नियम 134A समाप्त: गरीब छात्रों के हक खत्म, प्राइवेट स्कूल संचालकों के पक्ष में खड़ी हुई सरकार

हरियाणा सरकार के शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव आनंद मोहन शरण ने 28 मार्च को नोटिस जारी करके हरियाणा विद्यालय शिक्षा नियम 2003 के नियम 134ए को खत्म करने की सूचना सार्वजनिक की है।

नियम-134ए को खत्म करने के लिए स्कूल शिक्षा विभाग ने हरियाणा विद्यालय शिक्षा नियम, 2003 में संशोधन किया है। संशोधित नियमों को अब हरियाणा विद्यालय शिक्षा नियम, 2022 कहा जाएगा।

क्या था नियम 134ए

इस नियम के तहत प्रदेश के गरीब बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों में पहली से बारहवीं तक 25% सीट सरकारी स्कूलों के बराबर फीस के हिसाब से आरक्षित होती थी। इसका मतलब है कि प्राइवेट स्कूलों को 25% बच्चे सरकारी स्कूलों की फीस में पढ़ाने होते थे, जिनकी फीस हरियाणा सरकार प्राइवेट स्कूलों को देती थी। हुड्डा सरकार जाते-जाते इसको 10% कर गयी थी, जो अब बिल्कुल खत्म कर दिया गया है।

कैसे होता था दाखिला

इस स्कीम के तहत दाखिला लेने के लिया शिक्षा विभाग छात्र-छात्राओं की एक प्रवेश परीक्षा लेता था। इस प्रवेश परीक्षा में रैंक के हिसाब से छात्र छात्राओं को स्कूल अलाॅट किए जाते थे।

अब क्या होगा

इस नियम के खत्म होने के बावजूद केन्द्र सरकार द्वारा बनाया शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009, (RTE Act) की धारा 12(1)(सी) लागू है। इसके तहत निजी स्कूलों में ईडब्ल्यूएस छात्रों के लिए 25% सीटों का आरक्षण अनिवार्य है। लेकिन यह सिर्फ आठवीं कक्षा तक है जबकि प्रदेश सरकार का नियम 134ए बारहवीं तक के छात्र-छात्राओं के लिए था।

छात्र अभिभावक संघ (सोनीपत) के संयोजक विमल किशोर ने बताया, “आरटीई कहता है कि आपके आसपास कोई सरकारी स्कूल नहीं होगा तभी प्राइवेट स्कूल में दाखिला मिलेगा, इसी वजह से आरटीई 2009 ढकोसला मात्र है। यदि हरियाणा सरकार ने 134 ए को समाप्त करना ही था तो पहले सरकारी स्कूलों की हालत में सुधार करना चाहिए था ताकि गरीब बच्चे अच्छी शिक्षा ग्रहण कर सकें।”

उन्होंने आगे बताया कि 134 ए नियमावली 2003 के तहत निजी स्कूलों में गरीब बच्चों का कोटा 25% था जिसे 2013 में तत्कालीन कांग्रेस की हुड्डा सरकार ने निजी स्कूल संचालकों के दबाव में 10% कर दिया था, जिसे अब हरियाणा की बीजेपी सरकार ने बिल्कुल समाप्त कर दिया है। यह दर्शाता है कि हरियाणा की अब तक की सभी सरकारें निजी स्कूल संचालकों के दबाव में रही हैं।

प्राइवेट स्कूल संचालक शुरू से ही इस नियम का लागू करने में आनाकानी कर रहे थे, जिसको लेकर माननीय पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में भी केस चला हुआ था। हरियाणा भर में अभिभावकों ने लम्बे संघर्ष के बाद इस नियम को लागू करवाने में सफलता हासिल की थी। अभिभावक इसको लागू करवाने के संघर्ष के दौरान जेलों में भी रहे हैं। आमरण अनशन किया, लाठीचार्ज झेला और अंत में परिणाम यह मिला।

पत्रकारिता को बचाने की चुनौती

इसमें अब कोई शक-शुबहे की गुंजाइश नहीं रह गई है कि एक संस्था के रूप में भारतीय पत्रकारिता खासकर मुख्यधारा की कार्पोरेट स्वामित्ववाले न्यूज मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता साख के एक बड़े संकट से गुजर रही है. संभव है कि आप अपने खुद के अनुभवों से भी यह महसूस करते होंगे कि मुख्यधारा के कार्पोरेट स्वामित्ववाले न्यूज मीडिया और उसमें हो रही पत्रकारिता कितने गंभीर नैतिक और राजनीतिक-सामाजिक-कारोबारी-सांस्थानिक विचलनों की शिकार हो चुकी है; मुनाफे और दूसरे निजी हितों की पूर्ति के लिए किस तरह अनैतिक समझौते, सत्ता और बड़े कार्पोरेट समूहों के पक्ष में चापलूसी, प्रोपेगंडा और नागरिकों के साथ धोखाधड़ी कर रही है.

आपसे यह भी नहीं छुपा है कि किस तरह यह प्रोपेगंडा मीडिया न सिर्फ ताकतवर-प्रभावशाली लोगों और सत्ता का भोंपू बन गया है, बिना किसी शर्म और लाज-लिहाज के उनके एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है, गरीबों-कमजोर वर्गों और उनकी जरूरतों और मुद्दों को अनदेखा कर रहा है. यही नहीं, वह सत्ता की पैरोकारी में सच पर पर्दा डालने, सच्चाई को तोड़ने-मरोड़ने, सच को झूठ और झूठ को सच बनाने से लेकर वास्तविक मुद्दों से देश-समाज का ध्यान बंटाने के लिए पीआर, प्रोपेगंडा और छल तक का सहारा ले रहा है.

लेकिन हद तो यह हो गई है कि पिछले कुछ सालों से एक तो करेला, दूसरे नीम चढ़ा की तर्ज पर यह प्रोपेगंडा न्यूज मीडिया समाज में जहरीले सांप्रदायिक-दक्षिणपंथी प्रोपेगंडा के जरिये बंटवारे और ध्रुवीकरण की राजनीति को आगे बढ़ा रहा है. वह खुलेआम नफरत बेच रहा है, सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ रहा है, अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों और कमजोर वर्गों को निशाना बना रहा है और आम लोगों को जहरीले प्रोपेगंडा से मानसिक रूप से बीमार बना रहा है.

यही नहीं, न्यूज मीडिया समूहों खासकर न्यूज चैनलों और उनके स्टार एंकरों-संपादकों-रिपोर्टरों में जहरीले-नफरत भरे ‘हेट स्पीच’ और प्रोपेगंडा में एक-दूसरे को पछाड़ने और सबसे आगे निकलने की होड़ में हर दिन एक लक्ष्मण-रेखा टूट रही है. कल तक जिसे हेट स्पीच समझा जाता था और जिसे सार्वजनिक विमर्श में अस्वीकार्य, असहनीय और शर्मिंदगी का कारण माना जाता था, इन न्यूज चैनलों ने उस सांप्रदायिक नफरत, घृणा और हिंसा को न सिर्फ दैनिक सार्वजनिक विमर्श का स्वीकार्य हिस्सा बना दिया है बल्कि उसका पूरी तरह से सामान्यीकरण (नॉर्मलाइजेशन) कर दिया है.

इस आलेख में इसके कारणों में विस्तार से जाने की गुंजाइश या जरूरत नहीं है और शायद दोहराव का खतरा भी है. इस प्रोपेगंडा न्यूज मीडिया और उसके बारे में आलोचनात्मक आलेख और टिप्पणियां आपने खूब पढ़ी होंगी. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इसकी बुनियादी वजह बड़ी कार्पोरेट पूंजी के स्वामित्ववाले न्यूज मीडिया की संरचना में ही निहित है. जैसाकि वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ कहते हैं कि कार्पोरेट न्यूज मीडिया की संरचना की यह अनिवार्यता है कि वह झूठ बोले.

इसके साथ ही कार्पोरेट न्यूज मीडिया का सामाजिक ढांचा अब भी बुनियादी तौर पर सवर्ण-पुरुष-शहरी-अभिजात्य तबके से आनेवाले गेटकीपरों (संपादकों/पत्रकारों) तक सीमित है और आतंरिक ढाँचे में लोकतंत्र के लिए कोई खास जगह नहीं है. कार्पोरेट न्यूज मीडिया के ज्यादातर समाचारकक्षों में माहौल न सिर्फ दमघोंटू है बल्कि सामाजिक रूप में प्रतिगामी और उत्पीड़क है.

कार्पोरेट न्यूज मीडिया की इन सच्चाइयों और उसकी सीमाओं को लोग धीरे-धीरे समझने लगे हैं. इन सब कारणों से कार्पोरेट स्वामित्ववाली न्यूज मीडिया और उसमें हो रही कथित पत्रकारिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. यही नहीं, उसका बड़ा हिस्सा न सिर्फ अपनी साख खो चुका है बल्कि नागरिकों के एक छोटे हिस्से में ही सही लेकिन उसके खिलाफ गुस्सा बढ़ता जा रहा है.
यह गुस्सा कई रूपों में अभिव्यक्त भी हो रहा है. लोग विकल्प खोज रहे हैं. आखिर बिना स्वतंत्र, मुखर और सच्ची पत्रकारिता के लोकतंत्र भी नहीं चल सकता है और उसके कारण नागरिकों की आज़ादी और अधिकार भी खतरे में हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि आमलोगों के सरोकारों से जुड़ी, स्वतंत्र और गैर-लाभकारी मीडिया उपक्रमों से संचालित वैकल्पिक पत्रकारिता की जरूरत आज पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या वैकल्पिक पत्रकारिता मुख्यधारा की पत्रकारिता की जगह ले सकती है? क्या वैकल्पिक न्यूज मीडिया उपक्रमों और उसके विभिन्न प्लेटफार्मों में मुख्यधारा की कार्पोरेट न्यूज मीडिया कंपनियों के पैमाने पर समाचारों के संकलन और आमलोगों तक पहुँचने का सामर्थ्य है? सवाल यह भी है कि क्या मुख्यधारा की कार्पोरेट नियंत्रित पत्रकारिता में सुधार या बदलाव की सारी संभावनाएं खत्म हो चुकी हैं?

यह सही है कि कार्पोरेट नियंत्रित पत्रकारिता में बुनियादी बदलाव असंभव है और कार्पोरेट स्वामित्व के ढाँचे में बदलाव और विज्ञापन आधारित बिजनेस माडल की जगह नए बिजनेस माडल के बिना आदर्श पत्रकारिता की पुनर्बहाली मुश्किल है. लेकिन क्या वहां इन सीमाओं के बावजूद पत्रकारिता को दोबारा कम से कम इस स्थिति में नहीं लाया जा सकता है कि वह स्वतंत्र, तथ्यपूर्ण, साक्ष्यों पर आधारित और संतुलित रिपोर्टिंग कर सके, विचारों के मामले में वैचारिक विविधता और बहुलता का सम्मान करे और सत्ता और कार्पोरेट गठजोड़ के प्रोपेगंडा भोंपू की तरह जहरीला-सांप्रदायिक प्रचार न करे?

ये सवाल न्यूज मीडिया आलोचना के बीच इसलिए महत्वपूर्ण हो गए हैं क्योंकि कार्पोरेट नियंत्रित मुख्यधारा की पत्रकारिता के विचलनों/स्खलनों और कुछ मामलों में उसके पतन की आलोचना के बाद उसके विकल्पों या उसमें सुधार का सवाल आमतौर पर अधूरा छोड़ दिया जा जाता है या अनदेखा कर दिया जाता है. यही नहीं, इस प्रक्रिया में आम नागरिकों यानी पाठकों-दर्शकों-श्रोताओं की क्या भूमिका हो सकती है? क्या वे मौजूदा मीडिया परिदृश्य में हस्तक्षेप करने और पत्रकारिता जैसी जरूरी लोकतान्त्रिक संस्था की गरिमा और इयत्ता को बहाल करने में सक्षम हैं? क्या वे कार्पोरेट नियंत्रित न्यूज मीडिया पर सुधार का दबाव और वैकल्पिक न्यूज मीडिया को ताकतवर बनाने में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं?

महत्वपूर्ण है नागरिकों की भूमिका

सच यह है कि पत्रकारिता आज जिस गहरे संकट में है, उसमें एक बड़ा कारण उससे जुड़े मामलों में नागरिकों की आमतौर पर निष्क्रिय भूमिका भी है. आश्चर्य नहीं कि न्यूज मीडिया के जनतान्त्रिकीकरण और उसमें सुधार/बदलाव के मुद्दे न तो राजनीतिक दलों के एजेंडे पर हैं और न ही नागरिक समाज के एजेंडे पर. ऐसा लगता है जैसे यह कोई मुद्दा नहीं हो. इस तथ्य के बावजूद कि राष्ट्रीय मसलों और सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने, जनमत बनाने और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को निर्देशित करने और लोगों की आज़ादी और अधिकारों को फ़ैलाने या संकुचित करने में मीडिया की ताकत लगातार बढ़ती जा रही है, वह सार्वजनिक बहसों और चर्चाओं से बाहर है और कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कार्पोरेट नियंत्रित न्यूज मीडिया की जवाबदेही या उसके कामकाज में पारदर्शिता या उसके नियमन जैसे जरूरी मुद्दे पर कोई सार्वजनिक पहल, कार्रवाई और आन्दोलन भी नहीं दिखाई देता है.

