मुख्यमंत्री निवास का घेराव करने पहुंच रहे हजारों किसान!

किसान आए दिन अपनी मांगों को लेकर प्रदेश के अलग अलग हिस्सों में सक्रिय दिखाए देते हैं आज भी हजारों की संख्या में किसान सीएम निवास का घेराव करने के लिए पंचकूला में जुटे. किसान जुमला मालिकान, देह शामलात और पट्टी शामलात जमीनों के अधिग्रहण के नये नियम को रद्द करने, नारायणगढ़ चीनी मील के गन्ना किसानों के 62 करोड़ बकाया का भुगतान करने, धान की फसल में बौनेपन की बीमारी के कारण हुए नुकसान के मुआवजे और लंपी वायरस बीमारी के कारण पशुपालकों के नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजे की मांग को लेकर मुख्यमंत्री आवास घेरने पहुंचे.

किसान संगठन बीकेयू शहीद भगत सिंह की अगुवाई में अंबाला और आस-पास के हजारों किसान अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने के लिए जुटे हैं. किसान संगठन बीकेयू शहीद भगत सिंह के नेता अमरजीत मोहरी ने बताया कि धान में बौनेपन की वजह से किसानों का बारी नुकसान हुआ है. फसल नुकसान के मुआवजे की मांग, जुमला मालिकान, देह शामलात जमीनों के अधिग्रहण को रद्द करने और गन्ना किसानों के 62 करोड़ बकाया राशि के भुगतान के लिए मुख्यमंत्री आवास का घेराव किया जाएगा.

किसानों ने बीजेपी सांसद को घेरा, फसल के मुआवजे की रखी मांग!

आदमपुर, बालसमंद और खीरी चोपटा के किसानों ने आज आदमपुर के पीडब्ल्यूडी रेस्ट हाउस में हिसार से बीजेपी सांसद बृजेंद्र सिंह का विरोध किया. किसानों ने बीजेपी सांसद को काले झंडे दिखाते हुए नारेबाजी भी की. किसान आदमपुर के तहसील कार्यालय में पिछले तीन महीने से कपास की फसल के नुकसान के मुआवजे की मांग को लकेर धरना दे रहे हैं.

धरना दे रहे किसानों ने बीजेपी सांसद बृजेंद्र सिंह से शिकायत की कि सरकार ने उन्हें 2020 और 2021 में खराब हुई कपास की फसल के नुकसान का मुआवजा नहीं दिया है. वहीं एक किसान नेता ने सांसद को बताया कि किसान पिछले तीन साल से खरीफ सीजन की फसल में नुकसान झेल रहे हैं लेकिन सरकार की ओर से किसानों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया है.

किसानों ने सासंद से शिकायत करते हुए कहा कि सरकार ने 2020 के लिए मुआवजे को मंजूरी दी थी, लेकिन यह आज तक किसानों को नहीं दिया गया है. हमें पिछले तीन साल का मुआवजा मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही और इस साल फिर से जिले के कई हिस्सों में ज्यादा जलभराव के कारण कपास को भारी नुकसान हुआ है. किसानों ने कहा कि उन्होंने मुआवजे के भुगतान को लेकर कृषि मंत्री जेपी दलाल समेत अन्य नेताओं से भी मुलाकात की है लेकिन कोई समाधान नहीं हुआ.

वहीं किसानों से घिरे सांसद ने कहा कि उन्होंने पहले भी राज्य सरकार के समक्ष किसानों की मांग उठाई थी और आगे भी उठाउंगा.

मोटे अनाज की सरकारी खरीद के पीछे क्या है सरकार की मंशा?

जलवायु परिवर्तन के कारण गेहूं और चावल के उत्पादन में कमी आ रही है, इसलिए मोटे अनाज की खरीद पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए. यह बात किसी जलवायु वैज्ञानिक ने नहीं कही है, बल्कि केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (डीएफपीडी) के सचिव सुधांशु पांडे ने कही है.

इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार को आभास हो चुका है कि आने वाले दिनों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) के तहत गरीबों को दिए जाने वाले सस्ते राशन के लिए केवल गेहूं और चावल पर निर्भर नहीं रहा जा सकता और इसका विकल्प तलाशना होगा.

रबी सीजन में गेहूं के उत्पादन में कमी और निर्यात की छूट देने के कारण देश में गेहूं का संकट खड़ा हो गया है. हालांकि 21 अगस्त 2022 को डीएफपीडी की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए देश में गेहूं का पर्याप्त भंडार है.

उधर उधर खाद्य नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा का कहना है कि सवाल केवल गेहूं-धान के कम उत्पादन का नहीं है, बल्कि सवाल सस्टनेबल एग्रीकल्चर प्रेक्टिस (सतत कृषि अभ्यास) से जुड़ा है. यह जरूरी हो गया है कि देश सतत कृषि प्रणाली को अपनाए इसके लिए मोटे अनाज को बढ़ावा देना होगा.

खाद्य सचिव ने क्या कहा?

दरअसल, 30 अगस्त 2022 को डीएफपीडी की ओर से आगामी खरीफ विपणन सीजन (केएमएस) 2022-23 की खरीफ फसल के लिए खरीद प्रबंधों पर चर्चा करने के लिए बैठक बुलाई गई थी. इसमें राज्यों के खाद्य सचिव और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अधिकारी उपस्थित थे.

