तोमर समेत 15 मंत्रियों पर गांव-किसान के कल्याण का जिम्मा

भारी बहुमत से दोबारा सत्ता में आई नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्रालयों का बंटवारा हो गया है। अमित शाह को गृह मंत्रालय, राजनाथ सिंह को रक्षा, निर्मला सीतारमण को वित्त, नितिन गडकरी को परिवहन, एस. जयशंकर को विदेश और नरेंद्र तोमर को कृषि, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली है।

मोदी मंत्रिमंडल में सदानंद गौड़ा को रसायन एवं उर्वरक, पीयूष गोयल को रेल, धर्मेंद्र प्रधान को पेट्रोलियम व इस्पात, रविशंकर प्रसाद को कानून, संचार व आईटी, स्मृति ईरानी को कपड़ा, महिला एवं बाल विकास, डॉ. हर्षवर्धन को स्वास्थ्य, विज्ञान व तकनीक और रमेश पोखरियाल निशंक को मानव संसाधन विकास मंत्रालय मिला है।

मंत्रियों के बीच कामकाज के विभाजन के साथ-साथ कई मंत्रालयों के स्वरूप में भी फेरबदल किया गया है। गांव-किसान और खेती से जुड़े मंत्रालयों का जिम्मा अब एक-दो नहीं बल्कि कुल 15 मंत्रियों के पास रहेगा। अभी तक कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत आने वाले पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग को अलग मंत्रालय का दर्जा मिल गया है।

कृषि मंत्रालय के साथ-साथ ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालय की जिम्मेदारी नरेंद्र सिंह तोमर को दी गई है। इन तीनों मंत्रालय का संबंध गांंव-किसान से है इसलिए तीनों का जिम्मा एक ही कैबिनेट मंत्री के पास होना सही फैसला है। यह तोमर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बढ़ते भरोसे का भी सबूत है। उनके साथ कैलाश चौधरी और पुरुषोत्तम रूपाला को कृषि मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया है जबकि साध्वी निरंजन ज्योति ग्रामीण विकास मंत्रालय में राज्यमंत्री रहेेंगी।

मध्यप्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर इस बार मुरैना से सांसद हैं। वे पिछली मोदी सरकार में भी ग्रामीण विकास मंत्रालय का कार्यभार संभाल चुके हैं। इस बार राधा मोहन सिंह की जगह उन्हें कृषि मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई है।

पहली बार बने पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन मंत्रालय में बिहार के अनुभवी सांसद गिरिराज सिंह कैबिनेट मंत्री होंगे। मुजफ्फरनगर से अजित सिंह जैसे दिग्गज को हराकर दूसरी बार संसद पहुंचे डॉ. संजीव कुमार बालियान और उड़ीसा में झोपड़ी वाले सांसद के तौर पर मशहूर प्रताप चंद्र सारंगी पशुपालन मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाए गए हैं। बालियान खुद पशु चिकत्सक हैं और हरियाणा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके हैं। उन्हें पिछली बार कृषि मंत्रालय और जल संसाधन मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया था लेकिन कार्यकाल पूरा होने से पहले ही हटा दिया था। इस बार पश्चिमी यूपी से पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर डॉ. सत्यपाल सिंह की जगह संजीव बालियान को मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिली है।

पिछली बार की तरह इस बार भी खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय का जिम्मा एनडीए की घटक लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान के पास रहेगा।  पासवान पिछले 30 साल से ज्यादातर सरकारों में मंत्री रहे हैं। देश में अनाज की सरकारी खरीद, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, महंगाई को काबू में रखने के उपाय और चीनी उद्योग इसी मंत्रालय के तहत आता है। इसलिए किसानों के लिहाज से यह भी कृषि जितना ही महत्वपूर्ण मंत्रालय है। महाराष्ट्र  भाजपा के अध्यक्ष और जालाना से सांसद रावसाहेब दादाराव दानवे को खाद्य एवं उपभोक्ता मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की जिम्मेदारी इस बार भी अकाली दल की नेता हरसिमरत कौर बादल के पास है। असम के युवा सांसद रामेश्वर तेली इस मंत्रालय में राज्यमंत्री हैैं।

इस बार एक बड़ा बदलाव जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय में दिख रहा है।  इस मंत्रालय की जगह अब सिर्फ जल शक्ति मंत्रालय रह गया है।

जोधपुर से अशोक गहलोत के बेटे को मात देने वाले गजेंद्र सिंह शेखावत को जल शक्ति मंत्रालय में कैबिनेट मंत्री जबकि हरियाणा के रतन लाल कटारिया को राज्यमंत्री बनाया गया है। उमा भारती और नितिन गडकरी को मौका दिए जाने के बावजूद मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में गंगा की सफाई का काम बहुत प्रभावी ढंग से नहीं हो पाया था। शायद मंत्रालय का नाम बदलने के पीछे इस नाकामी से पीछा छुड़ाने की मंशा है।

खेती-किसानी और ग्रामीण विकास से जुड़े काम कई अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों में बंटे होने को लेकर विशेषज्ञ सवाल उठाते रहे हैं। पिछली मोदी सरकार में “न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन” का नारा खूब गूंजा था। तब मिलते-जुलते कामकाज वाले मंत्रालयों को मिलाने या उनका कलस्टर बनाने  की काफी बातें हुई थीं, लेकिन यह काम आगे नहीं बढ़ा।

कृषि अर्थशास्त्री पीके जोशी ने हाल ही में कृषि और ग्रामीण विकास मंत्रालयों को मिलाने का सुझाव दिया है। इस बार प्रधानमंत्री मोदी ने ग्रामीण विकास, पंचायती राज के साथ कृषि मंंत्रालय का जिम्मा नरेंद्र सिंह तोमर को देकर इस दिशा में कदम भी बढ़ाया लेकिन कृषि मंत्रालय से पशुपालन को अलग कर दिया। खाद्य और खाद्य प्रसंस्करण पहले ही अलग-अलग हैं। उर्वरक कृषि के बजाय रसायन मंत्रालय के साथ है। इस तरह केंद्र सरकार में खेती-किसानी और गांव से जुड़े पहले से ज्यादा मंत्रालय और मंत्री हो गए हैं। देखना है कि एक दर्जन से ज्यादा मंत्री गांव-किसान का कितना भला कर पाते हैं।

 

कभी कृषि मंत्रालय का हिस्सा रहा उर्वरक अब रसायन मंत्रालय का हिस्सा है, जिसमें सदानंद गौड़ा कैबिनेट मंत्री और मनसुख मंडाविया राज्यमंत्री  हैं।

इससे पहले गुरुवार शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रिमंडल के 57 सहयोगियों के साथ पद और गोपनीयता की शपथ ली थी। मोदी सरकार का पूरा मंत्रिमंडल इस प्रकार है:

 1. नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री)

प्रधानमंत्री के पद के साथ कार्मिक, जन शिकायत और पेंशन, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष मंत्रालय. इसके अलाव वो सभी मंत्रालय जो किसी भी मंत्री को अलॉट न हुए हो

 2. राजनाथ सिंह (कैबिनेट मंत्री)

रक्षा मंत्रालय

 3. अमित शाह (कैबिनेट मंत्री)

गृह मंत्रालय

 4. नितिन गडकरी (कैबिनेट मंत्री)

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय

 5. सदानंद गौड़ा (कैबिनेट मंत्री)

रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय

 6. निर्मला सीतारमण (कैबिनेट मंत्री)

वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों का मंत्रालय

 7. राम विलास पासवान (कैबिनेट मंत्री)

उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय

 8. नरेंद्र सिंह तोमर (कैबिनेट मंत्री)

कृषि एवं किसान कल्याण, ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालय

 9. रविशंकर प्रसाद (कैबिनेट मंत्री)

कानून एवं न्याय, संचार और इलेक्ट्रानिक एवं सूचना मंत्रालय

 10. हरसिमरत कौर बादल (कैबिनेट मंत्री)

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय

 11. एस. जयशंकर (कैबिनेट मंत्री)

विदेश मंत्रालय

 12. रमेश पोखरियाल निशंक (कैबिनेट मंत्री)

मानव संसाधन विकास मंत्रालय

 13. थावर चंद गहलोत (कैबिनेट मंत्री)

सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्रालय

 14. अर्जुन मुंडा (कैबिनेट मंत्री)

आदिवासी मामलों का मंत्रालय

 15. स्मृति ईरानी (कैबिनेट मंत्री)

महिला एवं बाल विकास और कपड़ा मंत्रालय

 16. हर्षवर्धन (कैबिनेट मंत्री)

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, विज्ञान और प्रोद्योगिकी, भूविज्ञान मंत्रालय

 17. प्रकाश जावड़ेकर (कैबिनेट मंत्री)

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय

 18. पीयूष गोयल (कैबिनेट मंत्री)

रेलवे और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय

 19. धर्मेंद्र प्रधान (कैबिनेट मंत्री)

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस और इस्पात मंत्रालय

 20. मुख्तार अब्बास नकवी (कैबिनेट मंत्री)

अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय

 21. प्रह्लाद जोशी (कैबिनेट मंत्री)

संसदीय मामले, कोयला और खान मंत्रालय

 22. महेंद्र नाथ पांडेय (कैबिनेट मंत्री)

कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय

 23. अरविंद सावंत (कैबिनेट मंत्री)

भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम मंत्रालय

 24. गिरिराज सिंह (कैबिनेट मंत्री)

पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन मंत्रालय

 25. गजेंद्र सिंह शेखावत (कैबिनेट मंत्री)

जल शक्ति मंत्रालय

 26. संतोष गंगवार (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय

 27. राव इंद्रजीत सिंह (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन और नियोजन मंत्रालय

 28. श्रीपद नाईक (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

आयुष मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार), रक्षा मंत्रालय (राज्य मंत्री)

 29. जितेंद्र सिंह (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

पूर्वोत्तर विकास (स्वतंत्र प्रभार), पीएमओ, कार्मिक, जनशिकायत और पेंशन, परमाणु उर्जा, अंतरिक्ष मंत्रालय (राज्य मंत्री)

 30. किरण रिजिजू (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

युवा मामले एवं खेल (स्वतंत्र प्रभार), अल्पसंख्यक मामले (राज्य मंत्री)

 31. प्रह्लाद सिंह पटेल (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

संस्कृति और पर्यटन (स्वतंत्र प्रभार)

 32. आरके सिंह (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

बिजली, नवीन एवं नवीकरणीय उर्जा (स्वतंत्र प्रभार), कौशल विकास एवं उद्यमिता (राज्य मंत्री)

 33. हरदीप सिंह पुरी (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

शहरी विकास और नागरिक उड्डयन मंत्रालय (स्वतंत्र प्रभार), वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय (राज्य मंत्री)

 34. मनसुख मंडाविया (राज्य मंत्री-स्वतंत्र प्रभार)

जहाजरानी (स्वतंत्र प्रभार), रसायन एवं उर्वरक (राज्य मंत्री)

 35. फग्गन सिंह कुलस्ते (राज्य मंत्री)

