सरकार ने गेंहू के बाद अब गेहूं के आटे के निर्यात पर भी लगाई रोक!

सरकार ने गेहूं के आटे के दाम में तेजी पर लगाम लगाने के लिए इसके निर्यात पर रोक लगाने का फैसला लिया. प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति की बैठक में यह निर्णय लिया गया है. आधिकारिक बयान के तहत मंत्रिमंडल के इस निर्णय से अब गेहूं के आटे के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति होगी. इसके पीछे सरकार का मानना है कि आटे की बढ़ती कीमतों पर रोक लगेगी और समाज के सबसे कमजोर तबके के लिए खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी.

रूस और यूक्रेन गेहूं के प्रमुख निर्यातक हैं. दोनों देशों की वैश्विक गेहूं व्यापार में लगभग एक-चौथाई हिस्सेदारी हैं. दोनों देशों के बीच युद्ध से गेहूं की आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित हुई है. जिसके चलते भारतीय गेहूं की मांग बढ़ गई है और इसके कारण घरेलू बाजार में गेहूं के दाम में तेजी देखने को मिली है.

इस से पहले सरकार ने खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मई में गेहूं के निर्यात पर रोक लगा दी थी. इससे गेहूं के आटे की विदेशी मांग में उछाल आया है. भारत से गेहूं आटे का निर्यात इस साल अप्रैल-जुलाई में सालाना आधार पर 200 फीसदी बढ़ा है.

बयान के अनुसार, इससे पहले गेहूं के आटे के निर्यात पर रोक या कोई प्रतिबंध नहीं लगाने की नीति थी. ऐसे में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और देश में गेहूं आटे की बढ़ती कीमतों पर रोक लगाने के लिए इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया है. सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है. आर्थिक मामलों की समिति ने गेहूं के आटे पर निर्यात प्रतिबंध के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है.’

2021-22 में भारत ने 24.6 करोड़ डॉलर के गेहूं के आटे का निर्यात किया. चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-जून अवधि के दौरान निर्यात लगभग 12.8 करोड़ डॉलर पर पहुंच गया है. वहीं मई में गेहूं के निर्यात पर पाबंदी लगाने के बाद सरकार ने चीनी के निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाया था.

साम-दाम-दंड-भेद से पतंजलि ने खरीदी दलितों की सैकड़ों एकड़ जमीन!

उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में तेलीवाला नाम का एक गांव है. तेलीवाला, औरंगाबाद और इसके आस पास के गांवों में सैकड़ों बीघा जमीन पतंजलि के पास है. एक विश्व प्रसिद्ध योग गुरु खासकर जो एक समय में भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला चुका है, उसके द्वारा जमीनें खरीदने के लिए ऐसा कुछ भी किया जा सकता है, यह विश्वास से परे लगता है. कहीं ग्रामसभा की जमीन पर कब्जा तो कहीं बरसाती नदी को भरकर कब्जा. कहीं दलितों की जमीन खरीदने के लिए दलितों को ही मोहरा बनाया गया.

हरिद्वार से तकरीबन 20 किलोमीटर दूर स्थित तेलीवाला गांव में तकरीबन 1500 के करीब दलित वोटर हैं. कई बार यहां के प्रधान दलित समुदाय से हुए हैं. साल 2005 से 2010 के बीच यहां पतंजलि और उनके सहयोगियों ने खूब जमीन खरीदी है. चूंकि गांव में दलित समुदाय की बड़ी आबादी है, इसलिए उनके पास गांव में जमीनें भी ज्यादा थीं. किसी समय में भूमिहीन दलितों को सरकार से छह-छह बीघा जमीन पट्टे पर मिली थी.

उत्तराखंड में कानूनी प्रावधान है कि दलित की जमीन दलित ही खरीद सकते हैं. दलितों द्वारा किसी अन्य को जमीन बेचने के नियम बहुत कठोर हैं. दलित किसी अन्य जाति को जमीन सिर्फ उसी हालत में बेच सकते हैं, जब उसके पास 18 बीघा या उससे ज्यादा जमीन हो. इसके लिए भी एसडीएम और डीएम से विशेष इजाजत लेनी पड़ती है और जमीन का लैंडयूज बदलवाना पड़ता है.

पतंजलि ने इन गांवों के आस पास जड़ी-बूटियों और गन्ने आदि की खेती के लिए बड़े पैमाने पर जमीनें खरीदीं. चूंकि वो सीधे तौर पर इन्हें नहीं खरीद सकते थे, इसलिए उन्होंने कुछ दलितों को ही मोहरा बना कर उनके नाम पर गांव के दलितों की जमीन को बिकवा दिया. इस तरह तेलीवाला में पतंजलि ने सैकड़ों बीघा जमीन खरीद ली.

जान मोहम्मद तेलीवाला गांव के प्रधान हैं. वे बताते हैं, ‘‘हमारे गांव के ही महेंद्र सिंह, कुरड़ी प्रधान और उनका लड़का अर्जुन, मुरसलीन समेत कई लोगों ने रामददेव के लिए जमीन की खरीदारी की है. खरीद के लिए पैसे पतंजलि के लोग देते थे. जमीन दलितों के नाम पर होती थी, लेकिन कब्जा उस पर पतंजलि का होता था. कुछ लोगों से दान में भी जमीन ली गई, लेकिन दान में ली गई जमीनों के लिए भी पैसे दिए गए हैं.’’

ग्रामीणों के मुताबिक जमीनों की इस अपरोक्ष खरीद-फरोख्त में तत्कालीन पटवारी गुलाब सिंह और तत्कालीन प्रधान कुरड़ी सिंह ने पतंजलि की मददद की. गुलाब सिंह और कुरड़ी दोनों दलित थे. दोनों का निधन हो चुका है.

