी की अब पंचायती राज में उनकी भी भागीदारी होगी. हरियाणा में कुल 6443 गांव हैं और इस नोटिफिकेशन की वजह से 500 के करीब सरपंच अति पिछड़ा वर्ग(बीसी-A) से बनते भी.

लेकिन इसके कुछ समय बाद इस कानून को हाई कोर्ट में चुनौती दे दी गई और कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी. अब हरियाणा के पंचायत चुनाव अति पिछड़ों को आरक्षण दिए बिना करवाए जाएंगे.

कोर्ट में किस पहलू पर चुनौती दी गई थी?

रेवाड़ी से याचिकाकर्ता राम किशन द्वारा इस संशोधन के खिलाफ याचिका दायर की गई. चीफ जस्टिस ऑफ हाई कोर्ट श्री रवि शंकर झा और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच पर इस केस की सुनवाई चल रही है. याचिकाकर्ता के वकील द्वारा इस संशोधित अधिनियम को संविधान का उल्लंघन बताया.

उन्होंने सवाल किया कि बिना पिछड़े वर्ग की जनगणना के किस आधार पर पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का प्रावधान किया गया?

पिछड़ा वर्ग आयोग के पास पिछड़ा वर्ग के आंकड़े ही नहीं हैं. 2011 की जनगणना में शेड्यूल कास्ट और सामान्य श्रेणी के आंकड़े तो लिए गए लेकिन पिछड़े वर्ग के आंकड़े ही नहीं लिए गए. तो ऐसा कौनसा पैमाना अपनाया गया जिसके आधार पर पिछड़ा वर्ग को 8 % आरक्षण का प्रावधान किया गया. इसी को केस का आधार बना कर हरियाणा सरकार के इस नोटिफिकेशन को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी.

कोर्ट ने क्या फैसला दिया है?

हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस श्री रवि शंकर झा और अरुण पल्ली की बेंच ने याचिकाकर्ता के आधार को सही माना. 10 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने सुरेश महाजन बनाम मध्यप्रदेश सरकार वाले केस में फैसला दिया था. जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने पिछड़ा वर्ग को मध्य प्रदेश में नगर पालिका के चुनावों में आरक्षण के प्रावधान पर रोक लगाते हुए कहा था कि कोई भी राज्य बिना ट्रिपल टेस्ट के राजनीति में आरक्षण का प्रावधान नही कर सकता है. जबकि नौकरियों और एडमिशन प्रक्रिया में मंडल कमीशन के तहत आरक्षण का प्रावधान निर्धारित है.

इसी फैसले को आधार बना कर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में अंतरिम राहत देते हुए हरियाणा सरकार को निर्देश दिया गया के मौजूदा पंचायत चुनाव बिना आरक्षण के कराया जाए.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 10 मई के अपने फैसले को बदलते हुए 19 मई को मध्यप्रदेश के फैसले को सही मानते हुए आरक्षण के तहत चुनाव करवाने की सहमति दे दी है. लेकिन अभी तक हरियाणा सरकार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय के इस नए फैसले को आधार बनाते हुए उच्च न्यायालय में कोई पुनर्विचार याचिका नहीं डाली गई है.

ट्रिपल टेस्ट क्या है?

किसी भी राज्य में किसी भी आरक्षण की सीमा को निर्धारण करने में ट्रिपल टेस्ट एक जरूरी एवं लंबी प्रक्रिया है. इस टेस्ट में तीन स्तर होते हैं:

1.   राज्य में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन करना.

2.   आयोग द्वारा सर्वे करवाकर संबंधित वर्ग के आंकड़े इकट्ठे करना.

3.   इन आंकड़ों के आधार पर सिफ़ारिश करना. जैसे कि कितना आरक्षण देना है, वह क्यों जरूरी है, इस से समाज में क्या प्रभाव पड़ेगा आदि.

किसी भी राज्य के भीतर अगर पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का प्रावधान करना है या कोई योजना लागू करनी है तो राज्यों के पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिश या अनुशंसा के बिना लागू नहीं किया जा सकता. परन्तु हरियाणा में तो 2019 में पिछड़ा वर्ग आयोग ही भंग कर दिया गया. उसके बाद से आयोग का गठन भी नहीं किया गया. ट्रिपल टेस्ट का पहला कदम ही आयोग का गठन है. जब आयोग ही नहीं है तो आंकड़ें कहाँ से आएंगे?