इस्पात राज्य मंत्री

 36. अश्विनी चौबे (राज्य मंत्री)

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री

 37. जनरल (रिटायर) वीके सिंह (राज्य मंत्री)

सड़क, परिवहन और राजमार्ग राज्य मंत्री

 38. कृष्ण पाल गुज्जर (राज्य मंत्री)

सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री

 39. दानवे रावसाहेब दादाराव (राज्य मंत्री)

उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण राज्य मंत्री

 40. जी. किशन रेड्डी (राज्य मंत्री)

गृह राज्य मंत्री

 41. पुरुषोत्तम रुपाला (राज्य मंत्री)

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री

 42. रामदास अठावले (राज्य मंत्री)

सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री

 43. साध्वी निरंजन ज्योति (राज्य मंत्री)

ग्रामीण विकास राज्य मंत्री

 44. बाबुल सुप्रियो (राज्य मंत्री)

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री

 45. संजीव कुमार बलियान (राज्य मंत्री)

पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन राज्य मंत्री

 46. धोत्रे संजय शमराव (राज्य मंत्री)

मानव संसाधन विकास, संचार और इलेक्ट्रानिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री

 47. अनुराग सिंह ठाकुर (राज्य मंत्री)

वित्त और कॉरपोरेट मामलों के राज्य मंत्री

 48. सुरेश अंगादि (राज्य मंत्री)

रेल राज्य मंत्री

 49. नित्यानंद राय (राज्य मंत्री)

गृह राज्य मंत्री

 50. वी मुरलीधरन (राज्य मंत्री)

विदेश, संसदीय कार्य राज्य मंत्री

 51. रेणुका सिंह (राज्य मंत्री)

आदिवासी मामलों की राज्य मंत्री

 52. सोम प्रकाश (राज्य मंत्री)

वाणिज्य एवं उद्योग राज्य मंत्री

 53. रामेश्वर तेली (राज्य मंत्री)

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री

 54. प्रताप चंद्र सारंगी (राज्य मंत्री)

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम और पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन राज्य मंत्री

 55. कैलाश चौधरी (राज्य मंत्री)

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री

 56. देबाश्री चौधरी (राज्य मंत्री)

महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री

57. अर्जुन राम मेघवाल (राज्य मंत्री)

संसदीय कार्य, भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम राज्य मंत्री

58. रतन लाल कटारिया (राज्य मंत्री)

जलशक्ति और सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण राज्य मंत्री

 

बिजनौर में भाकियू का धरना-प्रदर्शन, झड़प

पुलिसकर्मियों ने किसानों को रोकने का प्रयास किया लेकिन गुस्साए किसानों की भीड़ को रोका नही जा सका। किसानों ने गन्ना भुगतान, आवारा पशु, किसान नेताओं पर फर्जी मुकदमे दर्ज कर उत्पीड़न करने आदि मुद्दों को उठाया।

ताजा जानकारी के अनुसार, अपर जिलाधिकारी व पुलिस अधीक्षक शहरी किसानों के बीच पहुँचकर वार्ता कर रहे है। पंचायत जारी है।

आज सुबह पुलिसकर्मियों के द्वारा एक ट्रैक्टर के टायर की हवा निकालने से नाराज प्रदर्शनकारी किसानों ने ट्रेक्टर को डीएम ऑफिस में घुसा दिया। इसे लेकर बिजनौर पुलिस और किसानों के बीच झड़प भी हुई। बैकफुट पर आया बिजनौर प्रशासन भाकियू नेताओं से बातचीत की कोशिशों में लगा है।


मोदी की आंधी में कैसे गुम हुए किसान आंदोलन और उनके नेता

याद कीजिए, 2014 के बाद मोदी सरकार को पहली चुनौती कैसे मिली थी? भारी बहुमत और मजबूत इरादों के बावजूद भूमि अधिग्रहण विधेयक के मुद्दे पर मोदी सरकार को झुकना पड़ा था। क्योंकि पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर लामबंद हो गया था। इसके बाद भी हर साल किसानों के आंदोलन, धरने-प्रदर्शन और महापड़ाव सुर्खियों में छाए रहे। यह एकमात्र मोर्चा था जहां मोदी सरकार लगातार घिरती नजर आई। लेकिन 2019 आते-आते यह सब हवा हो गया।

विपक्ष के तमाम समीकरणों, गठबंधनों, दिग्गजों और मंसूबों को धराशायी करने वाली नरेंद्र मोदी और उनके राष्ट्रवाद की आंधी ने किसानों आंदोलनों को भी बेअसर कर दिया। इतना बेअसर कि न तो पूरे चुनाव में किसानों के मुद्दे कहीं सुनाई पड़े और न ही नतीजों पर उनका कोई असर दिखा।

उपज का उचित दाम न मिलने के खिलाफ किसान संगठनों की ‘गांव बंद’ सरीखी मुहिम लोकसभा चुनावी में बेअसर

 

जिन सूबों की राजनीति किसान और खेती के इर्द-गिर्द घूमती है, वहां भी किसान मुद्दा नहीं बन सका। यह विपक्ष की नाकामी तो है ही, मोदी का भी मैैजिक है। इसके अलावा कुछ असर किसानों के खातों में सीधे पैसे पहुंचाने की पीएम-किसान जैसी योजनाओं का भी जरूर रहा। जबकि विपक्ष और किसानों की नुमाइंदगी का दावा करने वाले नेता यह भरोसा पैदा करने में नाकाम रहे कि वे वाकई किसानों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं।

मोदी तंत्र बेहद चुस्त और चौकन्ना भी था। चुनाव से ठीक पहले किसानों के खातों में सालाना 6 हजार रुपये पहुंचाने के लिए पीएम-किसान योजना लाई गई। सरकार नेे आनन-फानन मेें सवा दो करोड़ से ज्यादा किसानों के खातों में 2,000 रुपये की पहली किस्त भी पहुंचा दी। इनमें एक करोड़ से ज्यादा किसान उत्तर प्रदेश के थे। महागठबंधन की एक काट यह भी थी, जो किसानों की नाराजगी दूर करने में मददगार साबित हुई।

अभी छह महीने भी नहीं हुए जब किसान कर्जमाफी के वादे ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की वापसी कराई थी। लेकिन तीनों राज्यों में  कांग्रेस सरकारें किसानों के मुद्दे पर अब बैकफुट पर आ चुकी हैं। आधी-अधूरी कर्जमाफी को लेकर कांग्रेस इस कदर घिरी कि कर्जमाफी का श्रेय लेना तो दूर किसानों को मुद्दा ही नहीं बना पाई। इसे यूं भी देख सकते हैं कि किसानों के जिस मुद्दे को कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में भुना लिया था, उसे कुछ महीनों बाद दोबारा भुनाना मुश्किल हो गया, क्योंकि अब सवाल उसकी राज्य सरकारों पर भी उठने लगे थे।

मध्य प्रदेश जहां मंदसौर से भड़का आंदोलन किसानों के गुस्से का प्रतीक बन गया था, वहां भी कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा है। मंदसौर लोकसभा सीट पर कांग्रेस की मीनाक्षी नटराजन भाजपा प्रत्याशी से करीब पौने चार लाख वोटों से हारी। इसी तरह खंडवा में कमलनाथ सरकार के कृषि मंत्री सचिन यादव के भाई अरुण यादव मैदान में थे, उन्हें भाजपा के नंद कुमार सिंह ने पौने तीन लाख वोटों से हराया। शहरों की बात तो छोड़ ही दीजिए, यह मध्य प्रदेश के किसान बहुल इलाकों का हाल है। विधानसभा चुनाव में 41 फीसदी वोट हासिल करने वाली कांग्रेस लोकसभा की एकमात्र छिंदवाड़ा सीट बचा सकी। जबकि वोट शेयर घटकर 34.5 फीसदी रह गया। इससे ज्यादा वोट तो कांग्रेस को 2014 में मिले थे। तब 2 सीटों पर जीती थी।

इन नतीजों के बारे में मध्य प्रदेश किसान कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष केदार सिरोही का कहना है कि यह मुद्दों का चुनाव था ही नहीं। भावनाओं का चुनाव था। किसानों का गुस्सा विधानसभा चुनाव में भाजपा पर निकल चुका था। इस बीच पुलवामा हो गया। और माहौल बदल गया। सिरोही मानते हैं कि ना तो कांग्रेस ने इस चुनाव में किसानों के मुद्दों को बहुत गंभीरता से उठाया और ना ही खुद किसानों ने इन मुद्दों को खास तवज्जो दी। कांग्रेस भी भावनात्मक मुद्दों और भाजपा के एजेंडे में उलझ गई। इसलिए मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों, फसल के दाम और किसानों के मुद्दों पर बात नहीं हुई।

कमोबेश यही स्थिति छत्तीसगढ़ में रही जहां सत्ता में आते ही कांग्रेस किसानों के सवालों पर मोदी सरकार को घेरना भूलकर अपने बचाव में जुट गई। विधानसभा चुनाव में 85 में से 68 सीटें जीतकर क्लीन स्वीप करने वाली कांग्रेस छत्तीसगढ़ की 11 में से केवल 2 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर पाई है।

पिछले पांच वर्षों में महाराष्ट्र केंद्र और राज्य की एनडीए सरकारों के खिलाफ किसान आंदोलनों का गढ़ बना रहा। लेकिन लोकसभा चुनाव में किसानों के मुद्दों की छाया भी भाजपा और शिवसेना को छू नहीं पाई। वहां कांग्रेस का लगभग सफाया हो गया और एनसीपी 4 सीटों पर ही सिमटी रही। महाराष्ट्र में किसान आंदोलनों को चेहरा रहे स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के राजू शेट्टी हातकणंगले सीट करीब 96 हजार वोटों से हार गए जबकि उन्हें कांग्रेस और एनसीपी का समर्थन हासिल था। सांगली में भी कांग्रेस-एनसीपी समर्थित स्वाभिमानी पक्ष के उम्मीदवार को डेढ़ लाख से ज्यादा वोटों से हार का सामना करना पड़ा।

महाराष्ट्र की गन्ना बेल्ट में शरद पवार-राजू शेट्टी का गठबंधन मोदी वेव के सामने बेअसर साबित हुआ। पश्चिमी महाराष्ट्र में एनसीपी और राजू शेट्टी का गढ़ रहे कोल्हापुर, हातकंणगले, सांगली और माढा लोकसभा क्षेत्रों में भाजपा और शिवसेना का परचम फैल चुका है। किसान और कॉओपरेटिव पॉलिटिक्स के दिग्गज शरद पवार के कुनबे को पहली बार हार का मुंह देखना पड़ा है। मावल लोकसभा सीट पर शरद पवार के भतीजे अजीत पवार के बेटे पार्थ पवार दो लाख से ज्यादा वोटों से हार गए। कांग्रेस ने महाराष्ट्र की 48 सीटों में से एकमात्र चंद्रपुर सीट जीती है। किसान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष नाना पटोले को नागपुर में नितिन गडकरी ने करारी शिकस्त दी। कांग्रेस के दो पूर्व सीएम अपनी सीट भी नहीं बचा पाए।

महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी और राजू शेट्टी के गठबंधन का खेल बिगाड़ने में प्रकाश अंबेडकर और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के गठजोड़ का बड़ा हाथ रहा है। लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है कि किसान राजनीति पर शरद पवार की पकड़ ढीली पड़ चुकी है।

अक्टूबर 2018 में भाकियू की किसान क्रांति यात्रा

 

महाराष्ट्र की तरह कृषि प्रधान होते हुए भी उत्तर प्रदेश की कहानी अलग है। यहां मुख्य विपक्षी दलों सपा और बसपा ने पांच साल किसानों के मुद्दों में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। दिल्ली में होने वाले किसानों के धरने-प्रदर्शन को कभी समर्थन नहीं दिया। हालांकि, गठबंधन की तीसरी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल किसान राजनीति करने का दम भरती है। लेकिन उसके धरने-प्रदर्शनों की गूंज पश्चिमी यूपी के 4-5 जिलों से बाहर नहीं निकली। सपा-बसपा-रालोद गठबंधन बस परंपरागत वोट बैंक और उसके गठजोड़ के भरोसे था, जो गच्चा दे गया।

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत संभाल रही भारतीय किसान यूनियन ने पिछले साल किसान क्रांति यात्रा ज़रूर निकाली थी। लेकिन टिकैत बंधु भी मोदी सरकार के सामने कोई चुनौती खड़ी नहीं कर पाए। 2 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली-यूपी बॉर्डर पर किसानों और पुलिस के बीच हुए संघर्ष से ज्यादा किसान यात्रा की अचानक समाप्ति का ऐलान चर्चाओं में रहा। इस तरह किसानों की खुदकुशी, गहराते कृषि संकट और किसान के बार-बार सड़कों पर उतरने के बावजूद किसान राजनीति नेतृत्व और भरोसे की कमी का शिकार हो गई। कृषक जातियों का बड़ा हिस्सा भी मोदी लहर को प्रचंड बनाने में जुटा रहा।

कैराना और नूरपुर उपचुनाव में “जिन्ना नहीं गन्ना” नारे के साथ गठबंधन की उम्मीदें जगाने वाली रालोद के दोनों बड़े नेता अजित सिंह और जयंत चौधरी सपा-बसपा और कांग्रेस के समर्थन के बावजूद चुनाव हार गए हैं। पांच साल में कोई बड़ा किसान आंदोलन खड़ा न करना और किसानों के मुद्दे पर ढुलमुल रवैया इस गठबंधन की खामियों में गिना जाएगा। तभी तो देश को चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत जैसे किसान नेता देने वाले उत्तर प्रदेश की किसान राजनीति में फिलहाल गहरा सन्नाटा है।

कमोबेश यही स्थिति हरियाणा की है जहां इंडियन नेशनल लोकदल पारिवारिक कलह में बिखर गई तो कांग्रेस किसानों के मुद्दों पर संघर्ष करने के बजाय जातिगत घेराबंद में लगी रही। इस बीच, छोटे-छोटे संगठन अपने स्तर पर किसानों के मुद्दे उठाते रहे, लेकिन चुनाव में उनका कोई असर नहीं दिखा। जबकि जाट ध्रुवीकरण और मोदी ब्रांड के सहारे भाजपा हरियाणा की सभी 10 सीटें भारी अंतर से जीतने में कामयाब रही। किसान कार्यकर्ता रमनदीप सिंह मान का कहना है कि 2019 की लोकसभा में 38% सांसद खुद को किसान बता रहे हैं, लेकिन किसान के असल मुद्दे अछूते ही रहे हैं। सत्तारूढ़ भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दलों ने भी किसानों की अनदेखी की है। किसान खुद भी अपनी परेशानियां भूलकर चुनाव के समय जात-धर्म  में बंट जाता है।

मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों के मुद्दे जोर-शोर से उठे थे। उससे पहले शेखावाटी में सीपीएम की ऑल इंडिया किसान सभा ने एक बड़ा आंदोलन किया था। लेकिन यहां भी लोकसभा चुनाव पूरी तरह मोदी और राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा। सीकर में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के किसान नेता अमरा राम महज 31 हजार वोट पा सके। उधर, भाजपा ने राजस्थान में तेजी से उभरते जाट नेता हनुमान बेनीवाल को साध लिया। इससे जाटों का साथ तो मिला ही, किसानों के मुद्दों पर मोदी सरकार को भी घिरने से बचा लिया। विधानसभा चुनाव में भी बेनीवाल ने कांग्रेस को कई सीटों पर नुकसान पहुंचाया था।

लोकसभा चुनाव से पहले एनडीए का दामन थामने वाले राजस्थान के उभरते जाट नेता हनुमान बेनीवाल

 

पंजाब में सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी अकाली दल एक-दूसरे पर कृषि संकट का ठीकरा तो फोड़ते रहे लेकिन चुनाव में इन मुद्दों का खास असर वहां भी नहीं दिखा। भाजपा सिर्फ एक सीट पर मुकाबले में थी, जहां सनी देओल के हैंडपंप और मोदी ब्रांड के अलावा किसी मुद्दे की जरूरत नहीं पड़ी।

पिछले बार पंजाब में 30 फीसदी वोट 4 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी की तरफ से सिर्फ भगवंत मान लोकसभा में पहुंचे हैं। आप का वोट बैंक घटकर 7.4 फीसदी रह गया, बाकी कांग्रेस, अकाली और भाजपा में बंट गया। हालांकि, भगवंत मान किसानों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे है, लेकिन आप भी किसानों के लिए संघर्ष करने के बजाय अपने ही झगड़ों में उलझी रही। जबकि खुद को गैर-राजनीतिक कहने वाली पंजाब की कई किसान यूनियनें नोटा के फेर में पड़ गईं। पंजाब में डेढ़ लाख से ज्यादा करीब 1.12 फीसदी वोट नोटा को गया। यानी विकल्प की कमी साफ नजर आई।

मोदी की आंधी में देवगौड़ा जैसे दिग्गज भी धराशायी

 

उत्तर भारत ही नहीं दक्षिण भारत में भी मोदी वेव के सामने किसान राजनीति कहीं टिक नहीं पाई। कर्नाटक में पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस अध्यक्ष एचडी देवेगौड़ा को तुमकुर सीट पर और मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के पुत्र निखिल को मांड्या सीट पर करारी शिकस्त मिली है। देवगौड़ा की छवि जमीन से जुड़े किसान नेता की रही है। लेकिन इस बार उनकी पार्टी सिर्फ एक सीट पर जीती। कर्नाटक में कांग्रेेेस भी 9 सेे घटकर 1 सीट पर आ गई है।

लोकसभा चुनावों में बेअसर किसान आंदोलनों और जमीनी मुद्दों के सन्नाटे पर कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि मतदाताओं पर हिंदुत्ववादी भावनाएं हावी रही। किसानों के नाम पर राजनीति करने वाले पार्टियां भी कोई बड़ा आंदोलन खड़ा करने में नाकाम रही। हालांकि, इस बीच किसानों की समस्याओं को लेकर जागरुकता बढ़ी है और डायरेक्ट इनकम सपोर्ट का मुद्दा सरकारों और राजनीतिक दलों के एजेंडे में आ चुका है। इसे वे अच्छा संकेत मानते हैं।

किसान संगठनों को लामबंद करने के लिए 2017 में निकली किसान मुक्ति यात्रा

 

पिछले दो साल के दौरान स्वराज इंडिया पार्टी के नेता योगेंद्र यादव और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक सरदार वीएम सिंह ने किसान संगठनों को लामबंद करने के काफी प्रयास किये। लेकिन ये कोशिशें चुनाव में असर दिखाने लायक ताकत हासिल नहीं कर पाई। चुनाव आते-आते योगेंंद्र यादव और वीएम सिंह नोटा का राग अलापने लगे। इस तरह राष्ट्रीय तो क्या क्षेत्रीय स्तर पर भी किसानों का कोई प्रभावी मोर्चा नहीं बन पाया।

कांग्रेस ने किसानों के लिए अलग बजट जैसे वादे ज़रूर किये, लेकिन पुलवामा के बाद किसानों के मुद्दों से भटक गई। राहुल गांधी किसानों के सवाल उठाते रहे, लेकिन उनकी अपनी कमियां और कमजोरियां हैं। आज की तारीख में कांग्रेस के पास कोई बड़ा किसान नेता नहीं है। ऐसी कोई कोशिश भी नहीं है। इसलिए लेफ्ट और किसान संगठनों के आंदोलनों से मोदी सरकार को मिली चुनौती लोकसभा चुनाव तक बिखर चुकी थी।

वैसे, भाजपा ने यह चुनाव जिस धनबल, सत्ता तंत्र, दुष्प्रचार और मजबूत संगठन के बूते लड़ा है, उसे भी नहीं भूलना चाहिए। विपक्ष की आवाज और असल मुद्दों को ना उठने देने में मीडिया के बड़े हिस्से ने पूरा जोर लगा दिया था। बाकी कसर निष्प्रभावी और बिखरे हुए विपक्ष ने पूरी कर दी।

बहरहाल, जमीनी मुद्दों पर सन्नाटे के बीच इन चुनावों में एक अनूठा उदाहरण भी सामने आया है। तेलंगाना की निजामाबाद सीट से मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की बेटी कविता के खिलाफ 179 निर्दलीय उम्मीदवारों ने मोर्चा खोल दिया था, इनमें से ज्यादातर सरकार से नाराज हल्दी उगाने वाले किसान थे। इन निर्दलीय उम्मीदवारों को कुल मिलाकर एक लाख से ज्यादा वोट मिले और कविता 70 हजार वोटों से चुनाव हार गईं। मुद्दों पर चुप्पी के बीच विरोध जताने का एक नायाब तरीका यह भी है।

 

 

बाबा टिकैत: किसानों को सत्ता से भिड़ने की ताकत देने वाला नेता

2 अक्‍टूबर 2018 को जब देश गांधी जयंती मना रहा था तो दिल्‍ली पुलिस किसानों पर लाठियां बरसा रही थी। लाठियां बरसाने वाले जवान भी ज्यादातर किसानों के ही बेटे थे। इस तरह जवान और किसान आमने-सामने थे। राजधानी से अपने मन की बात कहने चले किसानों को सरकार ने यूपी बॉर्डर पर ही रोक दिया तो टकराव होना ही था। लेकिन इस टकराव के बीच उभरी इस तस्वीर को कौन भूल सकता है? एक बुजुर्ग किसान पुलिसवालों से भिड़ गया! इस तस्वीर के पीछे जिस आदमी का दिया हौसला है उस बाबा टिकैत की आज 8वीं पुण्यतिथि है।

2 अक्टूबर, 2018 को दिल्ली में प्रवेश करते किसानों के साथ पुलिस का टकराव

यह तस्वीर हाल के दशकों में किसानों की सबसे सशक्त आवाज चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत मानी जा सकती है। किसानों में जो हौसला टिकैत भर गए थे, वह आज भी कहीं ना कहीं दिख जाता है। अगर चौधरी चरण सिंह के रूप में एक किसान प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा तो महेंद्र सिंह टिकैत ने सरकारों को किसान के आगे झुकना सिखाया।

