राजस्थान: शीत लहर और पाला पड़ने से 40 फीसदी सरसों की फसल बर्बाद, किसानों को हुआ भारी नुकसान!

राजस्थान के सीकर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, जैसलमेर और बाड़मेर जिलों के किसान मायूस हैं. शीत लहर ने उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत को अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे गंभीर पाला पड़ा है, जिससे उनकी सरसों, जीरा, अरंडी और सब्जियों की फसल नष्ट हो गई है. ‘गांव कनेक्शन’ में छपी पत्रकार पारुल कुलश्रेष्ठ की रिपोर्ट के अनुसार हनुमानगढ़ जिले के एक गांव के रायसिंह जाखड़ बंसरीवाला ने दुख व्यक्त किया कि ठंड और पाले के कारण उनकी सरसों की लगभग 40 प्रतिशत फसल नष्ट हो गई. शीत लहर और बारिश विनाशकारी साबित हुई.

इसके अलावा, इंदिरा गांधी नहर में रखरखाव के काम के कारण, हमें सिंचाई के लिए पानी नहीं मिला,” बंसरीवाला ने रिपोर्टर को बताया,”सरसों राजस्थान की प्रमुख फसलों में से एक है और उत्तर पश्चिमी राज्य अकेले भारत में सरसों के कुल उत्पादन का 43 प्रतिशत योगदान देता है. राजस्थान में, अलवर प्रमुख उत्पादक जिले के रूप में श्री गंगानगर, भरतपुर, टोंक, सवाई माधोपुर, बारां और हनुमानगढ़ के बाद आता है.

श्री गंगानगर और हनुमानगढ़ जिले में लगभग 556 हेक्टेयर भूमि सरसों के अधीन है. वहां के किसानों को डर है कि अगर शीत लहर जारी रही तो सरसों की 40 फीसदी फसल बर्बाद हो जाएगी. उनके अनुसार, कुछ स्थानों पर तापमान शून्य से 2.8 डिग्री सेल्सियस नीचे तक गिर गया है, जो रेगिस्तानी राज्य के लिए असामान्य है.

श्री गंगानगर जिले के चपावली गांव के प्रह्लाद ने बताया, “ठंढ को मात देने का एकमात्र तरीका पर्याप्त सिंचाई है. सुबह जमीन को पानी देने से पाले से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद मिलती है, लेकिन गांव में बिजली की आपूर्ति केवल रात में होती है, किसान केवल उस समय अपनी भूमि की सिंचाई कर सकते हैं जब तापमान शून्य के करीब गिर जाता है. अगर दिन के समय बिजली की आपूर्ति होती और हम दिन के उजाले में अपनी जमीन को सींच सकते तो यह बहुत अच्छा होता. लेकिन प्रशासन को किसानों की कोई परवाह नहीं है. जबकि सरकार भाषण देने में व्यस्त है लेकिन हम नुकसान उठा रहे हैं”

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के जयपुर कार्यालय के अनुसार, 3 जनवरी, 2014 के बाद यह पहली बार है, जब तापमान शून्य से 2.7 डिग्री सेल्सियस नीचे चला गया है. इससे पहले 1974 में चूरू में तापमान शून्य से 4.6 डिग्री सेल्सियस नीचे गिर गया था, जो राज्य में अब तक का सबसे कम तापमान दर्ज किया गया था. उन्होंने कहा, ‘हमने राज्य सरकार को चेतावनी जारी की थी कि इस साल 14 जनवरी से पाला पड़ेगा. जबकि इस मौसम में जमीनी पाला असामान्य नहीं है, समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह दो दिनों से अधिक समय तक रहता है. यह फसलों के लिए विनाशकारी है,”

किसान अपनी सरसों की फसल के 40 प्रतिशत तक नुकसान की सूचना दे रहे हैं, एक आधिकारिक आकलन किया जाना बाकी है. राजस्थान कृषि विभाग, हनुमानगढ़ जिले के सहायक निदेशक बी आर बाकोलिया ने कहा, “नुकसान की सीमा का तुरंत पता लगाना संभव नहीं है. हम अगले कुछ दिनों में ही नुकसान के बारे में बता पाएंगे. अगर अगले दो दिनों में बारिश होती है तो स्थिति में सुधार हो सकता है. यदि नहीं, तो अधिक नुकसान हो सकता है. सहायक निदेशक ने बताया, “हमारे अधिकारी फील्ड में जाकर, खासकर सरसों को हुए नुकसान की रिपोर्ट तैयार करेंगे.”

