दक्षिण हरियाणा: बिजली ट्यूबवेल सिंचाई का किसानों और भूजल स्तर पर गहरा असर!

हरियाणा के बिसोहा गांव (रेवाड़ी जिला) निवासी दीपक पिछले 20 वर्षों से खेती में लगे हैं. वह खेतों में बिजली ट्यूबवेल द्वारा फुव्वारा तकनीक से सिंचाई करते हैं. गांव में खेतों की सिंचाई के लिए अन्य साधन उपलब्ध नहीं हैं. इसी कारण गांव में ज्यादातर किसान सिंचाई के लिए बिजली ट्यूबवेल का प्रयोग करते हैं. दीपक के मुताबिक बिजली ट्यूबवेल से सिंचाई का खर्चा कम पड़ता है. महीने में ट्यूबवेल द्वारा सिंचाई का खर्च 80 रूपए है, जो ज्यादा नहीं है. इसलिए वह सोलर पम्पसेट के बारे में नहीं सोच रहे.

दीपक बताते हैं कि खाली पड़ी जमीन भी ख़राब हो रही है और जमीन का अन्य प्रयोग भी नहीं हो रहा है. इसलिए ट्यूबवेल लगवाकर खेतों में सिंचाई करते हैं. जमीनी पानी भी लगातार खारा हो रहा है और नीचे जा रहा है लेकिन सिंचाई का साधन भी ट्यूबवेल ही है. यहां कोई नहर नहीं है. बिजली ट्यूबवेल से सिंचाई की लागत डीज़ल ट्यूबवेल की तुलना में कम आती है.

अहीरवाल में सिंचाई फुव्वारा तकनीक से ही होती है. गांव के सरपंच नितेश कुमार ने बताया कि फुव्वारा तकनीक द्वारा सिंचाई करने से लाइन बदलने के लिए मजदूर लगाने पड़ते हैं, जिस कारण सिंचाई का खर्च बढ़ जाता है यदि सिंचाई के लिए पानी अन्य स्रोतों द्वारा मिल जाए तो खेतों में खुली सिंचाई की जा सकेगी, जिससे अन्य कई खर्च (पाइपलाइन, मजदूरी आदि) बच जाएंगे.

इस इलाके में ज्यादातर किसान अपना जीवन चलाने के लिए खेती पर निर्भर हैं, लेकिन खेती से लगातार आय कम होती जा रही है. फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाता तो फसलों की लागत भी पूरी नहीं होती. जब दीपक और बिसोहा के गांव वालों से प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (2015) के बारे में पूछा गया तो उन्हें इस योजना के बारे में नहीं पता था.

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत सरकार किसानों को खेत में सिंचाई करने के लिए उचित मात्रा में पानी उपलब्ध करवाने और सिंचाई उपकरणों के लिए सब्सिडी प्रदान करती है. सुनील कुमार शोधार्थी हैं और ग्रामीण एवं औद्योगिक विकास अनुसन्धान केंद्र चंडीगढ़ में काम कर चुके हैं. उनका शोध कार्य “खेती के कार्यो में बिजली के उपयोग” से संबधित है. सुनील कुमार से संबंधित विषय पर बात करने पर उन्होंने बताया कि पेट्रोल तथा डीजल से सिंचाई की लागत ज्यादा है, जिस कारण फसलों की उत्पादन लागत बढ़ती है. सिंचाई लागत कम होने की वजह से किसान बिजली टूबवेल की तरफ ज्यादा रुझान कर रहे हैं, जिससे किसानों के उत्पादन एरिया में भी बढ़ोतरी हुई है. लेकिन उत्पादित फसल चक्र में परिवर्तन नकारात्मक हो रहा है. किसान गहन सिंचाई की फसलों जैसे धान और गेहूं से कम गहन सिंचाई (कम सिंचाई) की फसलों सरसों, बाजरा आदि की तरफ आ रहे हैं, लेकिन बिजली टूबवेल की तरफ ज्यादा रुझान का विपरीत प्रभाव यह हो रहा है कि भूजल ज्यादा प्रयोग होने की वजह से भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है. किसानों को अपने ट्यूबेल पम्प सेट ज्यादा गहरे करवाने पड़ रहे हैं जिससे पम्प सेट की लगता में बढ़ोतरी हो रही है.

देश में भूजल स्तर लगातार कम हो रहा है. डाउन-टू-अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय जल शक्ति व सामाजिक न्याय मंत्री रतन लाल ने मार्च 2020 में संसद में जानकारी दी कि किसान 2001 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 1816 घनमीटर थी, जो साल 2021 में 1488 घनमीटर रही और साल 2031 में काम होकर 1367 घनमीटर हो सकती है.

हरियाणा सरकार की रिपोर्ट के अनुसार “हरियाणा के कृषि योग्य भूमि की सिंचाई नहर, डीजल तथा बिजली ट्युबवेल्स आदि के माध्यम से की जाती है. हरियाणा में सिंचित कृषि क्षेत्र का 1154 हजार एकड़ भूमि नहरों द्वारा तथा 1801 हजार एकड़ भूमि टुबवेल्स द्वारा सिंचित किया जाता है. हरियाणा में कुल 821399 बिजली ट्यूबवेल्स तथा डीजल पंप सेट हैं जिसमें 275211 डीजल पंप से तथा 546188 बिजली पंप सेट हैं. रेवाड़ी जिले की बात की जाए तो यहां कुल 13605 ट्यूबवेल तथा पंपसेट हैं जिसमें 3311 डीजल और 10294 बिजली ट्यूबवेल पंपसेट हैं.

मौसम अनुसार फसलों की पैदावार

बिसोहा निवासी दीपक कहते हैं कि खरीफ (ग्रीष्म काल) के मौसम में कपास तथा बाजरा और रबी (शीत काल) मौसम में गेहूं तथा सरसों की फसलों का उत्पादन करते हैं. एक एकड़ में गेंहू की पैदावार 50 से 55 मण (1मण=40 किलोग्राम) है, एक एकड़ में सरसों की पैदावार 20 से 25 मण है, एक एकड़ में बाजरा की पैदावार 20 से 22 मण है, खरीफ की फसलों में 1 से 2 बार सिंचाई करते हैं तथा रबी की फसल सरसों में 2 से 3 बार और गेहूं की फसल में 5 से 7 बार सिंचाई करते हैं, यदि समय पर बारिश हो जाए तो ट्यूबवेल द्वारा 1 या 2 सिंचाई कम करनी पड़ती है. बिसोहा से लगभग 35 किलोमीटर दूर मीरपुर निवासी हरि सिंह अपने खेतों में गेहूं और बाजरा की पैदावार करते हैं. गेहूं में सरसो, बाजरा तथा कपास की तुलना में ज्यादा सिंचाई की जरूरत पड़ती है. एक एकड़ में गेहूं की पैदावार लगभग 38-40 मण (1 मण=40 किलोग्राम) और बाजरा की पैदावार लगभग 18-20 मण होती है.

