आत्मनिर्भरता के दावे मगर किसानों पर सस्ते आयात की मार

हाल ही में केंद्र सरकार ने कृषि से जुड़े कई बड़े फैसले लिए हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि इन फैसलों में जहां एक तरफ किसानों के हितों की अनदेखी की गई है, वहीं कॉरपोरेट जगत को फायदा पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। कोविड-19 महामारी के चलते लागू लॉकडाउन में किसानों और पशुपालकों काफी नुकसान उठाना पड़ा है, लेकिन सरकार के ताजा फैसले इनके जले पर नमक छिड़कने जैसे हैं।

वित्त मंत्रालय ने 23 जून को एक अधिसूचना जारी कर टैरिफ रेट कोटा (टीआईक्यू) तहत 15 फीसदी के रियायती सीमा शुल्क पर 10 हजार टन मिल्क पाउडर के आयात की अनुमति दी है। जबकि मिल्क पाउडर पर सीमा शुल्क की मौजूदा दर 50 फीसदी है। इसी तरह टैरिफ रेट कोटा के तहत पांच लाख टन मक्का का आयात भी 15 फीसदी की रियायत सीमा शुल्क दर पर करने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही डेढ़ लाख टन क्रूड सनफ्लावर सीड या तेल और डेढ़ लाख टन रेपसीड, मस्टर्ड (सरसों) रिफाइंड तेल के सस्ती दरों पर आयात की अनुमति भी टैरिफ रेट कोटा के तहत दी गई है।

सरकार ने मिल्क पाउडर के आयात के लिए नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी), नेशनल कोऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन (एनसीडीएफ), एसटीसी, एमएमटीसी, पीईसी, नेफेड और स्पाइसेज ट्रेडिंग कारपोरेशन लिमिटेड को अधिकृत किया है। ताज्जुब की बात यह है कि जब इन कृषि उत्पादों के सस्ते आयात का रास्ता खोला जा रहा था, उसी समय देश को आत्मनिर्भर बनाने की बातें हो रही हैं। इतना ही नहीं चीनी स्टील और दूसरे औद्योगिक उत्पादों पर एंटी डंपिंग ड्यूटी भी लगाई या बढ़ाई जा रही है ताकि इनका आयात महंगा साबित हो। देश में चीन से होने वाले आयात पर अंकुश लगाने की मांग जोर पकड़ रही है। लेकिन इस शोरगुल के बीच कृषि आयात के रास्ते खोलकर किसानों को परेशानी में धकेला जा रहा है।

जहां सीमा पर किसान के बेटे शहीद हो रहे हैं, वहीं किसानों पर कृषि आयात की मार पड़ने जा रही है। इसके पीछे विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की शर्तों को पूरा करने की मजबूरी का तर्क दिया जा रहा है। मगर जब अमेरिका जैसा देश डब्ल्यूटीओ से बाहर निकलने की बात कर रहा हो और कई देश इसकी शर्तों का उल्लंघन कर रहे हों तो भारत द्वारा किसानों के हितों की अनदेखी कर डब्ल्यूटीओ की शर्तों को पूरा करने के तर्क को बहुत जायज नहीं ठहराता जा सकता है।

लॉकडाउन के दौरान मांग में भारी गिरावट की मार से डेयरी किसान अब तक भी नहीं उबर पाए हैं। गांवों में दूध की कीमतें 15 रुपये लीटर तक गिर गई हैं। हालांकि, इस दौरान सहकारी क्षेत्र ने सामान्य दिनों के मुकाबले करीब 10 फीसदी अधिक दूध की खरीद की है लेकिन प्राइवेट सेक्टर और असंगठित क्षेत्र की मांग में जबरदस्त गिरावट आई है। यही वजह है कि अधिकांश दूग्ध सहकारी संस्थाओं ने खरीदे गये दूध के एक बड़े हिस्से का उपयोग मिल्क पाउडर बनाने में किया। इस समय देश में करीब सवा लाख टन मिल्क पाउडर का स्टॉक मौजूद है। इस स्थिति में सस्ती दरों पर मिल्क पाउडर के आयात का सीधा असर दूध की कीमतों और पशुपालकों पर पड़ने वाला है।

डेयरी उद्योग के एक्सपर्ट का कहना है कि डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड (डीजीएफटी) द्वारा 15 फीसदी सीमा शुल्क दर पर मिल्क पाउडर के आयात की अनुमति का सीधा असर यह होगा कि स्किम्ड मिल्क पाउडर (एसएमपी) की कीमतें गिरकर 80 से 90 रुपये किलो पर आ जाएंगी। इसके चलते किसानों को मिलने वाली दूध की कीमत में सात से आठ रुपये प्रति लीटर की गिरावट आ सकती है। इसलिए सस्ते आयात का यह फैसला वापस लिया जाना चाहिए।

गौर करने वाली बात यह भी है कि देश के बड़े हिस्से में मानसून दस्तक दे चुका है और दूध का लीन सीजन (जिस समय उत्पादन कम होता है) लगभग निकल चुका है। अब फ्लश सीजन (जब दूध का उत्पादन अधिक होता है) शुरू होने जा रहा है। ऐसे में सरकार का यह फैसला किसानों के लिए घातक साबित होगा। कोविड-19 महामारी के इस दौर में जब पूरी अर्थव्यवस्था संकटों से घिरी है, तब सबकी उम्मीदें कृषि पर ही टिकी हैं। लेकिन ऐसे वक्त में किसानों का हौसला बढ़ाने की बजाय सरकार उन पर सस्ते आयात की मार डाल रही है।

मक्का उगाने वाले किसानों की हालत तो और भी खराब है। गत फरवरी के आसपास मक्का की कीमतें 2,000 से 2,200 रुपये प्रति क्विंटल थीं। लेकिन लॉकडाउन और अफवाहों से पॉल्ट्री इंडस्ट्री को हुए भारी नुकसान के चलते मक्का के दाम धराशायी हो गए। क्योंकि पॉल्ट्री फीड की करीब 60 फीसदी मांग मक्का से ही पूरी होती है। चुनावी साल होने के बावजूद बिहार में मक्का का दाम 1,200 प्रति कुंतल के आसपास है जबकि सरकार ने मक्का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 1,760 रुपये प्रति क्विटंल घोषित किया था। पंजाब में तो मक्का की कीमत एक हजार रुपये प्रति क्विंटल से भी नीचे चली गई है।

अगले मार्केटिंग सीजन के लिए मक्का का एमएसपी 1,815 रुपये तय किया है। लेकिन हकीकत में किसानों को इसका आधा दाम मिलना भी मुश्किल हो गया है। ऐसी स्थिति में सीमा शुल्क की घटी दर पर पांच लाख टन मक्का आयात की अनुमति इन किसानों के लिए बड़ा झटका है। इस समय वैश्विक बाजार में मक्का की कीमत करीब 150 डॉलर प्रति टन चल रही है। इस पर 15 फीसदी सीमा शुल्क भी लगता है तो दक्षिण भारत में यह आयात 1400-1500 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास बैठेगा।

सवाल उठता है कि ऐसे संकट के समय किसानों के हितों की अनदेखी कर आयात की अनुमति देने का क्या औचित्य है। मिल्क पाउडर और मक्का का आयात कब होगा, वह बाद की बात है लेकिन इन फैसलों से मार्केट और कीमतों पर असर अभी से पड़ने लगेगा।

