शुक्रवार, 27 जनवरी 2023
जल जंगल जमीन

फसल के दाम की गांरटी नहीं, खेती के कॉरपोरेटाइजेशन पर जोर



केंद्र सरकार ने किसानों के उत्पादों की बेहतर मार्केटिंग के लिए आर्थिक उदारीकरण की दिशा में तीन सुधार किए हैं। इनमें दो सुधारों के लिए पांच जून को राष्ट्रपति ने अध्यादेश जारी किए, क्योंकि इन फैसलों को कानूनी वैधता देने के लिए सरकार संसद सत्र का इंतजार नहीं करना चाहती थी। ये अध्यादेश हैं फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020 और फार्मर्स (एम्पावरमेंट ऐंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस ऐंड फार्म सर्विसेज ऑर्डिनेंस, 2020

तीसरा और जिसे सबसे बड़ा सुधार बताया गया है, वह है आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के दायरे से खाद्यान्न, दालें, तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज को बाहर करना। अब इन उत्पादों के लिए कोई स्टॉक लिमिट नहीं होगी और न ही निर्यात पर प्रतिबंध लगेगा। इन उत्पादों की खरीद-बिक्री और देश भर में आवाजाही पर भी कोई प्रतिबंध नहीं होगा। केवल आपदा या आपात स्थिति में इन उत्पादों को स्टॉक लिमिट के दायरे में लाया जा सकेगा। सरकार का तर्क है कि इससे किसानों को बेहतर कीमत मिलेगी।

इन तीनों फैसलों में एक बात साझा है कि कृषि व्यापार और कृषि उत्पादों के संगठित कारोबार यानी कॉरपोरेटाइजेशन को बढ़ावा देना। इन तीनों फैसलों में किसानों को उपज के लाभकारी मूल्य या न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और सुनिश्चित आय की कोई गारंटी नहीं है।

एक दूसरा पेच देखिए। फार्मर्स प्रोड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020 के तहत सरकार ने किसानों की उपज का नहीं, उत्पादों का जिक्र किया है। यह केवल फसलों से संबंधित नहीं है, बल्कि किसानों के तमाम उत्पाद इस कानून का हिस्सा हैं। इसमें फसलों के अलावा पशुपालन, पॉल्ट्री और दूसरी गतिविधियों के उत्पाद शामिल हैं।

यानी इस कानून का दायरा बहुत व्यापक है। इन उत्पादों को राज्य के भीतर और बाहर किसी भी व्यक्ति, कंपनी, संस्थान, सहकारी समिति, फार्मर प्रोड्यूसर्स ऑर्गनाइजेशन (एफपीओ) को किसान से सीधे खरीदने-बेचने, लाने-ले जाने और स्टोर करने की छूट दी गई है। यह छूट एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट के तहत बनी राज्य सरकार की कृषि मंडियों के बाहर होगी और इन पर राज्य सरकार कोई शुल्क भी नहीं लगा सकेंगी।

असल में कृषि मार्केटिंग राज्य का विषय है और उसके तहत ही एपीएमसी की व्यवस्था है। लेकिन केंद्र सरकार ने एग्री मार्केटिंग शब्द की बजाय ट्रेड शब्द का इस्तेमाल किया है, जो केंद्र का विषय है। अंतरराज्यीय व्यापार भी केंद्र के अधिकार में आता है।  इसके लिए अभी नियम बनने हैं। उसके बाद निजी क्षेत्र इस कारोबार में उतर सकेगा। वह किसान के खेत से या निजी मंडी स्थापित कर उत्पादों की सीधे खरीद कर सकेगा।

सरकार का कहना है कि इस नई व्यवस्था से किसानों को ज्यादा  खरीदार मिलेंगे और वह केवल एपीएमसी के लाइसेंसी कारोबारियों के भरोसे नहीं रहेगा। इस तरह प्रतिस्पर्धा बढ़ने से किसानों को उपज का बेहतर दाम मिल सकेगा। इसके तहत पेमेंट की शर्तें तय करने और विवाद के निपटारे के लिए एसडीएम स्तर के अधिकारी या उसके द्वारा नियुक्त आर्बिट्रेशन कमेटी को अधिकृत किया गया है। विवाद अपीलीय प्राधिकरण और राज्य स्तर पर नहीं निपटता है तो केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव के स्तर तक जा सकता है।

