विमुक्त घुमंतू परिवारों पर जगह खाली करने का दबाव, प्रशासन ने बस्ती की बिजली काटी!

हरियाणा के यमुनानगर में न्यायायिक परिसर और उपायुक्त निवास से महज एक किलोमीटर की दूरी पर 50 से ज्यादा घुमंतू परिवार पिछले 15 साल से झुग्गियों में रह रहे हैं. यमुनानगर-जगादरी रोड़ पर करीबन चार कनाल के खाली पड़े प्लॉट में घुमंतू परिवार पिछले 15 साल से झुग्गी बनाकर रह रहे हैं. लेकिन अब इन 50 से ज्यादा घुमंतू परिवारों पर जगह खाली करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है.

फेरी का काम करने वाले भरत ने बताया,“हमे यहां से हटाने के लिए दो महीने पहले प्रशासन के कुछ लोग आए थे. उसके बाद हम अपनी शिकायत लेकर मेयर से पास गए जिसके बाद घुमंतू विकास बोर्ड के कुछ लोग भी हमारे पास आए थे. घुमंतू बोर्ड के नेताओं ने आश्वासन दिया था कि जब तक सभी परिवारों को रहने के लिए दूसरी जगह नहीं दी जाएगी तब तक यहां से नहीं हटाया जाएगा. लेकिन प्रशासन के लोग बार-बार आकर जगह खाली करने के लिए बोल रहे हैं.”

भरत से बात करते देखकर आस-पास की झुग्गियों के लोग भी आ गए. ग्यारहवीं क्लास में पढ़ने वाले कर्ण ने बताया,

“हमारे पास राशन कार्ड भी है और वोटर कार्ड भी लेकिन जब हम राशन लेने के लिए डिप्पो पर जाते हैं तो हमें राशन देने से मना कर दिया जाता है. डिप्पो वाला सभी को राशन देता है लेकिन जब हमारी बारी आती है तो हमारे नाम का राशन खत्म हो जाता है. दो दिन पहले भी प्रशासन के कुछ लोग आए थे उन्होंने जगह खाली करने के लिए एक हफ्ते का समय दिया, बताओं इतने कम समय में हम लोग यहां से हटकर कहां जाएंगे.”                  

करीबन 35 साल के कृष्ण ने बताया,”हम लोगों पर एक दूसरी जगह जाने का दबाव बनाया जा रहा है. नई जगह शहर से 5-6 किलोमीटर दूर है. वहां जाएंगे तो हमारा सारा रोजगार खत्म हो जाएगा. अभी लॉकडाउन से पहले तक हमारे बच्चे स्कूल जाते थे अब फिर से स्कूल शुरू हो जाएंगे अगर हम शहर से 5 किलोमीटर दूर चले गए तो हमारे बच्चे शहर में स्कूल कैसे आएंगे. हमारी मांग है कि हम लोगों को यहीं रहने दिया जाए यह भी तो सरकारी जमीन है.”

विमुक्त घुमंतू परिवारों के पास जीवन की मूलभूत सुविधाएं भी नहीं हैं. इनके पास न रहने के लिए मकान है, न पीने के पानी की सुविधा और न ही खाने के लिए सरकारी राशन की उपलब्धता. 

मकान न होने के कारण ये लोग मौसम की हर मार झेल रहे हैं. बारिश के चलते झुग्गियों के आस-पास पानी भर गया है. पानी ठहरने से तमाम तरह की बीमारियां पनपने का खतरा बन रहा है.

वहीं सुरेश ने बताया, “हम लोगों को लगातार प्रशासन द्वारा परेशान किया जा रहा है. बिजली विभाग के कर्मचारियों ने हमारी बिजली काट दी और बिजली की तार भी साथ ले गए. सरकारी अधिकारी हमें परेशान कर रहे हैं ताकि हम यहां से जगह खाली कर दें. सुरेश ने बताया कि पिछले महीने जो अधिकारी आया था उसने तो जगह खाली नहीं करने पर झुग्गियों में आग लगाने तक की धमकी दी थी. सरकार की कोई भी सुविधा हम लोगों तक नहीं पहुंच रही है. शहर में गरीबी रेखा से नीचे वालों के लिए सरकारी मकान बने हैं. जब उनके पास गए तो बोले मकान के लिए ढाई लाख रुपये लगेंगे, बताओं हमारे पास इतने पैसे कहां से आंएगे?

बस्ती में रहने वाले एक और सदस्य ने बताया,”हमारे पास वोटर कार्ड समेत सभी कागज हैं. चुनाव के वक्त सभी नेता हमारे पास वोट मांगने के लिए आते हैं, नेता लोग मकान बनाने का वादा करते हैं लेकिन चुनाव के बाद कोई हमारा हाल जानने नहीं आता. कईं बार मकान देने के नाम पर सर्वे करने वाले भी आए, मकान देने की पर्ची भी दी लेकन आजतक कोई मकान नहीं मिला.

मकान के लिए किए गए सर्वे की रशीद

इस मामले में गांव-सवेरा ने विमुक्त घुमंतू विकास बोर्ड के सदस्य ओम पाल से फोन पर बात की.

उन्होंने कहा, “जिस जगह पर घुमंतू परिवार रह रहे हैं वह किसी की प्राइवेट जगह है. इन परिवारों को शहर के आस-पास रहने के लिए दो जगह दिखाई हैं जहां पर बिजली, पानी और स्कूल की व्यव्स्था भी की जाएगी लेकिन ये लोग हमारी बात नहीं मान रहे हैं.”

बता दें कि हरियाणा सरकार के सर्वे के अनुसार प्रदेश में दस हजार ऐसे परिवार हैं जिनके पास अपने मकान नहीं है. 2017 में एक रैली के दौरान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर प्रदेश के दस हजार बेघर परिवारों को मकान देने का वादा कर चुके हैं. लेकिन आज तक इस दिशा नें कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है. विमुक्त घुमंतू जनजातियों की 15 से 20 करोड़ की ऐसी आबादी है जिन तक पहुंचते-पहुंचते सारी सरकारी योजनाएं दम तोड़ देती हैं.

ईद मनाने को लेकर ‘जीशान’ मौत मामले में कोई गिरफ्तारी नहीें, डर के साये में पीड़ित परिवार!

हरियाणा के यमुनानगर से करीबन 15 किलोमीटर दूर जयधर गांव में पिछले कईं दिनों से धार्मिक विवाद चल रहा है. विवाद के चलते जयधर गांव में भारी पुलिसबल तैनात है. आरएसएस से जुड़े संगठन बजरंग दल के स्थानीय नेताओं ने जयधर गांव के मुस्लिम समुदाय पर बकरीद न मनाने का दबाव बनाया. जयधर में मुसलिम समुदाय ने पुलिस के पहरे में ईद मनाई. इसी तनाव के बीच 24 जुलाई को 18 साल के जीशान ने आत्महत्या कर ली.         

यमुनानगर के जयधर गांव में 21 जुलाई को बकरीद के त्योहार से कुछ दिन पहले ही धार्मिक उन्माद का माहौल बनना शुरू हो गया था. आरएसएस से जुड़े संगठन बजरंग दल द्वारा मुसलिम समुदाय को ईद न मनाने देने की धमकी बाबत गांव के मुस्लिम समुदाय ने जिला प्रशासन को अपनी शिकायत दी थी. शिकायत में बजरंग दल के कुछ लोगों द्वारा ईद न मनाने देने के आरोप लगाए गए. इसके उलट बजरंग दल के स्थानीय नेताओं ने भी गांव में बकरीद न मनाने देने को लेकर पंचायत की. पंचायत के दौरान बकरीद मनाने पर अंजाम भुगतने की धमकी भी दी गई.      

ईद के दिन गांव में भारी पुलिसबल तैनात था. जयधर गांव में मुसलिम समुदाय के लोगों ने भारी पुलिसबल की मौजूदगी में बकरीद मनाई. मामला 21 जुलाई यानी ईद की रात का है. 21 जुलाई की रात गांव के हिंदू परिवारों के मोहल्ले में एक युवक मांस फेंकता हुआ पकड़ा गया. मांस के टुकड़े फेंकने वाला विपिन नाम का युवक पास के ही गांव जयधरी का रहने वाला है. गांववालों ने युवक को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया. जिसे पुलिस ने एक दिन बाद छोड़ दिया. इस मामले में पुलिस ने मुस्लिम पक्ष के ही लोगों पर पकड़े गए युवक के साथ मारपीट करने के आरोप में केस दर्ज कर दिया.

जीशान के ताऊ ने बताया, 24 जुलाई को जीशान जब पास के गांव मलकपुर खादर में दावत के लिए जा रहा था तो रास्ते में उसे बजरंग दल से जुड़े कुछ लड़कों ने घेर लिया. उसके साथ मारपीट की और उसे जान से मारने की धमकी दी. उन्होंने जीशान को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया. इस घटना से आहत होकर जीशान ने कोई जहरीला पदार्थ खा लिया. जीशान को शहर के जेपी अस्पताल लेकर गए जहां उसकी मौत हो गई.”

18 साल के जीशान के परिवार में केवल दादी और जीशान था. करीबन 75 साल की दादी ने रोते हुए बताया,

“जीशान केवल सात-आठ साल का था जब उसके पिता की मौत हो गई थी. मां, दोनों भाईयों को छोड़कर चली गई थी. कुछ साल पहले जीशान के बड़े भाई की भी नहर में डूबने से मौत हो गई थी. परिवार में मेरे साथ केवल जीशान ही था. जीशान ही मेरा बुढ़ापे का एक सहारा था. मैं अब अकेली रह गई हूं, दुनिया में मेरा कोई नहीं रहा. सब खत्म हो गया”

जीशान का घर, जिसमें वह दादी के साथ रहता था.

तस्वीर में जीशान का कच्चा मकान जिसमें वह अपनी दादी के साथ रहता था. जीशान ने नौवीं तक पढ़ाई की थी उसके बाद वह दर्जी का काम सीख रहा था. घर का गुजारा केवल दादी की बुढ़ापा पेंशन से चल रहा था.

वहीं करीबन 60 साल के बुजुर्ग पड़ोसी ने बताया,

“गांव में अब पहले जैसा माहौल नहीं रहा है. गांव में 5-10 लड़के हैं जो माहौल खराब कर रहे हैं. यह आरएसएस और बजरंग दल से जुड़े हुए लोग हैं जो गांव में एक दूसरे के खिलाफ नफरत का माहौल बनाते हैं. पहले हम सभी गांव में एक-दूसरे के मरने-जीने, ब्याह-शादी सभी तीज-त्योहारों पर आते-जाते थे लेकिन जीशान के जनाजे पर गांव का कोई आदमी नहीं आया.”      

मृतक जीशान के एक और पड़ोसी ने कहा, “बीजेपी के नेता इस तरह का माहोल बनवा रहे हैं. यह लोग नहीं चाहते कि मुस्लमान भी गांव में रहे. बताओ, हमारे दादा-परदादा का जन्म इसी गांव में हुआ. मेरी 45 साल की उम्र हो गई मेरा जन्म यहीं हुआ हमारे गांव में मुस्लिमों के दो सौ से ज्यादा घर हैं. क्या अब हम गांव छोड़ दें.”                     