हालांकि बैठक में तय हुआ कि खरीफ मार्केटिंग सीजन 2022-23 के दौरान 518 लाख मीट्रिक टन चावल की खरीद की जाएगी। पिछले खरीफ मार्केटिंग सीजन 2021-22 के दौरान 509.82 लाख मीट्रिक चावल की खरीद की गई थी.

लेकिन यह मुद्दा उठा कि रबी मार्केटिंग सीजन 2022-23 में गेहूं की खरीद तय लक्ष्य से बहुत कम रही थी, इसलिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि आगामी खरीफ सीजन में चावल की खरीद पर भी असर पड़ सकता है. कुछ राज्यों ने प्रस्ताव रखा कि आगामी खरीफ मार्केटिंग सीजन में मोटे अनाज की खरीद की जाए.

इसके बाद तय हुआ कि आगामी खरीफ सीजन में 13.70 लाख मीट्रिक टन मोटा अनाज (सुपर फूड) खरीदा जाएगा. जबकि अब तक की कुल खरीद 6.30 लाख मीट्रिक टन है. यानी कि मोटा अनाज की खरीद के लक्ष्य में दोगुना से ज्यादा वृद्धि की गई है.

भारतीय खाद्य निगम के आंकड़ों के मुताबिक 31 जुलाई 2022 तक जिन राज्यों में मोटा अनाज खरीदा है, उनमें सबसे ज्यादा कर्नाटक में है. यहां 5.09 लाख टन मोटा अनाज खरीदा गया, इसके अलावा मध्यप्रदेश में 38 हजार, महाराष्ट्र में 41 हजार, ओडिशा में 32 हजार, गुजरात में आठ हजार और उत्तर प्रदेश में केवल तीन हजार टन मोटे अनाज की सरकारी खरीद हुई. हालांकि राज्यवार मोटे अनाज की खरीद का लक्ष्य क्या होगा, यह बाद में तय होगा.

दरअसल, चालू मानसून सीजन 2022 के दौरान बारिश की घोर अनियमितता ने भी खरीफ सीजन को लेकर सरकार की चिंता बढ़ा दी है. क्योंकि चालू खरीफ सीजन में धान और दालों की बुआई बेहद प्रभावित हुई है.

कृषि मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 26 अगस्त 2022 को समाप्त सप्ताह तक देश में 367.55 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई है तो पिछले साल 2021 के मुकाबले 23.45 लाख हेक्टेयर कम है. वहीं इस साल 127.71 लाख हेक्टेयर में दलहन की बुआई हुई है, जबकि पिछले साल 134.37 लाख हेक्टेयर (6.66 लाख हेक्टेयर कम) में दलहन की बुआई हो चुकी थी.

इस साल अब तक तिलहन की बुआई भी थोड़ी कम हुई है, लेकिन मोटे अनाज की बुआई में वृद्धि हुई है. इस साल 176.33 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाज की बुआई हुई है, जो पिछले साल 169.39 लाख हेक्टेयर थी। यानी कि मोटे अनाज की 6.94 लाख हेक्टेयर अधिक बुआई हुई है। सबसे अधिक बाजरे का रकबा बढ़ा है.

पिछले साल 63.19 लाख हेक्टेयर में बाजरा लगाया गया था, लेकिन इस बार 70.12 लाख हेक्टेयर में बाजरा लगाया जा चुका है, जबकि बाजरे का सामान्य रकबा 73.43 लाख हेक्टेयर है. मक्के के रकबे में भी थोड़ी बहुत वृद्धि हुई है. पिछले साल 79.06 लाख हेक्टेयर में मक्का लगाया गया था, जबकि इस साल 80.85 लाख हेक्टेयर में मक्का लगाया जा चुका है.

ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में राज्य सरकारें गेहूं-चावल की बजाय सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत मोटे अनाज का वितरण बढ़ाया जा सकता है. जुलाई 2022 में ऐसा एक प्रयास हो भी चुका है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत कर्नाटक को चावल की जगह 1.13 लाख टन मोटे अनाज का आवंटन किया गया है.

इससे पहले कर्नाटक में 67,019 टन और मध्य प्रदेश में 14,500 टन मोटा एनएफएसए के तहत मोटे अनाज का आवंटन किया गया था.

क्या किसानों को होगा फायदा

लेकिन सरकार के इस फैसले से क्या मोटा अनाज उगाने वाले किसानों को फायदा होगा? देविंदर शर्मा कहते हैं कि यह एक बड़ा सवाल है. शर्मा कहते हैं कि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी राज्यों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर मोटे अनाज की खरीद हो, ताकि मोटा अनाज उगाने वाले किसान को उचित दाम मिल सके.

शर्मा सुझाव देते हैं कि सरकार को फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (एफपीओ) के लिए यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि वे एमएसपी पर ही खरीददारी करें.

