क्या मतदान का अधिकार राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करता है? भारत से ऐतिहासिक साक्ष्य

लोकतंत्र को लंबे समय से बेहतर आर्थिक विकास परिणामों के लिए जाना जाता है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि नागरिकों को मतदान का अधिकार देना, राजनीतिक भागीदारी या प्रतियोगिता को प्रभावी बनाए रखने को सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है या नहीं। एक नए प्रयोग के तहत 1921-1957 के दौरान जिला-स्तरीय डेटासेट को आधार बनाते हुए यह लेख इस बात की जाँच करता है कि भारत में किस प्रकार दो वर्ग-आधारित विस्तार द्वारा राजनीतिक व्यवहार को आकार दिया गया है।

अरस्तू के राजनीति पर निबंधों से लेकर टोक्विले के अमेरिका में लोकतंत्र और सेन के लोकतन्त्र एक सार्वभौमिक मूल्य तक विभिन्न कालखण्डों के कई विद्वानों ने इस बात पर चर्चा की है कि क्या विकास के लिए लोकतन्त्र मायने रखता है। हाल के अनुभवजन्य साक्ष्य बताते हैं कि लंबे समय तक लोकतन्त्र में बेहतर आर्थिक विकास के परिणाम निहित हैं (पापाइनोऊ एवं सियोयूरोनिस 2008, एकिमोग्लू एवं अन्य 2019)। हालाँकि लोकतंत्र एक बहुत ही व्यापक अवधारणा है और यह स्पष्ट नहीं है कि नागरिकों को मतदान का अधिकार देना (जो कि लोकतंत्र का एक अनिवार्य घटक है) राजनीतिक भागीदारी या राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक प्रभावी मानक सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त है। कुछ पर्यवेक्षकों ने इसे भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने अथवा विकास को बढ़ावा देने के लिए ज़रूरी माना है। वास्तव में दुनिया के देशों में वयस्क मताधिकार होने के बावजूद दुनिया के एक-तिहाई देशों को तानाशाही के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है, जिसका अन्य प्रमुख कारकों में से एक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की कमी है (ल्हरमैन एवं अन्य 2017)।

भारत में मतदान के अधिकार का क्रम-विकास

हम भारत में मतदान के अधिकार विस्तार के दो विशिष्ट प्रकरणों की जांच यह देखने के लिए करते हैं कि ‘क्या उन्होंने राजनीतिक व्यवहार में परिवर्तन किया? यदि हाँ, तो कैसे?’ (कसन, अय्यर और मिर्ज़ा 2020)। पहला प्रकरण जिसका अध्ययन हम करते हैं वह है 1935 के ब्रिटिश शासित का भारत सरकार अधिनियम, जिसने मतदान के लिए संपत्ति के स्वामित्व की आवश्यकताओं को काफी कम कर दिया है। इस सुधार से पहले केवल 2.5% आबादी को वोट देने का अधिकार था। इस सुधार के परिणामस्वरूप यह हिस्सा बढ़कर 11.9% हो गया। दूसरा प्रकरण है – आज़ादी के बाद 1950 में संविधान द्वारा 21 वर्ष से अधिक के नागरिकों को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार दिया गया। इस रिफ़ार्म के बाद संपूर्ण भारत में 49% लोगों को मतदान का अधिकार था।

हमने 1921 से 1957 तक हुए प्रांतीय चुनावी परिणामों के एक नवीन ऐतिहासिक डेटासेट का निर्माण किया है, जहां हमने समय के साथ-साथ प्रशासनिक जिलों की जान की और यह पाया कि उन इकाइयों में राजनीतिक भागीदारी और प्रतिस्पर्धा दो मताधिकार सुधारों से कैसे प्रभावित हुई है। 1918 के मोंटाग्यू चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के बाद 1919 के भारत सरकार अधिनियम के अनुरूप केंद्रीय और प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों के लिए प्रत्यक्ष चुनाव का आयोजन किया गया। अधिनियम ने यह सुनिश्चित किया कि प्रांतीय परिषदों में 70% निर्वाचित हो, परंतु मताधिकार निश्चित आय वाले अथवा संपत्ति वाले लोगों तक ही सीमित था1।1

एक दशक के बाद स्वतंत्रता आंदोलन के स्वरूप और प्रभाव में वृद्धि के पश्चात 1935 के भारत सरकार अधिनियम ने निर्वाचित विधानसभाओं को अधिक विधायी एवं नीति शक्तियां प्रदान कीं और वोट का अधिकार प्राप्त करने के लिए आवश्यक संपत्ति सीमा को भी नाटकीय रूप से कम कर दिया। कुछ प्रांतों में मताधिकार को शिक्षित व्यक्तियों (साक्षर महिलाओं सहित) और योग्य पुरुष मतदाताओं की पत्नी अथवा विधवाओं तक विस्तारित (पुरुषों द्वारा मतदान के लिए आवश्यक संपत्ति से अधिक संपत्ति के साथ) किया गया। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है – 1937 के प्रांतीय चुनावों में राष्ट्रव्यापी मतदाताओं का अंश बढ़कर 11.9% हो गया था, परंतु यह प्रांतवार विविध था, एक ओर मुंबई एवं सिंध में 18.7% और दूसरी ओर बिहार एवं उड़ीसा में 7.8%। विभिन्न प्रांतों के बीच के अंतर मतदान की आवश्यकताओं की भिन्नता एवं परिसंपत्तियों, आय और शिक्षा के स्तर के असमान वितरण द्वारा संचालित हैं। 

मताधिकार का राजनीतिक और नीतिगत परिणामों पर प्रभाव

मताधिकार का अन्य राजनीतिक परिणामों पर प्रभाव का आकलन करने के लिए हम उन जिलों के बीच तुलना करते हैं जहां मताधिकार का दायरा ज्यादा बढ़ा और जहां मताधिकार का दायरा कम बढ़ा। हम इस बात की जांच करते हैं कि जहां मताधिकार अधिक बढ़ा है, वहाँ राजनीतिक परिणामों में भी वृद्धि हुई है या नहीं। 