डॉ अजय कुमार एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर महेन्द्रगढ़ ने बताया कि मिट्टी में सॉइल आर्गेनिक कॉम्पोनेन्ट की कार्बन संरचना होती है जिससे मिट्टी की उपजाऊपन बना रहता है, खारा पानी, रासायनिक खाद, फसल चक्रण आदि से सॉइल आर्गेनिक कम्पोनेंट का अनुपात कम होता जा रहा है. ग्रामीण जनसंख्या की कृषि पर ज्यादा निर्भरता तथा साधन उपलब्धता के कारण फसल चक्रण के बीच अंतर कम होता जा रहा है. पहले किसान फसल चक्र के बीच अंतर करते थे जिससे मिट्टी की उपजाऊ शक्ति ठीक बनी रहती थी, साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से तापमान में जो वृद्धि हो रही है, वह भी फसलों पर नकारात्मक प्रभाव डाल रही है. जैसे मार्च 2022 में हीट वेव (ज्यादा तापमान) के कारण गेहूं की पैदावार में 15% से ज्यादा की कमी आयी है.

खारा (नमकीन) पानी और रासायनिक खाद का खेती पर प्रभाव

राजेश कुमार एक एकड़ गेहूँ 70 से 75 किलोग्राम और सरसो में 50 किलोग्राम तथा बाजरा में 25 से 30 किलोग्राम रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं. वह बताते हैं, “रासायनिक खाद के ज्यादा प्रयोग के कारण मिट्टी की पैदावार भी कम हो रही है. देसी खाद (गोबर की खाद) जमीन को तो ठीक रखता है, लेकिन उससे पैदावार पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता. रासायनिक खाद जमीन को तो ख़राब कर रहा है, पर पैदावार पर देसी खाद की तुलना में ज्यादा असर डालता है.”

कृषि विज्ञान केंद्र झज्जर (हरियाण) से संदर्भित विषय में सम्बंधित जानकारी लेने पर उन्होंने बताया कि रेवाड़ी से लगते हुए झज्जर का दो तिहाई पानी खारा (नमकीन) हो गया है, जिससे मिट्टी लवणीय (कैल्सियम, मैग्निसियम और सल्फेट आयन की अधिकता) होती जा रही है. फसल चक्र में रबी सीजन में गेहूं तथा खरीफ सीजन में पेड्डी चावल, बाजरा तथा कपास की फसलों का उत्पादन किया जाता है. रासायनिक खाद का प्रयोग खेत की मिट्टी को कृषि विज्ञान केंद्र की लैब में चेक करवा के करना चाहिए लेकिन ज्यादातर किसान आपस में एक दूसरे से बात करके रासायनिक खाद का प्रयोग करते हैं.

अस्सिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.नवीन कटारिया ने बताया कि दक्षिणी हरियाणा की जमीन में फसल उत्पादन के आवश्यक तत्व (जिंक, कॉपर, मैंगनीज, आयरन,कॉपरआदि) कम मात्रा में पाए जाते हैं इसके साथ-साथ भूजल में फलोरिड, नमक की मात्रा ज्यादा है इसलिए फसल उत्पादन लगातार कम हो रहा है. जिस कारण किसानों को लगातार ज्यादा रासायनिक खाद का प्रयोग करना पड़ रहा है. जो रसायनिक खाद नाइट्रोजन फॉस्फोरस और पोटैशियम के आदर्श अनुपात (4:2:1) से ज्यादा है. फलोरिड और नमक युक्त भूजल दक्षिण हरियणा के जन मानस को भी बहुत ज्यादा प्रभावित कर रहा है, क्योंकि वहां के लोग पेय जल के रूप में भी इसी पानी का उपयोग करते हैं, जिससे मुख्यत दांतों की बीमारी दांतो का पीला पड़ना देखा जा सकता है.

हरियाणा का भूजल स्तर

बिसोहा निवासी हरीश ने 15 वर्ष पहले 150 फीट गहराई में ट्यूबवेल लगवाया था. पहले पांच वर्षों तक अच्छे से पानी चला लेकिन बाद में टूबवेल पानी छोड़ने लगा फिर ट्यूबवेल को दो बार 20- 20 फीट गहरा किया जा चुका है, लेकिन भूजल लगातार नीचे जाने की वजह से अब एक एकड़ फसल की सिंचाई के लिए दो-तीन बार ट्यूबवेल को चलना और बंद करना पड़ता है. जमीन में पानी इकट्ठा हो सके और खेत की सिंचाई पूरी हो सके, इसके लिए 3 किला (एकड़) जमीन की सिंचाई में एक सप्ताह का समय लग जाता है. फसलों को समय पर पानी नहीं मिलने से फसलों की पकावट अच्छी नहीं हो पाती है. जिस कारण खेतो में कुल पैदावार भी कम होती है.

डॉ अजय कुमार के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश होने की प्रवृति बदल रही है. मानसून स्तर में पहले बारिश लगातार होती रहती थी लेकिन अब कभी बहुत ज्यादा और कभी कई दिनों तक बारिश नहीं होती है, जिससे जमीनी पानी का रिचार्ज नहीं हो पाता है. महेन्द्रगढ़ तथा उसके आसपास के एरिया का पानी प्रतिवर्ष 1 मीटर से 3 मीटर तक नीचे जा रहा है, और पानी खारा (नमकीन) हो रहा है. पानी में फ्लोरिड की मात्रा भी बढ़ती जा रही है, इसके कई कारण है जैसे इंडस्ट्रीज से निकलने वाला पानी, ज्यादा फर्टीलिज़ेर का प्रयोग आदि है.

