हरियाणा में फिर टले पंचायत चुनाव, अब नवंबर के बाद होंगे चुनाव!

हरियाणा में पंचायत चुनाव और आगे टल गए हैं. पंचायत चुनाव अब नवंबर के बाद होने की संभावना है. प्रदेश सरकार की ओर से आरक्षित सीटों का ब्योरा नहीं दे पाने के कारण पंचायत चुनाव टले हैं. राज्य चुनाव आयोग ने आरक्षित सीटों पर डेटा की कमी का हवाला देते हुए 30 सितंबर तक चुनाव कराने में असमर्थता जाहीर की है. चुनाव आयोग ने विकास एवं पंचायत विभाग को पत्र लिखकर 22 सितंबर तक आरक्षित सीटों का ब्योरा मुहैया कराने की बात कही है. ऐसे में अगर पंचायत विभाग 22 सितंबर तक चुनाव आयोग को जानकारी नहीं दे पाया तो 30 सितंबर तक चुनाव होने की कोई संभावना नहीं है.

वहीं पंचायत विभाग द्वारा अब तक आरक्षित सीटों का पूरा ब्योरा देने के चलते राज्य चुनाव आयोग ने भी सरकार को जानकारी देते हुए 30 सितंबर तक चुनाव करवाने में असमर्थता जाहिर की है. बता दें कि राज्य सरकार ने इस साल जुलाई में एक अधिसूचना जारी की थी जिसके अनुसार राज्य चुनाव आयोग को 30 सितंबर तक पंचों, सरपंचों और पंचायत समितियों और जिला परिषदों के सदस्यों के आम चुनाव कराने थे.

बता दें कि पंचायती राज चुनाव फरवरी 2021 में होने थे. बीसी-ए आरक्षण, महिलाओं के लिए 50 फीसदी सीटें, सम-विषम आधार पर सीटें आरक्षित करने को लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न याचिकाएं विचाराधीन होने के कारण चुनाव टलते गए. इसी साल मार्च-अप्रैल में हाईकोर्ट ने चुनाव को हरी झंडी दी थी जिसके बाद सरकार ने राज्य चुनाव आयोग को चुनाव कराने की तैयारी करने के निर्देश दिए थे. जिसके बाद सितंबर के आखिर तक चुनाव कराने की समय सीमा भी तय की गई थी लेकिन अब पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा बीसी-ए को आरक्षण देने संबंधी रिपोर्ट सरकार को सौंपने के कारण मुख्य देरी हो रही है.

CBI को सौंपी सोनाली फोगाट केस की जांच, पिछले महीने गोवा में हुई थी मौत!

बीजेपी नेता सोनाली फोगाट की मौत के मामले की जांच अब सीबीआई को सौंपी गई है. केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के बाद सोनाली फोगाट की मौत की जांच अब सीबीआई करेगी. सोनाली फोगाट की मौत के मामले में परिवार की ओर से लगातार सीबीआई जांच की मांग की जा रही थी.

वहीं हरियाणा के हिसार में खाप महापंचायत में खाप प्रतिनिधियों ने भी इस मामले में सीबीआई जांच की मांग की थी. खाप महापंचायत में सरकार को अल्टीमेटम दिया था कि सोनाली हत्याकांड की जांच सीबीआई को 23 सितंबर तक नहीं सौंपने पर आंदोलन तेज किया जाएगा.

बता दें कि सोनाली फोगाट को गोवा पहुंचने के एक दिन बाद 23 अगस्त को एक अस्पताल में मृत अवस्था में लाया गया था. वहीं गोवा पुलिस ने हत्या के आरोप में अब तक सुधीर सांगवान, सुखविंदर सिंह को गिरफ्तार किया है. सोनाली फोगाट के भाई रिंकू ढाका ने कहा कि अगर सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश करने का फैसला किया होता, तो खाप महापंचायत आयोजित करने की कोई जरूरत नहीं होती. रिंकू ढाका ने कहा कि उनका परिवार गोवा पुलिस की जांच से संतुष्ट नहीं है.

मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने पहुंच रहे हजारों किसान!

किसान आए दिन अपनी मांगों को लेकर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में सक्रिय दिखाए देते हैं आज भी हजारों की संख्या में किसान सीएम निवास का घेराव करने के लिए पंचकूला में जुटे. किसान जुमला मालिकान, देह शामलात और पट्टी शामलात जमीनों के अधिग्रहण के नये नियम को रद्द करने, नारायणगढ़ चीनी मील के गन्ना किसानों के 62 करोड़ बकाया का भुगतान करने, धान की फसल में बौनेपन की बीमारी के कारण हुए नुकसान के मुआवजे और लंपी वायरस बीमारी के कारण पशुपालकों के नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजे की मांग को लेकर मुख्यमंत्री आवास घेरने पहुंचे.

