भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या में आई भारी गिरावट, मात्र 9% महिलाएं ही वर्कफोर्स का हिस्सा-रिपोर्ट

 

कोरोना महामारी का देश में रोजगार और अर्थव्यवस्था पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा है. कोरोना की पहली लहर की वजह से 25 मार्च, 2020 को पूरे देश में लॉकडाउन किया गया. जिसकी वजह से लगभग सभी उद्योग और व्यापार अचानक ठप हो गए. कुछ ही हफ्तों में देश भर में अनुमानित 10 करोड़ लोगों ने अपनी नौकरी खो दी. साथ ही बड़ी संख्या में मजदूरों को गांव लौटना पड़ा. इस दौरान बड़ी संख्या में महिला कर्मचारियों का भी काम छुट गया.

हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था में कामकाजी महिलाओं की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के कार्यबल में कामकाजी महिलाओं का अनुपात 2010 में जहां 26% था, वहीं 2020 में यह घट कर 19% से भी कम हो गया.

यही नहीं महामारी ने हालातों को और भी ज्यादा बिगाड़ दिया. देश में पहले से ही गिरती अर्थव्यवस्था के ग्राफ को महामारी ने और भी ज्यादा गिरा दिया. ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट के अनुसार साल 2022 में अर्थव्यवस्था में कामकाजी महिलाओं की संख्या 19% से घट कर मात्र 9% ही रह गई है. रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में, महामारी के दौरान पुरुषों की तुलना में महिलाओं की नौकरी जाने की संभावना अधिक थी, और उनकी रिकवरी अभी भी धीमी रही है.

यह भारत की अर्थव्यवस्था, युवा महिलाएं और लड़कियों के लिए के लिए विनाशकारी खबर है, जिसे बिलकुल भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए. अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, भारत में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के वर्कफोर्स में लौटने की संभावना कम है.

ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स विश्लेषण के अनुसार, देश में पुरुषों और महिलाओं के बीच रोजगार का अंतर 58 फीसदी है, जिसे अगर जल्द ही खत्म किया जाता है तो 2050 तक भारत की अर्थव्यवस्था लगभग एक-तिहाई तक बढ़ सकती है.

दूसरी ओर, यदि कुछ नहीं किया जाता तो वैश्विक बाजार के लिए भारत का प्रतिस्पर्धी उत्पादक बनने का लक्ष्य और सपना पटरी से उतरने का जोखिम होगा.

रिपोर्ट के मुताबिक महिलाएं भारत की कुल जनसंख्या का 48% हैं लेकिन देश के सकल घरेलू उत्पाद जिसे अंग्रेजी में जीडीपी कहते हैं, में उनका योगदान केवल 17% ही है. वहीं दुसरी ओर दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाला देश चीन की जीडीपी में महिलाओं का योगदान 40% तक है.

रिपोर्ट के अनुसार लैंगिक असमानता को खत्म करके कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ाने से 2050 तक वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में 20 ट्रिलियन (लगभग 1,552 लाख करोड़ रुपये) जोड़ने में मदद मिलेगी.

रिपोर्ट के अनुसार अर्थशास्त्रियों का मानना है कि महामारी से पहले ही भारत की आर्थिक वृद्धि धीमी हो गई थी. कार्यबल में कामकाजी महिलाओं की गिरावट चिंताजनक है. दूसरी ओर, सरकार ने कामकाजी महिलाओं के लिए काम करने की स्थिति में सुधार के लिए बहुत ही कम प्रयास किया है. विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं.

भारतीय जॉब मार्किट में महिलाओं के साथ साथ पुरुषों के भी हालात कुछ खास ठीक नहीं है. स्थिति इतनी खराब हो गई है कि भारत में रोज़गार की उम्र वाले लोगों में से आधे लोगों ने अब किसी रोज़गार की तलाश ही छोड़ दी है और घर बैठने का निश्चय किया है. और इन लोगों की संख्या में लगातार इज़ाफा भी हो रहा है. अर्थव्यवस्था पर नज़र रखने वाली संस्था सेंटर फॉर मोनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमईआई) के जारी नए आंकड़ों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था में भाग लेने वाले कामगारों का हिस्सा 2016 के मुकाबले 15% और अधिक कम हो गया है.

दुनिया भर में लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन की दर करीब 60 फीसदी है, यानी काम करने वाले उम्र के सभी लोगों में 60 फीसदी या तो काम कर रहे हैं या फिर काम ढूंढ़ रहे हैं. जबकि भारत में पिछले दस सालों में लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन की दर गिरते-गिरते दिसंबर, 2021 में 40 फीसदी पर जा पहुंची है. जबकि पांच साल पहले यह 47 फीसदी थी.