कृषि सुधारों को लागू करने से पहले किसानों को भरोसे में लेना जरूरी

कृषि क्षेत्र में मार्केटिंग सुधारों की जरूरत है क्योंकि देश की 50 फीसदी से अधिक आबादी के लिए खेती को फायदेमंद बनाना इन सुधारों के बिना संभव नहीं है। लेकिन सुधारों के लिए संबंधित पक्षों और खासतौर से किसानों की भागीदारी और विचार-विमर्श की लंबी और पारदर्शी प्रक्रिया की जरूरत है। सरकार ने पिछले साल जो कृषि सुधार किये हैं, उनके जरिये किसानों में जो संदेश गया, वह ठीक नहीं था। यही वजह है कि किसान तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ कई महीनों से आंदोलन कर रहे हैं। इसके साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का मुद्दा भी चर्चा का मुख्य बिंदु बन गया है।

किसानों की मांग है कि सभी फसलों के लिए एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी मिलनी चाहिए। किसान को कम से कम उसकी उपज का लागत मूल्य और उस पर उचित मुनाफा तो मिलना ही चाहिए। असल में कृषि बाजार की शर्तें किसानों के लिए प्रतिकूल हैं और उसमें बदलाव किये बिना किसानों और कृषि क्षेत्र की हालत को नहीं सुधारा जा सकता है। इसलिए सरकार को कृषि क्षेत्र के लिए एक व्यापक और समग्र नीति बनानी चाहिए।

ये विचार बिंदु सेंटर फॉर एग्रीकल्चर पॉलिसी (कैप) डायलॉग द्वारा आयोजित एक परिचर्चा में सामने आए। इसमें शिरकत करने वाले लोगों में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व चेयरमैन डॉ. टी. हक, स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक प्रोफेसर अश्विनी महाजन, भारत कृषक समाज के चेयरमैन और पंजाब स्टेट फार्मर्स एंड फार्म वर्कर्स कमीशन के चेयरमैन अजय वीर जाखड़, भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बिश्वजीत धर, काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट (सीएसडी) के डायरेक्टर प्रोफेसर नित्या नंद, जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्य सभा सांसद के.सी. त्यागी, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) के पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. डी.एन. ठाकुर समेत तमाम दूसरे कृषि विशेषज्ञ शामिल थे।

कार्यक्रम की शुरुआत में कैप डायलॉग के चेयरमैन डॉ. टी. हक ने कहा कि देश के मौजूदा कृषि मार्केटिंग सिस्टम की तमाम खामियों को देखते हुए कृषि मार्केटिंग सुधारों की जरूरत महसूस की जाती रही है। नये केंद्रीय कृषि मार्केटिंग सुधार कानूनों का मकसद किसानों को उनके उत्पादों के बेहतर मूल्य दिलाने के लिए बाजार पहुंच बढ़ाने और मौजूदा खामियों को दूर करना रहा है। हालांकि इन कानूनों में सुधार की काफी गुंजाइश है। इसलिए बेहतर होगा कि सरकार को खुद ही सुधारों की जरूरत का संज्ञान लेते हुए इन कानूनों में बदलाव कर दे। सरकार का इस तरह का कदम इस समय देश में चल रहे किसान आंदोलन को समाप्त करने में मददगार साबित होगा। इन सुधारों के तहत देश भर में कृषि उत्पाद मंडी समिति कानून (एपीएमसी) तहत चलने वाली मंडियों और उसके बाहर ट्रेड एरिया दोनों के लिए एक समान नियामक व्यवस्था बनानी चाहिए। इसके साथ ही एक मजबूत नियामक प्रणाली बनाने की जरूरत जो विवाद निस्तारण के लिए प्रभावी साबित हो।