बजरंग दल के प्रांत सुरक्षा प्रमुख गगन प्रकाश ने कहा “गांव में बकरीद पर पशु करुरता को रोकने के लिए हमने यमुनानगर प्रशासन को ज्ञापन दिया था कि बकरीद न मनाने दी जाए. इसके बाद भी गांव में बकरीद मनाने दी गई जिसके कारण हिंदू समाज में भारी रोष है. साथ ही यहां के एसएचओ लज्जाराम ने भी पंचायत में वादा किया था कि कोई पशु नहीं कटने दिया जाएगा. इसके बावजूद पुलिस की सुरक्षा में बकरीद पर पशु काटे गए.”

बजरंग दल के नेता ने आगे कहा,“हमारे धर्म में भी बली देने की प्रथा है हमारी देवी भी मांस का भक्षण करती हैं अगर पुलिस को बकरीद पर पशु काटे जाने पर कोई दिक्कत नहीं है तो फिर हिंदू भी पशु काटना शुरू कर देंगे.”

मौत से पहले जीशान ने अपने ब्यान में गांव के ही कईं लड़कों का नाम लिया था जिनकी वजह से उसने आत्महत्या की है. जीशान आत्महत्या के मामले में जयधर गांव के ही जोनी, अमित ,हेप्पी, मनीष और अमन नाम के युवकों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है. एक हफ्ते से जयादा का समय बीत जाने के बाद भी मामले में कोई गिरफ्तारी नहीं हुई.

यमुनानगर के एसपी कमलदीप गोयल ने कहा, “गांव में ऐसे हालात पैदा हुए इसका हमें दुख है. मामले की शिकायत मिलते ही एफआईआर दर्ज की गई है. घटना के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.”

वहीं मामले को देख रहे छछरौली थाने के एसएचओ लज्जाराम ने कहा, जयधर मामले में 6 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है, गांव का माहौल पूरी तरह से शांतमय है और मामले की तफ्तीश जारी है.”

जयधर गांव का माहौल अब भी तनावभरा है. घटना के बाद से गांव में भारी पुलिसबल की तैनाती है. गांव की गलियों में इक्का-दुक्का लोग ही दिखाई दिए. गांव के चारों ओर पुलिस है. पीड़ित पक्ष के लोगों में इतना डर है कि कैमरे पर कुछ भी बोलने से मना कर दिया.     

अरुंधति रॉय: पेगासस को महज एक नया तकनीकी हथकंडा कहकर नकारना एक गंभीर गलती होगी!

भारत में मौतों की मनहूसी का मौसम बड़ी तेज़ी से जासूसी के मौसम में बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।

कोरोना वायरस की दूसरी लहर उतर गई है, और अपने पीछे छोड़ गई है अंदाज़न 40 लाख भारतीयों की मौतें। मौतों का आधिकारिक सरकारी आंकड़ा इसका दसवां हिस्सा है– चार लाख। नरेंद्र मोदी की इस खौफनाक हुकूमत (डिस्टोपिया) में, जब श्मशान घाटों पर धुआं छंटने लगा और कब्रिस्तानों की मिट्टी जमने लगी, तब हमारी सड़कों पर “थैंक्यू मोदी जी” कहते हुए भारी-भरकम होर्डिंग नमूदार हुए। (यह उस “मुफ्त वैक्सीन” के लिए लोगों की तरफ से पेशगी शुक्रिया है, जो ज्यादातर तो उपलब्ध नहीं है, और जिसे आबादी के 95% को अभी लगना बाकी है।) जहां तक मोदी सरकार की बात है, मौतों के सही आंकड़ों की गिनती करने की कोई भी कोशिश भारत के खिलाफ एक साजिश है– मानो जो दसियों लाख लोग मरे वे महज अभिनेता थे जो एक बदनीयती के साथ काम कर रहे थे, जो उन तंग, सामूहिक कब्रों में लेटे जिन्हें आपने आसमान से ली गई तस्वीरों में देखा, या जिन्होंने लाशों का भेष धर कर खुद को नदियों में बहाया, या जिन्होंने शहरों के फुटपाथों पर खुद की लाश जलाई। वे सभी भारत की अंतरराष्ट्रीय इज्ज़त को बदनाम करने की अकेली ख्वाहिश के साथ काम कर रहे थे।

भारत सरकार और उसके जड़ाऊ मीडिया ने अब यही इल्जाम खोजी पत्रकारों के उस अंतरराष्ट्रीय कन्सोर्टियम के खिलाफ लगाया है, जिसके तहत 17 समाचार संगठनों के पत्रकारों ने फॉरबिडेन स्टोरीज़ और एमनेस्टी इंटरनेशनल के साथ मिल कर भारी पैमाने पर वैश्विक खुफियागिरी और निगरानी की एक असाधारण खबर उजागर की है। इन खबरों में भारत उन देशों में शामिल है जिनकी सरकारों ने जाहिर तौर पर इस्राएली निगरानी कंपनी एनएसओ ग्रुप द्वारा विकसित पेगासस स्पाइवेयर (जासूसी करने वाला एक सॉफ्टवेयर) खरीदा है। अपनी तरफ से एनएसओ ने कहा है कि यह अपनी तकनीक सिर्फ़ उन्हीं सरकारों को बेचती है जिनका मानवाधिकारों का इतिहास बेदाग हो और जो वादा करती हैं कि वे सिर्फ राष्ट्रीय सुरक्षा के मकसद से, आतंकवादियों और अपराधियों का सुराग लगाने के लिए इसका उपयोग करेंगी।

एनएसओ के मानवाधिकार टेस्ट में बेदाग निकलने वाले दूसरे कुछ देशों में रवांडा, सऊदी अरब, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और मेक्सिको शामिल हैं। तो “आतंकवादियों” और “अपराधियों” की परिभाषा ठीक-ठीक किन लोगों ने बनाई है? क्या यह बस एनएसओ और इसके ग्राहकों की मर्जी पर आधारित है?

स्पाइवेयर की भारी-भरकम कीमत के अलावा, जो एक-एक फोन के लिए लाखों डॉलर तक होती है, एनएसओ प्रोग्राम की कुल कीमत का 17% सालाना सिस्टम मेन्टेनेंस फीस के रूप में वसूल करता है। एक विदेशी कॉरपोरेट कंपनी एक ऐसा जासूसी नेटवर्क मुहैया करा रही है और उसे चलाती है जो एक देश की सरकार की तरफ से उस देश के निजी नागरिकों की निगरानी कर रही है, इसमें कुछ तो बहुत विश्वासघात वाली बात है।

पत्रकारों के जांच दल ने 50,000 फोन नंबरों की एक लीक हुई सूची की छानबीन की। इस विश्लेषण से पता लगा कि इनमें से 1,000 से अधिक नंबर भारत में एनएसओ के एक क्लाइंट द्वारा चुने गए थे। वे इन नंबरों को हैक करने में सफल रहे थे या नहीं, या उनको हैक करने की कोशिश हुई थी या नहीं, यह बात सिर्फ तभी पता लगाई जा सकती है जब इन फोनों को फोरेंसिक जांच के लिए जमा किया जाए। भारत में जिन नंबरों की जांच की गई उनमें से कइयों को पेगासुस स्पाइवेअर से संक्रमित पाया गया। लीक हुई सूची में विपक्षी दल के राजनेताओं, आलोचना करने वाले पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, वकीलों, बुद्धिजीवियों, कारोबारियों, भारत के चुनाव आयोग के एक नाफरमान अधिकारी, बात नहीं मानने वाले एक वरिष्ठ खुफिया अधिकारी, कैबिनेट मंत्री और उनके परिवार वाले, विदेशी कूटनीतिज्ञ और यहां तक कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के फोन नंबर भी शामिल हैं।

भारतीय सरकार के प्रवक्ता ने सूची को फर्जी घोषित कर दिया है। भारतीय सियासत पर करीबी नजर रखने वाले जानते हैं कि एक माहिर और जानकार कहानीकार भी उन लोगों की ऐसी एक सुसंगत, भरोसेमंद सूची तैयार करने के काबिल नहीं है जिनमें सत्ताधारी पार्टी की दिलचस्पी है (पर्सन्स ऑफ इंटरेस्ट) या वह जिन्हें अपनी राजनीतिक परियोजना के मुखालिफ समझती है। यह मज़ेदार बारीकियों से भरी हुई है, कहानियों के भीतर कहानियों से भरी हुई है। कुछ ऐसे नाम इसमें शामिल हैं जिनकी उम्मीद नहीं थी। अनेक जिनका अंदेशा था, वे इसमें शामिल नहीं हैं।

हमें बताया गया है कि पेगासस को बस एक मिस्ड कॉल के ज़रिए टारगेट किए गए फोन में इंस्टॉल किया जा सकता है। जरा सोचिए। मिस्ड कॉल की एक मिसाइल से दागे गए अदृश्य स्पाइवेयर का गोलाबारूद। महाद्वीपों को लांघने वाली एक बैलिस्टिक मिसाइल (आइसीबीएम) जिसका कोई जोड़ नहीं है। जो लोकतंत्रों को तहस-नहस करने में और समाजों को तोड़ने में सक्षम है, जिसको किसी लाल-फीताशाही का सामना नहीं करना है– न वारंट, न हथियारों के समझौते, न चौकसी करने वाली समितियां, न ही किसी किस्म का कानून। बेशक, बेशक तकनीक का अपना कोई उसूल नहीं होता। इसमें किसी का कोई कसूर नहीं है।

जाहिर तौर पर एनएसओ और भारत के बीच दोस्ताना लेन-देन 2017 से शुरू हुआ, जब भारतीय मीडिया की भाषा में मोदी-नेतन्याहू का ‘ब्रोमान्स’ चला था– जब उन्होंने अपने पतलूनों के पांयचे मोड़े और दोर समंदर तट पर कदम मिलाए। अपने पीछे उन्होंने जो छोड़ा वह रेत पर उनके कदमों का निशान भर नहीं था। यही वह समय था जिसके आस-पास इस सूची में भारत के फोन नंबर दिखाई देने लगे।

उसी साल भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद का बजट दस गुना बढ़ गया। ज्यादातर बढ़ी हुई रकम साइबर सिक्योरिटी पर खर्च होनी थी। प्रधानमंत्री के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल जीतने के बाद जल्दी ही, अगस्त 2019 में भारत के कठोर आतंकवाद विरोधी कानून, गैर कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) का विस्तार करके, जिसके तहत पहले से ही हजारों लोग बिना जमानत के जेलों में बंद हैं, अब सिर्फ संगठनों को ही नहीं, निजी व्यक्तियों को भी इसके दायरे में ले आया गया। आखिरकार संगठनों का कोई स्मार्टफोन नहीं होता– यह एक महत्वपूर्ण बारीकी है, चाहे सैद्धांतिक ही हो। लेकिन निश्चित तौर पर इसने फंदे का घेरा बढ़ा दिया। और बाजार भी।

संसद में इस संशोधन पर होने वाली बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने कहा: “सर, बंदूक़ आतंकवाद नहीं बढ़ाते, आतंकवाद की जड़ वह प्रचार है जो इसको फैलाने के लिए किया जाता है….और अगर ऐसे सभी व्यक्तियों को आतंकवादी के रूप में चिह्नित किया जाता है, तो मैं नहीं सोचता कि संसद के किसी सदस्य को इसमें आपत्ति होनी चाहिए।”

पेगासस कांड ने संसद के मानसून सत्र में उथल-पुथल पैदा की है। विपक्ष ने गृह मंत्री के इस्तीफे की मांग की है। अपने बेरहम बहुमत से आश्वस्त मोदी की सत्ताधारी पार्टी ने रेलवे और संचार एवं सूचना तकनीक मंत्री के रूप में नए-नए शपथ लेने वाले अश्विनी वैष्णव को संसद में सरकार का बचाव करने के लिए उतारा। उनकी अपमान जनक किस्मत देखिए, लीक हुई सूची में उनका नंबर भी था।

अगर आप सरकार के अनेक बयानों की गरजदार और उलझी हुई पेंचदार बातों को परे कर दें, तो आप पाएंगे कि पेगासस खरीदने और इसका इस्तेमाल करने से सीधे-सीधे इंकार नहीं किया गया है। एनएसओ ने भी बिक्री से इंकार नहीं किया है। इस्राएल सरकार ने स्पाइवेयर के दुरुपयोग के आरोपों की एक जांच शुरू की है, फ्रांसीसी सरकार ने भी ऐसा ही किया है। भारत में पैसे के लेन-देन का पता लगाएंगे तो देर-सबेर पक्के सबूतों तक पहुंच जाएंगे। लेकिन वे पक्के सबूत हमें कहां पहुंचाएंगे?