किसान संगठन बीकेयू शहीद भगत सिंह की अगुवाई में अंबाला और आस-पास के हजारों किसान अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने के लिए जुटे हैं. किसान संगठन बीकेयू शहीद भगत सिंह के नेता अमरजीत मोहरी ने बताया कि धान में बौनेपन की वजह से किसानों का बारी नुकसान हुआ है. फसल नुकसान के मुआवजे की मांग, जुमला मालिकान, देह शामलात जमीनों के अधिग्रहण को रद्द करने और गन्ना किसानों के 62 करोड़ बकाया राशि के भुगतान के लिए मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया जाएगा.

दक्षिण हरियाणा: बिजली ट्यूबवेल सिंचाई का किसानों और भूजल स्तर पर गहरा असर!

हरियाणा के बिसोहा गांव (रेवाड़ी जिला) निवासी दीपक पिछले 20 वर्षों से खेती में लगे हैं, दीपक खेतों में बिजली ट्यूबवेल दवारा फु्व्वारा तकनीक से सिंचाई करते हैं, गांव में खेतों की सिंचाई के लिए अन्य साधन उपलब्ध नहीं हैं इसी कारण गांव में ज्यादातर किसान सिंचाई के लिए बिजली ट्यूबवेल का प्रयोग करते हैं. बिजली ट्यूबवेल से सिंचाई का खर्चा भी कम पड़ता है. महीने में ट्यूबवेल द्वारा सिंचाई का खर्च 80 रूपए है, जो ज्यादा नहीं है इसलिए वे सोलर पम्पसेट के बारे में नहीं सोच रहे.

हरीश बताते हैं कि खाली पड़ी जमीन भी ख़राब हो रही है और जमीन का अन्य प्रयोग भी नहीं हो रहा है. इसलिए ट्यूबवेल लगवाकर खेतों में सिंचाई करते हैं, जमीनी पानी भी लगातार खारा हो रहा है और नीचे जा रहा है लेकिन सिंचाई का साधन भी ट्यूबवेल ही है, बिजली ट्यूबवेल से सिंचाई की लागत डीज़ल ट्यूबवेल की तुलना में कम आती.

बिसोहा के नितेश कुमार सरपंच के लड़के ने बताया कि फुव्वारा तकनीक द्वारा सिंचाई करने से लाइन बदलने के लिए मजदूर लगाने पड़ते हैं, जिस कारण सिंचाई का खर्च बढ़ जाता है यदि सिंचाई के लिए पानी अन्य स्रोतों द्वारा मिल जाये तो खेतों में खुली सिंचाई की जा सकेगी जिससे अन्य कईं खर्च (पाइपलाइन, मजदूरी आदि) बच जाएंगे. गांव में ज्यादातर किसान अपना जीवन चलाने के लिए खेती पर निर्भर हैं, खेती से लगातार आय कम होती जा रही है. फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिले तो फसलों की लागत भी पूरी नहीं होगी. जब दीपक तथा हरीश से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (2015) के बारे में पूछा गया तो उन्हें इस योजना के बारे में नहीं पता था.

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत सरकार किसानों को खेत में सिंचाई करने के लिए उचित मात्रा में पानी उपलब्ध करवाने और सिंचाई उपकरणों के लिए सब्सिडी प्रदान करती है. सुनील कुमार शोधार्थी हैं और ग्रामीण एवं औद्योगिक विकास अनुसन्धान केंद्र चंडीगढ़ में काम कर चुके हैं, जिनका शोध कार्य “खेती के कार्यो में बिजली के उपयोग” से संबधित है. सुनील कुमार से संबंधित विषय पर बात करने पर उन्होंने बताया कि पेट्रोल तथा डीजल से सिंचाई की लागत ज्यादा है, जिस कारण फसलों की उत्पादन लागत बढ़ती है. सिंचाई लागत कम होने की वजह से किसान बिजली टूबवेल की तरफ ज्यादा रुझान कर रहे है, जिससे किसानों के उत्पादन एरिया में भी बढ़ोतरी हुई है, लेकिन उत्पादित फसल चक्र में परिवर्तन नकारात्मक हो रहा है. गहन सिंचाई की फसलों जैसे धान गेहूं से काम गहन सिंचाई (कम सिंचाई) की फसलों सरसो, बाजरा आदि की तरफ आ रहे है लेकिन बिजली टूबवेल की तरफ ज्यादा रुझान का विपरीत प्रभाव यह हो रहा है कि भूजल ज्यादा प्रयोग होने की वजह से भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है, किसानों को अपने टूबवेल पम्प सेट ज्यादा गहरे करवाने पड़ रहे हैं जिससे पम्प सेट की लगता में बढ़ोतरी हो रही है. डाउन-टू-अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय जल शक्ति व सामाजिक न्याय मंत्री रतन लाल ने मार्च 2020 में संसद में जानकारी दी कि किसान 2001 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1816 घनमीटर थी, जो साल 2021 में 1488 घनमीटर रही और साल 2031 में काम होकर 1367 घनमीटर हो सकती है.

