ट्रैक्टरों के साथ फिर दिल्ली जाएंगे किसान, बजट सत्र में करेंगे संसद मार्च!

26 जनवरी को संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर हरियाणा के जींद में हुई किसान महापंचायत में बड़ी संख्या में किसान जुटे किसानों ने इस किसान महापंचायत के जरिए मुख्य रूप से गन्ना किसानों के लिए गन्ने का रेट 450 रुपये करने की मांग की. वहीं संयुक्त किसान मोर्चा ने बजट सत्र के दौरान 15 से 22 मार्च के बीच मार्च टू पार्लियामेंट का आयोजन करने का प्रस्ताव पास किया. दिल्ली संसद मार्च की तारीख का एलान 9 फरवरी को कुरुक्षेत्र की मीटिंग में किया जाएगा.

वहीं किसान महापंचात में जुटे बड़े किसान नेताओं ने खेती किसानी से जुड़े मुख्य मुद्दों को हासिल करने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर आंदोलन तेज करने की बात कही. किसान महापंचायत में केंद्र की मोदी सरकार पर लिखित आश्वासन के बावजूद पीछे हटने का आरोप लगाया गया.

जींद में हुई किसान महापंचायत में किसान नेताओं ने मंच से किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी प्राप्त करने, लखीमपुर खीरी हत्याकांड के आरोपी राज्य मंत्री अजय मिश्रा को हटाने और उसके बेटे आशीष मिश्रा को सजा दिलाने, बिजली संशोधन विधेयक-2022 को वापस करवाने और कर्जमाफी जैसे मुद्दों पर कमर कसने का आह्वान किया. यह घोषणा की गई कि बजट सत्र के दौरान 15 से 22 मार्च के बीच मार्च टू पार्लियामेंट का आयोजन किया जाएगा. सटीक तिथि की घोषणा 9 फरवरी को कुरुक्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर की एसकेएम बैठक में की जाएगी.

गन्ने के रेट में 10 रुपये की बढ़ोतरी पर ही राजी हुए चढ़ूनी, आंदोलन खत्म करने का किया एलान!

हरियाणा सरकार की ओर से गन्ने के लिए एसएपी में 10 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी के एक दिन बाद, भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) ने गन्ने की कीमतों के लिए अपना विरोध बंद कर दिया है और चीनी मिलों की आपूर्ति फिर से शुरू करने का फैसला किया है. बुधवार को सीजन के लिए एसएपी बढ़ाकर 372 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया गया था,जबकि किसान 450 रुपये प्रति क्विंटल की मांग कर रहे थे. 20 जनवरी से आपूर्ति बंद कर दी गई थी, जिससे चीनी मिलों में कामकाज ठप हो गया था.

कृषि कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करने के बाद, बीकेयू (चढ़ूनी) के नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा, “सरकार द्वारा बढ़ाया गया SAP अपर्याप्त था, लेकिन गन्ने को खेतों में खड़ा नहीं छोड़ा जा सकता है. किसानों को किसी तरह का आर्थिक नुकसान न हो, इसके लिए जनभावनाओं को देखते हुए चीनी मिलों को आपूर्ति फिर से शुरू करने का निर्णय लिया गया है. हालांकि, अगर एसकेएम गन्ने की कीमतों को लेकर आंदोलन का आह्वान करता है, तो यूनियन एसकेएम को अपना समर्थन देगी.”

वहीं बीकेयू (चढ़ूनी) द्वारा आंदोलन को वापस लेने का निर्णय भाजपा के लिए एक बड़ी राहत के रूप में आया है क्योंकि किसानों ने इससे पहले 29 जनवरी को गोहाना में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की रैली के दौरान विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया था.

गुरनाम चढ़ूनी ने कहा, “यह भी तय किया गया है कि अमित शाह की रैली के दौरान कोई प्रदर्शन नहीं किया जाएगा. लेकिन आने वाले चुनावों में बीजेपी का विरोध करने का भी सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया है.”

BBC डॉक्यूमेंट्री पर भारत द्वारा प्रतिबंध अघोषित आपातकाल की मुनादी है!