इसके बारे में सोचिए: 16 एक्टिविस्ट, वकील, मजदूर संघों के कार्यकर्ता, प्रोफेसर और बुद्धिजीवी, जिनमें से अनेक दलित हैं, बरसों से जेल में बंद हैं। इस मामले को अब भीमा-कोरेगांव (बीके) केस के नाम से जाना जाता है। बड़े अजीबोगरीब ढंग से उन पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने हिंसा भड़काने की एक साजिश रची, जो 1 जनवरी 2018 को दलितों और प्रभुत्वशाली जातियों के बीच हुई थी। इस दिन हजारों की संख्या में दलित भीमा-कोरेगांव की लड़ाई (जिसमें दलित सैनिकों ने ब्रिटिशरों के साथ मिल कर एक निरंकुश ब्राह्मण राज पेशवाओं को हरा दिया था) की 200वीं सालगिरह मनाने के लिए जमा हुए थे। 16 भीमा कोरेगांव आरोपितों में से आठ के फोन नंबर और उनके कुछ करीबी परिजनों के फोन नंबर इस लीक हुई सूची में मिले हैं। उनमें से सभी हैक हुए थे या नहीं, या हैक की कोशिश की गई थी या नहीं, इस बात का पक्का पता नहीं लगाया जा सकता क्योंकि उनके फोन नंबर पुलिस के कब्जे में और फोरेंसिक जांच के लिए उपलब्ध नहीं हैं।

इधर कुछ बरसों में हम उस मनहूस सीमा के विद्वान हो गए हैं जहां तक मोदी सरकार उन लोगों को फंसाने के लिए जा सकती है जिन्हें यह दुश्मन मानती है – और यह महज खुफिया निगरानी से बढ़ कर है। द वाशिंगटन पोस्ट ने हाल में मैसाच्युसेट्स की एक डिजिटल फोरेंसिक कंपनी आर्सेनल कन्सल्टिंग की एक रिपोर्ट के नतीजे प्रकाशित किए, जिसने दो भीमा कोरेगांव आरोपितों रोना विल्सन और सुरेंद्र गाडलिंग के कंप्यूटरों की इलेक्ट्रॉनिक कॉपियों की जांच की है। जांच करने वालों ने पाया कि उनके दोनों कंप्यूटरों में एक अज्ञात हैकर ने घुसपैठ की थी, और उनके हार्ड ड्राइवों में हिडेन (छुपे हुए) फोल्डरों में उन्हें फंसाने वाले दस्तावेज़ रख दिए गए। उनमें सनसनी बढ़ाने के लिए एक बेतुकी चिट्ठी मोदी की हत्या करने की एक नीरस साजिश के बारे में थी।

आर्सेनल रिपोर्ट के गंभीर संकेतों से भारतीय न्यायपालिका या इसके मुख्य धारा के मीडिया में इंसाफ के मकसद से कोई हलचल नहीं मची है। हुआ इसका उलटा ही है। जिस वक्त इसकी लीपापोती की भारी कोशिशें हो रही थीं और वे रिपोर्ट के संभावित नुकसानों को सीमित करने में लगे थे, भीमा कोरेगांव आरोपितों में से एक, 84 साल के एक जेसुइट पादरी फादर स्टेन स्वामी की जेल में कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद एक तकलीफदेह मौत हुई। इस शख्स ने झारखंड राज्य में जंगल में रहने वाले उन आदिवासी लोगों के बीच काम करते हुए अपनी जिंदगी के कई दशक गुजारे थे, जो अपनी धरती पर कॉरपोरेट कंपनियों के कब्जे के खिलाफ लड़ रहे हैं। अपनी गिरफ्तारी के समय स्वामी को पार्किन्संस बीमारी और कैंसर थी।

तो हम पेगासस को कैसे समझें? हकीकत से आंखें मूदते हुए इसको खारिज कर दें, कह दें कि शासक अपने शासितों की निगरानी करने के लिए जो सदियों पुराना खेल चलाते आए हैं, यह उसका महज एक नया तकनीकी हथकंडा है? ऐसा करना एक गंभीर गलती होगी। यह कोई मामूली खुफिया निगरानी नहीं है। हमारे मोबाइल फोन हमारे सबसे अंतरंग वजूद में शामिल हैं। वे हमारे दिमाग और हमारे शरीरों का विस्तार हैं। भारत में मोबाइल फोन की गैरकानूनी निगरानी नई बात नहीं है। हरेक कश्मीरी को यह पता है। ज्यादातर भारतीय एक्टिविस्ट भी यह जानते हैं। लेकिन हमारे लिए सरकारों और कॉरपोरेट कंपनियों को इस बात का कानूनी अधिकार दे देना कि वे हमारे फोन में घुसपैठ करें और उस पर कब्जा कर लें, ऐसा ही होगा मानो हम अपनी मर्यादा का हनन करने के लिए खुद को उनके हाथों में सौंप दें।

पेगासस प्रोजेक्ट से उजागर होने वाली बातें दिखाती हैं कि इस स्पाइवेयर का संभावित खतरा पुरानी किसी भी किस्म की खुफियागीरी या निगरानी से कहीं अधिक आक्रामक है। यह गूगल, अमेजन और फेसबुक के अलगोरिद्म्स से भी अधिक आक्रामक है, जिनके ताने-बाने के भीतर करोड़ों लोग अपनी जिंदगियां जी रहे हैं और अपनी चाहतों से खेल रहे हैं। यह अपनी जेब में एक जासूस लिए फिरने से भी बड़ी बात है। यह मानो ऐसा है कि आपका सबसे प्रियतम – या उससे भी बदतर, आपका अपना दिमाग, अपने दुरूह कोनों तक में – आपकी खुफियागीरी कर रहा हो।

पेगासस जैसे स्पाइवेअर न सिर्फ हरेक संक्रमित फोन के उपयोगकर्ता को, बल्कि उसके दोस्तों, परिवार वालों, सहकर्मियों के पूरे दायरे को राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जोखिम में डालता है।

जनता की व्यापक निगरानी के बारे में सबसे ज्यादा और सबसे गहराई से शायद एडवर्ड स्नोडेन से सोचा है, जो संयुक्त राज्य की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के पूर्व एनालिस्ट और आलोचक हैं। गार्डियन के साथ एक हालिया इंटरव्यू मे उन्होंने चेतावनी दी: “अगर आप इस तकनीक की बिक्री को रोकने के लिए कुछ नहीं करते हैं, तो यह सिर्फ 50,000 टारगेटों तक सीमित नहीं रहेगी। यह 5 करोड़ हो जाएगी, और यह हमारे अंदेशों से कहीं अधिक जल्दी होने वाला है।” हमें उनको सुनना चाहिए। वे इसके भीतर थे और उन्होंने इसको आते हुए देखा है।

स्नोडेन से मैं करीब सात साल पहले, दिसंबर 2014 में मॉस्को में मिली थी। उन्हें बगावत किए हुए करीब डेढ़ साल हुए थे, और उनमें अपनी सरकार द्वारा अपने ही नागरिकों की अंधाधुंध व्यापक निगरानी से नफरत थी। मई 2013 में वे बाल-बाल बच निकले थे, और एक फरार शख्स की ज़िंदगी के धीरे-धीरे आदी होने लगे थे। डैनियल एल्सबर्ग (पेंटागन पेपर्स वाले), जॉन क्यूज़ैक (जॉन क्यूज़ैक वाले) और मैं उनसे मिलने के लिए मॉस्को गए थे। तीन दिनों तक हम खिड़कियों पर दबिश देती रूस की बर्फीली सर्दी के बीच अपने होटल के कमरे में बंद रहे थे और निगरानी और खुफियागीरी पर बातें करते रहे थे। यह किस हद तक जाएगा? यह हमें कहां ले जाएगा? हम क्या बन जाएंगे?

जब पेगासस प्रोजेक्ट की खबरें आने लगीं तो मैं वापस अपनी रेकॉर्डेड बातचीत के ट्रांस्क्रिप्ट पढ़ने लगी। यह कुछ सौ पन्नों में है। अंत में मेरे रोंगटे खड़े हो गए। तब महज अपने तीसवें में रहे स्नोडेन एक सख्त पैगंबर की तरह बोल रहे थे: “तकनीक वापस नहीं ली जा सकती है, तकनीक तो बनी रहेगी…..यह सस्ती होने वाली है, यह अधिक कारगर होने वाली है, यह और अधिक उपलब्ध होने वाली है। अगर हम कुछ नहीं करते, तो एक तरह से हम सोते-सोते एक मुकम्मल निगरानी वाले राज्य में पहुंच जाएंगे जहां एक सुपर स्टेट होगा जिसके पास ताकत का उपयोग करने की अथाह क्षमता होगी और जानने और [इसलिए] उस [ताकत को] निशाने पर लगाने की अथाह क्षमता होगी– और यह एक बहुत खतरनाक मिश्रण है…..भविष्य की यह दिशा है।”

दूसरे शब्दों में, हम एक ऐसी दिशा में बढ़ रहे हैं जहां हम पर ऐसे राज्यों का शासन होगा जो हर वह बात जानते हैं जो लोगों के बारे में जानी जा सकती है, लेकिन उन राज्यों के बारे में जनता बहुत कम जानती है। यह असंतुलन सिर्फ एक ही दिशा में ले जा सकता है। एक असाध्य जानलेवा हुक्मरानी। और लोकतंत्र का अंत।

स्नोडेन सही हैं। तकनीक को वापस नहीं लिया जा सकता। लेकिन इसको अनियंत्रित, कानूनी उद्योग के रूप में काम करने की इजाजत देने की जरूरत नहीं है, जो मुक्त बाजार के हलचल भरे, महाद्वीपों में पसरे हुए राजमार्गों पर भागते हुए फले-फूले, और मुनाफा बटोरे। इस पर कानून की लगाम कसने की जरूरत है। इसको काबू में करना है। तकनीक रह सकती है, लेकिन उद्योग के रहने की जरूरत नहीं है।