कितना होता है उत्पादन

अभी देश में लगभग 50 मिलियन (500 लाख टन ) मोटे अनाज का उत्पादन होता है. सबसे अधिक मक्का और फिर बाजरे का उत्पादन होता है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय का 2012-22 का चौथा अग्रिम अनुमान बताता है कि इस साल 9.62 मिलियन टन बाजरे का उत्पादन हो सकता है, जबकि पिछले साल 10.50 मिलियन टन बाजरे का उत्पादन हुआ था. चालू खरीफ सीजन की बुआई के उत्पादन का अनुमान बाद में आएगा. मक्के के उत्पादन में वृद्धि का अनुमान जताया गया है. पिछले साल 30.90 मिलियन टन मक्के का उत्पादन हुआ था, जबकि चौथे अग्रिम अनुमान में 33.62 मिलियन टन उत्पादन का अनुमान है.

साभार- डाउन-टू-अर्थ

सेब किसानों के आंदोलन के बीच अडानी ने फिर घटाए सेब के दाम!

एक ओर सेब किसान और बागवान सेब की कम कीमत मिलने के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं. वहीं इस बीच अडानी की कंपनी एग्रोफ्रेस ने एक बार फिर सेब के दाम घटा दिए हैं. इस बार सेब के दाम में 2 रुपए प्रतिकिलो की कमी की गई है. पिछले एक माह से सेब बागवान विभिन्न मुद्दों को लेकर आंदोलनरत हैं. पहले बागवानों ने जीएसटी की दरों और पैकेजिंग मेटेरियल में बढ़ोतरी को लेकर सरकार के खिलाफ सचिवालय का घेराव किया था. इसके बाद बागवानों ने जेल भरो आंदोलन किया और उनपर एफआईआर तक भी हुई. इन सबके बीच में सरकार ने बागवानों के आंदोलन को देखते हुए सेब के दामों को तय करने के लिए एक हाई पावर कमेटी का गठन किया, लेकिन प्रदेश में सेब बागवानी से जुड़ी बड़ी कंपनी अडानी ने हाईपावर कमेटी के गठन वाले दिन ही सेब खरीद के दाम जारी कर दिए थे.

हिमाचल प्रदेश के किसान अलग-अलग मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. कंपनी की ओर से जारी ताजा दामों में ईईएस (एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा स्माल) श्रेणी के सेब का खरीद मूल्य 60 रुपये से घटाकर 58 रुपये प्रतिकिलो हो गया है. वहीं मंडियों में सेब के दाम 200 से 300 रुपये प्रति पेटी कम हुए हैं. कंपनियों की ओर से सेब के दाम मे गिरावट का कारण खराब मौसम बताया जा रहा है. सेब कीमतों में बढ़ोतरी की मांग के लिए आंदोलनरत संयुक्त किसान मंच ने दाम घटाने के फैसले पर नाराजगी जताई है.

पिछले हफ्ते शिमला फल मंडी में सेब का प्रति पेटी औसत रेट 1400 से 2000 रुपए था. इस हफ्ते के आखिर में दाम घटकर 1100 से 1800 रुपये पहुंच गए हैं. सेब की एक पेटी में 25 किलो सेब आता है. दूसरी ओर अदाणी कंपनी इससे पहले ईएल (एक्सट्रा लार्ज) और पित्तू (ग्रेड से छोटा आकार) के सेब का दाम भी दो रुपए प्रतिकिलो कम कर चुकी है. अदाणी कंपनी ने इस महीने 15 अगस्त से अपने तीन कंट्रोल्ड एटमोसफेयर स्टोरों पर सेब खरीद शुरू की थी. जिसके खिलाफ किसान आंदोलन कर रहे हैं.

शुरुआत में कंपनी ने एक्स्ट्रा लार्ज सेब के 52 रुपये, लार्ज मीडियम स्माल के 76, एक्स्ट्रा स्माल के 68, एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा स्माल के 60 और पित्तू सेब के 52 रुपये प्रतिकिलो खरीद दाम तय किए थे. एक हफ्ते बाद कंपनी ने एक्स्ट्रा लार्ज और पित्तू आकार के सेब के रेट 52 से घटाकर 50 कर दिए. अब एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा स्माल श्रेणी के सेब के दामों में भी दो रुपये की कटौती कर दी है. सेब के दामों मे कटौती से आदोलन कर रहे किसान बहुत रोष में है.

हरियाणा: मंत्रियों के घर के बाहर किसानों का प्रदर्शन!

किसान प्रदेशभर में ‘किसान देह शामलात और जुमला मालकाल भूमि के इंतकाल तोड़ने के आदेश के खिलाफ दो दिवसीय धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. देह शामलात व जुमला मालकन भूमि किसानों से छीनने के आदेश को वापस करवाने के लिए मंत्रियों के घरों के बाहर किसान पंचायत जारी रहेगी. इस बीच किसान करनाल में मुख्यमंत्री मनोहर लाल के आवास के बाहर प्रदर्शन करने के लिए पहुंच गए. किसानों को सीेएम आवास तक पहुंचने से पहले रोकने के लिए पुलिस द्वारा भारी बैरिकेंडिंग की गई है किसानों ने सीएम आवास के पास धरना दिया है.

किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने पंचायत की सारी व्यवस्था व खाने पीने का सारा इंतजाम मंत्रियों के जिम्मे लगाया था और मंत्रीयों की ओर से ऐसा न करने पर धरना बढ़ाने की भी चेतावनी दी है. ठीक ऐसे ही पंचकूला में हरियाणा विधानसभा स्पीकर ज्ञानचंद गुप्ता के घर के बाहर खुद किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी किसानों के साथ प्रदर्शन करते नजर आये. किसान जब विधानसभा स्पीकर के घर के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे तो स्पीकर किसानों के आने की सूचना मिलते ही बाहर निकल चुके थे.

भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा, “मुख्यमंत्री ने विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान कहा था कि किसानों की जमीन के इंतकाल बदले जाएंगे और मलकियत नहीं बदली जाएगी, लेकिन अगर इंतकाल बदल जाता है तो किसान न तो जमीन को बेच सकता है न ही रहन कर सकता है और न ही बच्चों के नाम ट्रांसफर कर सकता है. उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने बुर्दी बरामदगी की जमीन को लेकर भी किसानों को गुमराह किया है। बुर्दी बरामदगी की जमीन पहले शामलात से बाहर रहती थी, किंतु 2020 में सरकार ने एक्ट में संशोधन कर इस छूट को हटा लिया था और बुर्दी बरामदगी को जमीन को शामलात देह में दर्ज कर दिया था.”

कमजोर रणनीति और मानसून के चलते अनाज के दामों में बढ़ोतरी के आसार!

कुछ राज्यों में मानसून देरी से आया है इस कारण बोये गए चावल का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में कम हुआ है. आंकड़ो में कहें तो 29 जुलाई, 2022 तक 231.59 लाख हेक्टेयर रकबे में ही चावल बोया गया है. जोकि पिछले साल के इसी समय काल की तुलना में करीबन 36 लाख हेक्टेयर कम है. पिछले साल इन दिनों चावल का रकबा 267.05 हेक्टेयर रहा था. धान के रकबे में आयी कमी समेत अन्य कारणों से भी अनाजों के दामों में महंगाई बढ़ने का डर सताने लगा है. वहीं इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है. नोमुरा ग्लोबल इकोनॉमिक्स और सीइआईसी का अनुमान कहता कि भले ही दक्षिण पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर हो या सामान्य से मजबूत फूड के रिटेल इनफ्लेशन में वृद्धि नहीं होगी. वहीं दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ कमजोर मानसून को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं. धान के बड़े रकबे वाले राज्यों में कमजोर मानसून भविष्य में अनाजों के दामों में उछाल का बड़ा कारण हो सकता है.

हाल ही में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग ने रिटेल महंगाई पार आंकड़े जारी किये है. जिसमें रिटेल महंगाई में कमी आई है. पर अनाजों के रिटेल मूल्यों में बढ़ोतरी हुई है. आंकड़ो की भाषा में कहें तो अनाज और उत्पादों की महंगाई दर जून (2022) में 5.66% थी जो बढ़कर जुलाई माह (2022) में 6.90% हो गई.

दिख रहे है खतरे के बादल!

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले आर्थिक सलाहकार कार्यालय ने जुलाई, 2022 के लिए थोक मूल्य सूचकांक को जारी किया गया है. सूचकांक के अनुसार अनाज और उत्पादों के मूल्यों (थोक) में भारी उछाल आया है. इस उछाल का प्रभाव खाद्य सामानों के रिटेल मूल्यों पर भी देखा जा सकता है.

थोक मूल्यों के प्रभाव को रिटेल स्तर पर कम करने के लिए सरकार अपने भण्डारण में से “ओपन मार्किट सेल स्कीम” (OMSS) के तहत बाजार में अनाज जारी करती है.

वहीं सरकार के 15 जुलाई तक के आंकड़े यह कह रहे हैं कि चावल बोये गए रकबे में भी कमी आयी है. इस वर्ष बोये गए चावल का इलाका 128.5 लाख हेक्टे. है. जोकि पिछले वर्ष की तुलना में कम है ( 155.53 लाख हेक्टे.)

राहत की बात!

चावल और गेहूं से इतर मोटे अनाजों की बुवाई का रकबा बढ़ा है. सरकारी के आंकड़ों के अनुसार 28 जुलाई, 2022 तक बोया गया इलाका 142.21 लाख हेक्टेयर था. जोकि पिछले वर्ष के इसी समय (28 जुलाई, 2021) की तुलना में (135.30 लाख हेक्टेयर) अधिक है.

ऐसी ही उम्मीद की किरण दालों से भी मिली है. 27 जुलाई,2022 तक बोई गई दलहनी फसलों का रकबा 106.18 लाख हेक्टेयर था. जोकि पिछले वर्ष के इसी समय (27 जुलाई, 2021) की तुलना में अधिक है. (103.23लाख हेक्टे.)

भण्डारण की क्या स्थिति है?