डॉ.नवीन कटारिया ने बताया कि लगातार पानी का उपयोग करने तथा दक्षिण हरियाणा की वातावरणीय पारिस्तिथि शुष्क और रेतीली जमीन होने की वजह से यहां बारिश भी कम मात्रा में होती है, जिससे जमीन से निकलने वाले पानी की पूर्ति वापिस बारिश के पानी से पूरी नहीं हो पाती है. पहले भूजल की पूर्ति गांव में तालाब और जोहड़ों से भी हो जाती थी लेकिन अब गांव में तालाब और जोहड़ लगभग सूख चुके हैं. भूजल में फ्लोराइड के ज्यादा होने के कई कारण हो सकते हैं, दक्षिणी हरियाणा में मुख्य वजह चट्टानों का घुलना है, यह बारिश और भूजल के कारण हो रहा है. कई चट्टानों में फ्लोराइड, एपेटाइट और बिओटिट आदि की मात्रा ज्यादा होती है. इन चट्टानों के अपक्षय (घुलना) से भूजल में फ्लोराइड की मात्रा बढ़ जाती है. खेतों में फसल उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रयोग किये जाने वाले ज्यादा रासायनिक खाद (फॉस्फेट फर्टिलिसेर) से भी फ्लोराइड बढ़ता है.

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की रिपोर्ट के अनुसार “सामान्य मानसून लंबी अवधि का औसत 2005 से 2010 में सामान्य मानसून वर्षा की LPA दर 89.04 सेन्टीमीटर थी, जो 2011 से 2015 के बीच कम होकर 88.75 सेन्टीमीटर तथा 2018 से 2021 के बीच और भी कम होकर 88.6 सेन्टीमीटर हो गया है.”

कृषि विज्ञान केंद्र झज्जर से मिली जानकारी के अनुसार रेवाड़ी जिले से लगे हुए झज्जर जिले में चोवा (जमीनी पानी की उपलब्धता) 20-30 फीट है, लेकिन वह पानी खरा (नमकीन) है, जो किसी उपयोग लायक नहीं है. खेतो में सिंचाई तथा अन्य उपयोग के लिए अच्छे भूजल 80-100 फ़ीट की गहराई पर मिलता है.

पोस्ट ग्रेजुएट गवर्नमेंट कॉलेज तोशाम तथा बिहार सरकार के जीआईएस विभाग में काम कर चुके असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ वीरेंदर सिंह ने बताया कि रेवाड़ी तथा झज्जर भूजल स्तर की उपलब्धता में अन्तर का मुख्य कारण यह है कि रोहतक और झज्जर जिले में पानी के नहरी व्यवस्था अच्छी है, जिससे जमीन को लगातार पानी मिलता रहता है तथा नहरों के पानी रिसाव से भूजल रिचार्ज होता रहता है. इसी कारण यहां पर जलभराव की समस्या भी हो जाती है जबकि रेवाड़ी में नहरी व्यवस्था अच्छी नहीं है. दक्षिणी हरियाणा मुख्यत रेवाड़ी, महेन्द्रगढ़ और मेवात में रेतीली जमीन होने के साथ-साथ पहाड़ी इलाका है. जबकि रेवाड़ी के साथ लगते झज्जर जिले में जमीन मिट्टी युक्त है.

रेवाड़ी में नहरी व्यवस्था अच्छी नहीं है. दक्षिणी हरियाणा की भूगर्भिक संरचना हरियाणा के अन्य भाग से अलग होने की वजह से रोहतक, झज्जर का भूजल भी रेवाड़ी महेन्द्रगढ़ की तरफ नहीं जा पता है, जिस कारण जमीन को पानी भी कम मिल पाता है, जिससे भूजल स्तर लगातार गहरा हो रहा है.

मोंगाबे की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के करीब 25.9 प्रतिशत गांव गंभीर रूप से भूजल संकट से जूझ रहे हैं, इसी तरह की स्थिति उतर प्रदेश और बिहार में बन रही है. हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण (HWRA) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार हरियाणा के 319 गांव संभावित जल भराव वाले गांव हैं, जिनमें जल स्तर की गहराई 1.5 से 3 मीटर तक है हरियाणा में 85 गांव ऐसे हैं जो गंभीर रूप से जलजमाव से जूझ रहे हैं, जहां जल स्तर की गहराई 1.5 मीटर से कम है.

(यह स्टोरी स्वतंत्र पत्रकारों के लिए नेशनल फाउंडेशन फ़ॉर इंडिया की मीडिया फेलोशिप के तहत रिपोर्ट की गई है.)

मोटे अनाज की सरकारी खरीद के पीछे क्या है सरकार की मंशा?

जलवायु परिवर्तन के कारण गेहूं और चावल के उत्पादन में कमी आ रही है, इसलिए मोटे अनाज की खरीद पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए. यह बात किसी जलवायु वैज्ञानिक ने नहीं कही है, बल्कि केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग (डीएफपीडी) के सचिव सुधांशु पांडे ने कही है.

इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार को आभास हो चुका है कि आने वाले दिनों में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम) के तहत गरीबों को दिए जाने वाले सस्ते राशन के लिए केवल गेहूं और चावल पर निर्भर नहीं रहा जा सकता और इसका विकल्प तलाशना होगा.

रबी सीजन में गेहूं के उत्पादन में कमी और निर्यात की छूट देने के कारण देश में गेहूं का संकट खड़ा हो गया है. हालांकि 21 अगस्त 2022 को डीएफपीडी की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए देश में गेहूं का पर्याप्त भंडार है.

उधर उधर खाद्य नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा का कहना है कि सवाल केवल गेहूं-धान के कम उत्पादन का नहीं है, बल्कि सवाल सस्टनेबल एग्रीकल्चर प्रेक्टिस (सतत कृषि अभ्यास) से जुड़ा है. यह जरूरी हो गया है कि देश सतत कृषि प्रणाली को अपनाए इसके लिए मोटे अनाज को बढ़ावा देना होगा.

खाद्य सचिव ने क्या कहा?

दरअसल, 30 अगस्त 2022 को डीएफपीडी की ओर से आगामी खरीफ विपणन सीजन (केएमएस) 2022-23 की खरीफ फसल के लिए खरीद प्रबंधों पर चर्चा करने के लिए बैठक बुलाई गई थी. इसमें राज्यों के खाद्य सचिव और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के अधिकारी उपस्थित थे.

हालांकि बैठक में तय हुआ कि खरीफ मार्केटिंग सीजन 2022-23 के दौरान 518 लाख मीट्रिक टन चावल की खरीद की जाएगी। पिछले खरीफ मार्केटिंग सीजन 2021-22 के दौरान 509.82 लाख मीट्रिक चावल की खरीद की गई थी.