पतंजलि ने पूरे परिवार के नाम खरीदी जमीन

तेलीवाला के ग्रामीण हमें बताते हैं कि एक समय में पतंजलि के लिए ज़मीन खरीदना आसपास के लोगों के लिए व्यवसाय बन गया था. हमने पाया कि कुछ लोगों ने अपने परिवार के हर सदस्य के नाम पर जमीन खरीदी. कुछ ने तो अपने ड्राइवर और नौकर तक के नाम पर जमीन खरीदी थी. यह सब साल 2005 से 2010 के बीच हुआ.

52 वर्षीय महेंद्र सिंह तेलीवाला गांव के रहने वाले हैं. हम उनसे उनके घर पर मिले. सिंह ने खुद अपने नाम पर, पत्नी पल्ली, भाई फूल सिंह, बेटे अंकित कुमार और अपने ड्राइवर प्रमोद कुमार के नाम पर पतंजलि के लिए अपरोक्ष तरीके से जमीन खरीदी थी. यह बात वो खुद न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं.

महेंद्र सिंह कहते हैं, ‘‘मैंने तकरीबन 100 बीघा जमीन अपने और अपने घर वालों के अन्य सदस्यों के नाम पर पतंजलि के लिए खरीदी थी. पतंजलि के वरिष्ठ कर्मचारी देवेंद्र चौधरी मेरे पास आये थे. उन्होंने कहा कि अपने नाम पर कुछ जमीन लिखवा लो. पैसे हम देंगे, बस नाम तुम्हारा होगा. चौधरी खुद ही जमीन बेचने वालों को कैश में पैसा देते थे. नाम हम लोगों का होता था.’’

उत्तराखंड लैंड रिकॉर्ड के मुताबिक साल 2008 में सिंह और उनके परिवार ने तकरीबन 18 बार जमीन की खरीद, बिक्री और एग्रीमेंट किया. साल 2007 में सात बार और साल 2009 में 21 बार.

सिंह कहते हैं, ‘‘उस वक्त गुलाब सिंह हमारे गांव का पटवारी था. वो रामदेव का आदमी था. पटवारी को एक-एक जमीन की जानकारी होती है. गांव के किसी दलित से मेरे नाम पर जमीन ली जाती थी. इसके कुछ दिन बाद मेरे नाम पर ली गई जमीन अमर सिंह को बेच दी गई. अमर सिंह, गुलाब सिंह के रिश्ते में मामा लगते हैं.’’

दरअसल गुलाब सिंह और अमर सिंह पतंजलि के भरोसे के आदमी थे, जबकि महेंद्र सिंह गांव के आदमी थे. उनके नाम पर जमीन होने की स्थिति में बाद में वो कानूनी मुसीबत खड़ी कर सकते थे. लैंड रिकॉर्ड से भी इस बात की पुष्टि होती है. 9 जनवरी, 2009 के दिन अमर सिंह, पुत्र हरभजन सिंह ने लगभग 1.8 हेक्टेयर जमीन महेंद्र सिंह से खरीदी थी. इन जमीनों की कीमत 9 लाख 60 हजार रुपए थी. अमर सिंह ने 2009 में ही एक जनवरी को कुरड़ी सिंह से भी लगभग 1.9 हेक्टेयर जमीन खरीदी थी. जिसकी कीमत 10 लाख 15 हजार रुपए के करीब थी.

महेंद्र सिंह कहते हैं, ‘‘रामदेव या बालकृष्ण जमीन के मामले में कभी सामने नहीं आए. देवेंद्र चौधरी और पंकज ही यह सब करते थे. गुलाब सिंह उन्हें जमीन की जानकारी देते थे. जमीन एक आदमी से दूसरे के नाम दर्ज होती. दूसरे से तीसरे के पास. अभी भी पतंजलि का जिन जमीनों पर कब्जा है, उसमें से कई खसरा किसी और के नाम पर है.’’ ‘‘रामदेव के करीबी देवेंद्र चौधरी के यहां जितना कैश रुपया मैंने देखा, उतना मैंने सिर्फ फिल्मों में देखा था. वे जमीनों का भुगतान कैश में ही करते थे. पैसे देने का काम पंकज करते थे.’’

महेंद्र बताते हैं, पतंजलि द्वारा दलितों की जमीन की अपरोक्ष खरीद-फरोख्त का नतीजा यह हुआ कि आज तेलीवाला के ज्यादातर दलित भूमिहीन हैं. वे पतंजलि के मजदूर बन गए या फिर काम के लिए शहरों की तरफ पलायन कर गए. गांव के बुजुर्ग हरी सिंह ने पतंजलि को ग्रामसभा की सैकड़ों बीघा जमीन दान में देने के खिलाफ आंदोलन किया था.

हरी सिंह कहते हैं, ‘‘साल 2005 से 2010 के बीच हमारे गांव में खूब जमीन की बिक्री हुई. उन दिनों गांव में भू-माफियाओं का डेरा रहता था. अगर कोई अपनी जमीन बेचने के लिए राजी नहीं होता था तो उस पर तरह-तरह से दबाव बनाया जाता था, उसे लालच दिया जाता था.’’ हरी सिंह आगे कहते हैं, ‘‘साल 1975-76 में काफी कोशिश करके गांव के दलितों को हमने 6-6 बीघा जमीन पट्टे पर दिलवाई थी. ताकि वे गुजर-बसर कर सकें. आज इसमें से 80 प्रतिशत लोग भूमिहीन हो गए हैं.’’