ऐसे में, यहाँ कार्पोरेट नियंत्रित न्यूज मीडिया में सुधार और उसके जनतान्त्रिकीकरण के साथ वैकल्पिक न्यूज मीडिया को प्रभावी बनाने के मद्देनजर चर्चा के लिए कुछ प्रस्ताव पेश हैं. ये प्रस्ताव न तो पर्याप्त हैं और न ही इनका मकसद एकतरफा कार्रवाई को प्रोत्साहित करना है. इन प्रस्तावों का उद्देश्य कार्पोरेट न्यूज मीडिया में सुधार/बदलाव के साथ पत्रकारिता की साख को बहाल करने, उसे जवाबदेह और पारदर्शी बनाने और नागरिकों की अपने दायित्व के बाबत जागरूक बनाने के लिए सार्वजनिक चर्चा/बहस को प्रोत्साहित करना है.

मीडिया साक्षरता और उसके बारे में आलोचनात्मक समझ बढाने के लिए

1. देश में मीडिया साक्षरता और उसके बारे में आलोचनात्मक समझ बनाने के लिए एक बड़ा अभियान चलाने की जरूरत है. न्यूज मीडिया यानी अखबारों को पढने, टीवी देखने और डिजिटल माध्यमों को बरतने के लिए एक आलोचनात्मक दृष्टि और विवेक जरूरी है. न्यूज मीडिया कैसे काम करता है, संपादकों/पत्रकारों की क्या भूमिका होती है, वे कैसे समाचार चुनते और गढ़ते हैं, सम्पादकीय मूल्य क्या होते हैं और उनके काम करने के नैतिक मापदंड क्या है, समाचार कैसे संकलित, सम्पादित और प्रस्तुत किए जाते हैं, टीवी में विजुअल्स कैसे बनते हैं, उन्हें कैसे सम्पादित किया जाता है, कैमरा कैसे काम करता है जैसे अनेकों पहलुओं के बारे में स्पष्ट और आलोचनात्मक समझ होने पर पाठक-दर्शक-श्रोता न्यूज मीडिया के कंटेंट को ज्यादा सतर्क और सचेत रूप से ग्रहण करेंगे.

हालाँकि मीडिया साक्षरता का यह अभियान चलाना इतना आसान नहीं है. इसके लिए न सिर्फ बड़े पैमाने पर संसाधनों और प्रशिक्षकों की जरूरत है बल्कि इसे एक साथ कई स्तरों पर चलाना होगा. इस अभियान को स्कूलों, कालेजों-विश्वविद्यालयों से लेकर कचहरियों, निजी-सरकारी दफ्तरों/कार्यस्थलों तक ले जाना होगा. यही नहीं, घरों के अन्दर ड्राइंगरूम से लेकर किचन तक और दफ्तरों समेत दूसरे सार्वजनिक जगहों पर इस बारे में चर्चा करनी होगी. एक नागरिक के बतौर हमें न्यूज मीडिया के कामकाज और उसके कंटेंट लेकर आलोचनात्मक चर्चा को ड्राइंग रूम और व्हाट्सएप्प समूहों से लेकर कार्यस्थलों और कैंटीन/कैफेटेरिया तक ले जाना होगा. उसे हर मंच पर उठाने, बोलने और लिखने की कोशिश करनी होगी. अब इसपर चुप रहने या उसे अनदेखा करने का विकल्प नहीं है.

2. मीडिया साक्षरता अभियान का एक और बहुत जरूरी हिस्सा है- न्यूज मीडिया से आ रहे कंटेंट में दिखनेवाली गड़बड़ियों, विचलनों और तोड़मरोड़ पर सार्वजनिक प्रतिकार करना. इसके लिए नागरिक समाज के संगठनों से लेकर आम नागरिकों को नियमित तौर पर संपादकों को प्रतिवाद चिट्ठियां और ईमेल लिखने से लेकर उस बारे में प्रेस काउन्सिल और न्यूज ब्राडकास्टिंग स्टैण्डर्ड अथारिटी को शिकायती पत्र लिखने चाहिए. उन्हें इस बारे में सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी अपनी बात दर्ज करवानी चाहिए. गंभीर विचलनों और जहरीले-सांप्रदायिक प्रोपेगंडा के मामलों में “नाम लेकर शर्मिंदा करना” (नेम एंड शेम) भी जरूरी है. याद रहे कि सार्वजनिक आलोचना का दोहरा असर होता है- एक, कार्पोरेट न्यूज मीडिया संस्थानों पर दबाव पड़ता है और दूसरे, इस बारे में आम नागरिकों की चेतना भी बढ़ती है.

आप जैसे आम पाठक-दर्शक-श्रोता ऐसे मामलों में सक्रिय दिलचस्पी लेकर अपने परिचितों के साथ बात कर सकते हैं, व्हाट्सएप्प समूहों में चर्चा शुरू कर सकते हैं और सोशल मीडिया पर टिप्पणियां लिख सकते हैं. संपादकों को चिट्ठी और ईमेल लिख सकते हैं.

3. मीडिया साक्षरता अभियान के तहत फैक्ट चेक करनेवाले संगठनों और प्लेटफार्म्स को मजबूत बनाना बहुत जरूरी है. औद्योगिक स्तर पर संगठित-संचालित सत्ता समर्थक प्रोपेगंडा और जहरीले-सांप्रदायिक प्रचार के मुकाबले में आल्ट-न्यूज, बूम-लाइव और इंडिया-स्पेंड जैसे फैक्ट चेकर्स की ताकत भले कम हो, उनके पास उस स्तर के संसाधन और पहुँच न हो लेकिन इन सबने संगठित फेक न्यूज और जहरीले प्रोपेगंडा के मुकाबले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसमें कोई शक नहीं है कि वे मीडिया साक्षरता यानी मीडिया के कामकाज और उसके कंटेंट के बारे में लोगों को जागरूक करने के साथ लोगों को तथ्यों और सच्चाई से अवगत कराने की जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे रहे हैं. वे कार्पोरेट मीडिया के लिए वास्तविक नियामक और अंकुश का काम कर रहे हैं.

हमें उनके साथ खड़ा होना होगा. उनकी रिपोर्टों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने की कोशिश करनी होगी. एक नागरिक के रूप में कम से कम हम उनकी रिपोर्टों को सोशल मीडिया पर शेयर करने के साथ अपने परिचितों के व्हाट्सएप्प समूहों में भेजें तो झूठ और प्रोपेगंडा से लड़ने में मदद मिलेगी. हम अपने-अपने इलाकों में छोटे स्तर पर ही सही झूठी ख़बरों/प्रोपेगंडा की जांच-पड़ताल कर सकते हैं या फेक न्यूज/प्रोपेगंडा की जांच-पड़ताल के लिए फैक्ट चेकर्स के पास भेज सकते हैं.
हमें इन फैक्ट चेकर्स की हर तरह से मदद करनी चाहिए. अगर साल में एक बार अपनी आर्थिक सामर्थ्य के मुताबिक कम से कम 500 रूपये से लेकर 5000 रूपये तक मदद कर सकें तो उन्हें न सिर्फ अपना काम बढ़ाने, उसे स्थायित्व देने और अपनी पहुँच बढ़ाने में मदद मिलेगी बल्कि उनकी स्वतंत्रता भी सुनिश्चित हो सकेगी. फैक्ट चेकर्स कार्पोरेट या सरकारी पैसे के बजाय हम-आप जैसे लोगों के पैसे से चलें तो वे ज्यादा स्वतंत्र और निर्भीक होकर अपना काम कर पायेंगे.

कार्पोरेट न्यूज मीडिया में सुधार और उसके जन्तान्त्रिकीकरण के लिए

4. आज कार्पोरेट न्यूज मीडिया के स्वामित्व के नियमन की सख्त जरूरत है. इसकी शुरुआत न्यूज मीडिया कंपनियों के स्वामित्व और उसकी शेयर-होल्डिंग को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. उसमें सिर्फ कंपनी नहीं बल्कि उसके असली मालिक का नाम भी होना चाहिए. अभी ज्यादातर न्यूज मीडिया कम्पनियाँ शेयर-होल्डर के रूप में कंपनियों के नाम घोषित कर देती हैं लेकिन उससे यह पता नहीं चलता कि उसके वास्तविक मालिक कौन हैं. यही नहीं, इस जानकारी को एक पब्लिक पोर्टल पर डाला जाना चाहिए.

इसके अलावा न्यूज मीडिया में न सिर्फ बड़ी पूंजी के प्रवेश को सीमित और नियंत्रित करने की जरूरत है बल्कि मुख्यधारा के मीडिया में क्रास मीडिया प्रतिबंधों को भी लागू करने की जरूरत है. इस संबंध में टेलीकाम नियामक- ट्राई और एएससीआई प्रस्ताव सरकार के पास है. उनपर सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए. नागरिक समाज को और कार्पोरेट न्यूज मीडिया की मौजूदा स्थिति से चिंतित हर नागरिक (पाठक-दर्शक-श्रोता) को भी राजनीतिक दलों पर इस बारे में अपना स्टैंड स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना चाहिए.

5. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कार्पोरेट न्यूज मीडिया के कंटेंट के स्व-नियमन की मौजूदा व्यवस्था नैतिक विचलनों, कंटेंट में तोड़मरोड़ और जहरीले-सांप्रदायिक प्रोपेगंडा को नियंत्रित करने में काफी हद तक नाकाम साबित हुई है. लेकिन इसका विकल्प सरकारी नियमन कतई नहीं है. सरकारी नियमन मर्ज को और बदतर बना देगा. इसलिए आज जरूरत है कि कंटेंट संबंधी शिकायतों को रिपोर्ट करने-सुनने और उसकी जांच-पड़ताल करने के लिए संसद में पारित कानून के जरिये एक स्वतंत्र नियामक का गठन हो. यह नियामक सरकार और कार्पोरेट न्यूज मीडिया उद्योग दोनों से स्वतंत्र होना चाहिए. उसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संसद में विधेयक लाने से पहले उसके मसौदे पर व्यापक चर्चा और सभी भागीदारों से सलाह-मशविरा होना चाहिए. लेकिन उसे आर्थिक जुर्माना लगाने से लेकर गंभीर मामलों में लाइसेंस निलंबित करने तक का अधिकार होना चाहिए.

नागरिक समाज को इसकी मांग को लोकप्रिय बनाने और इसे स्वीकार करने के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव बनाना चाहिए. आखिर खुद को लोकतंत्र का पहरेदार बतानेवाले न्यूज मीडिया अपने कामकाज और कंटेंट की निगरानी और जवाबदेही से कब तक बचता रहेगा.

6. कार्पोरेट न्यूज मीडिया कंपनियों और उनके न्यूजरूम के जनतान्त्रिकीकरण को प्राथमिकता देने की जरूरत है. इसके लिए कई स्तरों पर पहल होनी चाहिए. सबसे पहले पत्रकारों/संपादकों की सेवा-शर्तों को बेहतर बनाने और उनकी नौकरी की सुरक्षा के लिए श्रमजीवी पत्रकार कानून, 1955 को संशोधित करके अखबारों के साथ-साथ टीवी न्यूज चैनलों और डिजिटल प्लेटफार्मों पर भी लागू करने की व्यवस्था करनी होगी. अस्थाई ठेके या सालाना कान्ट्रेक्ट पर या बिना किसी नियुक्ति पत्र के नौकरी कराने की व्यवस्था पर रोक लगनी चाहिए. इस कानून के तहत गठित होनेवाले पत्रकारों के वेतन आयोग की सिफारिशों को कड़ाई से लागू कराया जाना चाहिए. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिका सबसे अहम है और उसपर निगरानी रखी जानी चाहिए.
इस कानून को पिछले कुछ दशकों में ताकतवर न्यूज मीडिया कंपनियों और सरकारों के गठजोड़ ने कमजोर और बेमानी बना दिया है. लेकिन आज इस कानून को और प्रभावी और सशक्त बनाने की जरूरत है. इसके साथ ही पत्रकारों को अपने संस्थानों में यूनियन बनाने का अधिकार होना चाहिए. इसके लिए न्यूज मीडिया कंपनियों में यूनियन बनाना अनिवार्य होना चाहिए. यूनियन को कानूनी संरक्षण मिलनी चाहिए और उसके नेतृत्व में शामिल पत्रकारों/संपादकों को कंपनियों की बदले की कार्रवाई से सुरक्षा देने का उपाय किया जाना चाहिए.