किसानों के अनुसार सरसों के पकने से पहले अगर पाला पड़ जाए तो यह पौधे को मार देता है. इसलिए, क्षति से बचने के लिए भूमि को सिंचित रखना महत्वपूर्ण है. लेकिन श्री गंगानगर में हर साल ठंड पड़ रही है, किसान ने कहा, “तापमान का चार डिग्री तक गिरना सामान्य है, लेकिन साल दर साल ठंडा होता जा रहा है और यह साल अब तक का सबसे खराब रहा है.”

इस बीच, भरतपुर स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन रेपसीड-मस्टर्ड (NRCRM), जो एक ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) संस्थान है, के निदेशक पी के राय ने चेतावनी दी कि अनुचित सिंचाई स्थिति को और अधिक नुकसान पहुंचा सकती है. राय ने बताया, “जमीन में समय-समय पर सिंचाई करने से यह सुनिश्चित होता है कि कोई सूखापन नहीं है, खासकर उन जगहों पर जहां बीज अभी पूरी तरह से पके नहीं हैं”

बाड़मेर जिले में किसान अपने अनार, अरंडी के पौधे, जीरा और सरसों के पौधों को हुए नुकसान का हिसाब लगा रहे हैं. बाड़मेर के किसान हस्तीमल राजपुरोहित ने बताया, “जिले में करीब 30 फीसदी अनार, 70 फीसदी अरंडी और 50 फीसदी सरसों नष्ट हो जाती है” उन्हें बैंक का कर्ज चुकाने, बिजली बिल भरने आदि की चिंता सता रही थी. “बहुत ट्रिपिंग के साथ दिन में केवल दो से तीन घंटे बिजली की आपूर्ति की जाती है. किसी भी राजनेता को हमारी भलाई की चिंता नहीं है,”

सीकर जिले के किसान गांवों में बिजली की अनियमित आपूर्ति को लेकर पिछले चार दिनों से डोढ़ गांव में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, जिससे उनके लिए अपनी जमीन को सिंचित रखना मुश्किल हो रहा है. “बिजली की आपूर्ति स्थिर नहीं है. कभी-कभी बिजली आने के छह मिनट के भीतर ही बिजली बंद हो जाती है,” सीकर जिले के भुवाला गांव के राम रतन बगडिया ने बताया, “सब्जियों में पहले ही 60 फीसदी और सरसों में 40 फीसदी नुकसान हो चुका है. बगडिया ने कहा, “हम मांग करते हैं कि सरकार हमें नुकसान की भरपाई करे और हमें उचित बिजली मुहैया कराए.”

कहीं भस्मासुरी वरदान में न बदल जाए सोलर प्लांट

किसी भी विकासशील देश की अर्थव्यवस्था में ऊर्जा एक महत्वपूर्ण घटक है. गत कुछ वर्षों में गहराते कोयला संकट ने हमें गैर परम्परागत ऊर्जा स्रोतों की ओर मोड़ा है, जिनमें विशेषकर राजस्थान में सौर ऊर्जा  व पवन ऊर्जा मुख्य रूप से विकसित हो रही है. राजस्थान के पश्चिमी भाग में सौर ऊर्जा की प्रबल संभावनाएं तलाशी गई, जिसके तहत भादला, जोधपुर में 10,000 हेक्टेयर भूमि चिन्हित करते हुए विश्व का सबसे बड़ा सौर ऊर्जा  पार्क निर्माणाधीन है. इसी क्रम में भारत सरकार के उपक्रम एनटीपीसी के साथ साथ विभिन्न राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय निजी कम्पनियों ने भी बीकानेर शहर के आस-पास सौर ऊर्जा में निवेश किया है.

