किसानों को मिलकर रहेगा ब्याज समेत गन्ना भुगतान

कोविड-19 दुनिया भर के लिए मुसीबत का सबब है और उत्तर प्रदेश के गन्ना उत्पादक किसान इसके अपवाद नहीं हैं। करीब 80 फीसदी ग्रामीण अर्थव्यवस्था रोजमर्रा का खर्च चलाने के लिए दूध की बिक्री पर निर्भर है। लेकिन कोरोना संकट के कारण दूध की कीमत घटने से उन किसानों की दिक्कतें बढ़ गई हैं जिन्हें छह से बारह महीनों में गन्ना भुगतान मिलता है। यही नहीं, किसानों पर अपने किसान क्रेडिट कार्ड के कर्ज को ब्याज और जुर्माने के साथ लौटाने का दबाव है, बच्चों के स्कूल और कॉलेज की फीस जमा करने के साथ उन्हें अपना घर भी चलाना है। इससे उन पर भारी बोझ पड़ रहा है और कई किसानों ने आत्महत्या कर ली है।

ऐसे में किसान केंद्र सरकार द्वारा आगामी वर्ष के लिए घोषित गन्ने के उचित लाभकारी मूल्य (एफआरपी) में केवल 10 रुपये की वृद्धि से नाखुश हैं। कई किसानों का कहना है कि उनके सामने खुदकुशी करने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा है। लेकिन मैं गन्ने के बकाया भुगतान की समस्या के बारे में बात करते हुए किसानों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि आने वाले दिनों में हालत बेहतर हो सकते हैं। यह सर्वज्ञात तथ्य है कि साल 1995-96 तक चीनी मिलें किसानों से गन्ना लेकर भुगतान करने में वर्षों लगा देती थीं। लेकिन 1997 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद जब चीनी मिलों को गन्ना किसानों के 29 करोड़ रुपये ब्याज समेत चुकाने का निर्देश दिया गया तब चीनी मिलों ने जल्द भुगतान करना शुरू कर दिया था क्योंकि उन्हें पता 14 दिनों के बाद ब्याज भी देना पड़ेगा।

निर्देश के बावजूद अगौता चीनी मिल ने 25 करोड़ रुपये से ज्यादा का गन्ना भुगतान तो किया लेकिन ब्याज नहीं दिया। चूंकि तब 80 सहकारी या सरकारी चीनी मिलों का नियंत्रण राज्य सरकार के पास था, इसलिए राज्य सरकार ने ब्याज समेत गन्ना भुगतान में दिलचस्पी नहीं ली और आदेशों का पालन नहीं कराया। जबकि अदालत के आदेशों के तहत ब्याज की धनराशि के बराबर चीनी का स्टॉक डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट की कस्टडी में था। इसलिए 1997 में मुझे गन्ना आयुक्त और चीनी मिल मालिक के खिलाफ अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। लगभग 12 वर्षों के संघर्ष के बाद आखिरकार चीनी मिल के निदेशक को जेल भेजा गया और अगौता चीनी मिल के किसानों को 2009 में ब्याज का भुगतान मिला।

किसानों को याद दिलाना चाहुंगा कि गन्ना सीजन 1996-97 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) को अवैध करार देते हुए केंद्र द्वारा निर्धारित एसएमपी पर गन्ना भुगतान का निर्देश दिया था जो एसएपी से एक तिहाई कम था। इस मामले पर जब सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की याचिका खारिज हो गई तो 1997 में मैंने हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच में याचिका दायर की जिसमें अदालत ने 1999 में एसएपी को समझौता मूल्य के रूप में कायम रखने और गन्ना आयुक्त को 14 दिनों के भीतर ब्याज समेत भुगतान सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया। तब भी ब्याज का भुगतान नहीं किया गया तो मैंने 1997 से ब्याज का भुगतान करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की जो अभी तक लंबित है। जब अगौता चीन मिल ने किसानों को ब्याज का भुगतान किया तो मैंने ब्याज समेत गन्ना भुगतान के लिए एक नई याचिका दायर की।

साल 2014-15 में हाईकोर्ट ने गन्ना आयुक्त को साल 2011 से 2015 तक करीब 2000 करोड़ रुपये के ब्याज का भुगतान सुनिश्चित कराने को कहा लेकिन उस समय की समाजवादी पार्टी सरकार ने 2015 और 2016 में कैबिनेट फैसलों के जरिए चीनी मिलों द्वारा किसानों को दिया जाने वाला भुगतान तीन साल के लिए माफ कर दिया। हाईकोर्ट ने इस निर्णय को रद कर दिया है और योगी सरकार के गन्ना आयुक्त को चार महीनों नए सिरे से मामले पर निर्णय लेने का निर्देश दिया है।