हरियाणा सरकार की रिपोर्ट के अनुसार “हरियाणा के कृषि योग्य भूमि की सिंचाई नहर, डीजल तथा बिजली टुबवेल्स आदि के माध्यम से की जाती है, हरियाणा में संचित कृषि क्षेत्र का 1154 हजार एकड़ भूमि नहरों द्वारा तथा 1801 हजार एकड़ भूमि टुबवेल्स द्वारा संचित की जाती है. हरियाणा में कुल 821399 बिजली ट्यूबवेल्स तथा डीजल पंप सेट हैं जिसमें 275211 डीजल पंप से तथा 546188 बिजली पंप सेट हैं. रेवाड़ी जिले की बात की जाये तो यहां कुल 13605 ट्यूबवेल तथा पंपसेट हैं जिसमें 3311 डीजल और 10294 बिजली ट्यूबवेल पंपसेट हैं.

मौसम अनुसार फसलों की पैदावार

बिसोहा निवासी दीपक कहते हैं कि खरीफ (ग्रीष्म काल) के मौसम में कपास तथा बाजरा और रबी (शीत काल) मौसम में गेहूं तथा सरसों की फसलों का उत्पादन करते हैं. एक एकड़ में गेंहू की पैदावार 50 से 55 मण (1मण=40 किलोग्राम) है, एक एकड़ में सरसों की पैदावार 20 से 25 मण है, एक एकड़ में बाजरा की पैदावार 20 से 22 मण है, खरीफ की फसलों में 1 से 2 बार करते हैं तथा रबी की फसल सरसों में 2 से 3 बार और गेहूं की फसल में 5 से 7 बार सिंचाई करते हैं, यदि समय पर बारिश हो जाये तो ट्यूबवेल द्वारा 1 या 2 सिंचाई कम करनी पड़ती है. बिसोहा से लगभग 35 किलोमीटर दूर मीरपुर निवासी हरि सिंह अपने खेतों में गेहूं और बाजरा की पैदावार करते हैं, गेहूं में सरसो, बाजरा तथा कपास की तुलना में ज्यादा सिंचाई की जरूरत पड़ती है, एक एकड़ में गेहूं की पैदावार लगभग 38-40 मण (1 मण=40 किलोग्राम) और बाजरा की पैदावार लगभग 18-20 मण होती है.

राजेश कुमार ने बताया कि बिजली टूबवेल द्वारा सिंचाई और बारिश सही समय पर हो जाए तो एक एकड़ में गेहूं की पैदावार लगभग 40-42 मण तथा सरसो और बाजरा की पैदावार लगभग 20 मण होती है, खरीफ की फसलों (बाजरा) में 1 से 2 बार सिंचाई करते हैं, किसी वर्ष 3 बार सिंचाई भी करनी पड़ती है और गेहूं की फसल में 5 से 6 बार सिंचाई करते हैं.

डॉ अजय कुमार एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर महेन्द्रगढ़ ने बताया कि मिट्टी में सॉइल आर्गेनिक कॉम्पोनेन्ट की कार्बन संरचना होती है जिससे मिट्टी की उपजाऊपन बना रहता है, खारा पानी, रासायनिक खाद, फसल चक्रण आदि से सॉइल आर्गेनिक कम्पोनेंट का अनुपात काम होता जा रहा है. ग्रामीण जनसंख्या का कृषि पर ज्यादा निर्भरता तथा साधन उपलब्धता के कारण फसल चक्रण के बिच अंतर काम होता जा रहा है पहले किसान फसल चक्र के बीच अंतर करते थे जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति ठीक बनी रहती थी, साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से तापमान में जो वृद्धि हो रही है, वो भी फसलों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है, जैसे मार्च 2022 में हीट वेव (ज्यादा तापमान) के कारण गेहूं की पैदावार में 15% से ज्यादा की कमी आयी है.

कमल सिंह ने बताया कि भू-जल भी खारा (नमकीन) होता जा रहा है, जिससे मिट्टी की उत्पादन शक्ति भी काम हो रही है, जिस कारण पैदावार भी लगातार कम होती जा रही है, भूजल के खारा होने तथा लगातार नीचे जाने की वजह से फसलों की पैदावार कम होती जा रही है.

खारा (नमकीन) पानी और रासायनिक खाद का खेती पर प्रभाव

राजेश कुमार एक एकड़ गेहूँ 70 से 75 किलोग्राम और सरसो में 50 किलोग्राम तथा बाजरा में 25 से 30 किलोग्राम रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं, रासायनिक खाद के ज्यादा प्रयोग के कारण मिट्टी की पैदावार भी कम हो रही है, देसी खाद (गोबर की खाद) जमींन को तो ठीक रखता है, लेकिन उससे पैदावार पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता रासायनिक खाद जमींन को तो ख़राब कर रहा है, पर पैदावार पर देसी खाद की तुलना में ज्यादा असर डालता है.