दिल्ली पहुंच गया टिड्डी दल, खुद की पीठ थपथपाती रही सरकार

पिछले कई महीने से मंडरा रहा टिड्डियों का खतरा राजधानी दिल्ली और आसपास के जिलों तक पहुंच गया है। शनिवार को दिल्ली से सटे गुरुग्राम के आकाश में टिड्डियों की तादाद देखकर लोगों के होश उड़ गए। टिड्डियों का यह दल कई किलोमीटर लंबा-चौड़ा था। इन्हें भगाने के लिए लोगों के पास थाली, ताली बजाने के अलावा कोई उपाय नहीं था। गुरुग्राम और दक्षिणी दिल्ली से टिड्डियों का दल यूपी की तरफ मुड़ चुका है। इसे देखते हुए दिल्ली और यूपी के कई जिलों को अलर्ट कर दिया है। फिलहाल देश के 7 राज्य राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब टिड्डी दल के हमलों से जूझ रहे हैं।

कृषि मंत्रालय की ओर से दी जानकारी के मुताबिक, राजस्थान के झुंझुनूं में एक टिड्डी दल को नियंत्रित किया गया था जो शुक्रवार को हरियाणा के रेवाड़ी पहुंच गया। शनिवार सुबह झज्जर पहुंचने के बाद टिड्डियों का यह दल तीन-चार हिस्सों में बंट गया। इनमें से एक टिड्डी दल हरियाणा के नूंह पहुंचा और दो झुंड गुरुग्राम होते हुए यूपी की तरफ निकल गए।

लेकिन दो दिन से झुंझुनूं और रेवाड़ी में टिड्डी नियंत्रण की कोशिशों के बावजूद किसी को अंदाजा नहीं था कि एक दिन में टिड्डियां दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच जाएंगी। इसे सरकार की चेतावनी प्रणाली में बड़ी खामी माना जा रहा है कि कई किलोमीटर लंबे-चौड़े टिड्डी दल का पता क्यों नहीं चल पाया।

राजधानी दिल्ली तक पहुंचे टिड्डियों के प्रकोप के बाद विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस नेता और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने सवाल उठाया कि 6 महीने पहले से जानकारी होने के बावजूद सरकार ने कोई तैयारी क्यों नहीं की? उनका कहना है कि अगर वक्त रहते कारगर कदम उठाए जाते तो किसानों को नुकसान नहीं उठाना पड़ता। हुड्डा ने गिरदावरी करवाकर किसानों को मुआवजा देने की मांग की है।

चेतावनी की बजाय वाहवाही

इस साल 20 जनवरी को खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की चेतावनी के बाद से ही देश में टिड्डियों के हमले की आशंका जताई जा रही थी। लेकिन राजस्थान में टिड्डी दलों के नए हमले के बावजूद पिछले एक सप्ताह से केंद्र सरकार के मंत्री और अधिकारी टिड्डियों की रोकथाम के लिए खुद ही अपनी पीठ थपथपा रहे थे।

गत 21 जून को नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने टिड्डियों की रोकथाम में तकनीक के शानदार इस्तेमाल के लिए कृषि मंत्रालय को बधाई दी थी। इस बारे में अमिताभ कांत के मुताबिक, ड्रोन के इस्तेमाल ने बेहतरीन परिणाम दिए हैं। यह मेक इन इंडिया की पहल थी जिसका फायदा किसानों को मिल रहा है।

इससे पहले विदेश राज्यमंत्री वी. मुरलीधरन ने टिड्डियों पर रोकथाम के लिए कृषि मंत्रालय की प्रशंसा करते हुए ट्वीट किया था कि मोदी सरकार ने समय रहते विदेश से स्प्रेयर मंगाए और किसानों की फसलों को बचा लिया।

इस बीच, राजस्थान में जब टिड्डियों का नया हमला जोर पकड़ रहा था, तब कृषि मंत्रालय ने 23 जून को विज्ञप्ति जारी कर खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) से मिली सराहना और कीट नियंत्रण में ड्रोन व देसी-विदेशी मशीनों के इस्तेमाल का खूब बखान किया। मतलब, जब नए इलाकों में टिड्डियों के हमले के अलर्ट जारी होने चाहिए थे, तब कृषि मंत्रालय ड्रोन के गुणगान और एफएओ से मिली प्रशंसा का प्रचार-प्रसार कर रहा था।

इससे पहले 21 जून को कृषि मंत्रालय ने 7 राज्यों के 1.14 लाख हेक्टेअर क्षेत्र में टिड्डियों की रोकथाम करने का दावा किया था। सवाल उठता है कि इतने बड़े क्षेत्र में टिड्डी नियंत्रण के बावजूद दिल्ली तक हमले की भनक क्यों नहीं लगी? अब राजस्थान ही नहीं बल्कि हरियाणा और यूपी के कई जिलों तक टिड्डियों का प्रकोप पहुंच चुका है।

कीट नियंत्रण के सरकारी दावों के बावजूद नए हरियाणा और यूपी में टिड्डियों का आतंक बढ़ता जा रहा है। बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली इन टिड्डियों के कारण कोरोना संकट में किसानों की मुश्किल बढ़ रही हैं।

गुरुग्राम से यूपी पहुंचा टिड्डी दल

आज गुरुग्राम से यूपी पहुंची टिड्डियों के बारे में कृषि मंत्रालय का कहना है कि सभी टिड्डी दलों पर केंद्र और राज्य सरकारों की टीमें नजर बनाए हुए हैं। इनकी रोकथाम के पूरे उपाय किए जा रहे हैं। इस काम में 60 टीमें, 12 ड्रोन और कई फायर टेंडर लगेे हैं। यूपी में 5 अतिरिक्त टीम राजस्थान से भेजी गई हैं। हरियाणा में भी दो टीमें टिड्डियों को काबू में करने का प्रयास कर रही हैं।

अनलॉक के बीच महिंद्रा ने ऑनलाइन लांच किया सरपंच प्लस ट्रैक्टर

कोरोना संकट के बीच तमाम कंपनियां कारोबार को ऑनलाइन ले जाने में जुटी हैं। बदले हालात को देखते हुए देश की प्रमुख ट्रैक्टर निर्माता कंपनी महिंद्रा एंड महिंद्रा ने सरपंच प्लस सीरीज के ट्रैक्टरों की डिजिटल लांचिंग की है। इन ट्रैक्टरों की बिक्री फिलहाल महाराष्ट्र में होगी। खरीदार कंपनी के एम2ऑल पोर्टल पर मात्र 5001 रुपये में ऑनलाइन बुकिंग कर सकते हैं। सरपंच प्लस ट्रैक्टर पर कंपनी 6 साल की वारंटी दे रही है।

ये ट्रैक्टर महाराष्ट्र में महिंद्रा के उन डीलरों के यहां भी उपलब्ध हैं जो लॉकडालन के बाद खुल चुके हैं। कंपनी का कहना है कि महिंद्रा डीलरशिप पर स्टॉफ और उपभोक्ताओं की सुरक्षा और साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखा जाएगा। सरपंच प्लस ट्रैक्टर महिंद्रा की 575 सरपंच सीरीज का अपग्रेडेड वर्जन हैं। नई सरपंच प्लस सीरीज में 30 एचपी से 50 एचपी तक के ट्रैक्टर हैं। इसमें 2 एचपी ज्यादा पावर और कई खूबियां बताई जा रही हैं।