हम चुनावी राजनीति में जन-भागीदारी के दो मानकों का निर्माण करते हैं – मतदाता प्रतिशत या वोटर टर्नआउट (पंजीकृत मतदाता का वह भाग जो वास्तव में वोट डालते हैं) और प्रति 1000 पंजीकृत मतदाताओं पर प्रत्याशियों की संख्या। हम पाते हैं कि जिन जिलों में मताधिकार बहुत अधिक बढ़ा है, उनमें कम वृद्धि वाले जिलों की तुलना में मतदाता प्रतिशत में उतनी वृद्धि नहीं हुई है। 1950 के सुधारों के बाद भी इसी समान परिणाम प्राप्त होता है। हम यह भी पाते हैं कि 1935 के सुधारों के बाद भी अधिक मताधिकार वृद्धि वाले क्षेत्रों में प्रति 100 पंजीकृत मतदाताओं पर प्रत्याशियों की संख्या में उस अनुरूप वृद्धि नहीं हुई है। 1950 के सुधारों के बाद भी प्रत्याशियों की प्रतिभागिता समानुपातिक गिरावट को दर्शाता है, लेकिन ये आंकड़े के लिहाज से महत्वपूर्ण नहीं है। ये परिणाम बताते हैं कि नए मताधिकार प्राप्त मतदाता राजनीतिक रूप से उतने सक्रिय नहीं हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो नव-प्राप्त अधिकारों का समुचित प्रयोग लाभार्थियों द्वारा नहीं किया जा रहा है। 

नागरिक भागीदारी में थोड़ी-सी वृद्धि के बावजूद मतदाताओं की बढ़ी हुई संख्या, उम्मीदवारों द्वारा सामना की जाने वाली राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में सांख्यिकीय रूप से महत्त्वपूर्ण वृद्धि होती है। 1935 के सुधारों के परिणामस्वरूप प्रांतीय विधानसभाओं के सदस्यों के पुनर्निर्वाचन की दर में बड़ी कमी आई (अर्थात, पद पर रहते हुए लाभ अर्थात पुनर्निर्वाचन में गिरावट)। दूसरी ओर, सार्वभौमिक मताधिकार के लिए 1950 से प्रत्येक सीट पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की संख्या में वृद्धि हुई है। हालांकि इन सुधारों के बाद पद पर रहते हुए लाभ, अर्थात पुनर्निर्वाचन, में कोई गिरावट नहीं हुई है।

हमने एक महत्वपूर्ण नीतिगत परिणाम के रूप में शिक्षा पर हुए खर्च की भी जांच की। हम पाते हैं कि जिन जिलों के मताधिकार में 10% से अधिक की वृद्धि हुई है, उनमें 1935 के सुधार के बाद प्रति व्यक्ति 5% उच्च शिक्षा व्यय हुआ है। यह पूरे देश में लोकतंत्र के साक्ष्यों के अनुरूप है, जिसके परिणामस्वरूप बेहतर आर्थिक विकास और शिक्षा प्राप्त हुई है (एसमोगलू एवं अन्य 2019)। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की अवधि में जिला-स्तरीय खर्च का डेटा न होने के कारण हम 1950 के सुधारों के लिए एक समान विश्लेषण नहीं कर पाते हैं। 

निष्कर्ष 

कुल मिलाकर हमारे परिणाम बताते हैं कि वोट के अधिकार बढ़ने के समानुपात में राजनीतिक सक्रियता में वृद्धि नहीं हुई है। हालांकि राजनीतिक भागीदारी में समानुपातिक रूप से कम वृद्धि भी बढ़ती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और नीतियों में बदलाव के लिए पर्याप्त प्रतीत होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने और लोकतंत्र के पूर्ण लाभों को प्राप्त करने के लिए अन्य पूरक सुधारों जैसे – मतदाता जागरूकता में वृद्धि आवश्यक हो सकती है – यह स्वयं प्रत्याशियों और कार्यान्वयन की जाने वाली नीतियों के संबंध में मूर्त परिवर्तनों के लिए आवश्यक हो सकती है।

टिप्पणियाँ:

  1. यद्यपि 1919 अधिनियम स्पष्ट रूप से पुरुषों तक सीमित मताधिकार है तथापि प्रांत अगर चाहें तो इन व्यवस्थाओं को बदल सकते हैं। 1921 में मद्रास से शुरू होकर 1936 तक सभी प्रांतों ने एक ही समय में पुरुषों के समान महिलाओं के लिए भी मताधिकार का विस्तार किया। चूंकि पुरुषों के समान ही महिलाओं के लिए मताधिकार का विस्तार किया गया था। महिलाओं के लिए संपत्ति प्रतिबंध वही थे जो पुरुषों के लिए थे, जिसका अर्थ है कि व्यवहार में अधिकांश महिलाएं पंजीकृत मतदाता नहीं हो सकती थी; मतदाताओं में महिलाओं और पुरुषों का अनुपात 1:20 था।

लेखक परिचय: लक्ष्मी अय्यर यूनिवर्सिटी ऑफ नोट्रू डाम में एक असोसिएट प्रोफेसर हैं, उनकी वहाँ के अर्थशास्त्र विभाग और केओग स्कूल ऑफ ग्लोबल अफेयर्स में संयुक्त नियुक्ति है। रिंचन अली मिर्ज़ा यूनिवर्सिटी ऑफ केंट में अर्थशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। गिलहम कसन युनिवेर्सिटी ऑफ नामुर में अर्थशास्त्र के असोसिएट प्रोफेसर हैं। 

-आइडियाज फॉर इंडिया

चालू सीजन में यूपी के गन्ना किसानों का 7,000 करोड़ बकाया, पिछले सीजन के भी 1,500 करोड़ बाकी

अमित शाह 26 जनवरी को जब उत्तर प्रदेश के कुछ जाट नेताओं से मिले, तो उस बैठक में कुछ जाट नेताओं ने गन्ना किसानों को देरी से भुगतान का मुद्दा भी उठाया। दरअसल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों का बकाया एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बन गया है। सत्तारूढ़ भाजपा के रिकॉर्ड भुगतान के दावे के बावजूद अक्टूबर 2021 से सितंबर 2022 तक चलने वाले मौजूदा सीजन में गन्ना किसानों के करीब 7,000 करोड़ रुपये चीनी मिलों पर बकाया हो गए हैं। गन्ना किसान इस बात से भी नाराज हैं कि हाई कोर्ट के आदेश बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार चीनी मिलों को ब्याज भुगतान से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट चली गई।

उत्तर प्रदेश सरकार के गन्ना विभाग की 25 जनवरी तक की रिपोर्ट के अनुसार, चीनी मिलों ने पेराई सत्र 2021-22 में 25 जनवरी तक 465.26 लाख टन गन्ना किसानों से खरीदा, जिससे 45.67 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है। किसानों से खरीदे गए गन्ने की कीमत करीब 16,000 करोड़ रुपये बनती है, जबकि इस दौरान गन्ना किसानों को 9,157.43 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। यानी इस सत्र का करीब 7,000 करोड़ रुपये बकाया है।

भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने सरकार के रवैये को निराशाजनक बताया। रूरल वॉयस से बातचीत में उन्होंने कहा, “सरकार ने किसानों को 14 दिनों में भुगतान का वादा था, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। इससे किसानों की मुश्किलें बढ़ रही हैं। पिछली सरकार के समय जो ग्रुप समय से भुगतान नहीं कर रहे थे, वही ग्रुप अब भी भुगतान में कोताही कर रहे हैं। लेकिन उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो रही है।”

चौंकाने वाली बात यह है कि राज्य के गन्ना विकास और चीनी उद्योग मंत्री सुरेश राणा की विधान सभा थाना भवन और जिले की शामली मिल ने अभी तक पिछले साल का पूरा भुगतान नही किया है। इससे साफ हो जाता है कि जब उत्तर प्रदेश सरकार के संबंधित विभाग के मंत्री के गृह जिले और विधान सभा में गन्ना मूल्य भुगतान की यह स्थिति है तो इस मुद्दे पर सरकार की सख्ती की क्या स्थिति है।

शामली जिले के गांव खेड़ी बैरागी के किसान जीतेंद्र हुड्डा ने रूरल वॉयस को बताया, “इस साल के भुगतान की बात तो दूर, अभी तक पिछले साल के गन्ने का भी भुगतान नहीं हुआ है। ऐसे में हमें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।”

पिछले सीजन (2020-21) में 1027.50 लाख टन गन्ने की पेराई हुई और चीनी उत्पादन 110.59 लाख टन रहा था। चीनी मिलों ने गन्ना किसानों को 31,716.65 करोड़ रुपये का भुगतान किया। यह कुल गन्ना मूल्य का 96.07 फीसदी है। यानी पिछले सीजन की भी चार फीसदी रकम बकाया है, जो करीब 1,500 करोड़ रुपये बैठती है। हालांकि उससे पहले के वर्षों में प्रदेश की 119 चीनी मिलों ने गन्ने का पूरा भुगतान कर दिया है। मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कुल 1,55,926.79 करोड़ रुपये के गन्ना मूल्य का भुगतान किया गया है।

गन्ना किसानों की नाराजगी दूर करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले साल सितंबर के आखिरी हफ्ते में गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) 25 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाकर 350 रुपये किया था। गन्ने की कीमत में वृद्धि की घोषणा करते समय राज्य सरकार ने कहा था कि गन्ने की रिजेक्ट की गई किस्मों को भी 310 रुपये की जगह 335 रुपये प्रति क्विंटल के भाव पर खरीदा जाएगा। हालांकि घोषणा के समय इस गन्ने का सिर्फ एक फीसदी बाकी रह गया था। राज्य सरकार का दावा था कि मूल्यवृद्धि से किसानों को 4,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आमदनी होगी। लखनऊ में किसान सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसानों के बकाया बिजली बिल पर ब्याज माफ करने की भी घोषणा की थी। इसके बावजूद गन्ना किसानों की नाराजगी दूर होती नहीं लग रही है।

गांव में अपराध: क्या सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं से फर्क पड़ता है?

ग्रामीण भारत में गरीबी के उन्मूलन और आर्थिक विकास हेतु अच्छी बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच होना महत्वपूर्ण है। यह लेख, भारत मानव विकास सर्वेक्षण (आईएचडीएस) के 2004-05 और 2011-12 के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए दर्शाता है कि पक्की सड़कों से जुड़े गांवों के परिवारों में अपराध, श्रम बल की भागीदारी और पारिवारिक आय के सन्दर्भ में उन गांवों में रहने वालों की तुलना में बेहतर परिणाम पाए गए जहाँ पक्की सड़कें नहीं थी।

विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में विशेष रूप से विकास और आर्थिक विकास के लिए सड़क सुविधाएँ बहुत आवश्यक हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में उच्च आर्थिक विकास हासिल करने के बावजूद, भारत कमजोर और अपर्याप्त बुनियादी ढांचे के नेटवर्क से जूझ रहा है। बुनियादी सुविधाएँ शहरी क्षेत्रों के लिए आवश्यक हैं ही, ग्रामीण क्षेत्र में भी गरीबी के उन्मूलन और आर्थिक विकास हेतु बेहतर बुनियादी सुविधाओं तक पहुंच होना बहुत महत्वपूर्ण है। बुनियादी अवसंरचना के अंतर्गत, आजादी के बाद से ग्रामीण सड़क विकास योजनाओं पर ध्यान दिए जाने के साथ-साथ, भारत में आर्थिक विकास की दृष्टि से सड़क-निर्माण सबसे आगे रहा है। तथापि, योजना की कमी, अनुचित डिजाइन और खराब निगरानी के कारण ग्रामीण सड़क नेटवर्क में कई कमियां हैं (सामंता 2015)। अधिकांश सड़कें अपर्याप्त तटबंध और खराब जल निकासी नेटवर्क के चलते खराब मौसम के दौरान पहुंच योग्य नहीं हैं।

इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर, वर्ष 2000 में केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) शुरू की गई। इस योजना का प्राथमिक उद्देश्य ग्रामीण बस्तियों1 के 500 मीटर के क्षेत्र में हर मौसम में बनी रहनेवाली पक्की सड़क प्रदान करना था। हालाँकि यह योजना केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई एक योजना थी, राज्य और स्थानीय सरकारें भी परियोजना के कार्यान्वयन में सक्रिय रूप से शामिल थीं। पीएमजीएसवाई को जनसंख्या मानदंड के अनुसार चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया था- पहले चरण (कुछ अपवादों2 के साथ) में 1,000 या उससे अधिक की आबादी वाले गांवों को प्राथमिकता दी गई थी, दूसरे चरण में 500 की आबादी वाले गांव शामिल थे, और तीसरे (और अंतिम) चरण में 250 की आबादी वाले गांव शामिल थे। तथापि, वर्ष 2010 से यह योजना सभी गांवों के लिए लागू की गई। इसके अतिरिक्त, बनाई जानेवाली सड़कों को राज्य के भीतर की सड़कों के मुख्य नेटवर्क से जोड़ा जाना था।