कृषि विज्ञान केंद्र झज्जर (हरियाण) से संदर्भित विषय में सम्बंधित जानकारी लेने पर उन्होंने बताया कि रेवाड़ी से लगते हुए झज्जर का दो तिहाई पानी खारा (नमकीन) हो गया है, जिससे मिट्टी लवणीय (कैल्सियम, मैग्निसियम और सल्फेट आयन की अधिकता) होती जा रही है, फसल चक्र में रबी सीजन में गेहूं तथा खरीफ सीजन में पेड्डी चावल, बाजरा तथा कपास की फसलों का उत्पादन किया जाता है, रासायनिक खाद का प्रयोग खेत की मिट्टी को कृषि विज्ञान केंद्र की लैब में चेक करवा के करना चाहिए लेकिन ज्यादातर किसान आपस में एक दूसरे से बात करके रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं.

अस्सिस्टेंट प्रो फेसर डॉ.नवीन कटारिया ने बताया कि दक्षिणी हरियाणा की जमीन में फसल उत्पादन के आवश्यक तत्व (जिंक, कॉपर, मैंगनीज, आयरन,कॉपरआदि) कम मात्रा में पाए जाते हैं इसके साथ-साथ भूजल में फलोरिड, नमक की मात्रा ज्यादा है इसलिए फसल उत्पादन लगातार कम हो रहा है. जिस कारण किसानों को लगातार ज्यादा रासायनिक खाद का प्रयोग करना पड़ रहा है जो रसायनिक खाद नाइट्रोजन फॉस्फोरस और पोटैशियम के आदर्श अनुपात (4:2:1) से ज्यादा है. फलोरिड और नमक युक्त भूजल दक्षिण हरियणा के जन मानस को भी बहुत ज्यादा प्रभावित कर रहा है, क्योंकि वहां के लोग पेय जल के रूप में भी इसी पानी का उपयोग करते हैं, जिससे मुख्यत दांतों की बीमारी दांतो का पीला पड़ना देखा जा सकता है.

हरियाणा का भूजल स्तर

बिसोहा निवासी हरीश ने 15 वर्ष पहले 150 फीट गहराई में टूबवेल लगवाया था पहले पांच वर्षो तक अच्छे से पानी चला लेकिन बाद में टूबवेल पानी छोड़ने लगा फिर टूबवेल को दो बार 20- 20 फीट गहरा किया जा चूका है, लेकिन भूजल लगातार नीचे जाने की वजह से अब एक एकड़ फसल की सिंचाई के लिए दो-तीन टूबवेल को चलना और बांध करना पड़ता है, जमींन में पानी इकट्ठा हो सके और खेत की सिंचाई पूरी हो सके 3 किला (एकड़) जमीन की सिंचाई में एक सप्ताह का समय लग जाता है, फसलों को समय पर पानी नहीं मिलने से फसलों की पकावट अच्छी नहीं हो पाती है, जिस कारण खेतो में कुल पैदावार भी काम होती है.

दीपक का मानना है कि सिंचाई की अन्य व्यवस्था न होने की वजह से बिजली टूबवेल द्वारा खेत में सिचाई करने के लिए मजबूर है, जमीनी जल स्तर भी हर साल नीचे चला जाता है, जिस कारण उसे टूबवेल पम्पसेट को हर साल लगभग 10 फीट नीचे उतरना पड़ता है, पानी की बचत के लिए फुवारा तकनीक द्वारा सिचाई करते हैं, फिर भी फसलों को पूरा पानी नहीं मिल पता है.

डॉ अजय कुमार के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश होने की प्रवृति बदल रही है. मानसून स्तर में पहले बारिश लगातार होती रहती थी लेकिन अब कभी बहुत ज्यादा और कभी कईं दिनों तक बारिश नहीं होती है, जिससे जमींनी पानी का रिचार्ज नहीं हो पाता है. महेन्द्रगढ़ तथा उसके आसपास के एरिया का पानी प्रतिवर्ष 1 मीटर से 3 मीटर तक नीचे जा रहा है, और पानी खारा (नमकीन) हो रहा है. पानी में फ्लोरिड की मात्रा भी बढ़ती जा रही है, इसके कई कारण है जैसे इंडस्ट्रीज से निकलने वाला पानी, ज्यादा फर्टीलिज़ेर का प्रयोग आदि है.