ट्रिपल टेस्ट के आखरी जटिल प्रक्रिया के अंतर्गत आयोग को ये ध्यान रखना होता है के अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के पक्ष में आरक्षित कुल सीटों का 50 % से अधिक नही होगा.

 इसमें सरकार की क्या भूमिका है?

सरकार की ओर से महाधिवक्ता बी आर महाजन एवं दीपक बाल्यान इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखने में नाकामयाब रहे क्योंकि हरियाणा सरकार के पास 2011 की जनगणना के अंतर्गत पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या के आंकड़े ही नही हैं.

लंबे समय से पिछड़ा वर्ग के विभिन संगठनों की मांग रही है कि पिछड़ा वर्ग की जन गणना की जाए. ताकि आवंटित बजट का योजनबद्ध तरीके से इस्तेमाल किया जा सके पिछड़े वर्ग की गिनती हो सके. परन्तु ऐसा करने की बजाय सरकार ने 2019 में पिछड़ा वर्ग आयोग को ही भंग कर दिया और आज तक पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन नही किया गया.

ओबीसी अधिकार मंच से जुड़े डॉ अजय प्रजापती का कहना है, “बिना आंकड़ों के कैसे इस केस में हरियाणा सरकार उच्च न्यायालय में अपना पक्ष मजबूती से रख सकती है? इससे साफ साफ नजर आता है कि पिछड़ा वर्ग को आरक्षण के नाम पर गुमराह करने के सिवाए कुछ नही हो रहा.”

इस से पहले क्रीमीलेयर के मामले में भी ऐसा हो चुका है. बिना आंकड़ों के सरकार ने क्रीमीलेयर लागू कर दिया और फिर कोर्ट में फटकार भी खानी पड़ी और अपने फैसले को भी वापस लेना पड़ा.

मुख्यमंत्री मनोहर लाल विधानसभा में एक भाषण में कहते हैं कि फ़ैमिली आईडी के जरिये सरकार ने पिछड़े वर्ग से संबंधित डाटा इकट्ठा किया है. इसमें ऐसे परिवारों की संख्या से लेकर वार्षिक आय तक का ब्यौरा हमारे पोर्टल पर उपलब्ध है. परिवार पहचान पत्र सरल पोर्टल पर बनाये गए जो कि मुख्यमंत्री जी की निगरानी में कार्य करता है. अब ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि सारा डाटा अगर सरकार के पास है तो सरकार ने यह आंकड़े कोर्ट में पेश क्यों नहीं किए? जब परिवार पहचान पत्र में शैक्षणिक योग्यता, और परिवार की आय का ब्यौरा मौजूद है तो सरकार अपने पक्ष में इन आंकड़ो को कोर्ट में रख सकती थी परन्तु नही रखे गए.

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की एक टीम 2019 में चण्डीगढ़ आई भी थी. हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ के पिछड़ा वर्ग के मुद्दों को लेकर आयोग ने सिफारिश भी की थी. आयोग ने 2021 की जनगणना में ओबीसी का कॉलम जोड़ने की भी बात की थी क्योंकि पिछड़ा वर्ग की योजनाओं को लागू करने में हर जगह दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. परन्तु हरियाणा  सरकार द्वारा इस पर अभी तक कोई भी कदम नही उठाया गया है.

पिछड़ा समाज के संगठन भी इस मुद्दे पर सक्रिय हो चुके हैं. इन संगठनों द्वारा इस फैंसले का कड़ा विरोध किया जा रहा है. 22 मई को हरियाणा के फतेहाबाद में दर्जनों पिछड़ा वर्ग के संगठनों के हजारों सदस्य इकट्ठे हुए और पंचायत चुनाव में आरक्षण के साथ-साथ बैकलॉग और ओबीसी जनगणना जैसे मुद्दों पर भी आंदोलन करने का फैसला लिया. इन संगठनों द्वारा अगला कार्यक्रम सोनीपत में किया जाएगा.