7. न्यूज मीडिया संस्थानों के जनतान्त्रिकीकरण के लिए उनके न्यूजरूम की सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल को ज्यादा समावेशी और भागीदारीपूर्ण बनाने की जरूरत है. यह सचमुच अफ़सोस और चिंता की बात है कि लोकतंत्र का चौथा खम्भा होने का दावा करनेवाले न्यूज मीडिया संस्थान खुद बहुत अलोकतांत्रिक हैं. उनके न्यूजरूम में सवर्ण-पुरुष-शहरी और अभिजात्य/मध्यवर्गीय परिवारों से आनेवाले पत्रकारों/संपादकों का दबदबा है. उसमें दलितों-आदिवासियों-पिछड़े वर्गों-अल्पसंख्यकों-महिलाओं और गरीब/ग्रामीण पृष्ठभूमि के परिवारों से आनेवाले पत्रकारों की संख्या न के बराबर है. इसे बदले बिना न्यूज मीडिया खुद को लोकतान्त्रिक संस्था नहीं कह सकता.

नागरिक समाज से जुड़े संगठनों, पत्रकार यूनियनों और एडिटर्स गिल्ड जैसी संस्थाओं को न्यूज मीडिया कंपनियों और उनके न्यूजरूम को ज्यादा समावेशी और भागीदारीपूर्ण बनाने के लिए न सिर्फ इसे मुद्दा बनाना चाहिए बल्कि उनपर दबाव डालकर इस स्थिति को बदलने के लिए प्रेरित करना चाहिए. यहाँ आरक्षण की मांग नहीं की जा रही है लेकिन यह कानूनी प्रावधान किया जा सकता है कि न्यूज मीडिया कम्पनियाँ अपने सामाजिक प्रोफाइल की सालाना रिपोर्ट जारी करें. यही नहीं, उन न्यूज मीडिया कंपनियों को टैक्स में छूट और अन्य आर्थिक प्रोत्साहन (जैसे अन्य के मुकाबले 10 फीसदी ऊँचा एड रेट) देने चाहिए जो अपने न्यूजरूम में कम से कम 40 से 50 फीसदी समाचारकर्मी दलित-आदिवासी-पिछड़े-अल्पसंख्यक और महिला तबकों से भर्ती करें.

8. इन उपायों के बावजूद कार्पोरेट न्यूज मीडिया के उस हिस्से में सुधार की गुंजाइश कम दिखती है जो खुले तौर पर दक्षिणपंथी-सांप्रदायिक राजनीति खेमे में सम्बद्ध है और उसके एजेंडे के मुताबिक जहरीले-सांप्रदायिक प्रोपेगंडा में जुटा हुआ है. इससे निपटने के लिए सत्याग्रह और शांतिपूर्ण असहयोग के अलावा कोई रास्ता नहीं है. ऐसे समाचारपत्रों/पत्रिकाओं के साथ न्यूज चैनलों को चिन्हित करना चाहिए. उनके कामकाज के तरीकों और कंटेंट पर बारीक निगाह रखी जानी चाहिए. उनके गंभीर विचलनों को अनदेखा करने के बजाय उसे सोशल मीडिया पर “नाम लो, शर्मिंदा करो” के तहत चर्चा करनी चाहिए.
इसके साथ ही उनके आर्थिक बहिष्कार जैसे सब्सक्रिप्शन रद्द करने पर भी विचार करना चाहिए. उन कार्पोरेट्स पर भी निगाह रखनी चाहिए जो ऐसे जहरीले प्रोपेगंडा को स्पांसर कर रहे हैं. आखिर जहरीले प्रोपेगंडा को सबस्क्राइब करना या उसके स्पांसर्स की वस्तुएं/सेवाएँ खरीदना क्या उन्हें परोक्ष प्रोत्साहन देना नहीं है?

लोक प्रसारण के लिए प्रस्ताव

9. भारत में जब भी न्यूज मीडिया में सुधार और बदलाव और पत्रकारिता की साख को बहाल करने की बात होती है, उसमें आमतौर पर लोक प्रसारणकर्ता (पब्लिक ब्राडकास्टर) यानी दूरदर्शन और आकाशवाणी की चर्चा नहीं होती है. हालाँकि 80 के दशक तक दूरदर्शन/आकाशवाणी की स्वायत्तता और आज़ादी का मुद्दा सार्वजनिक बहसों और राजनीतिक दलों के एजेंडे पर रहता था लेकिन 90 के दशक के उत्तरार्ध से यह मुद्दा सार्वजनिक बहसों से गायब हो गया है. जैसे यह मान लिया गया हो कि दूरदर्शन/आकाशवाणी सरकारी चैनल हैं और उनका काम सरकारी प्रचार करना है.

मजे की बात यह है कि दूरदर्शन/आकाशवाणी आज कानूनी रूप से एक स्वायत्त निगम- प्रसार भारती के तहत काम कर रहे हैं जो संसद को जवाबदेह है लेकिन इसके बावजूद उनके कामकाज की वैसी सार्वजनिक पड़ताल या संसदीय छानबीन नहीं होती दिखती है, जैसी दुनिया के बहुतेरे देशों में लोक प्रसारकों की होती है. उदाहरण के लिए बीबीसी के कामकाज की संसदीय और सार्वजनिक पड़ताल होती रहती है और वह अक्सर सार्वजनिक आलोचनाओं के केंद्र में रहती है.

भारत में भी प्रसार भारती के कामकाज पर निगरानी रखने की जरूरत है. यह हमारे-आपके टैक्स के पैसे से चलता है. लोक प्रसारक को आम लोगों लोगों की सूचना-समाचार की जरूरतों को पूरा करनेवाला होना चाहिए. वह सरकार का भोंपू कतई नहीं है और न होना चाहिए. नागरिक समाज के संगठनों को उसके कामकाज और कंटेंट पर सार्वजनिक चर्चा करनी चाहिए और राजनीतिक दलों को संसद में उसकी निगरानी और जवाबदेही तय करनी चाहिए ताकि वह वास्तव में लोक प्रसारक की तरह काम करे.

वैकल्पिक मीडिया के लिए प्रस्ताव

10. इसमें कोई शक नहीं है कि मौजूदा दौर में जब दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी “मीडिया कैप्चर” एक सार्वजनिक सच्चाई है, वैकल्पिक न्यूज मीडिया को मजबूत बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. वैकल्पिक न्यूज मीडिया को मजबूत और प्रभावी बनाने की यह जिम्मेदारी हर उस आम नागरिक की है जो लोकतंत्र में सच्ची, स्वतंत्र, तथ्यपूर्ण, वस्तुनिष्ठ और संतुलित सूचनाओं/समाचारों के अबाध प्रवाह को बुनियादी जरूरत समझता है और जो खोजी-आलोचनात्मक-प्रतिपक्षी न्यूज मीडिया को अपनी आज़ादी और अधिकारों की गारंटी और पहरेदार मानता है.

वैकल्पिक न्यूज मीडिया को मजबूत बनाने के लिए यह जरूरी है कि ऐसे सभी स्वतंत्र-आलोचनात्मक मीडिया उपक्रमों की आर्थिक मदद की जाए जिन्होंने सरोकारी पत्रकारिता की है, सत्ता-कार्पोरेट से सवाल पूछने का साहस दिखाया है और सार्वजनिक विमर्श में आमलोगों के मुद्दों को उठाने की कोशिश की है. सभी सचेत नागरिकों को जो कार्पोरेट न्यूज मीडिया के अखबारों/न्यूज चैनलों के लिए हर महीने आठ सौ से हजार रूपये खर्च करते हैं, उन्हें इन वैकल्पिक न्यूज मीडिया उपक्रमों पर भी हर महीने 200-500 रूपये खर्च करने पर जरूर विचार करना चाहिए. हमारे-आपके पैसे पर चलनेवाला न्यूज मीडिया ही हमारे हितों की रखवाली कर सकता है, सत्ता-कार्पोरेट के दबावों को झेल सकता है और अपनी स्वतंत्रता सुरक्षित रख सकता है.
असल में, आज दुनिया भर में खासकर विकसित और उदार पूंजीवादी लोकतान्त्रिक पश्चिमी देशों में कार्पोरेट न्यूज मीडिया का मौजूदा विज्ञापन और बड़ी पूंजी आधारित बिजनेस माडल साख के संकट का सामना कर रहा है. ज्यादातर मीडिया विश्लेषक मान रहे हैं कि यह बिजनेस माडल संकट में है और टिकाऊ नहीं है, इसमें पत्रकारीय स्वतंत्रता संभव नहीं है, नैतिक विचलनों और समझौतों को रोकना मुश्किल है और इसलिए इसका विकल्प खोजना जरूरी है. इसका विकल्प पत्रकारों के कोआपरेटिव/ट्रस्ट पर आधारित स्वामित्ववाली कंपनियों और आम पाठकों/दर्शकों के सब्सक्रिप्शन पर जोर देने में देखा जा रहा है. कहने का आशय यह है कि आम पाठकों/दर्शकों की मदद के बिना वैकल्पिक पत्रकारिता का खड़ा होना न सिर्फ मुश्किल है बल्कि उसकी स्वतंत्रता की गारंटी के लिए भी जरूरी है.

11. वैकल्पिक न्यूज मीडिया के सहयोग/समर्थन के लिए उनके कंटेंट को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी आम नागरिकों और नागरिक समाज के संगठनों को उठानी पड़ेगी. इसके लिए प्रस्ताव है कि देश के जिलों/कस्बों और यहाँ तक कि गांवों में भी वैकल्पिक मीडिया को लेकर चिंतित सचेत, सक्रिय और उदार नागरिकों के समूह बनें जिनका नाम “वैकल्पिक मीडिया मित्र मंडली” जैसा हो सकता है. ये समूह समय-समय पर न सिर्फ इन वैकल्पिक न्यूज मीडिया प्लेटफार्मों के लेखों/रिपोर्टों पर चर्चा आयोजित करें, उसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए अपने सोशल मीडिया पर शेयर करने से लेकर व्हाट्सएप्प समूहों के जरिये और लोगों तक पहुंचाएं बल्कि उनकी आर्थिक मदद के लिए अभियान भी चलायें.

12. इसके साथ ही सचेत और सक्रिय नागरिकों और उनके समूहों को वैकल्पिक न्यूज मीडिया प्लेटफार्मों की निरंतर निगरानी भी करनी चाहिए. उनके सहयोग और समर्थन का मतलब यह कतई नहीं है कि वे आलोचना से परे हैं या गलतियाँ नहीं कर सकते हैं. दूसरी ओर, उन्हें भी ऐसी आलोचनाओं को न सिर्फ धैर्य से सुनना चाहिए बल्कि गंभीर आलोचनाओं को अपने मंचों पर जगह देनी चाहिए. उन आलोचनाओं पर बहस और चर्चा को प्रोत्साहित करना चाहिए. कहने की जरूरत नहीं है कि वैकल्पिक न्यूज मीडिया प्लेटफार्मों को न सिर्फ अधिक लोकतान्त्रिक और उदार होना चाहिए बल्कि नैतिक मानदंडों के मामले में कार्पोरेट न्यूज मीडिया के बरक्स आदर्श पेश करना चाहिए. उन्हें अपने न्यूजरूम में अधिक समावेशी और सामाजिक विविधता और भागीदारी को प्रोत्साहित करनेवाला होना चाहिए. उन्हें अपने व्यावसायिक लेनदेन और आय-व्यय का लेखा-जोखा पेश करने में पारदर्शी और जिम्मेदार होना चाहिए. उन्हें अपने कामकाज की नागरिक समाज से निगरानी के लिए तैयार रहना चाहिए.

नागरिकों यानी पाठकों/दर्शकों के लिए कुछ प्रस्ताव

13. पत्रकारिता की साख को बहाल करने और उसे उसकी भूमिका में वापस लाने की कोई पहल तब तक कामयाब नहीं हो सकती है जब तक आम नागरिक में सचेत, सतर्क और आलोचनात्मक समझ से लैस न हों. यह आसान प्रोजेक्ट नहीं है. लेकिन इसके बिना कोई विकल्प भी नहीं है. असल में, आज जिस नियोजित तरीके से औद्योगिक स्तर पर झूठ, प्रोपेगंडा और जहरीला-सांप्रदायिक प्रचार चल रहा है, उसका मुकाबला नागरिकों को ही करना पड़ेगा. इसके लिए जरूरी है कि नागरिकों का सचेत हिस्सा और नागरिक समाज के संगठन यह जिम्मेदारी लें कि वे अपने परिवारों से लेकर कार्यस्थलों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर अपने परिवारजनों, सहकर्मियों और मित्रों में आलोचनात्मक सोच-समझ विकसित करने के लिए काम करेंगे.
यह सच है कि एक सचेत और आलोचनात्मक नागरिक तैयार करने में क्रिटिकल न्यूज मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका होती है लेकिन आज एक क्रिटिकल और सचेत न्यूज मीडिया खड़ा करने की जिम्मेदारी सचेत और क्रिटिकल नागरिकों को उठानी पड़ेगी.