साल 2002 में गुजरात के मुस्लिम-विरोधी दंगों पर आधारित बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री  ‘द मोदी क्वेश्चन’ पर भारत सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की आलोचना को दबाने की एक और कोशिश है. पिछले हफ्ते, बीबीसी ने अपनी डॉक्यूमेंट्री के दो भाग का पहला भाग “द मोदी क्वेश्चन” प्रसारित  किया. यह डॉक्यूमेंट्री यूनाइटेड किंगडम के विदेश, राष्ट्रमंडल और विकास विभाग की एक पूर्व अप्रकाशित रिपोर्ट के निष्कर्षों को उजागर करती है, जिसमें 2002 के दंगों, जब प्रधानमंत्री मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, की जांच की गई थी. डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण के तुरंत बाद, भारत सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों को भारत में यह वीडियो हटाने के लिए मजबूर किया.

फरवरी 2002 में, कुछ मुसलमानों द्वारा एक ट्रेन, जिसमें हिंदू तीर्थयात्री सवार थे, पर हमले के बाद पूरे गुजरात में बदले की कार्रवाइयों में बलात्कार और हत्याएं की गई थीं. खबरों के मुताबिक दंगों में 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम थे. ऐसे आरोप लगाए गए कि राज्य सरकार ने मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की रोकथाम के लिए कार्रवाई नहीं की. प्रायः इस हिंसा का नेतृत्व मोदी की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) या इसके सहयोगी संगठनों के नेताओं ने किया. इस घटना की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आलोचना हुई. यूके की रिपोर्ट में पाया गया है कि जिस माहौल में हिंसा हुई, उस “बेख़ौफ़ माहौल” के लिए मोदी “सीधे तौर पर जिम्मेदार” थे. ब्रिटेन समेत अनेक विदेशी सरकारों ने उस समय मोदी से किसी प्रकार के संबंध पर रोक लगा दी थी, जबकि अमेरिका ने उनका वीजा रद्द कर दिया था.

2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सब कुछ बदल गया. भारतीय अधिकारियों और भाजपा समर्थकों ने उनकी छवि सुधारने के लिए कड़ी मेहनत की. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारतीय राजनयिक मानवाधिकारों के गंभीर हनन में मोदी की संलिप्तता की किसी भी आलोचना का सख्त विरोध करते हैं.

2022 में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक साजिश साबित करने संबंधी पर्याप्त सबूत नहीं होने के पुलिस जांच निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए, मोदी को आपराधिक जिम्मेदारी के आरोपों से मुक्त कर दिया.

लेकिन घाव तभी भरते और मानवाधिकार संबंधी दायित्व पूरे होते हैं जब न्याय और गलतियों में सुधार के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता हो. इसके बजाय, बीजेपी समर्थकों ने 2002 के दंगों में सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषी लोगों को सम्मानित किया. हिंदू श्रेष्ठता की भाजपा की विचारधारा ने न्याय प्रणाली और मीडिया में घुसपैठ कर ली है. इसने पार्टी समर्थकों को इस तरह लैस कर दिया है कि वे धार्मिक अल्पसंख्यकों, खास तौर से मुसलमानों को बेखौफ होकर धमकाएं, हैरान-परेशान करें और उन पर हमला करें. मोदी सरकार ने मुसलमानों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कानून और नीतियां लागू की है और स्वतंत्र संस्थानों पर अंकुश लगाने की कोशिश की है. इसने अपने आलोचकों को जेल में डालने के लिए अक्सर कठोर कानूनों का इस्तेमाल किया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने विकास और रणनीतिक साझेदारी के लिए भारत के साथ अंतर्राष्ट्रीय जुड़ाव पर जोर दिया है. लेकिन भारत की छवि तब बेहतर होगी अगर सरकारी तंत्र तमाम भारतीयों के अधिकारों – और इन मुद्दों पर जनता का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश कर रहे लोगों के अधिकारों – की रक्षा के लिए अधिक-से-अधिक प्रयास करे.

गन्ने के रेट में बढ़ोतरी को लेकर आंदोलन तेज, अमित शाह की रैली का विरोध करेंगे किसान!

प्रदेश के गन्ना किसानों ने भारतीय किसान यूनियन (चढ़ूनी) के बैनर तले किसानों ने गन्ने के राज्य सलाहकार मूल्य (एसएपी) में बढ़ोतरी की मांग पूरी नहीं होने पर सरकार के खिलाफ अपना आंदोलन तेज करने की घोषणा की. किसानों ने राज्य भर में कई विरोध प्रदर्शनों की घोषणा की, जिसमें ट्रैक्टर मार्च, गन्ने की ‘होली’ जलाना और शर्ट उतारकर गृह मंत्री अमित शाह की रैली का विरोध करना शामिल है.