भण्डारण के पीछे सरकार के दो उद्देश्य होते हैं. पहला, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन. दूसरा, अगर बाजार में खाने के सामानों के मूल्यों में बढ़ोतरी हुई हो तो आपूर्ति करके कीमतों में कमी लाना. सरकार आपूर्ति करने के लिए “ओपन मार्केट सेल स्कीम” का प्रयोग करती है. अब दिक्कत यह है कि सरकार के पास में भी “ओपन मार्केट सेल स्कीम” के लिए जरूरी गेहूं का भंडारण नहीं है. 1 जलाई,2022 के आंकड़ों के अनुसार केन्द्रीय भंडारगृह में गेहूं का कुल भंडारण 285.10 लाख टन था जोकि पिछले वर्ष के उसी समयकाल से बहुत कम है(603.56 लाख टन)

इसके पीछे का एक कारण (संयुक्त राष्ट्र के कृषि विभाग के अनुसार) खरीफ सीजन में तापमान का बढ़ना है (मार्च,2022) जिससे पैदावर में 10-15% की कमी आयी. दूसरा कारण यह है कि किसान व्यावसायिक फसलों के उत्पादन को वरीयता दे रहे है. 27 जनवरी 2022 के आंकड़े कह रहे हैं कि रबी में गेहूं का रकबा कम हुआ है. 27 जनवरी 2022 को 342.37 लाख हेक्टेयर था वहीं पिछले वर्ष के इसी समय काल में 345.86 लाख हेक्टेयर.

व्यवसायिक फसलों के रकबे में हुए बढ़ोतरी का एक कारण सरकार द्वारा msp में बढ़ोतरी करना भी है. रबी सीजन 2021-22 के लिए सरसों की msp में भारी वृदि की गई थी. परिणामस्वरूप रकबे में इजाफा हुआ. 27 जनवरी,2022 को बोये गए सरसों का रकबा 91.44 लाख हेक्टे. था जोकि पिछले वर्ष के रबी सीजन (73.12 लाख हेक्टे.)की तुलना में अधिक है.

यूक्रेन और रूस का युद्ध शुरू होता है. यह भ्रम फैल जाता है कि गेहूं की कमी होने वाली है, भारत में निजी बाजार किसानों से ऊँचे दामों पर खरीददारी शुरू कर देते हैं. फलस्वरूप सरकारी संस्थाओं के पास किसान msp पर फसल बेचने नहीं आते हैं. नीचे दी गई टेबल में देखिये पंजाब, हरियाणा, राजस्थान,मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष की तुलना में भण्डारण कम हुआ है.

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 81 करोड़ व्यक्तियों को प्रति माह पांच किलोग्राम अनाज (चावल/गेहूं) फ्री दिया जाता है. गेहूं की कमी के कारण गुजरात और उत्तरप्रदेश की सरकारों ने पहले 2 किलोग्राम चावल और 3 किलोग्राम गेहूं देना शुरू किया फिर 3 किलो चावल और 2 किलो गेहूं. विषय से इतर कई विशेषज्ञों का कहना है कि हाल ही में खाने की कई खाने वस्तुओं पर लगाया गया GST, खाने के सामानों की रिटेल दर में बढ़ोतरी कर सकता है.

साभार- im4change

अनाजों की महंगाई दर क्या  है ? कैसे की जाती है इसकी गणना?

भारत में महंगाई की गणना दो सूचकांक से की जाती है. पहले सूचकांक में वस्तुओं के थोक मूल्यों (wholesale price) को शामिल किया जाता है वहीं दूसरे सूचकांक में उपभोक्ता द्वारा चुकाएं गए मूल्य (consumer price सभी कर जोड़ने के बाद किस कीमत पर वस्तु ग्राहक को मिल रही है).


अनाजों के दामों में महंगाई की गणना को दोनों सूचकांकों के माध्यम से समझ सकते हैं.

सबसे पहले किसान के खेत से बाजार में उसे क्या मूल्य मिल रहा है. बाजार में बेचे जाने के बाद वो थोक व्यापारियों के पास जाएगा. थोक व्यापारी जिस दर पर बेचेंगे उसका अगर सूचकांक बनाये तो वो थोक मूल्य सूचकांक कहलाएगा.
थोक स्तर पर बिका हुआ सामान रिटेल में बेचा जाएगा. यानी कीमत का एक निश्चित गैप बना रहेगा, रिटेल और थोक कीमतों के बीच. अगर थोक मूल्यों में बढ़ोतरी होती है तो रिटेल मूल्यों में भी बढ़ोतरी होगी.

महंगाई के स्तर को मापने के लिए वर्तमान माह की तुलना पिछले वर्ष के उसी महीने से की जाती है. यानी आपको जुलाई 2022 में महंगाई को मापना है तो आप 2021 के जुलाई माह से तुलना करेंगे.

22 अगस्त को जंतर-मंतर पर किसान पंचायत, रोड़े अटकाने में जुटी दिल्ली पुलिस!

संयुक्त किसान मोर्चा ने एसएसपी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य, अग्निपथ योजना और लखीमपुर हिंसा के मुद्दों पर केंद्र सरकार के विरोध में 22 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर पंचायत की कॉल दी है. जंतर-मंतर पर पंचायत के बाद किसान अपनी सभी मांगों को लेकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सैंपेंगे. वहीं कोई भी राजनीतिक संगठन इस कार्यक्रम का हिस्सा नहीं होगा.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाली पंचायत में जहां एक ओर किसान भारी संख्या में पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दिल्ली पुलिस किसानों को जंतर-मंतर पर पहुंचने से रोकने के लिए पहले की तरह बैरिकेडिंग करने में जुट गई है. जंतर-मंतर पर होने जा रही किसान पंचायत के एक दिन पहले ही दिल्ली में प्रवेश करने वाले सभी वाहनों की चैकिंग की जा रही है खासकर किसानी झंड़े लगे वाहनों को रोका जा रहा है. खबर है कि दिल्ली पुलिस द्वारा टिकरी बॉर्डर पर बड़े-बड़े पत्थर रखने के साथ सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं. इसके साथ ही दिल्ली में प्रवेश करने वाले हर रास्ते पर नाके लगाकर चैकिंग की जा रही है.