बंगाल में भाजपा के खिलाफ उतरा किसान मोर्चा, कोलकाता में जोरदार स्वागत

कृषि कानूनों के खिलाफ कई महीनों से आंदोलन कर रहे किसान नेता अब पश्चिम बंगाल और असम की चुनावी रणभूमि में उतर चुके हैं। संयुक्त किसान मोर्चा अगले तीन दिनों के दौरान पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में किसान पंचायतें कर भाजपा को वोट न देने की अपील करेगा। नंदीग्राम में 13 मार्च को होने वाली किसान महापंचायत में राकेश टिकैत, बलबीर सिंह राजेवाल, गुरनाम सिंह चढूनी, डॉ. दर्शनपाल और योगेंद्र यादव शामिल होंगे। नंदीग्राम किसान आंदोलन का पुराना गढ़ रहा है। यहीं से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव लड़ रही हैं। नंदीग्राम में किसान नेताओं का जमावड़ा ममता बनर्जी के लिए मददगार साबित हो सकता है।

कोलकाता में किसान नेताओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो चुका है। गुरुवार को कोलकता हवाई अड्डे पर किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल और गुरनाम सिंह चढूनी का जोरदार स्वागत किया गया। एयरपोर्ट पर किसान नेताओं के स्वागत के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।  

इससे पहले 10 मार्च को पंजाब और हरियाणा के किसान नेताओं ने कोलकाता में एक जनसभा कर भाजपा को वोट न देने की अपील की थी। संयुक्त किसान मोर्चा के अलावा भी पंजाब, हरियाणा और देश के अन्य राज्यों से किसानों के अलग-अलग जत्थे बंगाल और असम पहुंच रहे हैं। आज कोलकाता पहुंचे संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी रणनीति के बारे में विस्तार से बताया।

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत आज राजस्थान में हैं। वे कल बंगाल पहुंचेंगे। राकेश टिकैत का कहना है कि वे बंगाल के किसानों से जाकर पूछेंगे कि उन्हें एमएसपी मिला या नहीं। बंगाल में भी बहुत किसान हैं, उन्हें कृषि कानूनों की हकीकत बताएंगे। किसान यूनियनों के राजनीति में उतरने के सवाल पर टिकैत का कहना है कि वे किसी पार्टी के लिए वोट नहीं मांग रहे हैं, बल्कि किसानों को भाजपा सरकार की असलियत बताने जा रहे हैं।

28 जनवरी को दिल्ली बॉर्डर से किसानों के धरने हटाने की कोशिशों के बाद किसान आंदोलन एक नये दौर में प्रवेश कर चुका है। कई राज्यों में किसान पंचायतें हो रही हैं, जिनमें राजनीतिक दल बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में किसान पंचायतें करने के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने बंगाल समेत उन पांचों राज्यों में जाने का फैसला किया है, जहां विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं।

संयुक्त किसान मोर्चा से मिली जानकारी के अनुसार, आज कोलकाता के प्रेस क्लब में किसान नेताओं की प्रेस वार्ता के बाद एक वाहन रैली निकाली जाएगी। दोपहर बाद रामलीला मैदान में किसान-मजदूर महापंचायत होगी। कल 13 मार्च को नंदीग्राम और 14 मार्च को सिंगूर और आसनसोल में किसान महापंचायतें होंगी। इन कार्यक्रमों के आयोजन के लिए पश्चिम बंगाल किसान कॉर्डिनेशन कमेटी गठित की गई है।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि उसके नेता भाजपा और उसके सहयोगी दलों के खिलाफ मतदान करने की अपील करेंगे। बंगाल के अलावा किसानों के जत्थे असम भी पहुंच रहे हैं। 26 मार्च को किसान आंदोलन के चार महीने पूरे होने के मौके पर भारत बंद का ऐलान किया गया है। इस बार होली पर कृषि कानूनों की प्रतियां जलाई जाएंगी। इस तरह यह पूरा महीना किसान आंदोलन की हलचल से भरपूर रहेगा।