वर्ष 1951 में, केवल 20% भारतीय गांवों में हर मौसम में बनी रहनेवाली सड़क थी, जो 2000 में बढ़कर 60% हो गई (ग्रामीण विकास मंत्रालय, 2011, लेई एवं अन्य 2019)। 2019 तक, 73% भारतीय गांवों में सड़कें बन गईं। कुछ अध्ययनों ने विशेष रूप से भारत में आर्थिक परिणामों पर परिवहन नेटवर्क के प्रभाव का विश्लेषण किया है। गनी एवं अन्य (2016) ने पाया कि भारत में राजमार्ग निर्माण और सुधार परियोजना- स्वर्णिम चतुर्भुज (जीक्यू)- ने राजमार्ग के करीब के जिलों में विनिर्माण उत्पादन में सुधार किया। एक अन्य अध्ययन में, लेई एवं अन्य (2019) ने यह दर्शाया कि सड़क की सुविधा व्यक्तियों के लिए रोजगार के बेहतर परिणामों से जुडी है, और खासकर महिलाओं के सन्दर्भ में इसका मजबूत प्रभाव पाया गया है। हाल के एक शोध (जैन और बिस्वास 2021) में, हम परिवहन नेटवर्क के एक और महत्वपूर्ण लेकिन कम अध्ययन किए गए आयाम का पता लगाते हैं, अर्थात, ग्रामीण भारत में सड़क की बुनियादी सुविधा वहां की आपराधिक गतिविधियों के साथ कैसे संबंधित है।

अपराध के निर्धारक के रूप में सड़क अवसंरचना

अपने आसपास के वातावरण में प्राकृतिक आपदा, नागरिक अशांति, महामारी, या हिंसक अपराध जैसे महत्वपूर्ण परिवर्तनों का सामना करने वाले व्यक्ति अधिक जोखिम-प्रतिकूल हो जाते हैं (ब्राउन एवं अन्य 2019)। जोखिम-प्रतिकूलता में अपराध-प्रेरित वृद्धि का मानव विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जिसमें उनकी गतिशीलता सीमित होकर रोजगार और शिक्षा के अवसरों (दत्ता और हुसैन 2009) तक पहुंच कम हो जाती है। इसके अलावा, अनौपचारिक बाजारों, कमजोर संस्थानों और बुनियादी अवसंरचना की खराब गुणवत्ता के चलते विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में अपराध करने पर पकड़े जाने और दोषी ठहराए जाने की संभावना कम होती है (बेनेट 1991, चटर्जी और रे 2014)। बेकर (1986) ने ‘अपराध के अर्थशास्त्र’ की अग्रता की, और इंगित किया कि अपराधी तर्कसंगत सोच रखते थे और अपराधों से मिलनेवाले लाभों और लागतों के आधार पर अपराधों में लिप्त होना है या नहीं यह तय करते थे। बेकर (1986) के बाद, बृहत साहित्य ने अपराध के निर्धारकों की खोज की है। इन अध्ययनों ने उच्च अपराध दर में योगदान देने वाले कई कारकों की पहचान की, जैसे कि बेरोजगारी, शहरीकरण का प्रभाव, अप्रवासियों की उपस्थिति, अपराध की पिछली घटनाएं और संस्थानों की गुणवत्ता। दूसरी ओर, समाजशास्त्रीय साहित्य ने इस बात पर ध्यान केंद्रित किया कि कैसे सापेक्ष अभाव का सामाजिक सिद्धांत अपराध के महत्वपूर्ण निर्धारकों में से एक हो सकता है। यह सिद्धांत मानता है कि अधिक गरीब और असमान समाजों में अपराध की दर अधिक होती है क्योंकि वहां के लोग अपने साथियों की तुलना में खुद को वंचित महसूस करते हैं।

इन सामाजिक-आर्थिक कारकों के अलावा, सड़क अवसंरचना भी अपराध दर को प्रभावित कर सकती है (ह्यूजेस 1998)। दो चैनल हैं जिनके माध्यम से सड़कें अपराध को प्रभावित कर सकती हैं। पहला, सड़कों के माध्यम से स्थानीय विकास से रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकते हैं। बेकर्स (1968) मॉडल से पता चलता है कि बेहतर रोजगार के अवसरों के साथ अपराध की अवसर लागत बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप, व्यक्ति अपराध में समय न बिताकर उसी समय में रोजगार कर सकते हैं। इसलिए, बेकर (1968) के फ्रेमवर्क का तात्पर्य है कि सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं के निर्माण से अपराध का रुकना और उसका निवारण होना चाहिए। तथापि, यदि सड़कों के निर्माण के कारण रोजगार के आर्थिक लाभ अनुपातहीन रूप से कुशल और संपन्न व्यक्तियों को मिलनेवाले हैं, तो अकुशल व्यक्ति अभी भी आपराधिक गतिविधियों में शामिल हो सकते हैं। इन संदर्भों में, यदि बेहतर सड़क अवसंरचना से जनसंख्या का बहुत छोटा हिस्सा लाभान्वित होता है, तो सड़क अवसंरचना के परिणामस्वरूप असमानता में वृद्धि के जरिये आपराधिक गतिविधि में वृद्धि हो सकती है।

एक अन्य चैनल जो यह निर्धारित करता है कि सड़क अवसंरचना अपराध को कैसे प्रभावित कर सकती है, बुनियादी सुविधाओं के विकास के कार्यान्वयन से ही उपजा है। सड़कें समय की लागत को कम करती हैं और आपराधिक और आर्थिक गतिविधियों- दोनों के लिए महत्वपूर्ण गतिशीलता को बढ़ाती हैं। अच्छी तरह से जुड़ा सड़क नेटवर्क संभावित हॉटस्पॉट तक अपराधियों की आवाजाही को आसानी से उत्प्रेरित कर सकता है।

इस पृष्ठभूमि के मद्देनजर, हम इस बात की जांच करना चाहते हैं कि सड़क-निर्माण की बुनियादी सुविधा ग्रामीण भारत में अपराध को कैसे प्रभावित करती है।

