किसान आंदोलन और हिन्दी अखबारों का रवैया

किसानों द्वारा आंदोलन के चौथे दिन 29 नवम्बर को केन्द्र सरकार के सशर्त बातचीत के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिए जाने के बाद आंदोलन के लम्बा खींचने के आसार बन रहे हैं। किसान लगातार चौथे दिन भी सिंघू बॉर्डर पर डटे रहे और उन्होंने कहा है कि वे किसी भी स्थिति में आंदोलन से पीछे हटने वाले नहीं हैं। आंदोलन के चौथे दिन की स्थिति को अमर उजाला, हिन्दुस्तान, अृमत विचार व दैनिक जागरण ने किस तरह से अखबारों में जगह दी है? इसी का विश्लेषण आंदोलन के चौथे दिन के समाचारों का करने की कोशिश की है। अमर उजाला, अमृत विचार ने जहां दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन को चौथे दिन मुख्य खबर बनाया है, वहीं हिन्दुस्तान से इसे मुख्य खबर तो नहीं बनाया, लेकिन पहले पेज पर जगह अवश्य दी है। दैनिक जागरण ने आंदोलन की खबर को पहले पन्ने में तो जगह नहीं दी, लेकिन इस बारे में “मन की बात” के अन्तर्गत प्रधानमन्त्री के बयान को मुख्य खबर अवश्य बनाया है।

अमर उजाला (नैनीताल) चौथे दिन के आंदोलन की खबरों के लिहाज से बेहतरीन करता दिखाई दिया। उसने पहले पेज पर “किसान वार्ता को तैयार … शर्त नहीं मानेंगे, पांच तरफ से दिल्ली की घेराबंदी करेंगे” शीर्षक से प्रमुख खबर प्रकाशित की है। पांच कॉलम में प्रकाशित खबर में उसने लिखा है कि किसान लम्बे प्रदर्शन की तैयारी में हैं और उन्होंने बुराड़ी मैदान में एकत्र होने की केन्द्र सरकार की मांग को ठुकराते हुए उसे खुली जेल करार दिया है। साथ ही किसानों ने केन्द्र सरकार द्वारा बातचीत की पेशकश के लिए शर्तें रखे जाने को उनका अपमान करार दिया है। चार दिन से सिंघू व टिकरी बॉर्डर पर डटे किसानों ने कहा कि केन्द्र सरकार ने अगर बिना शर्त बातचीत नहीं की तो वे दिल्ली की पांच मुख्य सड़कों को जाम कर देंगे।

समाचार में कहा गया है कि 30 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि गृह मन्त्री अमित शाह ने जो बुराड़ी मैदान जाने के बाद बातचीत की जो शर्त रखी है वह उन्हें मंजूर नहीं है। भारतीय किसान यूनियन के हरियाणा प्रदेश अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि केन्द्र सरकार को बातचीत का माहौल बनाना चाहिए। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के नेताओं ने कहा कि अगर सरकार किसानों की मांगों के प्रति गम्भीर है तो उसे बात करनी चाहिए। भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहा) के अध्यक्ष जोगिन्दर सिंह ने कहा कि सरकार कृषि कानूनों को वापस ले इससे कम कुछ भी मंजूर नहीं। भाकियू (क्रान्तिकारी) के पंजाब अध्यक्ष सुरजीत सिंह फूल ने कि प्रतिनिधियों की समिति आगे का निर्णय करेगी। हम अपने मंच पर किसी भी राजनैतिक दल के नेता को जगह नहीं देंगे।

बॉक्स की खबर में कहा गया है कि हरियाणा की खाप पंचायतों ने किसान आंदोलन को समर्थन देने की घोषणा की है और कहा कि सोमवार 30 नवम्बर को किसान दिल्ली कूच करेंगे। एक अन्य बॉक्स में गृहमन्त्री अमित शाह का बयान प्रकाशित किया गया है कि उन्होंने कभी भी किसान आंदोलन को राजनीति से प्रेरित नहीं कहा। लोकतंत्र के तहत सभी को अपने मत रखने का अधिकार है। साथ ही उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधा कि वह राजनीति के तहत कृषि कानूनों का विरोध कर रहा है। लगातार तीसरे दिन अमर उजाला ने “अन्नदाता आक्रोश में” शीर्षक से एक पूरा पेज आंदोलन की खबरों को समर्पित किया है। जो अखबार के पेज नम्बर-6 में प्रकाशित है। इसी पेज की प्रमुख खबर में कहा गया है कि किसानों के तेवर देख दिल्ली में हाई अलर्ट घोषित किया गया है। एक खबर में हरियाणा के सांगवान खाप के प्रधान व दादरी के निर्दलीय विधायक सोमबीर सांगवान का बयान प्रकाशित किया गया है कि पहले मैं सांगवान खाप का प्रधान हूं। म्हारे लिए आपसी भाई चारा पहले है, राजनीति बाद में। हरियाणा की 30 खापों ने एकत्र होकर निर्णय किया है कि वे आंदोलन के समर्थन में दिल्ली कूच करेंगे।

इसी पेज पर करनाल से एक अन्य खबर में कहा गया है कि किसानों के दबाव में हरियाणा सरकार ने कैथल, अम्बाला और कुरुक्षेत्र जिलों की पंजाब से लगती सीमा पर लगाए गए नाकों को किसानों के दबाव में हटा लिया है। सोनीपत से भेजे गए एक समाचार में कहा गया है कि दिल्ली के सिंघू बार्डर से हरियाणा की ओर पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश व उत्तराखण्ड से आने वाले किसानों की संख्या लगातार बढ़ रही है। रविवार ( 29 नवम्बर ) की शाम तक यहां राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर 7 किलोमीटर तक 40,000 से अधिक किसान एकत्र हो चुके थे। इसी खबर में कहा गया कि किसानों के संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि किसान कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ ही पराली व बिजली से जुड़े विधेयकों को वापस लेने की मांग सरकार से बातचीत के दौरान करेंगे। अगर सरकार बिना बातचीत भी किसानों की मॉग मान लेती है तो वह लोग वापस लौट जायेंगे। एक अन्य खबर में प्रसिद्ध पहलवान योगेश्वर दत्त व उनके शिष्य बजरंग पूनिया व महिला पहलवान विनेश फोगाट के किसान आंदोलन के समर्थन में ट्वीट करने की बात कही गई है।

इसी पेज में अब तक भाजपा की नीतियों का समर्थन करती रही बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती का बयान भी प्रकाशित किया गया है। जिसमें उसने केन्द्र सरकार से कृषि कानूनों पर पुनर्विचार की अपील की है। उन्होंने अपने ट्वीट में कहा कि केन्द्र के नए कृषि कानूनों के खिलाफ पूरे देश के किसानों में आक्रोश व असहमति है। ऐसे में किसानों की सहमति के बिना बनाए गए इन कानूनों पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ पर हमला करते हुए कहा कि प्रदेश में विकास कार्य ठप हैं, किसान आंदोलन की राह पकड़े हुए हैं, अपराधियों के हौंसले बुलन्द है, पर मुख्यमन्त्री इन पर ध्यान देने की बजाय देशाटन पर निकले हैं। उन मन स्टार प्रचारक बनकर दूसरे राज्यों में घूमने का है। उन्हें अन्नदाता की कोई चिंता नहीं है।

चार दिन के किसान आंदोलन के बाद भी अमर उजाला ने इस पर अभी तक सम्पादकीय नहीं लिखा है। जिससे पता चलता है कि अखबार भले ही खबरों में सीधे केन्द्र सरकार का पक्ष भले ही न ले रहा हो, लेकिन आंदोलन को लेकर एक तटस्थ सम्पादकीय लिखने की “हिम्मत” वह चार दिन बाद भी नहीं जुटा पा रहा है। हां, सम्पादकीय पेज में उसने कृषि मामलों के विशेषज्ञ देविन्दर शर्मा का लेख “क्यों नाराज हैं अन्नदाता” अवश्य प्रकाशित किया है। शर्मा कृषि नीति को लेकर सरकारों पर अपने लेख, इंटरव्यू में हमेशा तीखे हमले व सवाल करते रहे हैं। अपने इस लेख में भी उन्होंने कृषि कानूनों को लेकर किसानों की चिंता को सही बताते हुए लिखते हैं कि किसानों का यह आंदोलन अनूठा और ऐतिहासिक है। पहली बार देखने में आ रहा है कि पंजाब के किसानों के नेतृत्व में चल रहा यह आंदोलन किसी राजनैतिक दल या धार्मिक संगठन से प्रेरित नहीं है, बल्कि किसानों ने राजनीति और धर्म, दोनों को ही इस आंदोलन का समर्थन करने को बाध्य कर दिया है। वह लिखते हैं कि इस आंदोलन ने राजनीति को एक नई दिशा दे दी है।

देविन्दर शर्मा अपने लेख में कहते हैं कि जिस अमेरिका और यूरोप की तर्ज पर नए कृषि कानून बनाए गए हैं, वहां खेती इस समय सबसे गहरे संकट में है। तो फिर उस विफल मॉडल को भारत में जबरन क्यों लादा जा रहा है ? आज भी अमेरिका के किसानों पर 425 अरब डालर का कर्ज है और वहां के 87 प्रतिशत किसान आज खेती छोड़ने को तैयार हैं। यूरोपीय देशों में भी भारी सब्सिडी मिलने के बावजूद किसान लगातार खेती छोड़ रहे हैं। देविन्दर शर्मा लिखते हैं कि आंदोलन कर रहे किसानों की मांग कृषि के तीन नए कानूनों को हटाने की है, लेकिन मेरा मानना है कि एक चौथा कानून लाया जाय, जिसमें यह अनिवार्य हो कि देश में कहीं भी किसानों की फसल एमएसपी से कम कीमत पर नहीं खरीदी जाएगी।