किसान आंदोलन को किधर ले जाएंगे राकेश और नरेश टिकैत के बयान

अपने आंसूओं से किसान आंदोलन में नई जान फूंकने वाले भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत सरकार को लगातार चुनौतियां दे रहे हैं। अब राकेश टिकैत ने 40 लाख ट्रैक्टरों के साथ संसद घेराव की चेतावनी दी है। जबकि उनके भाई भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताते हुए सरकार को उनके जरिये सुलह का रास्ता सुझाया है। सुलह और चेतावनी के इन दो सुरों के बीच किसान आंदोलन की भावी रणनीति और असमंजस के संकेत देखे जा सकते हैं।

मंगलवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने राजस्थान के सीकर में किसान महापंचायत बुलाई थी। इसमें राकेश टिकैत के अलावा स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव और अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमरा राम भी मौजूद थे। सीकर महापंचायत में मंच से किसानों को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत कहा

“कान खोलकर सुन लो दिल्ली। ये ट्रैक्टर भी वही है और ये किसान भी वही है। अबकी कॉल पार्लियामेंट की होगी। और कह के जाएंगे। पार्लियामेंट पर जाएंगे। इस बार चार लाख ट्रैक्टर नहीं होंगे, चालीस लाख ट्रैक्टर जाएंगे। अबकी बार हल क्रांति होगी।”

किसान आंदोलन में राकेश टिकैत की एंट्री थोड़ी देरी से हुई थी। वे संयुक्त किसान मोर्चा के 26 नवंबर को दिल्ली कूच से एक दिन बाद आंदोलन में शामिल हुए थे। लेकिन तब से वे संयुक्त किसान मोर्चा के साथ हैं और किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं। किसानोंं के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता के पीछे उनके ठेठ अंदाज का बड़ा हाथ है। हालांकि, उन पर किसान आंदोलन को भड़काने के आरोप भी लग रहे हैं।

26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च का ऐलान भी सबसे पहले राकेश टिकैत ने किया था। “एक तरफ जवान चलेगा, दूसरी तरफ किसान चलेगा।” और “उधर टैंक चलेगा, इधर ट्रैक्टर चलेगा” इस तरह के बयानों ने 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च का माहौल बनाया था। बाद में इसे संयुक्त किसान मोर्चा ने अपना कार्यक्रम बना लिया। इसी तर्ज पर अब राकेश टिकैत लाखों ट्रैक्टरों के साथ संसद कूच की बात कह रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंने लाल किले पर जाने से साफ इंकार किया है। सीकर में राकेश टिकैत ने हुंकार भरी

“तिरंगा भी फैलेगा और पार्लियामेंट पर फैलेगा, कान खोलकर सुन लो। ये ट्रैक्टर जाएंगे और हल के साथ जाएंगे। पार्लियामेंट के बाहर जिन पार्कों में आज से 32 साल पहले 1988 में आंदोलन हुआ था, वहां ट्रैक्टर चलेगा, वहां खेती होगी। इंडिया गेट पर जो पार्क है उसमें ट्रैक्टर चलेगा, जुताई होगी। सरकार या तो बिल वापस ले, एमएसपी पर कानून बनाये, नहीं तो दिल्ली की घेराबंदी पक्की होगी। तारीख कौनसी होगा? यह संयुक्त मोर्चा बताएगा। हमारे पंच भी यही हैं और हमारा मंच भी वही है।”

कभी आक्रामक तो कभी चुटीली बयानबाजी से आंदोलन में जोश भरना राकेश टिकैत की रणनीति का हिस्सा है। इससे वे मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं। 26 जनवरी को लालकिले की घटना के बाद जब किसानों का मनोबल और संख्याबल दोनों टूटने लगे थे, तब राकेश टिकैत ने “किसान सीने पर गोली खाएगा, किसान कहीं नहीं जाएगा” और “जब तक गांव से पानी नहीं आएगा, जल ग्रहण करूंगा” जैसी बातों से किसानों को भावुक कर दिया था।