महिंद्रा एंड महिंद्रा के प्रेसिडेंट (फार्म इक्विप्मेंट) हेमंत सिक्का का कहना है कि आधुनिक किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ज्यादा पावर बेहतर टॉर्क, मॉडर्न स्टाइल और बेहतर प्रदर्शन के लिए सरपंच प्लस ट्रैक्टर बनाए गए हैं। इनकी आधुनिक इंजन टेक्नोलॉजी और ईंधन की बचत किसानों की उत्पादकता और आमदनी बढ़ाने में मददगार साबित होगी। ये ट्रैक्टर भारत में बनेंगे।

बर्फीले आर्कटिक में हीटवेव, साइबेरिया में गर्मी ने तोड़े रिकॉर्ड

उत्तरी ध्रुव के नजदीक अधिकतर बर्फ से ढका आर्कटिक वृत्त इस साल गर्मी से झुलस रहा है। रूस की एक मौसम एजेंसी के अनुसार, पृथ्वी के सबसे ठंडे स्थानों में शुमार साइबेरिया के वर्खोयांस्क का तापमान 38 डिग्री सेल्सियस के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है जो सामान्य से 17 डिग्री अधिक है। यहां न्यूनतम तापमान माइनस 68 डिग्री तक गिर जाता है। अब से पहले यहां उच्चतम तापमान 37.2 डिग्री सेल्सियस था। ऐसे समय जब पूरी दुनिया कोरोना संकट से जूझ रही है, आर्कटिक वृत्त में बढ़ती गर्मी जलवायु परिवर्तन के खतरे की आहट दे रही है।

इस साल आर्कटिक के साइबेरिया में गर्म हवाएं यानी हीटवेव चलने से जंगलों में काफी आग लगी है। साइबेरिया में गर्मी बढ़ने के पीछे जंगलों की इस आग को भी वजह माना जा रहा है।

साइबेरिया के अलावा आर्कटिक वृत्त में शामिल उत्तरी कनाडा, ग्रीनलैंड और स्कैंडिनेविया प्रायद्वीप में भी अत्यधिक गर्मी पड़ रही है और तापमान सामान्य से 20-30 डिग्री अधिक हैं। उत्तरी ध्रुव के नजदीक इन बेहद ठंडे इलाकों में बढ़ती गर्मी बेहद चिंताजनक है। इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा जा रहा है। आमतौर पर गर्म एशियाई क्षेत्र भी इस साल तापमान सामान्य से 5 डिग्री ज्यादा अधिक है। माना जा रहा है कि साल 2020 अब तक का सबसे गर्म साल रहेगा।

जलवायु के लिहाज बेहद महत्वपूर्ण आर्कटिक वृत्त को पृथ्वी का बैरोमीटर माना जाता है। दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक, पर्यावरण विशेषज्ञ और संस्थाएं जलवायु परिवर्तन की इन घटनाओं को लेकर काफी चिंतित हैं। इस साल मई का महीना पिछले 170 वर्षों में सबसे गर्म रहा है। यह भी जलवायु परिवर्तन का बड़ा प्रमाण है।

कैनेडियन मीडिया हाउस सीबीएस की खबर के मुताबिक, गत जनवरी से ही साइबेरिया के कई इलाकों में तापमान सामान्य से अधिक है। साइबेरिया में जितना तापमान सदी के आखिर यानी सन 2100 तक बढ़ने का अनुमान था, उतनी वृद्धि साल 2020 में ही हो चुकी है। हालांकि, कई लोग इस दावे पर सवाल भी उठा रहे हैं लेकिन जलवायु के बदले मिजाज और एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स पर शायद ही किसी को संदेह हो।

आर्कटिक वृत्त में तापमान बढ़ने के पीछे मानव जनित जलवायु परिवर्तन को वजह माना जा रहा है। ग्रीन हाउस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन के कारण आर्कटिक वृत्त का तापमान संपूर्ण पृथ्वी के मुकाबले दोगुनी तेजी से बढ़ रहा है। इससे समुद्रों और बाकी इलाकों में जमी बर्फ पिघल रही है। एक अनुमान के मुताबिक, पिछले 40 साल में आर्कटिक वृत्त की 50 फीसदी बर्फ पिघल चुकी है। जिसके चलते समुद्री और थल क्षेत्र बढ़ा है। बर्फ का क्षेत्र घटने से सूर्य की किरणों के परावर्तन में कमी आई है और ज्यादा अवशोषण हो रहा है, जिससे ग्लाेबल वार्मिंग बढ़ रही है। इससे निपटने के लिए जीवाश्म ईंधन की खपत और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी पर जोर दिया जा रहा है।

सिख किसानों के मुद्दे पर हरसिमरत कौर ने योगी को लगाया फोन

देश के बंटवारे के बाद उत्तर प्रदेश के बिजनौर, रामपुर और लखीमपुर खीरी जिलों में जाकर बसे हजारों किसानों पर जमीन से बेदखल होने का खतरा मंडरा रहा है। इन किसानों में बड़ी तादाद सिखों की है, जिसके चलते इस मुद्दे ने पंजाब की राजनीति में हलचल मचा दी है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस मामले पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और गृह मंत्री अमित शाह से बात करने का भरोसा दिलाया है तो भाजपा के सहयोगी शिरोमणी अकाली दल ने आंदोलन छेड़ने की चेतावनी दी है। आम आदमी पार्टी भी इस मुद्दे पर भाजपा को घेरने में जुट गई है क्योंकि मामला हजारों किसानों की रोजी-रोजी और जमीन से जुड़ा है।

इस बीच, शिरोमणी अकाली दल की सांसद और केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने सिख किसानों को जमीन से बेदखल किए जाने के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात की है। उनका कहना है कि योगी जी ने किसानों के साथ किसी तरह का अन्याय न होने देने का भरोसा दिलाया है। जल्द की अकाली दल का एक प्रतिनिधिमंडल भी यूपी के मुख्यमंत्री से मिलेगा।

इस मामले पर किसान संगठन भी हरकत में आ गए हैं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (AIKSCC) के संयोजक सरदार वीएम सिंह ने बताया कि जमीनी हकीकत जानने के लिए AIKSCC की तरफ से तीन सदस्यों की एक समिति गठित की गई है जो प्रभावित किसानों से मुलाकात कर हफ्ते भर में अपनी रिपोर्ट देगी। इस समिति की अध्यक्षता सरदार तेजिंदर सिंह करेंगे।

वीएम सिंह का कहना है कि इस मामले को बेवजह धर्म से जोड़ा जा रहा है जबकि प्रभावित किसानों में सभी धर्मों के किसान हैं। मुद्दा यह है कि कई पीढ़ियों से यूपी में बसे किसानों को उनकी जमीन से बेदखल की कोशिश की जा रही है, जिसका विरोध किया जाएगा।

क्या है बिजनौर का मामला?  