महेंद्र के मुताबिक पतंजलि के लिए काम करने के कारण उन्हें फायदे की जगह नुकसान हुआ है. वे कहते हैं, ‘‘साल 2009 के करीब पतंजलि के लोगों के कहने पर मैंने कुछ जमीनों का एग्रीमेंट किया. एग्रीमेंट के पैसे मैंने दे दिए क्योंकि देवेंद्र ने कहा था कि वो जल्द ही हमें वापस कर देगा. बाद में उन्होंने जमीन लिया नहीं और मेरे पास पैसे नहीं थे कि जमीन ले सकूं. नतीजतन जिनकी जमीन थी उन्होंने वापस कब्जा कर लिया. मेरे पैसे डूब गए. पैसे मैंने कर्ज पर लिए थे. कर्ज चुकाने के लिए मुझे अपनी पुश्तैनी जमीन बेचनी पड़ी.’’

पतंजलि के लिए जमीन खरीदने वाले महेंद्र सिंह अकेले नहीं हैं. तेलीवाला के ही रहने वाले देवेंद्र कुमार ने अपनी मां प्रेमवती, पत्नी ममता रानी और खुद अपने नाम पर जमीन खरीदी थी. कुमार भी दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. कुमार कहते हैं, ‘‘पतंजलि के लिए मैंने अपने और अपने परिवारजनों के नाम पर 35 बीघा के करीब जमीन खरीदी थी. इसके लिए मुझसे गुलाब सिंह ने संपर्क किया था. गुलाब ने कहा था कि स्वामी जी (रामदेव) के ट्रस्ट के लिए जमीन लेनी है. उनके कहने पर मैं गांव के दलितों की जमीन अपने नाम करवाता गया.’’

महेंद्र सिंह की तरह देवेंद्र भी, गुलाब सिंह के अलावा देवेंद्र चौधरी और पंकज के नामों का जिक्र करते हैं. वे कहते हैं कि यहीं लोग जमीन की खरीद बिक्री कराते थे. साल 2008 में देवेंद्र और उनके परिजनों ने तकरीबन 18 बार जमीन की खरीद बिक्री की. उत्तराखंड सरकार के लैंड रिकॉर्ड के मुताबिक साल 2008 में देवेंद्र कुमार और उनकी पत्नी ममता रानी ने 1.4 हेक्टेयर जमीन खरीदी थी. जिसकी कीमत 9 लाख 25 हजार रुपए थी.

पतंजलि की जमीन बटोरने में कुरड़ी सिंह आगे

बाबा रामदेव और जमीन का जिक्र आते ही तेलीवाला गांव के लोग तीन बार के प्रधान रहे कुरड़ी सिंह का जिक्र सबसे ज्यादा करते हैं. इनकी मृत्यु 2009 में हो गई. पटवारी गुलाब सिंह के साथ मिलकर कुरड़ी प्रधान ने पतंजलि के लिए खूब जमीनें बटोरी.

कुरड़ी सिंह के निधन के महज तीन दिन बाद ही गुलाब सिंह उनके घर पहुंचे और जमीन अपने लोगों के नाम करवाने का दबाव बनाया. जिसके बाद कुरड़ी की पत्नी और बेटों ने जमीन गुलाब सिंह के जानने वालों के नाम कर दी. यह जानकारी कुरड़ी के बेटे अर्जुन और तेलूराम देते हैं.

अर्जुन और तेलूराम दोनों के पास जेसीबी मशीन हैं. जिसे वे किराए पर चलाते हैं. न्यूज़लॉन्ड्री ने अर्जुन से मुलाकात की. अर्जुन जब हमसे मिलने आए तो उनके साथ मुरसलीन भी थे. मुरसलीन गांव के उन चंद लोगों में से एक हैं, जिन्होंने पतंजलि के लिए जमीन खरीदी थी. मुरसलीन हर चीज से अनजान होने का दिखावा करते हैं. लेकिन थोड़ा कुरेदने पर कहते हैं, ‘‘अब तो पुरानी बात हो गई. अब तो पतंजलि वाले इन्हें ही (अर्जुन की तरफ इशारा) मुसीबत में डाल दिए हैं.’’

अर्जुन पतंजलि के लिए जमीन खरीदने के सवाल पर कहते हैं, ‘‘पिताजी किसके लिए जमीन खरीदते थे यह तो हमें नहीं मालूम है. पर उनके निधन के तीन दिन बाद ही गुलाब सिंह हमारे घर आए और कहा कि उनके नाम पर मेरी जमीनें हैं. उसे वापस कर दो. मेरी मां और हम दोनों भाइयों ने जमीन वापस कर दी. वह जमीन अभी पतंजलि के पास है.’’

अर्जुन के नाम पर भी कई बार जमीन की खरीद बिक्री हुई है. इस पर अर्जुन कहते हैं, ‘‘वो जमीन मेरे पिताजी ने अपने पैसों से हमारे नाम पर खरीदी थी. उसमें से कुछ जमीन गुलाब सिंह ने हमसे वापस ले ली.’’ जब अर्जुन के नाम पर लाखों रुपए की जमीन की खरीदारी हो रही थी तब उनकी उम्र 22-23 साल थी. वे दिल्ली में रहकर मजदूरी करते थे.

उत्तराखंड सरकार के लैंड रिकॉर्ड के मुताबिक कुरड़ी सिंह और उनके बेटे अर्जुन ने साल 2006 में छह बार जमीन की खरीद-बिक्री की. 2007 में चार बार, 2008 में छह बार, 2009 में 11 दफा जमीन की खरीद बिक्री की है. कुरड़ी सिंह ने पतंजलि को जमीन दिलाने में मदद की, लेकिन उनके निधन के बाद उनके बेटे अर्जुन से जमीन की खरीद में पतंजलि ने छल किया. अर्जुन से जमीन लेने के लिए फिर एक दलित व्यक्ति सोमलाल का इस्तेमाल किया गया.