यहाँ एक बार फिर से दोहराना जरूरी है कि ये सिर्फ कुछ प्रस्ताव हैं जिनपर चर्चा की जरूरत है. यह कोई न्यूज मीडिया में सुधार, पत्रकारिता की साख बहाली और झूठ-प्रोपेगंडा से लड़ने की मुकम्मल योजना या घोषणापत्र नहीं है. इसमें कई मुद्दे छूट गए या छोड़ दिए गए हैं. वजह चर्चा और बहस के लिए गुंजाइश छोड़ना और इसे व्यापक और समावेशी बनाना है. लेकिन इतना तय है कि कार्पोरेट न्यूज मीडिया में सुधार से लेकर वैकल्पिक न्यूज मीडिया को मजबूत बनाने के एजेंडे को नागरिक समाज और राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में लाया जाना जरूरी हो गया है. यह देश में लोकतंत्र की सेहत और नागरिकों के अधिकारों से अभिन्न रूप से जुड़ा मुद्दा है. न्यूज मीडिया और पत्रकारिता से जुड़े इन सवालों और मुद्दों को उठाये बिना लोकतंत्र बचाने की कोई मुहिम सफल नहीं हो सकती है. इसे और अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए.

लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में पत्रकारिता के प्रोफ़ेसर हैं. उनका ट्विटर हैंडल है: @apradhan1968

एमएसपी पर जल्द गठित हो सकती है समिति, लेकिन कानूनी गारंटी के प्रावधान की संभावना कम

केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के मुद्दे पर समिति गठित करने के बारे जल्दी ही फैसला ले सकती है। संयुक्त किसान मोर्चा ने तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ 13 माह का आंदोलन समाप्त करने के लिए तीन कानूनों को रद्द करने की मांग माने जाने और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के लिए कानूनी गारंटी की शर्त रखी थी। सरकार ने तीन कानून रद्द कर दिये थे और एमएसपी पर एक समिति गठित करने का वादा किया था। यह वादा केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव द्वारा संयुक्त किसान मोर्चा को लिखे एक पत्र में किया गया था। साथ ही दूसरी शर्तों को मानने के संबंध में भी जानकारी इस पत्र में दी गई थी। लेकिन एमएसपी पर कानूनी गारंटी के मुद्दे पर अभी तक समिति गठित नहीं की गई है। 

कृषि मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक एमएसपी पर समिति गठित करने के बारे में कोई दुविधा नहीं है और जल्दी ही यह समिति गठित की जा सकती है। समिति के गठन में देरी के बारे में पूछे जाने पर उक्त सूत्र का कहना है कि पिछले दिनों पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों के मद्देनजर चुनाव आयोग की शर्तों को देखते हुए यह समिति गठित नहीं की जा सकी। लेकिन अब चुनाव प्रक्रिया पूरी हो गई है इसलिए समिति गठन के रास्ते में अब कोई बाधा नहीं है। 

एमएसपी पर समिति का गठन किन शर्तों के साथ होगा यानी उसकी टर्म्स ऑफ रेफरैंस क्या होगी, इस सवाल पर तो उक्त सूत्र ने कुछ साफ नहीं किया लेकिन यह जरूर कहा कि समिति के कामकाज के दायरे में एमएसपी पर कानूनी गारंटी देने का प्रावधान इसमें जोड़ने की संभावना नहीं है। उनका कहना है कि संयुक्त किसान मोर्चा को मंत्रालय ने जो चिट्ठी लिखी थी उसमें कहीं भी एमएसपी पर कानूनी गारंटी का जिक्र नहीं था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 19 नवंबर, 2021 को राष्ट्र को संबोधित करते हुए तीन विवादास्पद केंद्रीय कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की गई थी। उसके बाद इन कानूनों को रद्द करने की प्रक्रिया संसद में पूरी की गई और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद तीनों कानून रद्द हो गए। इसके बाद कृषि मंत्रालय के सचिव ने संयुक्त किसान मोर्चा को पत्र लिखकर किसान संगठनों की मांगों को मानने और उन पर विचार की जानकारी दी। इसमें आंदोलन के दौरान मृतक किसानों को मुआवजा और किसानों के खिलाफ आंदोलन के दौरान दर्ज किये गये केस वापस लेने की बात थी। इन दोनों मुद्दों पर राज्यों को अमल करने की बात कही थी और कुछ राज्यों ने इन पर अमल किया भी लेकिन यह प्रक्रिया अभी अधूरी है। वहीं एमएसपी पर एक समिति गठित करने की बात इस पत्र में की गई थी। यह समिति अभी तक गठित नहीं की गई है। कृषि सचिव के पत्र के बाद किसान संगठन दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे अपने धरनों और आंदोलन को समाप्त कर दिसंबर, 2021 के दूसरे सप्ताह में अपने घरों को लौट गये थे। 

वहीं केंद्र सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए किसान संगठनों ने सांकेतिक विरोध दर्ज कराया है। इस तरह का विरोध 21 मार्च को भी जिला अधिकारियों को ज्ञापन देकर दर्ज कराया गया। संयुक्त किसान मोर्चा ने सरकार द्वारा मांगों पर अमल नहीं किये जाने की स्थिति में एक आंदोलन की रूपरेखा की भी घोषणा कर रखी है।

इस आंदोलन में सबसे बड़ी भागीदारी वाले राज्य पंजाब के कुछ किसान संगठनों ने संयुक्त समाज मोर्चा बनाकर विधान सभा का चुनाव भी लड़ा और उसमें उनकी बुरी तरह हार हुई। वहीं पंजाब में अब आम आदमी पार्टी की सरकार मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में बन गई है। इसलिए आने वाले दिनों में वहां की राजनीति और किसान आंदोलन के इन मुद्दों पर किसानों का रुख काफी अहम होगा। वहीं दूसरी ओर 22 मार्च को दिल्ली में कुछ किसान संगठनों ने एमएसपी की कानूनी गारंटी पर एक मोर्चा गठित कर आंदोलन करने की घोषणा की है। एमएसपी गारंटी किसान मोर्चा की तरफ से आयोजित इस विरोध में 20 राज्यों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

इस संगठन में महाराष्ट्र के किसान संगठन स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के नेता और पूर्व सांसद राजू शेट्टी और आल इंडिया किसान संघर्ष कोआर्डिनेशन कमेटी के पूर्व संयोजक और राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के संयोजक वी.एम. सिंह समेत कई किसान नेता इस मोर्चा में मुख्य भूमिका में हैं। इसलिए अब देखना है कि सरकार जल्दी ही एमएसपी पर समिति गठित करती है या इस मुद्दे पर किसान संगठन अगले आंदोलन की शुरुआत करते हैं। हालांकि मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें जो समिति का गठन जल्दी हो सकता है।    

(हरवीर सिंह रूरल वॉइस के एडिटर हैं. उनका भारत की खेतीबाड़ी और ग्रामीण पत्रकारिता में महत्वपूर्ण स्थान है.)

लॉकडाउन से सूक्ष्म, लघु और मझोले कारोबार पर सबसे भयानक मार पड़ी, 2020-2021 में क़र्ज़ 20,000 करोड़ बढ़ा

पिछले दो वर्षों में कोविड-19 महामारी के कारण अर्थव्यवस्था में आई मंदी के कारण देश के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और केंद्र सरकार द्वारा ऋण पुनर्गठन योजनाओं और पैकेजों की घोषणा के बावजूद, MSMEs सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं।

इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से RBI से प्राप्त जानकारी के हवाले से कहा है कि MSMEs की कुल गैर-निष्पादित संपत्ति (NPA) या खराब ऋण सितंबर 2020 में 1,45,673 करोड़ की तुलना में 20,000 करोड़ रुपये बढ़कर सितंबर 2021 में 1,65,732 हो गया।

आरबीआई के अनुसार, एमएसएमई का एनपीए 17.33 लाख करोड़ रुपये के सकल अग्रिम का 9.6 प्रतिशत है, जो सितंबर 2020 में 8.2 प्रतिशत था। दरअसल, एमएसएमई का एनपीए सितंबर 2019 में 1,47,260 करोड़ रुपये (सकल अग्रिम का 8.8 प्रतिशत) से कम हो गया था, जो 2021 में फिर से बढ़ गया है।

आरबीआई का कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एमएसएमई का एनपीए में 1,37,087 करोड़ रुपये का बड़ा हिस्सा है। सितंबर 2021 तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में PNB का MSME NPA 25,893 था। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का MSME NPA 24,394 करोड़ रुपये, यूनियन बैंक का 22,297 करोड़ रुपये और केनरा बैंक का 15,299 करोड़ रुपये था।

आरबीआई की परिभाषा के अनुसार, एक सूक्ष्म इकाई का निवेश एक करोड़ रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए और कारोबार 5 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए। छोटी इकाइयों का निवेश 10 करोड़ रुपये और कारोबार 50 करोड़ रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए। मध्यम उद्यम का निवेश 50 करोड़ रुपये और टर्नओवर 250 करोड़ रु से अधिक नहीं होना चाहिए।

बता दें कि 90 दिनों के बाद भी मूलधन या ब्याज नहीं चुकाने पर लोन एनपीए में बदल जाता है।

सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में आरबीआई द्वारा बताया गया है कि जनवरी 2019, फरवरी 2020, अगस्त 2020 और मई 2021 में एमएसएमई के लिए चार ऋण पुनर्गठन योजनाओं की घोषणा के बाद से एमएसएमई के एनपीए में वृद्धि हुई है।

इन योजनाओं के तहत 1,16,332 करोड़ रुपये के 24.51 लाख एमएसएमई खातों के ऋणों का पुनर्गठन किया गया है।

आरबीआई की ओर से मई 2021 में जारी सर्कुलर के मुताबिक आरबीआई की ‘ट्रेंड्स एंड प्रोग्रेस ऑफ बैंकिंग’ रिपोर्ट के मुताबिक 51,467 करोड़ रुपये के कर्ज का पुनर्गठन किया गया।

एमएसएमई क्षेत्र सबसे अधिक महामारी प्रभावित क्षेत्रों में से एक था। मार्च 2020 में कोविड महामारी के मद्देनजर सरकार द्वारा देशव्यापी सख्त तालाबंदी की घोषणा के बाद हजारों एमएसएमई या तो बंद हो गए या उनकी हालत बिगड़ गई। उनको पुनर्जीवित करने के लिए, आरबीआई और सरकार ने आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) सहित कई उपाय पेश किए, जिसने एमएसएमई और व्यवसाय को 3 लाख करोड़ रुपये का असुरक्षित ऋण प्रदान किया। आरबीआई ने एमएसएमई को परिसंपत्ति वर्गीकरण डाउनग्रेड के बिना ऋणों के एकमुश्त पुनर्गठन की योजना को भी बढ़ाया और कृषि, एमएसएमई और आवास को प्राथमिकता वाले क्षेत्र ऋण (पीएसएल) के रूप में वर्गीकृत करने के लिए एनबीएफसी (एमएफआई के अलावा) को बैंक ऋण देने की अनुमति दी।

RBI और केंद्र सरकार ने आर्थिक गतिविधियों को पुनर्जीवित करने के लिए कई उपाय किए, जिसमें आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) शामिल है, जिसने MMME और छोटे व्यवसायों को 3 लाख करोड़ रुपये का असुरक्षित ऋण प्रदान किया।

बैंकिंग सूत्रों का कहना है कि पुनर्गठन योजनाओं और पैकेजों से हजारों इकाइयों को लाभ नहीं हुआ, जो पहले से ही कर्ज में थीं।

सांप्रदायिकताः ऑनलाइन अपराध के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक संदर्भ

सुल्ली डील्स और बुल्ली बाई नाम के एप्स का कांड जिस तरह से उद्घाटित हो रहा है वह अत्यंत डरावना है। इस अर्थ में नहीं कि उससे कोई आतंककारी षडय़ंत्र सामने आ रहा है बल्कि इसलिए कि उससे निम्न मध्य और मध्यवर्ग के बच्चे कानून और काफी हद तक उस  राजनीति की जद में आ गए हैं जो अत्यंत हिंसक और विभाजनकारी है। मसला ऐसा नाजुक है कि कई होनहार बच्चे दागी होनेवाले हैं, कहना कठिन है, उनका भविष्य क्या मोड़  लेगा? पर समस्या का इसी विपदा के साथ अंत नहीं होनेवाला है, यह कई ऐसे स्तरों पर, जिनके लिए हमारा समाज तैयार नहीं है, अपनी उपस्थिति बनाए रखनेवाली है।