लेकिन यह मुद्दा उठा कि रबी मार्केटिंग सीजन 2022-23 में गेहूं की खरीद तय लक्ष्य से बहुत कम रही थी, इसलिए यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि आगामी खरीफ सीजन में चावल की खरीद पर भी असर पड़ सकता है. कुछ राज्यों ने प्रस्ताव रखा कि आगामी खरीफ मार्केटिंग सीजन में मोटे अनाज की खरीद की जाए.

इसके बाद तय हुआ कि आगामी खरीफ सीजन में 13.70 लाख मीट्रिक टन मोटा अनाज (सुपर फूड) खरीदा जाएगा. जबकि अब तक की कुल खरीद 6.30 लाख मीट्रिक टन है. यानी कि मोटा अनाज की खरीद के लक्ष्य में दोगुना से ज्यादा वृद्धि की गई है.

भारतीय खाद्य निगम के आंकड़ों के मुताबिक 31 जुलाई 2022 तक जिन राज्यों में मोटा अनाज खरीदा है, उनमें सबसे ज्यादा कर्नाटक में है. यहां 5.09 लाख टन मोटा अनाज खरीदा गया, इसके अलावा मध्यप्रदेश में 38 हजार, महाराष्ट्र में 41 हजार, ओडिशा में 32 हजार, गुजरात में आठ हजार और उत्तर प्रदेश में केवल तीन हजार टन मोटे अनाज की सरकारी खरीद हुई. हालांकि राज्यवार मोटे अनाज की खरीद का लक्ष्य क्या होगा, यह बाद में तय होगा.

दरअसल, चालू मानसून सीजन 2022 के दौरान बारिश की घोर अनियमितता ने भी खरीफ सीजन को लेकर सरकार की चिंता बढ़ा दी है. क्योंकि चालू खरीफ सीजन में धान और दालों की बुआई बेहद प्रभावित हुई है.

कृषि मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 26 अगस्त 2022 को समाप्त सप्ताह तक देश में 367.55 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई है तो पिछले साल 2021 के मुकाबले 23.45 लाख हेक्टेयर कम है. वहीं इस साल 127.71 लाख हेक्टेयर में दलहन की बुआई हुई है, जबकि पिछले साल 134.37 लाख हेक्टेयर (6.66 लाख हेक्टेयर कम) में दलहन की बुआई हो चुकी थी.

इस साल अब तक तिलहन की बुआई भी थोड़ी कम हुई है, लेकिन मोटे अनाज की बुआई में वृद्धि हुई है. इस साल 176.33 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाज की बुआई हुई है, जो पिछले साल 169.39 लाख हेक्टेयर थी। यानी कि मोटे अनाज की 6.94 लाख हेक्टेयर अधिक बुआई हुई है। सबसे अधिक बाजरे का रकबा बढ़ा है.

पिछले साल 63.19 लाख हेक्टेयर में बाजरा लगाया गया था, लेकिन इस बार 70.12 लाख हेक्टेयर में बाजरा लगाया जा चुका है, जबकि बाजरे का सामान्य रकबा 73.43 लाख हेक्टेयर है. मक्के के रकबे में भी थोड़ी बहुत वृद्धि हुई है. पिछले साल 79.06 लाख हेक्टेयर में मक्का लगाया गया था, जबकि इस साल 80.85 लाख हेक्टेयर में मक्का लगाया जा चुका है.

ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में राज्य सरकारें गेहूं-चावल की बजाय सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत मोटे अनाज का वितरण बढ़ाया जा सकता है. जुलाई 2022 में ऐसा एक प्रयास हो भी चुका है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत कर्नाटक को चावल की जगह 1.13 लाख टन मोटे अनाज का आवंटन किया गया है.

इससे पहले कर्नाटक में 67,019 टन और मध्य प्रदेश में 14,500 टन मोटा एनएफएसए के तहत मोटे अनाज का आवंटन किया गया था.

क्या किसानों को होगा फायदा

लेकिन सरकार के इस फैसले से क्या मोटा अनाज उगाने वाले किसानों को फायदा होगा? देविंदर शर्मा कहते हैं कि यह एक बड़ा सवाल है. शर्मा कहते हैं कि सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी राज्यों में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर मोटे अनाज की खरीद हो, ताकि मोटा अनाज उगाने वाले किसान को उचित दाम मिल सके.

शर्मा सुझाव देते हैं कि सरकार को फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (एफपीओ) के लिए यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि वे एमएसपी पर ही खरीददारी करें.

कितना होता है उत्पादन

अभी देश में लगभग 50 मिलियन (500 लाख टन ) मोटे अनाज का उत्पादन होता है. सबसे अधिक मक्का और फिर बाजरे का उत्पादन होता है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय का 2012-22 का चौथा अग्रिम अनुमान बताता है कि इस साल 9.62 मिलियन टन बाजरे का उत्पादन हो सकता है, जबकि पिछले साल 10.50 मिलियन टन बाजरे का उत्पादन हुआ था. चालू खरीफ सीजन की बुआई के उत्पादन का अनुमान बाद में आएगा. मक्के के उत्पादन में वृद्धि का अनुमान जताया गया है. पिछले साल 30.90 मिलियन टन मक्के का उत्पादन हुआ था, जबकि चौथे अग्रिम अनुमान में 33.62 मिलियन टन उत्पादन का अनुमान है.

साभार- डाउन-टू-अर्थ

भाव गिरने से घाटे का सौदा साबित हुई टमाटर की खेती!

टमाटर के दामों मे अचानक से भारी गिरावट ने किसानों को परेशान कर दिया है. बुधवार को टमाटर के दाम 4 रुपए से10 रूपए किलो मिले. टमाटर की कीमत गिरने की एक वजह देश की मंडियो मे बंगलूरू और महाराष्ट्र से आ रहे टमाटर को भी माना जा रहा है.
सेब के दाम गिरने से पहले ही हिमाचल और कश्मीर के किसान परेशानी का सामना कर रहे हैं. अब टमाटर के दाम गिरने से किसान और भी हताश नजर आ रहे हैं. किसानों का कहना है कि टमाटर के दाम गिरने से खेती पर किया गया खर्च भी पूरा नहीं हो रहा है. दाम घटने की वजह से टमाटर की खेती अब किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है.

