MSP से 700–800 रुपये कम में बिक रही फसल, जीरो इंपोर्ट ड्यूटी से बढ़ी किसानों की मुश्किलें!

 

देशभर में कपास किसानों की परेशानियाँ लगातार बढ़ रही हैं. मंडियों में कपास के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से 700–800 रुपये प्रति क्विंटल तक नीचे गिर गए हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है. वहीं, सरकार द्वारा कपास पर आयात शुल्क को शून्य करने के फैसले ने संकट को और गहरा दिया है. किसान और विशेषज्ञ दोनों मानते हैं कि विदेशी कपास सस्ता होने से घरेलू बाजार पर सीधा दबाव बढ़ा है.

मध्य-रेशे वाली कपास के लिए चालू सीजन में MSP 7,710 रुपये प्रति क्विंटल तय है, लेकिन कई प्रमुख मंडियों में इसका भाव करीब 6,988 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास दर्ज किया गया. किसानों का कहना है कि MSP से नीचे खरीद होने के कारण उत्पादन लागत निकालना भी मुश्किल हो रहा है.

सरकार द्वारा कपास पर इंपोर्ट ड्यूटी 0% कर देने के बाद घरेलू मिलों और व्यापारियों को विदेशी कपास सस्ते दामों पर मिल रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे स्थानीय कपास की मांग घट रही है और मंडियों में कीमतें लगातार दबाव में हैं. रिपोर्टों के अनुसार चालू वर्ष 2024–25 में कपास आयात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिसने किसानों की स्थिति को और कमजोर कर दिया है.

मौसम में उतार-चढ़ाव, कीट प्रकोप और फाइबर गुणवत्ता घटने से बड़ी मात्रा में कपास मानकों पर खरी नहीं उतर पा रही. ऐसे में किसानों की MSP पर फसल नहीं खरीदी जा रही है. घटते दाम और बढ़ती अनिश्चितता देख कई किसान दलहन व तिलहन जैसी फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में देश में कपास उत्पादन क्षमता पर बड़ा असर पड़ सकता है.

टेक्सटाइल मंत्रालय का कहना है कि MSP व्यवस्था किसानों को लाभ देने के उद्देश्य से बनाई गई है और CCI जरूरत के अनुसार खरीद सुनिश्चित करता है. मंत्रालय का मत है कि आयात शुल्क हटाने का निर्णय उद्योग की कच्चे माल की जरूरत और वैश्विक कीमतों को देखते हुए लिया गया है. हालांकि, जमीनी स्तर पर किसान MSP का पूर्ण लाभ नहीं उठा पाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं.

किसान संगठनों ने सरकार से मांग की है कि कपास पर आयात शुल्क वापस लागू किया जाए, CCI को FAQ मानकों में अस्थायी छूट दी जाए और मंडियों में MSP पर खरीद को अधिक प्रभावी बनाया जाए. वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि जल्द निर्णायक कदम नहीं उठाए गए तो कपास की मंडी कीमतें और नीचे जा सकती हैं, जिससे किसानों की आय पर बड़ा असर पड़ेगा और उत्पादन में गिरावट देखने को मिल सकती है.