फिलहाल पूरा प्रसंग जो बतलाता है उसका लब्बो लुबाव यह है कि गलत राजनीति युवाओं को भटकाने में देर नहीं  लगाती और जरा सी चूक अच्छे खासे भविष्य को तबाह कर देने का कारण बन सकती है। विशेषकर उन बच्चों को जिनके मां बाप कम पढ़े लिखे हैं या पूरी तरह कंप्यूटर ‘इललिटरेट’ (अनभिज्ञ) हैं। उन्हें यह आभास तक नहीं हो पाता कि बच्चों के हाथ में  लैपटॉप या स्मार्ट फोन नाम का कितना विध्वंसक उपकरण है और इस में क्या गुल खिलाने की क्षमता है।  मुश्किल यह है कि यह तकनीकी इस हद तक व्यक्ति केंद्रित है कि घर के दूसरे सदस्यों को हवा तक नहीं लगती कि वह सदस्य, जो युवा लड़की या लड़का है, अपने कंम्यूटर अथवा स्मार्ट फोन से चिपका, कर क्या रहा है। दुर्भाग्य से वरिष्ठ पीढ़ी के लिए एक बड़ा छद्म यह है कि कम्यूटर/इंटरनेट सूचना और ज्ञानका पर्याय मात्र हैं। कोविड महामारी ने शिक्षा को ऑनलाइन कर इस छद्म को बढ़ाने में अतुलनीय योगदान दिया है। जबकि सच यह है कि व्यापारिक हितों के चलते कम्यूटर/इंटरनेट ज्ञान या कहिए सूचना का पर्याय मात्र नहीं रहा है बल्कि और भी बहुत कुछ हो चुका है: व्यापार, प्रचार, कामुकता, अश्लीलता, आक्रामकता, घृणा और असहिष्णुता फैलाने का सबसे कारगर और बर्बर माध्यम।  सोशल मीडिया नाम के मंचों की लाभ के चक्कर में , अधिक से अधिक डाटा इकट्ठा (माईनिंग) करने का लक्ष पाने के लिए रणनीतिगत लोगों को किसी भी बहाने अपने मंचों पर अधिक से अधिक सक्रिय रहने के लिए उकसाना है और यह आक्रामकता सेक्स, घृणा तथा हिंसा के कारोबार के माध्यम से ज्यादा प्रभावशाली तरीके से ही हासिल की जाती है। अंतत: ये मंच लोगों को वायवीय दुनिया का हिंसक, बर्बर और यौनविकृतियों के संसार का सूमो पहलवान बना देते हैं। एक नतीजा यह होता है कि इस तरह के पहलवान जीवंत समाज और दुनिया से कट कर अंतरमुखी ही नहीं हो जाते बल्कि ज्यादा खतरनाक यह है कि मासूम मन मस्तिष्क के युवा व्यक्तिवादी, आत्ममुग्ध और विकृतियों का शिकार बन जाते हैं। दूसरे शब्दों में इस माध्यम का इस्तेमाल, कम से कम बच्चों और किशोरों द्वारा, बिना संरक्षकों की देखरेख के होना, घातक साबित हो सकता है, जैसा कि सुल्ली, बुल्ली तथा क्लबहाउस के मामले में हुआ है। भारतीय या कहिए तीसरी दुनिया के संदर्भ में इसकी एक सीमा यह है कि इसका अधिसंख्य कारोबार अंग्रेजी में है और उसकी तकनीकी शब्दावली इस कदर नई, संकेतों व कूट अक्षरों की है कि भारत जैसे समाज में, जहां शिक्षा और जीवन स्तर काफी कम है, वरिष्ठों के लिए यह पूरी तरह अजनबी दुनिया के रूप में सामने आता है।

दूसरी ओर, विशेषकर वे व्यक्ति, सामाजिक और धार्मिक  संगठन, जो अतिमानवीय या दैवीय चमत्कारों का धंधा करते हैं या अपनी धारणाओं में कट्टरता और विगत के अमूर्त वैभव, चमत्कारों तथा उपलब्धियों से प्रचालित हैं, उनके लिए यह माध्यम इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह बिना शोर शराबे के अपनी इच्छित बात/विचार लक्ष्य तक असानी से पहुंचने की क्षमता हासिल कर लेते हैं। अजीब विडंबना यह है कि स्वयं को धर्म विशेष से जोडऩेवाले, अपनी हीनता में, जब दूसरे धर्मों पर आक्रमण करते हैं तब वे मात्र तार्किक स्तर पर बात नहीं करते बल्कि हिंसा, यौन हिंसा, कुतर्क और अन्य विकृतियों का इस्तेमाल करते हैं। अक्सर ऐसी विभत्स भाषा और प्रतीकों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनसे सामान्य जिंदगी में वे स्वयं भी जुडऩे का साहस नहीं करेंगे। बल्कि तब यह अपराध माना जाएगा।

इसलिए ऐसा नहीं है कि इस माध्यम का इस्तेमाल सिर्फ किसी धर्म विशेष के कट्टर पंथी ही करते हों बल्कि हर धर्म के स्वयंभू प्रचारक इस माध्यम से अपने ऐच्छित लक्षों पर हमला भी करते हैं। तर्क करने की जगह नास्तिकों, दूसरे धर्मावलंबियों और धर्म को लेकर उनसे प्रतिकूल समझ रखने वालों को आतंकित और प्रताडि़त किया जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह माध्यम लोगों को उनके एकांत में घेरता है और उन पर हर तरह का नैतिक, अनैतिक, व्यभिचारी हमला करता है, उस तरह की बर्बर और असामाजिक भाषा और संदर्भों से, जिन से कोई सामान्य जीवन में किसी से बात करने की हिम्मत नहीं कर सकता।

कारण जो भी हो, कट्टर धार्मिक व्यक्ति नहीं मानना चाहता कि मानव समाज जहां पहुंच चुका है उसमें धर्म और ‘ईश्वर’ का हस्तक्षेप समाप्त हो गया है। और उसके साथ वे सब चीजें जो कभी आदमी के जीवन को नियंत्रित करती थीं, अपना अर्थ खो चुकी हैं या बदल चुकी हैं।  इस तरह की पुरातन और जड़  सोच व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अंतत: घातक सिद्ध होती है। यह बात और है कि उन समाजों के लिए जो आधुनिक ज्ञान और सामाजिक परिवर्तन से तालमेल बैठाने में असफल हैं या इस दौड़ में पीछे छूट गए हैं विगत से आसानी से पीछा नहीं छुड़ा पाते। यह इसलिए भी नजर आता है क्यों कि भौतिक और सामाजिक प्रगति का फैलाव, विशेषकर तीसरी दुनिया में असमान है। इसी कारण इस समाज का बड़ा हिस्सा विगत को भव्य सपने की तरह याद करता रहता है। इस तरह के समाजों में प्रतिगामी नेतृत्व के तत्कालिक रूप से लाभान्वित होने की पूरी संभावना रहती है जैसा कि स्वयं हमारे समाज में हो रहा है। यह बात भी छिपी नहीं है कि अक्सर पुनर्थोनवादी विचारधारा राजनीति सत्ता पर कब्जा तो जमा लेती है पर वह समाज को न तो आधुनिक बनाती है और न ही तार्किक, क्यों कि वह स्वयं तार्किक हो या न हो पर देश और समाज को लगातार विगत में और विगत के नियमों से संचालित रखना चाहती है। इसलिए जनता का जो विश्वास वह विगत के वैभव और उपलब्धियों के नाम पर प्राप्त करती है, अपनी जड़ता और विरोधाभासों  के कारण जल्दी ही गंवा देती है और फिर दमन का सहारा लेती है। सच यह है कि विगत को लौटना न तो संभव है और न ही विगत भविष्य का निर्णायक, निर्धारक हो सकता है, इसलिए उसकी सीमाओं को उजागर होने में समय नहीं लगता। चूंकि मानव का भविष्य अंतत: नये ज्ञान और अनुसंधान पर ही निर्भर है परिणाम स्वरूप परंपरा की मानसिकता और नये बदलाव, लगातार एक दूसरे से टकराते रहते हैं।

इसी से जुड़ा दूसरा पक्ष यह है कि धर्म की अगर बिना ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में समझे, भाववादी व्याख्या की जाएगी तो उससे जो समझ बनेगी, वह लोगों को नियमों को वृहत्तर समाज के संदर्भ में न मानने को ही नहीं उकसायेगी बल्कि अंतत: हिंसक और समाज विरोधी बनाने में भी कसर नहीं छोड़ेगी। सच यह है कि सुल्ली-बुल्ली एप्स कांड कमोबेश इसी समझ का नतीजा है जिसमें विज्ञान पढऩेवाले और तकनीकी ज्ञान से लैस 18 से 30 वर्ष की आयु के अब तक कम से कम नौ युवा (इस आंकड़े  के बढऩे की पूरी संभावना है) अपराधी के रूप में सामने हैं। ये सभी बच्चे निम्नमध्य और मध्यवर्ग के हैं। अधिसंख्य ऐसे परिवारों से जिनके मां बाप पूरी तरह कंप्यूटर अपढ़ (इलिटरेट) हैं।

प्रतिनिधिक शिकार

इन पकड़े गए युवाओं में दो युवा विशेष ध्यान देने की मांग करते हैं। इसलिए कि वे इस प्रवृत्ति के प्रतिनिधिक शिकार हैं।

पहले 19 वर्षीय श्वेता सिंह पर बात करते हैं। उत्तराखंड के औद्योगिक शहर रुद्रुपुर की इस लड़की ने अभी सिर्फ 12वीं पास की है। उसकी मां का 10 वर्ष पहले कैंसर से देहांत हो गया था और गत वर्ष पिता भी कोविड का शिकार हो गए। तीन बहनों हैं सबसे छोटा भाई है। उन्हें कोविड से अनाथ होने वाले बच्चों को राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली तीन हजार रुपये प्रति माह की सरकारी मदद मिल रही है और साथ ही पिता, जिस कंपनी में काम करते थे, वहां से 10 हजार रुपये भी प्रति माह मिलते हैं। इससे उनका गुजारा चल रहा है। श्वेता को महाराष्ट्र पुलिस ने, जिसने इस कांड का सबसे पहले भंडा फोड़  किया था, तीन जनवरी को गिरफ्तार किया। पुलिस  का कहना है कि श्वेता सोशल मीडिया में पिछले एक वर्ष से जरूरत से ज्यादा सक्रिय थी और अक्सर ऑनलाइन अतिवादी बातें पोस्ट करती थी। यह वही दौर है जब उसके पिता का देहांत हुआ। उस पर गंभीर आरोप यह है उसने अपने मृत पिता का फर्जी एकाउंट बनवाया हुआ था।

श्वेता का पकड़ा जाना किसी दुर्भाग्य से कम नहीं है क्यों कि उसके पक्ष में कोई खड़ा होनेवाला भी शायद ही मिले। उसे लेकर एक सवाल यह है कि आखिर वह धर्म को लेकर इतनी असहिष्णुता क्यों पाले है? क्या उसके परिवार की दुर्दशा के लिए दूसरे धर्म का कोई व्यक्ति जिम्मेदार है? उस विधर्मी ने उनका इलाज नहीं होने दिया या उन्हें बीमारी सराई? या फिर उन्होंने श्वेता के परिवार के सदस्यों के रोजगार हथियाए हुए हैं? अगर ऐसा नहीं है तो फिर श्वेता की सक्रियता का कारण क्या हो सकता है? बेहतर यह नहीं होता कि वह कुछ ऐसा करती जिससे जल्दी पढ़ लिख जाती। वह ग्रेजुएश में दाखिला लेने की तैयारी कर रही थी। इसके अलावा अपनी बड़ी बहिन का छोटे भाई बहन को पढ़ाने लिखाने में हाथ बंटाती? आखिर ऐसा क्या रहा होगा जिसने उसे इस अतिवादी दुनिया से जोड़ा? क्या देश में बढ़ती सांप्रदायिकता और नेताओं के भड़काऊ भाषण अथवा क्या यह शगल उसके लिए यथार्थ से मुंह छिपाने का एक रास्ता बना होगा?

इस संदर्भ में मुंबई पुलिस की बात महत्वपूर्ण है कि ”नेटवर्क को वास्तव में बड़ा होना चाहिए। यह 21 वर्ष के या 18 वर्ष के इंटरनेट पर सक्रिय बच्चों का काम नहीं हो सकता।‘’  इसी से जुड़ी एक शंका यह भी हो सकती है कि यह सब किसी प्रलोभन के  तहत किया जा रहा हो?  अगर ऐसा है तो यह इस पूरे एपिसोड का और ज्यादा भयावह और दुखद पक्ष है। इस कांड का दूसरा किरदार जोरहाट, असम का 21 वर्षीय नीरज बिशनोई है। उसका मामला भी खासा जटिल है। परिवार मूलत: राजस्थानी है और उसके पिता वहां आजीविका के लिए पंसारी की दुकान चलाते हैं। उसकी एक बहन कानून पढ़ रही है और दूसरी एमएससी में है। नीरज को उसके घर से दिल्ली पुलिस ने पकड़ा। पुलिस का मानना है कि वह इस षडय़ंत्र का सरगना है। उसने ‘गिटहब’ के माध्यम से बुल्ली बाई एप बनाया था जिसमें मुस्लिम महिलाओं को नीलाम किया जाता था। पुलिस का तो यहां तक मानना है कि बुल्ली एप के अलावा भी छह महीने पहले बनाए गए सुल्ली डील्स एप में भी उस का हाथ है ।

जो विवरण इस युवक के बारे में उपलब्ध हैं वे खासे हैरान करनेवाले हैं। इंजीनियरिंग का छात्र नीरज अति भक्त किस्म का आत्मकेंद्रित युवक है। बाहर के दोस्त मित्र की तो छोड़ें  वह अपने के लोगों से भी ज्यादा बातचीत नहीं करता। अंग्रेजी दैनिक द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार पढऩे लिखने में तेज इस युवक को अपनी प्रतिभा के बल पर इंजीनियरिंग में सीधे दाखिला मिला है।  22 जनवरी की इस रिपोर्ट के मुताबिक नीरज सुबह उठ कर मंदिर जाता है।  वहां शिव और हनुमान की कम से कम एक घंटे पूजा करता है। लौटकर कुछ घंटे लैपटॉप पर लगाने के बाद खाना खाता है। आराम करने के बाद उठ कर एक घंटे बिना नागा’सुंदर कांड’ (रामचरतिमानस ) का पाठ करता है। उसका कोई सामाजिक दायरा नहीं है, न दोस्त न मित्र। गोकि वह निजी स्कूल में पढ़ा है पर दुर्भाग्य से जब से उसे भोपाल के इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला मिला है, कोविड महामारी के कारण कालेज एक दिन नहीं खुला पाया है। संभव है अगर कालेज खुलता और उसे होस्टल में रहना पड़ता, उसका दायरा विस्तृत होता, तब शायद वह इतना आत्मकेंद्रित नहीं रहता।

विज्ञान के छात्र की अवैज्ञानिकता 

प्रश्न यह है कि विज्ञान का यह छात्र इस हद तक गैर वैज्ञानिक क्यों है? क्यों उसकी विज्ञान की समझ मात्र घोटा लगाने तक ही सीमित रही है जिसके चलते उसे इंजीनियरिंग में दाखिला मिला। क्या यह हमारी शिक्षा प्रणाली की कमियों की ओर कोई संकेत करता है, उसकी एक आयामिता को लेकर? किसी ग्रंथ के एक अध्याय को रोजबरोज आंखमूंद कर पढ़े चला जाना क्या इस बात का संकेत नहीं है कि वह आदमी यांत्रिकता का शिकार है? बिना विवेक का इस्तेमाल किए यह सोचना कि हम धर्म की सेवा कर रहे हैं या दूसरे धर्मवाले किसी भी हाल में सम्मान और समानता के अधिकारी नहीं हैं, किस हद तक खतरनाक हो सकता है क्या इस प्रसंग को इस बात का उदाहरण माना जाए?