भारत कृषक समाज के चेयरमैन और पंजाब स्टेट फार्मर्स एंड फार्म वर्कर्स कमीशन के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ ने कहा कि हमें कृषि नीतियां बनाने की प्रक्रिया की व्याख्या करने की जरूरत और उसमें व्यापक बदलाव की दरकार है, जिसमें सभी संबंधित पक्षों और खासतौर के किसानों की भागीदारी हो। संबंधित पक्षों की भागीदारी के बिना जो नीतियां बनेंगी उनको हमेशा शक की  निगाह से देखा जाता है। तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का मौजूदा आंदोलन इसी वजह से खड़ा हुआ है क्योंकि इन कानूनों पर किसानों के साथ व्यापक विचार-विमर्श नहीं किया गया। इसके साथ जाखड़ का कहना है कि हमें एमएसपी के मुद्दे पर एक व्यापक विचार-विमर्श शुरू करने की जरूरत है। जिसके केंद्र में इसकी भावी व्यवस्था और किसानों के हितों के टिकाउपन को ध्यान में रखते हुए नीति निर्धारण किया जाए।

स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक प्रोफेसर अश्विनी महाजन ने कहा कि जहां तक नये कानूनों की बात है तो उनके बिना भी और अब उनके आने से भी कोई बड़ा फर्क कृषि और किसानों पर नहीं पड़ रहा है। हमें इस बात पर जोर देने की जरूरत है कि किसानों को उनके उत्पादों का बेहतर दाम कैसे मिले। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को कैसे बेहतर किया जाए। वहीं तकनीक का उपयोग कर किसानों को कैसे बेहतर दाम सुनिश्चित किया जा सकता है। इसके लिए बीमा, तनीक और वेयरहाउस रसीद जैसे विकल्पों पर गौर करना चाहिए। जिस तरह से स्टॉक मार्केट में शेयरों पर अपर और लोअर सर्किट लगता है क्या इस तरह की व्यवस्था कृषि उत्पादों के मामले में लागू नहीं हो सकती है। उन्होंने कहा कि हर तरफ तकनीक की बात हो रही है लेकिन तीनों नये कृषि कानूनों में कहीं भी टेक्नोलॉजी का जिक्र नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही का कहना था कि मौजूदा किसान आंदोलन पिछले लंबे समय से किसानों के वित्तीय संकट में फंसे होने और व्यापार की शर्तों के कृषि के प्रतिकूल होने के कारण किसानों की बढ़ती तकलीफ का नतीजा है। इसलिए  सरकार को किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी देने के साथ ही इसे तय करने के लिए लागत पर 50 फीसदी मुनाफे को शामिल करना चाहिए। ऐसा करने से ही मौजूदा किसान आंदोलन का हल निकल सकता है।

प्रोफेसर बिश्वजीत धर ने कहा कि दुनिया के तमाम देश और खासतौर से अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के देश किसानों की वित्तीय मदद करते हैं। भारत जैसे देश में जहां 50 फीसदी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है वहां और अधिक मदद की जरूरत है। केवल मार्केटिंग सुधारों से किसानों के संकट का हल नहीं है और यह समस्या के केवल एक हिस्से को छूता है। हमें एक समग्र और व्यापक कृषि नीति की जरूरत और उसी के अनुरूप सुधारों को लागू किया जाना चाहिए। अमेरिका जैसे देश में हर चार साल में 500 पेज के दस्तावेज के रूप में कृषि नीति आती है जबकि वहां केवल दो फीसदी आबादी ही खेती पर निर्भर करती है। ऐसे में हमें इसकी कितनी जरूरत है उसे समझा जा सकता है।

डॉ डी.एन. ठाकुर ने किसानों के संगठन खड़े कर उनको मजबूत करने पर जोर देतु हुए कहा कि देश में कृषि क्षेत्र और किसानों के संकट को हल करने का यह सबसे बेहतर विकल्प है। हमें स्वायत्त सहकारी समितियों के गठन को बढ़ावा देना चाहिए जो संगठित रूप में किसानों के लिए मार्केट हासिल करने और उनके उत्पादों के बेहतर दाम सुनिश्चित करने का कारगर तरीका है। इन संगठनों को किसी भी रूप में सरकार और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होना चाहिए और इनका संचालन कुशल पेशेवरों के जरिये होना चाहिए।