गन्ने के रेट में बढ़ोतरी की मांग को लेकर किसान बुधवार को ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे और मुख्यमंत्री का पुतला फुकेंगे.
26 जनवरी को सर छोटू राम की जयंती पर ‘गन्ने की होली’ जलाएंगे. 27 जनवरी को अनिश्चितकाल के लिए चीनी मिलों के बाहर सड़क जाम करेंगे. वहीं 29 जनवरी को गोहाना में गृह मंत्री अमित शाह की रैली में शामिल होंगे और उनके भाषण के दौरान शर्ट उतारकर अपनी नाराजगी जाहिर करेंगे.

एक बैठक के दौरान किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा, “किसान 25 जनवरी को अपनी चीनी मिलों से निकटतम शहर या कस्बे तक सीएम के पुतले के साथ ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे और बाद में चीनी मिलों पर पुतला फूंकेंगे. 26 जनवरी को सर छोटू राम की जयंती पर किसान “गन्ने की होली” जलाएंगे. उन्होंने कहा कि वे अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाने के लिए 27 जनवरी को अनिश्चित काल के लिए चीनी मिलों के बाहर सड़कों को जाम करेंगे.

साथ ही गोहाना में 29 जनवरी को गृह मंत्री अमित शाह की रैली में बड़ी संख्या में किसान शामिल होंगे. वे शाह के भाषण के दौरान अपनी शर्ट उतारकर नाराजगी जाहिर करेंगे. उन्होंने कहा, ‘हम अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकार हमें ये नहीं दे रही है.’

किसान नेता एसएपी को मौजूदा 362 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर 450 रुपये करने की मांग को लेकर राज्य की 13 चीनी मिलों के बाहर अनिश्चितकालीन धरना दे रहे हैं. किसानों ने आरोप लगाया कि सरकार ने किसी भी तरह की बढ़ोतरी की घोषणा नहीं की है. और जब विपक्षी नेताओं ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र में इस मुद्दे को उठाया, तो सीएम मनोहर लाल खट्टर ने एसएपी तय करने के लिए एक समिति गठित करने की घोषणा की थी. गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने कहा, ‘हम चीनी मिलों के बाहर विरोध कर रहे हैं और अपनी मांगों को पूरा होने तक विरोध जारी रखेंगे.’

हरियाणा में मनमाने ढंग से चलाया गया शिक्षकों का तबादला अभियान: हाई कोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा सरकार द्वारा चलाए गए शिक्षकों के तबादला अभियान को गलत बताते हुए इसे स्पष्ट रूप से छात्रों के हितों की अनदेखी और अधिकारियों की सनक का नतीजा बताया. जस्टिस हरनरेश सिंह गिल ने शिक्षकों के तबादलों की वजह से छात्रों को आई दिक्कतों को स्पष्ट करने के लिए वरिष्ठ माध्यमिक शिक्षा के डिप्टी डायरेक्टर को अदालत में हाजिर रहने का निर्देश दिया है.

बता दें कि प्रदेश भर के शिक्षकों ने सरकार के ट्रांसफर ड्राइव अभियान का विरोध किया था. सरकार के ट्रांसफर ड्राइव अभियान के खिलाफ शिक्षक सड़कों पर भी उतरे थे लेकिन सरकार ने शिक्षकों की मांगों की परवाह किए बिना ट्रांसफर ड्राइव स्कीम लागू कर दी जिसके बाद शिक्षकों ने हाई कोर्ट का रुख किया और अब हाई कोर्ट ने भी शिक्षकों की ट्रांसफर ड्राइव स्कीम पर सवाल खड़े करते हुए इसे मनमाने तरीके से लागू करने वाली स्कीम बताया है.

सुनवाई के दौरान जस्टिस गिल ने जोर देकर कहा कि यह समझ से परे है कि अधिकारी “इतनी गहरी नींद” में कैसे चले गए. स्कूलों में शिक्षकों की पोस्टिंग में अनुपातहीनता की गई है, जहां विषय के छात्रों की संख्या शून्य या न्यूनतम है वहां शिक्षक लगाए गए और दूसरी ओर जहां छात्रों की संख्या ज्यादा थी वहां विषय के शिक्षकों को तैनात नहीं किया गया.