द हिंदू के मुताबिक सुल्ली और बुल्ली कोई अकेले एप नहीं हैं। इसी तरह के ‘ट्रेड्स’ (ट्रेडिशनलिस्ट यानी परंपरावादी) भी हैं जो ज्यादा भयावह हैं।‘’ अखबार को ‘एल्ट न्यूज’ के जुबैर ने बतलाया की ”ट्रेडस मुसलमानों, उदार लोगों, दलितों, सिवा ब्राह्मणों के अन्य सभी जातियों के खिलाफ हैं। यहां तक कि ये जैनियों का भी विरोध करते हैं। ये औरतों के चित्रों पर अश्लील टिप्पणी करते हैं ये, सिर्फ ब्राह्मण औरतों को छोड़ कर बाकी हिंदू औरतों को भी नहीं बक्सते। ये सब जगह हैं: ट्वीटर, रेडिट, टेलीग्राम। हम इन लोगों पर यह मानकर ध्यान नहीं देते कि ये अधिकतर ट्रॉल हैं।‘’(  ‘द यंग एज्यूकेटेड हेट मौंगर्स’, द हिंदू 22 जनवरी, 2022)

पूरा कांड इस बात का भी प्रमाण है कि गलत राजनीति किस तरह से युवा पीढिय़ों को असामाजिक तत्वों में बदलने की संभावना रखती है। ये लोग सांप्रदायिक दंगा करवाने की सामर्थ्य तो रखते ही हैं, इनके कारण जातिवादी तनाव और दंगों की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता।

कहा नहीं जा सकता इन नौ-दस युवाओं में कितने सामान्य जीवन की ओर लौट पाएंगे। लंबी कानूनी प्रक्रिया और दंड उन्हें किस स्थिति में पहुंचाएगा, इसका भी अनुमान लगाना कठिन है। पर सच यह भी है कि हमारे सामने अभी तक सिर्फ नौ ही युवक आए हैं, और भी न जाने कितने इसकी चपेट में हैं कहा नहीं जा सकता।

(पंकज बिष्ट हिन्दी साहित्य के प्रतिष्ठित पत्रकार, कहानीकार, उपन्यासकार व समालोचक है। वर्तमान में वे दिल्ली से प्रकाशित समयांतर नामक हिन्दी साहित्य की मासिक पत्रिका का सम्पादन व संचालन कर रहे हैं।)

कोविड-19 और दीर्घकालिक गरीबी: ग्रामीण राजस्थान से साक्ष्य

प्रारंभिक गणना के आधार पर, भारत में कोविड-19 के कारण 7.7 से 22 करोड़ लोग गरीबी में आ गए हैं, जिसके अनुसार अब शहरी आबादी में गरीब 60% और ग्रामीण आबादी में 70% हो गए हैं। वर्ष 2002 में ग्रामीण राजस्थान में किए गए सर्वेक्षण के 2021 में किये गए फॉलोअप के आधार पर, यह लेख दर्शाता है कि परिवारों को मार्च 2020-अगस्त 2021 के दौरान अपनी नकद आय का एक-तिहाई और दो-तिहाई के बीच नुकसान हुआ, जबकि उन्होंने अपनी दीर्घकालीन गरीबी में बहुत कम बदलाव देखा या किसी बदलाव का अनुभव नहीं किया।

महामारी के दौरान भारत में लाखों लोगों ने अपनी आजीविका खो दी। प्रारंभिक अनुमान बताते हैं कि देश में ग्रामीण क्षेत्रों में 6.9 से 13.6 करोड़ (अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय, 2021, कोचर 2021) सहित 7.7 करोड़ से 22 करोड़ लोग गरीबी में आये होंगे। अन्य का अनुमान है कि शहरी क्षेत्रों में आय गरीबी महामारी से पहले 40% थी जो बढ़कर 60% हो गई, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी 70% तक हो सकती है (गुप्ता एवं अन्य 2021)।

इस संबंध में स्थिति की स्पष्ट जानकारी प्राप्त करने के लिए, कुछ और प्रश्नों की जांच करने की आवश्यकता है: गरीबी में कितनी वृद्धि क्षणिक प्रकृति की है, और क्या आर्थिक स्थिति सामान्य होने पर इसके उलट होने की संभावना है? और इसमें कितना संरचनात्मक या दीर्घकालिक लक्षण है, जो गरीबी में गहरे और कम आसानी से उलट अवरोह को दर्शाता है?

हम कार्टर और मे (2001) और कार्टर और बैरेट (2006) का अनुसरण करते हुए संरचनात्मक (या स्थायी या लंबी अवधि) और क्षणिक (या स्टोकेस्टिक या अल्पकालिक) शब्दों का उपयोग करते हैं। संरचनात्मक गरीब वे होते हैं जिनकी आय और खपत का स्तर आमतौर पर गरीबी रेखा से नीचे होता है क्योंकि उनके पास संपत्ति और क्षमताओं की कमी होती है। दूसरी ओर, क्षणिक गरीबों के पास पर्याप्त परिसंपत्तियां हैं और इसलिए वे औसतन गरीबी रेखा से ऊपर आय अर्जित करने में सक्षम हैं। तथापि, कुछ बिंदुओं पर- जैसे कि लॉकडाउन के महीनों के दौरान उनकी आय तेजी से घट सकती है, वह गरीबी रेखा से नीचे या शून्य तक गिर सकती है, संभवतः 22 करोड में से कई के अनुभवों का वर्णन करती है, लेकिन जब तक संपत्ति और क्षमताओं का इसके साथ-साथ क्षरण नहीं होता है, संरचनात्मक गरीबी में वृद्धि बहुत कम होगी।

महामारी के बाद की गरीबी की स्थिति को समझने हेतु संरचनात्मक गरीबी और क्षणिक गरीबी के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। आय का अस्थायी रूप से कम होना क्षणिक गरीबी का संकेत देता है, लेकिन संपत्ति और क्षमताओं की भी जांच की जानी चाहिए। इस उद्देश्य के लिए विभिन्न पद्धतियां सहायक होती हैं।

हमारा अध्ययन

हम हाल के एक अध्ययन (कृष्णा और अग्रवाल 2021) के जरिये राजस्थान राज्य के दक्षिणी भाग में तीन जिलों के सात गांवों के समूह में संरचनात्मक गरीबी में परिवर्तन का आकलन करते हैं। कृष्णा (2004) में वर्ष 2002 से पहले के उपलब्ध सूक्ष्म डेटा की प्रथम जांच की गई, जिससे संभवतः पहली बार हम कोविड-19 अवधि के संदर्भ में पहले और बाद की तुलना कर सके हैं।

हमने जुलाई-अगस्त 2021 में जिन सात गांवों का अध्ययन किया, वे राजस्थान के 35 गांवों के बड़े समूह का हिस्सा हैं, जहां हमने 2002 (कृष्णा 2004) में पारिवारिक गरीबी की गतिशीलता की जांच की थी। हम भागीदारी और समुदाय-आधारित एक पद्धति “प्रगति के चरण” का उपयोग करते हैं, जो संपत्ति और क्षमताओं पर केंद्रित है और संरचनात्मक गरीबी1 को मापने में मदद करती है। वर्ष 2002 में अपने अध्ययन का क्रियान्वयन करते समय, हमने अध्ययन किए गए 35 गांवों में से प्रत्येक में एक फोकस समूह बनाया, जिसमें विभिन्न जातियों, लिंग और आयु समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले 20 से 40 ग्रामीण शामिल थे। अपने उद्देश्यों पर चर्चा करने के बाद, हमने इस समूह से पूछा: घोर गरीबी से धीरे-धीरे ऊपर उठते हुए एक परिवार आमतौर पर क्या करता है? कौन-सी संपत्ति या क्षमता पहले हासिल की जाती है? जैसे-जैसे चीजें सुधरती हैं, बाद के चरणों में कौन-सी अन्य संपत्ति और क्षमताएं हासिल की जाती हैं? प्रत्येक ग्राम समूह ने अलग-अलग प्रगति के चरणों का अपना क्रम दर्ज किया।

उल्लेखनीय बात यह है कि इन 35 गांवों में से प्रत्येक में शुरूआती कुछ चरणों को एक ही क्रम में सूचित किया गया था। प्रगति के ये प्रारंभिक चरण इस क्रम में हैं: नियमित आधार पर भोजन (या अधिक सटीक रूप से, परिवार को नियमित रूप से खिलाने की क्षमता); बच्चों को स्कूल भेजना; घर के बाहर जाते समय पहनने के लिए कपड़े रखना; और नियमित किश्तों में कर्ज चुकाना।

पाँचवाँ चरण- घर की आवश्यक मरम्मत करना, विशेष रूप से, टपकती छतों को चकती लगाना- भी आमतौर पर रिपोर्ट किया गया। यह एक ऐसा कार्य है जो लोग गरीबी से ऊपर उठते ही करते हैं। चरण 4 या उससे कम के किसी भी व्यक्ति को संरचनात्मक रूप से गरीब माना जाता है। तालिका 1- एक नमूना गांव में प्रगति के चरणों की पूरी सूची दर्शाती है। इस प्रकार संरचनात्मक गरीबी को आसानी से सत्यापन-योग्य मार्करों के संबंध में सामूहिक और मानक रूप से परिभाषित किया गया है। इस क्षेत्र के ग्रामीण खुद को और दूसरों को गरीब मानते हैं, जब उनके पास खाने के लिए पर्याप्त नहीं होता, उनके पास पहनने के लिए उचित कपड़े नहीं होते, अपने बच्चों को स्कूल भेजने का जोखिम नहीं उठा सकते, और किश्तों को चुकाने में सक्षम हुए बिना अधिक कर्ज लेते हैं।

तालिका 1. प्रगति के चरण: राजस्थान के एक अध्ययन गांव से चित्रण

चरणप्रगति की गतिविधि
1भोजन की व्यवस्था
2कपड़े की व्यवस्था
3बच्चों को स्कूल भेजना
4किश्तों में अपना कर्ज चुकाना
5घर की आवश्यक मरम्मत (टपकती छतों को ठीक करना)
6खेती में सुधार
7मवेशी खरीदना
8मोटरसाइकिल ख़रीदना
9कंक्रीट का घर बनाना
10आभूषण खरीदना
11ट्रैक्टर, कार आदि की खरीद करना

नोट: चरण 5 से नीचे के परिवार को गरीब माना गया है।

प्रगति के इन चरणों के संबंध में प्रत्येक परिवार की वर्तमान और पूर्व स्थिति का पता लगाया गया। वर्तमान में यह परिवार किस स्थिति में है? पहले इसकी स्थिति क्या थी? इसके पश्चात, प्रत्येक गाँव के 30% परिवारों के एक यादृच्छिक नमूने का प्रत्येक उतार या मंदी से जुड़ी घटनाओं के बारे में साक्षात्कार लिया गया। प्राप्त परिणाम 6,500 घरों से संबंधित डेटा का एक संकलन था, जिसमें 2,000 परिवारों के नमूने से जुडी विस्तृत घटनाओं का इतिहास शामिल था।

