RSS का विमुक्त-घुमंतू जनजातियों को हिन्दुत्व से जोड़ने का रोडमैप!

 

विमुक्त घुमंतू और अर्धघुमंतू जनजातियों को अपनी हिन्दुत्वादी विचारधारा से जोड़ने के लिए आरएसएस ( राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) पिछले कईं वर्षों से सक्रिय है. 2011 की जनगणना के अनुसार देशभर में विमुक्त घुमंतू और अर्धघुमंतू जनजातियों की आबादी करीब 15 करोड़ है. वहीं वर्तमान में इन जनजातियों की आबादी का अनुमान करीबन 20 करोड़ है.

डिनोटिफाइड ट्राइब्स (डीएनटी) को टारगेट करने के लिए आरएसएस ने कईं संगठनों का गठन किया है. सामाजिक स्तर पर संगठन बनाने से लेकर सरकारी स्तर तक संघ ने विमुक्त घुमंतू और अर्धघुमंतू जनजातियों की बड़ी आबादी को संघ की विचारधारा से जोड़ने में पूरी ताकत झोंक रखी है.    

सामाजिक स्तर पर आरएसएस ने ‘विमुक्त-घुमंतू जनजाति कल्याण संघ’ और केंद्रीय स्तर पर ‘अखिल भारतीय विमुक्त-घुमन्तु जनजाति आयोग’ तो वहीं राज्य स्तर पर बीजेपी ने अपनी राज्य सरकारों में डीएनटी बॉर्ड का गठन किया है. डीएनटी बोर्ड के गठन के जरिए बीजेपी इन जनजातियों के चंद पढ़े-लिखे लोगों को पद देकर अपने साथ जोड़ रही है. आरएसएस ने डीएनटी बोर्ड में तैनात लोगों के जरिए विमुक्त घुंमतू और अर्धघुमंतू जनजातियों में हिन्दुत्व की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का अभियान चलाया है.

कौन हैं डीएनटी ?

1871 में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लगाए गए क्रिमीनल ट्राइब एक्ट (सीटीए) के तहत सरकारी दमन का शिकार हुईं ऐसी जनजातियां जो अंग्रेजों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध लड़ने के लिए जाने जाती थीं. क्रिमीनल ट्राईब एक्ट लागू करके अंग्रेजी सरकार ने इन जनजातियों पर जन्मजात अपराधी होने का ठप्पा लगा दिया था.

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ लेकिन ये जनजातियां 31 अगस्त 1952 तक आजाद देश में गुलामी का दंश झेलती रहीं. विमुक्त जनजातियों के लोग देश आजाद होने के बाद पांच साल 16 दिनों तक भी गुलाम बने रहें. इन जनजातियों को 31 अगस्त 1952 को डिनोटीफाई किया गया. तब से इन जनजातियों को डिनोटिफाईड ट्राईब्स के नाम से जाना जाता है. ये लोग हर साल 31 अगस्त को मुक्ती दिवस के तौर पर मनाते हैं.

विमुक्त-जनजातियों के बीच संघ की गतिविधियां

जिस तरह संघ ने लोकसभा और विधानसभा के अलग-अलग चुनावों में बीजेपी के लिए सोशल इंजीनियरिंग का काम किया है, ठीक उसी तर्ज पर आरएसएस ने डीएनटी जनजातियों को हिन्दुत्व और बीजेपी से जोड़ने का अभियान चलाया है.         

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में आयोजित विमुक्त-घुमंतू जनजाति से जुड़े एक कार्यक्रम के दौरान कहा, “आजादी के बाद से लेकर आज तक किसी ने भी विमुक्त घुमंतू जनजातियों से जुड़े मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ही ऐसी पहली संस्था है जिसने डीएनटी को लेकर काम किया है.”

संघ बीजेपी की सत्ता के सहारे इन जनजातियों के बीच अपनी विचारधारा के प्रचार में जुटा है. इसी कड़ी में आरएसएस के सामाजिक समरसता मंच और विमुक्त घुमंतू जनजाति कल्याण संघ ने मिलकर 13 जून को महाराणा प्रताप जयंती पर ऑनलाइन वेबिनार का आयोजन किया. ऑनलाइन बेविनार में आरएसएस  के प्रचारक और राष्ट्रीय स्तर पर विमुक्त-घुमंतू जाति के कार्य प्रमुख दुर्गा दास को मुख्य वक्ता के तौर पर आमंत्रित किया गया. कार्यक्रम में विमुक्त जनजाति के लोगों को महाराणा प्रताप से जोड़कर क्षत्रिय होने के गर्व से भरते हुए अपनी विचारधारा का प्रचार किया गया.

31 अगस्त 2017 को आरएसएस के संगठन ‘विमुक्त-घुमंतू जनजाति कल्याण संघ’ ने हरियाणा के फतेहाबाद में विमुक्ती दिवस मनाया जिसमें संघ के बड़े नेता और ‘अखिल भारतीय विमुक्त घुमंतू आयोग’ के चेयरमैन भीखूराम इदाते को बुलाया गया.

मार्च 2017 में संघ ने गुरुग्राम में विमुक्त-घुमंतू जनजाति के लोगों के लिए तीन दिवसीय ‘हिंदू आध्यात्मिक मेले’ में प्रदर्शनी लगाई. प्रदर्शनी का संचालन संघ से जुड़े ‘विमुक्त जनजाति कल्याण संघ’ ने ही किया.   