तो हम आज कहां हैं? मैं कहूंगी, उसी, जानी-पहचानी, पुरानी राजनीति की दुनिया में। इस खतरे को सिर्फ राजनीतिक कार्रवाई ही रोक सकती है, उसका नुकसान कम कर सकती है। क्योंकि यह तकनीक, जब भी यह उपयोग में लाई जाती है, (चाहे कानूनी या गैरकानूनी तरीके से), वह हमेशा एक जटिल दुष्चक्र में बनी रहेगी जो आज हमारे समय की पहचान है: राष्ट्रवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद, नस्लवाद, जातिवाद, सेक्सिज्‍म। चाहे यह तकनीक कैसे भी विकसित होती है – यह हमारी लड़ाई का मैदान बनी रहेगी।

हमें अपना बसेरा उठा कर एक ऐसी दुनिया में वापस जाना होगा जहां हम अपने सबसे अंतरंग दुश्मन अपने मोबाइल फोन के कब्जे में, उसके मातहत नहीं जी रहे होंगे। हमें डिजिटल निगरानी की दमघोंट देने वाली हुकूमत के बाहर अपनी जिंदगियों को, संघर्षों को और सामाजिक आंदोलनों को फिर से रचना होगा। हमें उन व्यवस्थाओं को सत्ता से बेदखल करना होगा जो हमारे खिलाफ इसकी तैनाती कर रही हैं। सत्ता की मूठ पर उनकी गिरफ्त को ढीली करने के लिए, उन्होंने जो कुछ तोड़ा उसे जोड़ने के लिए, और उन्होंने जो कुछ चुरा लिया है उसे वापस लेने के लिए, हम जो भी कर सकते हैं वह हमें करना होगा।

(अरुंधति रॉय जानी-मानी लेखिका हैं। गार्डियन में प्रकाशित उनके लेख का यह हिंदी अनुवाद है। अनुवाद रेयाज़ुल हक़ ने किया है।)

NEET परीक्षा में OBC आरक्षण के सवाल पर कितने गंभीर हैं हरियाणा के ओबीसी समुदाय के नेता!

12 सितम्बर 2021 को देशभर में NEET (नेशनल एलिजिब्लिटी एंट्रेंस टेस्ट) करवाया जाएगा. नीट डॉक्टर बनने की पढाई के लिए करवाई जाने वाली राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा है. नीट पास करने के बाद ही किसी व्यक्ति को देश के सरकारी कॉलेज में डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए दाखिला मिलता है.

लेकिन इसको लेकर एक विवाद छिड़ गया है. देश के कई संगठन इस परीक्षा का विरोध कर रहे हैं. उनके अनुसार इसमें OBC को छोड़कर बाक़ी सभी वर्गों को आरक्षण दिया जा रहा है और ये संविधान में दर्ज़ आरक्षण की मूल भावना के ख़िलाफ़ है.

2017 तक डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए PMT यानी प्री मेडिकल टेस्ट नामक परीक्षा होती थी. प्री मेडिकल टेस्ट को लेकर साल 1984 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक निर्णय के द्वारा इसमें AIQ यानी “ऑल इंडिया कोटा” लागू कर दिया.

ऑल इंडिया कोटा के तहत सभी राज्यों के मेडिकल कॉलेज में 15 प्रतिशत अंडर ग्रेजुएट और 50 प्रतिशत पोस्ट ग्रेजुएट सीटें केंद्र सरकार को दे दी गईं. ऐसा करने के पीछे कोर्ट ने दलील दी कि अक्सर राज्यों के मेडिकल कॉलेज में उसी राज्य के बच्चों को तरजीह दी जाती थी इसलिए ऐसा करना ज़रूरी था.

OBC वर्ग को करीबन 11 हजार सीटों का नुक़सान

“ऑल इंडिया ओबीसी फेडरेशन” जो कि केंद्र सरकार में काम कर रहे 40 से अधिक अन्य पिछड़ा वर्ग के संगठनों का एक समूह है, उसने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि आरक्षण न मिलने से पिछले तीन सालों में OBC वर्ग को करीबन 11 हजार सीटों का नुक़सान हुआ है. उनके अनुसार इस नुक़सान का फ़ायदा सामान्य वर्ग के लोगों को हुआ है.

साल 2017 से लेकर 2020 के दौरान इन सीटों पर ओबीसी आरक्षण ना मिलने से

• पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम (मेडिकल-एमडी, एमएस) में 7,307

• अंडर-ग्रेजुएट प्रोग्राम (मेडिकल-एमडी, एमएस) में 3,207

• पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम (डेंटल) में 262 और

• अंडर-ग्रेजुएट प्रोग्राम में 251 छात्रों का नुक़सान हुआ है.

हरियाणा के OBC वर्ग में इसको लेकर किस तरह की हलचल है?

इस मामले पर हमने सबसे पहले हरियाणा के उन नेताओं से बातचीत की जो OBC वर्ग से आते हैं और केंद्र सरकार में हरियाणा कोटे से मंत्री हैं.

इनमें सबसे पहला नाम है गुडगाँव से सांसद राव इंद्रजीत सिंह का जो कि अहीर जाति से आते हैं और फ़िलहाल हरियाणा से केंद्र में सबसे ऊँचे कद के मंत्री भी हैं.

इस मसले पर जब हमने उनसे बात करने की कोशिश कि तो पहली बार में उनके निजी सचिव ने कहा कि मंत्री जी अभी संसदीय सत्र में व्यस्त हैं और बाद में बात करेंगे.

दूसरी बार संपर्क करने पर उनके निजी सचिव ने कहा कि मंत्री जी का कहना है कि इस मसले को लेकर हम उनकी बजाय राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग से संपर्क करें.

जवाब में जब हमने कहा कि हम राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग से बात कर चुके हैं. अब हमें इस मसले को लेकर माननीय सांसद जी की राय लेनी है और वो हमारे सवाल सुने बिना ही हमें राष्ट्रिय पिछड़ा आयोग से बात करने की सलाह क्यों दे रहे हैं?

अंत में उनके निजी सचिव ने कहा कि हम उनको हमारे सवाल भेज दें. हमने अपनी तरफ़ से उनको तुरंत सवाल भेज दिए, मगर उसके बाद उनका कोई जवाब नहीं आया.

19 जुलाई से लेकर 23 जुलाई तक हमने उनके निजी सचिव को लगातार फ़ोन और मेसेज के माध्यम से संपर्क किया मगर उन्होंने न फ़ोन उठाया और न ही मेसेज पर कोई जवाब दिया.

आपको बता दें कि राव इंद्रजीत सिंह हरियाणा के अहिरवाल इलाक़े से आते हैं और यह पूरा इलाक़ा “यादव” बहुल क्षेत्र है जो कि एक बड़ा OBC समूह है. मगर यहाँ के सबसे बड़े नेता और हरियाणा से केंद्र में मंत्री, 5 बार के सांसद और 4 बार के विधायक राव इंद्रजीत सिंह ने नीट में OBC आरक्षण को लेकर हमारे सवालों का कोई जवाब नहीं दिया.

अब बात करते हैं हरियाणा से दूसरे केंद्रीय मंत्री और फ़रीदाबाद से सांसद कृष्णपाल गुर्जर की. कृष्णपाल गुर्जर तीन बार विधायक रह चुके हैं और सांसद के रूप में उनका यह दूसरा कार्यकाल है.

केंद्र सरकार में वह लगातार दूसरी बार मंत्री बने हैं. इस मामले में सांसद कृष्णपाल गुर्जर का मत जानना इसलिए और भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि वह केंद्र सरकार में सामाजिक न्याय राज्यमंत्री हैं और आरक्षण सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण पहलू है.

मगर हैरानी की बात है कि केंद्र में सामाजिक न्याय राज्यमंत्री के पद पर होते हुए भी सांसद कृष्णपाल गुर्जर ने गांव सवेरा से बातचीत में कहा कि, “उनको इस बारे में कोई जानकारी नहीं है और वह अपने पिछड़ा विभाग देखने वाले अधिकारी से बात करने के बाद ही हमें कुछ बता पाएँगे.”

इसके बाद हमने लगातार दो दिनों तक उनसे संपर्क किया मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

हरियाणा कोटे से केंद्र में अभी यह दो ही मंत्री हैं और दोनों ही OBC वर्ग से आते हैं मगर हैरानी की बात है कि दोनों में किसी भी मंत्री ने इस मसले को लेकर न तो अब तक संसद में कोई आवाज़ उठाई है और न ही हमारे सवालों का कोई जवाब दिया.

इस मसले को लेकर हमने हरियाणा सरकार में OBC वर्ग से आने वाले मंत्रियों से भी बात की.

हरियाणा सरकार के मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री को मिलाकर कुल 12 विधायक शामिल हैं. इन 12 मंत्रियों में से महज़ 2 मंत्री OBC वर्ग से आते हैं – जगाधरी से विधायक कंवरपाल गुर्जर और नारनौल से विधायक ओमप्रकाश यादव.

कंवरपाल गुर्जर ने गाँव सवेरा से बातचीत में कहा कि, “उनको इस विषय में जानकारी नहीं थी, उन्हें तो हमारे द्वारा ही इस बात का पता चला है. मैं इस विषय में केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखूंगा और मेर मानना है कि OBC को भी इसमें आरक्षण मिलना चाहिए.”

वहीं नारनौल से विधायक ओमप्रकाश यादव मनोहर मंत्रिमंडल में ओबीसी वर्ग से दूसरे और अंतिम मंत्री है. इनका हाल भी बाक़ी के मंत्रियों जैसा ही है, इनको भी इस मामले की जानकारी नहीं थी. गाँव सवेरा से फ़ोन पर बातचीत में ओम प्रकाश यादव ने बताया कि, “उनकों इस बारे में जानकारी नहीं है इसलिए वह इस मसले पर ज़्यादा कुछ नहीं कह सकते.”

हमारे द्वारा पूरा मामला समझाए जाने पर उन्होंने कहा कि वह अवश्य इसको लेकर सरकार को पत्र लिखेंगे और ओबीसी वर्ग को भी आरक्षण मिले इस बात का समर्थन करेंगे.

हरियाणा भाजपा ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष और इंद्री से पूर्व विधायक करणदेव कम्बोज ने इस मसले पर बातचीत करते हुए चौंकाने वाली बात कही. उन्होंने कहा, “देखिए देश में कुछ ऐसी प्रतिष्ठित परीक्षाएं होती हैं जिनमें चयन आरक्षण नहीं केवल मेरिट के आधार पर होता है, उनमें नीट की परीक्षा भी शामिल है.”

फिर हमने उनको बताया कि ऐसा नहीं है और नीट की परीक्षा में आरक्षण का प्रावधान है. हमने उनके सामने ये भी स्पष्ट किया कि नीट परीक्षा में ऑल इंडिया कोटा की सीटों पर SC ओर   ST को तो आरक्षण मिल रह है, केवल OBC को नहीं मिल रहा. तब उन्हें पूरा मामला समझ आया अन्यथा इससे पहले उनको इसकी कोई जानकारी नहीं थी और उनके अनुसार तो नीट में आरक्षण का प्रावधान ही नहीं था.