एपीएमसी के सचिव सुशील गुलेरिया ने बताया कि सब्जी मंडी में चार से 10 रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से टमाटर बिका है. दक्षिण भारत का टमाटर देश की विभिन्न मंडियों में आने से कीमतों में गिरावट आई है. किसानों ने बताया कि दाम कम मिलने से खेती का खर्च पूरा नहीं हो रहा है. एक बीघा जमीन पर दवाई, खाद, बीज और तार लगाने का खर्च करीब 20 हजार रुपये तक पहुंच जाता है. अगर टमाटर 20 रुपये किलो से कम कीमत पर बिकता है तो खेती का खर्च भी पूरा नहीं हो पाता है. सरकार को टमाटर पर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना चाहिए. इससे मंडियों में दाम स्थिर रहेंगे. साथ ही दवाइयों और खाद पर भी सब्सिडी दी जानी चाहिए.

सेब किसानों के आंदोलन के बीच अडानी ने फिर घटाए सेब के दाम!

एक ओर सेब किसान और बागवान सेब की कम कीमत मिलने के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं. वहीं इस बीच अडानी की कंपनी एग्रोफ्रेस ने एक बार फिर सेब के दाम घटा दिए हैं. इस बार सेब के दाम में 2 रुपए प्रतिकिलो की कमी की गई है. पिछले एक माह से सेब बागवान विभिन्न मुद्दों को लेकर आंदोलनरत हैं. पहले बागवानों ने जीएसटी की दरों और पैकेजिंग मेटेरियल में बढ़ोतरी को लेकर सरकार के खिलाफ सचिवालय का घेराव किया था. इसके बाद बागवानों ने जेल भरो आंदोलन किया और उनपर एफआईआर तक भी हुई. इन सबके बीच में सरकार ने बागवानों के आंदोलन को देखते हुए सेब के दामों को तय करने के लिए एक हाई पावर कमेटी का गठन किया, लेकिन प्रदेश में सेब बागवानी से जुड़ी बड़ी कंपनी अडानी ने हाईपावर कमेटी के गठन वाले दिन ही सेब खरीद के दाम जारी कर दिए थे.

हिमाचल प्रदेश के किसान अलग-अलग मुद्दों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. कंपनी की ओर से जारी ताजा दामों में ईईएस (एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा स्माल) श्रेणी के सेब का खरीद मूल्य 60 रुपये से घटाकर 58 रुपये प्रतिकिलो हो गया है. वहीं मंडियों में सेब के दाम 200 से 300 रुपये प्रति पेटी कम हुए हैं. कंपनियों की ओर से सेब के दाम मे गिरावट का कारण खराब मौसम बताया जा रहा है. सेब कीमतों में बढ़ोतरी की मांग के लिए आंदोलनरत संयुक्त किसान मंच ने दाम घटाने के फैसले पर नाराजगी जताई है.

पिछले हफ्ते शिमला फल मंडी में सेब का प्रति पेटी औसत रेट 1400 से 2000 रुपए था. इस हफ्ते के आखिर में दाम घटकर 1100 से 1800 रुपये पहुंच गए हैं. सेब की एक पेटी में 25 किलो सेब आता है. दूसरी ओर अदाणी कंपनी इससे पहले ईएल (एक्सट्रा लार्ज) और पित्तू (ग्रेड से छोटा आकार) के सेब का दाम भी दो रुपए प्रतिकिलो कम कर चुकी है. अदाणी कंपनी ने इस महीने 15 अगस्त से अपने तीन कंट्रोल्ड एटमोसफेयर स्टोरों पर सेब खरीद शुरू की थी. जिसके खिलाफ किसान आंदोलन कर रहे हैं.

शुरुआत में कंपनी ने एक्स्ट्रा लार्ज सेब के 52 रुपये, लार्ज मीडियम स्माल के 76, एक्स्ट्रा स्माल के 68, एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा स्माल के 60 और पित्तू सेब के 52 रुपये प्रतिकिलो खरीद दाम तय किए थे. एक हफ्ते बाद कंपनी ने एक्स्ट्रा लार्ज और पित्तू आकार के सेब के रेट 52 से घटाकर 50 कर दिए. अब एक्स्ट्रा एक्स्ट्रा स्माल श्रेणी के सेब के दामों में भी दो रुपये की कटौती कर दी है. सेब के दामों मे कटौती से आदोलन कर रहे किसान बहुत रोष में है.

हरियाणा: मंत्रियों के घर के बाहर किसानों का प्रदर्शन!

किसान प्रदेशभर में ‘किसान देह शामलात और जुमला मालकाल भूमि के इंतकाल तोड़ने के आदेश के खिलाफ दो दिवसीय धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं. देह शामलात व जुमला मालकन भूमि किसानों से छीनने के आदेश को वापस करवाने के लिए मंत्रियों के घरों के बाहर किसान पंचायत जारी रहेगी. इस बीच किसान करनाल में मुख्यमंत्री मनोहर लाल के आवास के बाहर प्रदर्शन करने के लिए पहुंच गए. किसानों को सीेएम आवास तक पहुंचने से पहले रोकने के लिए पुलिस द्वारा भारी बैरिकेंडिंग की गई है किसानों ने सीएम आवास के पास धरना दिया है.

किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने पंचायत की सारी व्यवस्था व खाने पीने का सारा इंतजाम मंत्रियों के जिम्मे लगाया था और मंत्रीयों की ओर से ऐसा न करने पर धरना बढ़ाने की भी चेतावनी दी है. ठीक ऐसे ही पंचकूला में हरियाणा विधानसभा स्पीकर ज्ञानचंद गुप्ता के घर के बाहर खुद किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी किसानों के साथ प्रदर्शन करते नजर आये. किसान जब विधानसभा स्पीकर के घर के बाहर प्रदर्शन करने पहुंचे तो स्पीकर किसानों के आने की सूचना मिलते ही बाहर निकल चुके थे.

भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा, “मुख्यमंत्री ने विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान कहा था कि किसानों की जमीन के इंतकाल बदले जाएंगे और मलकियत नहीं बदली जाएगी, लेकिन अगर इंतकाल बदल जाता है तो किसान न तो जमीन को बेच सकता है न ही रहन कर सकता है और न ही बच्चों के नाम ट्रांसफर कर सकता है. उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री ने बुर्दी बरामदगी की जमीन को लेकर भी किसानों को गुमराह किया है। बुर्दी बरामदगी की जमीन पहले शामलात से बाहर रहती थी, किंतु 2020 में सरकार ने एक्ट में संशोधन कर इस छूट को हटा लिया था और बुर्दी बरामदगी को जमीन को शामलात देह में दर्ज कर दिया था.”

दूध के दाम बढ़ने से कंपनियों को मुनाफा,किसानों के हाथ लगी निराशा!