अमृत विचार (बरेली – कुमाऊँ संस्करण) ने लगातार चौथे दिन किसान आंदोलन को न केवल पहले पेज पर जगह दी है, बल्कि उसे “किसानों ने ठुकराया केन्द्र का प्रस्ताव, कहा – बुराड़ी मैदान नहीं, खुली जेल” शीर्षक के तहत मुख्य खबर भी बनाया है। इस खबर के एक बॉक्स में किसानों के हवाले से कहा है कि वे लोग बुराड़ी मैदान में पहुंच चुके किसानों को वहां से वापस बुलायेंगे। वे लोग दिल्ली को घेरने के लिए आए हैं, न कि दिल्ली में घिर जाने के लिए। किसान के इस बयान से लगता है कि वे बेहद सतर्क हैं और सरकार के किसी झांसे में फंसने वाले नहीं है। वे सरकार को कोई ऐसा मौका नहीं देना चाहते हैं, जिससे कि सरकार को उनके ऊपर दबाव डालने का मौका मिल सके और आंदोलन बिना किसी परिणति के खत्म हो जाय। अखबार ने “मन की बात” के तहत प्रधानमन्त्री मोदी के किसान आंदोलन के सन्दर्भ में नए कृषि कानूनों के समर्थन में कही गई बात को पहले पेज पर “कृषि कानूनों से किसानों को मिले अधिकार” शीर्षक के तहत जगह दी है।

अमृत विचार ने आंदोलन के चार दिन के अन्दर ही दूसरी बार सम्पादकीय “भड़कते किसान” लिखा है। अखबार लिखता है कि कोरोना काल में देशव्यापी लॉकडाउन के बीच जब कृषि अध्यादेश को संसद ने पास किया था तो तब से किसान इसका विरोध कर रहे हैं। कृषि कानूनों को लेकर पिछले माह से पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह अपने विधायकों के साथ राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द से मिलने का समय मांग रहे हैं, पर उन्हें समय नहीं दिया जा रहा है।सम्पादकीय में लिखा गया है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार के धुर विरोधी व्यक्ति को भी अपनी बात कहने, विरोध प्रदर्शन करने और सत्ता केन्द्रों के बाहर एकत्र होकर सामुहिक दबाव बनाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। यही अधिकार किसानों को भी है। इसी पेज में वरिष्ठ पत्रकार नवेद शिकोह का लेख “…. तुम तो नेतृत्व विहीन किसान हो” प्रकाशित किया गया है। जिसमें वे लिखते हैं कि शायद ही कोई आंदोलन ऐसा हो, जिस पर हिंसक होने के आरोप नहीं लगे हो। यहॉ तक कि देश की आजादी के लिए महात्मा गॉधी के “भारत छोड़ो आंदोलन” को भी अंग्रेजी हुकूमत ने हिंसा फैलाने वाला आंदोलन बताया था। लेख में आगे लिखा गया है कि किसान आंदोलन का कोई एक मजबूत नेता नहीं है। जो चिंताजनक है। बिना मजबूत नेतृत्व वाला कोई भी आंदोलन सरकार के लिए मुसीबत बनता है। उसमें संवादहीनता की सम्भावनाएँ अधिक होती हैं। इस दौर में महेन्द्र सिंह टिकैत जैसा मजबूत किसान नेता देश में कोई नहीं है। इसके अलावा किसान से सम्बंधित स्थानीय समाचारों को अखबार ने पेज नम्बर – 4 व 6 में महतवपूर्ण जगह दी है।

हिन्दुस्तान (हल्द्वानी) ने आंदोलन की खबर को पहले पेज पर दो कॉलम “किसान अड़े, अब रास्ते जाम करेंगे” शीर्षक के तहत जगह दी है। इसके अलावा पेज नम्बर -10 में “सड़कों पर किसान” के तहत लगभग पूरे पेज में आंदोलन की खबरें हैं। जिसमें बॉलीवुड के मशहूर गायक गुरु रंधावा, दिलजीत दोसांझ, अभिनेत्री-पायलट गुल पनाग और स्वरा भाष्कर के किसान आंदोलन के सम्बंध में ट्वीट किए जाने की खबर भी है। इस पेज में राहुल गॉधी का बयान कि कानून को सही बताने वाले क्या हल निकालेंगे? भी है। अखबार ने भाजपा के राष्ट्रीय महामन्त्री व उत्तराखण्ड के प्रभारी दुष्यन्त कुमार गौतम का बयान पेज नम्बर दो में “कांग्रेस की मानसिकता दंगा भड़काना: गौतम” प्रकाशित किया है। जिसमें वह देहरादून में गम्भीर आरोप लगाते हुए कह रहे हैं कि पंजाब के किसान आंदोलन को उग्रवादियों ने हाईजैक कर लिया है। बिना किसी ठोस तथ्यों के उन्होंने कह कि आंदोलन में खालिस्तान व पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाए जा रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महामन्त्री द्वारा इस तरह के गैर जिम्मेदार बयान से पता चलता है कि भाजपा नेताओं को उनकी सरकार के खिलाफ किसी भी तरह का लोकतांत्रिक आंदोलन पसन्द नहीं है। वे हर उस आंदोलन को जो उनकी सरकार के खिलाफ चलाया जाता है उसे देशद्रोही आंदोलन बताते में पूरी निर्लज्जता के साथ जुट जाते हैं।

दैनिक जागरण (हल्द्वानी) लगातार चौथे दिन भी सरकार का भौंपू बना नजर आया। किसानों को आंदोलन को राजनीति से प्रेरित व बेवजह का बताने वाले अखबार ने प्रधानमन्त्री मोदी के मन की बात के तहत नए कृषि कानूनों की हिमायत में कही गई बात को “कृषि सुधारों ने खोले नए रास्ते: मोदी” के तहत न केवल पहले पेज पर जगह दी है, बल्कि पांच कॉलम में पहली खबर बनाया है। आखिर, प्रधानमन्त्री ने अपने इस बयान में ऐसा क्या महत्वपूर्ण व नया कह दिया है कि अखबार को उसे मुख्य खबर बनानी पड़ी ? यह बात तो सरकार पिछले चार-पांच महीने से लगातार व हर रोज कह रही है, जब से नए कृषि कानूनों को जल्दबाजी में कोरोना की आड़ लेकर बिना किसी व्यापक बहस के संसद के संक्षिप्त मानसून सत्र में पारित करवा लिया था। अब बात हर रोज सरकार द्वारा कही जा रही हो, वह फिर से इतनी महत्वपूर्ण कैसे हो गई ?

अखबार के इस तरह के रुख से हर रोज यह साबित हो रहा है कि इसका प्रबंधन तंत्र किसान आंदोलन को गैरजरुरी बताने के लिए कुछ भी कर सकता है। इस तरह की खबरें लिखने के साथ ही वह सम्पादकीय में भी आंदोलन के खिलाफ कुतर्क की हद तक जाने को तैयार है। चार दिन में दूसरी बार लिखे सम्पादकीय “विरोध की जिद” में लिखा गया है कि जब केन्द्र सरकार नए कृषि कानूनों को बहुत ही कल्याणकारी व क्रान्तिकारी बता रही है तो किसानों को इसमें शक क्यों है ? अखबार सम्पादकीय में यह तक लिख रहा है कि जब अनेक कृषि विशेषज्ञ व अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि नए कानून किसानों के लिए नई सम्भावनाएं खोलने का काम करेंगे तो उन पर अविश्वास करने का कोई कारण नहीं है। यह अलग बात है कि अखबार उन कृषि विशेषज्ञों व अर्थशास्त्रियों की बात का कोई जिक्र नहीं करता, जो इन कानूनों को किसानों को कारपोरेट का बंधुवा मजदूर बनाने वाला बता रही है और कह रही है कि इससे छोटी जोत के किसान हमेशा के बर्बाद हो जायेंगे।
अखबार सम्पादकीय में यह तक कुतर्क कर रहा है कि किसान बताएं कि नया कानून लागू होने के बाद अभी तक उनको क्या नुकसान हुआ है? उसका कहना है कि जब किसान को नुकसान होगा और वह आर्थिक तौर पर बर्बाद हो जाएगा तब वह कानून की खामियों पर बात करे उससे पहले उस पर बात करना और आशंका जताना बिल्कुल गलत है। इस तरह की कुतर्क भरी बातों का सम्पादकीय लिखने में अखबार की सम्पादकीय टीम को पत्रकारिता के लिहाज से जरा भी शर्म नहीं है।

दिल्ली आंदोलन की खबर को अखबार ने 13 नम्बर पेज पर “केन्द्र ने फिर दिया बुराड़ी मैदान में आने का प्रस्ताव” शीर्षक 6 कॉलम की खबर प्रकाशित की है। जो पूरी तरह से किसान आंदोलन की खबर न होकर केन्द्र सरकार का पक्ष लेने वाली खबर है। इसी पेज में दो कॉलम में नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद का बयान “विरोध कर रहे किसानों ने नहीं समझा नए कानूनों को” प्रकाशित किया है। जिसमें वह कहते हैं कि किसानों ने बिना पढ़े व समझे ही कृषि कानूनों का विरोध प्रारम्भ किया है। वे एक बार उसे पढ़ लेंगे तो उन्हें पता चल जाएगा कि उनको भविष्य में कितना लाभ होने वाला है। रमेश चंद के इस बयान से इस बाद का पर्दाफाश होता है कि सरकार ने कानून बनाने से पहले किसान संगठनों व किसानों से न तो कोई बात की और न ही उन्हें विश्वास में लिया। और न किसानों ने सरकार से इस तरह के तथाकथित कृषि सुधार की बात कानून बनाकर करने को कहा था।


नीति आयोग के सदस्य का बयान इस बात को भी बेनकाब करता है कि संसद में कानून पारित हो जाने और किसान संगठनों द्वारा इसका विरोध किए जाने के बाद भी पिछले तीन – चार महीनों में सरकार की ओर से किसानों की आशंकाओं को दूर करने की कोई पहल नहीं की गई। उसने किसानों के विरोध को बहुत ही हल्के में लिया। मीडिया में बिना जनाधार वाले कागजी किसान संगठनों के माध्यम से कृषि कानूनों को किसान हित में बताने की चाल अब केन्द्र के गले की हड्डी बनता दिखाई दे रहा है। ■

( ● लेखक: जनसरोकारों व “युगवाणी” समाचार पत्रिका से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार हैं )

