सोमवार, 03 अक्टूबर 2022
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विमुक्त घुमंतू जनजातियों की अनदेखी करने पर योगी सरकार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की फटकार!



उत्तर प्रदेश में 29 जनजातियों को अब तक विमुक्त घुमंतू जाति के प्रमाणपत्र जारी नहीं किये गए हैं. जाति प्रमाण पत्र न होने के कारण इन जनजातियों को सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है.

उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा विमुक्त घुमंतू जनजातियों को सरकारी योजनाओं से वंचित रखने की शिकायत मिलने पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने उत्तरप्रदेश की योगी सरकार को फटकार लगाई है. राष्ट्रीय मानवधिकार आयोग ने एक शिकायत पर संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखते हुए मामले में कार्रवाई न करने पर कानूनी दंढ भुगतने की चेतावनी जारी की है. 

इस मामले में उत्तर प्रदेश के सामाजिक कार्यकर्ता मोहित तंवर ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को उत्तर प्रदेश सरकार की शिकायत की थी. मोहित ने अपनी शिकायत में सरकार द्वारा विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों को योजनाओं का लाभ नहीं पहुंचाने का आरोप लगाया है.

उत्तर प्रदेश में 29 जातियों को विमुक्त घुमंतू जनजाती का दर्जा प्राप्त है. फिलहाल ये जनजातियां अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग में शामिल हैं. जिसके चलते इन जातियों को डीएनडी (डिनोटिफाईड ट्राईब्स) होने का लाभ नहीं मिल पा रहा है.

इन जनजातियों को अब तक विमुक्त घुमंतू जाति के प्रमाणपत्र जारी नहीं किये गए हैं. जाति प्रमाण पत्र न होने के कारण इन जनजातियों को सरकारी योजनाओं का कोई लाभ नहीं मिल रहा है और इस समाज के बच्चे शिक्षा के अधिकार से भी वंचित हैं. 

इन लोगों को न केवल उत्तर प्रदेश सरकार की योजनाओं का बल्कि केंद्र सरकार की योजनाओं का भी लाभ नहीं मिल पा रहा है. डीएनटी प्रमाण पत्र बनाने की मांग को लेकर कईं सामाजिक संगठन लगातार मांग कर रहे हैं.

यहां तक कि इससे पहले केंद्र सरकार का सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय भी इस संबंध में राज्य सरकार को तीन पत्र लिख चुका है लेकिन उसके बाद भी उत्तर प्रदेश सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया. बता दें कि उत्तर प्रदेश में विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों की सबसे ज्यादा 6 करोड़ आबादी है.

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख सचिव से इस मामले में दो हफ्ते के भीतर विमुक्त जातियों को जाति प्रमाण पत्र जारी करने का कड़ा निर्देश देते हुए फटकार लगाई है.

दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार ने विमुक्त जातियों को मिलने वाली योजनाओं के लाभ को अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के साथ मिला रखा है. ऐसे में अगर विमुक्त घुमंतू जनजाति का कोई अभ्यर्थी दावेदार नहीं मिलता है तो उनके बजट का पूरा लाभ अपने आप अनुसूचित जातियों के खाते में ट्रांसफर हो जाता है.विमुक्त जाति के प्रमाण पत्र के अभाव में विमुक्त जाति के विद्यार्थी एवं अभ्यर्थी अपने हक का दावा नहीं कर पा रहे हैं. 

सामाजिक कार्यकर्ता मोहित तंवर ने गांव-सवेरा से बात करते हुए कहा,” घुमंतू एवं विमुक्त जनजातियां आजादी के 5 साल बाद 1952 तक भी गुलामी का दंश झेलती रहीं. 1857 की क्रांति में इन जनजातियों ने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ अपना लोहा मनवाया था. जिसके चलते 1971 में अंग्रेजी सरकार ने इन जनजातियों पर क्रिमिनल ट्राईब एक्ट लगाकर दबाने की कोशिश की. आज ये जनजातियां मुख्यधारा से कटी हुईं हैं. सरकारों की ओर से इनके उत्थान के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गईं लेकिन घोषणाओं पर कोई अमल नहीं हुआ. हम चाहते हैं कि सरकार इऩ जनजातियों के साथ न्याय करें और विमुक्त एवं घुमंतू जनजातियों को मुख्यधारा से जोड़ने का काम करे.