अर्जुन न्यूज़लॉन्ड्री को बताते हैं, ‘‘पतंजलि के लोगों से उनकी बात आठ बीघा जमीन बेचने की हुई थी. जब बेचने गए तो 28 बीघा जमीन अपने नाम करा ली. जिसमें आठ बीघा की रजिस्ट्री थी और 20 बीघा दान करा ली. यह हमारे साथ छल था. हम लोग इतने अमीर तो है नहीं कि 20 बीघा जमीन दान करेंगे. हम इसके खिलाफ कोर्ट गए. आठ बीघा तो उनके पास चली गई, लेकिन 20 बीघा पर स्टे है, जिस पर हमारा कब्जा है. केस चल रहा है. पतंजलि की तरफ से राजू वर्मा केस की सुनवाई के समय आते हैं.’’

पतंजलि पर रुड़की में जमीन विवाद को लेकर तकरीबन 20 मामले चल रहे हैं. पतंजलि की तरफ से राजू वर्मा इनमें से कुछेक मामले की पैरवी कोर्ट में करते हैं. वर्मा अर्जुन की जमीन की बिक्री में सोमपाल की तरफ से गवाह बने थे. अर्जुन ने जो शिकायत की है उसमें इनका भी नाम है. यह जानकारी अर्जुन और राजू वर्मा दोनों न्यूज़लॉन्ड्री से साझा करते हैं.

वर्मा हमसे से बात करते हुए पहले तो स्वीकार करते हैं कि जमीन पतंजलि के लिए ली गई थी, लेकिन जैसे ही उन्हें भनक लगती है कि पत्रकार हैं, तो वे बात पलटने लगते हैं. वर्मा कहते हैं, ‘‘सोमलाल यहां अपनी जमीन खरीदने आए थे. उनको एक गवाह की जरूरत थी. उन्होंने मुझे कहा तो मैं गवाह बन गया.’’

न्यूज़लॉन्ड्री सोमलाल के घर पहुंचा तो अलग ही कहानी सामने आई. हरिद्वार के धेनुपुरा गांव के रहने वाले सोमलाल का निधन हो चुका है. हमारी मुलाकात उनके बेटे प्रणेश कुमार से हुई. कुमार उत्तराखंड पुलिस में सिपाही हैं. धेनुपुरा, तेलीवाला से करीब 25 किलोमीटर की दूरी पर है. यहां से थोड़ी ही दूर स्थित पदार्था गांव में पतंजलि का फूड पार्क है.

कुमार ने बताया, ‘‘पतंजलि के फूड पार्क में दलितों की जमीन पिताजी के नाम पर ली गई थी. जिसे बाद में उन्होंने वापस कर दिया. इसकी तो मुझे जानकारी है, लेकिन तेलीवाला की जानकारी नहीं है. अगर कोई मामला चल रहा है तो नोटिस तो मिलना चाहिए था. हमें अभी तक कोई नोटिस तक नहीं मिला है.’’

प्रणेश कहते हैं, ‘‘उनके (पिताजी) नाम पर दलितों की जमीन दूसरी जाति के लोग खरीदते थे. देहरादून में उनके नाम पर करोड़ों की जमीन ली गई थी. बहुत लोग ऐसे मौके पर लालच दिखा देते हैं, लेकिन उन्होंने जमीन वापस कर दी. उन्हें पीने का शौक था तो पीने का खर्च लेकर वे जमीन अपने नाम करा लेते थे. हमारे पास पुश्तैनी जमीन छोड़कर एक इंच जमीन नहीं है. कभी भी आप इसकी जांच करा सकते हैं.’’

साभार- न्यूजलॉंड्री

अमूल और मदर डेयरी ने दूध की कीमतों में की 2 रुपए की बढ़ोतरी!

डेयरी ब्रांड अमूल और मदर डेयरी ने अपने दूध की कीमतों में 2 रुपए की बढ़ोतरी की है. बढ़ोतरी का मुख्य कारण पशुपालकों द्वारा दूध की कीमतों में बढ़ोतरी और अन्य इनपुट खर्चों में बढ़ोतरी होना बताया है. दोनों ब्रांडों ने घोषणा की है कि दूध की बढ़ी हुई कीमतें बुधवार से प्रभावी होंगी.

अमूल डेयरी ब्रांड की मूल फर्म गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन ने कहा कि 500 मिलीलीटर के लिए, अमूल गोल्ड की कीमत अब 31 रुपये, अमूल ताजा 25 रुपये और अहमदाबाद और सौराष्ट्र बाजारों में अमूल शक्ति की कीमत 28 रुपये होगी. मदर डेयरी ने कहा है कि इसका मूल्य संशोधन उसके सभी दूध प्रकारों के लिए लागू होगा.

फुल क्रीम दूध की कीमत अब ₹ 61 प्रति लीटर, टोंड दूध ₹ 51, और डबल टोन्ड ₹ 45, बल्क वेंडेड दूध (टोकन दूध) की कीमत अब ₹ 48 प्रति लीटर होगी. कंपनियों ने बताया कि कीमतों में वृद्धि इनपुट लागत में वृद्धि को देखते हुए की गई है.

मदर डेयरी के एक अधिकारी ने अपने एक ब्यान में कहा है कि कंपनी ने पिछले पांच महीनों में इनपुट लागत में वृद्धि देखी है. कंपनी ने पिछली बार मार्च में दिल्ली-एनसीआर (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) में अपने दूध की कीमतों में 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की थी.