जामसर, कोलायत, पूगल इत्यादि गांवों के भूमिधारको ने बड़े स्तर पर अपनी भूमि, लगभग 25 साल के लीज पर कम्पनियों को उपलब्ध करवाई है. घाटे का सौदा मानी जा चुकी कृषि से त्रास्त भूमिधारकों की आय में वृद्धि हुई व मूलभूत सुविधाओं सड़क, बिजली, पानी इत्यादि में भी सुधार देखा जा रहा है. ग्रामीण युवाओं को आशा है कि वायदें के मुताबिक गांव में रोजगार भी उपलब्ध होगा. किन्तु जिस प्रकार कृत्रिम प्रकाश में शहरों के लोगों को आकाश के तारे अब नहीं दिखते, उसी प्रकार सोलर पैनलों का समुंद्र, मरूस्थलीय पारिस्थितिकी को लीलता हुआ शायद नजर नहीं आ रहा है.

हमारा थार राजस्थान के 33 जिलों में से 12 जिले समेटे हुए, विश्व का सबसे आबाद मरूस्थल है. यहां विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु, वृक्ष व झाड़ियां मनुष्य के साथ मरूस्थल साझा करते है. सेवण घास की विलुप्ति के साथ जिस प्रकार गोडावण पक्षी की प्रजाति विलुप्ति के कगार पर आ गई है, उसी प्रकार कई स्थानीय प्रजातियों पर संकट गहरा गया है. बीकानेर के रेगिस्तान में रेगिस्तानी लाल लोमड़ी, रेगिस्तानी जंगली बिल्ली, रेगिस्तानी बिच्छु, बांडी, नेवला 25 प्रकार के दुर्लभ सरीसर्प, जिनमें धामण सांप प्रमुख है, विभिन्न विलुप्त प्राय गिद्धों व चीला की प्रजातियां निवास करती है. यह जीव जन्तु सेवण, धामण, कैर, बैर, कण्टेली, नागफनी, धोकड़ा, रोहिड़ा, खेजड़ी, बबूल, फोग, खींप इत्यादि स्थानीय वनस्पतियों पर भोजन व आवास के लिए निर्भर है.

ऊर्जा प्राप्ति की हमारी आवश्यकता ने न सिर्फ इन वनस्पतियों को नष्ट करते हुए, अनेक प्रजातियों की विलुप्ति की ओर धकेल दिया है, बल्कि परम्परागत खाद्य व्यवस्था को भी प्रभावित किया है. भीषण गर्मी व सूखे के दिनों में भी रेगिस्तान कैर, सांगरी, बेर, फोग जैसी चीजों से आमजन की खाद्य आपूर्ति करता आया हैं सोलर प्लांटो को जमीन उपलब्ध करवाने की अंधी दौड़ में भूमिधारक तेजी से भूमि साफ करवाते जा रहे है, नजीजन कैर-सांगरी जैसी सूखी सब्जियों के भाव आसमान छूते जा रहे हैं और उत्पादन उतनी तेजी से गिरता जा रहा है. केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कम्पनियों को कई प्रकार की विशेष छूट दी गई है जिनमें पर्यावरण संबंधी शर्तों को भी हटाया गया है.

जागरूकता के अभाव का लाभ देते हुए दलालो ने छोटे भूमि धारको से जमीन खरीद कर बड़े बड़े क्षेत्राफलों का निर्माण किया है व अब कम्पनियों को महंगी दरों पर लीज़ पर दिया जा रहा है. अर्थशास्त्री शायद इसे आर्थिक विकास मानेंगे पर समाजशास्त्रियों के लिए यह मंथन का विषय है. इस तत्काल प्राप्त सफलता से इलाके में नशा, हिंसा, महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में भी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. वे भूमिधारक, जिन्होंने अपनी भूमि कंपनी या दलालों को बेच दी है वे या तो रोजगार की तलाश में शहर का रूख कर चुके हैं या सोलर कंपनियों में रोजगार की आस लगाये हुए हैं. क्या हमारे शहर इस जनसंख्या की रोटी, कपड़ा व मकान की आवश्यकता को पूरा कर पायेंगे?