डॉ.नवीन कटारिया ने बताया कि लगातार पानी का उपयोग करने तथा दक्षिण हरियाणा की वातावरणीय पारिस्तिथि शुष्क और रेतीली जमीन होने की वजह से यहां बारिश भी कम मात्रा में होती है, जिससे जमीन से निकले गए पानी की पूर्ति वापिस बारिश के पानी से पूरी नहीं हो पाती है, पहले भूजल की पूर्ति गांव में तालाब और जोहड़ों से भी हो जाती थी लेकिन अब गांव में तालाब और जोहड़ लगभग सूख चुके हैं. भूजल में फ्लोराइड के ज्यादा होने के कई कारण हो सकते हैं, दक्षिणी हरियाणा में मुख्य वजह चट्टानों का घुलना है, यह बारिश और भूजल के कारण हो रहा है. कईं चट्टानों में फ्लोराइड, एपेटाइट और बिओटिट आदि की मात्रा ज्यादा होती है, इन चट्टानों के अपक्षय (घुलना) से भूजल में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ जाती है. खेतों में फसल उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रयोग किये जाने वाले ज्यादा रासायनिक खाद (फॉस्फेट फर्टिलिसेर) से भी फ्लोराइड बढ़ता है.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की रिपोर्ट के अनुसार “सामान्य मानसून लंबी अवधि का औसत 2005 से 2010 में सामान्य मानसून वर्षा की LPA दर 89.04 सेन्टीमीटर थी, जो 2011 से 2015 के बीच कम होकर 88.75 सेन्टीमीटर तथा 2018 से 2021 के बीच और भी कम होकर 88.6 सेन्टीमीटर हो गया है.”

कृषि विज्ञान केंद्र झज्जर से मिली जानकारी के अनुसार रेवाड़ी जिले से लगे हुए झज्जर जिले में चोवा (जमीनी पानी की उपलब्धता) 20-30 फीट है लेकिन वह पानी खरा (नमकीन) है, जो किसी उपयोग लायक नहीं है, खेतो में सिंचाई तथा अन्य उपयोग के लिए अच्छे भूजल 80-100 फ़ीट की गहराई पर मिलता है.

पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज तोशाम तथा बिहार सरकार के जीआईएस विभाग में काम कर चुके असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ वीरेंदर सिंह ने बताया कि रेवाड़ी तथा झज्जर भूजल स्तर की उपलब्धता में अन्तर का मुख्य कारण यह है कि रोहतक और झज्जर जिले में पानी के नहरी व्यवस्था अच्छी है जिससे जमीन को लगातार पानी मिलता रहता है तथा नहरों के पानी रिसाव से भूजल रिचार्ज होता रहता है, इसी कारण यहां पर जलभराव की समस्या भी हो जाती है जबकि रेवाड़ी में नहरी व्यवस्था अच्छी नहीं है. दक्षिणी हरियाणा मुख्यत रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़ और मेवात में रेतीली जमीन होने के साथ-साथ पहाड़ी इलाका है. जबकि रेवाड़ी के साथ लगते झज्जर जिले में जमीन मिट्टी युक्त है.

रेवाड़ी में नहरी व्यवस्था अच्छी नहीं है, दक्षिणी हरियाणा की भूगर्भिक संरचना हरियाणा के अन्य भाग से अलग होने की वजह से रोहतक झज्जर का भूजल भी रेवाड़ी महेन्द्रगढ़ की तरफ नहीं जा पता है,जिस कारण जमीन को पानी भी कम मिल पाता है जिससे भूजल स्तर लगातार गहरा हो रहा है.

मोंगाबे की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के करीब 25.9 प्रतिशत गांव गंभीर रूप से भूजल संकट से जूझ रहे हैं, इसी तरह की स्थिति उतर प्रदेश और बिहार में बन रही है. हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण (HWRA) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार हरियाणा के 319 गांव संभावित जल भराव वाले गांव हैं, जिनमें जल स्तर की गहराई 1.5 से 3 मीटर तक है हरियाणा में 85 गांव ऐसे हैं जो गंभीर रूप से जलजमाव से जूझ रहे हैं, जहां जल स्तर की गहराई 1.5 मीटर से कम है.

हरियाणा: अब दान की जमीन के मालिक नहीं बन सकेंगे ब्राह्मण, पुजारी और पुरोहित, बिल में हुआ संशोधन!

सरकारी की ओर से पंचायती, शहरी या स्थानीय निकाय द्वारा दान में दी गई भूमि का मालिकाना हक नहीं देने का फैसला लिया गया है. इसको लेकर हरियाणा सरकार द्वारा दान दी गई जमीन या शामलात की जमीन को लेकर विधेयक को राज्यपाल के जरिए राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है. इस मंजूरी के बाद सरकारी जमीनों पर कब्जा छुड़वाने को लेकर सरकार ने कानूनी प्रक्रिया को तेज कर दिया है.
इस विधेयक में संशोधन करते हुए जो विधेयक पारित किया गया है, वह पूर्व में ब्राह्मणों समेत 12 जातियों को सरकार के द्वारा दिया जा रहा मालिकाना हक अब नहीं दिया जाएगा. यह मामला लगभग 4 साल पहले 2018 में विधानसभा में वर्तमान सरकार के द्वारा संशोधन के लिए लाया गया. जिस पर विपक्ष ने कईं बार आपत्ति दर्ज करवाई थी.