भाजपा ओबीसी मोर्चा की राज्य इकाई के अध्यक्ष को देश की टॉप मेडिकल परीक्षा में आरक्षण के प्रावधानों की ग़लत जानकारी का होना कितना गंभीर है, इसका अंदाज़ा आप खुद लगा सकतें हैं.

हालांकि हमारे द्वारा तमाम जानकारियां बताने के बाद करणदेव कम्बोज ने यह ज़रूर कहा कि वह इस विषय में सरकार से बात करेंगे और OBC वर्ग को आरक्षण दिलवाने के लिए प्रयास करेंगे.

इस मामले में राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग का पक्ष जानने के लिए हमने आयोग की सदस्या डॉक्टर सुधा यादव से बात की. जानकारी के लिए आपको बता दें कि डॉक्टर सुधा यादव साल 1999 में भाजपा के टिकट पर महेंद्रगढ़ लोकसभा से चुनाव जीतकर संसद में पहुंची थीं. डॉक्टर सुधा यादव भाजपा राष्ट्रीय ओबीसी मोर्चा की पूर्व अध्यक्ष भी रह चुकी हैं.

डॉक्टर सुधा यादव ने कहा, “राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग इस मामले पर लगातार नज़र बनाए हुए है और 2 बार इस मामले को लेकर आयोग सुनवाई भी कर चुका है. हमने स्वास्थ्य मंत्रालय को इस बारे में लिखा भी है कि OBC को आरक्षण दिया जाना चाहिए. हम लगातार केंद्र सरकार के सामने इस मुद्दे को उठा रहे हैं और हमें उम्मीद है कि इस साल की परीक्षा से पहले सरकार ओबीसी आरक्षण का प्रावधान लागू कर देगी.”

जहाँ सूबे के ओबीसी वर्ग से आने वाले भाजपा सांसदों और मंत्रियों को इस मसले की जानकारी ही नहीं है, वहीं हरियाणा में विपक्ष की तरफ़ से भी इस मामले को लेकर किसी तरह की कोई ख़ास आवाज़ नहीं उठाई जा रही. हरियाणा कांग्रेस के ट्विटर हैंडल से पिछले एक महीने में इस मामले को लेकर एक भी ट्वीट नहीं किया गया.

कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे और रेवाड़ी से लगातार 6 बार विधायक रह चुके अजय यादव से हमने इस मामले को लेकर कांग्रेस का पक्ष जानने की कोशिश की मगर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

हालांकि अखिल भारतीय कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने जुलाई महीने की शुरुआत में इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के नाम एक चिट्ठी लिखी थी. चिट्ठी के माध्यम से सोनिया गांधी ने मांग की थी कि केंद्र सरकार ओबीसी वर्ग को आरक्षण देने का काम करें, ऐसा न करके सरकार संविधान में दर्ज़ आरक्षण की मूल भावना की अनदेखी कर रही है.

हरियाणा का ओबीसी वर्ग इसको लेकर मुखर क्यों नहीं है….

इंडिया टुडे मैगज़ीन के पूर्व सम्पादक और आरक्षण के मुद्दे पर मुखरता से अपने विचार रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने हमें बताया, “हरियाणा में यादव और सैनी, ये दो सबसे बड़े ओबीसी समुदाय हैं. जाट वर्चस्व को चुनौती देने के चक्कर में ये भाजपा के साथ जुड़े हुए हैं. वैसे भी हरियाणा में वर्ग चेतना को लेकर कभी इतनी मुखर राजनीति नहीं रही. यही कारण है कि हरियाणा का ओबीसी समाज कभी भी पिछड़ों और अगड़ों की लड़ाई में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाता.”

गौरतलब है कि हरियाणा का यादव समाज जो कि प्रदेश का सबसे बड़ा ओबीसी वर्ग है, सेना में अहीर रेजिमेंट की मांग तो समय-समय पर उठाता रहता है, मगर इस मामले को लेकर वह एकदम शांत है.

इसको लेकर वरिष्ठ पत्रकार और रेवाड़ी भास्कर के पूर्व ब्यूरो चीफ़ प्रदीप रणघोष ने हमें बताया, “हरियाणा के यादव संवैधानिक तौर पर भले ही अन्य पिछड़ा वर्ग में आते हों, मगर वे खुद को सामाजिक रूप से पिछड़ा स्वीकार नहीं करते. अहीर रेजिमेंट की मांग उनके लिए जातीय गौरव के साथ-साथ अहीर कौम के लड़ाकू और जुझारू होने का प्रतीक भी है. यहाँ के ओबीसी वर्ग ने कभी जातीय संघर्ष की लड़ाई नहीं लड़ी, इसलिए इनकी आरक्षण के प्रति समझ अभी उतनी गहरी नहीं बन पाई है, जितनी यूपी और बिहार के ओबीसी समाज की है.”

OBC आरक्षण की बहस कैसे शुरू हुई?

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब मेडिकल परीक्षा के लिए देश भर में सीटों का बंटवारा तीन अलग-अलग श्रेणियों में हो गया. पहला केन्द्र सरकार के मेडिकल कॉलेज की सीटें, दूसरा राज्य सरकारों के मेडिकल कॉलेज की सीटें और तीसरा ऑल इंडिया कोटा की सीटें.

केंद्र और राज्य सरकारों के हिस्से आनी वाली सीटों पर तो मंडल कमीशन द्वारा दिए गए आरक्षण का प्रावधान लागू था, मगर ऑल इंडिया कोटा बनाते समय सुप्रीम कोर्ट ने इसको लेकर आरक्षण का कोई प्रावधान लागू नहीं किया. साल 1985 से लेकर 2007 तक ऑल इंडिया कोटा की सीटों पर किसी तरह का कोई आरक्षण किसी भी वर्ग को नहीं दिया गया.

साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने ऑल इंडिया कोटा की सीटों पर भी आरक्षण लागू कर दिया. कोर्ट ने ऑल इंडिया कोटा में 15 प्रतिशत सीटें SC के लिए और 7.5 प्रतिशत सीटें ST के लिए आरक्षित कर दी. हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फ़ैसले में OBC आरक्षण का कोई ज़िक्र नहीं किया.

यानी कि मौजूदा स्तिथि में यदि कोई OBC छात्र नीट की परीक्षा पास कर ऑल इंडिया कोटा के तहत दाखिला लेता है तो उसको राज्यों के सरकारी मेडिकल कॉलेज में आरक्षण नहीं मिलेगा. वहीं यदि कोई SC या ST समुदाय का छात्र ऑल इंडिया कोटा के तहत दाखिला लेता है तो उनको आरक्षण का लाभ मिलेगा.

2021 में भी ऑल इंडिया कोटा में बिना OBC आरक्षण के नीट की परीक्षा होने जा रही है

नीट परीक्षा के साल 2021 के नोटिफ़िकेशन  में केंद्र सरकार ने साफ़ कर दिया है कि वह इस बार भी ऑल इंडिया कोटा में OBC आरक्षण नहीं लागू कर रही.

मद्रास हाई कोर्ट के फ़ैसले पर केंद्र सरकार ने कहा है कि उन्होंने कोर्ट के आदेश के मुताबिक़ पांच सदस्यीय कमेटी बनाई थी और उसकी रिपोर्ट भी उनके पास आ चुकी है.

केंद्र सरकार का कहना है कि वो इस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में रखेंगे. दरअसल सुप्रीम कोर्ट में 2015 के एक दूसरे मामले में सुनवाई चल रही है. ये मामला सलोनी कुमारी बनाम केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस) का है, जिसमें ऑल इंडिया कोटा में ओबीसी आरक्षण न मिलने को लेकर ही सवाल उठाया गया है.

केंद्र सरकार ने कहा है कि जब तक सलोनी कुमार के केस में सुप्रीम कोर्ट से कोई फ़ैसला नहीं आ जाता, वो इस मामले पर कोई निर्णय नहीं ले सकती.

आरक्षण लागू न करने के पीछे केंद्र सरकार दे रही कोर्ट केस का हवाला

दरअसल इस पूरे मामले को लेकर मद्रास हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की गई. कोर्ट में मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने सरकार की तरफ़ से दलील दी कि ऑल इंडिया कोटा में आरक्षण को लेकर साल 2007 में सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया था, वो उस आदेश में बदलाव नहीं कर सकते.

कोर्ट ने इसके जवाब में कहा था कि ये कोई क़ानूनी या संवैधानिक अड़चन नहीं है जिसकी वजह से OBC को आरक्षण नहीं दिया जा सकता.

हाई कोर्ट ने 27 जुलाई 2020 को मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया की दलीलों को खारिज करते हुए केंद्र सरकार को आदेश दिया कि वो एक कमेटी बनाकर ऑल इंडिया कोटा में OBC आरक्षण लागू करने का मसौदा तैयार करें. कोर्ट ने इसके लिए सरकार को तीन महीनों का वक़्त दिया था.

इस मसले को लेकर जब हमने ओबीसी वर्ग के उन छात्रों से बात की जो नीट की तैयारी कर रहे हैं या नीट क्लियर कर मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं, तो भी हमें मिले-जुले जवाब ही सुनने को मिलें.

ऑल इंडिया कोटा सीट पर दाख़िला लेकर तेलंगाना के एक मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई कर रही रेवाड़ी की दिव्या यादव का कहना है कि, “ओबीसी और सामान्य वर्ग की कट ऑफ में अधिक अंतर नहीं रहता, लेकिन मैं मानती हूं कि या तो आरक्षण सबको मिले या किसी को न मिले.”

वहीं रोहतक के सरकारी मेडिकल कॉलेज में पढाई कर रहे दीपेश का मानना है कि यदि वह आज इस मुकाम तक पहुंचा है, तो उसमें ओबीसी आरक्षण का अहम योगदान है. बिना ओबीसी आरक्षण के उसका दाख़िला संभव नहीं था. इसलिए वह चाहता है कि केंद्र और राज्य की सीटों के साथ-साथ   ऑल इंडिया कोटा की सीटों पर भी ओबीसी को आरक्षण दिया जाना चाहिए.

अधर में लटका आरोही मॉडल स्कूल के स्टाफ का भविष्य, सरकार ने जारी किया रेगुलर न करने का फरमान!

हरियाणा सरकार की ओर से आरोही स्कूलों के स्टाफ को बड़ा झटका लगा है. हरियाणा सरकार के शिक्षा विभाग ने नोटिस जारी कर प्रदेश के 36 आरोही स्कूलों के टीचर समेत अन्य स्टाफ को पक्का करने से इनकार कर दिया है. हरियाणा सरकार ने ‘आरोही एजुकेशनली बैकवर्ड ब्लाक मॉडल स्कूल सोसायटी सर्विस बायलाज-2019’ के तहत सेवा नियमों में बदलाव कर यह फैसला लिया है.