किसान आन्दोलन की कवरेज और हिन्दी अखबार

किसान आन्दोलन के दूसरे दिन के समाचारों की कवरेज में आज 28 नवम्बर को अमृत विचार, हिन्दुस्तान, अमर उजाला व दैनिक जागरण अखबारों की स्थिति मुख्य समाचार के लिहाज पहले दिन वाली ही रही। पर आन्दोलन की विस्तार से खबर देने के मामले में आज 28 नवम्बर के दिन अमर उजाला दूसरे अखबारों से बाजी मार ले गया। इन चार अखबारों में आज भी दैनिक जागरण का जनविरोधी चेहरा बहुत ही बेशर्मी के साथ सामने आया है।

अमृत विचार (बरेली – कुमाऊँ संस्करण) ने किसान आन्दोलन को दूसरे दिन भी “पुलिस से संघर्ष और पथराव के बाद किसानों को दिल्ली आने की अनुमति” शीर्षक से पहली खबर बनाया है। उसने आन्दोलन की खबर को आज पहले पेज पर सात कॉलम में जगह दी है। इसी मुख्य खबर में उसने मुरादाबाद में भारतीय किसान यूनियन द्वारा तीन घंटे राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम करने की खबर भी दी है। साथ ही हरियाणा के मुख्यमन्त्री मनोहर लाल खट्टर का बयान भी प्रकाशित किया है। जिसमें वे किसानों से केन्द्र सरकार से वार्ता करने की अपील करने के साथ ही यह भी कह रहे हैं कि केन्द्र सरकार किसानों के साथ हमेशा बातचीत करने को तैयार है।

खट्टर का यह बयान उन्हें ही कठघरे में खड़ा करता है। पहला यह कि वे किस बिना पर कह रहे हैं कि केन्द्र सरकार उनसे बातचीत को तैयार है? क्या वे केन्द्र सरकार के प्रतिनिधि हैं? एक राज्य के मुख्यमन्त्री केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी कैसे ले रहे हैं? क्या केन्द्र सरकार ने उन्हें किसानों से बातचीत करने के लिए अधिकृत किया है? साथ ही यह भी कि खट्टर किसानों से बातचीत करने की अपील ऐसे कर रहे हैं जैसे कि किसानों ने किसी भी तरह की बातचीत से इंकार किया हो। पिछले दो महीने से पंजाब व हरियाणा के किसान लगातार आन्दोलन कर रहे हैं। इस दौरान उनसे केन्द्र सरकार ने कब बातचीत के लिए आमन्त्रित किया? कब उसने कहा कि केन्द्र सरकार किसानों से बातचीत के लिए तैयार है? वह तो लगातार किसान आन्दोलन को विपक्ष द्वारा प्रायोजित बताने के साथ ही यह भी दावा करती रही है कि नए कृषि कानून से किसान खुश हैं।

अमृत विचार ने आज “किसान का आन्दोलन” शीर्षक से लिखे सम्पादकीय में सवाल उठाया है कि आखिर किसान सड़क पर उतरने और दिल्ली कूच को मजबर क्यों हुआ? सम्पादकीय में लिखा है,”आखिर किसानों को आन्दोलन के लिए मजूबर किसने किया? किसान को अपनी मांग या मजबूरी बताने के लिए सड़कों पर आना पड़े और दिल्ली कूच करने के लिए लाठीचार्ज का सामना करना पड़े। फिर वह कैसा अन्नदाता? किसानों पर किया गया बल प्रयोग गलत तो है ही। सवाल यह नहीं है कि किसान सही हैं या गलत? उनकी मॉग सही है कि गलत? सवाल यह है कि लोकतंत्र में हर नागरिक की तरह उन्हें भी शान्तिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने और विरोध का हक है।” अमृत विचार ने 11 नम्बर पेज पर भी “तीन कृषि कानूनों का विरोध, चार घंटे हाईवे जाम” शीर्षक से सात कॉलम की खबर रामपुर डेटलाइन से प्रकाशित की है।


   किसान आन्दोलन की विस्तार से खबर प्रकाशित करने के मामले में आज अमर उजाला ( नैनीताल ) ने भले ही बाजी मारी हो, पर मुख्य खबर के मामले में उसका नजरिया किसानों को “उग्र” बताने पर ही रहा। पहले पेज पर “प्रदेश के मैदानी जिलों में भी किसान उग्र, देहरादून-दिल्ली हाईवे दो घंटे रखा जाम” 5 कॉलम की खबर में उसने किसानों के मंगलौर गुड़ मण्डी के पास दो घंटे सड़क जाम रखने और प्रशासन को ज्ञापन सौंपने को “उग्र” करार दे दिया। खबर में कहीं भी किसानों के किसी भी तरह से उग्र होने का जिक्र नहीं है। खबर में यह लिखा है कि किसानों ने प्रधानमन्त्री मोदी और मुख्यमन्त्री त्रिवेन्द्र रावत के नाम ज्वाइंट मजिस्ट्रेट को ज्ञापन सौंपा उसके बाद दिल्ली कूच की घोषणा की। अब कुछ घंटे के लिए सड़क जाम करना और ज्ञापन देकर आगे को बढ़ जाना उग्र होना कैसे हो गया? यह अमर उजाला के सम्पादकों और उसके मालिकों के किसान विरोधी चेहरे को बेनकाब करता है। अब किसान आन्दोलन को वह जबरन “उग्र” क्यों साबित कर रहा है? और ऐसा लिखने के लिए उसके ऊपर किसका दबाव होगा यह समझा जा सकता है ?

दिल्ली के किसान आन्दोलन को उसने स्थानीय खबर के सामने कम महत्व दिया और पहले पेज पर ही इस खबर के साथ दिल्ली की खबर को “दिल्ली में झड़प के बाद प्रदर्शन की मिली इजाजत” शीर्षक से बॉक्स में प्रकाशित किया है । साथ ही केन्द्रीय कृषि मन्त्री नरेन्द्र सिंह तोमर का यह बयान भी प्रकाशित किया है कि वे किसानों का भ्रम दूर करने को तैयार है । कृषि मन्त्री के इस बयान से पता चलता है कि केन्द्र सरकार की मंशा किसानों की मॉग मानने की नहीं बल्कि उनका “भ्रम” दूर करके उन्हें नए कृषि कानूनों पर “सहमत”करने की है। पहले पेज में अपनी मुख्य खबर से किसान विरोधी चेहरा दिखाने वाले अमर उजाला ने पेज नम्बर 4 को “अन्नदाता आक्रोश में : कृषि कानूनों का विरोध” शीर्षक से पूरा पेज बनाकर सन्तुलन साधने की कोशिस की है। जिसमें वह कुछ हद तक सफल होता दिखाई दिया। दूसरे दिन भी किसान आन्दोलन पर सम्पादकीय लिखने की बजाय अखबार ने “ममता की बढ़ती मुश्किलें” शीर्षक से सम्पादकीय लिखा है। इससे भी यह बात साबित होती है कि अखबार किसान आन्दोलन को अभी महत्व देने को तैयार नहीं है।

आन्दोलन की खबरों के लिहाज से आज भी हिन्दुस्तान (हल्द्वानी) ने पहले पेज में “किसान इजाजत के बाद भी बॉर्डर पर डटे” शीर्षक से तीन कॉलम की पहली खबर प्रकाशित की है। “रामपुर बॉर्डर पर दूसरे दिन भी धरना” शीर्षक आन्दोलन की खबर को बॉक्स में प्रकाशित किया है। दिल्ली में किसान आन्दोलन की खबर को हिन्दुस्तान ने 10 नम्बर पेज पर भी 5 कॉलम में “आंसू गैस के गोले और पानी की बौछार से भी नहीं थमे कदम” शीर्षक से प्रकाशित कर आन्दोलन को महत्व दिया है। उसने पेज नम्बर 7 में तराई (ऊधमसिंह नगर) के किसान आन्दोलन पर भी 4 की कॉलम खबर “रुद्रपुर-बिलासपुर हाईवे पर 36 घंटों से जमा किसानों का डेरा” शीर्षक से प्रकाशित की है। इसी भर में लालकुआं में किसान महासभा द्वारा किसानों के समर्थन में तहसील परिसर में किए प्रदर्शन के समाचार को बॉक्स में प्रकाशित किया है।


   हिन्दुस्तान ने आन्दोलन पर आज भी सम्पादकीय नहीं लिखा है। पर सम्पादकीय पेज पर आमने-सामने में किसानों को राजधानी तक कौन लाया? के तहत आन्दोलन के समर्थन में वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता का लेख “काश! नाराज लोगों को पहले ही समझाया – मनाया जाता” और सरकार के पक्ष की वही पुरानी दलीलों पर आधारित व किसानों को कठघरे में खड़ा करता रानी लक्ष्मीबाई केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति अरविन्द कुमार का लेख “राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल हो रहे अन्नदाता” प्रकाशित किया है। अपने लेख में परंजॉय गुहा ठाकुरता लिखते हैं कि हमारे यहां किसानों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें होती हैं “जय जवान-जय किसान व भारत एक कृषि प्रधान देश है”, पर आज सबसे अधिक जोखिम खेती-किसानी में ही है। ऐसे जोखिम में जिन्दगी बिताने वाले किसानों की राह सरकार रोक रही है। हास्यास्पद है कि कोरोना के बहाने किसानों को रोकने की कोशिश हुई। बल प्रयोग व उपेक्षा से कतई समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए संवाद के रास्ते ही किसानों को आश्वस्त करना होगा।”