खुद को गरीब मां का बेटा कहकर लंबी-लंबी फेंकने वाले आज के नेताओं से उलट चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत का देसी अंदाज, सादा जीवन, जमीनी पकड़ और अक्खड़ मिजाज ही था जो हुकूमत को हिलाने की कुव्वत रखता था। इस आवाज ने कितनी ही बार किसानों के बिजली बिल माफ करवाए, मुआवजे और उचित दाम की मांगें पूरी करवाई। कई बार कुछ नहीं भी करवा पाए तो एक हिम्मत दिलाई कि सरकार को झुकाया जा सकता है। कोई तो है जो किसानों के साथ खड़ा है।

80 के दशक में जब चौधरी चरण सिंह और देवीलाल जैसे किसान नेताओं की सक्रियता के दिन बीत रहे थे और हरित क्रांति के सुनहरे दावे बोझ बनने लगे, तब टिकैत आते हैं। जब फसल की लागत और कीमत का अंतर घटने लगा और किसान नेतृत्व का खालीपन बढ़ रहा था, तब टिकैत खड़े हुए।

17 अक्टूबर, 1986 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले (अब शामली) के सिसौली गांव में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बनी भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) देश भर के किसानों की आवाज बन गई। भाकियू का यूपी, हरियाणा और पंजाब के अलावा राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी काफी असर था।

अस्सी के दशक में तब देश और प्रदेशों में कांग्रेस की सरकारें थीं। सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार, बिजली के दाम में बढ़ोतरी और फसलों के दाम को लेकर किसान खासे परेशान थे। इस दौरान जनवरी, 1987 में शामली के करमूखेडी बिजली घर पर किसानों का एक धरना-प्रदर्शन शुरू हुआ जिसकी अगुवाई महेंद्र सिंह टिकैत कर रहे थे। किसान ट्यूब वैल की बिजली दरें बढ़ाए जाने से परेशान थे। इस आंदोलन से निपटने हेतु पुलिस ने किसानों पर गोलियां चला दी जिसमें लिसाढ़ गांव के किसान जयपाल सिंह व सिंभालका के अकबर अली की मौत हो गई। इस टकराव में पीएसी का एक जवान भी मारा गया। इस घटना ने एक बड़े किसान आंदोलन को जन्म दिया।

आखिरकार, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह ने टिकैत की ताकत को पहचाना और खुद सिसौली गांव जाकर किसानों को राहत का ऐलान किया। टिकैत ने घर आए मुख्यमंत्री को भी मिट्टी के करवे से पानी पिलाकर किसानों का दिल जीत लिया। यह ठेट अंदाज उनकी पहचान बन गया। वे खुद भी ऐसे ही थे। एकदम साधारण किसान।

अगले साल यानी 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बड़ी तादाद में किसान मेरठ कमिश्नरी का घेराव करने पहुंचे। मुद्दे तब भी वही थे। फसल का दाम, बिजली की महंगी दरें, महंगा खाद-पानी आदि। तब देश में कांग्रेस विरोधी लहर और जनता दल की अगुवाई में विपक्षी दलों के लामबंद होने के दिन थे। भाकियू के कमिश्नरी घेराव को समर्थन देने के लिए राजनीतिक दलों में होड़ मच गई। लेकिन टिकैत ने अपने संगठन और आंदोलन को अराजनीतिक कहलाना पसंद किया। हालांकि, मोदी के गैर-राजनीतिक इंटरव्यू की तरह इस पर भी मतभेद हैं कि ऐसे किसान आंदोलन या संगठन कितने अराजनैतिक हो सकते हैं। मुख्यधारा की राजनीति के साथ संबंधों को लेकर ऊहापोह की यह स्थिति आज तक भाकियू और इससे टूटे धड़ों का पीछा नहीं छोड़ रही है।

शुरुआत से ही टिकैत और भारतीय किसान यूनियन पर जाट समुदाय और खाप का दबदबा था। लेकिन टिकैत को सभी धर्म-जात-खाप के लोगों को साथ लेकर चलने का श्रेय मिलना चाहिए। उनके सबसे पहले आंदोलन में जान देने वाले दो किसानों में से एक मुस्लिम था। जाट, गुर्जर और मुस्लिम और अन्य जातियों के किसान उनकी रैलियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। किसान के तौर पर अपनी पहचान को गले लगाते थे।

1988 में टिकैत ने मेरठ कमिश्नरी का ऐतिहासिक घेराव किया तो मंदिर आंदोलन और सांप्रदायिक राजनीतिक का जोर था। मेरठ दंगों की आग मेंं झुलस रहा था। लेकिन बाबा टिकैत के भाईचारे के नारों ने उस माहौल को बदल दिया। जात-धर्म भूलकर लोग खुद को किसान मानने लगे। हालांकि, नफरत की राजनीति के सामने यह दौर ज्यादा दिनों तक नहीं टिका। फिर भी भाईचारे की एक आवाज टिकैत की शक्ल में पश्चिमी यूपी में मौजूद थी जिसकी कमी आज खल रही है।

1989 में मुजफ्फरनगर के भोपा कस्बे में एक मुस्लिम युवती का अपहरण और हत्याकांड हुआ तो भाकियू ने इंसाफ के लिए नहर किनारे हफ्तों तक आंदोलन किया। उस आंदोलन की धुंधली-सी याद अब भी मेरे जेहन में है। नहर के दोनों किनारे पर दूर तक ट्रैक्टरों और किसानों का हुजूम था। पुलिस ने ट्रैक्टर नहर में धकेल दिए मगर किसान पीछे नहीं हटे। आखिर में एनडी तिवारी की सरकार को झुकना पड़ा और किसानों की मांगे मानने के अलावा ट्रैक्टर भी वापस दिलाने पड़े।

इस घटना ने हिंदू-मुस्लिम भाईचारे को तो मजबूत किया ही, भाकियू को उत्तर भारत के गांव-गांव में पहुंचा दिया। हरी टोपी किसान चेतना का प्रतीक बन गई। देश में एक नए किसान नेता का उभार राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां बनने लगा।

मेरठ कमिशनरी घेराव की कामयाबी के बाद महेंद्र सिंह टिकैत ने दिल्ली में किसान पंचायत का ऐलान किया। 25 अक्टूबर 1988 को लाखों की तादाद में किसान नई दिल्‍ली के बोट क्लब पर आ डटे। पिछले तीस-चालीस साल में वह संभवत: सबसे बड़ी किसान रैली थी। दिल्ली पर किसानों का कब्जा-सा हो गया था। मजबूरी में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को इन्दिरा गांधी की पुण्यतिथि का कार्यक्रम लाल किले के पीछे शिफ्ट करना पड़ा। टिकैत का यह अड़ियल रवैया किसानों को आत्मविश्वास से भर देता था। उन्हें अपनी ताकत का अहसास कराता था।

राजीव गांधी को इसलिए भी झुकना पड़ा क्योंकि टिकैत के साथ-साथ देश भर के तमाम किसान संगठन भी एकजुट होने लगे थे। तब कर्नाटक में नंजुंदास्वामी, आन्ध्र प्रदेश पी. शंकर रेड्डी, पंजाब के भूपेन्द्र सिंह मान और अजमेर सिंह लाखोवाल, महाराष्ट्र में नेता शरद जोशी, हरियाणा में घासीराम नैन, प्रेम सिंह दहिया किसानों की आवाज को पुरजोर तरीके से उठा रहे थे। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर किसान संगठनों के समन्वय की कोशिशें बहुत कामयाब नहीं रही। लेकिन टिकैत के साथ इन सभी किसान नेताओं ने सरकारों पर दबाव बनाए रखा।

आज चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर कुछ बातें खासतौर गौर करने लायक हैं। जिस उत्तर प्रदेश में नेताओं की भरमार थी और एक के बाद एक प्रधानमंत्री सूबे से निकले रहे थे, वहां टिकैत ने आम किसान को ताकत दी। हर किसान खुद को टिकैत मानने लगा। हरी टोपी किसान स्वाभिमान का प्रतीक बन गई। यह लोगों को “मैं भी अन्ना” लिखी टोपियां पहनाए जाने से काफी पहले की बात है। इन हरी टोपियों का असर आज तक कायम है।

हालांकि, टिकैत के आखिरी दिनों में जैसे-जैसे सांप्रदायिक राजनीति देश पर हावी होती गई, किसान आंदोलनों का असर भी घटने लगा था। किसान आंदोलन के बिखराव की कई दूसरी वजह भी हैं। लेकिन किसानों के हक की लड़ाई लड़ने और उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर संघर्ष करने का जज्बा टिकैत में आखिरी सांस तक रहा। यह उनके आंदोलनों की ताकत ही थी कि पश्चिमी यूपी के सिसौली जैसे गांव को किसान राजनीति का केंद्र बना दिया। उनके हुक्के की गुडगुडाहट सरकार के पसीने छुड़ा देती थी। फसल के दाम, खाद-बिजली-पानी और जमीन के मुआवजे जैसे मुद्दों को लेकर वे जीवन भर किसानों के साथ डटे रहे।

सन 2010 में अलीगढ़ के टप्पल में किसानों के भूमि अधिग्रहण का आंदोलन उनकी आखिरी लड़ाई थी। 76 साल की उम्र में भी बाबा टिकैत किसानों की ताकत बने रहे। कभी अपनी जमीन नहीं छोड़ी!