विटा, मदर डायरी समेत लगभग सभी दूध की कंपनियों ने पिछले हफ्ते ही दूध के मूल्य में दो रुपये की बढ़ोतरी की है. दूध की बढ़ी हुई कीमतों का सीधा असर जनता की जेब पर पड़ रहा है. लेकिन इस बीच दूध उत्पादन करने वाले किसानों को कोई लाभ नहीं पहुंच रहा है. 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी में से किसानों के दाम में एक पैसे की भी बढ़ोतरी नहीं हुई है. यह जनता की जेब से जाकर सीधा दूध कंपनियों की तिजोरी में जा रहा है.

हिंदी अखबार दैनिक ट्रिब्यून में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार अम्बाला डिस्ट्रिकट कॉर्पोरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर (विटा) ने दूध के रिटेल प्राइस पर प्रति लिटर 2 रूपए की वृद्धि की है. दूध की वृद्धि का मुनाफा किसानों और रिटेल डीलरों को न मिलकर सीधा मालिक को मिल रहा है.

दूध का रेट बढ़ने के बाद भी दूध उत्पादन करने वाले किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है. इससे पहले भी जुलाई में विटा ने अपने अन्य उत्पादों के दामों में बढ़ोतरी की थी और अब दूध पर भी 2 रूपये प्रति लिटर का इजाफा कर दिया है. दूध के बढ़े हुए दाम के साथ 500 मिलीलीटर डबल टोंड दूध का रेट 22 रुपये से 23 रुपये, स्टैंडर्ड मिल्क 27 रुपये से 28 रुपये, गोल्ड मिल्क का रेट 30 रुपये से 31 रुपये कर दिया है.

इसके अलावा गाय के दूध के रेट में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है. यह रेट 28 रुपये 500 मिलीलीटर ही रखा गया है. इन पर रिटेलर को सवा दो रुपये प्रति लीटर कमीशन भी दी जाती है. रिपोर्ट के अनुसार अम्बाला शहर का आकड़ा देखे तो अम्बाला मिल्क पॉइंट के पास रोजना करीब एक लाख लीटर की मांग है, यानी कंपनी को रोजाना 2 लाख और माह में 60 लाख का मुनाफा अकेले अम्बाला मिल्क पॉइंट से होता है.

जिले में 725 सोसायटी से दूध इकट्ठा किया जाता है, लेकिन इन समितियों से जुड़े किसानों को रिटेल दामों में की गयी वृद्धि से कोई मुनाफा नहीं दिया जाता है. साथ ही रिटेलरों के कमिशन में भी पिछले कई सालों से कोई इजाफा नहीं किया गया है. वहीं इस पर अम्बला विटा प्लांट के सीईओ, सर्वजीत सिंह ने अखबार को बताया कि, “अभी तक नुकसान उठाकर हमने आम लोगों को कम दाम में दूध बेचा है, लेकिन अब सबके दाम बढ़े हैं तो हमने केवल 2 रूपए प्रति लीटर का इजफा किया है. यह दर पूरे प्रदेश में लागू होती है, अभी खरीद के दाम व कमीशन के दाम नहीं बढ़ाए गये हैं.”

धान में बौनेपन की बीमारी पर गठित केंद्रीय टीम ने वायरस को बताया बीमारी की वजह!

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में धान फसल के पौधों में बौनेपन की अनजान बीमारी को लेकर आठ सदस्यीय टीम को ऑन स्पॉट आकलन के लिए प्रभावित राज्यों पंजाब और हरियाणा में जाने को कहा गया है. इस टीम को मंगलवार यानी एक दिन में ही विस्तृत रिपोर्ट कृषि मंत्रालय के एग्रीकल्चर कमिश्नर को सौंपने के लिए कहा गया. आईएआरआई ने धान में बौनेपन की बीमारी पर अपनी एक रिपोर्ट केंद्रीय कृषि मंत्रालय को सौंपी है. रिपोर्ट में बीमारी की वजह ग्रास स्टंट वायरस या फाइटोप्लाज्मा बैक्टीरिया की संभावना को माना जा रहा है.

रिपोर्ट के अनुसार फील्ड सर्वे में पाया गया कि धान की फसल में उर्वरक और जरूरी न्यूट्रीशन देने के बावजूद पौधों में बौनेपन की समस्या खत्म नहीं हुई. इस आधार पर माना जा सकता है कि पौधों के बौनेपन के पीछे उर्वर तत्वों की कमी नहीं है. बीमारी से प्रभावित पौधों के सैंपल की जांच करने के बाद फाइटोप्लाज्मा बैक्टीरिया या ग्रास स्टंट वायरस को इसका कारण माना जा रहा है. इन सैंपल के डीएनए को अलग कर इनकी जीन सिक्वेंसिंग की रिपोर्ट काफी हद तक पौधों में बौनेपन (स्टंटिंग) समस्या को स्पष्ट कर सकेगी.

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस में छपी रिपोर्ट के अनुसार राजेंद्र नाम के किसान ने 22 से 25 जून के बीच अपने 9 एकड़ खेच में धान की पीआर-121 और पीआर-113 की किस्म लगाई थी पहले 30 से 35 दिनों तक फसल में अच्छी ग्रोथ हुई लेकिन इसके बाद धान की फसल की ग्रोथ रुक गई.

वही करनाल स्थित डॉ वीरेन्द्र सिंह लाठर, जो पिछले एक दशक से तर-वत्तर सीधी बिजाई धान तकनीक पर कार्यरत हैं ने बताया कि धान फसल में बौनेपन का मुख्य कारण टूँगरो वायरस कम्पलेक्स है. जिसका प्रकोप मुख्यता प्राइवेट कम्पनियों के बिना टेस्ट किये हाइब्रीड व नकली बीज सीधे किसानों को बेचने से बढा है. टूँगरो वायरस का प्रसार कीट द्वारा धान फसल में फैलता है इस बीमारी से बचाव के लिए, किसान धान फसल क्षेत्र को खरपतवार से मुक्त रखें और कीट नियंत्रण के लिए कलोरोपायरीफास आदि दवा का छिड़काव करें और धान बीज केवल सरकारी कृषि विश्वविधालय व संस्थान से ही खरीदें.

कमजोर रणनीति और मानसून के चलते अनाज के दामों में बढ़ोतरी के आसार!