कुलपति अरविन्द कुमार ने केन्द्र सरकार द्वारा इस साल जारी किए गए समर्थन मूल्य की आड़ लेकर किसान आन्दोलन को गैरजरुरी बताने की कोशिस की है। पर वे किसानों द्वारा उठाए जा रहे सवालों का जवाब देने की बजाय केन्द्र सरकार की अब तक बोली जा रही भाषा में ही लिखते हए दावा करते हैं कि नए कृषि कानूनों के लागू हो जाने के बाद हम वैश्विक मनकों के हिसाब से फसल उगा पायेंगे। अपने लेख में कुलपति अरविन्द किसान आन्दोलन पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि जब किसानों को इतना लाभ हो रहा है तो वह आन्दोलन पर क्यों उतारु हैं? अब भी उन्हें शंका है तो उचित माध्यम से अपनी बात रखें। यह उचित माध्यम क्या है? वे नहीं बताते वह भी तब जब पिछले दो महीने से आन्दोलनरत किसानों से बात करने को केन्द्र ने कोई पहल नहीं की। वे यह भी लिखते हैं कि इस तरह दिल्ली कूच करने से उनकी समस्याओं को समाधान नहीं होगा। साथ ही यह भी लिखते हैं कि किसान आन्दोलन की आड़ में निहित स्वार्थों को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता है। ये हैं एक कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति के किसान आन्दोलन को लेकर विचार। इससे आसानी से समझा जा सकता है कि कैसे लोगों के हाथ में आज कृषि विश्वविद्यालय सौंप दिया गया है? जो किसानों और खेती-किसानी की पीड़ा व समस्या को समझने की बजाय केन्द्र के प्रवक्ता की तरह लेख लिख रहे हैं। यह भविष्य की ओर भी खतरनाक संकेत करता है कि आगे कौन और कैसे लोग खेती-किसानी का भविष्य तय करेंगे।

दैनिक जागरण (हल्द्वानी) का किसान व जनविरोधी चेहरा किसान आन्दोलन के दूसरे दिन की खबरों को लेकर फिर सामने आया। आज भी उसने दूसरे दिन के आन्दोलन की खबर को महत्वहीन बनाकर पेज नम्बर 15 में तीन कॉलम में “नहीं माने किसान, दिल्ली में बढ़ा तनाव” शीर्षक से प्रकाशित की है। खबर की शीर्षक से ही अखबार के सम्पादकों की मानसिकता का पता चलता है। और खबर का शीर्षक इस तरह से लिखा गया है जैसे कि किसान दिल्ली पर हमला करने जा रहे हों और उनके दिल्ली जाने से वहां के लोगों का जीवन संकट में पड़ने वाला है। खबर अपने तुच्छ शीर्षक से एक तरह से दिल्ली वालों से किसानों से दो-दो हाथ कर उनसे निपटने का आह्वान करती दिखती है।

इसी खबर के साथ अखबार ने आन्दोलन को एक तरह से देशद्रोहियों का आन्दोलन बताने का कुत्सित व शर्मनाक प्रयास किया है। बॉक्स में एक खबर “किसानों के जत्थे में लगे पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे” शीर्षक से अपुष्ट खबर को जानबूझकर किसान आन्दोलन को बदनाम करने के लिए छापा है। इस घृणित साजिश का पर्दाफाश इस बात से भी होता कि बाकी तीनों अखबारों में इस तरह की कोई खबर नहीं है। यह खबर लिखकर दैनिक जागरण के सम्पादकीय टीम ने फिर साबित किया है कि वे किस तरह की औछी व घटिया मानसिकता से भरे हुए हैं। जिनके लिए सत्ता के तलुए चाटना ही पत्रकारिता है।

  अखबार ने आज अपने सम्पादकीय “बेजा विरोध” में शुरू में ही लिखा है कि किसी को बरगलाने के कैसे नतीजे सामने आते हैं, इसका ताजा उदाहरण दिल्ली में बड़ी संख्या में पहुँचे किसानों का आगमन है। सम्पादकीय में नए कृषि कानूनों को एक तरह से अलादीन का चिराग घोषित किया गया है। सम्पादकीय में यह तक कहने की कोशिश की गई है कि अगर किसान नए कृषि कानूनों को नहीं मानता है तो इसका मतलब है कि वह दबा कुचला व आढ़तियों से शोषित-पीड़ित ही रहना चाहता है, इसके लिए उसे किसी और को अब दोष नहीं देना चाहिए। देश के सबसे बड़े अखबार का इससे घटिया सम्पादकीय और क्या हो सकता है? जो न्यूज चैनल आन्दोलन के पीछे खालिस्तान की साजिश देख रहे थे, वही काम प्रिंट मीडिया में दैनिक जागरण भी कर रहा है। जो शर्मनाक व चिंताजनक स्थिति को बयॉ करता है। ■

किसान लामबंदी (1920 – 2020)

“ एक वह हैं जो अपनी ही सूरत को लेते हैं बिगाड़,

एक वह है जिसे तस्वीर बनानी आती है ”

आज देश में जगह जगह किसान सरकार की नीतियों से नाराज होकर सड़कों पर रोषप्रकट कर रहें हैं. किसान की उपज की लूट चल रही है, किसान कर्ज में डूबते जा रहें हैं, जिस कारण किसान की ख़ुदकुशी के केस बढ़ते जा रहें हैं, सरकार किसान हितैषी होने का दम भरती है और लीपापोती के लिए ऐसे ऐसे कानून बनाती है कि उनसे आखिर में बाजार को ही मुनाफा होता दिखता है. आज देश में अनेकों किसान संगठन हैं बावजूद इसके इन समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं हो पा रहा है ! इस लेख में 1920 से लेकर अबतक यानि 2020 तक के हालातों पर चर्चा करेंगे कि कैसे किसान पहले लामबंद थे, कैसे देश की राजनीति किसान के इर्दगिर्द घुमती थी, और क्यों अब किसान की लामबंदी पर ही सवालिया चिन्ह लग गया ?

आज़ादी पूर्व संयुक्त पंजाब में साहूकारों का पूरा आतंक था. देश में जितने साहूकार थे उसका एक चौथाई पंजाब में थे. किसानों की कमाई इन साहूकारों के चक्रव्रधि ब्याज चुकाने में चली जाती. कर्ज न चूका पाने की स्थिति में साहूकार किसान की ज़मीन, बैल आदि सब कुर्क करवा देते थे. पंजाब में आर्थिक तौर पर भेदभाव की बहुत गहरी खाई बन चुकी थी. शत प्रतिशत किसान कर्जे में डूब चूका था. ज़मींदार (किसान) के हालात ये थे कि रिश्तेदारी में भी जाने के लिए एक दुसरे के कपडे मांग कर जाना पड़ता था. सरकारी अफसरों के दौरे के समय उनका सामान ढोने के लिये ज़मींदारों की गाड़ियाँ बेगार में और घी-दूध मुफ्त में लिये जाते थे. बड़े अफसर तो छोडिये छोटे छोटे मुलाजिम भी उनसे ढंग से पेश नहीं आते थे. कहावतें तक बन गई थी कि ‘हाकिम के पीटे का और कीचड़ में फिसलने का कोई डर शर्म नहींया फिर ‘अफसर की अगाड़ी और घोड़े की पिछाड़ी से बचना चाहिए. उस समय ज़मींदार (किसान) की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक दशा क्या थी इसका अनुमान हम सर छोटूराम के रोहतक में वकील के तौर पर शुरुआती जीवन की घटना से लगा सकते हैं. सर छोटूराम ने सितम्बर,1912 में रोहतक में वकालत शुरू की थी. उस दिनों वकील लोग अपने को हाकिमों जैसा ही समझते थे. वकीलों व् हाकिमों में एक नेक्सस सा बन गया था. वकीलों का दिमाग भी ऐसा बन गया था कि वे शेष जनता से और खास तौर से देहातियों से अपने को ऊँचा समझते थे. उन्हें बैठने के लिए कुर्सी मुढे न देते थे. सर छोटूराम जो एक साधारण ज़मींदार परिवार से थे इसलिए वह इस सबसे अंजान नहीं थे. जब उन्होंने वकालत शुरू की तो वह अपने देहाती मुवकिल को अपने बराबर मुढे कुर्सी पर बैठाते उनके साथ हुक्का गुडगुडाते. इससे कोर्ट में अन्य वकीलों में बेचैनी पैदा हो गई कि ये तो जाहिल देहातियों का दिमाग ख़राब कर रहा है. वकीलों ने उनसे इस बारे में बात की तो उनका जवाब था, ‘मुझे ताज्जुब है कि मजदुर मालिक से अपने आपको ऊँचा मानता है? मुवकिल की अशिक्षा और भोलेपन से आप लोग नाजायज लाभ उठाते हैं. जिससे हम मुंह मांगी मजदूरी लेते हैं उसके साथ अच्छा व्यवहार भी न करें और उसे अनादर का पात्र समझें, क्या यह अन्याय और असमर्थ नहीं है? इस वाक्या के बाद चौधरी छोटूराम की देहातियों में और ज्यादा पैठ बननी शुरू हो गई. चौधरी छोटूराम ने देहातियों में चेतना के लिए 1916 में जाट गजट नाम से साप्ताहिक अख़बार निकालना शुरू किया और किसानों में जाग्रति और उनकी लामबंदी के लिए ज़मीन्दरा लीग (सभा) की स्थापना की. इसी वर्ष में वे गाँधी जी के आज़ादी आन्दोलन से जुड़ गए और कांग्रेस के रोहतक जिले के प्रथम प्रधान बने. पर यह सफ़र लम्बा न चल सका. 1920 में कलकत्ता में असहयोग आन्दोलन प्रस्ताव पारित किया गया. इसमें छात्रों को स्कुल छोड़ देने, काश्तकारों को लगान न देने, मुलाजिमों से सरकारी नौकरियों से इस्तीफा देने के लिए कहा गया था. चौधरी छोटूराम की सोच व् राजनीति पूरी तरह व्यावहारिक एवं किसान हितों तक सीमित थी. इसलिए उन्हें इस प्रस्ताव से आपत्ति थी. आपत्ति का मुख्य कारण ‘किसान लगान देना बंद कर दे’ था. और उस समय पंजाब में राजस्व कानून के मुताबिक लगान का कोई भी अंश रोकने पर सारी ज़मीन जब्त होती थी. चौधरी छोटूराम ने इसमें ज़मींदार का सर्वनाश देखा और उन्हें ऐसा भी लगा कि किसान की जब्त की हुई ज़मीनों को जब नीलाम करेंगे तब यही महाजन उन्हें नीलामी में लेंगे. ऐसे हालातों में उन्होंने यही निश्चय किया कि असहयोग प्रस्ताव के लगान बंदी अंश को निकलवाने की कोशिश की जाये. इस के लिए वे भिवानी की कांफ्रेंस में पहुंचे और जब अपने विचार व्यक्त करने लगे तो लोगों ने हुल्लड़ मचा दिया. जैसे आज लोग राष्ट्रवाद में अंधे हैं वैसे ही उस वक्त भी थे, पर उस वक्त राज गैरों का था सो उनकी समझ आती है पर आज वाले राष्ट्रवादियों का अंधापन समझ से परे है ! इसके बाद रोहतक में एक सभा बुलाई गई, इसमें देहाती भी काफी बड़ी संख्या में आये हुए थे. जब सर छोटूराम ने अपने विचार रखने चाहे तो यहाँ भी शहरी लोगों ने शोर-गुल किया. देहाती लोगों ने भी सर छोटूराम का इस मुद्दे पर साथ नहीं दिया और सभा में असहयोग का प्रस्ताव पास हो गया. कम समझ के लोग समझते थे कि प्रस्ताव पास होते ही लोग उस पर अमल कर देंगे और अंग्रेज सहज ही भाग जायेंगे इसलिए उन्होंने प्रस्ताव का पूर्णरूपेण पास हो जाना ही बेहतर समझा. चौधरी छोटूराम का हित इसी में था कि वे हवा के रुख के साथ चलते, बहाव के साथ बहते, किन्तु वह उनके स्वभाव के प्रतिकूल था, इसलिए वे कांग्रेस से त्याग पत्र देकर अलग हो गए. जब उनसे कहा गया कि जिन ज़मींदारों का आप लगान बंदी में अहित देखते हैं वे भी तो इस प्रस्ताव के पक्ष में हैं तो चौधरी साहब ने कहा, वे भाववेश में हैं. जब जोश उतर कर उन्हें होश आएगा तब वह पछताएंगे.

