कृषि मंत्रालय ने प्राइवेट कंपनियों को सौंपी फसल बीमा की अहम जिम्मेदारी

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने प्राइवेट कंपनियों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से जुड़ी एक अहम जिम्मेदारी सौंपी है। यह पहल उपज की पैदावार के सही अनुमानों और समय पर बीमा दावों के निस्तारण के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से जुड़ी है। इसके लिए कृषि मंत्रालय ने तीन प्राइवेट कंपनियों की सेवाएं लेने का फैसला किया है जो राज्य सरकारों द्वारा किये गये फसल कटाई प्रयोग (सीसीई) का निरीक्षण करेंगी और खुद भी ऐसे प्रयोग कर सकती हैं।  

कृषि मंत्रालय की ओर 8 मार्च को राज्य सरकारों को भेज गये एक पत्र के अनुसार, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 13 राज्यों के 100 जिलों में ग्राम पंचायत स्तर पर तकनीक आधारित उपज अनुमानों के लिए प्रायोगिक अध्ययन कराये जा रहे हैं। इन अनुमानों की पुष्टि स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा कराने का निर्णय लिया गया है। इसके लिए तीन एजेंसियों – इंडियन एग्रीबिजनेस सिस्ट्म्स-एग्रीवॉच, आईएआर इंश्योरेंस सर्वेयर्स एंड लॉस असेसर्स प्राइवेट लिमिटेड और लीड्सकनेक्ट सविर्सेज प्राइवेट लिमिटेड को चुना गया है।

इस चयन का क्या आधार था? और इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनायी गई? इसकी जानकारी फिलहाल नहीं है। लेकिन ये एजेंसियां राज्य सरकार द्वारा किये गये फसल कटाई प्रयोगों का निरीक्षण करेंगी। इसके अतिरिक्त अपनी तरफ से भी ऐसे प्रयोग करेंगी। इन प्रयोगों के आधार पर फसल की पैदावार और जोखिम का आकलन किया जाता है। इस समूची प्रक्रिया में डेटा कलेक्शन की अहम भूमिका है, जिसके लिए रिमोट सेंसिंग, जीआईएस और डेटा एनालिटिक्स से जुड़ी तकनीक का इस्तेमाल होता है। इस तरह की टेक्नोलॉजी को कृषि के भविष्य के तौर पर भी देखा जा रहा है।      

स्वतंत्र एजेंसियों के चयन के बारे में कृषि मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को लिखा पत्र

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में शुरुआत से ही निजी क्षेत्र की भागीदारी रही है, इसलिए फसल कटाई प्रयोगों के निरीक्षण और अध्ययन में निजी क्षेत्र की भागीदारी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। कृषि मंत्रालय ने राज्य सरकारों से इन एजेंसियों को पूरा सहयोग देने का अनुरोध किया है। यह कदम कृषि मंत्रालय की उन कोशिशों का हिस्सा है जिसके तहत फसल बीमा दावों के समय पर निस्तारण के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है।

फसल कटाई प्रयोगों के लिए चुनी गई एजेंसियों में से एक लीड्स कनेक्ट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, कंपनी रिमोट सेंसिंग, जीआईएस, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और डेटा एनालिटिक्स जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से राज्य सरकार द्वारा किये गये क्रॉप कटिंग एक्सपेरीमेंट्स का सह-निरीक्षण करेगी। इसके अलावा कंपनी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुल 25 जिलों की ग्राम पंचायतों में फसल कटाई प्रयोग करेगी। लीड्स कनेक्ट के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक नवनीत रविकर का कहना है कि यह पारंपरिक डेटा कलेक्शन और रिमोट सेंसिंग तकनीक आधारित स्मार्ट सेंपलिंग कार्यप्रणाली का स्मार्ट सम्मिश्रण होगा। प्रबल संभावना है कि भविष्य में यह नई कार्यप्रणाली पारंपरिक विधि की जगह ले लेगी।