लेकिन जब गन्ना आयुक्त ने ब्याज भुगतान के मुद्दे पर लगभग दो साल तक कोई निर्णय नहीं लिया तो मुझे अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी। पहले तो गन्ना आयुक्त ने अदालत के निर्देशों को टालने की कोशिश की लेकिन जब उन्हें गिरफ्तार किए जाने की चेतावनी दी गई, तो उन्होंने 2019 में एक हलफनामा दायर किया कि 2012-13, 2013-14 और 2014-15 में लाभ कमाने वाली चीनी मिलें किसानों को प्रतिवर्ष 12 फीसदी और घाटे में चल रही मिलें 7 फीसदी ब्याज का भुगतान करेंगी। इसमें भुगतान माफ किए जाने या 2011-12 के ब्याज भुगतान का कोई जिक्र नहीं है जबकि इसका भुगतान भी अदालत के आदेश के अनुसार होना चाहिए।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर आपत्ति जताई कि ब्याज का भुगतान कानूनन 15 फीसदी की दर से होना चाहिए। मैंने गन्ना किसानों को मिलने वाला ब्याज खत्म करने के लिए राज्य सरकार और गन्ना आयुक्त के अधिकार को भी चुनौती दी। जब गन्ना आयुक्त ने ब्याज के भुगतान के बारे में हलफनामा दायर कर दिया, तब धनराशि का भुगतान तुरंत होना चाहिए था, लेकिन राज्य और चीनी मिलों ने लंबी हड़ताल और बाद में महामारी के कारण अदालत न चलने का फायदा उठाया।

लेकिन अदालतें कुछ दिनों में काम करना शुरू कर देंगी और तब गन्ना आयुक्त को ब्याज के भुगतान में देरी का कारण बताना होगा। एक बार जब सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दे दिया कि गन्ना आयुक्त के पास ब्याज राशि को माफ करने या कम करने का अधिकार नहीं है, तो मिल मालिक या राज्य 14 दिनों के बाद भुगतान में एक दिन की भी देरी नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें 15 फीसदी ब्याज देना होगा, जबकि उन्हें कॉरपोरेट कर्ज 10 से 12 फीसदी ब्याज पर मिलता है। ये तथ्य बताते हैं कि किसानों को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। निश्चित रूप से उन्हें ब्याज का भुगतान मिलेगा।

मैं गन्ना किसानों को भरोसा दिलाना चाहता हूं कि बुरा वक्त बीत चुका है और अब बकाया भुगतान मिलना तय है। अगर 1996 से 15 फीसदी सालाना की दर से ब्याज का भुगतान किया जाता है, तो उन्हें प्रति एकड़ एक लाख रुपये मिलेंगे और यदि 2011-12 से 2019-2020 तक भुगतान किया जाता है, तो भी उन्हें प्रति एकड़ 50 हजार रुपये से कम नहीं मिलेंगे।

कर्ज अदा न करने पाने वाले गन्ना किसानों के खिलाफ रिकवरी नोटिस जारी होने को लेकर उनकी परेशानी समझी जा सकती है। लेकिन हर किसान को पता होना चाहिए कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच के 2012 के आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि जब तक चीनी मिलों से ब्याज समेत गन्ना भुगतान न हो जाए, तब तक राज्य किसानों के खिलाफ सरकार रिकवरी नोटिस जारी नहीं कर सकती है। यही वजह है कि पिछले सात सालों में रिकवरी नोटिस जारी नहीं हुए और किसानों को कम से कम 10 फीसदी कलेक्शन चार्ज की बचत हुई है। लेकिन इस साल स्टे ऑर्डर लागू होने के बावजूद रिकवरी नोटिस जारी हुए हैं। राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन ऐसे रिकवरी नोटिस को वापस कराने के प्रयास कर रहा है।

एफआरपी में दस रुपये की वृद्धि से भी किसानों को उदास होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि हम सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के अनुसार एसएपी के हकदार हैं, जिसने मेरे मामले में हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। राज्य को एसएपी तय करने का अधिकार है, जो एक वैध मूल्य है। उम्मीद है कि अक्तूबर में जो एसएपी तय किया जाएगा, वह प्रधानमंत्री के वादे के मुताबिक उत्पादन लागत पर 50 फीसदी लाभ के फार्मूले के अनुसार कम से कम 450 रुपये प्रति क्विंटल होगा। एक बार जब 15 फीसदी की दर से किसानों को ब्याज का भुगतान किया जाएगा तो अगली बार गन्ना भुगतान खुद ही समय से होगा। इससे नोटबंदी और महामारी के दौरान नौकरी गंवा चुकी युवा पीढ़ी के लिए खेती की तरफ लौटने का अच्छा अवसर मौका मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा।