मजाक और मजबूरियों के बीच गायब मुद्दे

एक पुरानी लोक कथा है जिसमें एक तपस्वी की कड़ी तपस्या के बाद भगवान उसकी प्रार्थना से खुश होकर उसके समक्ष प्रकट हुए। भगवान ने वरदान देने से पहले एक शर्त रखी। शर्त यह थी कि भगवान तपस्वी को जो भी देंगे, उसके घनिष्ट दोस्त को उसका दुगना मिलेगा। तपस्वी ने कुछ देर सोचने के बाद भगवान से अपनी एक आंख को निकाल लेने को कहा। उसका दोस्त पूरी तरह से अंधा हो गया।

आज के भारत में यह कोई लोक कथा नहीं रही। यह वर्तमान शासन प्रणाली का एक तरीका बन चुका है जहां किसी ‘अन्य’ के दुःख और असहायता से हम अपने सुख और सम्पन्नता को तोलने लगे हैं। जहां दूसरों की विफलता, हमारी सफलता का पैमाना हो गई है। उदाहरण के तौर पर, कुछ लोग गौरक्षा के नाम पर मुस्लिमों पर हमले करने, उनकी हत्या तक कर देने को भी जायज ठहराने लगते हैं। यह विकृत सोच हिंदुस्तान के संविधान और सभ्यता के विपरीत है। एक तरफ लीक हुए सरकारी आंकड़ों से संकेत मिलता है कि बेरोजगारी पिछले 45 साल में सबसे ऊंचाई पर है, वहां दूसरी तरफ प्रज्ञा ठाकुर जैसे आतंक के आरोपियों को लोकसभा का टिकट दिया जाता है। मकसद साफ है, हिंदुत्व के परदे से जनता के असल मुद्दों को ढक दो। देखते ही देखते ‘सबका साथ’ काल्पनिक बन गया और ‘सबका विकास’ केवल नारा और मजाक बनकर रह गया।

इस दौर का सबसे घिनौना मजाक नोटबंदी था। सूचना के अधिकार कानून द्वारा पता चला है कि आरबीआई ने नोटबंदी करने से मना किया था। लेकिन आरबीआई की इस सलाह को नकारते हुए नोटबंदी का ऐलान किया गया। नोटबंदी का 99% से ज्यादा पैसा आरबीआई को वापस मिल गया। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की स्टेट ऑफ वर्किंग इन इंडिया रिपोर्ट 2019 (एसडब्ल्यूआई) एक गंभीर स्थिति को दर्शाती है – (1) नोटबंदी के बाद कम से कम 55 लाख पुरुषों का रोजगार छिन गया (2) 20-24 वर्ष की आयु के लगभग हर 5 में से 3 पुरुष बेरोजगार हैं। केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया आकड़ों को दबाने या फिर ईपीएफओ और मुद्रा जैसे अधूरे डेटा को दिखाकर लोगों को बहकाने की रही।

नोटबंदी के बाद गरीबों को यह भरोसा दिलाया गया कि इससे जो काला धन मिलेगा, उससे उनके जनधन खातों में 15 लाख रुपये जमा होंगे। लेकिन ना काला धन मिला और न ही किसी के जनधन खाते में कोई पैसा आया। जो सरकार काला धन लाने की बात करती थी उसकी निगाहों के सामने 36 बड़े व्यापारी हाल के दिनों में बैंकों का पैसा लेकर देश छोड़कर भाग गए हैं।

अब मजाक का कारवां निकल चुका था। कहा गया कि आधार कार्ड का मकसद उन्हें पहचान देना है जिनके पास और कोई पहचान पत्र नहीं है। परंतु जितने लोगों ने आधार बनवाया उनमें से 99.97% ने कोई मौजूदा पहचान पत्र जैसे – राशन कार्ड या वोटर कार्ड का उपयोग किया। यानी उनके पास कोई न कोई पहचान पत्र पहले से था। तो फिर उन्हें आधार की क्या जरूरत थी? फिर कहा गया कि आधार का उपयोग सही लाभार्थी तक सरकारी योजनाओं के लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। परंतु सच तो यह है कि आधार गलत तरीके से जुड़ने के कारण कई लोगों को छात्रवृत्ति, गैस सब्सिडी, आवास योजना का पैसा इत्यादि पाने में अत्यंत परेशानी हुई है। बायोमेट्रिक पहचान की प्रक्रिया में विफलताओं के कारण राशन और पेंशन से वंचित कम से कम 75 लोगों की भूख से मौत हो चुकी है। हैदराबाद के इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस ने झारखंड के पिछले 4 सालों के एक करोड़ मनरेगा मजदूरी भुगतानों का अध्ययन किया तो पता चला कि जो मजदूरी भुगतान आधार से जुड़े थे, उनमें से 38% किसी अन्य मजदूर के खाते में जमा हुए।

मनरेगा के तहत हर साल करीब 7.5 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है। पिछले पांच साल में हर साल वित्त मंत्री ऐलान करते आये हैं कि इस साल मनरेगा का आवंटन सर्वाधिक है। मगर महंगाई को समायोजित करते हुए देखा जाए तो पिछले पांच साल में हर साल का आवंटन 2010-11 के आवंटन से भी कम था। जबकि हर साल करीब 20 फीसदी आवंटन पिछले सालों का लंबित भुगतान है। केंद्र सरकार का दावा है कि 90 फीसदी भुगतान 15 दिन में हुए हैं लेकिन वास्तव में केवल 21 फीसदी भुगतान 15 दिनों में हुए हैं। यह लंबित भुगतान सुप्रीम कोर्ट के आदेश का उल्लंघन है। बेरोजगारी की समस्या को हल करने में मनरेगा के शक्तिकरण के साथ शहरी रोजगार कानून की जरूरत है। एसडब्ल्यूआई की रिपोर्ट में भी इसकी सिफारिश की गई है।

मोदी सरकार के पांच साल के कामकाज और दावों में अंतर की लंबी फेहरिस्त है। मिसाल के तौर पर, वर्ष 2019-20 में आयुष्मान भारत के तहत 10 करोड़ परिवारों के लिए 6 हजार करोड़ रुपये के आवंटन का दावा किया गया। परंतु हिसाब लगाईये तो पता चलेगा कि इस पैसे में देश के सिर्फ 1.20 लाख परिवार ही 5 लाख की बीमा का फायदा उठा पाएंगे। यह मजाक नही तो क्या है?

खुले में शौच से मुक्ति पर भी इस सरकार का खूब जोर रहा है। इसी के चलते कई जिलों को खुले में शौच मुक्त घोषित कर दिया गया। लेकिन अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में शोध कर रहे आशीष गुप्ता की टीम के अध्ययन से पता चला कि गांवों को खुले में शौच से मुक्त (ODF) होने के दावे पूरी तरह झूठे हैं। जबकि खुले में शौच रोकने के लिए सरकार जोर-जबरदस्ती की रणनीति अपना रही है। इसके लिए ‘निगरानी समितियां’ बनाई गई हैं जो शौच करते लोगों से लोटा छीनकर, उनकी तस्वीरें लेकर सार्वजनिक रूप से पोस्टर बनवाकर गांव में चिपकाती हैं। कहीं शौचालय बनने तक राशन रोक दिया गया तो कहीं ड्रोन का इस्तेमाल कर खुले में शौच करने वालों के वीडियो बनाए गए। क्या यह एक सभ्य समाज की निशानी है?

बीते पांच साल गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी और मॉब लिचिंग की वजह से भी भुलाए नहीं जा सकेंगे। झारखंड के गुमला जिले में 11 अप्रैल, 2019 को कुछ लोगों ने आदिवासी समुदाय के चार व्यक्तियों को गोहत्या के शक में बेरहमी से मारा-पीटा था जिनमें से एक प्रकाश लकड़ा की मौत हो गई। हैरानी की बात है कि जिन गरीब आदिवासियों की पिटाई हुई उन्हीं के ऊपर झारखण्ड गोवंशीय पशु हत्या प्रतिषेध अधिनियम, 2005 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया, जबकि अपराधी फरार हैं। इसी तरह राजस्थान में अलवर के रहने वाले उमर खान भी 2017 में मॉब लिंचिंग के शिकार हुए थे। यहां भी पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के बजाय उमर के बेटे मकसूद को गोतस्करी के आरोप में जेल में डाल दिया गया।

कश्मीर के बडगाम जिले में मेजर नितिन गोगोई द्वारा सेना की जीप के बोनट से बंधे फारुख अहमद दार की छवि हमारी मानवता के पतन का स्थायी गवाह बनी रहेगी। दार तब से अत्यधिक न्यूनता और अनिद्रा से पीड़ित हैं। समाज को नफरत, विकृति, और हिंसा की आग में धकेला जा रहा है। सरकार कहती है सेना को खुली छूट दी है, परन्तु सच यह है कि देश में दहशत फैलाने वालों को खुली छूट मिल रही है। जबकि भारत को एक शांतिप्रिय, समावेशी, न्यायसंगत, पारदर्शी और जवाबदेह सरकार की जरुरत है।

राजेंद्रन (@rajendran_naray) अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरु और शयानदेब (@sayandeb) अम्बेडकर यूनिवर्सिटी, दिल्ली में पढ़ाते हैं।)

झारखंड के अनूठे वाद्य यंत्र और सांस्कृतिक उपेक्षा की टीस

झारखंड के बारे में एक कहावत प्रचलित है कि यहां चलना नृत्य है और बोलना ही गीत है। यहां हजारों सालों से अखड़ा की एक समृद्ध परंपरा रही है। अखड़ा गांव में वह स्थान होता है जहां रात्रि पहर में उम्र की सीमाओं के बंधन को छोड़कर निश्चछल, सरल, अबोध ग्रामीण मांदर की थाप और लोकगीतों की तान पर समूह में नृत्य करते हैं। इसकी अपनी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि रही है जो आदिवासी समुदाय को अपनी परंपरा एवं संस्कृति के और करीब लाती है। लेकिन इस संगीतमय प्रदेश की अपनी त्रासदी भी  है जो सत्ता के दावों से इतर कला-संस्कृति के प्रति सही दृष्टिकोण की कमी या आदिवासी संस्कृति के प्रति समझ का अभाव अथवा उसकी उपेक्षा से उपजी है।

आलम यह है कि आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के नाम पर उनकी परंपरा, संस्कृति और प्रकृति से दूर किया जाने का प्रयास होता रहा है। यह किसी एक राज्य की समस्या अथवा उनके लिए चुनौती नहीं है। कमोवेश यह जनजातीय बहुल सूबों की त्रासदगाथा का अंतहीन सिलसिल बन चुका है। इस विडंबनाबोध से मुक्ति की राह आसान नहीं है।

बहरहाल, झारखंड के लोक गीत-संगीत की बात परंपरागत वाद्ययंत्रों के बिना अधूरी है। इन वाद्य यंत्रों को निम्न श्रेणी में विभाजित किया जा सकता है।

तत्वाद्य 2- सुषिर वाद्य 3- अवनद्ध 4- घनवाद्य

तत्वाद्य इस श्रेणी के तहत केंदरी, एकतारा, सारंगी, टूईला, भुआंग और आनन्द लहरी आदि वाद्य यंत्र आते हैं। इनमें एकतारा, टुईला, केंदरी और तरंगी स्वर वाद्य हैं, जो कंठ संगीत के साथ बजाये जाते हैं। कभी-कभी इनका प्रयोग बिना कंठ संगीत के सिर्फ धुनों के तौर पर भी की जाता है। एकतारा का प्रयोग ताल और स्वर आधार दोनों के लिए किया जाता है। भुआंग और आनंद लहरी ताल के लिए प्रयोग किये जाते हैं।

केंदरी वाद्ययंत्र की शैली वायलिन वादन से मिलती जुलती है। इसे वायलिन का झारखंडी स्वरुप भी माना जाता है। संथाल जनजाति में केंदरी का प्रयोग आमतौर पर किया जाता है। इसका तुंबा कछुआ के मजबूत खोल या नारियल के खोल से बनाया जाता है जिसमें गोही का चमड़ा मढ़ा जाता है। तुंबा से बांस या लकड़ी का दंड जुड़ा रहता है और उसके ऊपर तीन तार बंधे रहते हैं और इसके गज में घोड़े की पूंछ के बाल लगाये जाते हैं।