बीकानेर अपने बरखान रेत के टिब्बों के लिए जाना जाता है जो आंधियों के माध्यम से अपना स्थान बदलते रहते हैं. जब साधारण हवा का झोंका भी रेजे़ की एक मोटी परत बिछा जाता है, तब ऐसी पारिस्थितिकी से सोलर पैनल्स को साफ रख पाना एक मुश्किल काम है, जिसे इंदिरा गांधी नहर से उपलब्ध पानी से किया जा रहा है. पिछले एक महिने की नहरबंदी ने हमे जल का महत्व याद दिलाया है परन्तु बदले वैश्विक तापमान से फ्रिज, एसी, कूलर इत्यादि को भी हमारी आवश्यकताओं में शामिल कर दिया है. ऐसे में ऊर्जा संकट और जल संकट में से चुनाव कर पाना शायद संभव नहीं है पर आशा की जा सकती है कि हमारे उपलब्ध पेयजल का संवहनीय इस्तेमाल किया जायेगा.

विशेषज्ञों का मत है कि भूमि अवक्रमण को रोकने व पारिस्थितिकी की रक्षा करते हुए सौर ऊर्जा निर्माण किया जा सकता है. उदाहरण के तौर पर गुजरात में नर्मदा नदी की तर्ज पर इन्दिरा गांधी नहर परियोजना के ऊपर सोलर पैनल लगाये जा सकते हैं. इससे जहां एक तरफ पानी का वाष्पीकरण कम किया जा सकता है वहीं दूसरी तरफ सोलर प्लांट को जल आपूर्ति भी आसानी से की जा सकती है. नहर के दोनों किनारों पर आमतौर पर पेड़ व झाड़ समय समय पर साफ करवाए जाते है ताकि जड़े नहर को नुकसान न पहुंचाये. सोलर प्लांट इस स्थिति का लाभ उठा सकते हैं. भारतमाला परियोजना के बड़े क्षेत्राफल पर भी काफी मात्रा में सोलर पैनल लगवाये जा सकते हैं जिससे व्यवस्था को आय व ऊर्जा दोनों प्राप्त हो सकते है.

इन सभी विषयों के साथ हमें भविष्य में खराब व अनुपयोगी होने वाले सोलर पैनल्स के निस्तारण व्यवस्था के बारें में भी पुनर्विचार करना होगा. हमारी कचरा प्रबंधन नीतियां व व्यवस्थायें किसी से छुपी नहीं है. आज से 20-25 साल बाद का हमारा रेगिस्तान कैसा होगा? जिस प्रकार जैसलमेर, बाड़मेर में पवन ऊर्जा संयत्रा स्थापित करने के लिए भूमि के ह्रदय में बड़ी मात्रा में सीमेन्ट व कन्क्रीट इंजेक्ट कर दी गई है, उसी प्रकार सोलर प्लांट स्थापित करने के लिए भी सीमेंट व कन्क्रीट की आवश्यकता होती है. सोलर प्लांट की सफलता के लिए बार बार उग आने वाले झाड़ व पौद्यों को लगातार साफ किया जाता रहेगा, तो प्रकृति भी कब तक संघर्ष करेगी और हम बड़ी संकट भूमि निर्माण करेंगे. आज गैर कृषित भूमि से उडायी जा रही ये रेत कृषित व उपजाऊ भूमि की ओर धीरे धीरे पैर पसारती जा रही है. क्या हम भविष्य में बंजर हो चुके रेगिस्तान में एक बड़े कूड़ेदान का निर्माण करेंगे?

जलवायु परिवर्तन के वैश्विक संकंट में हमें ऊर्जा के गैर-परम्परागत साधनों की ओर निश्चित तौर पर बढ़ना होगा, जिसमें सौर ऊर्जा एक बेहतरीन विकल्प बना है, परन्तु पूंजीवादी व्यवस्था में यह वरदान भस्मासुरी रूप लेता हुआ प्रतीत हो रहा है. ग्रीन एनर्जी की ओर कदम बढ़ाने के साथ हमें पर्यावरण संरक्षण भी करना होगा तभी हम एक बेहतर कल का निर्माण कर सकेंगे.