आजादी के बाद बहुत से किसान पश्चिमी यूपी और तराई के इलाकों में जाकर बस गए थे। इन किसानों ने अपनी मेहतन के दम पर जंगल से सटे इलाकों को खेती के लायक बनाया। लेकिन जमीन के मालिकाना हक पर विवाद और वन विभाग के दावे के चलते अब इन किसानों पर विस्थापन की तलवार लटक रही है। सरकार की नजर में ये किसान अवैध कब्जेदार हैं।  

इस मुद्दे  को उठाने वाले सिक्ख संगठन के अध्यख जसवीर सिंह विर्क ने बताया कि बिजनौर जिले की नगीना तहसील के चंपतपुर गांव में 1948 से 1951 के बीच कुछ सिख परिवार आकर बसे थे। पिछले करीब 70 साल से बिजनौर में बसे इन किसानों की तीसरी-चौथी पीढ़ी खेती कर रही है। इन किसानों को नलकूप और बिजली कनेक्शन भी जारी हुए हैं। यूपी सरकार इन्हें जमीन से बेदखल कर शायद कोई आर्म्ड फोर्स  सेंटर बनवाना चाहती है।

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन से जुड़े अदित चौधरी का कहना है कि बिजनौर में किसानों को जमीन से बेदखल करने की सुगबुगाहट से किसानों में भय और चिंता का माहौल है। कोराना और रोजगार संकट के बीच अब किसानों को जमीन से हाथ धोने का डर सता रहा है।             

लखमीपुर खीरी और रामपुर में क्या हुआ?

सिक्ख संगठन यूपी के अध्यक्ष जसवीर सिंह विर्क बताते हैं कि रामपुर की स्वार तहसील और लखीमपुर खीरी की निघासन तहसील के रननगर गांव में सैकड़ों किसान परिवार आजादी के बाद आकर बसे थे। इन किसानों ने राजा विक्रम शाह से जमीन खरीदी थी, लेकिन उसकी कोई लिखा-पढ़ी नहीं हुई। सन 1966 में जब सीलिंग की कार्रवाई शुरू हुई तो उक्त जमीन को वन विभाग की जमीन के तौर पर दर्ज किया गया, लेकिन वहां किसान खेती करते रहे। 1980 में चकबंदी के दौरान इन किसानों की खतौनियां तो बनी लेकिन सरकार की नजर में यह वन विभाग की जमीन थी। इस बीच यह मामला हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा जहां निर्णय किसानों के पक्ष में नहीं आया। फिलहाल रननगर में करीब 400 परिवार खेती करते हैं।

जमीन से बेदखल होने के कगार पर लखीमपुर खीरी जिले के रननगर गांव के हरबंत सिंह व अन्य किसान जिन पर
जमीन से बेदखल होने के कगार पर लखीमपुर खीरी जिले के रननगर गांव के हरबंत सिंह व अन्य किसान

जमीन से बेदखल होने की चिंता में डूबे रननगर के किसान हरबंत सिंह का कहना है कि इस इलाके को उनके पुरखों ने बसाया और कड़ी मेहनत से खेती के लायक बनाया। अब किसानों की तीसरी-चौथी पीढ़ी यहां खेती कर रही है। लेकिन गत 5 जून को वन विभाग और पुलिस की टीम जेसीबी लेकर गन्ने की खड़ी फसल उजाड़ने पहुंच गई और कई एकड़ में फसल तबाह कर दी। सिक्ख संगठन के गुरमीत सिंह रंधावा का कहना है कि यहां किसानों की तीन से ज्यादा पीढ़ियों खेती करती आ रही हैं फिर भी सरकार इन्हें जमीन से बेदखल करना चाहती है। यहां तक कि कोरोना जैसे संकट के बीच वन विभाग की टीम खड़ी फसल को रौंदने पहुंच गई।

मिली जानकारी के मुताबिक, रननगर में जमीन का कब्जा लेने पहुंची वन विभाग और पुलिस की टीम को किसानों के विरोध के चलते वापस लौटना पड़ा। इस दौरान किसानों और पुलिस के बीच झड़प भी हुई। इस मामले में 250 से ज्यादा लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है।

पंजाब की सियासत में हलचल

अगर यह मामला सिर्फ यूपी तक सीमित होता तो शायद उतना बड़ा मुद्दा नहीं बनता। लेकिन सिक्ख संगठन के दखल के बाद इसकी गूंज पंजाब में भी सुनाई देने लगी है। शिरोमणी अकाली दल के नेता प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस यूपी में सिख किसानों के साथ अन्याय न होने देने का दावा किया है। वहीं आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान ने इस मुद्दे पर भाजपा और अकाली को घेरना शुरू कर दिया है। मान का कहना है कि आज जो उत्तर प्रदेश में हो रहा है, ठीक वैसा ही गुजरात के कच्छ में सिख किसानों के साथ हो चुका है। अकाली दल को सत्ता का मोह छोड़कर किसानों के साथ खड़ा होना चाहिए।

हालांकि, किसानों से जमीन वापस लेने को लेकर राज्य सरकार के रुख की पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है। लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री और अकाली दल के नेताओं ने जिस तरह इस मुद्दे को उठाया है, उससे किसानों की हिम्मत जरूर बंधी है।

सुधारों के नाम पर किसान की आंख में धूल झोंकने की कोशिश

आजादी के बाद पिछले 70 साल से किसान घाटे का सौदा कर रहे हैं। एक तरफ उसकी जोत कम हो रही है, दूसरी तरफ उत्पादन की लागत बढ़ रही है। लेकिन उन्हें उपज बेचने पर लागत भी नसीब नहीं होती है। हर सरकार किसानों की पीड़ा का जिक्र चुनाव प्रचार में तो करती है, लेकिन जीतने के बाद पांच साल के लिए किसानों को भूल जाती हैं।

जहां कोरोना से देश परेशान है और लगभग 70 दिनों तक लॉकडाउन में रहा। उद्योगपति अपने घाटे के लिए सरकार से राहत मांगने लगे हैं। जब सरकार ने उद्योगपतियों के लिए राहत पैकेज तैयार किया होगा तो शायद उसे किसान के घाटे का अहसास रहा होगा, इसलिए सरकार ने 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज में बार-बार किसानों को राहत की बात की। यह अलग बात है कि किसान को इस पैकेज में राहत के नाम पर कुछ नहीं मिला।

सरकार को छोटे किसानों की पीड़ा देखनी चाहिए, जिनकी सब्जी, फल, दूध, फूल का नुकसान हुआ। सरकार ने मनरेगा को खेती के साथ जोड़ने या ग्रामीण क्षेत्र में खेती पर निर्धारित उद्योग लगाने की कोई बात नहीं की, लेकिन मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति ने तीन फैसले लिए जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐतिहासिक बताया।

पहले फैसले के तहत आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन किया गया है, जिससे अनाज, दलहन, खाद्य तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज को आवश्यक वस्तुओं के दायरे से हटा दिया गया है। इसका मतलब अब अनाज, दलहन आदि वस्तुओं की जमाखोरी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी।

एक अध्यादेश किसान की आमदनी बढ़ाने, उन्हें सशक्त और सुरक्षित करने के नाम पर लाया गया है। मोदी आत्मनिर्भर बनाने की बात करते हैं, तो वे कांट्रेक्ट फार्मिंग की वकालत करते दिखते हैं। कांट्रेक्ट फार्मिंग से उद्योगपति का फायदा होगा या किसान का? ऐसा नहीं कि हमने कांट्रेक्ट फार्मिग के बारे में पहली बार सुना है। 30 साल पहले पंजाब के किसानों ने पेप्सिको के साथ आलू और टमाटर उगाने के लिए समझौते किए और बर्बाद हो गए। वहीं, महाराष्ट्र के किसान कपास में बर्बाद हुए, जिससे आत्महत्याएं बढ़ीं।

इस अध्यादेश के तहत किसान को व्यापारी के साथ लिखित समझौता रजिस्टर करना होगा। यह किसके लिए बना है, यह धारा 2 (एफ) से अंदाज होता है। जहां फार्म प्रोड्यूसिंग ऑर्गनाइजेशन (एफपीओ) को किसान माना गया है, वहीं धारा 10 में किसान और व्यापारी के बीच विवाद में बिचौलिए (एग्रीगेटर) के रूप में भी रखा है। अगर एफपीओ किसान है तो एग्रीगेटर बनकर अपने खिलाफ फैसला कैसे करेगा?