हालांकि, कई बार अपने बयानों पर खुद राकेश टिकैत को भी सफाई देनी पड़ती है। तब वे बड़ी मासूमियत से बात टाल देते हैं। आंदोलन को 2024 तक जारी रखने, फसलों को आग लगाने और लाखों ट्रैक्टरों के साथ संसद घेरने के ऐलान पर उन्हें सफाई देनी पड़ी। लेकिन गाजीपुर बॉर्डर पर टिकैत जिस मजबूती से डटे रहे। उससे उनकी छवि धाकड़ नेता की बनी है। सरकार को ललकारने वाले उनके बयान इस छवि को पुख्ता करते हैं। इसलिए भी वे रोजाना कुछ न कुछ सुर्खियां बटोरने वाला कह डालते हैं। ऐसा करते हुए टिकैत की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि वे हरियाणा और राजस्थान में बड़ी-बड़ी किसान पंचायतें कर रहे हैं।  

अब जबकि दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन को तीन महीने बीत चुके हैं। सरकार के साथ आखिरी वार्ता हुए भी एक महीने से ज्यादा गुजर चुका है तो किसान आंदोलन की धार बनाये रखना बड़ी चुनौती है। यहां टिकैत काम आते हैं। यह बात संयुक्त किसान मोर्चा भी समझता है। शायद इसीलिए टिकैत के बयानों पर संयुक्त किसान मोर्चा कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि उन्हें अपनी सभाओं और प्रेस वार्ताओं में बुलाता है।

किसान आंदोलन को हरियाणा-पंजाब से बाहर फैलाने में टिकैत अहम भूमिका निभा रहे हैं। महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत और भाकियू के बड़े संगठन से उन्हें मदद मिल रही है। खासतौर पर सरदार वीएम सिंह के संयुक्त किसान मोर्चा से अलग होने के बाद किसान आंदोलन को व्यापक और एकजुट बनाये रखने के लिए टिकैत बंधुओं की जरूरत है। यही वजह है कि किसान आंदोलन के बाकी नेता आंदोलन में उभरते नये शक्ति केंद्र और राकेश टिकैत की बयानबाजी से असहज होने के बावजूद इस पर कुछ बोलने से बचते हैं।

संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 23 मार्च को शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस पर दिल्ली कूच या संसद घेराव की रणनीति का ऐलान हो सकता है। इसकी रूपरेखा तय होनी बाकी है। संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल ऑल इंडिया किसान सभा के राजस्थान में संयुक्त सचिव संजय माधव का कहना है कि संसद मार्च की योजना पहले एक फरवरी को बनी थी, जिसे 26 जनवरी की घटना के बाद स्थगित कर दिया गया था। राकेश टिकैत ने संसद घेराव की जो बात कही है, उस पर भी विचार किया जाएगा। आंदोलन की भावी रणनीति का ऐलान 28 फरवरी को होगा।

एक तरफ जहां राकेश टिकैत संसद घेराव की चेतावनी दे रहे हैं, वहीं भाकियू के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने सुलह का रास्ता सुझाया है। नरेश टिकैत ने कहा कि राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। उनकी बहुत शर्म-लिहाज है। हम भी उन पर विश्वास करते हैं। लेकिन उन्हें पिंजरे के तोते की तरह कैद कर रखा है। अगर उन्हें किसानों से बात करने की आजादी दी जाए तो एक दिन या एक घंटे में आंदोलन का फैसला हो जाएगा। लेकिन राजनाथ सिंह सरकार के शिकंजे में हैं। वे सरकार से बाहर नहीं बोल सकते।

लगता है बयानों से सुर्खियां बटोरने वाला फार्मूला नरेश टिकैत भी आजमाने लगे हैं। नरेश टिकैत का बयान खाप पंचायतों द्वारा आंदोलन का हल निकालने की कोशिशों के तौर पर भी देखा जा सकता है। इससे पहले भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में भी खाप पंचायतों से बातचीत के प्रयास किये थे, लेकिन तब खुद नरेश टिकैत ने भाजपा नेताओं से मिलने से इंकार कर दिया था। इसके बावजूद केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान खाप चौधरियों से मिलने पहुंचे तो उनकी खिलाफ नारेबाजी हुई जो अगले दिन हिंसक टकराव में बदल गई।

राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताकर नरेश टिकैत ने भाजपा की अंदरुनी राजनीति पर भी निशाना साधा है। साथ ही कृषि मंत्री से इतर किसी दूसरे नेता के जरिये सुलह का संकेत भी दिया है। वैसे, टिकैत बंधु राजनाथ सिंह के नजदीक माने जाते हैं और उनके साथ मंच साझा कर चुके हैं। लेकिन जिस अंदाज में नरेश टिकैत ने राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताया है, उससे यह सुझाव कम तंज ज्यादा हो गया है और सरकार शायद ही इसे स्वीकार करे।

संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े हरियाणा के बड़े किसान नेता गुरनाम सिंह चडूनी का कहना है कि राकेश टिकैत ने संसद घेराव की बात अपनी तरफ से कही है। इस बारे में संयुक्त किसान मोर्चा ने अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। इसी तरह राजनाथ सिंह के जरिये सुलह का सुझाव भी नरेश टिकैत का व्यक्तिगत सुझाव है। चडूनी का कहना है कि टिकैत किसान आंदोलन में शामिल हैं, लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा का हिस्सा नहीं हैं।

राकेश टिकैत के सहयोगी और भाकियू के मीडिया प्रभारी धर्मेंद्र मलिक का कहना है कि आंदोलन को मजबूत भी करना है और बातचीत का रास्ता भी निकालना है। राकेश टिकैत और नरेश टिकैत के हालिया बयानों को इसी संदर्भ देख जाना चाहिए। लेकिन इस बारे में अंतिम निर्णय संयुक्त किसान मोर्चा लेगा। राकेश टिकैत ने भी अपना मंच और पंच संयुक्त किसान मोर्चा को ही बताया है।

सामूहिक नेतृत्व इस किसान आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत है तो एक बड़ी चुनौती भी। एक नई चुनौती किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरे के तौर पर किसी एक नेता का उभरना भी है। संयुक्त किसान मोर्चा के अलावा भी आंदोलन में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसान संगठन शामिल हैं। 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्चा के दौरान हुई हिंसा के बाद सबसे ज्यादा गिरफ्तारियां पंजाब के आंदोलनकारियों की हुई थी। तब संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली हिंसा से किनारा करते हुए दीप सिद्धू के साथ-साथ सतनाम सिंह पन्नू के नेतृत्व वाली किसान मजदूर संघर्ष कमेटी से पल्ला झाड़ लिया था। आंदोलन की आगामी रणनीति पर इसका असर भी पड़ेगा।

पिछली बार ट्रैक्टर मार्च के दौरान जो कुछ हुआ, उसे देखते हुए संसद घेराव की चेतावनी पर सहमति बनाना आसान नहीं है। लेकिन जब तक मामला किसी निर्णायक स्थिति में पहुंचता है, तब तक टिकैत बंधु अपने बयानों से आंदोलन को चर्चाओं में जरूर बनाये रखेंगे।

खेतों तक पहुंचा किसान आंदोलन, किसान ने खड़ी फसल जोत डाली

केंद्र के तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान विरोध-प्रदर्शन के नए-नए तरीके आजमा रहे हैं। बिजनौर के एक किसान ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जताते हुए अपनी खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाकर दिया।

बिजनौर की चांदपुर तहसील के गांव कुल्चाना निवासी किसान सोहित ने छह बीघा खेत में खड़ी गेहूं की फसल जोत दी है। उसका कहना है कि सरकार किसान की सुनने को तैयार नहीं है। फसल मिट्टी में मिलाने के बाद किसान का कहना है कि वह आंदोलन के समर्थन में दिल्ली बॉर्डर पर जाएगा।

किसान सोहित ने बताया कि उसके पास 13 बीघे गेहूं की फसल थी। जिसमें से सात बीघा छोड़कर बाकी छह बीघा गेहूं को खेत में ही जोत दिया है। भाकियू युवा के प्रदेश अध्‍यक्ष दिगम्‍बर सिंह ने बताया कि किसान भाकियू का कार्यकर्ता है। वे किसानों को आवेश में इस तरह का कोई कदम न उठाने के लिए समझा रहे हैं।