खट्टर सरकार द्वारा साल 2018 में इस कानून में संशोधन किया गया. जिस पर राज्यपाल के हस्ताक्षर होने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा गया. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद सरकार द्वारा इसका नोटिफिकेशन जारी किया गया. सरकार का दावा है कि इस कानून से शामलात जमीनों की अवैध खरीद-फरोख्त बंद हो जाएगी और सरकार के द्वारा उन्हें अब मालिकाना हक नहीं दिया जाएगा.

सरकार ने अब फैसला किया है कि कोई दोहलीदार (गरीब ब्राह्मणों, पुजारियों और पुरोहितों) ऐसी किसी भी जमीन का मालिकाना हक प्राप्त नहीं कर सकता, जो पंचायत की है, वह शहरी निकायों में आ चुकी है और राज्य सरकार के स्वामित्व वाली है. ऐसी जमीन भी दोहलीदारों के नाम नहीं हो सकती, जिसकी मालिक सरकार है, भले ही वह जमीन कहीं भी मौजूद है और दोहलीदारों को आवंटित है.पंचायतों ने जो जमीन दोहलीदारों को दान में दे रखी है, उस पर भी दोहलीदारों का मालिकाना हक नहीं होगा. इस जमीन की खरीद-फरोख्त दोहलीदार नहीं कर सकते.

पुराने समय में कि गरीब ब्राह्मणों, पुजारियों और पुरोहितों को फसल बोने के लिए जमीन दान में दे दी जाती थी. यह जमीन पंचायती होती थी, जिस पर उनका मालिकाना हक तो नहीं होता था, लेकिन वह फसल बोकर प्राप्त होने वाली आमदनी को अपने ऊपर खर्च करने का अधिकार रखते थे। इसी श्रेणी के लोगों को दोहलीदार कहा जाता है.

SYL मुद्दे पर हरियाणा-पंजाब बातचीत से हल निकालें- सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों को सतलुज यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर के विवादास्पद मुद्दे का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने के लिए मिल-बैठकर बातचीत करने को कहा. न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय से दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाने को कहा है. इस मुद्दे पर हुई ज्यादा जानकारी के साथ एक रिपोर्ट के साथ बेंच ने मामले को 15 जनवरी तक के लिए आगे बढ़ा दिया है.

न्यायमूर्ति कौल ने कहा, “पानी एक प्राकृतिक संसाधन है केवल व्यक्तिगत हितों को ध्यान में नहीं रखा जा सकता है.” वहीं जब बेंच ने दोनों राज्यों की बातचीत के लिए एक टेबल पर लाने के लिए केंद्र सरकार पर फटकार लगाई तो अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि केंद्र ने अप्रैल में पंजाब के नए मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा था, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

सुप्रीम कोर्ट ने 28 जुलाई, 2020 को पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों से इस मुद्दे का बातचीत से समाधान निकालने का प्रयास करने को कहा था. हरियाणा सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान और अतिरिक्त महाधिवक्ता अनीश गुप्ता ने हरियाणा के पक्ष में फरमान लागू करने की मांग करते हुए कहा कि कई दौर की बातचीतविफल रही है.

पंजाब सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जेएस छाबड़ा ने शीर्ष अदालत को आश्वासन दिया कि वह समस्या का बातचीत से समाधान निकालने की ओर कदम बढाएगी. पंजाब, केंद्र की मदद से दोनों राज्यों के बीच बातचीत से समझौता करने की मांग कर रहा है, जबकि हरियाणा का कहना है कि उसके पक्ष में डिक्री होने के बावजूद उसे अनिश्चित काल तक इंतजार करने के लिए नहीं कहा जा सकता है.

वहीं इस मामले को लेकर केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय की ओर से कई बैठकें बुलाई गई थी. बैठक में दोनों राज्यों के मुख्य सचिवों ने भाग लिया था लेकिन बैठकों में कोई नतीजा नहीं निकला. सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही केंद्र, पंजाब और हरियाणा सरकार को अपनी बातचीत जितनी जल्दी हो सके समाप्त करने को कहा है वहीं ऐसा नहीं करने पर वह इस मामले पर फैसला करने के लिए आगे बढ़ेगा.   

किसानों ने बीजेपी सांसद को घेरा, फसल के मुआवजे की रखी मांग!