याचिकाकर्ता के वकील की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों को पढ़ने और तर्कों को सुनने के बाद जस्टिस गिल ने कहा, “एक दस्तावेजों से पता चलता है कि आठ स्कूलों में, छात्रों की कुल संख्या के मुकाबले विषय शिक्षकों की अनुपातहीन संख्या उपलब्ध है. कुछ स्कूलों में छात्र नहीं होने पर भी तीन-तीन शिक्षकों की पोस्टिंग की गई है. वहीं जहां छात्रों की अच्छी संख्या है वहां किसी भी विषय के शिक्षकों की पोस्टिंग नहीं किया गया है.”

मनरेगा के तहत मिलने वाला रोजगार मौजूदा वित्त वर्ष में पांच साल के सबसे नीचले स्तर पर!

इस वित्तीय वर्ष में मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के तहत प्रति परिवार रोजगार के औसत दिन पांच साल में सबसे निचले स्तर पर रहे. 20 जनवरी तक, प्रति परिवार दिया गया औसत रोजगार 2021-22 में 50 दिनों के मुकाबले 42 दिन,2020-21 में 52 दिन, 2019-20 में 48 दिन और 2018-19 में 51 दिन था. अंग्रेजी अखबार द हिंदू में छपी रिपोर्ट के अनुसार अधिकारियों ने बताया, इस वित्त वर्ष में मनरेगा योजना के तहत रोजगार की मांग में गिरावट आई है. जबकि महामारी के दो वर्षों के विपरीत, जब एक बड़ी आबादी नौकरी छूटने के कारण अपनी आय में कमी को पूरा करने के लिए मनरेगा पर निर्भर थी.

वहीं मनरेगा कार्यकर्ता सरकार के रोजगार की मांग में कमी आने के तर्क को नकारते हुए आरोप लगाते हैं कि मनरेगा प्रणाली में अनेक कमीयां होने के कारण लोगों की इसमें भागीदारी कम हो रही है. प्रेमजी विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले राजेंद्रन नारायणन ने बताया, “ केंद्र से फंड नहीं मिलने से काम की मांग में कमी आई है जिसकी मुख्य वजह वेतन भुगतान में देरी रही है. मनरेगा मजदूरों की हाजिरी के लिए एक ऐप जैसी अनावश्यक तकनीकी जटिलताओं की शुरूआत ने मजदूरों के लिए और अधिक दिक्कतें बढ़ा दी हैं.”

20 जनवरी तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अरुणाचल प्रदेश (63.92%), छत्तीसगढ़ (61.60%), गोवा (18.03%), हरियाणा (59.91%), मणिपुर (14.52%), मेघालय (55.65%) %), अंडमान निकोबार (26.84%) फीसदी रोजगार दे पाया है. मणिपुर अपने अनुमानित 2.5 करोड़ व्यक्ति दिवसों में से केवल 14.52% का उपयोग करके सबसे निचले पायदान पर है. मनरेगा कार्यकर्ता बताते हैं कि छत्तीसगढ़ और मेघालय का प्रदर्शन भी विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि पिछले वर्षों में दोनों राज्यों का रिकॉर्ड मजबूत रहा है.

गन्ने की कीमत बढ़ाने की मांग को लेकर किसानों ने दूसरे दिन भी जड़ा शुगर मिलों पर ताला!

हरियाणा सरकार ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र के अखिरी दिन प्रदेश में गन्ने के दाम बढ़ाने की विपक्ष की मांग को नहीं माना था. गन्ने के दाम में बढ़ोतरी न होने से प्रदेश के किसान आक्रोषित हैं. जिसको लेकर आज नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी के नेतृत्व में भारतीय किसान यूनियन चढूनी ने प्रदेश की सभी शुगरमिलों को बंद

पिछले कईं दिनों से किसानों ने गन्ने की छिलाई बंद कर रखी है और किसान नेताओं की ओर से जारी कार्यक्रम के तहत प्रदेशभर की शुगर मिलों पर तालाबंदी की गई है. किसानों ने पानीपत ,फफड़ाना ,करनाल ,भादसोंभाली आनंदपुर शुगर मिल व महम शुगर मिल पर भी सुबह 9 बजे ताला लगाते हुए धरना शुरू किया. साथ ही जो भी गन्ने की ट्राली मिल पर पहुंची, उन्हें वापस लौटा दिया. उन्होंने कहा कि जब तक सरकार किसानों की मांग पूरी नहीं करती, तब तक शुगर मिलों को बंद रखते हुए प्रदर्शन किया जाएगा.