एकतारा बहुधा फकीर, भिक्षुक, योगी या साधुओं के द्वारा प्रयोग में लाया जाता है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है इसमें एक ही तार का प्रयोग होता है। एकतारा को गुपिजंतर भी कहा जाता है। इसके नीचे का हिस्सा लौकी या ककड़ी लकड़ी से बना होता है, जो खोखला होता है और इसके मुंह पर चमड़ा मढ़ा होता है। दोनों तरफ से तीन फुट लंबे बांस की खमचिया जुड़ी रहती हैं। एक लकड़ी की खूंटी बांस के ऊपरी हिस्से में होती है और नीचे से ऊपर की ओर खूंटी तक एक तार बंधा होता है। इसे बजाने के लिए दाहिनी तर्जनी में तांबा या पीतल से टोपीनुमा त्रिकोण पहना जाता है। इसी त्रिकोण से तार को बजाया जाता है।

टूईला का प्रयोग झूमर, टूसु, करम, बान्धना आदि गीतों के लिए किया जाता है। यह एक स्वर प्रधान और कठिन शैली का वाद्य यंत्र है। टूईला में स्वर स्थानों को नाखूनों के सहारे से निकालना पड़ता है जो मुश्किल काम होता है लेकिन इसमें पारंगत कलाकार इसे बखूबी बजाते है।

भूआंग तत्वाद्य श्रेणी का यह वाद्ययंत्र सामान्यतया दशहरा के समय दासाई नृत्य में प्रयोग में लाया जाता है। तार वाद्य होते हुए भी वादन प्रक्रिया के कारण इसमें एक से अधिक स्वर निकालने की गुंजाइश नहीं रहती है। इसमें दो भाग होते है धनुष और तुंबा। धनुष की लकड़ी वाले हिस्से के ठीक बीच में कद्दू से बना लगभग 2 फीट लंबा तुंबा नीचे की ओर लटका रहता है। नीचे की तरफ तुंबा का मुंह खुला रहता है जो रस्सी के सहारे कंधे से लटका लिया जाता है। यह संथालियों का प्रिय वाद्य यंत्र है।

सुषिर वाद्य शहनाई, बांसुरी, मदनभेरी, शंख और सिंगा, सुषिर वाद्य की श्रेणी में आते हैं। इनका प्राण फूंक है। सानाई और बांसुरी मुख्यत: स्वर वाद्य हैं। खास अवसरों इनकी धुनें काफी लोकप्रिय हैं।

सानाई का आकार बांसुरी की भांति होता है। सामान्य बोल-चाल की भाषा में इस वाद्ययंत्र को शहनाई भी कहा जाता है। पर्व -त्यौहार, पूजा-पाठ और विवाह जैसे शुभ अवसर पर सानाई की मंगलध्वनि पूरे वातावरण को मंत्रमुग्ध कर देती है। मंगल वाद्य सानाई, नटुआ, छऊ, पाईका, नचनी आदि नृत्य के साथ बजाई जाती है। इसकी लम्बाई लगभग 10 इंच की होती है। इसके तीन हिस्से क्रमश: माउथपीस, लकड़ी की नली और कांसा धातु से बना गोलाकार मुंह होता है। माउथपीस में ताड़ के पत्ते की पेपती रहती है। लकड़ी की नली में छ: छेद होते हैं। पेंपती और माउथपीस में फूंक भरी जाती है और छिद्रों पर अंगुली का संचालन करके स्वर को निकाला जाता है। कांसा धातु से बने मुंह के कारण इसकी आवाज काफी तेज होती है।

मदन भेरी शहनाई, बांसुरी और ढोल आदि के साथ इसे एक सहायक वाद्य के रूप में बजाया जाता है। शिकार के समय और पशुओं को खदेड़ने के लिए भी मदन भेरी का प्रयोग किया जाता है। नृत्य के साथ विवाह के समय भी इस यंत्र का को बजाया जाता है। मदन भेरी 4 फुट लंबा और सीधा वाद्य यंत्र है।

शंख एक शुभ वाद्य यंत्र है। विवाह पूजा आदि मंगल अवसरों के समय शंख का प्रयोग किया जाता है। पहले किसी संकेत का ऐलान करने या संदेश भेजने के लिए शंख की ध्वनि की जाती थी। यह सामुद्रिक जीव का सफेद खोल होता है जिसे फूंक मारकर बजाया जाता है।

सिंगा भैंस के सींग से बने होने के कारण इसका नाम सिंगा पड़ा। इसके नुकीले छोर की तरफ से फूंक मारा जाता है। चौड़ा वाला हिस्सा आगे की तरफ मुड़ा होता है। देर तक स्वर को टिकाए रखने के लिए इसमें दमदार फूक भरी जाती है। कभी रुक-रुक कर भी स्वर आता है। पर्व त्यौहार और शिकार के समय तथा पशुओं को खदेड़ने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

वाद्य यंत्रों के हिसाब से मुंडा और उरांव समाज में नगाड़ा बहुत लोकप्रिय है तो संथालों में तमक को बजाता हुआ देखा जा सकता है। वहीं मांदर को लगभग हर पारंपरिक उत्सव और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल किया जाता है। बांसुरी का भी इन वाद्य यंत्रों में एक महत्वपुर्ण स्थान है। अर्से से बांसुरी को ज्यादातर बैकग्राउंड म्यूजिक के रूप में लोकगीतों में प्रयोग किया जाता रहा है।

जब मिटता भाषाई सरहदों का भेद 

पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित लोक गायक मुकुंद नायक बताते हैं कि दिनभर गांव के खेत-खलिहान में काम करने के बाद लोग शाम को अखरा में बैठते थे और अपना सुख-दुख बतियाते थे। भावी योजनाओं की रूपरेखा भी बनाते थे। यह सब मौखिक परंपरा के जरिये होता आया है। अखड़ा में ज्ञान का संचार कहानियों और गीतों के माध्यम से होता था। लोक गायकों की स्वर साधना तथा गायन पद्धति हुआ करती थी। वह चाहे कुड़ूख हो, मुण्डारी, खोरठा या पंच परगनिया कोई भी भाषा क्यों न रही हो। अखड़ा में गायकों का साथ ढोल, नगाड़ा व अन्य वाद्ययंत्रों के माध्यम से वाद्यय कलाकार देते थे। वे बताते हैं कि नागपुरी भाषा यहां के नागवंशी राजाओं के काल में एक हजार नौ सौ पचास साल तक राजभाषा रही है। अखड़ा की एक खूबसूरती यह भी थी कि अलग-अलग भाषाओं में गायन तथा कथा कहने वालों का यहां सामूहिक जुटान होता था। इसमें भाषाई सरहदों का कोई सवाल नहीं होता था न ही किसी किस्म का अन्य विभेद देखने को मिलता है।

सांस्कृतिक चेतना का क्षरण

प्रसिद्ध गायक-गीतकार मधु मंसूरी के गीत झारखंड आंदोलन में जान फूंकते थे। आज वो सरकारी तंत्र में सांस्कृतिक चेतना के अभाव को लेकर चिंतित हैं। फोटो साभार: यूट्यूब

 

लोक गायक मधु मंसूरी बताते हैं कि मुुरली, टोहिला, ठेचका, केंद्रा, सारंगी, झाल-मंजीरा, शहनाई (शास्त्रीय वाद्यय नहीं) लुप्तप्राय वाद्ययंत्रों की श्रेणी में शुमार किये जाने वाले वाद्यय यंत्र हैं। यहां के नेताओं के अंदर राम दयाल मुंडा और विश्वेश्वर प्रसाद केसरी की तरह वैसी सांस्कृतिक चेतना नहीं है और न ही उनमें परंपरा को लेकर गंभीरता का भाव है।दिवंगत मुण्डा और स्व. केसरी राजनीतिक आंदोलनकारी होने के साथ साथ सांस्कृतिक चेतना संपन्न शख्सियत के मालिक थे।

लोक प्रस्तुति में वैभव के प्रवेश पर मधु मंसूरी कहते हैं कि 1960 ई. से पूर्व तक नचनी का अखड़ा था, लेकिन आज के जैसा शिष्ट मंच नहीं था। अतीत को याद करते हुए वे कहते हैं, “1960 में अपने खर्च से मैंने मुड़मा जतरा और जगरन्नाथपुर रथयात्रा में शिष्ट सांस्कृतिक मंच को स्थापित किया। अन्य प्रांतों में संस्कृतिकर्मियों को जैसी तरजीह दी जाती है उसका यहां अभाव है।” वे सवालिया लहजे में बताते हैं, “संपूर्ण भारत में संस्कृतिकर्मियों को  राजनीतिक दल टिकट देते हैं, लेकिन यहां कोई राजनीतिक दल नहीं देते? अपरवाद स्वरूप अब तक सत्तर साल के इतिहास में सिर्फ दो व्यक्तियों को प्रमुख राजनीतिक दलों से टिकट मिला। एकीकृत बिहार में शिक्षामंत्री रहे करमचंद भगत और दूसरे राम दयाल मुण्डा को।”

सरकारी रवैया निराशाजनक 

दरअसल कला-संस्कृति की बदहाली के पीछे गैर-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के अधिकारियों की संस्कृति विभाग में मौजूदगी का होना भी है। पिछले दौर को याद करते हुए मधु मंसूरी याद दिलाते हैं कि कैसे झारखंड के कला-संस्कृति विभाग में एक ऐसे महानुभाव को सांस्कृतिक संयोजक नियुक्त कर दिया गया था जिन्हें झारखंड की एक भी स्थानीय भाषा मसलन मुण्डारी, खड़िया, हो, पंचपरगनिया व अन्य बोलियों का कोई ज्ञान नहीं था। वे न गाते है, न बजाते हैं और न ही नाचते हैं।

मधु मंसूरी आगे कहते हैं कि साल 1962 से लेकर 1980 तक के करीब दो दशक के लंबे कालखंड में जब रामदयाल मुण्डा अमेरिका प्रवास पर थे तब इस इलाके में सांस्कृतिक कर्म की जमीन को पुख्ता करने में उनके जैसे नौजवानों की भूमिका थी। बहरहाल, कुछ पुरस्कार प्राप्त लोक कालाकारों को अखड़ा की चिंता पुरस्कार मिलने के बाद आयी! उसके पहले अखड़ा का उनके सांस्कृतिक जीवन में कोई मोल नहीं था! यह कला के विद्रूप होते जाने की स्थितियों से हमें रूबरू कराता है।

 

गायब मुद्दे: अपने एजेंडे पर भी वोट नहीं मांग पाया विपक्ष

चुनाव का  पांचवा चरण खत्म हो गया, विद्वान मित्र चिंतित हैं कि देश की अगले 5 वर्ष में क्या दिशा-दशा होगी? चुनाव लड़ रही पार्टियां (किसी एक गठबंधन को तो आना ही है), अगर सत्ता में आई तो उनका किसानों के लिए क्या एजेंडा होगा? वो शिक्षा के क्षेत्र में क्या पहल करेंगी? स्वास्थ्य, रोजगार, पर्यावरण, पेयजल, शहरी नीति, ग्रामीण नीति, विदेश नीति और आर्थिक नीति  क्या होगी? आखिर राजनीतिक दल क्या कहकर वोट मांग रहे हैं? अगर एक सामान्य नागरिक अपने सूझबूझ से मतदान करना चाहे तो किसे वोट दे?