सरकार की ओर से बैकवर्ड ब्लाक मॉडल स्कूल में पढ़ाने वाले स्टाफ को पांच साल की नौकरी के बाद पक्का करने का वादा किया गया था. लेकिन सरकार के नये फरमान के अनुसार अंग्रेजी माध्यम के आरोही स्कूलों में न तो स्थाई नियुक्ति होगीं और न ही स्थाई कर्मचारियों के समान वेतनमान दिया जाएगा. यानी सरकार के नये ड्राफ्ट के तहत आरोही स्कूलों में कॉन्ट्रैक्ट पर ही भर्तियां की जाएंगी. सरकार ने सीधे तौर पर इन कर्मचारियों को पक्का करने से साफ इनकार कर दिया है.

कॉन्ट्रैक्ट पर रखने के लिए भी बनाए नए नियम:

आरोही स्कूलों में कॉन्ट्रैक्ट जारी रखने के लिए भी सरकार ने मानक तय कर दिए हैं. कॉन्ट्रैक्ट जारी रखने के लिए अध्यापकों को 100 में से न्यूनतम 50 अंक लेने अनिवार्य कर दिए हैं. मानकों के अऩुसार हर साल 100 अंकों में से 40 से कम अंक लेने वाले कर्मचारियों का कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया जाएगा. 40 से 49  के बीच अंक प्राप्त करने वालों को नोटिस जारी किए जाएंगे. यानी कॉन्ट्रैक्ट जारी रखने के लिए कम-से-कम 50 अंक लेने अनिवार्य हैं.  

क्या है आरोही स्कूल योजना:

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 15 अगस्त, 2007 में लाल किले की प्राचीर से भाषण देते हुए देशभर में अंग्रेजी माध्यम के 6 हजार स्कूल चलाने की योजना की घोषणा की थी. ये सभी स्कूल शैक्षणिक तौर पर पिछड़े इलाकों में बनाए जाने हैं. योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर इन स्कूलों को चलाना है. छठी से बारहवी तक के इन स्कूलों का लक्ष्य देश के पिछड़े इलाकों में बच्चों का सर्वांगीण विकास कर शिक्षा के स्तर को बढ़ाना है.

हरियाणा में आरोही स्कूल:

हरियाणा में दस जिलों के शैक्षणिक तौर पर पिछड़े ब्लॉक्स में 36 आरोही स्कूल चल रहे हैं. जिनमें सिरसा और हिसार में 6-6, मेवात और फतेहाबाद में 5-5, पलवल में 4, जींद और कैथल में 3-3, भिवानी में 2, महेंद्रगढ़ और पानीपत में एक-एक आरोही स्कूल हैं. 

हरियाणा विधानसभा नें भी उठा आरोही स्कूल का मुद्दा:

18 मार्च, 2021 को हरियाणा विधानसभा में विपक्ष की ओर से कांग्रेस विधायक गीता भुक्कल ने सवाल उठाया, “कांग्रेस सरकार में बनाए गए 36 आरोही मॉडल स्कूलों में मौजूदा सरकार की तरफ से कोई बढ़ोतरी नहीं की गई. सरकार इन स्कूलों पर ध्यान क्यों नहीं दे रही है.”

वहीं कांग्रेस विधायक धर्मपाल मलिक ने भी आरोही स्कूलों की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा,

“2250 सेंक्सन पोस्ट को घटाकर 350 कर दिया गया है. टीचिंग स्टाफ के लोग पक्के न होने के डर से नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरियों में जा रहे हैं. इससे आने वाले समय में इन स्कूलों के रिजल्ट पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है.”

वहीं आरोही मॉडल स्कूल एसोसिएशन के अध्य़क्ष सत्येंद्र बनवाना ने गांव-सवेरा को बताया,

“हमने शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों के सामने इस संबंध में अपनी बात रखी है. हमें आश्वासन दिया गया है कि एक महीने के भीतर हमारी समस्या का हल कर दिया जाएगा साथ ही जो नोटिस जारी किया गया है वह भी वापस ले लिया जाएगा.”

किसान, महिला और समाज सुधारक विरोधी तिलक!

23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र में रत्नागिरी के चिखली गांव में जन्मे बाल गंगाधर तिलक की आज जयंती है. सोशल मीडिया पर तिलक की जयंती की बधाई संदेश दिए जा रहे हैं. पिछले साल तो सीपीआई(एम) नेता सीताराम येचुरी ने भी ट्वीट कर तिलक की जयंती पर बधाई संदेश दिया था. जिसके बाद येचुरी के ट्वीट की लिबरल खेमे में काफी आलोचना हुई थी, उसका असर यह हुआ कि इस साल सीताराम येचुरी तिलक को याद करना भूल गए. वहीं खुद को सामाजिक न्याय की पक्षधर बताने वाली बहुजन समाज पार्टी के बड़े नेता भी तिलक की जयंती पर संदेश साझा कर रहे हैं.

प्रोफेसर परिमाला वी.राव ने तिलक पर एक शोधपत्र जारी किया है. प्रोफेसर परिमाला वी.राव ने अपने शोधपत्र में मुख्य रूप से तिलक के अखबार मराठा के हवाले से जानकारी दी हैं. प्रो.परिमाला की तिलक पर की गई रिसर्च के अनुसार तिलक के विचार किसान विरोधी, महिला विरोधी और गैर-ब्राह्मण को शिक्षा देने के विरोधी थे.

समाज सुधारक महादेव रानाडे के अनुसार राष्ट्र निर्माण के लिए किसानों और महिलाओं का सशक्तिकरण, हर नागरिक को शिक्षा और समाज सुधार के अन्य कदम उठाए जाने जरुरी हैं. लेकिन तिलक ने रानाडे के इन सभी सामाजिक कार्यों का विरोध किया और अपने अखबार मराठा के जरिए संपादकीय लिखकर समाज सुधार के कामों, किसानों के उत्थान, महिलाओं और गैर-ब्राह्मणों की शिक्षा का पुरजोर विरोध किया. 

किसानों के विरोध में तिलक      

किसानों को सूदखोरों के चुंगल से बचाने के लिए महादेव गोविंद रानाडे ने ‘डेक्कन एग्रीकल्चरिस्ट्स रिलीफ बिल’ का ड्राफ्ट तैयार किया था. महाराष्ट्र में 1870 के दशक में आए अकाल के चलते किसानों पर भारी कर्ज हो गया था. इसी कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए ड्राफ्ट तैयार किया गया था. साथ ही किसानों को इस तरह बदहाल न होना पड़े, इसके लिए महादेव गोविंद रानाडे ने शेतकारी बैंकों की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा था.

इस बैंक के जरिए किसानों को कम ब्याज दर और आसान शर्तों पर कर्ज देने की योजना थी. लेकिन तिलक के भारी विरोध के कारण सरकार को डेक्कन कानून बनाने और कृषि (शेतकारी) बैंकों को खोलने का फैसला रद्द करना पड़ा. इतना ही नहीं तिलक ने सूदखोरों को किसानों का भगवान बताते हुए सरकार से सिफारिश की कि जो लोग सूदखोरों का पैसा नहीं लौटा रहे हैं, उनके लिए जेल भेजने वाले कानून को लागू किया जाना चाहिए.’

साथ ही तिलक का स्पष्ट मानना था कि किसान और कारीगर जातियों का राजनीति में कोई काम नहीं है. 1918 में जब इन जातियों ने राजनीति में प्रतिनिधित्व की मांग की तो तिलक ने एक सभा के दौरान कहा कि

“तेली-तमोली-कुनबी विधानसभा में जाकर क्या करेंगे.”     

शोलापुर की सभा में तिलक का बयान

गैर-ब्राह्मण शिक्षा विरोधी

वहीं किसानों के बच्चों को शिक्षा देने के मसले पर भी तिलक के विचार किसान विरोधी थे. तिलक का कहना था कि किसानों के बच्चों को शिक्षा देना बेकार है. पढ़ना-लिखना सीखना और गणित, भूगोल की जानकारी का उनकी व्यावहारिक जिदगी से कोई लेना-देना नहीं है. पढ़ाई-लिखाई उन्हें फायदा नहीं, नुकसान ही पहुँचाएगी.’ तिलक ने कहा

“गैर-ब्राह्मणों को तो बढ़ईगिरी, लुहार, राज मिस्त्री के काम और दर्जीगिरी सिखाई जानी चाहिए. उनका जो दर्जा है, उसके लिए यही काम सबसे उपयुक्त हैं.”

साथ ही तिलक ने रानाडे के गैर-ब्राह्मणों को उच्च शिक्षा के लिए बॉम्बे विश्वविद्यालय में भेजने के प्रयासों का भी विरोध किया. जिसके चलते गैर-ब्राह्मणों ने तिलक के इन विचारों का कडा़ विरोध किया.

जाति व्यवस्था का समर्थक

आगे चलकर तिलक जाति-व्यवस्था के बचाव में भी खुलकर बोलने लगा. तिलक के अनुसार जाति व्यवस्था ही राष्ट्र के निर्माण का आधार थी. तिलक ने 22 मार्च 1891 को लिखा,

“हमारे लिए आधुनिक पढ़े-लिखे ब्राह्मण और नए जमाने के पढ़े-लिखे गैर-ब्राह्मणों के बीच अंतर करना मुश्किल होगा. इस असमानता को महसूस करने का वक्त आ गया है.”

वहीं प्रोफेसर परिमाला वी.राव के रिसर्च पेपर के अनुसार 10 मई, 1891 को तिलक ने अखबार के संपादकिय में लिखा

“एक हिंदू राष्ट्र यह मानता है कि अगर इस पर जाति का प्रभाव नहीं होता तो यह कब का मिट चुका होता. रानाडे जैसे सुधारवादी लोग जाति की हत्या कर रहे हैं और इस तरह वे राष्ट्र की प्राण शक्ति को भी खत्म कर रहे हैं.”

10 मई,1891 के मराठा अखबार में तिलक के विचार

 साथ ही तिलक ने ब्रिटिश सरकार में जाति व्यवस्था के कमजोर होने पर भी नाराजगी जताई.

महिला शिक्षा विरोधी 

महिलाओं की उच्च शिक्षा और अंग्रेजी शिक्षा पर तिलक ने 26 सितंबर 1884 को लिखा,

“अंग्रेज़ी शिक्षा महिलाओं को स्त्रीत्व से वंचित करती है, अंग्रेजी शिक्षा हासिल करने के बाद वे एक सुखी सांसारिक जीवन नहीं जी सकती. महिलाओं को सिर्फ देसी भाषाओं, नैतिक शिक्षा और सिलाई-कढ़ाई की शिक्षा दी जानी चाहिए. लड़कियों को केवल तीन घंटे पढ़ाया जाना चाहिए ताकि उन्हें घर का काम करने और सीखने का वक्त मिल सके.”

26 सितंबर,1884 को मराठा अखबार में तिलक

मॉनसून सत्र के साथ जंतर-मंतर पर लगी ‘किसान संसद’, कृषि कानूनों पर हुई चर्चा!

संसद के मॉनसून सत्र के साथ किसानों ने भी जंतर-मंतर पर अपनी ‘किसान संसद’ लगाई. संयुक्त किसान मोर्चे के कार्यक्रम के तहत किसान जंतर-मंतर पर ‘किसान ससंद’ लगाने के लिए पहुंचे. धरना प्रदर्शन के कार्यक्रम के तहत 200 किसान बसों में सवार होकर सिंघू बॉर्डर से जंतर-मंतर पर पहुंचे. किसानों के प्रदर्शन को देखते हुए सिंघु बॉर्डर से लेकर जंतर-मंतर तक भारी सुरक्षा बल की तैनाती की गई थी.