जून 2018 में हरियाणा के जींद में संघ से जुड़े संगठन ने क्रीडा भारती के साथ मिलकर ‘विमुक्त घुमन्तु-जनजाति खेल उत्सव’ करवाया. आरएसएस के संगठन द्वारा करवाए गए इस ‘डीएनटी खेल उत्सव’ में अलग-अलग जगह से आए छह सौ से ज्यादा खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया. इस कार्यक्रम के जरिए भी संघ ने इन जनजातियों के युवाओं तक अपनी पहुंच स्थापित की.

इस प्रकार घुमंतू जनजातियों के बीच विमुक्ति दिवस, खेल प्रतियोगिता, प्रदर्शनी और इस तरह की अन्य गतिविधियों के जरिए आरएसएस, डीएनटी समुदाय के बीच अपनी पहुंच बना रहा है.

कथनी और करनी में अंतर

रेनके कमीशन-2008 के दस साल बाद 2018 में इदाते कमीशन ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी. संघ के नेता भीखूराम इदाते इस कमीशन के प्रमुख हैं. आरएसएस का एजेंडा इन जनजातियों के विकास से ज्यादा अपनी विचारधारा से जोड़ने का है. ऐसा हम इस कमीशन द्वारा दी गई सिफारिशों पर कितना काम किया गया उससे समझ सकते हैं.

सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत नेशनल कमीशन फॉर डीएनटी का गठन किया गया है लेकिन पिछले कईं वर्षों के बजट में नेशनल कमीशन फॉर डीएनटी के हिस्से बजट की बहुत मामूली रकम आई है. संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने घुमंतू जनजातियों के विकास के लिए जो दावा किया है जमीनी हकीकत इसके उलट है.

2015-16 से लेकर 2020-21 तक के सभी बजट को मिलाकर विमुक्त घुमंतु जनजातियों के नाम केवल 75 करोड़ का बजट दिया गया है. पिछले 6 साल में 20 करोड़ की आबादी के विकास के लिए केवल 75 करोड़ की मामूली राशि से समझा जा सकता है कि मौजूदा सरकार और संघ इन जनजातियों के विकास के लिए कितनी प्रतिबध है.

डीएनटी पर काम करने वाले लोगों की प्रतिक्रिया

शुरूआत से ही इन जनजातियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मोर्चों पर वंचित रखा गया है. लेकिन आरएसएस ने इन जनजातियों में अपनी पैठ बनाना शुरू की है. इसका परिणाम है कि इन जनजातियों में से कुछ पढ़ी-लिखी जनजातियों के लोगों को संघ ने अपना झंडाबरदार बनाया है.

विमुक्त घुमंतू समाज से आने वाले और इस समुदाय के बीच लंबे समय से काम कर रहे बालक राम ने बताया, “ये लोग केवल वोट की राजनीति और अपने एजेंडे के लिए काम कर रहे हैं. समाज के चंद लोगों को पद का लालच देकर अपने साथ जोड़ रहे हैं. अगर ये लोग असल में डीएनटी समाज का भला चाहते हैं तो रेनके कमीशन-2008 और इदाते कमीशन-2018 की सिफारिशों को लागू क्यों नहीं करते हैं. हमारे साथ सभी सरकारों ने धोखा किया है सत्ता में आने से पहले राजनाथ सिंह ने भी वादा किया था कि रेनके कमीशन की सिफारिशों को लागू किया जाएगा लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया.”  

विमुक्त जनजातियों के बीच हिन्दुत्व की विचारधारा के संघ के प्रसार-प्रचार को लेकर बालक राम ने कहा, “इन जनजातियों को कभी हिंदू माना ही नहीं गया अगर इनको हिंदू माना गया होता तो इन जनजाति के लोगों को अंतिम संस्कार तक के लिए शमशान घाटों से नहीं लौटाया जाता. आए दिन कितनी ही ऐसी खबरें आती रहती हैं कि फला जगह पर विमुक्त जनजाति के लोगों को अंतिम संस्कार करने से रोका गया.”  

बालक राम ने कहा, “इदाते कमीशन की रिपोर्ट को लागू करना तो दूर उस पर बात तक नहीं की जा रही है. 2018 से कमीशन की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में पड़ी है. यूपीए सरकार द्वारा गठित बालकृष्ण रेनके आयोग व एनडीए सरकार द्वारा गठित इदाते कमीशन की रिपोर्ट अब तक ससंद में पेश नहीं की गई है.”  

विमुक्त-जनजातियों के लिए काम करने वाले और एक एनजीओ से जुड़े युवा ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया, “सभी राजनीतिक पार्टियों और संगठनों ने इन जनजातियों की अनदेखी की है. इस बड़ी आबादी को संघ खाली मैदान की तरह देख रहा है. संघ इन लोगों के बीच अपनी वैचारिक फसल उगाने की जुगत में जुटा है. अन्य समुदायों की तरह इन जनजातियों को अपने पाले में कर संघ हिन्दुत्व के कुनबे को बड़ा करने की राजनीतिक मंशा से आगे बढ़ रहा है. संघ इन जनजातियों को फुट सोल्जर के तौर पर प्रयोग करना चाहता है. इस तरह का उदाहरण हम गुजरात के 2002 के दंगों में भी देख चुके हैं. आरएसएस अब इन जनजातियों का इस्तेमाल बड़े स्तर पर करना चाहता है” 

संघ के संगठन ‘विमुक्त-घुमंतू कल्याण संघ’ के अध्यक्ष राजेश कुमार ने बताया, “हम अनेक सांस्कृतिक कार्यकर्मों के जरिए इन जनजातियों को जागरुक करने का प्रयास कर रहे हैं. हिन्दुत्व के सवाल पर उन्होंने कहा, “हमारी ऐसा कोई मंशा नहीं है. हम केवल इन जनजातियों के बीच लीडरशीप तैयार करने के साथ-साथ इन लोगों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए काम कर रहे हैं.”