धारा 3 (1) और 4 (1) में साफ है कि समझौते में फसल की गुणवत्ता, ग्रेडिंग और विशेष विवरण का हवाला दिया जाएगा, जिससे विवाद की गुंजाइश बनी रहेगी।

धारा 3 (3) में लिखा है कि समझौता एक फसल से पांच साल तक का होगा और आगे अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाया जा सकता है।

धारा 5 के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग और सीधे ऑनलाइन खरीद का प्रावधान है और बाजार भाव यानी मंडी रेट या ऑनलाइन रेट की गारंटी की बात कही गई है।

इन फैसलों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) या स्वामीनाथम कमीशन के फॉर्मूले (सी2 के साथ 50 फीसदी मार्जिन) का जिक्र कहीं नहीं है। उपधारा 6 (2) में व्यापारी फसल तैयार होने से पहले फसल का मुआयना करेगा, जिससे किसान पर व्यापारी हावी रहेगा।

धारा 6 (4) के अनुसार, किसान को पैसा कब और कैसे दिया जाएगा, यह राज्य सरकार निर्धारित करेगी। आपसी विवाद सुलझाने के लिए 30 दिन के भीतर समझौता मंडल में जाना होगा। अगर वहां न सुलझा तो धारा 13 के अनुसार, एसडीएम के यहां मुकदमा करना होगा। एसडीएम के आदेश की अपील जिला अधिकारी के यहां होगी और जीतने पर किसान को भुगतान किए जाने का आदेश दिया जाएगा। इसकी वसूली के लिए जमीनी लगान की तरह की प्रक्रिया चलेगी।

देश के 85 फीसदी किसानों के पास दो-तीन एकड़ की ही जोत है। समझौता करने के बाद विवाद होने पर वे अपनी पूंजी तो वकीलों पर ही उड़ा देंगे। आज किसान अपनी फसल औने-पौने दाम पर बेचकर गुजारा तो कर लेता है। कल को अपना पैसा वसूल करने में वर्षों लग जाएंगे। देश के गन्ना किसानों को भी इन्हीं समझौतों के आधार पर प्रधानमंत्री के आश्वासन के बाद भी वर्षों तक पैसा नहीं मिलता है और आज वे पूरे देश के किसानों को इस मुसीबत में डालना चाहते हैं।

इस अध्यादेश के बाद तो किसानों का हाल गन्ना किसानों से भी बदतर होगा, क्योंकि गन्ना किसानों को भुगतान पिछले 25 वर्षों से देर-सवेर कोर्ट के जरिये मिल रहा है, यहां तो धारा 19 के अनुसार कोर्ट में जाने पर प्रतिबंध है। धारा 19 समझौते को लागू करने के लिए दीवानी अदालतों में जाने की रोक है। यह अध्यादेश कहीं से न तो किसान की आमदनी बढ़ाएगा, और न ही सशक्त और सुरक्षित करेगा।

दूसरा अध्यादेश फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड एंड कॉमर्स (प्रमोशन फैसेलिटेशन) ऑर्डिनेंस लाया गया है। अगर मोदी जी की मानें तो यह किसानों की जिंदगी बदल देगा क्योंकि अब एक राष्ट्र, एक बाजार के कारण किसानों को जहां ज्यादा पैसा मिलेगा, वहीं वह अपनी उपज बेचेगा।

किसान के पास न तो साधन है और न ही मौका कि वह अपनी फसल दूसरे मंडल या प्रांत में ले जाए। और गलती से अगर वह ले भी गया तो उसके बर्बादी के दिन शुरू हो जाएंगे क्योंकि धारा 4 में कहा गया है कि पैसा उस समय या तीन कार्य दिवस में दिया जाएगा। किसान का पैसा फंस गया तो उसे दूसरे मंडल या प्रांत में बार-बार चक्कर काटने होंगे।

धारा 13 और 15 में कहा गया है कि विवाद होने पर दीवानी अदालत में मुकदमा नहीं कर सकते हैं। न तो दो-तीन एकड़ जमीन वाले किसान के पास लड़ने की ताकत है और न ही वह इंटरनेट पर अपना सौदा कर सकता है। वह अपनी जमीन पर चारा, सब्जी और अनाज सब कुछ लगाता है। क्या वह उसे लेकर मुंबई, दिल्ली बेचने जाएगा? उसे शाम को अगले दिन की सब्जी भी तोड़नी होती है और क्या वह जाने-आने का खर्च बर्दाश्त करने की सोच भी पाएगा?

एक राष्ट्र, एक बाजार किसान के किसी काम का नहीं है। जबकि हमें चाहिए एक राष्ट्र, एक एमएसपी, जिससे किसान का भला हो सके। इतना कर दें कि एमएसपी से कम कोई सौदा न हो। एमएसपी से कम भाव पर खरीदने वाले को जेल जाना होगा।

लगता है सरकार को तो किसानों पर कानून टेस्टिंग कर तजुर्बा लेने की आदत पड़ गई है। याद है 2015 में भूमि अधिग्रहण, 2013 में संशोधन के लिए तीन बार अध्यादेश पाया गया जिसे किसान विरोध के कारण वापस लेना पड़ा। सरकार कानून बनाने से पहले उसका तजुर्बा अपने कृषि केंद्र, राज्य कृषि फार्म, अनुसंधान केंद्र एवं कृषि महाविद्यालयों में क्यों नहीं करती?

हकीकत है कि सरकार सुधारों के नाम पर किसानों की आंखों में धूल झोंक रही है। वास्तव में न तो 20 लाख करोड़ रुपये के पैकेज में और न ही इन अध्यादेशों में किसानों का कुछ भला होगा।

(लेखक राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन और अखिल भारतीय किसान संघर्ष कॉर्डिनेशन कमेटी के संयोजक हैं) 

 

फसल के दाम की गांरटी नहीं, खेती के कॉरपोरेटाइजेशन पर जोर

केंद्र सरकार ने किसानों के उत्पादों की बेहतर मार्केटिंग के लिए आर्थिक उदारीकरण की दिशा में तीन सुधार किए हैं। इनमें दो सुधारों के लिए पांच जून को राष्ट्रपति ने अध्यादेश जारी किए, क्योंकि इन फैसलों को कानूनी वैधता देने के लिए सरकार संसद सत्र का इंतजार नहीं करना चाहती थी। ये अध्यादेश हैं फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020 और फार्मर्स (एम्पावरमेंट ऐंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस ऐंड फार्म सर्विसेज ऑर्डिनेंस, 2020