रुरल वॉयस के संपादक हरवीर सिंह ने कहा कि किसानों को उनके उत्पादों के एमएसपी की कानूनी गारंटी मिलनी चाहिए और इसके लिए कारपेरेट जगत को भी आगे आना चाहिए। खाद्य उत्पादों का कारोबार करने वाली कंपनियों को उपभोक्ता मूल्य का बड़ा हिस्सा किसानों के साथ साझा करना चाहिए। डेयरी क्षेत्र में काम करने वाली सहकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियां उपभोक्ता मूल्य का 70 फीसदी तक की हिस्सेदारी किसानो के साथ साझा करती हैं। यह काम दूसरी खाद्य उत्पाद कंपनियां क्यों नहीं कर सकती हैं, यह खुद एक बड़ा सवाल है।

हरवीर सिंह का कहना था कि किसानों को एमएसपी का गारंटी का मतलब यह नहीं कि सरकार को अपने संसाधनों के जरिये खुद बाजार में आने वाले सरप्लस कृषि उत्पादों को खरीदना होगा। इस धारणा को बदलने की जरूरत है क्योंकि खाद्य उत्पादों के बड़े हिस्से पर निजी कारोबार का कब्जा है और उसे बाजार में अपनी भागीदारी बढ़ानी होगी। कृषि को मुनाफे में लाने की नीतियों पर काम करने की जरूरत है। ऐसा होने से अर्थव्यस्था के दूसरे क्षेत्रों को भी फायदा होगा क्योंकि कृषि  क्षेत्र खुद में एक बड़ा बाजार है तो दूसरे क्षेत्रों की वृद्धि दर को बढ़ाने का काम करता है। इसके एक व्यवहारिक और समग्र कृषि नीति बनाकर उसे अमल में लाने की जरूरत है। केवल मार्केटिंग सुधारों को लागू करने से कृषि संकट को हल करना संभव नहीं है।

किसानों के लिए क्यों जरूरी है एमएसपी की गारंटी

भारत में तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की लेकर एक तरफ ऐतिहासिक किसान आंदोलन चल रहा है वहीं एमएसपी पर खरीफ फसलों की खरीद भी जारी है। यह किसान आंदोलन का ही असर है कि खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय और कृषि मंत्रालय रोज धान और अन्य फसलों की खरीद के आंकड़े जारी करते हुए एक जताने का दावा कर रहा है कि सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि एमएसपी पर खरीद के प्रति कितनी गंभीर है।  

खैर तीनों कानूनों के लागू होने के बाद सरकार खरीफ 2020-21 में रिकार्ड खरीद का दावा कर रही है। किसान आंदोलन का यह असर है कि मौजूदा खरीद के आंकड़े रोज सरकार जारी कर रही है। एमएसपी पर धान 23 राज्यों में और गेहूं 10 राज्यों में खरीदा जाता है। इस बार सरकारी मंशा 156 लाख से अधिक किसानों से 738 लाख टन तक धान खरीदने की है जिस पर 1.40 लाख करोड़ रुपए व्यय होगे। पिछले साल 627 लाख टन धान खरीदी हुई थी। इस बार 125 लाख गांठ कपास की खरीद का लक्ष्य भी सरकार ने रखा है जिस पर 35,500 करोड़ रुपए व्यय होगा। धान खरीदी के लिए इस बार देश भर में करीब 40 हजार केंद्र खोले गए हैं। फिर भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की बुरी दशा है जहां पखवारे तक भाग दौड़ के बाद भी तमाम किसान अपना धान नहीं बेंच पा रहे हैं और मजबूरी में एक हजार से 1200 रुपए में व्यापारियों को बेच रहे हैं। जबकि धान का एमएसपी 1868 रुपए कामन और 1888 रुपए प्रति कुंतल ए ग्रेड का है। 