आदमपुर, बालसमंद और खीरी चोपटा के किसानों ने आज आदमपुर के पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में हिसार से बीजेपी सांसद बृजेंद्र सिंह का विरोध किया. किसानों ने बीजेपी सांसद को काले झंडे दिखाते हुए नारेबाजी भी की. किसान आदमपुर के तहसील कार्यालय में पिछले तीन महीने से कपास की फसल के नुकसान के मुआवजे की मांग को लकेर धरना दे रहे हैं.

धरना दे रहे किसानों ने बीजेपी सांसद बृजेंद्र सिंह से शिकायत की कि सरकार ने उन्हें 2020 और 2021 में खराब हुई कपास की फसल के नुकसान का मुआवजा नहीं दिया है. वहीं एक किसान नेता ने सांसद को बताया कि किसान पिछले तीन साल से खरीफ सीजन की फसल में नुकसान झेल रहे हैं लेकिन सरकार की ओर से किसानों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया है.

किसानों ने सासंद से शिकायत करते हुए कहा कि सरकार ने 2020 के लिए मुआवजे को मंजूरी दी थी, लेकिन यह आज तक किसानों को नहीं दिया गया है. हमें पिछले तीन साल का मुआवजा मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही और इस साल फिर से जिले के कई हिस्सों में ज्यादा जलभराव के कारण कपास को भारी नुकसान हुआ है. किसानों ने कहा कि उन्होंने मुआवजे के भुगतान को लेकर कृषि मंत्री जेपी दलाल समेत अन्य नेताओं से भी मुलाकात की है लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ.

वहीं किसानों से घिरे सांसद ने कहा कि उन्होंने पहले भी राज्य सरकार के समक्ष किसानों की मांग उठाई थी और आगे भी उठाउंगा.

फसल अवशेष जलाने से रोकने के लिए खर्च किये 693 करोड़, कृषि विशेषज्ञों ने जताई घोटाले की आशंका!

हरियाणा सरकार द्वारा पिछले चार साल में फसल अवशेष प्रबंधन के नाम पर खेतों में लगाई जाने वाली आग को रोकने के लिए 693.25 करोड़ रुपये खर्च कर दिये हैं. सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत किसानों को सब्सिडी देते हुए 31,466 कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) स्थापित करने और 41,331 किसानों को धान की पुआल के निपटान के लिए वैकल्पिक तरीके अपनाने के लिए मशीनरी देने का दावा किया है.

एक तरफ सरकार फसल के अवशेष को जलाने से रोकने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा कर रही थी वहीं कृषि विभाग के आंकड़े कुछ और ही तस्वीर बया कर रहे हैं. कृषि विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2021 में 14.63 लाख हेक्टेयर में हुई धान की खेती में से 3.54 लाख हेक्टेयर में फसल के जले हुए अवशेष की बात सामने आई है. इसके साथ ही फसल के अवशेष जलाने का क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है. पिछले चार वर्षों में फसल के अवशेष जलाए जाने का रकबा 2021 में सबसे ज्यादा रहा है. 2018 में 2.45 लाख हेक्टेयर, 2019 में 2.37 लाख हेक्टेयर और 2020 में 2.16 लाख हेक्टेयर में फसल के अवशेष जलाए गए थे.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय से आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी से पता चला है कि केंद्र ने 2018-19 में 137.84 करोड़ रुपये जारी किए, जिसमें से 132.86 करोड़ रुपये खर्च किये गए. इसी तरह, 2019-20 में 192.06 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिसमें से 101.49 करोड़ रुपये खर्च किये गए. अगले साल 2020-21 में केंद्र ने 170 करोड़ रुपये जारी किए, जबकि 205.75 रुपये खर्च किए गए. 2021-22 में 193.35 करोड़ रुपये जारी किए गए और 151.39 करोड़ रुपये खर्च किए गए. 2018-19 में 132.86 करोड़, 2019-20 में 101.49 करोड़, 2020-21 में 205.75 करोड़ और 2021-22 में 151.39 करोड़ यानी पिछले चार साल में कुल 693 करोड़ रुपए खर्च किये जा चुके हैं. लेकिन जमीनी असर नहीं दिखाई दे रहा है.

वहीं कृषि विशेषज्ञों डॉ.राम कुमार ने पंजाब की तरह हरियाणा में भी घोटाले की आशंका जताई है. उन्होंने कहा कि इससे पहले पंजाब में फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सीएचसी को जारी की गई सब्सिडी के नाम पर बड़ा घोटाला सामने आया है. चौंकाने वाली बात यह है कि इन सीएचसी (कस्टम हायरिंग सेंटर) और सब्सिडी का कोई ऑडिट नहीं होता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाना न केवल हरियाणा में बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों के लिए भी चिंता का विषय है.

हरियाणा: लंपी वायरस के कारण दूध उत्पादन 20% घटा!