भारत में अपराध संबंधी डेटा

भारत में आपराधिक गतिविधियों के बारे में जानकारी एकत्र करने के दो संभावित तरीके हैं – संबंधित नोडल एजेंसी द्वारा बनाए गए अपराध रिकॉर्ड, यानी एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) और एक सर्वेक्षण के माध्यम से पीड़ितों से सीधे एकत्र की गई जानकारी। सूचना का पूर्व स्रोत अपराध स्थल और नोडल एजेंसी के बीच कई मध्यस्थ एजेंटों से होकर गुजरता है। साथ ही, एनसीआरबी द्वारा अपराधों से संबंधित पुलिस रिकॉर्ड का उपयोग करने से अपराध के वास्तविक पैटर्न को पकड़ने में कई सीमाएं हो सकती हैं क्योंकि भारत में खराब बुनियादी ढांचे, कमजोर संस्थानों और सामाजिक कलंक के कारण विभिन्न अपराधों को रिपोर्ट नहीं किए जाते हैं। वास्तव में, अपराध की कम रिपोर्टिंग एक वैश्विक मुद्दा है- अंतर्राष्ट्रीय अपराध शिकार सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर केवल 40% किये गए अपराध ही रिपोर्ट किए जाते हैं। हालांकि, विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में अपराध की कम रिपोर्टिंग अधिक प्रचलित है। अध्ययन में यह भी दर्ज किया गया है कि भारत में हत्या जैसे हिंसक अपराधों की प्रवृत्ति विकसित दुनिया से बहुत अलग नहीं है, लेकिन चोरी और चोरी जैसी अन्य आपराधिक गतिविधियों की रिपोर्ट3 नहीं होने की संभावना अधिक है। इसके अलावा, भारत में अपराध की कम रिपोर्टिंग, पीड़ितों द्वारा रिपोर्ट न करने का विकल्प चुनने और पुलिस द्वारा इसे रिकॉर्ड न करने का निर्णय लेने का ही परिणाम है (अंसारी एवं अन्य 2015)। जबकि पुलिस रिकॉर्ड जानकारी का एक मूल्यवान स्रोत है, पीड़ित द्वारा रिपोर्ट किए गए अपराध की गणना करने से अंदाजन (बढ़ा-चढ़ा कर मूल्यांकन) को कम किया जा सकता है। सीधे सर्वेक्षणों के माध्यम से उत्तरदाताओं से यह पूछकर कि क्या उन्होंने पिछले एक साल में किसी अपराध का सामना किया है, इस तरह के डेटा एकत्र किए जाते हैं।

सड़क अवसंरचना और अपराध

हम 2004-05 और 2011-12 में किये गए भारत मानव विकास सर्वेक्षण (आईएचडीएस) के डेटा का उपयोग करते हैं। आईएचडीएस के चार प्रश्न हैं कि क्या परिवारों को चोरी, धमकी या हमलों, महिला उत्पीड़न और किसी के घर में घुसने की घटनाओं का सामना करना पड़ा। इन आपराधिक गतिविधियों के आधार पर, हम अपराध के दो मापों का निर्माण करते हैं: (i) चार प्रकार के अपराधों में से प्रत्येक का एक साधारण औसत, और (ii) यदि परिवार में से कोई भी इन चार प्रकार के अपराध में से किसी का शिकार हुआ है|

आईएचडीएस के दोनों सर्वेक्षणों में अन्य विशेषताओं के साथ-साथ गाँव-स्तरीय सुविधाओं, जनसंख्या रचना और व्यवसाय संरचना के लिए एक अलग प्रश्नावली है। गाँव की प्रश्नावली से प्राप्त जानकारी का उपयोग करते हुए कि क्या हर मौसम में बनी रहने वाली पक्की सड़क या कच्ची सड़क के माध्यम से गाँव पहुँचा जा सकता था, या वह दुर्गम था, हम अपने फोकल चर का निर्माण करते हैं- गाँव में पक्की सड़क का होना। हम गांव और परिवार स्तर के कारकों पर भी विचार करते हैं जो अपराध को प्रभावित कर सकते हैं।

हम सड़क की बुनियादी सुविधा और अपराध के बीच समग्र पैटर्न को इस बात पर ध्यान केंद्रित करके मापते हैं कि पक्की सड़कों वाले गांवों और उनके बिना गांवों के बीच विभिन्न आर्थिक परिणाम कैसे भिन्न होते हैं। ये परिणाम हम तालिका 1 में संकलित करते हैं।

तालिका 1. गांव में सड़क की बुनियादी सुविधा के अनुसार माध्य/औसत अंतर

चरपक्की सड़केंपक्की सड़कें नहींअंतर
आपराधिक गतिविधि के प्रकार
अपराध सूचकांक 10.0230.028-0.005***
अपराध सूचकांक 20.1880.1880.000
चोरी0.0360.045-0.008***
हमला0.0230.030-0.007***
उत्पीड़न0.1450.150-0.004*
घर में घुसना0.0090.0100.001
अन्य सुविधाएं और आर्थिक परिणाम
स्ट्रीट लाइट0.4370.2360.201***
बस स्टॉप की दूरी1.0431.471-0.428***
रोजगार अनुपात0.7590.6840.074***
परिवार की आय0.3270.2790.048***

नोट: (i) इस धारणा को देखते हुए कि शून्य परिकल्पना सच है, पी-वैल्यू कम से कम उतना ही चरम परिणाम प्राप्त करने की संभावना है जितना कि परिणाम देखे गए हैं। उल्लिखित महत्व स्तर से कम पी-मान को सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण माना जाएगा (यदि पी <0.01, यह 1% के स्तर पर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण है)। * पी<.05, ** पी <.01, ***पी <. 001=”” span=””>(दो तरफा )।

तालिका 2 से पता चलता है कि अधिकांश अपराध माप बिना पक्की सड़कों वाले गांवों में रहने वाले परिवारों की तुलना में हर मौसम में बनी रहने वाली पक्की सड़क वाले गांवों में रहने वाले परिवारों के सन्दर्भ में कम हैं। इसके अलावा, हम पाते हैं कि पक्की सड़कों वाले गांवों में सार्वजनिक कार्यक्रम के माध्यम से स्ट्रीट लाइट मिलने की संभावना भी अधिक होती है। इसी प्रकार से, इस समूह के गांवों में एक बस स्टॉप भी है और यह पक्की सड़क की सुविधा नहीं होनेवाले उन गांवों के समूह की तुलना में, गांव के करीब भी है। अंततः, अच्छी तरह से जुड़ी सड़कों वाले गांवों में रहने वाले परिवार श्रम शक्ति भागीदारी की बेहतर दर और उच्च पारिवारिक आय प्रदर्शित करते हैं। ये पैटर्न इंगित करते हैं कि भारत में अपराध से निपटने में ग्रामीण सड़क अवसंरचना प्रभावी हो सकती है।

चर्चा और नीतिगत निहितार्थ

हमारे प्रारंभिक अवलोकन विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में ठोस बुनियादी सुविधाओं के निर्माण के महत्व को उजागर करते हैं। रोजगार के अवसरों में सुधार के साथ साथ ही, सड़क अवसंरचना कम अपराध के रूप में सकारात्मक स्पिलओवर प्रभाव उत्पन्न करती है। परियोजना पूरी होने की लंबी अवधि के बावजूद इन परियोजनाओं में निवेश संसाधनों पर ध्यान केंद्रित करने वाली नीतियों को डिजाइन करने और लागू करने में इसके महत्वपूर्ण नीतिगत निहितार्थ हैं। वर्तमान कोविड-19 महामारी ने भारत में आय, लिंग और जाति की मौजूदा असमानता को गहरा कर दिया है (डीटन 2021, देशपांडे 2021, विश्व बैंक, 2020)। इन परिस्थितियों में, सड़कों जैसी बुनियादी सुविधाओं वाली परियोजनाओं में निवेश बढ़ाने में सरकार की भूमिका यह सुनिश्चित करने के लिए निर्णायक हो जाती है कि महामारी की वजह से असमानता में आई वृद्धि अल्पकालिक होगी और इससे आपराधिक गतिविधियों में कमी आएगी।