करीबन एक साल तक दिल्ली के बॉर्डरों पर धरना देने वाले किसान सरकार के वादों से संतुष्ट नहीं हैं. सरकार ने हालंहि में बिलजी संशोधन बिल-2022 पेश कर दिया है जिसको लेकर देशभर के किसान रोष व्यक्त कर चुके हैं. वहीं किसानों पर दर्ज केस अब तक वापस नहीं लिए गए हैं जिसके चलते किसान सरकार से नाखुश हैं. साथ ही सरकार ने एमएसपी गारंटी को लेकर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसानों जंतर-मंतर पर किसान पंचायत करने जा रहे हैं.

25 अगस्त को अडानी के गोदामों का घेराव करेंगे हिमाचल के सेब किसान!

हिमाचल प्रदेश के सेब उत्पादक अपने घटते लाभ मार्जिन को लेकर राजधानी शिमला में आंदोलित हैं. सरकार द्वारा उनकी मांगों को अनसुना किए जाने के कारण, उन्होंने 25 अगस्त को अडानी के स्वामित्व वाले तीन सेब गोदामों का घेराव करने का फैसला किया है. इसके अलावा, उत्पादकों ने सरकार के खिलाफ कानूनी मोर्चा खोलने का भी फैसला किया है और संयुक्त किसान मंच ने एपीएमसी अधिनियम को लागू करने के लिए अदालत में जाने की घोषणा की है.

सेब उत्पादकों ने अपना एक संयुक्त ब्यान जारी करते हुए कहा है, “सरकार सोच रही है कि समय के साथ अपने आप विरोध कम हो जाएगा, तो वह बहुत बड़ी गलती कर रही है।. जब तक सरकार हमारी मांगें नहीं मानती तब तक धरना जारी रहेगा. अपने अगले कदम में हम 25 अगस्त को अडानी के स्वामित्व वाले सेब गोदामों पर धरना देंगे.”

अडानी के पास तीन गोदाम हैं और कुछ अन्य निजी सीए स्टोर अगस्त के मध्य से सीजन खत्म होने तक सेब खरीदते हैं. कटाई का मौसम समाप्त होने के बाद गोदाम इस सेब को बाजार में अधिक कीमत पर बेचते हैं. फिलहाल, कुल सेब कारोबार में अडानी और अन्य छोटे निजी खिलाड़ी हैं. राज्य में उत्पादित कुल 5-7 लाख मीट्रिक टन सेब में से, अडानी के तीन गोदाम लगभग 18,000-20,000 मीट्रिक टन की खरीद करते हैं, जो कुल बिक्री का लगभग दो से तीन प्रतिशत है.

सेब उत्पादकों के नेता हरीश चौहान ने बताया, “अडानी स्टोर बहुत अधिक खरीद नहीं कर रहे हैं, लेकिन उनकी खरीद दरें खुले बाजार को प्रभावित करती हैं. अक्सर अडानी स्टोर्स द्वारा अपनी खरीद कीमतों की घोषणा के बाद बाजार में गिरावट आती है. अडानी के गोदाम लगभग 75-85 रुपये में जो प्रीमियम सेब खरीदते हैं, उन्हें बाद में बहुत अधिक लाभ मार्जिन पर बेचा जाता है. दूसरी ओर, उत्पादकों का लाभ तेजी से बढ़ती इनपुट लागत के कारण दिन-ब-दिन घट रहा है. इसलिए, हम सभी मांग कर रहे हैं कि ये गोदाम हमें बेहतर कीमतें दें, क्योंकि उनका खुद का लाभ मार्जिन इतना अधिक है.”

शिमला में प्रदर्शन करने आए सेब किसान अजय ठाकुर ने बताया, “अडानी ने 2020 में 88 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत पर सेब खरीदे थे, लेकिन 2022 में वे सिर्फ 76 रुपये प्रति किलोग्राम की पेशकश कर रहे हैं, जबकि हम उत्पादकों की इनपुट लागत बहुत ज्यादा बढ़ गई है. यह कैसे जायज है?”

विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन के अलावा, एसकेएम ने कानूनी रूप से भी सरकार को घेरने का फैसला किया है. एसकेएम के एक सदस्य दीपक सिंघा ने बताया, “हम जल्द ही एपीएमसी अधिनियम को लागू नहीं करने के लिए सरकार के खिलाफ अदालत का रुख करेंगे. सरकार को अदालत में जवाब देना होगा कि वह अधिनियम को लागू करने और उत्पादकों को अधिनियम में अनिवार्य सभी सुविधाएं प्रदान करने में अपनी रुचि क्यों नहीं दिखा रही है.”