ये प्रश्न पूरे चुनावी संवाद में अनुत्तरित रहे हैं, और विद्वान मित्र परेशान।

हालांकि, विद्वानों के परेशान होने का कोई खास कारण नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र और भीड़तंत्र में कोई विशेष फर्क नहीं होता। भले ही आप अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अर्थशास्त्री हों, वैज्ञानिक हों, प्रोफेसर हों या दिन भर शराब के नशे में धुत्त अनपढ़ और कामचोर हो, वोट की कीमत तो सबकी बराबर ही है।

आप आम काटकर खाते हैं या चूसकर, जब यह प्रधानमंत्री जी से पूछा जाने वाला महत्वपूर्ण सवाल बन गया हो तो फिर देश की प्रसिद्ध महिला कार्यकर्ताओं द्वारा पूछे गए 56 सवालों (रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला नीति, महिला आरक्षण, किसान आत्महत्या, कृषि नीति) को कौन पूछेगा?  अगर सिर्फ दिल्ली की सात सीटों के बारे में ही बात करें तो एक तरफ आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा,  आतिशी जैसे विद्वान नौजवानों को टिकट दिया है तो वहीँ एक ऐसा व्यक्ति भी चुनावी मैदान में है 1971 की भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश बनने का पता ही नहीं है। क्योंकि तब वह बहुत छोटा था। ठीक से कुछ याद नहीं है!

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, विदेश नीति और अर्थव्यवस्था को लेकर प्रधानमंत्री की सोच और नजरिये से ज्यादा खुद उनकी शैक्षिक योग्यता चर्चा का विषय बनी हुई है। इस तरह पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री हर चुनाव में शैक्षिक योग्यता के क्षेत्र में एक कदम पीछे हट जाती हैं। एक अन्य फिल्म स्टार और चुनावी उम्मीदवार की 2014 से 2019 के पांच वर्षो में उम्र तो 7 साल बढ़ गई लेकिन शैक्षिक योग्यता बीए से घटकर इंटर पास हो गई है। ऐसे माहौल में मुद्दों पर क्या खाक चर्चा होगी! मजेदार बात यह है कि ये सभी लोग प्रमुख राजनैतिक दल के लोग हैं और शायद चुनाव जीत भी जाएं क्योंकि इनमें से कोई गाता अच्छा है तो कोई एक्टिंग अच्छी करता है और कोई बड़ा खिलाड़ी है।

शायद जनता भी यही चाहती है इसलिए तो डॉक्टर मनमोहन सिंह जैसे अंतरराष्ट्रीय छवि के अर्थशास्त्री दक्षिणी दिल्ली जैसी पढ़े-लिखे लोगों वाली लोकसभा सीट से चुनाव हार जाते हैं। स्वर्गीय नरसिम्हा राव, जिन्होंने देश को एक नई दिशा दी और मुल्क को आर्थिक संकट से उबारा  वे आर्थिक उदारीकरण के फायदे गिनाते हुए चुनावी राजनीति में कूदे और इतिहास हो गए। अटल बिहारी वाजपेयी जो अपनी वाकपटुता, ईमानदारी और स्वच्छ छवि के लिए जाने जाते थे, इंडिया शाइनिंग के बावजूद फीके पड़ गए। तब सोशल मीडिया भी नहीं था, लेकिन देश तो यही था।

ध्यान से देखा जाय तो 21वीं के पहले 19 वर्षों में देश में  कोई बड़ा राजनैतिक आंदोलन नहीं हुआ है। चुनावी रैलियों के अलावा किसी बड़े मुद्दे पर राजनैतिक दल देश को एकजुट करने या दिशा देने में नाकाम रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेताओं के नेतृत्व में विरोध-प्रदर्शन के लिए दिल्ली जा रहे किसानों को राजधानी में घुसने से रोका गया और लाठीचार्ज कर तितर-बितर कर दिया गया। तमिलनाडु के किसान अपने मुद्दे उठाने के लिए क्या कुछ नहीं किया। शिक्षामित्रों और बेरोजगारों के पुलिस से पिटने पर अब किसी को फर्क नहीं पड़ता। आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी साल भर संघर्षरत रहती हैं। सरकारी कर्मचारी और पूर्व सैनिक भी अपनी मांगों को लेकर हर वक्त सरकार से सींग लड़ाये रहते हैं। ताज्जुब की बात है कि चुनाव के वक्त से सारे मुद्दे सिरे से गायब हैं। या कहना चाहिए गायब कर दिए गए हैं।

मुद्दों की इन गुमशुदगी का एक बड़ा कारण है सत्ताधारी भाजपा की तनखैया और अवैतनिक ट्रोल आर्मी जो व्हाट्सअप विश्वविद्यालय से ज्ञान पाते ही किसी का भी मुंह काला कर सकती है। किसी पर जूता फेंक सकती है। इनके डर से ज्यादातर विद्वान और समझदार लोगों ने अपने मुंह पर ताला लगा लिया है।  यह ट्रोल आर्मी एक फौजी को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए तीन दिन के अंदर उसे देशद्रोही, विदेशी जासूस, अय्याश और  आतंकवाद की  आरोपी को राष्ट्रभक्त घोषित कर सकती है। शहीद पुलिस अफसर स्वर्गीय हेमंत करकरे की शहादत को बदनाम करना इनके लिए चुटकी बजाने जितना आसान काम है।

यह सब एक सोची-समझी चुनावी रणनीति के तहत किया गया है। धर्म, जाति और क्षेत्रीय संकीर्णताओं में बंटे भारतीय समाज के मनोविज्ञान का भरपूर इस्तेमाल किया गया। प्रधानमंत्री के भाषणों में तमाम गैर-जरूरी और हल्की बातों (राजीव गांधी भ्रष्टाचारी नंबर वन बनकर मरा, कांग्रेस मुझे मरवाना चाहती है, मैं भिक्षा मांगता था, मेरी मां दूसरे के घर वर्तन धोती थी, चेतक घोड़े की मां गुजराती थी) को शुमार किया। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे मुद्दों को दूर से ही नमस्ते कर दी।

पिछले पांच वर्ष में तमाम योजनाओं, परियोजनाओं को गेम चेंजर कहा जा रहा था। जीएसटी, नोटबंदी, तीन तलाक, विदेश नीति, एफडीआई और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे गेम चेंजर मुद्दे भी इस चुनाव में गुम हैं।

ऐसा भी नहीं है कि आम जनता के जीवन से जुड़े मुद्दों को दफन करने का काम सिर्फ भाजपा ने किया है। कांग्रेस सहित लगभग सभी क्षेत्रीय दल सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, अकाली दल मुद्दाविहीन चुनाव ही लड़ रहे हैं।  चौधरी अजीत सिंह की राष्ट्रीय लोकदल जैसी पार्टियां जो किसानों की लड़ाई लड़ने का दावा करती हैं, वे भी किसानों के मुद्दे पर बड़ा आंदोलन छेड़ने में नाकाम रही हैं। कैराना उपचुनाव में जयंत चौधरी ने जरूर जिन्ना नहीं गन्ना का नारा दिया था जो कारगर भी रहा लेकिन लोकसभा चुनाव में गन्ना किसानों के भुगतान का मुद्दा ज्यादा नहीं उठ पाया। मुद्दों के इस नैरेटिव को बनाने, मिटाने में मुख्यधारा के मीडिया की बड़ी भूमिका है। भाजपा के पक्ष में मीडिया के बड़े हिस्से ने अपनी इस भूमिका को पूरी तरह सरेंडर कर दिया।

आज कृषि और किसान एक बड़े संकट से गुजर रहे हैं। लागत बढ़ रही है, आमदनी घट रही है, नई पीढ़ी खेती किसानी से दूर भाग रही है, ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की मार अलग है। लेकिन देश की तकरीबन आधी आबादी की रोजी-रोटी का सहारा खेती और किसान चुनावी चर्चा से गायब हैं। कांग्रेस ने अपने घोषणा-पत्र में कई अहम मुद्दों को जगह दी और कहा है कि कृषि पर अलग से बजट लाएंगे, लेकिन घोषणा-पत्र की ऐसी ज्यादातर बातों पर कांग्रेस वोट मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। घोषणा पत्र में लिखे अपने वायदों पर भी कांग्रेस वोट मांगने से कतरा रही है।

राष्ट्रीय और अन्तराष्ट्रीय स्तर की अनेक रिपोर्ट बता रही है कि भारत के शहरों की गिनती दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहरों में होती है। शुद्ध पेयजल तो अब धीरे-धीरे लग्जरी बनता जा रहा है। यमुना, गंगा  और हिंडन  सहित अनेक छोटी बड़ी नदियां नाले में परिवर्तित हो चुकी  हैं लेकिन इस पर भी चुनाव में कोई चर्चा नहीं है, उल्टे मथुरा की वर्तमान सांसद शुद्ध पेयजल और शुद्ध हवा की मशीनों के प्रचार में लीन हैं। नदियों को मां का दर्जा देने वाले समाज की संवेदनाएं इन्हें गंदा नाला बनते देख कतई आहत नहीं होती हैं।

(लेखक समाजशास्त्री हैं और कांग्रेस का घोषणा-पत्र बनाने वाली टीम में शामिल रहे हैं) 

 

किसानों के सामने ऐसी झुकी पेप्सिको, बेदम था कंपनी का दावा    

कानून की आड़ में बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसानों का कैसे उत्पीड़न कर सकती हैं इसकी झलक पिछले दिनों देखने को मिली। कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने गुजरात के 11 किसानों के खिलाफ कथित गैर-कानूनी तरीके से एक खास किस्म का आलू उगाने और बेचने के खिलाफ केस कर दिया। कंपनी का दावा था कि उसने भारतीय पेेेेटेंट कानून के तहत आलू की एफएल-2027 वैरायटी का रजिस्ट्रेशन कराया हुआ है जिसे वह एफसी-5 ब्रांड से बेचती है। बगैर अनुमति यह आलू उगाने वाले किसानों से पेप्सिको ने 20 लाख रुपये से लेकर 1.05 करोड़ रुपये तक का हर्जाना मांगा। साबरकांठा, बनासकांठा और अरावली जिले के इन किसानों के खिलाफ अलग-अलग अदालतों में तीन केस दर्ज कराए गए।

पेप्सिको का दावा शुरुआत में जितना दमदार समझा जा रहा था, असल में उतना मजबूत था नहीं। किसान संगठनों के दबाव और मामले को लेकर बढ़ी जागरूकता ने पेप्सिका को कदम वापस खींचने पर मजबूर कर दिया। 2 मई को कंपनी ने किसानों के खिलाफ केस वापस लेने का ऐलान किया और 5 मई को दो किसानों फूलचंद कछावा और सुरेशचंद कछावा के खिलाफ गुजरात की डीसा कोर्ट में चल रहा मामला वापस ले लिया। बाकी मुकदमे भी जल्द वापस होने की उम्मीद है।