फसल बीमा के लिए एक किसान पुत्री का संघर्ष

मैं एक किसान परिवार से ताल्लुक रखती हूं और खेती ही हमारा मुख्य व्यवसाय है। पिछले साल अतिवृष्टि के कारण राजस्थान के कई जिलों में किसानों की फसलें खराब हुई थी। हमारी भी हुई थी। चूंकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा करवा रखा था, अतः क्लेम के लिए आवेदन भी किया। एक उम्मीद थी कि बीमा क्लेम से इस क्षति की कुछ हद तक भरपाई हो जाएगी।

लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। कुछ दिनों पहले मेरे पिताजी का गांव (राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के निम्बाहेडा ब्लॉक का भावलियां गांव) से फोन आया कि एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया के नंबर 0141-4042999 पर लगातार फोन कर रहे हैं पर कोई उठाता ही नहीं है। तुम इस नंबर पर कोशिश करके देखना। नंबर जयपुर का है और संभव हो तो बीमा कंपनी के ऑफिस जाकर भी पता करना कि 2019 की अतिवृष्टि में खराब हुई फसलों का बीमा क्लेम अभी तक क्यों नहीं मिला है।

बैंक से पूछने पर कहा गया कि बीमा कंपनी से बात करो, हमें कोई जानकारी नहीं है। बीमा कंपनी की जानकारी मांगने पर भी बैंक से यही कहा गया कि बीमा कंपनी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। आप यानी कि किसान अपने स्तर पर पता करे। फसल बीमा के मामले में बैंक का ये रवैया हताश और हैरान करने वाला था।

इसके बाद मैंने कई बार कृषि बीमा कंपनी के नंबर पर फोन किया लेकिन किसी ने फोन उठाया नहीं। फिर बीमा कंपनी के नाम से गूगल पर सर्च किया और तब कहीं जाकर कंपनी के जयपुर ऑफिस में रीजनल मैनेजर का मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी मिला। मैंने उस मेल पर अंग्रेजी में एक लंबा मेल लिखा और पूछा कि साल भर बाद भी फसल बीमा का क्लेम क्यों नहीं मिला है। मैंने रीजनल मैनेजर के मोबाइल नंबर पर फोन भी किया और अंग्रेजी में उन्हें पूरा मामला बताया। यहां ये बताना जरूरी है कि अगर बातचीत और मेल अंग्रेजी में नहीं होते तो शायद मेरी बात सुनी ही न जाती।

खैर, दो दिन बाद मुझे बीमा कंपनी का एक मेल आता है कि आपके तीन खातों में से दो खातों की कोई जानकारी बैंक से नहीं मिली है और एक खाते की जानकारी अनुसार बीमा क्लेम मंजूर हो गया है। अतः क्लेम राशि एक सप्ताह के अंदर आपके बैंक खाते में पहुंच जाएगी। अन्य दो खातों के बारे में पूछने पर बीमा कंपनी के रीजनल मैनेजर ने बताया कि बैंक ने आधार विवरण नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस पोर्टल (एनसीआईपी) पर अपलोड नहीं किया होगा, इसलिए हमारे पास खातों की डिटेल नहीं पहुंची। जब कोई विवरण ही नहीं आया है तो दोनों खातों का बीमा भी नहीं हुआ है और इस वजह से क्लेम भी नहीं मिल सकता है। अब तो भारत सरकार का पोर्टल भी वर्ष 2019 के लिये बंद हो चुका है। इसे पुनः एक बार खोला गया था लेकिन बैंकों ने त्रुटियां नहीं सुधारी। अब इसमें हम कुछ नहीं कर सकते हैं।

जब मुझे पता चला कि दो खातों की डिटेल बैंक ने इंश्योरेंस पोर्टल पर अपलोड नहीं की है तो संबंधित बैंक शाखा (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, निम्बाहेडा, चित्तौड़गढ़) से वापस संपर्क किया। तब बैंक ने स्वीकार किया कि आधार विवरण पोर्टल पर अपलोड नहीं हो पाया, इसलिए बीमा नहीं हुआ है। जबकि किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) वाले किसानों का बीमा प्रीमियम काटकर बीमा कंपनी को जमा करना बैंक की जिम्मेदारी है। आधार वगैहरा की डिटेल भी बैंक को ही पोर्टल पर अपलोड करनी होती हैं। लेकिन बैंक इसमें चूक करे तो किसान कहां जाए?