लंपी वायरस की बीमारी से हरियाणा के करीबन 70 फीसदी गांव प्रभावित हैं. प्रदेश में संक्रमित पशुओं की संख्या बढ़कर 80 हजार से ज्यादा पहुंच गई है. इनमें से 75 हजार गायें संक्रमित हैं और 145 भैसें भी इस बीमारी से ग्रस्त हो गई हैं. प्रदेश में करीबन 1300 गायों की मौत हो चुकी है.

लंपी वायरस के कारण प्रदेश के दूध उत्पादन में 20 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है. संक्रमित पशुओं की दूध उत्पादन की क्षमता कम हो रही है, जबकि कमजोर पशु बिल्कुल दूध देना कम कर रहे हैं. जिसके चलते प्रदेश में दूध की मांग बढ़ रही है और इसके रेट में भी बढ़ोतरी हो रही है. दूध की मांग को देखते हुए पिछले दिनों वीटा ने भी दूध के दाम दो रुपये बढ़ाए हैं.

अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में करीब 16 लाख परिवारों के पास 36 लाख दुधारू पशु हैं. हरियाणा में कुल वार्षिक दूध का कुल उत्पादन 117.34 लाख टन है. इसमें सबसे अधिक हिस्सा भैंस का 9474 टन, गाय के दूध का 2207 टन और बकरी के दूध का 52 टन उत्पादन शामिल है.

पशुपालन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, औसतन हरियाणा में 32 लाख टन दूध का उत्पादन होता है लेकिन जब से प्रदेश में लंपी बीमारी आई है, तब से पशुओं के दूध देने की क्षमता घट रही है. इस समय सबसे ज्यादा गाय लंपी वायरस की चपेट में हैं और जिसकी वजह से गाय के दूध उत्पादन में 20 प्रतिशत तक की कमी आई है. इसका दूसरा कारण है कि संक्रमण के भय के चलते पशुपालक दूध निकालने से भी बच रहे हैं. दूध का उत्पादन कम होने से प्रदेश में दूध की मांग भी बढ़ने लगी है.

CMIE रिपोर्ट: हरियाणा बेरोजगोरी में एक बार फिर पहले नंबर पर!

देश में बेरोजगारी दर अगस्त में एक साल के उच्चस्तर 8.3 प्रतिशत पर पहुंच गयी है. इस दौरान रोजगार पिछले महीने की तुलना में 20 लाख घटकर 39.46 करोड़ रह गया. वहीं इस बीच हरियाणा बेरोजगारी में एक बार फिर पहले स्थान पर रहा है. आंकड़ों के मुताबिक अगस्त के दौरान हरियाणा में सबसे ज्यादा 37.3 प्रतिशत बेरोजगारी थी. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई में बेरोजगारी दर 6.8 प्रतिशत और रोजगार 39.7 करोड़ था.

देश के ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर जुलाई में 6.1 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 7.7 प्रतिशत हो गई. वहीं रोजगार दर 37.6 प्रतिशत से गिरकर 37.3 प्रतिशत पर आ गई. सीएमआईई की ओर से जारी बयान में कहा गया कि, “आमतौर पर शहरी बेरोजगारी दर आठ फीसदी रहती है, जबकि ग्रामीण बेरोजगारी दर लगभग सात फीसदी होती है. इस साल अगस्त में शहरी बेरोजगारी दर बढ़कर 9.6 फीसदी और ग्रामीण बेरोजगारी दर बढ़कर 7.7 फीसदी हो गई है. अनियमित वर्षा ने बुवाई गतिविधियों को प्रभावित किया है और यह ग्रामीण भारत में बेरोजगारी बढ़ने का एक मुख्य कारण है.”

वहीं विपक्ष की ओर से कांग्रेस नेता दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने सरकार पर निशाना साधते हुए ट्विट में लिखा “भर्ती के नाम पर घोटालों पर घोटाले, बेरोजगार युवाओं से लाखों की अवैध वसूली,बिन भर्ती पद खत्म करने व निवेश की बजाए नशे को बढावा देने की नीति का नतीजा है 37.3% बेरोजगारी. कांग्रेस कार्यकाल मे जो हरियाणा विकास के हर पैमाने पर अन्य राज्यो से आगे था,वो आज बेरोजगारी-भ्रष्टाचार मे आगे”

बता दें कि अगस्त के दौरान हरियाणा में सबसे ज्यादा 37.3 प्रतिशत बेरोजगारी रही. इसके बाद जम्मू-कश्मीर में बेरोजगारी 32.8 प्रतिशत, राजस्थान में 31.4 प्रतिशत, झारखंड में 17.3 प्रतिशत और त्रिपुरा में 16.3 प्रतिशत बेेरोजगारी दर थी. वहीं आंकड़ो के अनुसार छत्तीसगढ़ में बेरोजगारी दर सबसे कम 0.4 फीसदी रही