(लेखक किसान नेता और राष्ट्रीय मजदूर किसान संगठन के संयोजक हैं)

मुद्दा किसानों की जमीन पक्की करने का है, सिख या गैर-सिख का नहीं | वीएम सिंह

आपको याद होगा जून के दूसरे सप्ताह में सोशल मीडिया पर उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकार द्वारा 30 हजार सिखों को उनकी जमीन से हटाने की खबर तेजी से फैली। जिसने भी सुना वो हैरान था कि हजारों सिखों को उनकी जमीन से क्यों बेदखल किया जा रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह, अकाली दल के नेताओं और आम आदमी पार्टी ने तुरंत इस मुद्दे पर बयान दिए और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात करने की बात कही। मुझे देश-विदेश से लोगों के फोन आये क्योंकि उन्हें मालूम था कि पिछले 25 साल में जब भी किसानों को उजाड़ने की बात हुई है, हमने पहल कर शासन/प्रशासन या कोर्ट के माध्यम से उजाड़ने से रुकवाया।

सन 1996 में लिया गया हाईकोर्ट का आर्डर 15 साल से ज्यादा समय तक लोगों को जमीन से बेदखल होने से बचाता गया। साल 2018 में योगी सरकार नानक सागर डाम के बदले वाली भूमि पर बैठे किसानों को उजाड़ने आई थी, तब हाई कोर्ट में केस किया गया जो आज भी चल रहा है। इसलिए मुझे सोशल मीडिया की खबरों पर आश्चर्य हुआ कि हजारों सिख किसानों को उजाड़ने का मामला सही नहीं हो सकता।

लखीमपुर खीरी जिले के रननगर में जमीन पर कब्जा करने गए पुलिस बल के साथ किसानों का टकराव

हमने जमीनी हकीकत का पता लगाने के लिए तीन सदस्य समिति बिजनौर और रामपुर भेजी जिसके अध्यक्ष तेजिंदर सिंह विर्क (वर्किंग ग्रुप सदस्य-AIKSCC) थे। ऐसी ही एक दूसरी समिति प्रताप बहादुर जी की अध्यक्षता में पीलीभीत और खीरी भेजी गई। इस समिति को खासतौर से कहा गया कि रननगर की जांच में ज्यादा समय दें। दोनों टीमें 19 जून को जांच के लिए गई थी और पूरे मामले की पड़ताल के बाद दोनों समितियों ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।

दोनों जांच रिपोर्ट में साफ है कि सरकार किसानों को जमीनों से हटाने का जोर डाल रही है लेकिन किसी को भी हटाने में नाकामयाब रही है। रननगर में 3 जून को फोर्स ने जेसीबी के माध्यम से 10-12 एकड़ गन्ना उजाड़ दिया। किसानों को जैसे ही इसकी जानकारी मिली, उन्होंने विरोध किया और फोर्स को वापस लौटना पड़ा। अधिकारियों ने उसी दिन गांव वालों पर एफआईआर लिखवा दी। इससे पहले 2018 में जब फोर्स टाटरगंज, कंबोज नगर ओर टिल्ला के किसानों को उजाड़ने गई थी, तब भी नाकामयाब रही थी। क्योंकि किसानों ने पुलिस बल को वापस लौटने पर विवश कर दिया था।

अब देखने की बात है कि जब हमारे किसानों ने दोनों जगहों पर सरकारी फोर्स को भगा दिया तो क्या आज यह कहना सही होगा कि सरकार ने 30 हजार सिखों को उजाड़ दिया? अगर सही मैसेज जाता कि बिना देश के नेताओं/किसानों की सपोर्ट के गांव के किसानों ने फोर्स को भगा दिया और अगर ऐसा फिर हुआ तो पूरे देश के किसान उनके साथ खड़े रहेंगे तो सरकार पर दबाव बनता और वो किसी को उजाड़ने के पहले दो बार सोचती।

लेकिन सोशल मीडिया पर इस मामले को फैलाकर सरकार की नाकामयाबी को उनकी ताकत बना दिया और खुद सरकार से गुहार लगाने गए कि हमें मत उजाड़ो। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अकाली दल की टीम को 20 जून का टाइम दिया। लेकिन वहां किसी ने यह नहीं कहा कि 30 हजार उजड़े हुए लोगों को दोबारा बसाया जाए। उन्हें मालूम था कि सरकार उजाड़ने में नाकामयाब रही और जो 10-12 एकड़ गन्ना जो जोत दिया गया था उस पर भी किसानों ने फोर्स को भगाने के बाद धान लगा दिया है।