कुछ राज्यों में मानसून देरी से आया है इस कारण बोये गए चावल का रकबा पिछले वर्ष की तुलना में कम हुआ है. आंकड़ो में कहें तो 29 जुलाई, 2022 तक 231.59 लाख हेक्टेयर रकबे में ही चावल बोया गया है. जोकि पिछले साल के इसी समय काल की तुलना में करीबन 36 लाख हेक्टेयर कम है. पिछले साल इन दिनों चावल का रकबा 267.05 हेक्टेयर रहा था. धान के रकबे में आयी कमी समेत अन्य कारणों से भी अनाजों के दामों में महंगाई बढ़ने का डर सताने लगा है. वहीं इस मुद्दे पर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है. नोमुरा ग्लोबल इकोनॉमिक्स और सीइआईसी का अनुमान कहता कि भले ही दक्षिण पश्चिम मानसून सामान्य से कमजोर हो या सामान्य से मजबूत फूड के रिटेल इनफ्लेशन में वृद्धि नहीं होगी. वहीं दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ कमजोर मानसून को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं. धान के बड़े रकबे वाले राज्यों में कमजोर मानसून भविष्य में अनाजों के दामों में उछाल का बड़ा कारण हो सकता है.

हाल ही में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग ने रिटेल महंगाई पार आंकड़े जारी किये है. जिसमें रिटेल महंगाई में कमी आई है. पर अनाजों के रिटेल मूल्यों में बढ़ोतरी हुई है. आंकड़ो की भाषा में कहें तो अनाज और उत्पादों की महंगाई दर जून (2022) में 5.66% थी जो बढ़कर जुलाई माह (2022) में 6.90% हो गई.

दिख रहे है खतरे के बादल!

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले आर्थिक सलाहकार कार्यालय ने जुलाई, 2022 के लिए थोक मूल्य सूचकांक को जारी किया गया है. सूचकांक के अनुसार अनाज और उत्पादों के मूल्यों (थोक) में भारी उछाल आया है. इस उछाल का प्रभाव खाद्य सामानों के रिटेल मूल्यों पर भी देखा जा सकता है.

थोक मूल्यों के प्रभाव को रिटेल स्तर पर कम करने के लिए सरकार अपने भण्डारण में से “ओपन मार्किट सेल स्कीम” (OMSS) के तहत बाजार में अनाज जारी करती है.

वहीं सरकार के 15 जुलाई तक के आंकड़े यह कह रहे हैं कि चावल बोये गए रकबे में भी कमी आयी है. इस वर्ष बोये गए चावल का इलाका 128.5 लाख हेक्टे. है. जोकि पिछले वर्ष की तुलना में कम है ( 155.53 लाख हेक्टे.)

राहत की बात!

चावल और गेहूं से इतर मोटे अनाजों की बुवाई का रकबा बढ़ा है. सरकारी के आंकड़ों के अनुसार 28 जुलाई, 2022 तक बोया गया इलाका 142.21 लाख हेक्टेयर था. जोकि पिछले वर्ष के इसी समय (28 जुलाई, 2021) की तुलना में (135.30 लाख हेक्टेयर) अधिक है.

ऐसी ही उम्मीद की किरण दालों से भी मिली है. 27 जुलाई,2022 तक बोई गई दलहनी फसलों का रकबा 106.18 लाख हेक्टेयर था. जोकि पिछले वर्ष के इसी समय (27 जुलाई, 2021) की तुलना में अधिक है. (103.23लाख हेक्टे.)

भण्डारण की क्या स्थिति है?

भण्डारण के पीछे सरकार के दो उद्देश्य होते हैं. पहला, सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन. दूसरा, अगर बाजार में खाने के सामानों के मूल्यों में बढ़ोतरी हुई हो तो आपूर्ति करके कीमतों में कमी लाना. सरकार आपूर्ति करने के लिए “ओपन मार्केट सेल स्कीम” का प्रयोग करती है. अब दिक्कत यह है कि सरकार के पास में भी “ओपन मार्केट सेल स्कीम” के लिए जरूरी गेहूं का भंडारण नहीं है. 1 जलाई,2022 के आंकड़ों के अनुसार केन्द्रीय भंडारगृह में गेहूं का कुल भंडारण 285.10 लाख टन था जोकि पिछले वर्ष के उसी समयकाल से बहुत कम है(603.56 लाख टन)

इसके पीछे का एक कारण (संयुक्त राष्ट्र के कृषि विभाग के अनुसार) खरीफ सीजन में तापमान का बढ़ना है (मार्च,2022) जिससे पैदावर में 10-15% की कमी आयी. दूसरा कारण यह है कि किसान व्यावसायिक फसलों के उत्पादन को वरीयता दे रहे है. 27 जनवरी 2022 के आंकड़े कह रहे हैं कि रबी में गेहूं का रकबा कम हुआ है. 27 जनवरी 2022 को 342.37 लाख हेक्टेयर था वहीं पिछले वर्ष के इसी समय काल में 345.86 लाख हेक्टेयर.

व्यवसायिक फसलों के रकबे में हुए बढ़ोतरी का एक कारण सरकार द्वारा msp में बढ़ोतरी करना भी है. रबी सीजन 2021-22 के लिए सरसों की msp में भारी वृदि की गई थी. परिणामस्वरूप रकबे में इजाफा हुआ. 27 जनवरी,2022 को बोये गए सरसों का रकबा 91.44 लाख हेक्टे. था जोकि पिछले वर्ष के रबी सीजन (73.12 लाख हेक्टे.)की तुलना में अधिक है.

यूक्रेन और रूस का युद्ध शुरू होता है. यह भ्रम फैल जाता है कि गेहूं की कमी होने वाली है, भारत में निजी बाजार किसानों से ऊँचे दामों पर खरीददारी शुरू कर देते हैं. फलस्वरूप सरकारी संस्थाओं के पास किसान msp पर फसल बेचने नहीं आते हैं. नीचे दी गई टेबल में देखिये पंजाब, हरियाणा, राजस्थान,मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में पिछले वर्ष की तुलना में भण्डारण कम हुआ है.

प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत 81 करोड़ व्यक्तियों को प्रति माह पांच किलोग्राम अनाज (चावल/गेहूं) फ्री दिया जाता है. गेहूं की कमी के कारण गुजरात और उत्तरप्रदेश की सरकारों ने पहले 2 किलोग्राम चावल और 3 किलोग्राम गेहूं देना शुरू किया फिर 3 किलो चावल और 2 किलो गेहूं. विषय से इतर कई विशेषज्ञों का कहना है कि हाल ही में खाने की कई खाने वस्तुओं पर लगाया गया GST, खाने के सामानों की रिटेल दर में बढ़ोतरी कर सकता है.