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद भारत में क्या राजनीतिक सुधार किये जाएँ, इस सम्बन्ध में तत्कालीन भारतमंत्री सर मोंटेग्यू की अध्यक्षता में एक कमीशन भारत आया. इस कमीशन के सामने पंजाब ज़मींदार सभा की तरफ से चौधरी छोटूराम के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पेश हुआ. मोंटेग्यू तहकीकात के सिलसिले में प्रत्येक प्रान्त से सम्मति ली गई और यह प्रश्न पंजाब कौंसिल के सामने भी आया. चौधरी छोटूराम की सलाह पर चौधरी लालचंद ने निम्नलिखित तीन प्रस्ताव कौंसिल के सामने रखे –

  1. देहाती तथा शहरी इलाके अलग-अलग हों.
  2. जनसँख्या और करों की वसूली की दृष्टि से 90% सीटें देहात को और 10% शहरों को दी जाएं.
  3. देहाती हलकों से देहाती उम्मीदवार ही खड़ें हो सकें.

ये तीनों ही प्रस्ताव स्वीकृत हो गए. देहाती अधिकारों की यह शहरी क्षेत्रों पर पहली जीत थी और इस से चौधरी छोटूराम के भावी राजनैतिक कार्यक्रम की रुपरेखा की एक झलक स्पष्ट रूप से सामने आई. इस कमीशन की रिपोर्ट के बाद जो सुधार किये गए वे मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड योजना के नाम से भारतीय राजनैतिक इतिहास में प्रसिद्द हैं.

इस सुधारों के बाद से पंजाब की राजनीति में एक नया मोड़ आया या यूँ कहें कि यह पंजाब के किसान की दशा सुधार में टर्निंग पॉइंट था. चौधरी छोटूराम अपना पहला चुनाव हार गए थे. पर यह हार उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी क्योंकि अर्जुन की तरह उन्हें भी अपना लक्ष्य साफ़ दिख रहा था. 1923 में सर फजले हुसैन की रूरल ब्लॉक व् चौधरी छोटूराम की ज़मीन्दरा सभा ने यूनियनिस्ट पार्टी को जन्म दिया. यह सिर्फ राजनीतिक पार्टी ही नहीं थी बल्कि एक किसान तहरीक थी. एक ऐसी तहरीक जिसने न सिर्फ पंजाब बल्कि पंजाब से बाहर राजस्थान, उत्तर प्रदेश तक के किसान में लामबंद होने की चेतना भर दी. सर छोटूराम की इस किसान लामबंदी ने ही अलवर रजवाड़े और सीकर के ठिकानेदारों के विरुद्ध किसान आन्दोलन किया. ऐसी किसान लामबंदी की कि 1923 से 1947 तक पंजाब में यूनियनिस्ट पार्टी अर्थात किसान राज रहा. जिसमें कई किसान हितैषी कानून बनाए गए. जिनमें प्रमुख कानून थे – 1. कर्जा माफ़ी अधिनियम-1935 2. पंजाब कर्जा राहत कानून-1935 3. साहूकार पंजीकरण एक्ट -1938 4. गिरवी ज़मीन की मुफ्त वापसी एक्ट-1938 5. कृषि उत्पाद मंडी अधिनियम-1938 6. व्यवसाय श्रमिक एक्ट – 1940. ये कानून पंजाब के इतिहास में सुनहरे कानूनों के नाम से जाने जाते हैं. इसके इलावा किसान कल्याण कोष की स्थापना, जिसके तहत कई किसान मजदूरों के लड़के पढ़ कर बड़े बड़े ओहदों पर गए. पाकिस्तान के साइंटिस्ट अब्दुस सलाम जिनका नाम नोबेल प्राइज के लिए नामित हुआ था वे भी इसी कोष की मदद से पढ़े थे. वह दौर किसान के लिए सुनहरे दौर की बुनियाद था. उस दौर में किसान कमेरे की ऐसी लामबंदी की मिसाल देश में कहीं और न थी. चौधरी छोटूराम हर तबके के, चाहे हिन्दू हो या मुस्लिम, किसान हो या मजदुर, हरमन प्यारे नेता बन गए थे, मुस्लिम उन्हें रहबरे आजम कहते तो दलित उन्हें दीनबंधु कहते. यह उनके द्वारा की गई किसान की लामबंदी की ताकत ही थी कि जिस जोर पर उन्होंने वोइसरॉय को भी झुकने पर मजबूर कर दिया था. दुसरे विश्व युद्ध के समय ब्रिटिश सरकार को गेहूं की जरुरत थी, वोइसरॉय वेवल ने सारे भारत के प्रान्तों के प्रीमियरों की मीटिंग बुलाई. मद्रास से श्री राजगोपालाचार्य आये और पंजाब से चौधरी छोटूराम. वोइसरॉय चाहता था कि युद्ध की जरुरत के लिए खाद्द्यवस्तुएं विशेषकर गेहूं का भाव सस्ता किया जाए. वह गेहूं का 7 रुपया प्रति मण का भाव नियत करना चाहते थे. श्री राजगोपालाचार्य कांग्रेस के प्रतिनिधि थे उन्होंने वोइसरॉय का यह सुझाव मान लिया. चौधरी छोटूराम ने इसका विरोध करते हुए कहा कि गेहूं मद्रास का किसान नहीं, पंजाब का किसान पैदा करता है. हम 10 रुपया प्रति मण से कम गेहूं नहीं देंगे. इस पर वोइसरॉय ने चौधरी छोटूराम पर दबाव ही नहीं बल्कि धमकी भी दी कि हमने युद्ध में व्यापारी वर्ग की मदद लेनी है, वे भाव सस्ता चाहते हैं. सरकार इतना महंगा भाव नहीं देगी और किसान को सरकारी भाव पर गेहूं देना होगा. इस पर चौधरी छोटूराम ने कहा, हमने व्यापरी का नहीं किसान का लाभ देखना है. किसान युद्ध के लिए जवान भी दे और घाटा खा कर गेहूं भी दे, दोनों बात नहीं हो सकती. लड़ाई व्यापरियों से नहीं किसानों के बेटों से जीती जायेगी. चौधरी साहब यह कह कर मीटिंग से खड़े हो गए और कहा कि 10 रुपया प्रति मण से कम किसान का गेहूं नहीं दूंगा. वरना खड़ीं फसल में आग लगवा दूंगा. यह कह कर वह पंजाब लौट आए. वोइसरॉय ने चौधरी छोटूराम की गिरफ़्तारी का सुझाव दिया. तब सर सिकंदर हयात खान वोइसरॉय के पास गए और उन्हें चौधरी छोटूराम की किसानों में लोकप्रियता से अवगत करवाया कि चौधरी छोटूराम पंजाब के किसान और सिपाही का महान नेता है और वह जो कहता करता है. क्या किसान को नाराज करके और उसका अलाभ करके युद्ध पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ेगा ? इस पर वोइसरॉय को झुकना पड़ा और उन्हें किसान को 10 रुपया प्रति मण का भाव देना पड़ा. चौधरी छोटूराम किसान के लिए जीते मरते थे. उनकी राजनीति की धुरी ही किसान बनाम साहूकार और शहरी बनाम देहात थी. यहाँ तक कि मृत्यु से एक दिन पहले वह किसानों को भाखड़ा बाँध की बहुत बड़ी सौगात देकर गए. चौधरी छोटूराम ने एक सभा में कहा कि पंजाब के किसान को जो रास्ता मैंने दिखलाया है अगर वह उस पर चलेगा तो हमेशा उसकी सत्ता रहेगी. किसान से आह्वान करते हुए कहते हैं – “ए ज़मींदार (किसान) तू समाज का निचला भाग नहीं है, बल्कि सबसे श्रेष्ठ है. तू हलपति ही नहीं, देख तू खेडापति और गढ़पति भी है ; तू हुकूमत का तख़्त-ए-मश्क बनने के लिए पैदा नहीं हुआ है बल्कि हुकूमत करने के लिए पैदा हुआ है ; तू अपने असली स्वरूप को पहचान ले…”.