कम नमी वाला एफसी-5 आलू खासतौर पर पेप्सी के लेज चिप्स के लिए उगाया जाता है। पेप्सिको का दावा था कि बिना अनुमति इस आलू की खेती और बिक्री कर किसानों ने उसके पेटेंट अधिकारों का उल्लंघन किया और कारोबार को नुकसान पहुंचाया। लेकिन ऐसा लगता है कि कंपनी को जल्द ही अपना कानूनी पक्ष कमजोर होने और भारतीय कानून में किसान के अधिकारों का अहसास हो गया। इसलिए केस से पीछे हटना मुनासिब समझा। देश भर के तमाम किसान संगठनों के अलावा भाजपा समर्थक स्वदेशी जागरण मंच ने भी पेप्सिको के रवैये पर कड़ा एतराज जताया था।

हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि गुजरात सरकार से पेप्सिको की क्या बात हुई और किसानों से मुकदमे किन शर्तों पर वापस लिए जा रहे हैं। लेकिन इस पूरे प्रकरण ने बीजों पर किसानों के अधिकार को लेकर नई बहस छेड़ दी है। बीजों पर किसान के हक की आवाजें कई साल से उठ रही हैं, लेकिन इस मामले ने कृषि से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकार कानून के धुंधलेपन और पेचीदगियों को भी उजागर किया है।

फ्लैशबैक

यह मामला पिछले तीन दशक में आर्थिक उदारीकरण की राह पर चलने, भटकने और ठिठकने के भारत के तजुर्बे से जुड़ा है। जिसके सिरे अस्सी के दशक के उस दौर से जुड़ते जब भारतीय सॉफ्ट ड्रिंक्स बाजार पर पारले जैसी  घरेलू कंपनियों का दबदबा था। राजीव गांधी, जो आजकल काफी चर्चाओं में हैं, तब उनके सत्ता संभालने के दिन थे। अर्थव्यवस्था को नेहरू दौर की समाजवादी जकड़न से निजात दिलाने के लिए अर्थव्यवस्था के दरवाजे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए खोले जाने लगे।

इन्हीं दरवाजों पर 1985 में अमेरिकी सॉफ्ट ड्रिंक कंपनी पेप्सिको ने दस्तक दी थी। पेप्सिको ने पंजाब में एग्रो रिसर्च सेंटर स्थापित कर फसलों की नई वैरायटी विकसित करने, आलू चिप्स और टमाटर कैचप के लिए फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने और किसानों के कल्याण के सब्जबाग दिखाए। बदले में कंपनी भारत में कोल्ड ड्रिंक बेचने की अनुमति चाहती थी। इन्हीं मंसूबों के साथ 1986 में पेप्सिको ने पंजाब सरकार और टाटा की वोल्टास के साथ एक ज्वाइंट वेंचर  किया।

 

देश में पेप्सिको की एंटी का घरेलू कंपनियों और स्वदेशी के लंबरदारों ने खूब विरोध किया। आखिरकार 1988 में भारत सरकार ने पेप्सिको को पंजाब में बॉटलिंग और फूड प्रोसिसंग प्लांट शुरू करने की इजाजत दे दी और 1990 में स्वदेशी की लहर के बीच पेप्सिको के तीन ब्रांड पेप्सी, 7-अप और मिरिंडा जयपुर से लांच हुए।

इस तरह आलू चिप्स के साथ पेप्सिको का भारत से नाता करीब तीन दशक पुराना है जिसमें पहली बार कंपनी और किसान आमने-सामने आए।  

एफसी-5 आलू की एंट्री

साल 2009 में पेप्सिको आलू की एफसी-5 वैरायटी भारत लेकर आई। ताकी लेज चिप्स को खास स्वाद और पहचान दी जा सके। इसकी शुरुआत भी पंजाब से हुई। अनुबंध के तहत कंपनी ने किसानों को एफसी-5 आलू का बीज दिया और उनसे उपज खरीदने लगी। आगे चलकर यही मॉडल गुजरात में अपनाया गया जहां साबरकांठा जिले के हजारों किसान यह आलू उगाने लगे।

इस बीच, 2016 में पेप्सिको ने भारत के प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वैरायटिज एंड फार्मर्स राइट्स एक्ट, 2001 (पीपीवी एंड एफआरए) के तहत आलू की एफसी-5 वैरायटी को रजिस्टर्ड करा लिया। लेकिन चूंकि बरसों से यह आलू देश में उगाया जा रहा है इसलिए जिन किसानों के साथ कंपनी का अनुबंध नहीं है, उन तक भी यह किस्म पहुंची और वे भी इसकी खेती करने लगे।

क्या ऐसा करना गैर-कानूनी है? नहीं!

जानिए कैसे?

जिस पीपीवी एंड एफआर एक्ट को आधार बनाकर पेप्सिको ने किसानों के खिलाफ केस किया, उसी कानून का सेक्शन 39 किसानों को रजिस्टर्ड वैरायटी की उपज अपने पास बचाकर रखने, इसे दोबारा उगाने और बेचने की छूट देता है। बशर्ते किसान रजिस्टर्ड वैरायटी के ब्रांडेड बीज ना बेचें। मतलब किसान रजिस्टर्ड बीज उगा सकते हैं। आपस में इसका लेन-देन और बिक्री कर सकते हैं लेकिन उसकी खुद ब्रांडिंग कर नहीं बेच सकते।

यह कहना मुश्किल है कि गुजरात के किसानों ने इस प्रावधान का उल्लंघन किया है या नहीं। लेकिन एक बात साफ हे कि पेप्सिको के पास एफसी-5 आलू का ऐसा कोई पेटेंट नहीं है कि उसकी अनुमति के बिना कोई दूसरा इस आलू को उगा ही ना पाए। यह एक गलत धारणा थी जो शुरुआत में मीडिया के जरिए फैलाई गई।  

पीपीवी एंड एफआर एक्ट का सेक्शन 42 कहता है कि अगर किसान को किसी प्रावधान के उल्लंघन के वक्त उसकी जानकारी नहीं है तो उसे उक्त उल्लंघन का दोषी नहीं माना जाना चाहिए। यह बात भी पेप्सिको के रवैये के खिलाफ जाती है क्योंकि सभी रजिस्टर्ड किस्मों की जानकारी किसानों को होना जरूरी नहीं है।

तीसरी बात यह है कि एफसी-5 वैरायटी के आलू की खोज 2016 में नहीं हुई थी। भारत में यह आलू 2009 से उगाया जा रहा है। पेटेंट कानून के तहत इसका रजिस्ट्रेशन भी पहले से प्रचलित किस्म की श्रेणी में ही हुआ है। संभवत: इस पहलू को भी पेप्सिको ने नजरअंदाज किया।

वैसे, सामान्य जानकारी वाली प्रचलित किस्मों के रजिस्ट्रेशन के साथ भी कई दिक्कतें हैं।2001 में जब पीपीवी एंड एफआर एक्ट बना तब भी कई विशेषज्ञों ने इस पर आपत्ति जताई थी। उनका तर्क था कि  कंपनियां अपनी पुरानी किस्मों का रजिस्ट्रेशन कराकर किसानों को इनके इस्तेमाल से रोक सकती हैं या उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकती हैं। करीब 20 साल बाद यह आशंका सही साबित हुई।

बहरहाल एक बात साफ है जो पेटेंट कानून पेप्सिको जैसी कंपनियों को अपने बीज पंजीकृत कराने की सहूलियत देता है, उसी कानून से किसानों को भी कई अधिकार मिले हुए हैं। इस लिहाज से भारतीय कानून अमेरिका और यूरोपीय देशों के कानूनों से अलग है।

सभी किसान बाजार से बीज नहीं खरीदते। बहुत से किसान पुरानी उपज का एक हिस्सा बीज के लिए बचाकर रख लेते हैं या फिर आपस में बीजों का लेनदेन करते हैं। बीजों के इस्तेमाल की यह आजादी किसानों के साथ-साथ जैव-विविधता और देश की खाद्य संप्रभुता के लिए भी जरूरी है। इसलिए पीपीवी एंड एफआर एक्ट किसानों को रजिस्टर्ड बीज के इस्तेमाल की आजादी और अधिकार भी देता है।

इस विवाद का एक पहलू उस आरोप से भी जुड़ा है जिसके मुताबिक, एफसी-5 आलू उगाने वाले गुजरात के किसान लेज के प्रतिद्वंद्वी ब्रांड को इसकी आपूर्ति करते हैं जो पेप्सिको के हितों के खिलाफ है। ऐसे किसानों पर शिकंजा कसकर कंपनी लोकल कॉपीटिशन को मात देना चाहता है। इस तरह यह एक कॉरपोरेट जंग है जिसमें एक बहुराष्ट्रीय कंपनी और उसको टक्कर देने वाली स्थानीय ब्रांड आमने-सामने हैं और किसान बीच में पिस रहे हैं।

अब आगे

भारत के लिए यह मामला खतरे की घंटी है। देखने वाली बात यह है कि क्या भारत विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के समझौतों के तहत कृषि क्षेत्र में लागू हुए बौद्धिक संपदा अधिकार कानूनों में किसानों के अधिकार और अपनी खाद्य संप्रभुता को सुरक्षित रख पाता है या नहीं। कृषि से जुड़े पेटेंट कानून के कई प्रावधान पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। जिनका फायदा उठाकर पेप्सिको जैसी दिग्गज कंपनियां किसानों का उत्पीड़न कर सकती हैं।

बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ प्रो. बिश्वजीत धर का मानना है कि इस मामले ने पीपीवी एंड एफआर एक्ट से जुड़ी कई समस्याओं को उभारा है जो इसके विवादित प्रावधानों और इन्हें लागू करने के तरीकों से जुड़ी हैं। अगर इन मुद्दों को इस कानून की मूल भावना और कृषक समुदाय पर असर को ध्यान में रखते हुए नहीं सुलझाया गया तो भारतीय कृषि क्षेत्र के समक्ष मौजूदा संकट और गंभीर हो जाएगा।

किसान अधिकारों की पैरवी करने वाले संगठन आशा की सह-संयोजक कविता कुरूगंटी ने एक बयान जारी कर किसानों के खिलाफ मुकदमे वापस लेने के पेप्सिको के फैसले को भारतीय किसानों की जीत बताया है। उनका कहना है कि भारतीय कानून से किसानों को मिली बीज स्वतंत्रता बरकरार रहनी चाहिए। किसानों का उत्पीड़न करने वाली पेप्सिको को माफी मांगकर और किसानों को हर्जाना देना चाहिए। भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हो इसके लिए सरकार को भी पुख्ता व्यवस्था बनानी होगी।

पेप्सिको द्वारा किसानों से केस वापस लेना ही काफी नहीं है। जिन दलीलों के साथ कंपनी ने किसानों पर एक-एक करोड़ रुपये के मुकदमे ठोके थेे उनमें कानूनी स्पष्टता आनी जरूरी है। बेहतर होता अगर यह मामला अदालत के निर्णय से सुलझता और भविष्य के लिए नजीर बनता।