साभार- im4change

अनाजों की महंगाई दर क्या  है ? कैसे की जाती है इसकी गणना?

भारत में महंगाई की गणना दो सूचकांक से की जाती है. पहले सूचकांक में वस्तुओं के थोक मूल्यों (wholesale price) को शामिल किया जाता है वहीं दूसरे सूचकांक में उपभोक्ता द्वारा चुकाएं गए मूल्य (consumer price सभी कर जोड़ने के बाद किस कीमत पर वस्तु ग्राहक को मिल रही है).


अनाजों के दामों में महंगाई की गणना को दोनों सूचकांकों के माध्यम से समझ सकते हैं.

सबसे पहले किसान के खेत से बाजार में उसे क्या मूल्य मिल रहा है. बाजार में बेचे जाने के बाद वो थोक व्यापारियों के पास जाएगा. थोक व्यापारी जिस दर पर बेचेंगे उसका अगर सूचकांक बनाये तो वो थोक मूल्य सूचकांक कहलाएगा.
थोक स्तर पर बिका हुआ सामान रिटेल में बेचा जाएगा. यानी कीमत का एक निश्चित गैप बना रहेगा, रिटेल और थोक कीमतों के बीच. अगर थोक मूल्यों में बढ़ोतरी होती है तो रिटेल मूल्यों में भी बढ़ोतरी होगी.

महंगाई के स्तर को मापने के लिए वर्तमान माह की तुलना पिछले वर्ष के उसी महीने से की जाती है. यानी आपको जुलाई 2022 में महंगाई को मापना है तो आप 2021 के जुलाई माह से तुलना करेंगे.

दिल्ली: दिल्ली पुलिस की रोक-टोक के बाद भी किसान महापंचायत में जुटे हजारों किसान!

किसान संगठनों द्वारा दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक दिवसीय किसान महापंचायत बुलाई गई है. यह किसान महापंचायत लखीमपुर हत्याकांड के मुख्यारोपी राज्य मंत्री अजय मिश्र के बेटे आशीष मिश्र को सजा दिलाने और मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर बुलाई गई है. किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए सरकार के इशारों पर दिल्ली पुलिस किसानों का रास्ता रोकने में जुटी थी. सड़क के रास्ते को रोका गया तो किसान रेल के रास्ते दिल्ली पहुंच गए.

दिल्ली पहुंचे किसानों ने गांव-सवेरा के पत्रकार मनदीप पुनिया को बताया कि दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद भी पुलिस ने हमारा रास्ता रोकने की कोशिश की. पुलिस ने हमें अपनी बसों में बैठने को कहा लेकिन हम लोगों ने पुलिस की बसों में बैठने से मना कर दिया. पुलिस ने जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर भारी बैरिकेडिंग कर रखी है.

वहीं पंजाब के मानसा से दिल्ली पहुंची 70 साल की बुजुर्ग माता ने कहा हम लखीमपुर में मारे गए किसानों को न्याय दिलाने के लिए पहुंचे हैं. साथ ही बिजली संशोधन बिल-2022 वापिस होना चाहिए.

संयुक्त किसान मोर्चा अराजनैतिक की ओर से जारी प्रेस रिलीज में किसान महापंचायत की प्रमुख मांगें.
1). लखीमपुर खीरी नरसंहार के पीड़ित किसान परिवारों को इंसाफ, जेलों में बंद किसानों की रिहाई व नरसंहार के मुख्य दोषी केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी की गिरफ्तारी की जाए.
2). स्वामीनाथन आयोग के C2+50% फॉर्मूले के अनुसार एमएसपी की गारंटी का कानून बनाया जाए.
3). देश के सभी किसानों को कर्जमुक्त किया जाए.
4). बिजली संशोधन बिल-2022 रद्द किया जाए.
5). गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाया जाए और गन्ने की बकाया राशि का भुगतान तुरन्त किया जाए.
6). भारत WTO से बाहर आये और सभी मुक्त व्यापार समझौतों को रद्द किया जाए.
7). किसान आंदोलन के दौरान दर्ज किए गए सभी मुकदमे वापस लिए जाएं.
8). प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत किसानों के बकाया मुआवज़े का भुगतान तुरन्त किया जाए.
9). अग्निपथ योजना वापिस ली जाए.

22 अगस्त को जंतर-मंतर पर किसान पंचायत, रोड़े अटकाने में जुटी दिल्ली पुलिस!

संयुक्त किसान मोर्चा ने एसएसपी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य, अग्निपथ योजना और लखीमपुर हिंसा के मुद्दों पर केंद्र सरकार के विरोध में 22 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर पर पंचायत की कॉल दी है. जंतर-मंतर पर पंचायत के बाद किसान अपनी सभी मांगों को लेकर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सैंपेंगे. वहीं कोई भी राजनीतिक संगठन इस कार्यक्रम का हिस्सा नहीं होगा.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाली पंचायत में जहां एक ओर किसान भारी संख्या में पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर दिल्ली पुलिस किसानों को जंतर-मंतर पर पहुंचने से रोकने के लिए पहले की तरह बैरिकेडिंग करने में जुट गई है. जंतर-मंतर पर होने जा रही किसान पंचायत के एक दिन पहले ही दिल्ली में प्रवेश करने वाले सभी वाहनों की चैकिंग की जा रही है खासकर किसानी झंड़े लगे वाहनों को रोका जा रहा है. खबर है कि दिल्ली पुलिस द्वारा टिकरी बॉर्डर पर बड़े-बड़े पत्थर रखने के साथ सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं. इसके साथ ही दिल्ली में प्रवेश करने वाले हर रास्ते पर नाके लगाकर चैकिंग की जा रही है.

करीबन एक साल तक दिल्ली के बॉर्डरों पर धरना देने वाले किसान सरकार के वादों से संतुष्ट नहीं हैं. सरकार ने हालंहि में बिलजी संशोधन बिल-2022 पेश कर दिया है जिसको लेकर देशभर के किसान रोष व्यक्त कर चुके हैं. वहीं किसानों पर दर्ज केस अब तक वापस नहीं लिए गए हैं जिसके चलते किसान सरकार से नाखुश हैं. साथ ही सरकार ने एमएसपी गारंटी को लेकर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया है. सरकार पर दबाव बनाने के लिए किसानों जंतर-मंतर पर किसान पंचायत करने जा रहे हैं.