टिप्पणियाँ:

  1. ग्रामीण बस्ती को आबादी के एक समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है जो एक गाँव- खेड़ा की तर्ज पर एक ही स्थान पर रहता है।
  2. उदाहरण के लिए, यदि 1,000 से कम आबादी वाली कोई बस्ती सड़क के सीधे रास्ते पर पड़ती है, जो 1,000 से अधिक आबादी के लिए बनाई गई थी, तो इसे चरण 1 में शामिल किया गया था।
  3. यह 1992 और 2003 में अंतर्राष्ट्रीय अपराध पीड़ित सर्वेक्षण के दो दौर के आंकड़ों पर आधारित है जिसमें चुनिंदा भारतीय शहरों को शामिल किया गया था। अधिक जानकारी के लिए अंसारी एवं अन्य (2015) देखें।

चौधरी छोटूराम की मृत्यु के बाद 19 फ़रवरी, 1945 को पंजाब असेम्ब्ली में पढ़ा गया वह शोक संदेश

चौधरी सर छोटूराम की मृत्यु नो जनवरी, 1945 को हुई थी। यूनियनिस्ट पार्टी के हल और तलवार के चिन्ह वाले झंडे में लिपटे उनके शरीर को लाहौर से रोहतक लाया गया। रोहतक में कांग्रेस कमेटी की तरफ़ से प० श्रीराम शर्मा ने कांग्रेस पार्टी का तिरंगा झंडा पेश किया। चौधरी सर छोटूराम का दाहसंस्कार जाट हीरोज़ मेमोरीयल हाई स्कूल रोहतक की सेठ छाजूराम बिल्डिंग के सामने किया गया।

उनकी मृत्यु के बाद जब सोमवार, 19 फ़रवरी, 1945 को पंजाब असेम्ब्ली का सेशन शुरू हुआ तो सदन में उन्हें श्रधांजलि पेश की गई। पंजाब के प्रीमियर ख़िजर टिवाना समेत सभी वज़ीरों व सदस्यों ने शोक प्रकट किया। मुझे इनमें डॉ. शेख मुहम्मद आलम का शोक संदेश दिल से प्रकट किया दर्द लगा।

चौधरी छोटूराम को श्रधांजलि देते हुए डॉ. शेख मुहम्मद आलम (रावलपिंडी डिवीजन टाउन, मुहम्मडन, अर्बन) –
जनाब, काफ़ी देर बाद मैं इस अगस्त हाउस को एक बहुत ही अलग विषय पर संबोधित करने के लिए खड़ा हुआ हूं, जिसके बारे में मौखिक रूप से संवेदना व्यक्त की जानी है। मैं इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बारे में कुछ सरल शब्दों में अपनी भावनाओं को व्यक्त करना चाहता हूँ। सभी तरह की राय के लोगों ने स्वर्गीय चौधरी सर छोटू राम पर सहानुभूति की बौछार की है। स्वर्गीय चौधरी सर छोटू राम की स्मृति को एक शानदार श्रद्धांजलि देने वालों में वो नेता भी शामिल हैं जो मानते हैं कि धर्म को राजनीति में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और उन दलों के नेता भी जो मानते हैं कि धर्म को राजनीति में हस्तक्षेप करना चाहिए।

विभिन्न दलों के नेता, अर्थात् वे दल जो खुद को दलितों व दबे कुचले हुए जमींदारों के शुभचिंतक होने का दावा करते हैं, और जो गैर-कृषको के नेता कहे जाते हैं, स्वर्गीय सर छोटू राम की प्रशंसा में हमारे साथ जुड़े हैं। सर छोटू राम की महानता के बारे में विभिन्न दलों के इन नेताओं ने जो कुछ व्यक्त किया है, उसके संबंध में मैं कुछ नहीं कहना चाहता, लेकिन अब तक किए गए तमाशे से एक बात बिल्कुल स्पष्ट हो गई है कि एक आदमी के रूप में सर छोटू राम में कुछ अलग था, और मैं कहूंगा कि यही एकमात्र गुण था जिसने मुझे हमेशा बहुत दृढ़ता से आकर्षित किया था। इसी गुण के कारण ही मैं आज इस सदन में उनकी प्रशंसा करने के लिए खड़ा हूं, एक यूनियनिस्ट के रूप में नहीं, एक कृषक के रूप में नहीं, और एक राष्ट्रवादी के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के रूप में। एक व्यक्ति के रूप में उनमें वास्तव में कुछ विशेष ख़ासियत थी, जो उन्हें दूसरों से अलग करती थी और केवल उसी गुण के कारण वह हमारे बीच इतने लोकप्रिय थे।

मैं यह भी निवेदन कर सकता हूं कि उनके इसी गुण के कारण ही आज विभिन्न वर्गों के लोग भी अब उनकी प्रशंसा कर रहे हैं और उनके दुखद निधन पर बहुत दुखी हैं। अब सदन के पटल पर की गई सभी अनावश्यक टिप्पणियों को एक तरफ रखते हुए, मैं फिर से यह निवेदन करूंगा कि सर छोटू राम, एक व्यक्ति के रूप में हमारे बीच एक बहुत ही प्रतिष्ठित स्थान रखते थे। उनके मित्रों और यहाँ तक कि विरोधियों ने भी उन्हें विभिन्न रंगों में प्रस्तुत करते हुए इस तथ्य को स्वीकार किया है कि उनके दिल और दिमाग़ की योग्यता का स्तर बहुत ऊँचा था कि वो प्रशंसा के हक़दार थे और उनके सच्चे स्वभाव और सशक्त चरित्र के कारण ही उन्होंने उन्हें हमेशा सम्मान दिया था। वे पूँजीवाद के घोर विरोधी थे और गरीबों के प्रति स्नेही होने के कारण वे हमेशा उनके लिए डटे रहते थे। उनका जीवन गरीबों और दलित जमींदारों की स्थिति में सुधार के लिए एक निरंतर संघर्ष में गुज़रा और हम में से कोई भी इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता है कि अपने पूरे जीवन में वह एक वर्ग की भलाई के लिए प्रयास कर रहे थे, चाहे उस वर्ग का बहुमत मुस्लिम या हिंदू ही क्यों न हो। उन्होंने उस वर्ग की बेहतरी के लिए अच्छा प्रदर्शन किया, जिसकी मदद करने के लिए वह निकले थे। उन्होंने उनके अधिकारों की रक्षा की। उन्होंने उनमें नया रक्त संचार किया। उन्होंने सदन से उनके अधिकारों को दिलाया और उनके सिर को ऊंचा रखने के लिए उनके लिए हर संभव प्रयास किया। उनमें कई गुण थे लेकिन दो चीजें जो मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती थीं, वह थी छोटू राम एक आदमी के रूप में और दूसरा पूंजीवाद के विरोध में।