जाहिर है, किसानों के उत्पादों को संगठित क्षेत्र के तहत लाने का यह बड़ा कदम है और देश के बड़े कॉरपोरेट यानी रिलायंस, अडाणी, आइटीसी, महिंद्रा ऐंड महिंद्रा, फ्यूचर ग्रुप समेत तमाम दिग्गजों के लिए भारतीय कृषि बाजार में उतरने का रास्ता खुल गया है। लेकिन सबसे अहम बात है दाम। लेकिन इस अहम मसले पर यह अध्यादेश मौन है।

फार्मर्स (एम्पावरमेंट ऐंड प्रोटेक्शन) एग्रीमेंट ऑन प्राइस एश्योरेंस ऐंड फार्म सर्विसेज ऑर्डिनेंस, 2020 के तहत कंपनियों को किसानों के साथ कांट्रैक्ट फार्मिंग और कृषि उत्पादन से जुड़ी सेवाओं के संचालन के प्रावधान किये गये हैं। साथ ही इसमें लैंड लीजिंग का भी प्रावधान है जिसकी अवधि एक फसल सीजन के लेकर पांच साल तक हो सकती है।

इस अध्यादेश के मुताबिक, पहले से निर्धारित कीमत और गुणवत्ता मानकों के आधार पर फसल खरीद का कांट्रैक्ट हो सकता है। इसी तरह किसानों को सेवाएं देने का कांट्रैक्ट हो सकता है जिसमें बीज, खाद, पेस्टिसाइड की बिक्री से लेकर तमाम तरह की कृषि से जुड़ी सेवाएं शामिल हो सकती हैं। इसके तहत कंपनियां, प्रसंस्करण करने वाली कंपनियां, सहकारी संस्थाएं, एफपीओ किसानों के साथ कांट्रैक्ट कर सकते हैं। विवाद होने की स्थिति में लगभग वही व्यवस्था है जो फार्मर्स प्रॉड्यूस ट्रेड ऐंड कॉमर्स (प्रमोशन ऐंड फैसिलिटेशन) ऑर्डिनेंस, 2020 में है। लेकिन यहां भी उपज की कीमत तय करने या किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने की कोई व्यवस्था नहीं है। किसान को लाभकारी मूल्य कैसे मिलेगा, इसका कोई प्रावधान या पैमाना नहीं है। तीनों कानूनों में सुधारों का जोर प्रतिस्पर्धा के जरिये किसानों को बेहतर दाम मिलने की संभावना पर टिका है।

एक बात चौंकाने वाली है कि चीनी को आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से बाहर क्यों नहीं किया गया। इसमें दो मसले हैं। एक, गन्ने का एफआरपी तय करने का प्रावधान और उसके भुगतान के लिए शुगरकेन कंट्रोल ऑर्डर इस अधिनियम के तहत आता है। दूसरे, इस समय चीनी उद्योग कुछ मुश्किल में है और माना जा रहा है कि सरकार उसे अभी सुरक्षित रखना चाहती है। वैसे भी किसानों का चीनी मिलों पर भारी-भरकम बकाया है। लेकिन सवाल है कि अगर बाकी चीजों को आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से बाहर करने पर किसानों को सही दाम मिलेगा तो चीनी को उसके तहत क्यों रखा गया है? जबकि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य में दो साल से गन्ने का दाम स्थिर है। इसी को शायद राजनीति कहते हैं।

साफ तौर पर इन सुधारों का मकसद देश में कृषि का कॉरपोरेटाइजेशन करना है। किसानों को सुनिश्चित आय या फसल के लाभकारी दाम की गारंटी की बजाय कृषि के कॉरपोरेटाइजेशन की कोशिशें  हावी हैं। दिग्गज कंपनियों के मुकाबले किसान कैसे मोलभाव करेगा? इस सौदेबाजी में किसानों के हित कैसे सुरक्षित रहेंगे? इस पर बहुत जोर नहीं दिया गया है। जबकि देश में कामयाब सहकारी संस्थाओं के जरिये किसानों को बेहतर दाम मिलने के उदाहरण मौजूद हैं तो देशव्यापी स्वायत्त सहकारी संगठन खड़ा करने पर जोर क्यों नहीं दिया जा रहा है?

जब सरकार पूरे देश को एक बाजार बनाने के लिए राज्यों की अनदेखी कर नए कानून बना सकती है तो यह काम सहकारी संस्थाओं को नौकरशाही और राजनीति से मुक्त करने के लिए क्यों नहीं किया जा सकता है। बेहतर होता कि सरकार किसानों की आय बढ़ाने के लिए मार्केटिंग की ताकत किसानों और उनके द्वारा स्थापित संस्थानों के हाथ में देती और कॉरपोरेट के साथ मिलकर खुद ढांचागत सुविधाओं पर निवेश करती।