अमूल ने भी एक बयान जारी कर बताया, “यह मूल्य वृद्धि दूध के संचालन और उत्पादन की समग्र लागत में वृद्धि के कारण की जा रही है. पिछले वर्ष की तुलना में अकेले पशु आहार लागत लगभग 20 प्रतिशत तक बढ़ गई है. इनपुट लागत में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, हमारे सदस्य संघों ने पिछले वर्ष की तुलना में किसानों की कीमतों में 8-9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.” कंपनी दूध से होने वाली बिक्री का लगभग 75-80 प्रतिशत किसानों से दूध की खरीद पर खर्च करती है.

बारिश न होने से बोते ही खराब हुई फसल, कर्ज लेकर दोबारा बुवाई की तैयारी कर रहे किसान

मध्यप्रदेश में मॉनसून के पहले महीने में सामान्य से कम बारिश ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. जिन किसानों ने जून के पहले हफ्ते में खरीफ की बुवाई कर दी थी, उनकी फसल सूख रही है. जिन्होंने बारिश के इंतजार में सूखे खेत में बुवाई की थी उनके खेत में बीज खराब हो रहा है. ऐसे किसान कर्ज लेकर दोबारा बुवाई कर रहे हैं. जिन किसानों ने अब तक बुवाई नहीं की है, वे भी चिंतित है. इनका कहना है कि यदि लगातार बारिश होने लगी और बुवाई का समय नहीं मिला तो उनके खेत खाली रह जाएंगे.

मौसम विभाग के मुताबिक मध्यप्रदेश में 28 जून तक 116 मिमी बारिश होनी थी, लेकिन 89 मिमी ही हुई है जो सामान्य से 23 प्रतिशत कम है. बीते वर्ष इस अवधि तक 100 मिमी से अधिक बारिश दर्ज की गई थी. इधर, मानसून के आने की घोषणा को हुए 8 दिन बीत रहे हैं. असामान्य बारिश ने किसानों का पूरा गणित बिगाड़ दिया है. कुछ जिले ऐसे भी हैं जहां रह—रहकर हल्की बारिश हो रही है जिसके कारण फसलें प्रभावित नहीं है.

बैतूल के आठनेर टिमरने के लिए रहने वाले किसान गुलाब राव कापसे बताते हैं कि उन्होंने 8 से 12 जून के बीच 9 एकड़ खेत में तीन क्विंटल सोयाबीन बीज बोया था, जो खराब हो गया है. यह बीज 49 हजार का था. डीजल पर 10 हजार रुपये खर्च हुए हैं व मजदूरी 1800 रुपये लगी है. घर के सदस्यों ने अलग मेहनत की थी. इस तरह बाहर का खर्च और घर के सदस्यों की मजदूरी मिलाकर करीब एक लाख रुपये का खर्चा आया था. बीज नहीं उगा इसलिए कर्ज लेकर 27 जून को दोबारा बुवाई की है. इस बार आधे खेत में मक्का व बाकी में सोयाबीन की बुवाई की है. किसान गुलाब राव कापसे बताते हैं कि इसके लिए एक रिश्तेदार से 35 हजार रुपये कर्ज लिया है.

हरदा के चारखेड़ा गांव के किसान बंसत कुमार बताते हैं कि उनके पास 20 एकड़ जमीन है. 10 एकड़ में सोयाबीन व 10 एकड़ में मूंगफली लगाई है. बुवाई 20 जून को की है. फसल पतली उगी है. यदि दो दिन के भीतर बारिश नहीं हुई तो दोबारा बुवाई करनी पड़ सकती है. वह बताते हैं कि प्रति एकड़ करीब 15 हजार रुपये खर्च हुए हैं. क्षेत्र में दूसरे किसानों की फसलें तो खराब हो चुकी है.

बड़वानी के किसान राजा मंडलोई कहते हैं कि उनके क्षेत्र में असामान्य बारिश हो रही है. जिन किसानों के पास सिंचाई साधन हैं उन्होंने समय पर कपास लगा ली है. जिनके पास पानी नहीं है वे अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं. वह बताते हैं कि 50 प्रतिशत बुवाई का काम बचा हुआ है. वह इस बात से चिंतित है कि यदि अच्छी बारिश को शुरू होने में और देरी हुई तो फसल चक्र प्रभावित होगा और रबी सीजन की फसल पर असर पड़ेगा.

नर्मदापुरम की डोलरिया तहसील के बैराखेड़ी में रहने वाले किसान सुरेंद्र राजपूत बताते हैं कि उन्होंने 18 एकड़ खेत में धान की बुवाई की है. प्रति एकड़ 1700 रुपये का बीज, 1350 रुपये की डीएपी, 1500 रुपये डीजल खर्च और 1200 रुपये मजदूरी पर खर्च हुए हैं. एक हफ्ते से बारिश नहीं हो रही है, धान के कुछ बीज उग चुके हैं और कुछ नहीं उगें है. खाद मिलाकर बुवाई की है इसलिए बीज खराब होने का भय है.

छतरपुर के किसान जगदीश सिंह का कहना है कि उनके जिले में हल्की बारिश हुई है. अभी जमीन में पर्याप्त नमी नहीं हुई है. फसल की बुवाई करने जैसी स्थिति ही नहीं है इसलिए इंतजार कर रहे हैं. वह चिंता जताते हैं कि खरीफ फसल की बुवाई में देरी हो रही है. जिन किसानों के पास रबी पफसल की बुवाई के लिए सिंचाई का साधन नहीं होता है उन्हें नुकसान हेागा. क्योंकि अभी देरी से बुवाई करेंगे तो देरी से फसल आएगी. तब तक रबी सीजन की चना, गेहूं, सरसों की फसलों की बुवाई करने में पिछड़ जाएंगे.