तीसरा और जिसे सबसे बड़ा सुधार बताया गया है, वह है आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के दायरे से खाद्यान्न, दालें, तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज को बाहर करना। अब इन उत्पादों के लिए कोई स्टॉक लिमिट नहीं होगी और न ही निर्यात पर प्रतिबंध लगेगा। इन उत्पादों की खरीद-बिक्री और देश भर में आवाजाही पर भी कोई प्रतिबंध नहीं होगा। केवल आपदा या आपात स्थिति में इन उत्पादों को स्टॉक लिमिट के दायरे में लाया जा सकेगा। सरकार का तर्क है कि इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलेगी।

इन तीनों फैसलों में एक बात साझा है कि कृषि व्यापार और कृषि उत्पादों के संगठित कारोबार यानी कॉरपोरेटाइजेशन को बढ़ावा देना। इन तीनों फैसलों में किसानों को उपज के लाभकारी मूल्य या न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और सुनिश्चित आय की कोई गारंटी नहीं है।

एक दूसरा पेच देखिए। फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020 के तहत सरकार ने किसानों की उपज का नहीं, उत्पादों का जिक्र किया है। यह केवल फसलों से संबंधित नहीं है, बल्कि किसानों के तमाम उत्पाद इस कानून का हिस्सा हैं। इसमें फसलों के अलावा पशुपालन, पॉल्ट्री और दूसरी गतिविधियों के उत्पाद शामिल हैं।

यानी इस कानून का दायरा बहुत व्यापक है। इन उत्पादों को राज्य के भीतर और बाहर किसी भी व्यक्ति, कंपनी, संस्थान, सहकारी समिति, फार्मर प्रोड्यूसर्स ऑर्गनाइजेशन (एफपीओ) को किसान से सीधे खरीदने-बेचने, लाने-ले जाने और स्टोर करने की छूट दी गई है। यह छूट एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट के तहत बनी राज्य सरकार की कृषि मंडियों के बाहर होगी और इन पर राज्य सरकार कोई शुल्क भी नहीं लगा सकेंगी।

असल में कृषि मार्केटिंग राज्य का विषय है और उसके तहत ही एपीएमसी की व्यवस्था है। लेकिन केंद्र सरकार ने एग्री मार्केटिंग शब्द की बजाय ट्रेड शब्द का इस्तेमाल किया है, जो केंद्र का विषय है। अंतरराज्यीय व्यापार भी केंद्र के अधिकार में आता है।  इसके लिए अभी नियम बनने हैं। उसके बाद निजी क्षेत्र इस कारोबार में उतर सकेगा। वह किसान के खेत से या निजी मंडी स्थापित कर उत्पादों की सीधे खरीद कर सकेगा।

सरकार का कहना है कि इस नई व्यवस्था से किसानों को ज्यादा  खरीदार मिलेंगे और वह केवल एपीएमसी के लाइसेंसी कारोबारियों के भरोसे नहीं रहेगा। इस तरह प्रतिस्पर्धा बढ़ने से किसानों को उपज का बेहतर दाम मिल सकेगा। इसके तहत पेमेंट की शर्तें तय करने और विवाद के निपटारे के लिए एसडीएम स्तर के अधिकारी या उसके द्वारा नियुक्त आर्बिट्रेशन कमेटी को अधिकृत किया गया है। विवाद अपीलीय प्राधिकरण और राज्य स्तर पर नहीं निपटता है तो केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव के स्तर तक जा सकता है।

जाहिर है, किसानों के उत्पादों को संगठित क्षेत्र के तहत लाने का यह बड़ा कदम है और देश के बड़े कॉरपोरेट यानी रिलायंस, अडाणी, आइटीसी, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा, फ्यूचर ग्रुप समेत तमाम दिग्गजों के लिए भारतीय कृषि बाजार में उतरने का रास्ता खुल गया है। लेकिन सबसे अहम बात है दाम। लेकिन इस अहम मसले पर यह अध्यादेश मौन है।

फार्मर्स (एम्पावरमेंट ऐंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस ऐंड फार्म सर्विसेज ऑर्डिनेंस, 2020 के तहत कंपनियों को किसानों के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग और कृषि उत्पादन से जुड़ी सेवाओं के संचालन के प्रावधान किये गये हैं। साथ ही इसमें लैंड लीजिंग का भी प्रावधान है जिसकी अवधि एक फसल सीजन के लेकर पांच साल तक हो सकती है।

इस अध्यादेश के मुताबिक, पहले से निर्धारित कीमत और गुणवत्ता मानकों के आधार पर फसल खरीद का कांट्रैक्ट हो सकता है। इसी तरह किसानों को सेवाएं देने का कांट्रैक्ट हो सकता है जिसमें बीज, खाद, पेस्टिसाइड की बिक्री से लेकर तमाम तरह की कृषि से जुड़ी सेवाएं शामिल हो सकती हैं। इसके तहत कंपनियां, प्रसंस्करण करने वाली कंपनियां, सहकारी संस्थाएं, एफपीओ किसानों के साथ कांट्रैक्ट कर सकते हैं। विवाद होने की स्थिति में लगभग वही व्यवस्था है जो फार्मर्स प्रॉड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020 में है। लेकिन यहां भी उपज की कीमत तय करने या किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने की कोई व्यवस्था नहीं है। किसान को लाभकारी मूल्य कैसे मिलेगा, इसका कोई प्रावधान या पैमाना नहीं है। तीनों कानूनों में सुधारों का जोर प्रतिस्पर्धा के जरिये किसानों को बेहतर दाम मिलने की संभावना पर टिका है।

एक बात चौंकाने वाली है कि चीनी को आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से बाहर क्यों नहीं किया गया। इसमें दो मसले हैं। एक, गन्ने का एफआरपी तय करने का प्रावधान और उसके भुगतान के लिए शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर इस अधिनियम के तहत आता है। दूसरे, इस समय चीनी उद्योग कुछ मुश्किल में है और माना जा रहा है कि सरकार उसे अभी सुरक्षित रखना चाहती है। वैसे भी किसानों का चीनी मिलों पर भारी-भरकम बकाया है। लेकिन सवाल है कि अगर बाकी चीजों को आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से बाहर करने पर किसानों को सही दाम मिलेगा तो चीनी को उसके तहत क्यों रखा गया है? जबकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य में दो साल से गन्ने का दाम स्थिर है। इसी को शायद राजनीति कहते हैं।

साफ तौर पर इन सुधारों का मकसद देश में कृषि का कॉरपोरेटाइजेशन करना है। किसानों को सुनिश्चित आय या फसल के लाभकारी दाम की गारंटी की बजाय कृषि के कॉरपोरेटाइजेशन की कोशिशें  हावी हैं। दिग्गज कंपनियों के मुकाबले किसान कैसे मोलभाव करेगा? इस सौदेबाजी में किसानों के हित कैसे सुरक्षित रहेंगे? इस पर बहुत जोर नहीं दिया गया है। जबकि देश में कामयाब सहकारी संस्थाओं के जरिये किसानों को बेहतर दाम मिलने के उदाहरण मौजूद हैं तो देशव्यापी स्वायत्त सहकारी संगठन खड़ा करने पर जोर क्यों नहीं दिया जा रहा है?