अब, जनाब, मेरी इच्छा है कि हमारी सहानुभूति न केवल दिवंगत के परिवार के शोक संतप्त सदस्यों तक पहुंचाई जाए बल्कि यह बात झोंपड़ियों में रहने वाले जमींदारों और यहां तक ​​कि उन गरीब किसानों तक भी पहुंचाई जानी चाहिए जो मुश्किल से अपना गुजारा करते हैं, जिनके साथ दिवंगत मंत्री स्वर्गीय सर छोई राम का जज़्बाती रिश्ता था। हालांकि, मैं सरकार से कहना चाहता हूं कि वह हमारी भावनाओं को दिवंगत सर छोटू राम के दुश्मनों तक भी पहुंचाएं।

मेरे माननीय मित्र लाला भीम सेन सच्चर, जोकि विपक्ष के नेता हैं, ने ठीक ही कहा है कि सर छोटू राम अपने शक्तिशाली व्यक्तित्व के कारण दोस्त और दुश्मन बनाने में मदद नहीं कर सकते थे। मैं उनसे काफी सहमत हूं, लेकिन मैं कहूंगा कि दुश्मन कई तरह के होते हैं। ऐसे दुश्मन हैं जिनकी दुश्मनी ईमानदारी पर आधारित है जबकि दूसरी तरफ ऐसे दुश्मन हैं जिनकी दुश्मनी द्वेष में निहित है, सर छोटू राम के दूसरे प्रकार के दुश्मन भी थे। इस संबंध में मैं बता दूं कि कुछ ऐसे अख़बार थे जिनका प्रकाशन और स्तर मुख्य रूप से सर छोटू राम को गाली देने पर निर्भर करता था और उन पर कीचड़ उछालकर पैसा मिलता था। अब जाहिर तौर पर सर छोटू राम की मौत ने उनके पेशे को घातक झटका दिया है। मुझे उन अख़बारों पर बहुत दया आती है, क्योंकि अब वे पैसे नहीं हड़प सकेंगे जो वे अब तक करते रहे हैं। मुझे यह कहते हुए दुख हुआ कि ज़मींदारों के अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर लेने वाले अख़बार भी उसी तर्ज पर काम कर रहे हैं, जैसा कि उन अख़बारों ने अपनाया है, जिनकी आय का स्रोत, जैसा कि मैंने बताया है, मुख्य रूप से दिवंगत मंत्री को कोसने पर निर्भर करता है।

मुझे उन अख़बारों से पूरी सहानुभूति है जिनकी आय सर छोटू राम की मृत्यु के कारण हमेशा के लिए रुक गई है।

अपनी सीट पर बैठने से पहले मैं कहूंगा कि सर छोटू राम वास्तव में एक महान व्यक्ति थे और मैं उन्हें एक यूनियनिस्ट के रूप में ही नहीं बल्कि पूंजीवाद के कट्टर विरोधी के रूप में, ग़रीब ज़मींदारों के एक महान शुभचिंतक और हमदर्द के रूप में बहुत सम्मान देता हूँ। अंत में मैं शोक संतप्त संबंधियों और गरीब जमींदारों के साथ-साथ स्वर्गीय सर छोटू राम के उन दयनीय शत्रुओं के प्रति गहरी सहानुभूति व्यक्त करता हूं, जिनकी आय को उनकी मृत्यु ने समाप्त कर दिया है।

लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में यूपी पुलिस ने 7 किसानों को किया गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में बीते साल तीन अक्टूबर को हुई हिंसा के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या मामले में यूपी पुलिस किसानों के खिलाफ दर्ज हत्या के मामले में एसआईटी अब तक कुल सात किसानों को गिरफ्तार कर चुकी है. अभी हाल ही में विशेष जांच दल (एसआईटी) ने दो किसानों को​ गिरफ्तार किया है.

अधिकारियों के मुताबिक, भाजपा कार्यकर्ताओं की तरफ से दर्ज कराई गई प्राथमिकी में एसआईटी ने बीती एक जनवरी की शाम दो किसानों- तिकुनिया कोतवाली सीमा अंतर्गत खैरतिया गांव निवासी कंवलजीत सिंह (35 वर्ष) और पलिया कोतवाली क्षेत्र के बबौरा निवासी कमलजीत सिंह (29 वर्ष) को गिरफ्तार किया है.

अन्य आरोपियों की पहचान के लिए पुलिस ने थानों और चौकियों के अलावा अन्य सार्वजिनक जगहों पर फोटो चस्पा कराए थे. एसआईटी ने पहचान के बाद थाना पलिया के बबौरा फार्म निवासी कमलजीत सिंह, सोनू उर्फ कवलजीत और गुरुप्रीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया है.

अधिकारियों के अनुसार, किसानों के खिलाफ दर्ज हत्या के मामले में एसआईटी अब तक कुल सात किसानों को गिरफ्तार कर चुकी है, इसके पहले चार अन्य विचित्र सिंह, गुरविंदर सिंह, रंजीत सिंह और अवतार सिंह को गिरफ्तार किया गया था, जो जेल में बंद हैं.

बताया गया कि इन पर भाजपा कार्यकर्ताओं- शुभम मिश्रा (26 वर्ष) और श्याम सुंदर (40 वर्ष) और केंद्रीय राज्य मंत्री की एसयूवी के चालक हरिओम मिश्रा (35 वर्ष) की हत्या में शामिल होने का आरोप है.

लखीमपुर मामले में दो एफआईआर हुई थीं, पहली एफआईआर एक किसान जगजीत सिंह ने चार किसानों और एक पत्रकार की मौत के मामले में दर्ज कराई थी जिसमें उन्होंने केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा और 15 से 20 अन्य को आरोपी बनाया था. दूसरी एफआईआर भाजपा के कार्यकर्ता सुमित जायसवाल द्वारा किसानों को गाड़ी से कुचले जाने के बाद हुई हिंसा के दौरान भाजपा के दो कार्यकर्ताओं और एक चालक की मौत के मामले में दर्ज कराई गई थी, जिसमें उन्होंने अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया था. इसके बाद मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया था.