मप्र में बीते वर्षों में कब—कब आया मानूसन

वर्ष———— मानूसन आने की तारीख

2016———21 जून

2017———26 जून

2018———27 जून

2019———28 जून

2020———15 जून

2021———11 जून

2022———20 जून

मप्र में 25 जून तक खरीफ बुवाई की स्थिति मध्य प्रदेश में सामान्यत: 139 लाख हेक्टेयर में खरीफ की बुवाई होती है, लेकिन पिछले साल 145.18 लाख हेक्टेयर में बुवाई हुई थी, यही वजह है कि इस साल 147.75 लाख हेक्टेयर रकबे में बुवाई का लक्ष्य रखा गया है. 25 जून 2022 तक राज्य में 9.14 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी है, जबकि पिछले साल यानी 2021 में  12.73 लाख हेक्टेयर में बुवाई हो चुकी थी.

साभार: Down To Earth

देश में ‘चीनी कम’ फिर भी क्यों नहीं बढ़े गन्ने के दाम?

पिछले दिनों पूरे उत्तर प्रदेश में जगह-जगह गन्ना किसानों ने प्रदर्शन कर गन्ने की होली जलाई। उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद तीन वर्षों में गन्ने के भाव में केवल 2017-18 में मात्र 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई थी। उत्तर प्रदेश में गन्ने का एसएपी यानी राज्य परामर्शित मूल्य पिछले दो सालों से 315-325 रुपये प्रति क्विंटल के स्तर पर ही है। इस साल गन्ना किसानों को सरकार से गन्ने का भाव बढ़ने की बड़ी उम्मीद थी, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। जबकि पिछले दो सालों से अत्यधिक चीनी उत्पादन और विशाल चीनी-भंडार से परेशान चीनी उद्योग की स्थिति इस साल सुधर गई है। इस कारण सभी आर्थिक तर्क भी भाव बढ़ाने के पक्ष में थे। इस साल देश में चीनी उत्पादन कम होने और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में अधिक मांग के कारण चीनी उद्योग को तो पूरी राहत मिलेगी, परन्तु गन्ने के रेट ना बढ़ने से गन्ना किसानों की स्थिति और बिगड़ेगी।

2018-19 में देश में चीनी का आरंभिक भंडार (ओपनिंग स्टॉक) 104 लाख टन, उत्पादन 332 लाख टन, घरेलू खपत 255 लाख टन और निर्यात 38 लाख टन रहा। इस प्रकार वर्तमान चीनी वर्ष में चीनी का प्रारंभिक भंडार 143 लाख टन है। अतः हमारी लगभग सात महीने की खपत के बराबर चीनी पहले ही गोदामों में रखी हुई है। कुछ महीने पहले तक यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति थी जिसको देखते हुए सरकार ने चीनी मिलों को चीनी की जगह एथनॉल बनाने के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए थे।

इस्मा (इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन) के अनुसार देश में इस वर्ष चीनी का उत्पादन पिछले वर्ष के 332 लाख टन के मुकाबले घटकर लगभग 260 लाख टन होने का अनुमान है, जो केवल घरेलू बाज़ार की खपत के लिए ही पर्याप्त होगा। इस गन्ना पेराई सत्र की पहली तिमाही अक्टूबर से दिसंबर 2019 के बीच चीनी का उत्पादन पिछले साल की इस अवधि के मुकाबले 30 प्रतिशत घटकर 78 लाख टन रह गया है। पिछले साल इस अवधि में देश में चीनी का उत्पादन 112 लाख टन था।

2019-20 में विश्व में चीनी का उत्पादन 1756 लाख टन और मांग 1876 लाख टन रहने की संभावना है। यानी उत्पादन मांग से 120 लाख टन कम होने का अनुमान है। इस कारण अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की अच्छी मांग होगी, जिसकी आपूर्ति भारत कर सकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीनी उत्पादन में संभावित कमी से हमारे पहाड़ से चीनी भंडार अचानक अच्छी खबर में बदल गए हैं। उत्तर प्रदेश के चीनी उद्योग का इस स्थिति में सबसे ज्यादा लाभ होगा क्योंकि पिछले साल की तरह इस साल भी चीनी उत्पादन में प्रथम स्थान पर उत्तर प्रदेश ही रहेगा, जहां 120 लाख टन चीनी उत्पादन होने का अनुमान है।

पिछले साल उत्तर प्रदेश के किसानों ने 33,048 करोड़ रुपये मूल्य के गन्ने की आपूर्ति चीनी मिलों में की थी। परन्तु 31 दिसंबर 2019 तक इसमें से 2,163 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान बकाया है। चालू पेराई सत्र में तीन महीने बीतने के बाद भी 31 दिसंबर तक इस सीज़न का केवल 3,492 करोड़ रुपये का गन्ना भुगतान हुआ है, जबकि किसान लगभग 10,500 करोड़ रुपये मूल्य का गन्ना चीनी मिलों को दे चुके हैं। इसके अलावा विलम्बित भुगतान के लिए देय ब्याज़ का आंकड़ा भी 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का है। इस तरह 31 दिसंबर तक उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का चीनी मिलों के ऊपर 11,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का गन्ना भुगतान बकाया है।

इस साल गन्ना मूल्य निर्धारण से पहले उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी हितधारकों से विचार विमर्श किया था। इस बैठक में उत्तर प्रदेश चीनी मिल्स एसोसिएशन ने अपनी खराब आर्थिक स्थिति, चीनी के अत्यधिक उत्पादन और भंडार का डर दिखाकर इस साल भी गन्ने का रेट ना बढ़ाने की मांग रखी थी। किसानों का कहना है कि दो सालों से गन्ने के रेट नहीं बढ़ाये गए हैं जबकि लागत काफी बढ़ गई है। गन्ना शोध संस्थान, शाहजहांपुर के अनुसार गन्ने की औसत उत्पादन लागत लगभग 300 रुपये प्रति क्विंटल आ रही है। सरकार के लागत के डेढ़ गुना मूल्य देने के वायदे को भूल भी जाएं तो भी बदली परिस्थिति में कम से कम 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव मिलना चाहिए था। यदि पिछले तीन सालों में 10 प्रतिशत की मामूली दर से भी वृद्धि की जाती तो भी इस वर्ष 400 रुपये प्रति क्विंटल का भाव अपने आप हो जाता।

