मोदी सरकार की नई परिभाषा से अरावली का 90% क्षेत्र पहाड़ी नहीं, विशेषज्ञों ने जताई गंभीर पर्यावरणीय चिंता!
सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा के बारे में पर्यावरण मंत्रालय की एक समिति की सिफारिशें मंज़ूर कर लीं हैं. इन सिफारिशों के मुताबिक, जिस भी भू-आकृति की ऊंचाई आसपास की ज़मीन से 100 मीटर या उससे अधिक होगी, उसे उसकी ढलानों और आसपास के क्षेत्र सहित अरावली पहाड़ियों का हिस्सा माना जाएगा.
समिति ने कोर्ट के सामने यह बात स्पष्ट नहीं की कि इस परिभाषा के अनुसार अरावली की 90% से अधिक पहाड़ियां अरावली के दायरे से बाहर हो जाएंगी. इससे उन क्षेत्रों में खनन और निर्माण को रास्ता मिल सकता है, जिसके गंभीर पर्यावरणीय असर होंगे, खासकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में हवा की गुणवत्ता पर.
इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) के एक आंतरिक मूल्यांकन के अनुसार, राजस्थान के 15 जिलों में फैले 12,081 अरावली के वे पहाड़/टीलें जो 20 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई के हैं, उनमें से सिर्फ 1,048 (यानी केवल 8.7%) ही 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचे हैं.
20 मीटर की ऊंचाई का मानक इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इतनी ऊंचाई वाले पहाड़ हवा को रोकने के लिए एक प्राकृतिक अवरोध (विंड बैरियर) की भूमिका निभाते हैं.
ज्ञात हो कि अरावली पर्वतमाला दिल्ली से उत्तर में शुरू होकर हरियाणा और राजस्थान से गुजरते हुए दक्षिण में गुजरात तक फैली हुई है.
पुराने मानकों की अनदेखी
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कहा था कि अरावली की एक समान परिभाषा तैयार करे. 2010 से, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) अरावली पहाड़ियों को परिभाषित करने के लिए 3-डिग्री ढलान का मानक इस्तेमाल कर रहा था.
इसी उद्देश्य से 2024 में बनाई गई एक तकनीकी समिति ने इस मानक में बदलाव किया और सुझाव दिया कि जिस भौगोलिक संरचना में कम से कम 4.57 डिग्री की ढलान हो और ऊंचाई कम से कम 30 मीटर हो, उसे अरावली पहाड़ी माना जाना चाहिए. इन मानकों से लगभग 40% अरावली क्षेत्र को कवर किया जा सकता था.
लेकिन इसके बावजूद, मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को अपनी हलफनामे में एक बिना हस्ताक्षर वाली रिपोर्ट के ज़रिये 100 मीटर वाली परिभाषा ही सुझाई. मंत्रालय ने नई परिभाषा को सही ठहराने के लिए ढलान और ऊंचाई के मापदंडों को आपस में मिला दिया और कुछ ऐसे सब्जेक्टिव ऊंचाई मानक पेश किए, जिनके बारे में विशेषज्ञों का कहना है कि इससे 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली कई पहाड़ियां भी अरावली की श्रेणी से बाहर हो सकती हैं.
विशेषज्ञ चिंतित क्यों?
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक़, अरावली को 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियां मानने वाली केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार किए जाने से पर्यावरण विशेषज्ञों में चिंता बढ़ गई है. उन्हें आशंका है कि भविष्य में इस परिभाषा का इस्तेमाल दूसरे मामलों में भी किया जा सकता है.
उदाहरण के तौर पर, एनसीआर मास्टर प्लान (रीजनल प्लान 2041) का नया ड्राफ्ट अभी अंतिम रूप नहीं पाया है. अरावली को कैसे परिभाषित किया जाएगा, यह बहुत महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि उसी पर निर्भर करेगा कि प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्रों (NCZ) को कितनी सुरक्षा मिलेगी.
विशेषज्ञों ने कहा कि यह संभव है कि एनसीआर के सदस्य राज्य सुप्रीम कोर्ट द्वारा खनन के संदर्भ में स्वीकार की गई 100 मीटर वाली परिभाषा का हवाला देते हुए यह दलील दें कि इसे प्लानिंग और रियल एस्टेट ज़ोनिंग में भी लागू किया जाना चाहिए.
पूर्व वन संरक्षक आरपी बलवान का कहना है, ‘यह तो एक बड़े ख़तरे की शुरुआत होगी. गुड़गांव और फरीदाबाद में अरावली संरक्षण के ख़िलाफ़ काम करने वाली ताक़तें इस परिभाषा का इस्तेमाल करके और ज़्यादा रियल एस्टेट गतिविधियों को अनुमति देने की कोशिश करेंगी, और संरक्षण तथा वन्यजीव सुरक्षा की ज़रूरत पूरी तरह अनदेखी कर दी जाएगी.’
बलवान ने आगे कहा कि गुड़गांव की 95% और फरीदाबाद की 90% अरावली पहाड़ियां इस नई परिभाषा में फिट नहीं बैठेंगी. छोटी पहाड़ियों को बाहर कर देने का मतलब यह होगा कि झाड़ीदार पहाड़ियों, घास के मैदानों और रिज क्षेत्रों के बड़े हिस्से पारिस्थितिक संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगे.
हरियाणा में सेवानिवृत्त वन संरक्षक एमडी सिन्हा ने अख़बार से कहा कि ऊंचाई के आधार पर अरावली को परिभाषित करने का विचार ही ‘वैज्ञानिक और तर्कसंगत नहीं’ है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट अरावली को गुजरात से दिल्ली तक फैली एक सतत भूवैज्ञानिक श्रृंखला मान चुका है.
सिन्हा ने कहा कि 100 मीटर का फ़िल्टर लगने से एनसीआर में अरावली लगभग मिट जाएगी, ‘दिल्ली में 100 मीटर से ऊपर कोई क्षेत्र ही नहीं है. अगर यही परिभाषा बना दी गई, तो अरावली का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा. और यह मूल रूप से अवैज्ञानिक है. क्या हम शिवालिक, हिमालय या गंगा नदी को भी ऐसे मनमाने पैमानों से परिभाषित करेंगे? अगर किसी जगह गंगा थोड़ा संकरी हो जाए तो क्या वह गंगा होना बंद कर देती है?’
साभार: द वायर
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