सड़कों पर उतरे हिमाचल के सेब किसान

कृषि सुगमता सूचकांक का वक्त : गन्ना किसानों के बकाया भुगतान की राह में रोड़े और सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

लगभग तीन दशक पहले मैं गन्ना किसानों द्वारा अपने बकाया भुगतान की मांग को लेकर किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को कवर करने पंजाब के गुरुदासपुर में गया था. तीस साल बाद भी देश के कई हिस्सों में गन्ना किसानों को अपने बकाया भुगतान के लिए लंबे समय तक विरोध का सहारा लेते हुए देखना दुखद है. वे मुफ्त की मांग नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे चीनी मिलों द्वारा खरीदे गए गन्ने के समय पर भुगतान की वैध बकाया राशि की मांग कर रहे हैं. 

सुप्रीम कोर्ट और कुछ उच्च न्यायालयों ने चीनी मिलों को 14 दिनों में भुगतान करने का निर्देश दिया है और भुगतान में देरी होने पर 15 प्रतिशत का ब्याज देने का निर्देश दिया है. यह महत्वाकांक्षी भारत है, जहां इसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता. हमें अक्सर बताया जाता है कि उद्यमशीलता की संस्कृति का विकास भारत की सफलता की कुंजी है. लेकिन ऐसा क्यों है कि जब हम युवा भारत की उद्यमशीलता की भूख की बात करते हैं, तो यह भूल जाते हैं कि गांवों के युवा भी महात्वाकांक्षी उद्यमी बनने के अवसर तलाश रहे हैं? 

वे भी नवाचार करने, अपने कौशल में सुधार करने और कृषि में क्रांति (पैमाने और दक्षता, दोनों में) लाने के इच्छुक हैं. ग्रामीण भारत की उद्यमशीलता की भूख मिटाने की सबसे बड़ी बाधा किसानों को उनकी सही आय से वंचित करना है, और उन्हें उनके बकाये के भुगतान की मांग के लिए विरोध प्रदर्शन करने पर मजबूर करना है. किसानों के भी सपने होते हैं और जैसे-जैसे उनकी आय बढ़ती है, (उनमें अंतर्निहित जोखिम लेने की उनकी क्षमता को देखते हुए), वे तस्वीर बदलने की क्षमता रखते हैं. 

लेकिन अगर गन्ने जैसी फसल की खेती करने के बाद, जिसे तैयार होने में एक साल लगता है, उनमें से कई को मिलों से भुगतान प्राप्त करने के लिए महीनों या लगभग एक और साल तक विरोध प्रदर्शन करने पर मजबूर होना पड़ता है, तो यह निश्चित रूप से उड़ान भरने की उनकी आकांक्षा को मार देता है. हालांकि वर्ष 2020-21 में जब गन्ना सीजन खत्म हुआ था, तब किसानों का बकाया घटकर 6,667 करोड़ रुपये रह गया था, जो एक साल पहले 10,342 करोड़ रुपये था. बड़ा सवाल यह है कि चीनी मिलें समय पर भुगतान क्यों नहीं कर सकती हैं. 

मिलों का कहना है कि उत्पादन की लागत बढ़ गई है, क्योंकि गन्ने के लिए राज्य सरकार द्वारा उच्च मूल्य निर्धारित किया जाता है, जिससे सरकारें मिलों को बकाया चुकाने के लिए बार-बार सब्सिडी प्रदान करने के लिए मजबूर होती हैं. उदाहरण के लिए, वर्ष 2017-18 में, सरकार ने बकाया राशि चुकाने के लिए संकटग्रस्त मिलों को 7,000 करोड़ रुपये का राहत पैकेज दिया था. इसके अलावा, कई अन्य प्रोत्साहन हैं, जो सरकार समय-समय पर मिलों के लिए जारी करती रही है. 

पंजाब में, निजी चीनी मिलों को 2015-16 में 50 रुपये, वर्ष 2018-19 में 25 रुपये और 2021-22 में 35 रुपये प्रति क्विंटल की सब्सिडी प्रदान की गई थी. फिर भी, चार निजी मिलों से 126 करोड़ रुपये का बकाया भुगतान हासिल करने के लिए किसानों को फगवाड़ा में लंबे समय से धरने पर बैठने को मजबूर होना पड़ा है. इसने पंजाब सरकार को निजी चीनी मिलों के ऑडिट का आदेश देने के लिए प्रेरित किया है, ताकि चीनी मिलों की अर्थव्यवस्था का पता चल सके. 

चीनी मिल लॉबी के दबाव के आगे झुकने के बजाय देश की सभी निजी चीनी मिलों के ऑडिट का काम पहले ही शुरू कर देना चाहिए था. मीडिया हर साल लंबित गन्ना बकाया राशि की खबरें प्रकाशित कर रहा है. यह अजीब नहीं है कि पिछले तीस वर्षों से, जब से मैं जानता हूं, मिलों द्वारा 14 दिनों के भीतर गन्ने का बकाया भुगतान करने का मुद्दा अनसुलझा है? यदि शहरों में उद्यमशीलता के निर्माण के लिए लालफीताशाही की बाधाएं दूर करना, खराब बुनियादी ढांचे में सुधार, समय पर व्यावसायिक, व्यापारिक एवं वित्तीय सेवाएं प्रदान करना पूर्व जरूरतें हैं, तो ग्रामीण इलाकों में महत्वाकांक्षी कौशल को उभारने के लिए किसानों को उनके उत्पाद का समय पर और सुनिश्चित भुगतान शीर्ष पर होना चाहिए. 

यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसका हल न निकाला जा सके, बल्कि यह बताता है कि ग्रामीण सपनों की पूर्ति किस तरह हमारे नीति नियंताओं की प्राथमिकता में सबसे नीचे है. चाहे वह गन्ने का बकाया हो, या अचानक बाढ़ या बढ़ते तापमान से फसल को नुकसान या कुछ साल पहले सफेद मक्खी के कारण कपास की फसल को हुआ नुकसान, किसानों को सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए भूख हड़ताल, विरोध प्रदर्शन और राष्ट्रीय राजमार्ग पर धरने का सहारा लेना पड़ता है. आखिर किसानों को किसी भी तरह की राहत या अपनी उपज के बेहतर मूल्य के लिए विरोध प्रदर्शन क्यों करना पड़ता है. 

भारत ने पिछले 75 वर्षों में कृषि क्षेत्र में बड़ी प्रगति की है. मुझे लगता है कि ग्रामीण इलाकों में उद्यमशीलता का माहौल बनाने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक गंभीर बुनियादी ढांचे के विकास के अलावा कृषि क्षेत्र में व्यापार सुगमता सूचकांक लाना है. विश्व बैंक के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की तर्ज पर, जिसमें भारत ने 80 पायदान की छलांग लगाई है, अब समय आ गया है कि भारत अपना खुद का ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग इंडेक्स तैयार करे. कृषि क्षेत्र की ज्यादातर समस्याएं शासन की कमी से जुड़ी हैं और बड़ी चुनौती है कि हर स्तर पर आने वाली बाधाओं को दूर किया जाए, ताकि तंत्र को और अधिक किसान अनुकूल बनाया जा सके. 

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस ने न केवल उद्योग के लिए एक सक्षम वातावरण बनाने में मदद की, बल्कि रास्ते में आने वाली अनावश्यक बाधाएं भी दूर कीं. व्यावसायिक संचालन आसान बनाने के लिए छोटे-बड़े 7,000 कदम उठाए गए. आखिर भारत विश्व बैंक के प्रस्ताव का इंतजार करने के बजाय खुद का ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग इंडेक्स तैयार कर इसे सही तरीके से लागू करने की शुरुआत क्यों नहीं कर सकता? इसका अर्थ एक विस्तृत और कुशल प्रणाली स्थापित करना होगा, जो किसानों की हर समस्याओं का समाधान करे. इससे किसानों को बार-बार धरने पर नहीं बैठना पड़ेगा और यह अंततः ग्रामीण उद्यमियों की नई पौध के उभरने में मदद करेगा.

साभार – अमर उजाला

किसान 25 और 26 अगस्त को मंत्रियों के घरों के बाहर करेंगे ‘किसान पंचायत’!

किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने भारतीय किसान यूनियन चढ़ूनी की प्रदेश स्तरीय बैठक में देह शामलात और जुमला मालकाल भूमि के इंतकाल तोड़ने के आदेश के खिलाफ चल रहे आंदोलन को तेजी देने के लिए किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने रणनीति बनाई. बैठक में फैसला लिया गया कि 25 और 26 अगस्त को देह शामलात व जुमला मालकन भूमि किसानों से छीनने के आदेश को वापस करवाने के लिए मंत्रियों के घरों के बाहर किसान पंचायत बिठाई जाएगी और इस पंचायत की सारी व्यवस्था व खाने पीने का सारा इंतजाम मंत्रियों के जिम्मे होगा.

मंत्रियों की तरफ से किसान पंचायत की सारी व्यवस्था और खाने पीने का इंतजाम न होने पर किसान सत्यग्रह व भूख हड़ताल करेंगे. इससे पहले देह शामलात व जुमला मालकन भूमि किसानों से छीनने के आदेश के खिलाफ किसानों ने 16 अगस्त को प्रदेश के तमाम विधायकों को ज्ञापन सौंपा था किसानों ने विधायकों को 25 अगस्त तक का अल्टीमेटम दिया था की सरकार 25 अगस्त तक विधानसभा का स्पेशल सत्र बुलाकर उनकी मांगें पूरा करे अन्यथा किसान मंत्रियों के घरों के बाहर डेरा डाल लेंगे और पंचायत करेंगे.

भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा, “मुख्यमंत्री ने विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान कहा है कि किसानों की जमीन के इंतकाल बदले जाएंगे और मलकियत नहीं बदली जाएगी, लेकिन अगर इंतकाल बदल जाता है तो किसान न तो जमीन को बेच सकता है न ही रहन कर सकता है और न ही बच्चों के नाम ट्रांसफर कर सकता है. उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने बुर्दी बरामदगी की जमीन को लेकर भी किसानों को गुमराह किया है। बुर्दी बरामदगी की जमीन पहले शामलात से बाहर रहती थी, किंतु 2020 में सरकार ने एक्ट में संशोधन कर इस छूट को हटा लिया था और बुर्दी बरामदगी को जमीन को शामलात देह में दर्ज कर दिया था.”