पंजाब में 1923 से लेकर 1947 तक यूनियनिस्ट पार्टी की सरकार रही और उस सरकार ने विकास की जो बुनियाद रखी उसका फर्क आज भी अन्य राज्यों से तुलना करके देख सकते हैं. जबकि आज़ादी के बाद पश्चिम बंगाल में किसान मजदुर की बात करने वाली कम्युनिस्ट सरकार रही बावजूद उसके पश्चिम बंगाल में किसान और मजदुर के हालात देख लीजिये. पश्चिम बंगाल से ही हथियार बंद नक्सलवाद आन्दोलन की शुरुआत हुई और आजतक जारी है. जबकि सर छोटूराम ने ब्रिटिश हुकूमत के समय ही बिना किसी हथियारबद आन्दोलन के ये चमत्कार करके दिखाया. उन्होंने न सिर्फ किसान को कर्ज से राहत दिलवाई बल्कि सिंचाई योजनाओं से पंजाब को अनाज का टोकरा बना दिया. 2019 में केरल सरकार ने अपने राज्य में कर्जा माफ़ी मॉडल लागु किया तो योजना आयोग के उपाध्यक्ष श्री प्रभात पटनायक ने मीडिया के सामने कहा कि उन्हें इस मॉडल की प्रेरणा पंजाब में सर छोटूराम कर्जा राहत योजना से मिली, जिसमें उन्होंने एक आयोग बनाया और उस आयोग के सदस्य गाँव गाँव जाकर हालातों का जायजा लेते. ये थे उनकी किसान लामबंदी के कारण.

 सर छोटूराम के जाने के बाद देश के किसान की लामबंदी उनसे अगले पायदान के नेता चौधरी चरण सिंह ने की. जो कानून पंजाब में लागु हुए थे वे कानून चौधरी चरण सिंह ने यूपी में लागू करवाए. चौधरी चरण सिंह ही थे जिन्होनें अपनी ही पार्टी के नेता और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु का रूस की तर्ज पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की बात का विरोध किया था. चौधरी चरण सिंह के समय में किसान की लामबंदी की मिसाल उनके द्वारा 27 दिसम्बर, 1977बोट क्लब दिल्ली में की गई रैली थी, जो आजतक एक रिकोर्ड है. इस रैली में पंजाब से अकाली, बिहार से कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेता महाराष्ट्र से शरद जोशी जैसे किसान नेता जिनकी अगुवाई में महाराष्ट्र के तम्बाकू किसानों ने एक बड़ा आन्दोलन किया था, सब शरीक हुए. दिल्ली में किसानों की इस रैली से देश की राजनीति में एक नया सन्देश गया. इस किसान रैली से कांग्रेस पार्टी समझ चुकी थी कि अब देश में किसान ही राजनीति की धुरी होंगें इसलिए श्रीमती इंदिरा गाँधी ने 16 नवम्बर, 1981में दिल्ली में एक बड़ी किसान रैली का आयोजन किया जो उस समय की मीडिया ने बहुत सफल रैली बताई थी ज्सिमें देश से लाखों की संख्या में किसान आए.

चौधरी चरण सिंह के बाद देश का किसान चौधरी देवीलाल की अगुवाई में लामबंद हुआ. इनका साथ दिया किसान नेता चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत जैसे किसान नेताओं ने, पंजाब के अकाली गुजरात के पटेलों ने तो बिहार से लालूप्रसाद यादव, नितीश कुमार व् मुलायम सिंह यादव, शरद यादव जैसे नेताओं ने. केंद्र की सत्ता में आते ही चौधरी देवी लाल ने देश के किसानों का कर्जा माफ़ किया. चौधरी देवी लाल ने भी दिल्ली में एक सफल किसान रैली का आयोजन किया. पर यह किसान लामबंदी ज्यादा लम्बी न चल सकी. इसके टूटने के दो कारण बने. पहला वीपी सिंह सरकार द्वारा मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करना. इस रिपोर्ट में किसी राज्य की एक जाति को ओबीसी में शामिल कर लिया गया तो वहीँ दुसरे राज्य कि इसी जाति को अगड़ा की श्रेणी में मान लिया गया.  यहाँ से किसान लामबंदी ओबीसी के जाल में उलझ गई. दूसरा कारण बना, उस समय बीजेपी नेता श्री लाल कृष्ण अडवाणी द्वारा शुरू की गई राम मंदिर रथ यात्रा. चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की रैलियों में कभी किसान एक ही मंच से नारा लगाया “अल्लाह-हु-अकबर. हर-हर महादेव”. राम मंदिर रथ यात्रा के बाद किसान भी धर्मो की राजनीति में बंटता गया और उनका “अल्लाह-हु-अकबर, हर-हर महादेव” का नारा अब “बच्चा बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का” का हो गया था.   

 नब्बे के दशक से राष्ट्रीय स्तर पर किसान राजनीति हाशिये पर जाना शुरू हो गई. ऐसा कोई नेता नहीं रहा जिसके चेहरे से राष्ट्रिय स्तर पर किसान लामबंदी हो सके. जो किसान नेता ओबीसी की राजनीति में बंट कर खुद को किसान की बजाए अब ओबीसी वर्ग का अगुवा कहने लगे थे उन्हें तो इस ओबीसी वर्ग की अगुवाई भी करनी नहीं आई. सबसे पहले तो कोर्ट ने मंडल कमीशन की सिफारिश पर जो कोटा घटाया उस पर भी ये चुप रहे और उसके बाद आये साल कितनी ही वैकेंसियाँ बैकलॉग की खाली रह जाती हैं उन पर भी ये आजतक कुछ नहीं कर पाए.  इन्हें तो ठीक से ओबीसी वर्ग का नेतृत्व करना भी नहीं आया और यही कारण है कि किसान के बंटवारे के बाद अब ओबीसी वर्ग भी दो हिस्सों में बंटता जा रहा है, एक वर्ग खुद को मूल ओबीसी कह दुसरे वर्ग का विरोध कर रहा है.  और राष्ट्रीय राजनीतिक दल भी यही चाहते थे कि किसी न किसी तरह किसान केंद्र की राजनीतिक धुरी से हटे. इसके लिए इन राजनीतिक दलों ने एक डाव और चला, इन दलों ने अपने-अपनी पार्टियों में अलग से किसान प्रकोष्ठ बना दिए. जैसे कि कांग्रेस का किसान खेत मजदुर कांग्रेस तो बीजेपी का भाजपा किसान मोर्चा. ये सब संगठन दरअसल किसान यूनियनों की पीठ तोड़ने के लिए बनाए गए हैं और किसान की आँख में धुल झोंकने के लिए कि देखिये हमारी पार्टी किसान के चिंतित है इसलिए अलग से किसान प्रकोष्ठ भी है. और कभी कभी कोई बड़ा किसान आन्दोलन हो तो ये पार्टियों के किसान संगठन उस आन्दोलन को भटकाने या ख़त्म करने के काम भी आते हैं.

किसान लामबंदी ख़त्म होने का एक और कारण हैं और वह यह कि कभी जिन चेहरों पर किसान लामबंद हुआ करते थे आज उनमें से अधिकतर की अगली पीढियां भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. भ्रष्ट्र व्यवस्था से लड़ते लड़ते पता ही नहीं चला कि कब खुद उस पाले में आ गए. आज ये गाँव में चालीस-पचास लाख की गाड़ियों में जाते हैं, कलाई पर पांच-दस लाख की ब्रांडेड घडी बंदी होती है, और फिर उस ब्रांडेड घडी वाली कलाई को हवा में लहराते हुए कहते हैं कि हम किसान की आवाज़ हैं, हम किसान के लिए लड़ेंगे. अब जिस किसान की कोशिश यही रहती है कि अगर इस साल ढंग की फसल हो जाए तो ढंग का मकान बना लूँ, छोरी का ब्याह ढंग से कर दूँ, या बालकों का किसी अच्छी शिक्षण संस्था में दाखिला करवा दूँ, क्या ऐसा करके ये नेता उस किसान को खिझा नहीं रहे ? अब तो किसान भी थक हार कर इन नेताओं की चापलूसी सीख गया है. किसान को अब तरक्की का यही शॉर्टकट लगने लगा है. और जो किसान के बच्चे इनकी चापलूसी करके राजस्व विभाग में, कृषि विभाग में या अन्य जिस भी विभाग में जिनका वास्ता आए दिन किसान देहातियों से पड़ता रहता है उनसे ही रिश्वत लेने में हिचक नहीं करते. हमारे नेता तो पूंजीवादी व्यवस्था का शिकार हुए ही हुए, किसान भी शिकार होता जा रहा है, और पैसा ही पीर है मानने लगा है. यही कारण है कि आज देहात अनाथ है, शहर आबाद हैं. सरकार गाँव गोद लेने की बात करती है और शहर को स्मार्ट बनाने की. सर छोटूराम हमें जो बुनियादी विचार देकर गए थे यदि हम उन पर चलते तो क्या आज गाँव अनाथ होते ?

वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे,
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख।

अब देखने में आता है कि देश में जगह जगह किसान आन्दोलन करते हैं पर वह देश व्यापी तो छोडिये राज्य व्यापी भी करने में सफल नहीं हो पाते हैं. 2017 में तमिलनाडु के किसान काफी दिनों तक दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना दिए रहे थे. मैं खुद भी अपने साथियों के साथ दो बार उनके धरने पर गया था. वहां हरियाणा यूपी से काफी संगठन उनकी हौसलाफजाई के लिए आते,  पर उनके साथ भाषा की दिक्कत थी, और हम लोकल भी जो जाते वह सिर्फ औपचारिकता पूरी करने जा रहे थे. यदि कोई बड़ा चेहरा होता तो उनकी सुनवाई में इतना वक्त न लगता. पर अब जब ऐसा कोई बड़ा चेहरा किसान के पास है नहीं जिसके चेहरे पर देश का किसान लामबंद हो सके तो ऐसे हालतों में बंटे हुए किसान के पास एक ही विकल्प है कि उनके जितने भी छोटे छोटे संगठन हैं वह “एक प्रतीक” का विकल्प चुनें. आप हम सब देखते हैं कि आज दुनियाभर के दलित संगठन हैं पर जब उनकी कोई मांग होती है तो सरकार तुरंत हरकत में आती है, हरकत में आने का कारण है सभी संगठनों का प्रतीक एक, और वह है डॉक्टर आंबेडकर. सो ऐसे ही किसान संगठनों को एक प्रतीक चुनना होगा और मेरी समझ अनुसार उस प्रतीक के लिए सर छोटूराम से बढ़कर कोई नहीं. केरल योजना आयोग वाले भी कर्जा माफ़ी मॉडल बनाते वक्त सर छोटूराम को पढ़ रहें हैं तो फिर “सर छोटूराम” सबका एक साँझा प्रतीक क्यों न हो ? दुनिया प्रतीकों से चलती है. दुनियां में जितने भी धर्म हैं इन्हें ही देख लीजिये, इनको बनाने वाले सदियों पहलें जा लिए पर इनके अनुयायी आज भी उनके प्रतीकों के सहारे उनके बनाए धर्मों को चला रहें हैं. सो किसान को भी ये प्रतीक वाला दस्तूर समझना और अपनाना होगा. सभी संगठनों का प्रतीक एक होगा तो अलग अलग होते हुए भी सब एक दिखेंगे. “एक प्रतीक” ही “अनेकता में एकता” और किसान लामबंदी का सूत्रधार है अब.