गौरतलब है कि कल भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने किसानों को एक फसल की कुर्बानी देने के लिए तैयार रहने को कहा था। इससे पहले हरियाणा के खरक पुनिया में किसान महापंचायत को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत ने कहा था कि सरकार ऐसी गलतफहमी में न रहे कि किसान फसल काटने के लिए वापस चले जाएंगे। अगर सरकार ने दबाव बनाया तो हम अपनी फसल को आग लगा देंगे।

राकेश टिकैत ने शनिवार को फिर दोहराया कि जब तक बिल वापसी नहीं, तब तक घर वापसी नहीं। उन्होंने कहा कि खेतों में भी काम प्रभावित ना हो, इसके लिए रणनीति तैयार कर ली है। किसान बारी-बारी से आंदोलन स्थल पर आते-जाते रहेंगे। जो किसान आंदोलन में रहेगा, गांव वाले उसके खेत और काम का पूरा ध्यान रखेंगे। टिकैत ने किसानों से कहा है कि कृषि कार्य के दबाव में आंदोलन को ठंडा न होने दें।

अभी सिर्फ तैयार रहे, फसल नष्ट न करें: राकेश टिकैत

बिजनौर में एक किसान द्वारा फसल नष्ट जाने के सवाल पर राकेश टिकैत ने कहा कि ऐसा करना ठीक नहीं है। हमने अभी केवल आह्वान किया है कि किसान आंदोलन के लिए अपनी एक फसल कुर्बान करने को तैयार रहें। इसका मतलब यह नहीं है कि फसल में आग लगा दें, नहीं। आंदोलन के लिए जरूरत पड़ी तो फसल का मोह छोड़ने को तैयार रहें। हालांकि, अभी आंदोलन उस स्थिति में नहीं है। यह आह्वान बहुत विपरीत स्थिति के लिए किया गया था। उन्होंने किसानों से अपील की है कि आवेश में आकर कोई आत्मघाती कदम न उठाएं।

कृषि कानूनों पर स्टे के बावजूद क्यों पीछे हटने को तैयार नहीं किसान?

कृषि कानूनों और इनके विरोध में चल रहे किसान आंदोलन से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया। सुप्रीम कोर्ट ने तीनों कृषि कानूनों के अमल पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। इसके अलावा कृषि कानूनों पर किसानों और सरकार का पक्ष जानने के लिए चार सदस्यों की एक समिति भी गठित की है।

इस समिति में अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, पीके जोशी, किसान नेता भूपेंद्र सिंह मान और अनिल घनवट को शामिल किया गया है। ये नाम सुप्रीम कोर्ट के पास कहां से आये? यह तो मालूम नहीं है, लेकिन ये चारों कृषि कानूनों का समर्थन करते हैं। ऐसे सदस्यों के चयन से आंदोलनकारी किसानों और सरकार के बीच विश्वास का संकट और ज्यादा गहरा गया है। यही वजह है कि कृषि कानूनों पर स्टे को भी वे संदेह की नजर से देख रहे हैं और आंदोलन जारी रखने का ऐलान किया है।

अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी. रामारामासुब्रमण्यम की पीठ ने कहा कि हम एक शांतिपूर्ण आंदोलन को दबाना नहीं चाहेंगे। हमें लगता हैं कि कृषि कानूनों के अमल पर रोक के आदेश को आंदोलन की उपलब्धि के तौर पर देखा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने उम्मीद जताई है कि इस आदेश के बाद किसान यूनियनें अपने लोगों को वापस जाने के लिए समझाएंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। किसान यूनियनों ने कृषि कानूनों के अमल पर रोक के आदेश पर संतोष तो जाहिर किया है, लेकिन इसे अपनी जीत मानने और पीछे हटने से साफ इंकार कर दिया है।

भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने असलीभारत.कॉम को बताया कि वे सुप्रीम कोर्ट का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन किसान आंदोलन की दो ही प्रमुख मांगें हैं। तीनों कृषि कानूनों की वापसी और एमएसपी की कानूनी गारंटी। इन मांगों के पूरा किये बगैर किसान घर वापस नहीं जाएंगे।