वास्तविकता तो यह है कि चीनी मिलें चीनी के सह-उत्पादों जैसे शीरा, खोई (बगास), प्रैसमड़ आदि से भी अच्छी कमाई करती हैं। इसके अलावा सह-उत्पादों से एथनॉल, बायो-फर्टीलाइजर, प्लाईवुड, बिजली व अन्य उत्पाद बनाकर भी बेचती हैं। गन्ना (नियंत्रण) आदेश के अनुसार चीनी मिलों को 14 दिनों के अंदर गन्ना भुगतान कर देना चाहिए। भुगतान में विलम्ब होने पर 15 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देय होता है। परन्तु चीनी मिलें साल-साल भर गन्ना भुगतान नहीं करतीं और किसानों की इस पूंजी का बिना ब्याज दिये इस्तेमाल करती हैं। इस तरह चीनी मिलें अपने बैंकों के ब्याज के खर्चे की बचत भी करती हैं। पिछले दो सालों में सरकार ने चीनी मिलों को चीनी बफर स्टॉक, एथनॉल क्षमता बनाने और बढ़ाने, चीनी निर्यात के लिए कई आर्थिक पैकेज भी दिए हैं। इसके बावजूद भी मिलों ने गन्ने का समय पर भुगतान नहीं किया और न ही सरकार ने गन्ने का भाव बढ़ाया।

महंगाई के प्रभाव और बढ़ती लागत के कारण गन्ने का वास्तविक दाम घट गया है। बदली परिस्थितियों में कम चीनी उत्पादन और अच्छी अंतरराष्ट्रीय मांग को देखते हुए सरकार को लाभकारी गन्ना मूल्य दिलाना सुनिश्चित करना चाहिए था। परन्तु इस स्थिति का सारा लाभ अब चीनी मिलें ही उठाएंगी और किसानों के हाथ मायूसी के अलावा कुछ नहीं लगेगा। सरकार अब भी अलग से बोनस देकर गन्ना किसानों को बदहाली से बचा सकती है।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

गुजरात-राजस्थान में टिड्डियों का आतंक, कीट नियंत्रण जुगाड़ भरोसे

देश के दो बड़े राज्यों में टिड्डी दलों ने आतंक मचा रखा है। पाकिस्तान से आए टिड्डी दल गुजरात और राजस्थान में किसानों की हजारों करोड़ रुपये की फसल तबाह कर चुकी हैं। दोनों राज्यों में किसान सरकार से कीट नियंत्रण की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन कीट नियंत्रण के उपाय जुगाड़ भरोसे हैं। मामले के तूल पकड़ने के बाद गुरुवार को केंद्र सरकार ने टिड्डी नियंत्रण के लिए 11 टीमें गुजरात भेजी हैं। उधर, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने टिड्डी नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार से मदद मांगी है।

किसानों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए प्रशासन भी टिड्डयों से बचाव के तरह-तरह के उपाय आजमा रहा है। खबर है कि गुजरात के बनासकांठा जिले में टिड्डियां भगाने की जिम्मेदारी शिक्षकों को दी गई है।

गुजरात और राजस्थान में पिछले कई महीनों से टिड्डी दलों के हमले जारी है, लेकिन कीट नियंत्रण के सारे प्रयास महज कागजी खानापूर्ति तक सीमित हैं। उत्तरी अफ्रीका से निकलकर सऊदी अरब और पाकिस्तान होते हुए गुजरात और राजस्थान में घुसे टिड्डी दल गुजरात के कच्छ, मेहसाणा, पाटण, और बनासकांठा तक पहुंच चुके हैं। टिड्डियों के आक्रमण की वजह से कपास, गेहूं, सरसों, जीरा समेत कई फसलों को नुकसान हुआ है।

हैरानी की बात है कि गुजरात और राजस्थान में हर साल टिड्डयों हमले में बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान पहुंचता है, इसके बावजूद इससे बचाव का कोई पुख्ता उपाय न तो राज्य सरकारों के पास है और ना ही केंद्र सरकार इसमें कोई खास दिलचस्पी ले रही है। मजबूरी में किसान टिड्डियों को भगाने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। थाली, ढोल और डीजे बजाकर टिड्डीयों को भगाने की कोशिश की जा रही है।

गहलोत में मांगी केंद्र से मदद

टिड्डी दलों के बढ़ते हमले के बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार से मदद मांगी है। उनका कहना है कि टिड्डी नियंत्रण का विषय मुख्यतः भारत सरकार के अधीन है। ऐसे में केन्द्र सरकार इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए राज्य सरकार को अतिरिक्त संसाधन एवं सहयोग उपलब्ध कराए। राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, नागौर, चुरू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और जालौर जिलों में  टिड्डी दलों का प्रकोप है।

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय के फसल सुरक्षा और टिड्डी चेतावनी से जुड़े कई कार्यालय राजस्थान में होने के बावजूद सब मूकदर्शक बने हुए हैं।

 

एमपी में यूरिया के लिए मारामारी, थाने से मिल रहे हैं टोकन

मध्य प्रदेश की जिस चंबल नदी के नाम पर देश की प्रमुख फर्टीलाइजर कंपनी का नाम पड़ा, उसी राज्य में यूरिया के लिए ऐसी मारामारी मची है कि किसानों को पुलिस थाने से टोकन बांटे जा रहे हैं। यूरिया के लिए पुलिस के डंडे खाते किसानों का एक वीडियो भी सामने आया है।