सरकार एमएसपी पर देश भर में 15 दिसंबर तक करीब 391 लाख टन धान की खरीदी कर चुकी है। यह पिछले साल इसी अवधि की गयी 319 लाख टन से 22.41 फीसदी ज्यादा है। खरीद में भी सबसे अधिक 202 लाख टन से अधिक का योजना पंजाब का है जो करीब 52 फीसदी का बैठता है। 22 नवंबर तक पंजाब का योगदान करीब 70 फीसदी तक था। अब तक खरीफ में 73,781 करोड़ रुपये से अधिक का धान किसानों से खरीदा गया है और इससे 44.32 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं। वही 52.40 करोड़ रुपये एमएसपी मूल्य पर 5089 टन खोपरा खरीद से कर्नाटक और तमिलनाडु के 3,961 किसानों को फायदा हुआ। धान के बाद सबसे अधिक 10.01 लाख किसानों को एमएसपी पर कपास बेचने से हुआ। कपास खरीद पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और कर्नाटक राज्यों में जारी है और अब तक 14,894 करोड़ रुपये से अधिक दाम पर 5179479  गांठ कपास खरीदी गयी है। 

पंजाब में सबसे अधिक खरीद की वजह व्यवस्थित तैयारी और मंडियां भी हैं। लेकिन इसी साल देश मे पंजाब से भी अधिक और 129.42 लाख टन गेहूं मध्य प्रदेश ने खरीदा, जबकि उत्तर प्रदेश केवल 35.77 लाख टन खरीदी के साथ चौथे नंबर पर रहा। एमएसपी पर खरीद को लेकर कई राज्यों में दिक्कतें हैं। इसी साल के आरंभ में आंध्र प्रदेश में धान किसानों की समस्याओं को लेकर उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडु को कृषि मंत्री और खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्री से हस्तक्षेप करना पड़ा था। बाद में 2 मार्च 2020 को खाद्य मंत्रालय और एफसीआई के अधिकारियों ने उपराष्ट्रपति से मुलाकात कर धान किसानों से समय पर खरीदारी न होने और समय पर भुगतान के मसले पर सफाई दी और समाधान के लिए जल्दी कार्रवाई करने औऱ राज्य सरकार को बकाया राशि का तुरन्‍त भुगतान करने की बात कही।

इस समय चल रहा देशव्यापी किसान आंदोलन तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने के साथ एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी भी मांग रहा है। किसानों की एमएसपी की मांग को राष्ट्रव्यापी समर्थन मिलते देख भारत सरकार के कई मंत्री एक स्वर में एमएसपी पर खरीद जारी रखने की बात किसान संगठनों को लिख कर देने को तैयार है। लेकिन किसान चाहते हैं कि सरकार ऐसा कानून बनाए जिससे कोई भी उनके उत्पाद को एमएसपी से नीचे न खरीद सके। उसके लिए दंड की व्यवस्था हो। अभी एमएसपी पर खरीद दो दर्जन फसलों तक सीमित है। लेकिन गेहूं औऱ धान को छोड़ दें तो अधिकतर फसलों की खरीद दयनीय दशा में है। और ऐसा नहीं है कि मौजूदा किसान आंदोंलन में ही एमएसपी पर खरीद की चर्चा हो रही है। बीती एक सदी से किसान आंदोलनों के केंद्र में कृषि मूल्य नीति या वाजिब दाम शामिल रहा है। 

भारतीय किसान यूनियन के नेता स्व. महेंद्र सिंह टिकैत अपने जीवनकाल में कृषि उत्पादों के मूल्य 1967 को आधार वर्ष पर तय करने की मांग करते रहे। सारे प्रमुख किसान संगठन भी इस मांग से सहमत थे। अस्सी के दशक के बाद कोई ऐसा  किसान आंदोलन नहीं हुआ जिसमें फसलों का वाजिब दाम न शामिल रहा हो। खुद संसद, संसदीय समितियों और विधान सभाओं में इस पर व्यापक चर्चाएं हुई हैं। किसान संगठन चाहते हैं कि उनका उत्पाद सरकार खरीदे या निजी क्षेत्र लेकिन सही दाम मिलेगा तो उनके जीवन स्तर पर असर पड़ेगा और देश की अर्थव्यवस्था पर भी।