हम वर्ष 20212 के अनुवर्ती अध्ययन के लिए सात गांवों का चयन करते हैं। हम प्रगति के चरणों को नए सिरे से लागू करते हैं। इस बार भी, ग्राम समूहों द्वारा प्रगति के प्रारंभिक चार चरणों को रिपोर्ट किया गया, और उनके द्वारा गरीबी कट-ऑफ को उसी बिंदु पर रखा गया था (चरण 4 और 5 के बीच) जैसा कि वर्ष 2002 में था। इसलिए, समय के साथ तुलना का समर्थन किया जाता है। हम अपनी जांच के समय (जुलाई-अगस्त 2021) प्रत्येक परिवार की प्रगति के चरण का पता लगाते हैं, इन चरणों की तुलना वर्ष 2002 में उसी परिवार के संदर्भ में दर्ज किए गए चरणों से करते हैं, और उसी परिवार के मुखिया या उनके उत्तराधिकारी के साथ बार-बार साक्षात्कार आयोजित करते हैं। हमने वर्ष 2002 में 258 परिवारों के मुखियाओं के साथ साक्षात्कार आयोजित किए। हम 185 परिवारों के मुखियाओं-सहित अन्य 49 प्रमुखों3 के उत्तराधिकारियों से फिर से संपर्क और फिर से साक्षात्कार करने में सक्षम थे। सम्पूर्ण परिवारों द्वारा प्रवास या बाहर प्रवास किया जाना दुर्लभ है। हालाँकि यह सांख्यिकीय रूप से प्रतिनिधिक नहीं है, सात गांव विविध जीवन स्थितियों को दर्शाते हैं (तालिका 2)।

तालिका 2. वर्ष 2021 में गांव की जानकारी

गाँव(जिला)परिवारों की संख्यानिकटतम बाजार से दूरीनिकटतम हाई स्कूल से दूरीनिकटतम पीएचसी/उप-केंद्र से दूरीअनुसूचित जाति परिवार का %अनुसूचित जनजाति परिवार का %परिवार का सत आकारऔसत जोत(बीघा)
फ़ैरनियोंकागढ़ (उदयपुर)23110224.3325.115.962.03
फियावरी (राजसमंद)17930013.4141.95.074.32
विशनपुरा (उदयपुर)18244117.5819.784.55.3
दौलजी का खेड़ा (भीलवाड़ा)163646063.854.06
खतीखेड़ा(भीलवाड़ा)12333333.3304.862.79
मेहताजी काखेड़ा(भीलवाड़ा)2407041510.834.596.16
सरना(भीलवाड़ा)34888826.443.746.064.57
कुल1,46615.9621.285.194.26

नोट: (i) दूरी किलोमीटर में मापी जाती है। (ii) बीघा, भूमि की एक स्थानीय इकाई है, जो एक हेक्टेयर के छठे हिस्से के बराबर है।

हामारी से पहले संरचनात्मक गरीबी में तेजी से गिरावट आई (2002-2020)

महामारी से ठीक पहले संरचनात्मक गरीबी में हिस्सेदारी 2002 में लगभग आधे से गिरकर 20% से भी कम हो गई (तालिका 3)। हालांकि अनुसूचित जाति (अनुसूचित जाति) और अनुसूचित जनजाति (अनुसूचित जनजाति) का बहुत बड़ा अनुपात गरीब है, प्रत्येक जाति समूह ने प्रगति की है (तालिका 4)।

तालिका 3. संरचनात्मक रूप से गरीब परिवारों का प्रतिशत

गांव20022020
फ़ैरनियोंकागढ़35.0625.22
फियावरी68.7231.28
विशनपुरा41.0115.38
दौलजी का खेड़ा67.4819.63
खतीखेड़ा30.0813.01
मेहताजी का खेड़ा36.5515.48
सरना60.3412.93
कुल49.3818.58

तालिका 4. जाति समूहों के आधार पर संरचनात्मक रूप से गरीब परिवारों का प्रतिशत

जाति समूह20022020
सामान्य30.776.25
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी)33.125.93
अनुसूचित जाति63.0928.21
अनुसूचित जनजाति88.1048.71

2002-2020 की अवधि (तालिका 5) के दौरान गरीबी में आना एक दुर्लभ घटना थी। कुल मिलाकर, इस अवधि के दौरान सभी ग्राम परिवारों में से केवल 0.5% ही गरीबी में आये। इसके विपरीत, एक बहुत बड़ा हिस्सा, 31.5%, गरीबी से ऊपर और बाहर चला गया।

तालिका 5. संरचनात्मक गरीबी गतिशीलता का प्रतिशत, 2002-2020

2021 में गांवों का सर्वेक्षण2020 में
गरीबगरीब नहींकुल
2002 मेंगरीब18.131.349.4
गरीब नहीं0.550.250.7
कुल18.681.4100

सुधार के संकेत व्यापक रूप से दिखाई देते हैं। कॉलेज स्नातकों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। वर्ष 2002 में इन गांवों में घर में टेलीविजन सेट का होना दुर्लभ था, मोटरसाइकिलें बहुत कम थीं और उनका होना भी बहुत दुर्लभ था, वर्ष 2021 में 91% परिवारों के पास मोबाइल फोन था, और लगभग 70% के पास मोटरसाइकिल थी।

गरीबी से बाहर निकलने और इसमें अवरोह के घरेलू स्तर के कारणों की खोज से अंतर्निहित गतिशीलता का पता चलता है। पाई गई प्रगति के मुख्य रूप से दो कारण हैं- पहला, नकद आय अर्जित करने वाले परिवारों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। वर्ष 2002 में एक चौथाई से भी कम परिवारों ने नकद आय अर्जित की, लेकिन 2020 तक, लगभग दो-तिहाई परिवारों में एक या अधिक सदस्य- जिनमें अधिकतर युवा पुरुष थे, वर्ष की कुछ अवधि में शहरों में अनौपचारिक पदों जैसे कि कारखाना श्रमिक, ड्राइवर, लोडर, बढ़ई, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, खनिक, आदि पर काम करते हुए आमतौर पर प्रतिमाह 8,000 और 15,000 रु के बीच कमाते पाए गए। संरचनात्मक गरीबी से बाहर निकलने के लिए ऐसी नौकरी प्राप्त करना एक प्राथमिक कारण था। लोगों की ज्यादातर बैंक खातों में नकद राशि जमा हो गई, और अब उन्हें कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए अपनी संपत्ति बेचने की जरूरत नहीं थी।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण अवरोह की बहुत कम घटना होना था। जबकि 2002 से पहले के दो दशकों में 23% परिवार ज्यादातर बीमारियों और उच्च स्वास्थ्य खर्चों (कृष्णा 2004) के कारण गरीबी में आ गए, इसके बाद की 18 साल की अवधि में अवरोह के ये कारण बहुत कम प्रभावी होते गए। क्लिनिक और उप-केंद्र गांवों के करीब आ गए, और अब आपातकालीन सेवाओं वाली एम्बुलेंस अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध हैं। लोग अधिक पढ़े-लिखे हो गए हैं, और अपने परिवार के बीमार व्यक्तियों के गंभीर रूप से अस्वस्थ होने तक प्रतीक्षा करने के बजाय, वे उन्हें तुरंत डॉक्टर के पास ले जाने लगे हैं। स्वास्थ्य बीमा कवरेज बढ़ा है, हालांकि इन गांवों में यह अभी भी 20% से कम है।

कोविड-19 अवधि: मार्च 2020-अगस्त 2021

हमारे द्वारा बनाए गए ग्राम समूहों ने हमें सूचित किया कि चरण 1 (मार्च-अगस्त 2020) के दौरान छह महीने तक और महामारी के दूसरे चरण (अप्रैल-जून 2021) के अन्य दो महीनों के दौरान सभी परिवारों में से 60% ने अपनी नकद आय का एक-तिहाई और दो-तिहाई के बीच खो दिया था। परिवारों के अनुमान वित्तीय व्यवधान के इस चित्रण की पुष्टि करते हैं।

फिर भी, संरचनात्मक गरीबी के मार्करों के संदर्भ में, गांव के परिवारों ने इस 18 महीने की अवधि में बहुत कम बदलाव देखा या कोई बदलाव नहीं देखा। शायद ही किसी परिवार की प्रगति की स्थिति प्रभावित हुई हो। हालाँकि संपत्ति और क्षमताओं का थोड़ा क्षरण हुआ है।

तालिका 6 में, अवधि की शुरुआत में प्रत्येक परिवार की प्रगति के चरण को उस अवधि के अंत में उसके चरण से घटाया गया है। इस प्रकार से, जो परिवार वर्ष 2002 में चरण 4 पर था लेकिन वर्ष 2020 में चरण 10 पर है, उसने +6 का चरण–परिवर्तन स्कोर प्राप्त किया है। प्रत्येक अवधि हेतु कॉलम निर्दिष्ट चरण-परिवर्तन स्कोर वाले परिवारों की संख्या दर्शाता है।

तालिका 6. दो समयावधियों में संरचनात्मक गरीबी में परिवर्तन

परिवारों का चरण-परिवर्तन स्कोर18 साल की अवधि(2002-2020)18 महीने की कोविड-19 अवधि(मार्च 2020-अगस्त 2021)
+5 या अधिक91 (6.21)1 (0.07)
+4123 (8.39)2 (0.14)
+3219 (14.94)9 (0.61)
+2325 (22.17)38 (2.59)
+1445 (30.35)132 (9.00)
0 (कोई परिवर्तन नहीं)230 (15.69)1,270 (86.63)
-115 (1.02)11 (0.75)
-2 या और ख़राब11 (0.75)1 (0.07)
कुल1,4661,466

नोट: कोष्ठक में दी गई संख्या सभी परिवारों का प्रतिशत है।

कोविड-19 अवधि के दौरान 95% से अधिक परिवारों में संरचनात्मक स्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ या हल्का-सा सकारात्मक परिवर्तन हुआ है। बारह परिवारों ने- सभी में 1% से भी कम संरचनात्मक अवरोह का अनुभव किया, लेकिन 12 में से 11 मामलों में अवरोहण सीमांत प्रकृति के हैं।

महामारी ने गरीबी में व्यापक वृद्धि कर अपनी गहरी जड़ें जमा ली हैं, इस मान्यता को इन आंकड़ों से समर्थन नहीं मिलता है जो आय में उतार-चढ़ाव को देखने के बजाय संपत्ति और संरचनात्मक गरीबी पर विचार करते हैं, जिनमें से कई या अधिकांश अल्पकालिक हो सकते हैं। इस ग्रामीण क्षेत्र में अब तक, दीर्घकालिक गरीबी में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। हमने जिन 221 परिवारों का साक्षात्कार लिया, उनमें से 17 से अधिक ने इस अवधि में कोई संपत्ति नहीं बेची थी। एक सर्वेक्षण प्रश्न के उत्तर में, दो-तिहाई से अधिक लोगों ने भविष्य की अपेक्षाओं के बारे में उत्साहित होने की सूचना दी।

एक प्रमुख उत्तरदाता ने बताया, “लोग शहरों में नहीं जा सकते थे। उन्होंने अपनी नौकरी और आय खो दी। लेकिन किसी को भी जमीन या आभूषण बेचने या मवेशियों को छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ी। पैसे की कमी आयेली किं गरीबी की मार नहीं” (हमें नकदी की कमी का सामना करना पड़ा लेकिन गरीबी के भूत का नहीं)।

उपसंहार

कारकों का संयोजन हमें यह समझने में मदद करता है कि महामारी के पहले 18 महीनों के दौरान संरचनात्मक गरीबी लगभग अपरिवर्तित क्यों रही। सबसे पहले, दो दशक पहले परिवारों के लचीलेपन (परिस्थिति में ढाल लेना) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी। जहां लोगों के पास बहुत कम नकद भंडार हुआ करता या कोई नकद भंडार नहीं हुआ करता था और वित्तीय तनाव के समय में संपत्ति को बेचना या गिरवी रखना पड़ता था, नियमित नकद आय के प्रवाह ने परिवारों के लचीलेपन (परिस्थिति में ढाल लेना) को बढ़ा दिया है। दूसरा, चरण 1 के दौरान के 5-6 महीने और चरण 2 के अन्य दो महीनों के लिए प्रति व्यक्ति पांच किलोग्राम गेहूं के खाद्य राशन से युक्त सरकारी सहायता और कई और लोगों को न्यूनतम-मजदूरी वाला रोजगार देनेवाली मनरेगा5 (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का विस्तार किया गया। तीसरा, शिक्षा के बढ़ते स्तर ने खतरों और अवसरों के प्रति लोगों की प्रतिक्रियाओं की गुणवत्ता में सुधार किया है। गरीबी में आ जाना अब कम हो गया है।

यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि अगर आय के नुकसान की अवधि आगे बढती तो क्या हो सकता था। लोगों का नकदी भंडार ख़त्म हो जाता और उनके द्वारा आत्मसात लचीलापन (परिस्थिति में ढाल लेना) समाप्त हो सकता था।

