शनिवार, 04 फ़रवरी 2023
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डीएनटी समुदाय की आजादी और संघर्ष की घटनाओं पर प्रकाश डालती किताब ‘विमुक्त’!



यह किताब देश के अलग-अलग हिस्सों, संस्कृति और भाषा से आने वाले डीएनटी समुदाय के लोगों की कहानियों का संकलन है. डीएनटी समुदाय से जुड़े लोगों के जीवन के व्यक्तिगत अनुभवों, रोजमर्रा के संघर्षों, नाटकों और केस स्टडी का अपनी तरह का पहला संकलन है.

देश में करीबन 15 करोड़ की आबादी वाली विमुक्त घुमंतू जनजातियां हर साल 31 अगस्त को ‘विमुक्ति’ दिवस के तौर पर मनाते हैं. इस बार विमुक्ति दिवस के मौके पर 31 अगस्त को डीएनटी से जुड़ी कहानियों के संकलन ‘विमुक्त’ का विमोचन होगा. ‘विमुक्ता’ का संपादन प्रोफेसर हेनरी श्वार्ज और दक्षिण छारा ने किया है. अहमदाबाद के छारानगर के रहने वाले दक्षिण छारा डिनोटिफाइड ट्राइब से आते हैं. यह किताब विमुक्त घुमंतू जनजातियों की आजादी की कहानियों का संकलन है.

दक्षिण छारा सोशल एक्टिविस्ट के साथ-साथ अहमदाबाद में छारा डिनोटिफाइड जनजाति से आने वाले पहले फिल्म निर्देशक हैं. दक्षिण छारा बॉलीवुड हिंदी फिल्म ‘समीर’ का निर्देशन कर चुके हैं. विमुक्त घुमंतू जनजातियों के संघर्ष की कहानियों के संकलन ‘विमुक्त’ के दूसरे संपादक प्रोफेसर हेनरी श्वार्ज है. प्रोफेसर हेनरी श्वार्ज जॉर्ज टाउन विश्वविद्यालय से जुड़े रहे हैं और प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी के समय से डीएनटी समुदायों पर काम कर रहे हैं.

किताब में डिनोटिफाइड ट्राइब्स से आने वाले लोगों के संघर्ष की कहानियां हैं. यह किताब देश के अलग-अलग हिस्सों, संस्कृति और भाषा से आने वाले डीएनटी समुदाय के लोगों की कहानियों का संकलन है. यह डीएनटी समुदाय से जुड़े लोगों के जीवन के व्यक्तिगत अनुभवों, रोजमर्रा के संघर्षों, नाटकों और केस स्टडी का अपनी तरह का पहला संकलन है.

किताब के लेखक दक्षिण छारा ने गांव-सवेरा को बताया, “इस किताब में केवल कहानियां नहीं बल्कि असल जीवन की घटनाएं भी शामिल हैं. हमारे समुदाय में लिखने वाले बहुत कम लोग हैं. ऐसे में हमारी जनजातियों पर जो भी अत्याचार होता है उसको दूसरे समुदाय के लोग लिखते हैं. उस लिखे हुए में वो दर्द और असलियत सामने नहीं आती है इसलिए जिस समुदाय ने जिन घटनाओं का सामना किया है वो जब लिखता है तो वह घटनाओं का असली रूप होता है. इसलिए मुझे महसूस हुआ कि हमें लिखना चाहिए.”

आगे उन्होंने बताया कि किताब में डीएनटी समुदाय से आने वाले पेशे से वकील सुब्बा राव की लिखी कहानी है. सुब्बा राव ने डीएनटी जोड़े की कहानी लिखी है. जिसमें जिक्र है कि डीएनटी जोड़े के सामने किस तरह की चुनौतियां आती हैं और इन चुनौतियों के बीच वो कैसे अपना जीवन यापन करते हैं. साथ ही डीएनटी समुदाय से आने वाले महाराष्ट्र के भीमराव जाधव के जीवन की घटनाओं पर आधारित किस्सा है. भीमराव जाधव का जन्म सोलापुर के सेटलमेंट में हुआ था. किताब में भीमराव जाधव के सेटलमेंट में रहने से लेकर उनकी गांधी और अंबेडकर से मुलाकात का जिक्र है. यह किताब नवयाना पब्लिकेशन से आ रही है. प्रोफेसर गणेश देवी और प्रो हेनरी और एस आनंद पुस्तक के विमोचन में शामिल रहेंगे.

दक्षिण छारा अहमदाबाद में डीएनटी समुदाय के युवा कलाकारों के साथ मिलकर बुद्धन थिेएटर ग्रूप भी चलाते हैं जिसमें डीएनटी समुदाय से जुड़े युवा कलाकार नाटक के जरिए लोगों को डीएनटी समुदाय से जुड़े मुद्दों को लेकर जागरुक करने का काम करते हैं. पुस्तक के प्रमोशन के लिए बुद्धन थिएटर के कलाकार अनिश गार्गे, चेतन और विकास ने एक वीडियो तैयार है. वीडियो में पुस्तक का प्रमोशनल गीत डीएनटी समुदाय की अपनी ‘भांतू’ भाषा में गाया गया है.


कौन हैं डीएनटी?

1871 में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लगाए गए क्रिमीनल ट्राइब एक्ट (सीटीए) के तहत सरकारी दमन का शिकार हुईं ऐसी जनजातियां जो अंग्रेजों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध लड़ने के लिए जाने जाती थीं. क्रिमीनल ट्राईब एक्ट लागू करके अंग्रेजी सरकार ने इन जनजातियों पर जन्मजात अपराधी होने के ठप्पा लगा दिया. 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ लेकिन ये जनजातियां 31 अगस्त 1952 तक आजाद देश में गुलामी का दंश झेलती रहीं. यानी ये जनजातियां देश आजाद होने के पांच साल बाद तक भी गुलाम रहीं. इन जनजातियों को 31 अगस्त 1952 को डिनोटीफाई किया गया. तब से इन जनजातियों को डिनोटिफाईड ट्राईब्स के नाम से जाना जाता है. यह जनजातियां हर साल 31 अगस्त को विमुक्ती दिवस के तौर पर मनाते हैं.