इससे एक तरफ 30 हजार सिख किसानों को उजाड़ने की गलत खबर से हमारी कमजोरी दिखाई दी और दूसरी तरफ जात-बिरादरी छोड़ देश के किसानों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने की मुहिम को कमजोर करने की कोशिश दिख रही है। सिख किसानों के मालिकाना हक की बात पहले भी बहुत मुख्यमंत्रियों ने की पर ऐसे उजाड़ने का प्रयास तो किसी ने नहीं किया। क्या सिखों को उजाड़ने कि झूठी बात सोशल मीडिया पर वायरल करना मुख्यमंत्री से अकालियों के साथ मिलने की सुनियोजित रणनीति थी?

मुख्यमंत्री ने 4 जांच कमेटियां बनाई हैं जो मालिकाना हक दिलवाने का काम करेंगी। वहीं उस वार्ता के कुछ दिन बाद उसी निघासन तहसील के सिंघाई थाने में सिखों पर सरकारी जमीन पर कब्जा करने के आरोप में 10 गंभीर धाराओं लगते हुए एफआईआर दर्ज करवाई गई।

हकीकत है कि पिछले 50-60 सालों से बैठे किसानों को बीजेपी सरकार ने उखाड़ने की कोशिश की है। मंगल ढिल्लों जी ने पीलीभीत में सिखों (सुरजीत कौर आदि) की विरासत जिला अधिकारी द्वारा पलटने की बात कही! यह मामला 1997-98 में भाजपा सरकार का है आज का नहीं। यह मामला 20-22 किसानों का है और आज ये मामला कमिश्नरी से वापस चकबंदी अफसर के पास पहुंचा है। केवल मामला उछालने की बजाय हम अगर उन परिवारों की अच्छे वकीलों के द्वारा मदद करे तो बेहतर होगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें हर बिरादरी के किसानों को जमीन का मालिकाना हक दिलवाने की कोशिश करनी है। नानक सागर डाम और रामपुर जिले का मामला कोर्ट में है। सरकार हल निकाल दे तो सोने पर सुहागा, अगर कमेटी की सिफारिशों का इंतज़ार कर रही है तो कम से कम गन्ने का सट्टा तो आने वाले सर्वे में चालू करवा दें, जिससे उनका कब्जा तो बरकरार रहेगा। किसान 50-60 साल से अपनी जमीन पर काबिज हैं। कुछ सरकारों ने उसकी जमीन की मलकियत देने की बात कही पर आज तक दोनों मुद्दों पर सरकारें नाकामयाब रही हैं।

पिछले 25 सालों में मैंने अपना फर्ज निभाया। किसानों का सट्टा दिलवाने का काम भी किया। अब अकाली दल और बीजेपी के माध्यम से अगर किसानों को मलकियत मिलती है तो उससे बड़ी बात कोई नहीं हो सकती। हाई कोर्ट में जो हमसे होगा हम करेंगे। मैं उम्मीद करता हूं कि अगले 6 महीने में इन कमेटी की प्रक्रिया समाप्त होकर किसानों को मलकियत मिलेगी।

मुझे मालूम है कि उत्तराखंड में बीजेपी सरकार द्वारा खटीमा में हाल ही में 106 एकड़ गेहूं उजाड़ दी गई और बाजपुर में प्रशासन द्वारा 20 हजार किसानों की 5,838 एकड़ पर संकट के बादल छाए हुए हैं। जैसे दिल्ली में कोरोना कम होता है और उत्तराखंड में जाने की अनुमति मिलती है, तब मैं खटीमा और बाजपुर आऊंगा। पर इसी बीच में उत्तर प्रदेश/उत्तराखंड सिख संगठन और अकाली दल के नेताओं से कहना चाहूंगा कि आपकी सहयोगी बीजेपी सरकार से इन मामलों का भी हल निकलवाने की कोशिश करें। बाजपुर और खटीमा में सिखों के साथ-साथ अन्य बिरादरियों के किसान भी हैं। सिख पहले श्रेणी की खेती करता है, देश का पेट भरता है। उसकी बात किसान के रूप में कि जाए तो बेहतर होगा। जब हमारे गुरु ने जात बिरादरी में फर्क ना रखते हुए एक धर्म को बचाने के लिए सब कुछ किया तो कुछ लोग सिख किसान और गैर सिख किसान की दरार क्यों पैदा कर रहे हैं?

(लेखक राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के राष्ट्रीय संयोजक हैं)