महिला किसान – अधिकार और पहचान का इंतजार

तीन साल पहले मैंने एक किसान प्रशिक्षण शिविर में भाग लिया था। उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के एक गांव में प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह ने आवर्तनशील खेती के बारे में प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया था। इसमें देश भर से किसान भाग लेने पहुंचे थे। वहां पहुंचकर पता चला कि मुझे छोड़कर सभी प्रतिभागी पुरुष हैं। आश्चर्य हुआ, क्योंकि अक्सर ये देखा गया है कि खेती में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर ही रहती है।

हमारे कृषि प्रधान देश में जब भी किसान की बात होती है तो एक पुरुष की छवि ही दिमाग में आती है। अक्सर आप देखेंगे कि रेडियो, टेलीविजन आदि पर जब किसान से संबंधित कार्यक्रम दिखाते हैं तो उनमें प्रायः पुरुष ही दिखायी देते हैं। ट्रैक्टर, खाद वगैरह के विज्ञापनों में भी अक्सर पुरुष किसान ही दिखते हैं। कोई किसान हाट हो, मेला हो या किसान आंदोलन हो, या किसान नेता हों, सभी जगहों पर पुरुष ही दिखाई देते हैं। इसी के चलते एक महिला किसान की छवि सहज ही ध्यान में नहीं आती।

महिलाएं खेत में मजदूर की तरह ही दिखाई पड़ती हैं। हालांकि यह अवधारणा गलत है कि किसानी में महिलाओं का योगदान केवल मजदूरी तक सीमित है। दरअसल, खेती की जमीन पर मालिकाना हक न के बराबर होने के कारण महिलाओं को पुरुषों के बराबर या पुरुषों की तरह एक किसान की पहचान नहीं मिल पायी है। महिला किसान का ना तो राजनीति में प्रतिनिधित्व है और ना ही कृषि अर्थव्यवस्था में।

सोचिए, जो महिलाएं बीज बुआई से लेकर फसल कटाई तक सभी कामों में बराबर हाथ बंटाती हैं, उनका ना कहीं प्रतिनिधित्व है ना ही भू-स्वामित्व। खेत से निकलते ही फसल के विक्रय, व्यय संबंधित सभी निर्णय पुरुष ही करते हैं। महिला किसान एक आम गृहिणी की तरह पति, भाई या बेटे के अधीन ही रहती है। अपने ही हाथों से उगाए अन्न में उसका व्यावसायिक हिस्सा नहीं रहता। क्या यह किसी और व्यवसाय में सम्भव है? पुरुषों के बराबर या अधिक काम करके भी कमाई व खर्च में स्त्रियों की हिस्सेदारी न के बराबर है। महिलाएं अपने परिश्रम से सींचकर भी कृषि भूमी पर अपना हक नहीं जमा पातीं।

पितृसत्ता के चलते वैसे ही महिलाओं की भागीदारी सभी प्रकार की संपत्तियों में कम ही होती है। लेकिन कृषि भूमि में मालिकाना हक आय से भी जुड़ा होता है। कृषि भूमि के दस्तावेजों में नाम ना होने के कारण महिलाएं किसान क्रेडिट कार्ड, किसान बीमा या अन्य कृषि योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाती हैं। महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण और निवेश के लिए प्रोत्साहन देने के लिए सुरक्षित भूमि अधिकार आवश्यक हैं। तभी महिलाएं अपने हिसाब से खेती की कमाई को खर्च या निवेश करने के सभी फैसले ले पाएंगी। महिलाओं को मिला भूमि स्वामित्व पूरे परिवार की वित्तीय स्थिरता के लिए एक ठोस आधार प्रदान करता है।

भूमि पर मालिकाना हक महज एक कागज का टुकड़ा नहीं होता। भूमि स्वामित्व से जो आत्मशक्ति मिलती है, उसका प्रभाव नारी अधिकार और सम्मान पर भी पड़ता है। सदियों से महिलाओं को पुरुष से निचले दर्जे पर रखा गया है, उसका एक कारण संपत्ति अधिकार का ना होना भी है। मालिकाना हक मिलने से जो स्वाभिमान और गौरव का सुख मिलता है, महिलाएं उससे ताउम्र वंचित रह जाती हैं। महिलाओं को भूमि स्वामित्व मिलने से एक सामाजिक “पावर-बैलेन्स” भी बनेगा जिसमें स्त्री हो या पुरुष सभी को बराबर का दर्जा मिले। पति की मृत्यु के उपरांत पत्नी की बजाय पुत्र या भाई को कृषि भूमि पर अधिकार मिलने की वजह से विधवा स्त्रियों की दुर्दशा छुपी नहीं है। दूसरा, नौकरी या मजदूरी की तलाश में शहर जाने वाले छोटे किसान खेती की जिम्मेदारी घर की महिलाओं पर ही छोड़कर जाते हैं। इसलिए यह कहना कि महिलाएं खेती कैसे संभालेंगी, एक दुष्प्रचार के सिवा कुछ नहीं है। क्योंकि वैसे भी आधी से ज्यादा खेती का काम महिलाएं ही संभाल रही हैं। यह बात कई शोध में सामने आ चुकी है।

भारतीय महिलाओं को भूमि अधिकार ना मिलने के कई कारणों में कानूनी जागरूकता की कमी और पारिवारिक विरोध मुख्य हैं। LANDESA नामक संगठन भारत सहित सम्पूर्ण विश्व में महिला भूमि अधिकार के क्षेत्र में काफी सक्रिय है। “महिलाओं के लिए, भूमि स्वामित्व वास्तव में एक सर्वोपरि, सर्वप्रथम अधिकार है – इसके बिना, मूल अधिकारों और सभी महिलाओं के उत्थान व सुधार के प्रयासों में बाधा उत्पन्न होती रहेगी।” – यह LANDESA संगठन के चीफ प्रोग्राम ऑफिसर कैरोल बोर्डों का कथन है। यह संगठन वर्ल्ड बैंक के साथ मिलकर “STAND FOR HER LAND” नामक अभियान के माध्यम से गांवों और समुदायों में महिलाओं के लिए भूमि अधिकार को एक वास्तविकता बनाने में जुटा है।

पुरुषों को करीब 90% भू-स्वामित्व मिलने से ही हमारा देश पुरुष-प्रधान बना है। विश्व के सभी आर्थिक रूप से उन्नत राष्ट्र पुरुष-प्रधान व्यवस्था से निकल कर एक न्याय-संगत और लैंगिक समानता वाले समाज में बदल रहे हैं। केवल कानून लाने से यह बदलाव संभव नहीं है। आर्थिक विकास के साथ साथ एक सामाजिक क्रांति वर्तमान समय की जरूरत है। अब हमें ऐसे युग की ओर बढ़ना है जिसमें स्त्री-पुरुष, शिवा-शक्ति की तरह साथ मिलकर हमारे देश की कृषि अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ायें। कृषि से जुड़े हर पहलू में बिना महिलाओं की बराबर भागीदारी के यह संभव नहीं है। सभी किसान भाई अपने घर की महिलाओं को खेती में बराबर अधिकार और सम्मान दें। उन्हें आगे बढ़ने का मौका दें, प्रतिनिधित्व करने दें। जब कोई एक किसान की कल्पना करे तो महिला किसान की तस्वीर भी मन में आए। महिला किसान को उनकी अपनी पहचान मिल सके।

माटी और शिल्प के लिए नये अवसरों का उत्सव

उत्तर प्रदेश माटी कला बोर्ड ने कारीगरों को सशक्त बनाने और उनके उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लखनऊ के खादी भवन में माटी कला मेले का आयोजन किया है। यह त्यौहार 5 नवंबर को शुरू हुआ था और 14 नवंबर तक चलेगा। इसमें पूरे राज्य के माटी कारीगरों को अपने उत्तम उत्पादों को प्रदर्शित करने और बेचने का मंच मिलेगा।

यह महोत्सव गोरखपुर, आजमगढ़ के ब्लैक पॉटरी, खुर्जा के बर्तनों जैसे वाराणसी, मिर्जापुर, बलिया, कानपुर, पीलीभीत, कुशीनगर और चंदौली के अन्य उत्पादों के साथ एमएसएमई की “वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट” योजना के तहत विभिन्न उत्पादों और कलाकारों को आगे बढ़ने का मौका दे रहा है। आत्‍मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल की राह पर यूपी के कदम तेजी से बढ़ रहे हैं।

दीपावली के पावन अवसर पर 30 स्‍टॉलों में आजमगढ़, गोरखपुर, प्रयागराज, कानपुर, बनारस समेत अन्‍य जनपदों की बेहतरीन कलाकृतियों की खरीदारी लोग जमकर कर रहे हैं। उत्सव के मुख्य आकर्षण हैं हाथ से बने, रंगीन दीये हैं।