जब सरकार पूरे देश को एक बाजार बनाने के लिए राज्यों की अनदेखी कर नए कानून बना सकती है तो यह काम सहकारी संस्थाओं को नौकरशाही और राजनीति से मुक्त करने के लिए क्यों नहीं किया जा सकता है। बेहतर होता कि सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए मार्केटिंग की ताकत किसानों और उनके द्वारा स्थापित संस्थानों के हाथ में देती और कॉरपोरेट के साथ मिलकर खुद ढांचागत सुविधाओं पर निवेश करती।

 

चीनी मिलों को 38 हजार करोड़ की सरकारी मदद, फिर भी किसानों का 22 हजार करोड़ बकाया

पिछले दो वर्षों में केंद्र सरकार चीनी मिलों को करीब 38 हजार करोड़ रुपये की मदद और रियायतें देने का ऐलान कर चुकी है। इसके बावजूद गन्ना किसानों का बकाया भुगतान 22 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें सबसे ज्यादा बकाया उत्तर प्रदेश के किसानों का है। 12 मई तक यूपी की चीनी मिलों पर किसानों का कुल 14,496 करोड़ रुपये बकाया था।

लॉकडाउन और महामारी के संकट में भुगतान को लेकर किसानों की परेशानी बढ़ती जा रही है। स्थिति बिगड़ती देख अब केंद्र सरकार हरकत में आई है और केंद्रीय खाद्य मंत्री राम विलास पासवान ने चीनी मिलों को जल्द से जल्द भुगतान करने को कहा है। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि सरकार से हजारों करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता मिलने के बावजूद चीनी मिलों ने किसानों को समय पर भुगतान नहीं किया है।

खाद्य मंत्रालय के अनुसार, अक्तूबर से शुरू हुए पेराई सीजन 2019-20 में देश भर की चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का बकाया 22,079 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इसमें से करीब 767 करोड़ रुपये का भुगतान पेराई सीजन 2018-19 का है। यह हाल तब है जबकि पिछले दो साल में करीब 80 लाख टन चीनी का निर्यात हो चुका है और अगले चार महीनों में 10 लाख टन चीनी निर्यात की संभावना है। चीनी के अलावा एथनॉल के उत्पादन से भी चीनी मिलों को कमाई होती है। लॉकडाउन के दौरान तो चीनी मिलों ने सैनिटाइजर भी खूब बनाया, लेकिन किसानों का भुगतान अटका हुआ है।

सवाल यह है कि चीनी मिलों की कमाई के विभिन्न स्रोतों, चीनी के निर्यात और तमाम सरकारी रियायतों के बावजूद किसानों को समय पर भुगतान क्यों नहीं मिलता?

इस साल चीनी मिलों को रियायतें

40 लाख टन चीनी का बफर स्टॉक बनाने के लिए 1647 करोड़ रुपये की भरपाई

60 लाख टन चीनी निर्यात के लिए प्रति टन 10,448 रुपये की सहायता। इस पर कुल 6,268 करोड़ रुपये खर्च

पिछले साल दी गई सहायता  

चीनी मिलों को प्रति कुंतल 13.88 रुपये की मदद। कुल खर्च 3,100 करोड़ रुपये

चीनी निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 900 करोड़ रुपये की सहायता

30 लाख टन चीनी का बफर स्टॉक बनाने के लिए 780 करोड़ रुपये की भरपाई

बैंकों के जरिए 7402 करोड़ रुपये का सॉफ्ट लोन जिस पर एक साल के लिए 7 फीसदी ब्याज सरकार भरेगी। ब्याज छूट पर खर्च 518 करोड़ रुपये

इन रियायतों के अलावा गन्ने से एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 362 चीनी मिलों को 18,643 करोड़ रुपये का सॉफ्ट लोन दिया जा रहा है। इस कर्ज पर सरकार पांच साल तक कुल 4045 करोड़ रुपये की ब्याज छूट देगी। इस योजना के तहत अब तक 64 चीनी मिलों को 3148 करोड़ रुपये का कर्ज मंजूर हो चुका है। एथनॉल उत्पादन की तकनीक और क्षमता में सुधार के लिए भी सरकार चीनी मिलों को प्रोत्साहन दे रही है।

यह सिर्फ केंद्र सरकार की ओर से दी गई सहायता है। राज्य सरकारों की ओर चीनी मिलों को मिलने वाली मदद इसमें शामिल नहीं है।

करीब 38 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की इन रियायतों के बावजूद चालू पेराई सीजन में 31 फीसदी गन्ने का भुगतान किसानों को नहीं मिला है। चालू पेराई सीजन में किसानों ने कुल 72 हजार करोड़ रुपये का गन्ना चीनी मिलों को बेचा है, जिसमें से अभी तक करीब 50 हजार करोड़ रुपये का भुगतान हुआ है।

किसान नेता सरदार वीएम सिंह
किसान नेता सरदार वीएम सिंह

गन्ना भुगतान के मुद्दे पर सरकार और चीनी मिलों के साथ लंबी लड़ाई लड़ रहे राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के राष्ट्रीय संयोजक सरदार वीएम सिंह का कहना है कि सरकार और चीनी मिलों की मिलीभगत के चलते किसानों को न तो समय पर पेमेंट मिलता है और न ही बकाया भुगतान पर कोई ब्याज मिल पाता है। जिस दिन चीनी मिलों को बकाया भुगतान पर ब्याज देना पड़ेगा, वे समय पर भुगतान करने लगेंगी। चीनी मिलों की खराब माली हालत के तर्क को खारिज करते हुए वीएम सिंह कहते हैं कि यूपी में 15 साल में प्राइवेट चीनी मिलों की संख्या 35 से बढ़कर 95 हो गई। अगर इस उद्योग में घाटा होता तो प्राइवेट सेक्टर नई फैक्ट्रियां क्यों लगाता?

इस साल गन्ना भुगतान में देरी के लिए केंद्र सरकार कोरोना संकट और लॉकडाउन को प्रमुख वजह बता रही है। खाद्य मंत्रालय के अनुसार, लॉकडाउन के दौरान चीनी की खपत में करीब 10 लाख टन की कमी आई जिसका असर चीनी मिलों की कमाई पर पड़ा। यह बात मान भी लें तो हर साल भुगतान में देरी की समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। पिछले साल जब कोरोना जैसा संकट नहीं था, तब भी गन्ना किसानों का बकाया 28 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। अगर उत्पादन के लिहाज से देखें तो इस साल चीनी मिलों की स्थिति बेहतर है, क्योंकि देश में चीनी उत्पादन पिछले साल से करीब 18 फीसदी कम हुआ है। इसलिए भाव बेहतर मिलने की उम्मीद है।

दरअसल, गन्ना भुगतान में देरी पुरानी समस्या है। इससे चीनी मिलों को कच्चा माल यानी गन्ना उधार पर मिल जाता है और किसानों को पेमेंट कई-कई महीने बाद या अगले साल होता है। किसानों का यह बकाया भुगतान चीनी मिलों के लिए ब्याज मुक्त कर्ज की तरह है। जबकि किसानों को नकद खर्च कर पेमेंट के इंतजार में उधार लेना पड़ता है। यह खेती को घाटे का सौदा बनाने वाली व्यवस्था की एक छोटी-सी झलक है। कृषि संकट के पीछे ऐसे कई कहानियां छिपी हैं।

 

 

 

गेहूं खरीद में मध्यप्रदेश नंबर वन, पंजाब को पीछे छोड़ा

मध्य प्रदेश ने चालू रबी सीजन में 127.67 लाख टन गेहूं की खरीद कर पंजाब को पीछे छोड़ दिया है। अब मध्यप्रदेश देश में सबसे ज्यादा गेहूं खरीद करने वाला राज्य बन गया है। पंजाब में इस साल 127.62 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है। बरसों से सबसे ज्यादा गेहूं खरीद पंजाब की उपलब्धि रही है। लेकिन इस बार एमपी ने बाजी मार ली।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस उपलब्धि के लिए प्रदेश के किसानों और मंडी अधिकारियों को बधाई दी है।