किसानों ने अम्बाला में नारायणगढ़ शुगर मिल के बाहर धरना दिया. सोनीपत के गोहाना में आहुलाना शुगर मिल पर ताला जड़कर किसानों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की तो वहीं किसानों का शाहबाद शुगर मिल और करनाल शुगर मिल पर भी धरना जारी है.

किसान गन्ने के रेट को बढ़ाकर 450 रुपए करने की मांग कर रहे हैं. बता दें कि पंजाब में गन्ना किसानों को 380 रुपये प्रति किवंटल का रेट मिल रहा है.

दो दिन पहले किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने ट्वीट किया था, “आज रात के बाद कोई भी किसान भाई किसी भी शुगर मिल में अपना गन्ना लेकर ना जाए अगर कोई किसी नेता या अधिकारी का नजदीकी या कोई अपना निजी फायदा उठाने के लिए शुगर मिल में भाईचारे के फैसले के विरुद्ध गन्ना ले जाता है और कोई उसका नुकसान कर देता है तो वह अपने नुकसान का खुद जिम्मेदार होगा.”

किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी ने आज लिखा, “हरियाणा के सभी शुग़रमिल बंद करने पर सभी पदाधिकारियों व किसान साथियों का धन्यवाद, अगर सरकार 23 तारीख़ तक भाव नहीं बढ़ाती तो आगे की नीति 23 तारीख़ जाट धर्मशाला में बनायी जाएगी.”

सोनीपत गन्ना मिल के बाहर किसानों का प्रदर्शन.

आजमगढ़: जमीन अधिग्रहण के खिलाफ 100 दिन से किसानों का आंदोलन जारी!

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में संयुक्त किसान मोर्चा समेत कईं किसान संगठन पिछले 100 दिनों से आजमगढ़ मंडुरी हवाई अड्डे के विस्तार के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. संयुक्त किसान मोर्चा ने पूर्वी यूपी के सभी किसानों से आजमगढ़ के धरने में शामिल होने का आह्वान किया है. वहीं धरना स्थल पर मौजूद किसानों ने आरोप लगाया कि ‘मोदी सरकार निजीकरण के नाम पर लगातार सरकार और सार्वजनिक संस्थानों को पूंजीपतियों को बेच रही है, जिससे जनता का इस सरकार पर से विश्वास उठ गया है.’

किसान संगठनों का आरोप है कि हवाई पट्टी, मंडी, हाईवे, एक्सप्रेसवे के नाम पर नए सामंत, बड़े जमींदार बनाए जा रहे हैं. उनका कहना है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में किसानों और मजदूरों को सबसे सस्ता और लाचार मजदूर बना दिया गया है और अब तैयारी उनके सम्मान और स्वाभिमान को छीन कर उन्हें बंधुआ मजदूर बनाने की है.

धरना-प्रदर्शन कर रहे किसानों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट के विस्तारीकरण के लिए जमीन और मकान नहीं छोड़ेंगे. किसानों कि मांग है कि हवाई अड्डे का मास्टर प्लान रदद् किया जाए. वहीं रविवार को एक बार फिर बड़े स्तर पर संयुक्त किसान मोर्चा पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान नेता और किसान धरना स्थल पर जुटेंगे. वहीं इस बीच आजमगढ़ आंदोलन में जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे एक बुजुर्ग किसान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है वीडियो में बुजुर्ग किसान जमीन छीन जाने के डर से रोते हुए नजर आ रहे हैं.

राजस्थान: शीत लहर और पाला पड़ने से 40 फीसदी सरसों की फसल बर्बाद, किसानों को हुआ भारी नुकसान!

राजस्थान के सीकर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, जैसलमेर और बाड़मेर जिलों के किसान मायूस हैं. शीत लहर ने उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत को अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे गंभीर पाला पड़ा है, जिससे उनकी सरसों, जीरा, अरंडी और सब्जियों की फसल नष्ट हो गई है. ‘गांव कनेक्शन’ में छपी पत्रकार पारुल कुलश्रेष्ठ की रिपोर्ट के अनुसार हनुमानगढ़ जिले के एक गांव के रायसिंह जाखड़ बंसरीवाला ने दुख व्यक्त किया कि ठंड और पाले के कारण उनकी सरसों की लगभग 40 प्रतिशत फसल नष्ट हो गई. शीत लहर और बारिश विनाशकारी साबित हुई.