इस आयोजन में कारीगरों को मुफ्त में स्टॉल प्रदान किए गए हैं। साथ ही यूपी माटीकला बोर्ड द्वारा उनके रहने की व्यवस्था भी की गई है। कारीगरों को पीओपी मास्टर डाई, स्प्रे पेंटिंग मशीन, दीया बनाने की मशीनें दी जा रही हैं। विशेषज्ञों द्वारा कारीगरों को नि: शुल्क प्रशिक्षण भी दिया गया है। यह पूरा आयोजन #GoVocalForLocal अभियान से जुड़ा है।

माटी कला मेले में शामिल कुशीनगर की दिव्‍या सिंह ने बताया कि वे 150 मिट्टी के तरह के सजावटी सामानों को लेकर आई हैं, जिन्हें लोग खूब पसंद कर रहे हैं। उसने बताया, “मुझे मिट्टी के बर्तन का व्यवसाय शुरू किये एक साल हो गया है। मिट्टी के बर्तन स्वास्थ्य लाभ के कारण बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं। आप इन बर्तनों में जो कुछ भी पकाएंगे, वह अपने खनिजों को बनाए रखेगा और मधुमेह जैसे कई बीमारियों में लाभदायक है।”

बाराबंकी के मिट्टी उत्पाद कारीगर कलाकार शिव कुमार प्रजापति कहते हैं, “हम सजावटी उत्पाद बेचते हैं। ये चीजें लोगों को काफी पसंद आ रही हैं। हमारे पास 10 रुपए से लेकर 1200 तक के प्रोडक्ट हैं। सरकार ने माटी कलाकारों को मंच दिया, जिससे हमारी कमाई दोगुनी हो रही है। हमें मिट्टी के उत्पादों को बढ़ावा देना ही चाहिए और चीनी उत्पादों को न खरीदें। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लोकल के लिए वोकल होने का नारा दिया है। इससे स्थानीय दुकानदारों और कलाकारों को आजीविका चालने में मदद मिलेगी। माटी कलाकार लोगों को इको फ्रेंडली दिवाली मनाने और स्थानीय उत्पाद खरीदने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।”

मेले में खरीदारी करने आईं गोमतीनगर की पूनम गौतम ने कहा: “मैंने गोबर से बने दीयों के बारे में पत्र-पत्रिकाओं में पढ़ा था, जो सुंदर भी हैं और इकोफ्रेंडली भी। इसलिए इस मेले में आने का बहुत मन था। खास बात यह है कि स्थानीय कारीगरों से खरीदने करने से स्थानीय कलाओं को भी सहारा मिलता है। जो हम ऑनलाइन खरीदते हैं यहा उसका आधा भी नहीं है। हम सभी को “गो वोकल फॉर लोकल” के अभियान से जुड़ना चाहिए।

पराली जलाने पर 2000 किसानों पर FIR, विपक्ष ने उठाये सवाल

पराली की आग उत्तर प्रदेश में किसानों के गले की फांस बनती जा रही है। दिल्ली के प्रदूषण के लिए भले ही हरियाणा और पंजाब में पराली की आग को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन किसानों पर कार्रवाई के मामले में तेजी यूपी सरकार ज्यादा दिखा रही है। समाचार एजेंसी आईएएनएस के अनुसार, यूपी के विभिन्न जिलों में अब तक 2000 से ज्यादा किसानों के खिलाफ पराली जलाने के आरोप में 1100 से ज्यादा एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। कई मामलों में कार्रवाई करते हुए किसानों को जेल भेजा गया है।

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में पराली जलाने के पर किसान को कॉलर पकड़कर खींचने वाले इंस्पेक्टर की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई, जबकि सहारनपुर में 6 किसानों की गिरफ्तारी का मामला तूल पकड़ चुका है। इन मामलों को लेकर विपक्ष राज्य की योगी सरकार को घेरने का प्रयास कर रहा है।

प्रदूषण के नाम पर किसानों के उत्पीड़न का मुद्दा उठाते हुए कांग्रेस महासिचव प्रियंका गांधी ने सवाल उठाया कि क्या प्रदूषण के लिए सिर्फ किसान जिम्मेदार हैं? प्रदूषण फैलाने के असली जिम्मेदारों पर करवाई कब होगी? यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी पराली के बहाने किसानों को जेल में डाले जाने पर कड़ी आपत्ति जाहिर की है। उन्होंने ट्वीट किया कि पर्यावरण प्रदूषण के बहाने पराली जलाने के नाम पर किसानों को जेलों में डालने वाले महानुभाव बताएं कि राजनीतिक प्रदूषण फैलाने वालों को जेल कब होगी।

पराली के प्रदूषण पर सख्त रुख अपनाते हुए यूपी पुलिस ने पिछले 24 घंटों में राज्य के विभिन्न जिलों में 144 एफआईआर दर्ज की हैं। इनमें से 15 एफआईआर बलरामपुर में, 8 एफआईआर बहराइच और कुशीनगर, 7 एफआईआर अलीगढ़, बस्ती, हरदोई और 6 एफआईआर रामपुर और शाहजहांपुर जिलों में दर्ज हुई हैं।

राज्य के पुलिस महानिदेशक एचसी अवस्थी ने सभी जिलों में पराली जलाने से रोकने के सख्त आदेश दिये हैं। कृषि विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वह लोग पराली जलाने वाले किसानों को इससे होने वाले नुकसान तथा इसके उपयोग के प्रति जागरूक करें।

किसानों का उत्पीड़न स्वीकार नहीं किया जाएगा: योगी आदित्यनाथ

किसानों की गिरफ्तारी और दुर्व्यवहार के मुद्दे पर आलोचनाओं से घिरने के बाद यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि पराली जलाने से संबंधित कार्रवाई में किसानों के साथ कोई दुर्व्यवहार या उत्पीड़न स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पराली जलाने के दुष्प्रभावों तथा उसके बेहतर उपयोग हेतु कृषकों को जागरूक करने की आवश्यकता है।

बिजनौर में चक्का जाम करने वाले 575 किसानों पर केस दर्ज

कृषि कानूनों के खिलाफ किसान संगठनों के राष्ट्रव्यापी चक्का जाम की अपील पर अमल करना बिजनौर जिले के किसानों को भारी पड़ सकता है। हालांकि, इस तरह के विरोध-प्रदर्शन 5 नवंबर को देश भर में हुए थे। सरदार वीएम सिंह के राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के कई पदाधिकारियों समेत चक्का जाम में शामिल बिजनौर के लगभग 575 किसानों के खिलाफ पुलिस ने केस दर्ज किये हैं।

स्थानीय मीडिया के अनुसार, बिजनौर जिले में चक्का जाम करने वाले सैकड़ों किसानों के खिलाफ विभिन्न थानों में कुल सात मुकदमे दर्ज किये गये हैं। इनमें 87 लोगों को नामजद किया है, जबकि सैकड़ों अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर कराई गई है। ये केस थाना कोतवाली शहर, हल्दौर, मंडावर, नजीबाबाद, नहटौर, चांदपुर, अफजलगढ़ थाने में दर्ज हुए हैं।

गुरुवार को केंद्र के कृषि कानूनों और गन्ना मूल्य व भुगतान समेत विभिन्न मांगों को लेकर राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने बिजनौर जिले में आठ जगहों पर चक्का जाम किया था। मिली जानकारी के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों के खिलाफ जाम लगाकर शांति भंग करने, धारा 144 के उल्लंघन और महामारी में नियमों का पालन न करने पर ये केस दर्ज हुए हैं।

चक्का जाम करने पर राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के जिन पदाधिकारियों पर केस दर्ज हुए हैं, उनमें बिजनौर के जिलाध्यक्ष विनोद कुमार, जिला महासचिव वेद प्रकाश चौधरी, प्रदेश महासचिव कैलाश लांबा, ब्लॉक अध्यक्ष संजीव कुमार, हरिराज, रामपाल सिंह, सुरेश पाल, ब्रजपाल सिंह आदि शामिल हैं। संगठन से जुड़े कार्यकर्ता पुलिस की इस कार्रवाई का कड़ा विरोध कर रहे हैं।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन से जुड़े अदित चौधरी ने असलीभारत.कॉम को बताया कि योगी सरकार किसानों की आवाज को दबाने का प्रयास कर रही है। गुरुवार को बिजनौर में हिंदूवादी संगठनों ने भी महाराष्ट्र सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। हैरानी की बात है कि प्रदर्शनकारी किसानों पर केस दर्ज कराये गये हैं। जिला प्रशासन मनमाने तरीके से धारा-144 का इस्तेामल कर किसानों का दमन करना चाहता है।

किसानों के चक्का जाम का कई राज्यों में असर, पंजाब के सारे हाईवे रोके

केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ आज किसान संगठनों के चक्का जाम की अपील का पंजाब से तमिलनाडु तक कई इलाकों में असर देखने को मिला। पंजाब में किसानों ने लगभग सभी हाईवे जाम कर दिये तो हरियाणा में भी लगभग सभी प्रमुख हाईवे पर किसान धरना जमाए बैठे हैं।

उत्तर प्रदेश में सरदार वीएम सिंह के राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ने कई जिलों में चक्का जाम कर विरोध-प्रदर्शन किया तो दक्षिण भारत के राज्यों में रास्ता रोके जाने की खबरें आ रही हैं। उल्लेखनीय है कि 5 नवंबर के चक्का जाम और 26-27 नवंबर को दिल्ली घेराव की अपील के साथ देश के 400 से अधिक किसान संगठन एक मंच पर आ गए हैं। इनमें बलबीर सिंह राजेवाल, डॉ. दर्शन पाल, गुरुनाम सिंह चढूनी, सरदार वीएम सिंह, योगेंद्र यादव और राजू शेट्टी के नेतृत्व वाले किसान संगठनों के अलावा वामपंथी किसान संगठन और कई गैर-सरकारी संगठन भी शामिल हैं।

केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ पंजाब में किसान सड़कों पर उतर आए हैं, “चक्का जाम” कर दिया है। 200 से ज्यादा मार्ग पर चक्का जाम किया है पंजाब में किसानों ने। मालेर कोटला (लुधियाना) और दिल्ली स्टेट हाइवे की तस्वीर।