यह बड़ी विचित्र स्थिति है। किसान सोचे बैठा है कि उसकी फसल का बीमा हो चुका है, लेकिन बैंक ने बीमा पोर्टल पर ब्यौरा ही अपलोड नहीं किया। वास्तव में, बीमा हुआ है या नहीं और फसल को नुकसान होने पर कितना क्लेम मिलेगा यह पता करने का किसान के पास कोई तरीका नहीं है। थक-हारकर मैंने कृषि विभाग, बैंक और बीमा कंपनी के आला अधिकारियों के साथ-साथ राजस्थान के कृषि मंत्री को एक ईमेल भेजा और पूरा मामला बताया।

ताज्जुब की बात है आज तक कि इनमें से केवल बीमा कंपनी का जवाब आया हैं, जिसमें यही कहा गया है कि अगर एनसीआईपी पोर्टल पर किसानों का डाटा अपलोड नहीं किया गया है तो उनका बीमा नहीं हुआ है। योजना के दिशा-निर्देशों के मुताबिक सिर्फ वित्तीय संस्था यानी बैंक ही किसानों का विवरण पोर्टल पर अपलोड कर सकते हैं। बैंक ने किसानों का ब्यौरा पोर्टल पर क्यों अपलोड नहीं किया, इसका कोई जवाब न तो बैंक के पास है और न ही कृषि विभाग या फसल बीमा कंपनी के पास। इस सवाल को लिए मैं इन तीनों के बीच जद्दाेजहद कर रही हूं।

सवाल ये है कि किसानों से आधार का विवरण लेने के बाद भी यदि बैंक उसे पोर्टल पर अपलोड नहीं करता है तो इसका जवाबदार कौन होगा? बैंक की लापरवाही या प्रक्रियागत त्रुटि का खामियाजा किसान क्यों भुगते? इस पूरे मामले में कृषि विभाग ने तो ईमेल का जबाव देना भी जरूरी नहीं समझा। चित्तौड़गढ़ कृषि उपनिदेशक को कई बार फोन किया लेकिन उन्होंने फोन उठाना ही बंद कर दिया।

ऐसी परिस्थितियों में किसान क्या करे? किससे शिकायत? किससे मदद की उम्मीद करे? बीमा प्रीमियम कटने के बाद भी पता चलता है कि बीमा हुआ ही नहीं? किसी ने बताना भी जरूरी नहीं समझा कि पोर्टल पर ब्यौरा अपलोड नहीं हुआ है। बैंक औेर बीमा कंपनी के बीच गफलत में किसान का बीमा गुम हो गया।

इस मामले में मैंने चित्तौड़गढ़ के सांसद से भी गुहार लगाई ताकि वे केंद्रीय कृषि मंत्री से पुनः पोर्टल खुलवाने का निवेदन करें। लेकिन उन्होंने भी वह चिट्ठी आगे नहीं भेजी है। राजस्थान के कृषि सचिव का कहना है कि जयपुर में उनसे आकर मिलो। जबकि कृषि आयुक्त को विस्तृत ईमेल किया जा चुका है। शायद मैं सचिव से मिल भी लूंगी लेकिन महामारी के दौरान कितने किसान राजस्थान के दूर-दराज इलाकों से जयपुर आकर सचिव से मिल सकते हैं? कितने किसान गूगल पर ईमेल खोजकर बैंक और बीमा कंपनियों के साथ इतना फोलोअप कर पाएंगे?