इसके अलावा, इंदिरा गांधी नहर में रखरखाव के काम के कारण, हमें सिंचाई के लिए पानी नहीं मिला,” बंसरीवाला ने रिपोर्टर को बताया,”सरसों राजस्थान की प्रमुख फसलों में से एक है और उत्तर पश्चिमी राज्य अकेले भारत में सरसों के कुल उत्पादन का 43 प्रतिशत योगदान देता है. राजस्थान में, अलवर प्रमुख उत्पादक जिले के रूप में श्री गंगानगर, भरतपुर, टोंक, सवाई माधोपुर, बारां और हनुमानगढ़ के बाद आता है.

श्री गंगानगर और हनुमानगढ़ जिले में लगभग 556 हेक्टेयर भूमि सरसों के अधीन है. वहां के किसानों को डर है कि अगर शीत लहर जारी रही तो सरसों की 40 फीसदी फसल बर्बाद हो जाएगी. उनके अनुसार, कुछ स्थानों पर तापमान शून्य से 2.8 डिग्री सेल्सियस नीचे तक गिर गया है, जो रेगिस्तानी राज्य के लिए असामान्य है.

श्री गंगानगर जिले के चपावली गांव के प्रह्लाद ने बताया, “ठंढ को मात देने का एकमात्र तरीका पर्याप्त सिंचाई है. सुबह जमीन को पानी देने से पाले से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलती है, लेकिन गांव में बिजली की आपूर्ति केवल रात में होती है, किसान केवल उस समय अपनी भूमि की सिंचाई कर सकते हैं जब तापमान शून्य के करीब गिर जाता है. अगर दिन के समय बिजली की आपूर्ति होती और हम दिन के उजाले में अपनी जमीन को सींच सकते तो यह बहुत अच्छा होता. लेकिन प्रशासन को किसानों की कोई परवाह नहीं है. जबकि सरकार भाषण देने में व्यस्त है लेकिन हम नुकसान उठा रहे हैं”

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के जयपुर कार्यालय के अनुसार, 3 जनवरी, 2014 के बाद यह पहली बार है, जब तापमान शून्य से 2.7 डिग्री सेल्सियस नीचे चला गया है. इससे पहले 1974 में चूरू में तापमान शून्य से 4.6 डिग्री सेल्सियस नीचे गिर गया था, जो राज्य में अब तक का सबसे कम तापमान दर्ज किया गया था. उन्होंने कहा, ‘हमने राज्य सरकार को चेतावनी जारी की थी कि इस साल 14 जनवरी से पाला पड़ेगा. जबकि इस मौसम में जमीनी पाला असामान्य नहीं है, समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह दो दिनों से अधिक समय तक रहता है. यह फसलों के लिए विनाशकारी है,”

किसान अपनी सरसों की फसल के 40 प्रतिशत तक नुकसान की सूचना दे रहे हैं, एक आधिकारिक आकलन किया जाना बाकी है. राजस्थान कृषि विभाग, हनुमानगढ़ जिले के सहायक निदेशक बी आर बाकोलिया ने कहा, “नुकसान की सीमा का तुरंत पता लगाना संभव नहीं है. हम अगले कुछ दिनों में ही नुकसान के बारे में बता पाएंगे. अगर अगले दो दिनों में बारिश होती है तो स्थिति में सुधार हो सकता है. यदि नहीं, तो अधिक नुकसान हो सकता है. सहायक निदेशक ने बताया, “हमारे अधिकारी फील्ड में जाकर, खासकर सरसों को हुए नुकसान की रिपोर्ट तैयार करेंगे.”

किसानों के अनुसार सरसों के पकने से पहले अगर पाला पड़ जाए तो यह पौधे को मार देता है. इसलिए, क्षति से बचने के लिए भूमि को सिंचित रखना महत्वपूर्ण है. लेकिन श्री गंगानगर में हर साल ठंड पड़ रही है, किसान ने कहा, “तापमान का चार डिग्री तक गिरना सामान्य है, लेकिन साल दर साल ठंडा होता जा रहा है और यह साल अब तक का सबसे खराब रहा है.”