राकेश टिकैत ने सरकार पर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जो अशोक गुलाटी कृषि कानून बनवाने वाली समिति में शामिल थे, वे क्या सुनवाई करेंगे। इस ‘सरकारी’ समिति से बात करने से अच्छा है, सरकार से ही बात की जाये। टिकैत ने ऐसे किसान नेताओं को समिति में शामिल करने पर भी निराशा जताई, जिसका किसान आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में एमएसपी की व्यवस्था को कायम रखने और कृषि कानूनों के जरिये किसानों को जमीन से बेदखल नहीं करने का भी आदेश दिया है। साथ ही किसान आंदोलन पर भी किसी तरह की कोई रोक नहीं लगाई है। फिर भी आंदोलनकारी किसान इसे अपनी जीत नहीं मान रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह कृषि कानूनों पर बनी समिति और विश्वास का संकट है। इसके अलावा जिस तरह यह मामला आंदोलनकारी किसान यूनियनों की मर्ज़ी के विपरीत सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, उसे लेकर भी किसान नेता आशंकित हैं।

समिति में शामिल अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी और पीके जोशी कृषि कानूनों के पक्ष में खुलकर अपनी राय जाहिर कर चुके हैं। ये दोनों सरकारी खरीद बढ़ाने और एमएसपी की कानूनी गारंटी के खिलाफ भी लिखते रहे हैं। समिति के अन्य सदस्य बीकेयू के भूपिंदर सिंह मान और शेतकारी संगठन के अनिल घनवट भी कुछ सुधारों के साथ कृषि कानूनों को लागू करने के पक्ष में हैं। यानी समिति के चारों सदस्य कृषि कानूनों के पैरोकार हैं। समिति में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो आंदोलनकारी किसानों का प्रतिनिधित्व करता हो या निष्पक्ष माना जाये। संयुक्त किसान मोर्चा ने अफसोस जताया कि देश के सुप्रीम कोर्ट में अपनी मदद के लिए बनाई समिति में एक भी निष्पक्ष व्यक्ति नहीं रखा है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, चार सदस्यों की यह समिति कृषि कानूनों पर किसानों और सरकार का पक्ष सुनने के बाद दो महीने के अंदर अपनी रिपोर्ट देगी। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एसए बोबडे ने कहा कि यह समिति मध्यस्थता नहीं करेगी। हम मामले को हल करना चाहते हैं। इसलिए समिति गठित की है, ताकि हमारे सामने तस्वीर स्पष्ट हो सके। चीफ जस्टिस ने यहां तक कहा कि आप अनिश्चितकाल तक आंदोलन करना चाहता है तो कर सकते हैं। लेकिन हम यह तर्क नहीं सुनना चाहते कि किसान समिति के पास नहीं जाएंगे। जो लोग वाकई इस मसले का हल चाहते हैं, उन्हें समिति के समक्ष जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति से जुड़े योगेंद्र यादव ने रेशम का फंदा करार देते हुए संघर्ष जारी रखने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि एक तरफ सरकार किसानों से वार्ता कर रही है और दूसरी तरफ कर रही है कि अब मामला कोर्ट में सुलझेगा। इससे संदेह पैदा होता है कि सरकार जो काम विज्ञान भवन में नहीं कर पा रही है, कहीं ये उम्मीद तो नहीं कर रही कि वो काम सुप्रीम कोर्ट कर देगा।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले ही संयुक्त किसान मोर्चा ने किसी प्रकार की मध्यस्थता से इंकार करते हुए समिति के समक्ष जाने से मना कर दिया था। कोर्ट के फैसले के बाद संयुक्त किसान मोर्चा नेे बयान जारी कर कहा कि हमने मामले में मध्यस्थता के लिए सुप्रीम कोर्ट से प्रार्थना नहीं की है और ऐसी किसी कमेटी से हमारा कोई संबंध नहीं है। चाहे यह कमेटी कोर्ट को तकनीकी राय देने के लिए बनी है या फिर किसानों और सरकार में मध्यस्थता के लिए।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि किसान आंदोलन इन तीन कानूनों के स्थगन नहीं इन्हें रद्द करने के लिए चलाया जा रहा है। इसलिए केवल इस स्टे के आधार पर अपने कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं कर सकते। किसान आंदोलन जारी रहेगा और इस साल लोहड़ी कृषि कानूनों की प्रतियां जलाकर मनाएंगे।