डिजिटल इंडिया के दौर में फसल बीमा के लिए किसानों को कैसे दर-दर भटकना पड़ता है, यह मैं खुद भुगत चुकी हूं। जबकि फसल बीमा की पूरी जानकारी मसलन कितना प्रीमियम कटा, कितना बीमा हुआ, कितना क्लेम बनता है इत्यादि किसानों को आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए। अगर फिर भी कोई दिक्कत है तो शिकायत निवारण की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए।

मैं पिछले एक महीने से फसल बीमा क्लेम के लिए जूझ रही हूं। मेरे पापा पढ़े-लिखे हैं, स्मार्टफोन चलाते हैं जब वो भी पता नहीं कर पाए कि क्लेम क्यों नहीं मिल पा रहा है तो आम किसानों की परेशानी का आप अंदाजा लगा सकते हैं। यह किसी एक किसान की व्यथा नहीं है। देश में न जानें कितने किसान ऐसे ही फसल बीमा से वंचित रह जाते होंगे।

गुजरात-राजस्थान में टिड्डियों का आतंक, कीट नियंत्रण जुगाड़ भरोसे

देश के दो बड़े राज्यों में टिड्डी दलों ने आतंक मचा रखा है। पाकिस्तान से आए टिड्डी दल गुजरात और राजस्थान में किसानों की हजारों करोड़ रुपये की फसल तबाह कर चुकी हैं। दोनों राज्यों में किसान सरकार से कीट नियंत्रण की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन कीट नियंत्रण के उपाय जुगाड़ भरोसे हैं। मामले के तूल पकड़ने के बाद गुरुवार को केंद्र सरकार ने टिड्डी नियंत्रण के लिए 11 टीमें गुजरात भेजी हैं। उधर, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने टिड्डी नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार से मदद मांगी है।

किसानों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए प्रशासन भी टिड्डयों से बचाव के तरह-तरह के उपाय आजमा रहा है। खबर है कि गुजरात के बनासकांठा जिले में टिड्डियां भगाने की जिम्मेदारी शिक्षकों को दी गई है।

गुजरात और राजस्थान में पिछले कई महीनों से टिड्डी दलों के हमले जारी है, लेकिन कीट नियंत्रण के सारे प्रयास महज कागजी खानापूर्ति तक सीमित हैं। उत्तरी अफ्रीका से निकलकर सऊदी अरब और पाकिस्तान होते हुए गुजरात और राजस्थान में घुसे टिड्डी दल गुजरात के कच्छ, मेहसाणा, पाटण, और बनासकांठा तक पहुंच चुके हैं। टिड्डियों के आक्रमण की वजह से कपास, गेहूं, सरसों, जीरा समेत कई फसलों को नुकसान हुआ है।

हैरानी की बात है कि गुजरात और राजस्थान में हर साल टिड्डयों हमले में बड़े पैमाने पर फसलों को नुकसान पहुंचता है, इसके बावजूद इससे बचाव का कोई पुख्ता उपाय न तो राज्य सरकारों के पास है और ना ही केंद्र सरकार इसमें कोई खास दिलचस्पी ले रही है। मजबूरी में किसान टिड्डियों को भगाने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं। थाली, ढोल और डीजे बजाकर टिड्डीयों को भगाने की कोशिश की जा रही है।

गहलोत में मांगी केंद्र से मदद

टिड्डी दलों के बढ़ते हमले के बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार से मदद मांगी है। उनका कहना है कि टिड्डी नियंत्रण का विषय मुख्यतः भारत सरकार के अधीन है। ऐसे में केन्द्र सरकार इस पर प्रभावी नियंत्रण के लिए राज्य सरकार को अतिरिक्त संसाधन एवं सहयोग उपलब्ध कराए। राजस्थान के जैसलमेर, बाड़मेर, जोधपुर, बीकानेर, नागौर, चुरू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और जालौर जिलों में  टिड्डी दलों का प्रकोप है।

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय के फसल सुरक्षा और टिड्डी चेतावनी से जुड़े कई कार्यालय राजस्थान में होने के बावजूद सब मूकदर्शक बने हुए हैं।