रबी की बुवाई के दौरान यूरिया की किल्लत ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। एक-दो बोरी यूरिया के लिए भी किसानों को सुबह 4-5 बजे से लाइनों में खड़ा होना पड़ रहा है। इसके बावजूद मुश्किल से 2-4 बोरी यूरिया मिल पा रहा है। यह सब उस सरकार कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में हो रहा है जो किसानों के मुद्दों पर सत्ता में आई है।

यूरिया की किल्लत के चलते हरदा, होशंगाबाद, रायसेन, विदिशा, गुना, सागर, नीमच समेत कई जिलों से कालाबाजारी की खबरें भी आने लगी हैं। कहीं 267 रुपये में मिलने वाली  यूरिया की बोरी 350-400 रुपये में मिल रही है तो कहीं किसानों को यूरिया के साथ 1,200 रुपये की डीएपी की बोरी लेने को मजबूर किया जा रहा है। राज्य सरकार और कृषि विभाग की ओर से पर्याप्त यूरिया होने के दावे तो जरूर किए जा रहे हैं मगर जमीन हालात अलग हैं।

इस यूरिया संकट के लिए मांग के अनुरुप आपूर्ति न होने को वजह माना जा रहा है। कई जिलों में अभी तक जरूरत के मुकाबले 50-60 फीसदी यूरिया ही पहुंचा है। जिसके चलते रबी की बुवाई में देरी हो रही है और बुवाई कर चुके किसानों को दुकानदारों से महंगा यूरिया खरीदना पड़ रहा है। इस साल अच्छी बारिश और गेहूं का रकबा बढ़ने की वजह से यूरिया की मांग बढ़ी है। इससे भी यूरिया की किल्लत बढ़ी है।

पिछले साल भी मध्य प्रदेश और राजस्थान में यूरिया को लेकर इसी तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा था। तब विपक्ष में बैठी कांग्रेस ने तत्कालीन भाजपा सरकारों को इस मुद्दे पर खूब घेरा था। अब सरकारें बदल चुकी हैं लेकिन हालत नहीं बदले।

रबी बुवाई के दौरान यूरिया संकट को लेकर किसान संगठनों ने कमलनाथ सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। आम किसान यूनियन के समस्या का समाधान नहीं होने पर आंदोलन की चेतावनी दी है।

भाजपा का किसान मोर्चा राज्य सरकार को इस मुद्दे पर घेरने में जुटा है तो मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष केदार सिरोही ने भी कृषि विभाग पर सवाल खड़े किए हैं। सिरोही का कहना है कि एमपी में यूरिया की किल्लत होती तो 400 रुपये में यूरिया कैसे मिल पा रहा है। यानी कृषि विभाग की नीयत और मैनेजमेंट ठीक नहीं है। विभाग को इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी। यूरिया की लाइनें खत्म होनी चाहिए।

इस यूरिया संकट के पीछे सरकार की बदइंतजामी के अलावा यूरिया की किल्लत के बहाने डीएपी बेचने की फर्टिलाइजर कंपनियों और डीलरों की कारगुजारी का भी बड़ा हाथ माना जा रहा है। पिछले एक सप्ताह में कालाबाजारी करने वाले कई खाद विक्रेताओं पर छापेमारी हुई है।

National Seminar on “Liberating the Farmers from Debt Trap”

The question is how do we revitalize the health of our economy and liberate the farmers from the debt trap. Have we failed on the policy front?

gadkariAccording to 70th round of NSS data for the year 2012-13, majority of the farmers in India do not earn enough even to meet their consumption needs. In years of drought or floods, their condition becomes miserable and desperate. The small and marginal farmers are the most vulnerable in this respect. During the past one and a half decade, about 3 lakh farmers have committed suicide.

The question is how do we revitalize the health of our economy and liberate the farmers from the debt trap. Have we failed on the policy front? What kind of policy reforms are needed to improve the socio-economic conditions of farmers in various regions? What are the key challenges to implement the needed policy reforms? We sincerely feel that there is a need to discuss in an integrated manner, all the relevant issues relating to the present agrarian distress and find out the ways to overcome the challenges.

To initiate a debate on this crucial agricultural policy challenge The Council for Social Development, New Delhi, Centre for Agricultural Policy Dialogue, New Delhi and Swabhimani Shetkari Sanghtana of Maharashtra are jointly organizing a National Seminar on “Liberating the Farmers from Debt Trap: Challenges of Policy Reforms in India” at the India International Centre, Annexe, New Delhi on June 14, 2016.

Participants in the inaugural session of the seminar include Sri. Nitin Gadkari, Union Minister of Surface Transport, Highways and Shipping, Prof. Arvind Panagariya, Vice Chairman, NITI Aayog, Sri. Sanjeev Balyan, Minister of State, Agriculture, Sri. Om Prakash Singh Dhankar, Minister of Agriculture Haryana, Sri. Feroze Varun Gandhi, M.P and Dr. Dalwai, Additional Sec. Ministry of Agriculture, Govt. of India.

About 70 persons including technical experts, Members of Parliament, senior government officials and representatives of NGOs and Farmers’ organisations are expected to participate in the seminar. The seminar will discuss the following issues:

(i) Alternative Models of Income and Social Security for the farmers;
(ii) Challenges of Agricultural Policy Reforms, including Agricultural Price and Market Reforms, Technology, Land Policy, Subsidies, Crop Insurance, Credit Sector Reforms etc.
(iii) Challenges of Climate change – Risk Mitigation and Adaptation Strategies.