इस बीच, भरतपुर स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन रेपसीड-मस्टर्ड (NRCRM), जो एक ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) संस्थान है, के निदेशक पी के राय ने चेतावनी दी कि अनुचित सिंचाई स्थिति को और अधिक नुकसान पहुंचा सकती है. राय ने बताया, “जमीन में समय-समय पर सिंचाई करने से यह सुनिश्चित होता है कि कोई सूखापन नहीं है, खासकर उन जगहों पर जहां बीज अभी पूरी तरह से पके नहीं हैं”

बाड़मेर जिले में किसान अपने अनार, अरंडी के पौधे, जीरा और सरसों के पौधों को हुए नुकसान का हिसाब लगा रहे हैं. बाड़मेर के किसान हस्तीमल राजपुरोहित ने बताया, “जिले में करीब 30 फीसदी अनार, 70 फीसदी अरंडी और 50 फीसदी सरसों नष्ट हो जाती है” उन्हें बैंक का कर्ज चुकाने, बिजली बिल भरने आदि की चिंता सता रही थी. “बहुत ट्रिपिंग के साथ दिन में केवल दो से तीन घंटे बिजली की आपूर्ति की जाती है. किसी भी राजनेता को हमारी भलाई की चिंता नहीं है,”

सीकर जिले के किसान गांवों में बिजली की अनियमित आपूर्ति को लेकर पिछले चार दिनों से डोढ़ गांव में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे उनके लिए अपनी जमीन को सिंचित रखना मुश्किल हो रहा है. “बिजली की आपूर्ति स्थिर नहीं है. कभी-कभी बिजली आने के छह मिनट के भीतर ही बिजली बंद हो जाती है,” सीकर जिले के भुवाला गांव के राम रतन बगडिया ने बताया, “सब्जियों में पहले ही 60 फीसदी और सरसों में 40 फीसदी नुकसान हो चुका है. बगडिया ने कहा, “हम मांग करते हैं कि सरकार हमें नुकसान की भरपाई करे और हमें उचित बिजली मुहैया कराए.”

अंतर्राष्ट्रीय पहलवानों का कुश्ती फेडरेशन के खिलाफ जंतर-मंतर पर धरना!

अंतर्राष्ट्रीय पहलवान ओलपिंक पदक विजेता बजरंग पुनिया समेत भारत के शीर्ष पहलवान विनेश फोगाट, साक्षी मलिक, संगीता फोगाट, सोनम मलिक और अंशु ने जंतर-मंतर पर भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) की मनमानी के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. खिलाड़ी, भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष बीजेपी सांसद ब्रजभूषण शरण का विरोध कर रहे हैं.

पहलवान बजरंग पुनिया ने ट्वीट करते हुए लिखा, “खिलाड़ी पूरी मेहनत कर के देश को मेडल दिलाता हैं लेकिन फेडरेशन ने हमें नीचा दिखाने के अलावा कुछ नहीं किया. मनचाहे क़ायदे क़ानून लगा कर खिलाड़ियों को प्रताड़ित किया जा रहा है.

ओलंपिक पदक विजेता पहलवान ने कहा, पहलवानों ने चुपचाप बहुत कुछ झेला है लेकिन अब हमने तय किया है कि भारतीय कुश्ती महासंघ द्वारा लिए जा रहे एकतरफा फैसलों के खिलाफ अब हम चुप नहीं रहेंगे. भारत के सभी शीर्ष पहलवान तब तक राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग नहीं लेंगे जब तक कि हमारी मांगें पूरी नहीं हो जातीं और भारतीय कुश्ती महासंघ द्वारा हमारे साथ बेहतर व्यवहार नहीं किया जाता.

वहीं कुश्ती फेडरेशन पर निशाना साधते हुए एक और ट्वीट में लिखा कि, “फेडरेशन का काम खिलाड़ियों का साथ देना, उनकी खेल की जरूरतों का ध्यान रखना होता है. कोई समस्या हो तो उसका निदान करना होता है. लेकिन अगर फेडरेशन ही समस्या खड़ी करे तो क्या किया जाए? अब लड़ना पड़ेगा, हम पीछे नहीं हटेंगे.”

वहीं महिला पहलवान विनेश फोगाट ने ट्वीट करते हुए लिखा खिलाड़ी आत्मसम्मान चाहता है और पूरी शिद्दत के साथ ओलंपिक और बड़े खेलो के लिए तैयारी करता है लेकिन अगर फेडरेशन उसका साथ ना दे मनोबल टूट जाता है।लेकिन अब हम नही झुकेंगे. अपने अधिकारों के लिए लड़ेंगे.