भारत के किसानों ने कठिन चुनौतियों और अपनी मेहनत से कम उत्पादकता के बावजूद भारत को चीन के बाद सबसे बडा फल औऱ सब्जी उत्पादक बना दिया है। चीन और अमेरिका के बाद सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक देश भारत ही है। पांच दशको में हमारा गेहूं उत्पादन 9 गुना और धान उत्पादन पांच गुणा से ज्यादा बढ़ा है। लेकिन खेती की लागत भी लगातार बढी है, जबकि उनके उत्पादों के दाम नहीं मिलते। जैसे ही किसान की फसल कटने वाली होती है, दाम गिरने लगते हैं। मौजूदा तीन कृषि कानूनो के बाद अगर एमएसपी की गारंटी बिना किसान बाजार के हवाले हो गया तो बड़े कारोबारी किसानों और उपभोक्ताओं दोनों की क्या दशा करेंगे, यह बात किसान समझ रहा है। 

सरकारी स्तर पर यह दावा हो रहा है कि पीएम-किसान सम्मान निधि जैसी योजना जो सरकार शुरू कर सकती है वह किसानों का अहित कैसे कर सकती है। भूमि जोतों के आधार पर साढे 14 करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि के दायरे में लाने की बात सरकार ने की थी लेकिन अब तक 10 करोड़ किसानों के खाते में सरकार ने एक लाख करोड़ रूपये पहुंचाया है। किसानों के इस आंकड़े के हिसाब से एमएसपी पर सरकारी खरीद को देखेंगे तो पता चलेगा कि कितने कम किसानो से एमएसपी पर उनकी उपज खरीदी जाती है। सरकारी एकाधिकार के दौर में अगर एमएसपी पर खरीद चंद राज्यों और दो फसलों तक सीमित है तो निजी क्षेत्र के दबदबे के बाद बिना गारंटी के किसान की क्या हालत होगी। 

संसद के मानसून सत्र में भी यह विषय उठा था तो कृषि मंत्री नरेन्द्र  सिंह तोमर ने दावा किया था कि अब किसानों को उपज बेचने के प्रतिबंधों से मुक्ति के साथ अधिक विकल्प मिलेगा। कृषि मंडियों के बाहर एमएसपी से ऊंचे दामों पर खरीद होगी। उसी दौरान सांसदों ने मांग की थी कि विधेयक में यह गारंटी शामिल की जाये कि जो कारोबारी मंडियों से बाहर एमएसपी से कम दाम पर खरीदेगा वह दंडित होगा। लेकिन सरकार ने इसे नजरंदाज किया। जिससे किसानों के मन में संदेह का और बीजारोपण हुआ। यही नहीं हाल में हरियाणा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने राज्यों में अनाज बिक्री के लिए आने वाले दूसरे राज्यों के किसानों को रोकने और दंडित करने की बात तक की। अगर किसान अपनी मर्जी का मालिक है तो ऐसे बंधन क्यों। 