फसल बीमा के लिए उपज की पैदावार और नुकसान से जुड़े सही आंकड़े जुटाना बेहद महत्वपूर्ण है। आंकड़ों के आधार पर ही बीमा के जोखिम और सरकार द्वारा बीमा कंपनियों को होने वाले प्रीमियम के भुगतान का आकलन होता है। कृषि मंत्रालय की यह पहल डेटा कलेक्शन के इन्हीं प्रयासों से जुड़ी है।

गौर करने वाली बात यह भी है कृषि मंत्रालय ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और कृषि विश्वविद्यालयों के विशाल तंत्र की बजाय निजी क्षेत्र की कंपनियों पर भरोसा किया है। यह आईसीएआर और उसके संस्थानों की प्रासंगिकता पर भी एक सवालिया निशान है।

फसल बीमा के लिए ड्रोन उड़ाने की अनुमति, लेकिन क्यों लगे 5 साल?

पांच साल पहले 2016 में जब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू हुई तो इस योजना में ड्रोन के इस्तेमाल पर काफी जोर दिया गया था। कई वर्षों तक ड्रोन के इस्तेमाल को योजना की खूबियों में गिनाया गया। लेकिन ताज्जुब की बात है कि इस योजना के लिए ड्रोन के इस्तेमाल की अनुमति कृषि मंत्रालय को 18 फरवरी, 2021 को यानी पांच साल बाद मिली है। यह स्थिति तब है, जबकि अनुमति देने वाला और अनुमति लेने वाला मंत्रालय केंद्र सरकार के तहत काम करता है। इससे ड्रोन के उपयोग में आ रही कानूनी बाधाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नागर विमानन मंत्रालय की ओर से जारी आदेश के अनुसार, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत ड्रोन के जरिये देश के 100 जिलों में ग्राम पंचायत स्तर पर उपज अनुमान के आंकड़े जुटाने के लिए एयरक्राफ्ट रूल्स, 1937 से सशर्त छूट दी गई है। इससे पहले 29 जनवरी को नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने कृषि मंत्रालय को फसल बीमा योजना के लिए सुदूर संचालित विमान प्रणाली (आरपीएएस) यानी ड्रोन के उपयोग की अनुमति दी थी। यह अनुमति फिलहाल एक साल के लिए और कई तरह की पाबंदियों के साथ दी गई है।

इस बारे में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने ट्वीट किया था कि गेहूं और धान उत्पादक 100 जिलों में ड्रोन उड़ाने की अनुमति मिलने से फसल बीमा केे दावों का समय से निस्तारण सुनिश्चित होगा। इसमें कोई दोराय नहीं है कि कृषि में ड्रोन के उपयोग की कई संभावनाएं हैं। लेकिन सवाल यह है कि फिलहाल कृषि में ड्रोन का कितना उपयोग हो रहा है और इससे उत्पादकता और किसानों की आय पर क्या असर पड़ा है।

क्या होता है ड्रोन?

वास्तव में ड्रोन एक रिमोट संचालित एयक्राफ्ट सिस्टम (आरपीएएस) है जिसे अन्मैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) भी कहते हैं। इसका उपयोग कई वर्षों से डिफेंस, पुलिस और आपदा प्रबंंधन समेत क्षेत्रों में किया जा रहा है। इस तकनीक को कृषि के भविष्य के तौर पर देखा जा रहा है। कई स्टार्ट-अप कृषि में ड्रोन की संभावनाओं तलाश रहे हैं। इस लिहाज से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ड्रोन के इस्तेमाल की छूट मिलना एक अच्छी पहल है।

फसल बीमा योजना में ड्रोन का इस्तेमाल

सवाल यह है कि जिस योजना में पहले दिन से ड्रोन के इस्तेमाल की बात कही जा रही है, उसे हरी झंडी मिलने में पांच साल क्यों लग गये। कृषि मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव डॉ. आशीष कुमार भूटानी ने बताया कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में सेटैलाइट डेटा का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन खराब मौसम में सेटैलाइट की बजाय ड्रोन ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं, इसलिए 100 जिलों में ड्रोन के जरिये उपज उत्पादन और फसलों के नुकसान संबंधी आंकड़े जुटाए जाएंगे। कृषि मंत्रालय ने कुछ महीने पहले डीजीसीए को आवेदन किया था। इस प्रक्रिया में करीब तीन महीने का समय लगा है। क्योंकि नागर विमानन मंत्रालय और डीजीसीए के दिशानिर्देशों के अनुसार प्रस्ताव तैयार करना था।