लखीमपुर खीरी पुलिस और वरिष्ठ अभियोजन अधिकारी (एसपीओ) एसपी यादव ने कहा कि करीब दो महीने पहले एसआईटी द्वारा संदिग्धों की तस्वीरें जारी किए जाने के बाद से 22 वर्षीय गुरप्रीत सिंह फरार चल रहा था. लिंचिंग मामले में अब तक सात किसानों को गिरफ्तार किया जा चुका है.

सुमित द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकी में किसानों और पत्रकार की मौत का जिक्र नहीं था, जिन्हें कथित तौर पर आशीष के काफिले ने कुचल दिया था. हिंसा से संबंधित पहली प्राथमिकी पुलिस ने आशीष और अन्य के खिलाफ किसानों की शिकायत के आधार पर दर्ज की थी. एसआईटी ने उस मामले में 13 लोगों को गिरफ्तार किया है और घटना को ‘योजनाबद्ध’ करार दिया है.

नवंबर में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी का पुनर्गठन किया था और नए सदस्यों को जोड़ा था. सदस्यों में आईपीएस अधिकारी एसबी. शिराडकर, प्रीतिंदर सिंह और पद्मजा चौहान, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश राकेश कुमार जैन शामिल हैं.

भिवानी: अवैध खनन के चलते तोशाम में पहाड़ खिसकने से तीन मजदूरों की मौत, कई दबे

भिवानी के तोशाम खनन क्षेत्र में 1 जनवरी को डाडम पहाड़ के पिट नंबर 37-38 में भारी हादसा हुआ, जिसमें पहाड़ के दरकने की वजह से 10 से अधिक मजदूरों के दबे होने की सूचना मिल रही है. हादसे में तीन लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हैं और उन्हें हिसार के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया है. मृतक छत्तीसगढ़, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं. 

डाडम पहाड़ के माइनिंग माफिया 4 पोकलेन, 2 ड्रिल, अनेकों डंपर और बहुत सारे माइनिंग के कर्मचारियों से 40 मीटर के खतरनाक बेंच के नीचे गैरकाननूनी ढंग से जबरदस्ती काम करवा रहे थे.

इस हादसे में खनन में प्रयोग होने वाली पोपलैंड और अन्य कई मशीनें भी मलबे में दब गई है. तोशाम क्षेत्र के खानक और डाडम में बड़े स्तर पर पहाड़ खनन कार्य होता है. प्रदूषण के चलते 2 महीने पहले खनन कार्य पर रोक लगाई गई थी. एनजीटी ने गुरुवार को ही खनन कार्य दोबारा शुरू करने की इजाजत दी थी. एनजीटी से अनुमति मिलने के बाद शुक्रवार से ही खनन कार्य शुरू कर दिया गया था. 2 महीने तक खनन कार्य बंद रहने की वजह से भवन निर्माण सामग्री की किल्लत हो रही थी. इस किल्लत को दूर करने के लिए ही वहां बड़े स्तर पर ब्लास्ट किए जाने की आशंका भी जताई जा रही हैं.

भिवानी जिला के खानक और डाडम के डाडम पहाड़ में अवैध तरीके से माइनिंग काफी समय से जारी है. डाडम में अवैध खनन के विरोध में काम कर रहे एक एक्टिविस्ट ने पत्रकार राजेश कुंडु से बातचीत करते हुए बताया,” जिस प्रकार अनसाइंटिफिक तरीके से डाडम में खनन हो रहा था इसकी लिखित में शिकायत वहां के तत्कालिक जिला उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक, माइनिंग इंजीनियर और डायरेक्टर माइन्स को कई बार दे चुका हूं, लेकिन कार्यवाही के नाम पर मात्र लीपापोती की गई. मैंने उन्हें लिखित में आगाह किया था कि जिस तरीके से खनन हो रहा है कभी भी पहाड़ दरक कर कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है लेकिन इस पर कोई भी कार्यवाही नहीं की गई जिसका अंजाम आज के हादसे के रूप में बहुत सारे परिवारों को भुगतना पड़ रहा है. इस माइनिंग के खेल में लगभग दस से ज्यादा बड़े खिलाड़ी शामिल है जिनमें माफिया के अलावा सत्ता पक्ष, विपक्ष के नेता एवं दिल्ली में बैठे कुछ बहुत ही शक्तिशाली लोग भी है.”

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के डाडम क्षेत्र में हुए अवैध और अवैज्ञानिक खनन की जांच के लिए सेवानिवृत्त जस्टिस प्रीतम पाल कमेटी अपनी अंतिम रिपोर्ट सौपेंगी. कमेटी की रिपोर्ट में पहाड़ की सेटेलाइट इमेज में खनन ठेकेदार की पूरी कारगुजारी कैद है. जस्टिस प्रीतम पाल पूरे मामले पर अंतरिम रिपोर्ट एनजीटी को सौंप चुके हैं. इमेज मिलते ही अंतिम रिपोर्ट भी सौंप दी जाएगी. इसमें जिला प्रशासन की विरोधाभासी रिपोर्ट का भी भेद खुलेगा. जिला प्रशासन ने डाडम पहाड़ पर हुए अवैध व अवैज्ञानिक खनन को लेकर दो अलग-अलग रिपोर्ट सौंपी थी. दोनों आपस में मेल नहीं खाती थी, एक में बताया गया कि खनन गलत तरीके से हुआ है, जबकि दूसरी में कहा कि अवैध खनन के कोई साक्ष्य नहीं हैं.

इस पर एनजीटी के चेयरमैन जस्टिस आदर्श कुमार गोयल का माथा ठनक गया. उन्होंने शिकायतों के मद्देनजर एनजीटी की हरियाणा इकाई के चेयरपर्सन जस्टिस प्रीतम पाल की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति गठित कर दी. इसमें खनिज एवं भू-गर्भ, वन एवं अन्य क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल किए गए. कमेटी को धरातल की स्थिति का जायजा लेकर अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए. जस्टिस प्रीतम पाल ने कमेटी सदस्यों के साथ अक्तूबर 2021 में पूरे दिन डाडम पहाड़ का दौरा किया. मौके पर सौ से डेढ़ सौ ग्रामीण मिले, जिन्होंने बेतरतीब खनन को लेकर कड़ी नाराजगी जताई. कमेटी उनके बयान रिकॉर्ड कर चुकी है. ग्रामीणों का कहना है कि खनन ठेकेदार ने वन क्षेत्र में भी खनन किया है.