सरकार ने इसी साल खरीफ में मूल्य समर्थन योजना  के तहत 48.11 लाख टन दलहन और तिलहन की खरीद को मंजूरी दी। लेकिन 15 दिसंबर 2020 तक 1.72 लाख टन से अधिक दलहन खरीद हुई जिसका एमएसपी मूल्य 924.06 करोड़ रुपये है। इस खरीद से तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और राजस्थान के 96,028 किसानों को लाभ मिला। दलहन और तिलहन खरीद को बढ़ावा देने के लिए 2018 में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान के तहत खास तवज्जो दी गयी। लेकिन इसके दिशानिर्देशों में उत्पादित 75 फीसदी फसल खरीद के दायरे से बाहर कर दी गयी। 2020-21 में राजस्थान में कुल 22.07 चना की खरीद हुई जबकि उपचुनावों के नाते मध्य प्रदेश में 27 फीसदी तक चना खरीदी हुई। मूंग खरीद न होने के कारण राजस्थान के किसानों को करीब 98 करोड़ का घाटा उठाना पड़ा। इसे लेकर किसानों ने आंदोलन भी किया और किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट ने केंद्र सरकार को पत्र लिख कर गुहार भी लगायी लेकिन हालत नहीं सुधरी। 

कोरोना संकट में खाद्य सुरक्षा के हित में किसानों ने खरीफ बुवाई का क्षेत्र 316 लाख हेक्टेयर तक पहुंचा दिया जो पिछले पांच सालों के दौरान औसतन 187 लाख हेक्टेयर था। लेकिन एमएसपी में आशाजनक बढोत्तरी नहीं की गयी। भारतीय किसान यूनियन ने खरीफ एमएसपी घोषणा के साथ ही यह कहते हुए विरोध जताया था कि पिछले पांच वर्षों में इसकी सबसे कम मूल्य वृद्धि रही। धान का एमएससी 2016-17 में 4.3 फीसदी, 2017-18 में 5.4, 2018-19 में 12.9 और 2019-20 में 3.71 फीसदी बढ़ा था जबकि 2020-21 में सबसे कम 2.92 फीसदी बढ़ा। 

कृषि मूल्य नीति और मंडियो को लेकर किसानों को तमाम शिकायतें है।  मोदी सरकार ने स्वामिनाथन आयोग की सिफारिश के तहत एमएसपी तय करने का वादा किया था। लेकिन इसे आधा अधूरा माना गया। तमाम कमजोरियों के बाद भी सरकारी मंडियां बाजार की तुलना में किसानों के हितों की अधिक रक्षा करती हैं। अगर यह व्यवस्था भी अर्थहीन हो गयीं तो उत्तर भारत का किसान अपना गेहूं या चावल हैदराबाद या भुवनेश्वर के बाजार में बेचने कैसे जाएगा। यह काम बड़ा कारोबारी ही करेगा। बेशक किसान के पास कई विकल्प होने चाहिए। लेकिन यह छोटे किसानों के संदर्भ में 22 हजार ग्रामीण मंडियों या हाट बाजार के विकास से निकल सकते हैं। अधिकतर छोटे किसान अपने गांव में ही छोटे व्यापारियों को उपज बेचते हैं, जिस पर कोई रोक नहीं है। रोक इस पर लगनी चाहिए कि सरकार जो एमएसपी घोषित करती है बाजार में इससे कम में कोई कारोबारी न खरीदे। औद्योगिक औऱ दूसरे उत्पादों को अधिकतम कीमत वसूलने का लाइसेंस देने वाली सरकार किसानों को न्यूनतम मूल्य की गारंटी क्यों नहीं दे सकती।

राज्य सभा में 19 जुलाई, 2019 को गैर-सरकारी सदस्यों के संकल्प के तहत सांसद और भाजपा किसान मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय पाल सिंह तोमर ने किसानों की समस्याओं के समाधान के लिए संवैधानिक दर्जे वाले एक राष्ट्रीय किसान आयोग की स्थापना की मांग की थी जिसे व्यापक समर्थन मिला। उनका कहना था कि सरकार यह सुनिश्चित करे कि फसलों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर खरीदा या बेचा न जाए और इसका उल्लंघन करने पर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। लेकिन अब यह मांग किसान आंदोलन की व्यापक मांग बन गयी है। जमीनी हकीकत यही है कि अगर इस व्यवस्था में किसानो के लिए एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी नहीं दी गयी तो सुधार किसानों को गहरी खाई में धकेल देंगे।