यही कारक अन्य स्थानों पर अलग तरह के परिणाम दर्शा सकते थे। शहरी झुग्गी बस्तियों में किये गए अध्ययन दीर्घकालिक गरीबी बढ़ने का संकेत देते हैं (उदाहरण के लिए, एउरबैक और थेशील (2021), और डाउन्स-टेपर एवं अन्य (2021a, 2021b) देखें)। राष्ट्रीय और राज्य औसत से स्थानीय परिस्थितियों में महत्वपूर्ण अंतर छिप जाता है। स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं द्वारा निभाई गई भूमिका के कारण, स्पष्ट तस्वीर प्राप्त करने के लिए जमीनी स्तर पर अध्ययन किया जाना आवश्यक है। संरचनात्मक गरीबी का एक अलग माप प्राप्त करना भी महत्वपूर्ण है, जिसके अभाव में दीर्घकालिन गरीबी के कारण हो रहे आय में उतार-चढ़ाव से बचना मुश्किल हो जाता है।

टिप्पणियाँ:

  1. कार्यप्रणाली के बारे में अधिक जानकारी के लिए, कृष्णा (2010) देखें।
  2. हम और अधिक व्यापक अध्ययन करना पसंद करते लेकिन हमारे पास अधिक व्यापक अध्ययन के लिए समय और साधन- दोनों की कमी थी।
  3. भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम)-उदयपुर के संस्थागत समीक्षा बोर्ड द्वारा इन प्रोटोकॉल की जांच की गई और इन्हें अनुमोदित किया गया है। टीम के प्रत्येक सदस्य का पूर्ण टीकाकरण किया गया था। उन्होंने मास्क लगाये थे और उन्हें गाँव के वार्ताकारों को देने के लिए मास्क भी दिए गए थे।
  4. हमने इस प्रकार के अध्ययन के दौरान स्वीकार्य संघर्षण दर के अनुसार कुल 37 परिवारों को खो दिया।
  5. मनरेगा एक ऐसे ग्रामीण परिवार को एक वर्ष में 100 दिनों के वेतन-रोजगार की गारंटी प्रदान करता है, जिसके वयस्क सदस्य निर्धारित न्यूनतम मजदूरी पर अकुशल शारीरिक कार्य करने के इच्छुक होते हैं।

लेखक परिचय: तुषार अग्रवाल भारतीय प्रबंधन संस्थान उदयपुर में अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर हैं। अनिरुद्ध कृष्णा ड्यूक युनिवर्सिटी में सार्वजनिक नीति और राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। यह लेख आइडियाज फॉर इंडिया जर्नल में छप चुका है।

पंजाब के दलित: चुनाव में दिखे जरूर, मगर असल मुद्दे गायब रहे

पंजाब विधानसभा चुनाव में भाग ले रहे मुख्य राजनीतिक दल प्रचारात्मक तौर पर दलितों को चुनाव में इस बार अधिक हिस्सेदारी की इश्तेहारी कर रहे हैं. शुरूआत पिछले साल भाजपा ने यह घोषणा कर की थी कि अगर वह जीतते हैं तो वे एक दलित मुख्यमंत्री को मुख्यमंत्री बनाएंगे. कांग्रेस ने आचार संहिता लगने से ठीक 111 दिन पहले दलित समुदाय के राजनेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बना दिया. आम आदमी पार्टी और शिरोमणि अकाली दल (बादल) के पास सामान्य जाति के मुख्यमंत्री चेहरे थे, लेकिन पंजाब में एक वोट बैंक के तौर पर दलितों की संख्या सबसे अधिक होने के कारण इन दोनों पार्टियों ने भी दलितों को उपमुख्यमंत्री बनाने का वादा करना पड़ा.

इन घटनाओं ने देश का ध्यान पंजाब के जातीय समीकरणों की ओर खींचा है. मगर 15 फरवरी की उस सर्द सुबह मलेरकोटला जिले के हथोआ गांव के दलित नौजवान बिकर सिंह ने जो बात मुझसे कही, उससे यह समझ आया कि दलितों को अपने पाले में खींचने के लिए सभी दल फिक्रमंद जरूर हैं, लेकिन उनके असल मुद्दों को हाथ लगाए बगैर. चूंकि यहां कुल आबादी का 33 प्रतिशत दलित हैं, और राजनीतिक दल आबादी के इतने बड़े हिस्से को दरकिनार नहीं कर सकते.

बिकर सिंह ने मुझे बताया, “जिस किस्म के विकास की बात सारे दल कर रहे हैं उसमें दलितों को आटा-दाल फ्री देने, हजार-दो हजार रूपया देने या किसी गली-नाली को बनवाना है. कोई भी दल यह बात नहीं कर रहा कि दलितों के जीवन स्तर को ऊपर कैसे उठाया जाए. न तो कोई उनके घरों की बात कर रहा है और न ही मुल्क में पैदावार के अलग-अलग साधनों में उनके हिस्से की.”  

बिक्कर पिछले 3 साल से जमीन प्राप्ति संघर्ष कमेटी के मेंबर हैं जो मालवा इलाके के दलितों को उनके गांव की पंचायती जमीन में हिस्सेदारी दिलवाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वह पैदावारी संसाधनों में दलितों की हिस्सेदारी समझाने के लिए अपने पास के ही एक गांव तोलेवाल में ले गए, जहां के दलितों ने साल 2019 में गांव की पंचायती जमीन के तीसरे हिस्से पर अपना कब्जा लिया.

14 फरवरी की उस सर्द सुबह तोलेवाल के दलित अपने गांव की रविदास धर्मशाला में जमा थे. वहां मौजूद रंजीत सिंह ने मुझे बताया, “साल 1961 में, राज्य ने पंजाब विलेज कॉमन लैंड्स अधिनियम पारित किया गया था, जिसमें अनुसूचित जाति के लिए गांव की 33% पंचायती जमीन आरक्षित थी, जिसमें दलित बोली के माध्यम से वार्षिक पट्टा प्राप्त कर सकते थे. इस कानून को आए 60 साल से ज्यादा हो गए हैं लेकिन आज भी पंजाब के 95 प्रतिशत गांव में दलित इस जमीन पर अपना हक नहीं जता सके हैं। वोट बटोरू पार्टियां इस मुद्दे पर एक शब्द नहीं बोलती. हम लोगों ने लाठियां खाकर एक लंबे संघर्ष के बाद इस जमीन का हक ले पाए हैं.” 

उनके बगल में बैठीं माया देवी की और हाथ करके रंजीत ने गुस्से में कहा, “इन महिलाओं के सर तक फाड़ दिए थे.” चुपचाप बैठीं माया देवी एकदम बोल पड़ती हैं, “भाई, डंडे खाए हैं तो क्या हो गया. लड़कर कम से कम हरे चारे लायक तो गए. अब पशुओं के लिए चारा भी कर लेते हैं और खाने जितने दाने भी.”

इस गांव के दलितों के पास इस समय साढ़े 5 एकड़ जमीन का पट्टा है, जिसपर सभी लोग मिलकर खेती करते हैं. बिक्कर बताते हैं, “पंचायती जमीन के अलावा निजूल की जमीन का भी मामला है. साल 1956 में दलित किसानों को जमीन का कुछ हिस्सा खेती करने के लिए मिला था, पर आज ज्यादातर जगहों पर उनकी जमीनों पर धननाड लोग अतिक्रमण किए हुए हैं. दलित किसानों की सभी कोशिशों के बाद भी उन्हें अपनी जमीन नसीब नहीं हो रही. इतने साल बीत जाने के बाद भी दलित किसानों को उनका मालिकाना हक नहीं मिला है और इस चुनाव में कोई भी पार्टी उनके इस हक को दिलवाने की बात नहीं कर रही.” 
पंजाब के मालवा इलाके में पिछले दस सालों में दलितों के लिए आरक्षित जमीन से जुड़े आंदोलन अनेकों गांव में उभरे हैं तो बहुतेरे गांव में घरों की जमीन के लिए भी आंदोलन उभरे हैं.

संगरूर से सिर्फ 3 किलोमीटर दूर खेड़ी गांव के दलित पिछले कई सालों से घर बनाने के लिए उस जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं जो उन्हें आज से करीब दस साल पहले मिली थी. सड़क किनारे नाले पर एक कमरा बनाकर रह रहे दर्शन ने मुझे बताया, “दस साल पहले हमारे गांव के 65  परिवारों को 5-5 मरले के प्लाट मिले थे, लेकिन वे हमें आज तक अलॉट नहीं हुए. हमारे नाम जो इंतकाल चढ़े थे, उलटा उन्हें तोड़ दिया गया है. अकाली सरकार भी राज कर गई और कांग्रेस भी. लेकिन हमारा कोई हल नहीं हो रहा। गांव के दलित लोग कोई दस गज में रह रहा है, कोई 20 गज में. लेकिन कोई भी राजनीतिक पार्टी इस मुद्दे पर अपना मुंह नहीं खोल रही.”

दर्शन बोलते बोलते बीच में रुक गए और गांव के ही दूसरे दलित परिवारों के घर दिखाने के लिए ले गए। गांव के लगभग परिवार माचिस जैसे घरों में रह रहे थे. जिस घर में भी जाते, घर की महिलाएं रोजमर्रा की दिक्कतें बताने लगतीं. कोई कहती, “मनरेगा का काम नहीं मिल रहा”, तो कोई कहती, “स्कूल बंद होने के कारण बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पाती क्योंकि उनके पास बड़े वाला फोन (स्मार्टफोन) नहीं है.”

एक घर की जर्जर दीवार पर लगे चुनावी पोस्टरों की तरह हाथ करके दर्शन कहते हैं, “सारे नेता एक दूसरे को ललकारने में लगे हुए हैं, एक दूसरे को नीचा दिखाकर वोट मांग रहे हैं, लेकिन कोई भी हमारे असली मुद्दों की बात नहीं कर रहा.” 

दर्शन सिंह की बात सुनकर दिमाग में यह सवाल कौंधा कि क्या सच में मुख्य चुनावी पार्टियां पंजाब के दलितों के मुद्दों पर बात भी कर रही हैं? जिसके जवाब में पंजाबी यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान पढ़ाने वाले जतिंदर सिंह ने मुझे बताया, “भाजपा, पंजाब लोक कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल (यूनाइटेड) गठबंधन के 11 सूत्री संकल्प एजेंडे में दलितों की समस्याओं का जिक्र तक नहीं है. आम आदमी पार्टी के पांच वादों में महिलाओं के खाते में मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य और पैसे का जिक्र है, लेकिन इसमें संसाधनों के आवंटन और सरकारी संस्थानों में प्रतिनिधित्व का जिक्र नहीं है. शिरोमणि अकाली दल (बादल) के पास दलित उपमुख्यमंत्री के वादे के अलावा और कुछ नहीं है. मुख्यमंत्री बनाने के दम पर ही कांग्रेस दलित समुदाय का सबसे अधिक समर्थक होने का दावा कर रही है. दलितों की तथाकथित राजनीतिक पार्टी बसपा राजनीतिक अखाड़े से पूरी तरह गायब है. कोई भी स्थापित पार्टी दलित समाज के असल मुद्दों पर सही से बात नहीं कर रही.”

दलित समाज के असल मुद्दों की के सवाल पर जतिंदर बताते हैं, “उचित शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, भूमि का पुनर्वितरण, पंचायत भूमि की उचित बोली, मकान बनाने के लिए जमीन, मनरेगा का सही कार्यान्वयन, सहकारी समितियों की सदस्यता, शहरी सफाई कर्मचारियों को आधुनिक मशीनरी उपलब्ध करवाना, ऐसे कई मुद्दे हैं जोकि चुनाव के मुद्दे होने ही चाहिए.”

जतिंदर पंजाब चुनाव में एक मतदाता के तौर पर दलित समाज के अहम मुद्दों पर स्थापित पार्टियों की चुप्पी के पीछे एक कारण यह भी बताते हैं, “दरअसल सूबे में जातिगत भेदभाव और हिंसा के मुद्दे पर सामाजिक आंदोलनों की निरंतरता का अभाव है और शोषित वर्ग के सामाजिक आंदोलनों का वर्तमान स्वरूप खंडित है. दोआबा इलाका जाति और विभिन्न धार्मिक पहचान के आंदोलनों का केंद्र है. मालवा का एक हिस्सा ही पंचायत की जमीन, मकान के लिए प्लाट और शोषण की घटनाओं के खिलाफ सक्रिय है। माझा और अपवाद इलाके में दलितों के छिटपुट किस्म के ही आंदोलन हैं. नतीजतन, सामाजिक आंदोलनों की निरंतरता के बिना, राजनीतिक दल शोषित समाज के वास्तविक मुद्दों से दूरी बनाकर रखते हैं.”

पंजाब की कुल आबादी का 33 प्रतिशत दलित हैं, जिन्हें अपने पाले में खींचने के लिए सभी दल फिक्रमंद हैं, लेकिन उनके असल मुद्दों को हाथ लगाए बगैर. इस समाज के सामने जो समस्याएं आ रही हैं, वे राजनीतिक दलों के चुनावी अभियान का हिस्सा नहीं हैं, न वे मेनिफेस्टो का हिस्सा हैं, न कोई मुद्दा और न ही रैलियों में दिए जाने वाले भाषणों का.

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