नागर विमानन मंत्रालय में संयुक्त सचिव अंबर दुबे ने बताया कि सरकार कृषि, इन्फ्रास्ट्रक्चर, रूरल डेवलपमेंट और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में ड्रोन के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दे रही है। कृषि से जुड़ी कई परियोजनाओं में ड्रोन के उपयोग की अनुमति दी गई है। गत वर्ष टिड्डी नियंत्रण में ड्रोन का बखूबी इस्तेमाल हुआ था। कृषि मंत्रालय का प्रस्ताव 100 जिलों से संबंधित था, फिर भी इसे प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी दी गई है। अंबर दुबे का कहना है कि ड्रोन से जुड़े अप्रूवल में लोगों की सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ड्रोन के इस्तेमाल के लिए कृषि मंत्रालय ने 6 नवंबर, 2020 को डीजीसीए को पत्र लिखा था। मतलब, फसल बीमा योजना भले ही 2016 में लांच हुई, लेकिन ड्रोन के प्रयोग के लिए मंत्रालय 2019-20 में जाकर सक्रिय हुआ। कृषि मंत्रालय ने 2019 में फसल बीमा योजना में रिमोट सेंसिंग डेटा के उपयोग के लिए देश के 64 जिलों में एक पायलट स्टडी करायी थी। इसके आधार पर ही 100 जिलों में रिमोट सेंसिंग डेटा और ड्रोन तकनीक की मदद लेना का फैसला लिया गया। हालांकि, इस दौरान कुछ फसल बीमा कंपनियों ने अपने स्तर पर ड्रोन के इस्तेमाल के प्रयास भी किये हैैं।

ड्रोन के सामने नियमन की बाधाएं

दरअसल, ड्रोन रेगुलेशन और नियमन प्रक्रिया में देरी की वजह से 2014 से 2018 तक इस क्षेत्र की प्रगति काफी धीमी रही है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ड्रोन की मदद लेने में समय लगने के पीछे यह भी एक वजह है। इसके अलावा ड्रोन के मामले में नागर विमानन मंत्रालय, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की एप्रोच में भी अंतर है। कई बार इस वजह से भी मंजूरी मिलने में समय लगता है।

ड्रोन इंडस्ट्री भारत में कई साल से नियम-कायदों और पाबंदियों में उलझी रही है। जबकि दूसरी तरफ ड्रोन का गैर-कानूनी इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। ड्रोन को लेकर कई साल तक नीतिगत अस्पष्टता भी रही है। साल 2014 में भारत सरकार ने ड्रोन के गैर-सरकारी इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। हालांकि, इसके बावजूद चीन से आयातित हल्के ड्रोन की खरीद-बिक्री जारी रही। एक अनुमान के मुताबिक, देश में छोटे-बड़े करीब छह लाख ड्रोन हैं।

नए रेगुलेशन आने में कई साल बीते

2014 में ड्रोन पर पाबंदी लगने के बाद ड्रोन संबंधी रेगुलेशन जारी करने में सरकार को चार साल लगे। 27 अगस्त, 2018 रिमोट संचालित एयरक्राफ्ट सिस्टम (आरपीएएस) के लिए सिविल एविएशन रेगुलेशन (सीएपी) बने। इसके तहत 250 ग्राम से कम वजन के नैनो ड्रोन उड़ाने की छूट दी गई, जबकि 250 ग्राम से ज्यादा वजनी ड्रोन पर “नो परमिशन-नो टेक ऑफ” की नीति लागू कर दी। एक दिसंबर, 2018 से ड्रोन संचालन के लिए डिजिटल स्काई प्लेटफार्म पर रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया है।