मध्यप्रदेश की यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि राज्य में पिछले साल के मुकाबले 74 फीसदी ज्यादा गेहूं खरीद हुई, जो देश की कुल गेहूं खरीद का करीब एक तिहाई है। गेहूं खरीद के मामले में पंजाब का प्रदर्शन भी काबिलेतारीफ है। लेकिन देश के सबसे बड़े गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में सिर्फ 27.5 लाख टन गेहूं खरीदा गया है, जो तय लक्ष्य का सिर्फ 50 फीसदी है। राजस्थान और गुजरात से भी गेहूं की बहुत कम खरीद हुई है।

गेहूं की सरकारी खरीद के चलते किसानों को उपज का सही दाम मिलना संभव हुआ है। लॉकडाउन के दौरान जहां तमाम काम-धंधे ठप पड़ गए थे, वहीं कृषि मंडियों और सरकारी खरीद की व्यवस्था ने गेहूं किसानों को नुकसान पहुंचने से बचाया है। प्याज-टमाटर जैसी जिन फसलों में एमएसपी और सरकारी खरीद की व्यवस्था नहीं है, वहां फसलें कौड़ियों के भाव बिक रही हैं।

इस साल देश में कुल 386 लाख टन गेहूं की खरीद हुई है। यानी इतनी उपज पैदा करने वाले किसान लॉकडाउन के बावजूद समर्थन मूल्य पर फसल बेचने में कामयाब रहे हैं। चालू रबी के दौरान देश में 407 लाख टन गेहूं खरीद का लक्ष्य तय किया गया था, जबकि पिछले रबी सीजन में 341.32 लाख टन गेहूं खरीद हुई थी।

मध्यप्रदेश में गेहूं की खरीद बढ़ने के पीछे सरकारी प्रयासों का बड़ा हाथ है। इस बार राज्य में खरीद केंद्रों की संख्या 3545 से बढ़ाकर 4529 की गई थी। रिकॉर्ड गेहूं खरीद के चलते राज्य में 14 लाख किसानों के खाते में करीब 20 हजार करोड़ रुपये की धनराशि पहुंच चुकी है।

 

 

पर्यावरण दिवस: भूमि को बंजर होने से बचाने की चुनौती

धरती का हर तरह से दोहना जारी है। इसी कारण धरती बंजर होती जा रही है। धरती का तेजी से बंजर होना पूरे विश्व के सामने एक ज्वलंत समस्या है। इस विषय पर गत वर्ष कोप (कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज) का 14वां सम्मेलन गंगा-यमुना के दोआब में आयोजित हुआ था। जिसमें कि दुनिया के करीब 196 देशों के विशेषज्ञों और प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था।

गौरतलब है कि कोप का पहला सत्र 1999 में जर्मनी में आयोजित किया गया था। इसका गठन भूमि की भूमि की गिरती गुणवत्ता को रोकने के लिए ही किया गया था। क्योंकि अगर समूचे विश्व ने सार्थक प्रयास नहीं किये तो दुनिया की करीब एक चौथाई उपजाऊ भूमि आने वाले दशक में बंजर हो चुकी होगी, जिसका प्रभाव किसी न किसी रूप में विश्व की करीब तीन अरब आबादी पर पड़ेगा।

भारत जिस गांधी दर्शन से मौसम परिवर्तन की चिंता से निजात पाने की खुराक सम्पूर्ण विश्व को दे रहा है उसका कुछ असर अब होता दिख रहा है। इसके लिए हमें गांवों को गांव ही रहने देना होगा, शहरों की आबादी को सीमित करना होगा तथा आबादी के बोझ को कम करना होगा।

आज विश्व के आगे मौसम परिवर्तन की समस्या मुंह बाए खड़ी है कि आखिर इससे निपटा कैसे जाए। यह किसी एक देश के लिए नासूर नहीं है बल्कि सम्पूर्ण विश्व इससे प्रभावित है। संयक्त राष्ट्र के अनुसार अगर बंजर होती भूमि की समस्या से समय रहते नहीं निपटा गया तो 2050 तक करीब 70 करोड़ लोग अपनी भूमि से विस्थापित होंगे।

इस समस्या से निपटने के लिए यूनाइटेड नेशन्स कन्वेंशन टू काॅम्बेट डेजरटिफिकेशन (यूएनसीसीडी) द्वारा 2018-2030 स्ट्रैटेजिक फे्रमवर्क तैयार किया गया है। इसको लागू करने के व संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा तय किए गए सतत् विकास के 17 लक्ष्यों को लागू करने के लिए कोप-14 में भी विस्तार से चर्चा हुई थी। इन सतत विकास के लक्ष्यों को पाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ विकास कार्यक्रम की विशेष भूमिका तय की गई है, क्योंकि दुनिया में विकास के कार्यक्रम यूनाइटेड नेशन्स डवलेपमेंट प्रोग्राम के माध्यम से ही संचालित किए जाते हैं।

कान्फ्रेंस ऑफ पार्टीज में जुड़े 100 देश भू-क्षरण के लिए अपने लक्ष्य तय कर चुके हैं जबकि करीब 70 देश अपनी समस्याओं के निपटार हेतु यूएनसीसीडी के सूखा नियंत्रण कार्यक्रम के साथ सक्रियता से कार्य कर रहे हैं। कोप का लक्ष्य यही है कि विकसित देश गरीब व विकासशील देशों की मदद के लिए आगे आएं। इसमें कहीं न कहीं विकसित व विकासशील देशों के बीच अहम का टकराव भी देखने को मिलता है क्योंकि विकसित देश जोकि अपने प्राकृतिक संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग करके आधुनिकता की दौड़ में आगे निकल चुके हैं और वे चाहते हैं कि गरीब या विकासशील देश अपने संसाधनों का दोहन न करें जोकि सही भी है लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है।

पृथ्वी एक ही है इसको बचाने के लिए कुछ पुख्ता उपाय करने होंगे जिनमें भारत की अहम भूमिका होगी। ग्रामीण स्तर पर सरकारों को रोजगार उपलब्ध कराने होंगे। अधिकाधिक जंगल खड़े करने होंगे। अपने रहन-सहन में बदलाव लाकर प्रकृति के साथ जीवन जीना प्रारम्भ करना होगा। अपने जल स्रोतों को संरक्षित करना होगा तथा अपनी कृषि पद्धति को रसायनमुक्त करना होगा।

ये कुछ ऐसे उपाय हैं जिनमें कि भारत के लिए नया कुछ भी नहीं है लेकिन विकास की बेतरतीब दौड़ में कहीं हम पीछे न रह जाएं इसीलिए अपने ज्ञान से जो विमुखता हुई है बस उसको वापस पाना है और सम्पूर्ण विश्व को अपने आचरण से अपने पीछे चलाना है। कोरोना महामारी के वर्तमान दौर ने हमें वही सब सोचने व करने पर मजबूर कर दिया है जोकि वास्तव में होना चाहिए।

(लेखक नैचुरल एन्वायरन्मेंटल एजुकेशन एण्ड रिसर्च, नीर फाउंडेशन के निदेशक हैैं)