संसद भवन के पास स्थित जंतर-मंतर पर किसानों ने कुर्सियां लगाकर संसद लगाई जिसमें किसान नेता राकेश टिकैट, सुरेश कोथ, युद्धवीर सिंह शामिल हुए. किसान संसद के पहले दिन पीएमसी एक्ट पर चर्चा की गई. इसी तरह कल 200 किसानों का दूसरा जत्था जंतर-मंतर पर जाएगा और अन्य कृषि कानूनों पर चर्चा की जाएगी.

गांव-सवेरा से बात करते हुए किसान नेता सुरेश कोथ ने कहा, “हमारा आज का मकसद संसद के सामने धरना-प्रदर्शन करने का था, लेकिन यह देश का दुर्भाग्य है कि इस देश का किसान आपनी आवाज उठाने के लिए पुलिस के पहरे में बोल रहा है. किसानों के चारों ओर पुलिस की तैनाती कर दी गई. कार्यक्रम के शुरुआत में मीडिया को भी किसानों के पास नहीं आने दिया गया. लोकसभा में सांसद किसानों के हक में अपना काम नहीं कर रहे हैं अगर सांसद ठीक से अपना काम करते तो आज किसानों को पुलिस के पहरे में न रहना होता. किसान संसद के जरिए किसानों की बात देश के लोगों तक जाएगी.”

वहीं किसान नेता युद्धवीर सिंह ने कहा, “संसद के नाम से सभी कार्यक्रम जंतर-मंतर पर ही होते रहे हैं. किसानों ने आज यहां बैठकर कृषि कानूनों पर चर्चा की. सभी लोगों ने अपने-अपने विचार रखे. वोटर व्हिप के जरिए हमने राजनीतिक पार्टियों के चेताया है कि उनको किसानों के मुद्दे पर साथ आना चाहिए.

किसान हर रोज इसी तरह 200 किसानों के जत्थे के साथ जंतर-मंतर पर जाएंगे और किसान-संसद लगाएंगे. किसानों को 9 अगस्त तक जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन करने की अनुमति है. किसान संसद 9 अगस्त तक सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक चलेगी.

विमुक्त घुमंतू जनजातियों को ‘जातीय गिरोह’ लिखने के पीछे मीडिया की मानसिकता!

विमुक्त घुमंतू जनजाति से आने वाली बावरिया और सांसी जाति के साथ गिरोह लिखने की मानसिकता को समझने के लिए हमने कईं राष्ट्रीय समाचार पत्रों और टीवी चैनलों की कवरेज को देखा. बावरिया और सांसी जाति के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित अखबारों और टीवी चैनलों की खबरों की हेडलाइन्स में आए दिन इन जातियों के नाम पढ़ने को मिलते हैं. डिनोटिफाइड ट्राइब्स (डीएनटी) से आने वाली सांसी और बावरिया जाति की इस साल की मीडिया कवरेज कुछ इस तरह की रही.  

17 जुलाई, 2021 को दैनिक जागरण ने हेडलाइन दी, ‘सांसी गिरोह का सरगना रोहतक से काबू’. 18 जुलाई को राजस्थान पत्रिका की आशिता गुप्ता ने खबर की हेडलाइन लगाई, ‘रेल यात्री सावधान! कहीं आपके कोच में सांसी गिरोह तो नहीं, थोड़ी चूक हुई और सामान पार’. 29 जून 2021 को अमर उजाला के पत्रकार जितेंद्र जोशी खबर की हेडलाइन देते हुए लिखते हैं, ‘सांसी गिरोह के तीन सदस्य गिरफ्तार’.       

इसी तरह बावरिया जाति को लेकर भी मीडिया का नजरिया कुछ ऐसा ही रहा. ‘आज तक’ नाम के एक राष्ट्रीय हिंदी न्यूज चैनल ने आपराधिक गैंग से संबधित कार्यक्रम किया. कार्यक्रम में आपराधी गैंग की जाति का नाम लिखा गया. चैनल ने ‘बावरिया गैंग की अनकही कहानी’ नाम से कार्यक्रम चलाया. इसी तहर एक और राष्ट्रीय न्यूज चैनल ‘न्यूज 24’ ने ‘गैंग्स ऑफ बावरिया’ नाम से कार्यक्रम किया. 27 जून, 2021 को राष्ट्रीय समाचार पत्र अमर उजाला ने लिखा ‘बागपत पुलिस ने बावरिया गिरोह का बदमाश पकड़ा’. पत्रिका ने 18 जुलाई, 2021 को लिखा, ‘बावरिया गरोह की तीन चैन स्नेचिंग करने वाली महिलाएं गिरफ्तार’. आज तक द्वारा चलाए गए इस कार्यक्रम पर जब क्राइम रिपोर्टर शम्स ताहिर खान को फोन किया गया तो उन्होने कोई जबाव नहीं दिया.

आज तक और न्यूज 24 द्वारा किए गए कार्यक्रम

इस तरह सामाजिक भेदभाव के साथ-साथ सरकार और मीडिया ने भी हाशिए के समाज की अनदेखी की है. मीडिया द्वारा विमुक्त घुमंतू जनजाति के संबंध में जो भी कवरेज की है उसका अध्ययन करें तो पाएंगे कि मीडिया में काम करने वाले अधिकतर पत्रकारों के पास इन जनजातियों से जुड़ें विषयों की समझ का अभाव है. विमुक्त जनजातियों को कवर करते हुए मीडिया की ओर से जो संवेदनशीलता अपनाई जानी चाहिए वह दिखाई नहीं देती है. राष्ट्रीय समाचार पत्रों और टेलीविजन चैनलों में इन जनजातियों की मीडिया कवरेज देखकर लगता है जैसे इनके प्रति समाज के दूसरे लोगों में विद्वेष पैदा करने और इन जातियों का सामाजिक बहिष्कार करने के लिए खबर चलाईं जाती हैं.

ऐतिहासिक पहलू

विमुक्त घुमंतू जनजातियों के अपराधीकरण की शुरूआत 1871 से हुई. अंग्रेजों के खिलाफ 1857 के विद्रोह में गोरिल्ला युद्ध की कला के साथ घुमंतू जनजातियों ने भी बड़ी भूमिका निभाई. इन जनजातियों से परेशान होकर अंग्रेजी सरकार ने 1871 में इऩपर क्रीमिनल ट्राइब एक्ट लगा दिया. क्रीमिनल ट्राइब एक्ट लागू होने के बाद स्थानीय प्रशासन की ताकत बढ़ा दी गई और स्थानिय प्रशासन ने इन जनजातियों पर दबिश डालकर पेरशान करना शुरू कर दिया. अंग्रेजों के हथियारों की लूट-पाट करने के कारण अंग्रेजी सरकार ने इन जनजातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया. तब से लेकर आज तक इन जनजातियों पर चोरी-डकैती करने का ठप्पा लगा हुआ है. यही वजह है कि आज भी इस समाज की पीढ़ियां आदतन अपराधी होने का दंश झेल रही हैं. 

31 अगस्त 1952 को इन जानजातियों को डिनोटीफाई तो कर दिया लेकिन साथ ही आदतन अपराधी एक्ट भी लगा दिया गया. जिसके चलते किसा आपराधिक घटना में शामिल न होते हुए भी इन लोगों को पुलिस के दमन का सामना करना पड़ा.

जिस तरह मीडिया इन जनजातियों का पक्ष जानने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता है, ऐसे ही इन लोगों पर होने वाली ज्यादतियों के खिलाफ राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर आवाज उठाने वाले लोग न के बराबर हैं. समाज में पहले से गढ़ी गई छवि के चलते पुलिस द्वारा इन लोगों को निशाना बनाना आसान होता है. इन लोगों के आस-पास हुई किसी भी आपराधिक घटना के आरोप में पुलिस सबसे पहले सांसी और बावरिया जाति के लोगों को निशाना बनाती है. यही वजह है कि ये दोनों जातियां पुलिस के सबसे सॉफ्ट टारगेट हैं. किसी आपराधिक घटना में शामिल असली अपराधियों को बचाने के लिए भी इन जनजातियों के लोगों को निशाना बनाया जाता है.  

हरियाणवी म्यूजिक इंडस्ट्री में काम करने वाले गायक और लेखक बिंटू पाबड़ा भी सांसी से समुदाय आते हैं. ‘हरयाणवी हैं दबया नहीं करदे’ से लेकर ‘सलाम’ और ‘तेरे शहर की गली’ जैसे हिट गाने देने वाले बिंटू पाबड़ा ने भी मीडिया की इस मानसिकता पर आपत्ति जताई है. इस विषय पर गांव-सवेरा से बात करते हुए बिंटू पाबड़ा ने कहा,

“अपराधी किस्म के लोग हर जाति और समाज में होते हैं लेकिन कभी उन अपराधियों की जाति नहीं लिखी जाती है. वहीं जब बावरिया और सांसी जाति के लोगों पर किसी अपराध में लिप्त होने के आरोप लगते हैं तो अखबारों में जाति का नाम लिखकर पूरी जाति को निशाना बनाया जाता है. मेरा मानना है जो अपराधी हैं उनको सजा दी जानी चाहिए लेकिन उसके लिए पूरी जाति को निशाना बनाकर इस तरह खबर छापना बहुत गलत है. इसके चलते समाज हम जैसे लोगों को भी गलत नजरिए से देखते हैं.”

इसी समाज से आने वाले और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी में काम करने वाले इंजीनियर ने बताया “यह सीधे तौर पर विमुक्त जनजातियों को निशाना बनाए जाने का मामला है. जब अखबार और टीवी जैसे माध्यम ऐसा करते हैं तो समाज के दूसरे लोग भी इन जनजातियों को उसी नजरिए से देखने लगते हैं जिसके चलते इन लोगों को समाज में शर्मिंदा होना पड़ता है. मीडिया द्वारा गढ़ी गई इस छवि के कारण हमारे लोगों को बाहर संस्थानों में नौकरी करने तक में दिक्कत आती है.  

डीएनटी समाज से आने वाले फिल्म डायरेक्टर दक्षिण छारा ने भी मीडिया के इस रवैये पर आपत्ति जताई है. उन्होंने कहा,

“गुजरात में भी छारा जाति को लेकर मीडिया ने इसी तरह की छवि बनाने की कोशिश की है, जिसको लेकर हमने कईं बार समाचार पत्रों के संपादकों से मिलकर इस विषय पर आपत्ति दर्ज करवाई लेकिन मीडिया के नजरिए में कोई ज्यादा बदलाव नहीं दिखा.” उन्होंने कहा जब कोई शाह या बनिया समाज से कोई व्यक्ति किसी अपराध में पकड़ा जाता है तो कोई अखबार उनकी जाति का नाम नहीं लिखताहै. लेकिन जब छारा,सांसी या बावरिया जाति से जुड़ा व्यक्ति किसी केस में आरोपी बनता है तो ये लोग उस अपराधी विशेष का नाम न लिखकर पूरी जाति का नाम छापते हैं. दक्षिण छारा ने कहा सरकार द्वारा डीएनटी जनजातियों को भी एससी\एसटी एक्ट की तरह कानूनी संरक्षण दिया जाना चाहिए.”

महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, रोहतक में समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर देशराज से इस विषय पर बात कि तो उन्होंने ने कहा, “विमुक्त-घूमंतु जनजातियों से आने वाली सांसी और बावरिया दो ऐसी जातियां हैं जिनपर अंग्रेजी हुकूमत के दौर से ही अपराधी होने का ठप्पा लगाया गया है, हो सकता है कुछ सामाजिक और आर्थिक कारणों से इन जातियों के कुछ लोग इस तरह की आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहे हो लेकिन इसके लिए पूरी जाति को निशाना बनाना गलत है. इस तरह की आपराधिक छवि गढ़े जाने से इस सामज की नई पीढ़ी के बच्चों पर गलत असर पड़ता है और वो खुलकर अपनी बात रखने और सामाज के अन्य क्षेत्रों में घुलने-मिलने से हिचकिचाते हैं. इस तरह कि स्थिति किसी भी समाज के विकास में अवरोधक बनती है, यही इन दो जातियों के साथ हुआ है. आज अगर हम इन जातियों के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक पहलुओं को देखते हैं तो हम पाते हैं कि ये लोग समाज और विकास की मुख्यधारा से अभी भी कोसों दूर हैं. इसकी असल वजह है इन जातियों पर आपराधी होने का ठप्पा लगाना और मीडिया द्वारा इसको प्रचारित करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है. भारतीय मीडिया को अपनी खबर की हेडलाइन में इस तरह से किसी जाति विशेष का नाम लिखने से बचना चाहिए.     

वहीं युवा सामाजिक कार्यकर्ता अंकुश सांसी ने कहा, “हम लोग किसी भी अपराधी के साथ जाति का नाम लिखे जाने के खिलाफ काफी समय से आवाज उठा रहे हैं. अपराधी, अपराधी होता है उसको उसकी जाति के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए. इस मामले पर हम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम उपायुक्त को ज्ञापन देंगे और इस तरह की खबरों में जाति का नाम लिखने वाले समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई करने बाबत विचार कर रहें हैं.”

इस मामले पर विमुक्त-घुमंतु विकास बोर्ड के चैयरमेन डॉ बलवान ने कहा कि इस मसले पर हम डीएनटी विकास एवं कल्याण बोर्ड के चैयरमेन भीखूराम इदाते से मिले हैं. हमने उनके सामने अपनी मांग रखी है कि इन जातियों के साथ गिरोह लिखने वालों के खिलाफ एसएसटी एक्ट के तहत कार्रवाई होनी चाहिए और साथ ही पुलिस द्वारा इन लोगों को झूठे मुकदमों में फसाने पर पुलिस पर भी कार्रवाई होनी चाहिए.

हरियाणा में महिला आयोग के पास लव जिहाद की एक भी शिकायत नहीं, फिर भी कानून बनाने में जुटी सरकार!

हरियाणा सरकार कथित लव जेहाद को गम्भीर समस्या के तौर पर प्रचारित कर इसको रोकने के लिए सख्त कानून बनाने में जुटी है. लेकिन एक आरटीआई में खुलासा हुआ है कि राज्य महिला आयोग के सामने लव जिहाद का कोई मामला नहीं आया है.

आरटीआई एक्टिविस्ट पीपी कपूर द्वारा 13 नवम्बर 2020 को लगाई गई आरटीआई का जवाब देते हुए हरियाणा राज्य महिला आयोग के जन सूचना अधिकारी ने यह जानकारी दी है कि राज्य महिला आयोग को पूरे राज्य से लव जिहाद से जुड़ी आज तक एक भी शिकायत नहीं मिली है. इसके अलावा हरियाणा राज्य महिला आयोग ने इस मुद्दे पर अब तक न तो कोई मीटिंग की, न ही सरकार को कोई सिफारिश भेजी गई है और न ही कोई रिपोर्ट तैयार की गई है.  

आरटीआई में पूछे गए सात सवाल. सवाल संख्या 2 और 3 का जवाब नहीं दिया गया.

  1. पूरे हरियाणा से जिलावार लव जेहाद के मामलों की आपको प्राप्त सभी शिकायतों की सूचना(संख्या की सूचना).
  2. उपरोक्त सभी शिकायतों व इन बारे दर्ज FIR के स्टेस्ट रिपोर्ट की सत्यापित प्रति सूचना.
  3. लव जिहाद की परिभाषा की सूचना.
  4. लव जिहाद की रोकथाम बारे राज्य महिला आयोग हरियाणा द्वारा की गई कार्रवाई की रिपोर्ट.
  5. मीटिंगों में इस मुद्दे पर हुई प्रोसिंडिंग की सत्यापिक प्रति.
  6. लव जिहाद की समस्या बारे सरकार को भेजी गई सिफारिश और रिपोर्ट की कॉपी .
  7. लव जिहाद पर की गई अध्ययन रिपोर्ट की कॉपी.

आरटीआई में सात सवाल किए गए थे. जिनमें से पांच सवालों के जवाब दिए गए हैं. राज्य महिला आयोग ने दो सवालों से जुड़ी जानकारी नहीं होने का हवाला दिया. सबसे दिलचस्प है कि आरटीआई में लव जिहाद को परिभाषित किए जाने के सवाल पर राज्य महिला आयोग ने लिखा कि आयोग के पास इस तरह का कोई रिकॉर्ड नहीं है यानी राज्य महिला आयोग के पास लव जिहाद की परिभाषा तक नहीं है.

बीजेपी शासित राज्यों उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और कर्नाटक में लव जिहाद को लेकर कानून बनाए गए हैं इसी तर्ज पर हरियाणा सरकार भी कानून बनाने की तैयारी में है.         

आरटीआई एक्टिविस्ट पीपी कपूर ने बताया, “इस आरटीआई खुलासे से स्पष्ट हो गया है कि कथित लव जेहाद कोई समस्या नहीं ,बल्कि समाज में नफरत फैलाने का बीजेपी व आरएसएस का राजनैतिक एजेंडा है.”

एक्टिविस्ट पीपी कपूर ने बताया, “उन्होंने इसी मुद्दे पर मुस्लिम आबादी वाले जिला नूंह, फरीदाबाद, पानीपत, यमुनानगर, अम्बाला, गुरुग्राम, रेवाड़ी, हिसार के जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालयों में भी आरटीआई लगाई थी. पुलिस से प्राप्त सूचनाओं मुताबिक पिछले तीन वर्षों में कथित लव जेहाद के मात्र चार केस दर्ज हुए. इनमें से जाँच के दौरान दो केस झूठे पाए जाने पर रद्द कर दिये गए. एक केस में सबूतों के अभाव में आरोपी अदालत से बरी हो गया. जबकिं एक केस अदालत में लंबित है.” 

हरियाणा: सरकारी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए न शिक्षक, न किताबें!

अमर उजाला में छपी पत्रकार यशपाल शर्मा की रिपोर्ट के अनुसार स्कूल शिक्षा विभाग पहली से आठवीं के बच्चों को निशुल्क किताबें मुहैया कराने के लिए दिसंबर में टेंडर कर देता है. इस बार अधिकारियोंं की लापरवाही के कारण दिसंबर तो दूर मार्च-अप्रैल तक भी टेंडर नहीं हुआ. और मई में विभाग ने बच्चों को किताबें मुहैया कराने से हाथ खड़े कर दिए.

हरियाणा में सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत चिंताजनक है. हरियाणा के सरकारी स्कूलों में 20 हजार से अधिक शिक्षकों की कमी है. कक्षा पहली से लेकर आठवीं तक के बच्चों को इस सत्र के लिए किताबें ही नहीं मिल पाई हैं. 

खट्टर सरकार का स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक और किताबें मुहैया कराने का दावा झूठा साबित होता दिख रहा है.  इस सत्र में सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या में 1.60 लाख की बढ़ोतरी हुई है. लेकिन सरकार की ओर से शिक्षकों की नई भर्ती करने की कोई प्रक्रिया नहीं शुरू की गई है.

नवंबर 2020 के आंकड़ों के अनुसार हरियाणा में 20 हजार से ज्यादा पद खाली हैं. स्कूलों में अप्रैल से सत्र शुरू हो चुका है. 500 प्राथमिक स्कूलों में बच्चों की संख्या के अनुसार शिक्षकों की कमी है वहीं 70 से ज्यादा प्राथमिक स्कूल शिक्षक विहीन हैं.              

किताबों के टेंडर में छह महीने की देरी  

स्कूल शिक्षा विभाग पहली से आठवीं के बच्चों को फ्री पुस्तकें देने के लिए दिसंबर में टेंडर कर देता है. लेकिन  इस बार छह महीने बीत जाने के बाद भी टेंडर नहीं हुआ. जिसके चलते मई में विभाग ने बच्चों को किताबें देने से मना कर दिया. बच्चों को 200 से 300 रुपये किताबें खरीदने के लिए देने की घोषणा की गई लेकिन बहुत से बच्चों के खातों में यह राशि भी नहीं पहुंची. 

रिपोर्ट के अनुसार शिक्षाविद् सीएन भारती और कुछ बच्चों के अभिभावकों ने बताया कि शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने के बाद पहली से आठवीं कक्षा तक की सरकारी स्कूलों की किताबें बाजार में उपलब्ध नहीं हैं. हरियाणा सरकार के शिक्षा विभाग की लापरवाही का खामियाजा सरकारी स्कूल के बच्चों और अभिभावकों भुगतना पड़ रहा है. कुछ बच्चों ने तो किताबें पुराने विद्यार्थियों से जुटा लीं, लेकिन अन्य को प्रकाशकों से संपर्क कर छपवानी पड़ रही हैं, जिनकी कीमत पांच सौ से सात सौ रुपये पड़ रही है.  

हरियाणा के स्कूलों में शिक्षकों की कमी

अमर उजाला में छपी रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2020 के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में पक्के जेबीटी 6,217, मुख्य शिक्षक 842, टीजीटी 10,225, मौलिक मुख्याध्यापक 2,365, लेक्चरर 12,960, मुख्याध्यापक 676, प्रिंसिपल 991 कम हैं. यह कुल संख्या 34276 बनती है. कार्यरत 5000 गेस्ट जेबीटी, 6000 टीजीटी, 2000 गेस्ट पीजीटी व 800 तदर्थ शिक्षकों के पदों को भी भरा हुआ मान लिया जाए तब भी 20476 पद खाली रह जाते हैं. 

शिक्षा मंत्री कंवर पाल का पक्ष शिक्षा मंत्री कंवर पाल का कहना है कि शिक्षकों के पदों को भरने के लिए कर्मचारी चयन आयोग के जरिए भर्ती प्रक्रिया जारी है. जेबीटी लगभग पूरे हैं. अन्य श्रेणी के शिक्षकों की कमी जल्दी दूर हो जाएगी. पहली से आठवीं तक के बच्चों के लिए तीस फीसदी किताबें बाजार में उपलब्ध थीं. अन्य को पुराने छात्रों व प्रकाशकों से दिलाने का प्रयास जारी है.