डिजिटल स्काई पोर्टल पर ड्रोन ऑपरेटर और डिवाइस दोनों का रजिस्ट्रेशन होता है। हरेक उड़ान से पहले ऑपरेटर को फ्लाइट प्लान देना पड़ता है। सुरक्षा के लिहाज से विभिन्न क्षेत्रों को ग्रीन, येलो और रेड जोन में बांटा गया है। ग्रीन जोन में सिर्फ उड़ान की सूचना पोर्टल पर देनी होती है जबकि येलो जोन में उड़ान के लिए अनुमति लेनी पड़ती है। रेड जोन में ड्रोन उड़ाने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा ड्रोन के हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और संचालन संबंधी कई बाध्यताएं हैं।

कोरोना काल में काम आया ड्रोन

हालांकि, पिछले दो वर्षों में नागर विमानन मंत्रालय ने ड्रोन से जुड़े कई नीतिगत बदलाव किये हैं। डिजिटल स्काई पोर्टल के जरिये ड्रोन के रजिस्ट्रेशन और उड़ान अनुमति की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है। कोरोना संकट के दौरान राहत कार्यों के लिए सरकारी विभागों खासतौर पर पुलिस ने ड्रोन का खूब इस्तेमाल किया। ड्रोन के लिए मार्च, 2020 में डीजीसीए में भी एक गाइडेंस मैन्युअल जारी किया था। जिसके बाद जून में अन्मैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम रूल्स, 2020 जारी किये गये। फिलहाल देश में ड्रोन का संचालन इन्हीं नियमों के तहत होता है।

ड्रोन और इससे जुड़ी सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनी आईओटेकवर्ल्ड एविगेशन प्राइवेट लिमिटेड के तकनीकी निदेशक अनूप कुमार उपध्याय का कहना है कि नागर विमानन मंत्रालय ड्रोन से जुड़े रेगुलेशन को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा है। जिस तेजी से ड्रोन इंडस्ट्री बढ़ रही है, उसे देखते हुए सरकार को अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत है। अन्यथा ड्रोन का गैर-कानूनी इस्तेमाल बढ़ेगा।

कृषि में ड्रोन का इस्तेमाल

खेती में ड्रोन का इस्तेमाल फसलों की मॉनिटरिंग, फसल की तैयारी, उपज के अनुमान, आपदा प्रबंधन, कीट नियंत्रण और फसलों पर छिड़काव के लिए किया जाता है। सेंसर, कैमरा, स्प्रेयर और मानवरहित उड़ान भरने की क्षमता के चलते बहुत से कामों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

महाराष्ट्र समेत कई राज्य सरकारों ने कृषि में ड्रोन के इस्तेमाल के लिए प्रयास कर रही हैं। भारत सरकार ने हैदराबाद स्थित अंतर्राष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (इक्रीसेट) को ड्रोन के उपयोग की अनुमति दी है। स्काईमैट जैसी कई कंपनियां भी फसल और मौसम पूर्वानुमान के लिए ड्रोन की मदद ले रही हैं।

विशेष परिस्थितियों को छोड़कर भारत में ड्रोन के जरिये कीटनाशकों के छिड़काव की अनुमति नहीं है। यह कृषि के लिहाज से बड़ी बाधा है। इसके अलावा सख्त नियम-कायदे, महंगी कीमत, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और ट्रेनिंग संबंधी कई तरह की बाधाएं भी हैं। अब देखना है कि इन बाधाओं को पार कर कृषि क्षेत्र में ड्रोन कितने कारगर साबित हो पाते हैं।

फसल बीमा के लिए एक किसान पुत्री का संघर्ष

मैं एक किसान परिवार से ताल्लुक रखती हूं और खेती ही हमारा मुख्य व्यवसाय है। पिछले साल अतिवृष्टि के कारण राजस्थान के कई जिलों में किसानों की फसलें खराब हुई थी। हमारी भी हुई थी। चूंकि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत बीमा करवा रखा था, अतः क्लेम के लिए आवेदन भी किया। एक उम्मीद थी कि बीमा क्लेम से इस क्षति की कुछ हद तक भरपाई हो जाएगी।

लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली। कुछ दिनों पहले मेरे पिताजी का गांव (राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के निम्बाहेडा ब्लॉक का भावलियां गांव) से फोन आया कि एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया के नंबर 0141-4042999 पर लगातार फोन कर रहे हैं पर कोई उठाता ही नहीं है। तुम इस नंबर पर कोशिश करके देखना। नंबर जयपुर का है और संभव हो तो बीमा कंपनी के ऑफिस जाकर भी पता करना कि 2019 की अतिवृष्टि में खराब हुई फसलों का बीमा क्लेम अभी तक क्यों नहीं मिला है।

बैंक से पूछने पर कहा गया कि बीमा कंपनी से बात करो, हमें कोई जानकारी नहीं है। बीमा कंपनी की जानकारी मांगने पर भी बैंक से यही कहा गया कि बीमा कंपनी के बारे में कोई जानकारी नहीं है। आप यानी कि किसान अपने स्तर पर पता करे। फसल बीमा के मामले में बैंक का ये रवैया हताश और हैरान करने वाला था।

इसके बाद मैंने कई बार कृषि बीमा कंपनी के नंबर पर फोन किया लेकिन किसी ने फोन उठाया नहीं। फिर बीमा कंपनी के नाम से गूगल पर सर्च किया और तब कहीं जाकर कंपनी के जयपुर ऑफिस में रीजनल मैनेजर का मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी मिला। मैंने उस मेल पर अंग्रेजी में एक लंबा मेल लिखा और पूछा कि साल भर बाद भी फसल बीमा का क्लेम क्यों नहीं मिला है। मैंने रीजनल मैनेजर के मोबाइल नंबर पर फोन भी किया और अंग्रेजी में उन्हें पूरा मामला बताया। यहां ये बताना जरूरी है कि अगर बातचीत और मेल अंग्रेजी में नहीं होते तो शायद मेरी बात सुनी ही न जाती।

खैर, दो दिन बाद मुझे बीमा कंपनी का एक मेल आता है कि आपके तीन खातों में से दो खातों की कोई जानकारी बैंक से नहीं मिली है और एक खाते की जानकारी अनुसार बीमा क्लेम मंजूर हो गया है। अतः क्लेम राशि एक सप्ताह के अंदर आपके बैंक खाते में पहुंच जाएगी। अन्य दो खातों के बारे में पूछने पर बीमा कंपनी के रीजनल मैनेजर ने बताया कि बैंक ने आधार विवरण नेशनल क्रॉप इंश्योरेंस पोर्टल (एनसीआईपी) पर अपलोड नहीं किया होगा, इसलिए हमारे पास खातों की डिटेल नहीं पहुंची। जब कोई विवरण ही नहीं आया है तो दोनों खातों का बीमा भी नहीं हुआ है और इस वजह से क्लेम भी नहीं मिल सकता है। अब तो भारत सरकार का पोर्टल भी वर्ष 2019 के लिये बंद हो चुका है। इसे पुनः एक बार खोला गया था लेकिन बैंकों ने त्रुटियां नहीं सुधारी। अब इसमें हम कुछ नहीं कर सकते हैं।

जब मुझे पता चला कि दो खातों की डिटेल बैंक ने इंश्योरेंस पोर्टल पर अपलोड नहीं की है तो संबंधित बैंक शाखा (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, निम्बाहेडा, चित्तौड़गढ़) से वापस संपर्क किया। तब बैंक ने स्वीकार किया कि आधार विवरण पोर्टल पर अपलोड नहीं हो पाया, इसलिए बीमा नहीं हुआ है। जबकि किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) वाले किसानों का बीमा प्रीमियम काटकर बीमा कंपनी को जमा करना बैंक की जिम्मेदारी है। आधार वगैहरा की डिटेल भी बैंक को ही पोर्टल पर अपलोड करनी होती हैं। लेकिन बैंक इसमें चूक करे तो किसान कहां जाए?

यह बड़ी विचित्र स्थिति है। किसान सोचे बैठा है कि उसकी फसल का बीमा हो चुका है, लेकिन बैंक ने बीमा पोर्टल पर ब्यौरा ही अपलोड नहीं किया। वास्तव में, बीमा हुआ है या नहीं और फसल को नुकसान होने पर कितना क्लेम मिलेगा यह पता करने का किसान के पास कोई तरीका नहीं है। थक-हारकर मैंने कृषि विभाग, बैंक और बीमा कंपनी के आला अधिकारियों के साथ-साथ राजस्थान के कृषि मंत्री को एक ईमेल भेजा और पूरा मामला बताया।

ताज्जुब की बात है आज तक कि इनमें से केवल बीमा कंपनी का जवाब आया हैं, जिसमें यही कहा गया है कि अगर एनसीआईपी पोर्टल पर किसानों का डाटा अपलोड नहीं किया गया है तो उनका बीमा नहीं हुआ है। योजना के दिशा-निर्देशों के मुताबिक सिर्फ वित्तीय संस्था यानी बैंक ही किसानों का विवरण पोर्टल पर अपलोड कर सकते हैं। बैंक ने किसानों का ब्यौरा पोर्टल पर क्यों अपलोड नहीं किया, इसका कोई जवाब न तो बैंक के पास है और न ही कृषि विभाग या फसल बीमा कंपनी के पास। इस सवाल को लिए मैं इन तीनों के बीच जद्दाेजहद कर रही हूं।

सवाल ये है कि किसानों से आधार का विवरण लेने के बाद भी यदि बैंक उसे पोर्टल पर अपलोड नहीं करता है तो इसका जवाबदार कौन होगा? बैंक की लापरवाही या प्रक्रियागत त्रुटि का खामियाजा किसान क्यों भुगते? इस पूरे मामले में कृषि विभाग ने तो ईमेल का जबाव देना भी जरूरी नहीं समझा। चित्तौड़गढ़ कृषि उपनिदेशक को कई बार फोन किया लेकिन उन्होंने फोन उठाना ही बंद कर दिया।

ऐसी परिस्थितियों में किसान क्या करे? किससे शिकायत? किससे मदद की उम्मीद करे? बीमा प्रीमियम कटने के बाद भी पता चलता है कि बीमा हुआ ही नहीं? किसी ने बताना भी जरूरी नहीं समझा कि पोर्टल पर ब्यौरा अपलोड नहीं हुआ है। बैंक औेर बीमा कंपनी के बीच गफलत में किसान का बीमा गुम हो गया।

इस मामले में मैंने चित्तौड़गढ़ के सांसद से भी गुहार लगाई ताकि वे केंद्रीय कृषि मंत्री से पुनः पोर्टल खुलवाने का निवेदन करें। लेकिन उन्होंने भी वह चिट्ठी आगे नहीं भेजी है। राजस्थान के कृषि सचिव का कहना है कि जयपुर में उनसे आकर मिलो। जबकि कृषि आयुक्त को विस्तृत ईमेल किया जा चुका है। शायद मैं सचिव से मिल भी लूंगी लेकिन महामारी के दौरान कितने किसान राजस्थान के दूर-दराज इलाकों से जयपुर आकर सचिव से मिल सकते हैं? कितने किसान गूगल पर ईमेल खोजकर बैंक और बीमा कंपनियों के साथ इतना फोलोअप कर पाएंगे?

डिजिटल इंडिया के दौर में फसल बीमा के लिए किसानों को कैसे दर-दर भटकना पड़ता है, यह मैं खुद भुगत चुकी हूं। जबकि फसल बीमा की पूरी जानकारी मसलन कितना प्रीमियम कटा, कितना बीमा हुआ, कितना क्लेम बनता है इत्यादि किसानों को आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए। अगर फिर भी कोई दिक्कत है तो शिकायत निवारण की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए।

मैं पिछले एक महीने से फसल बीमा क्लेम के लिए जूझ रही हूं। मेरे पापा पढ़े-लिखे हैं, स्मार्टफोन चलाते हैं जब वो भी पता नहीं कर पाए कि क्लेम क्यों नहीं मिल पा रहा है तो आम किसानों की परेशानी का आप अंदाजा लगा सकते हैं। यह किसी एक किसान की व्यथा नहीं है। देश में न जानें कितने किसान ऐसे ही फसल बीमा से वंचित रह जाते होंगे।