BBC डॉक्यूमेंट्री पर भारत द्वारा प्रतिबंध अघोषित आपातकाल की मुनादी है!

साल 2002 में गुजरात के मुस्लिम-विरोधी दंगों पर आधारित बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री  ‘द मोदी क्वेश्चन’ पर भारत सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की आलोचना को दबाने की एक और कोशिश है. पिछले हफ्ते, बीबीसी ने अपनी डॉक्यूमेंट्री के दो भाग का पहला भाग “द मोदी क्वेश्चन” प्रसारित  किया. यह डॉक्यूमेंट्री यूनाइटेड किंगडम के विदेश, राष्ट्रमंडल और विकास विभाग की एक पूर्व अप्रकाशित रिपोर्ट के निष्कर्षों को उजागर करती है, जिसमें 2002 के दंगों, जब प्रधानमंत्री मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, की जांच की गई थी. डॉक्यूमेंट्री के प्रसारण के तुरंत बाद, भारत सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी नियमों के तहत आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों को भारत में यह वीडियो हटाने के लिए मजबूर किया.

फरवरी 2002 में, कुछ मुसलमानों द्वारा एक ट्रेन, जिसमें हिंदू तीर्थयात्री सवार थे, पर हमले के बाद पूरे गुजरात में बदले की कार्रवाइयों में बलात्कार और हत्याएं की गई थीं. खबरों के मुताबिक दंगों में 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें से अधिकांश मुस्लिम थे. ऐसे आरोप लगाए गए कि राज्य सरकार ने मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की रोकथाम के लिए कार्रवाई नहीं की. प्रायः इस हिंसा का नेतृत्व मोदी की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) या इसके सहयोगी संगठनों के नेताओं ने किया. इस घटना की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आलोचना हुई. यूके की रिपोर्ट में पाया गया है कि जिस माहौल में हिंसा हुई, उस “बेख़ौफ़ माहौल” के लिए मोदी “सीधे तौर पर जिम्मेदार” थे. ब्रिटेन समेत अनेक विदेशी सरकारों ने उस समय मोदी से किसी प्रकार के संबंध पर रोक लगा दी थी, जबकि अमेरिका ने उनका वीजा रद्द कर दिया था.

2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद सब कुछ बदल गया. भारतीय अधिकारियों और भाजपा समर्थकों ने उनकी छवि सुधारने के लिए कड़ी मेहनत की. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारतीय राजनयिक मानवाधिकारों के गंभीर हनन में मोदी की संलिप्तता की किसी भी आलोचना का सख्त विरोध करते हैं.

2022 में, भारत के सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक साजिश साबित करने संबंधी पर्याप्त सबूत नहीं होने के पुलिस जांच निष्कर्षों की पुष्टि करते हुए, मोदी को आपराधिक जिम्मेदारी के आरोपों से मुक्त कर दिया.

लेकिन घाव तभी भरते और मानवाधिकार संबंधी दायित्व पूरे होते हैं जब न्याय और गलतियों में सुधार के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता हो. इसके बजाय, बीजेपी समर्थकों ने 2002 के दंगों में सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषी लोगों को सम्मानित किया. हिंदू श्रेष्ठता की भाजपा की विचारधारा ने न्याय प्रणाली और मीडिया में घुसपैठ कर ली है. इसने पार्टी समर्थकों को इस तरह लैस कर दिया है कि वे धार्मिक अल्पसंख्यकों, खास तौर से मुसलमानों को बेखौफ होकर धमकाएं, हैरान-परेशान करें और उन पर हमला करें. मोदी सरकार ने मुसलमानों के खिलाफ भेदभावपूर्ण कानून और नीतियां लागू की है और स्वतंत्र संस्थानों पर अंकुश लगाने की कोशिश की है. इसने अपने आलोचकों को जेल में डालने के लिए अक्सर कठोर कानूनों का इस्तेमाल किया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने विकास और रणनीतिक साझेदारी के लिए भारत के साथ अंतर्राष्ट्रीय जुड़ाव पर जोर दिया है. लेकिन भारत की छवि तब बेहतर होगी अगर सरकारी तंत्र तमाम भारतीयों के अधिकारों – और इन मुद्दों पर जनता का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश कर रहे लोगों के अधिकारों – की रक्षा के लिए अधिक-से-अधिक प्रयास करे.

विपक्ष को हल्के में नहीं ले सकते: पीएम मोदी

2024 लोकसभा चुनाव और इस साल होने वाले 9 राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर बीजेपी कमर कसती दिखाई दे रही है. दिल्ली में बीजेपी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी नेताओं को गलत बयानबाजी से बचने की नसीहत दी. मोदी ने पार्टी नेताओं को संबोधित करते हुए कहा कि हमें पसमांदा, बोहरा मुस्लिम और अन्य मुस्लिम समाज के लोगों के बीच जाकर उनसे संवाद करना चाहिए. हमें वोट की चाह के बिना समाज में हाशिये पर खड़े लोगों के बीच जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि “हमें सिख, ईसाई समुदाय के लोगों के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करानी है. मोदी ने कहा चुनाव में केवल 400 दिन बचे हैं ऐसे में हमें समाज के कमजोर वर्गों के बीच जाकर काम करना होगा.

वहीं मोदी ने विपक्ष को हल्के में नहीं लेने और विपक्ष से सतर्क रहने की नसीहत देते हुए कहा कि 1998 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से सीख लेनी चाहिए कैसे हम कांग्रेस पार्टी की लहर नहीं होने के चलते भी चुनाव हार गए थे.

वहीं मोदी ने 18 से 25 साल के युवा वर्ग को भी साधने की बात पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि हमें 18 से 25 साल के युवा वर्ग तक पहुंच बनानी होगी इस युवा वर्ग को पिछली सरकार के भ्रष्ट्राचार और नाकामयाबियों के बारे में बताना होगा. साथ ही मोदी ने पार्टी के लोगों को अलग-अलग क्षेत्रों के पेशेवर लोगों से मिलने और उनसे जुड़ने के लिए विश्वविद्यालयों और चर्चों जैसे स्थानों पर भी जाने के लिए कहा.

5 साल में केंद्र सरकार ने मीडिया को विज्ञापन के लिए दिये 3 हजार 305 करोड़!

भारत सरकार ने पांच सालों, यानी 2017 से 2022 के बीच प्रिंट मीडिया को 1736 करोड़ और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को 1569 करोड़ रुपए के विज्ञापन दिए हैं. यानी इस दौरान भारत सरकार द्वारा कुल 3305 करोड़ रुपए विज्ञापनों पर खर्च किए गए. यह जानकारी राज्यसभा में पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने दी है.

वहीं वित्त वर्ष 2022-23 में 12 जुलाई तक प्रिंट मीडिया को 19.26 करोड़ तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को 13.6 करोड़ रुपए के विज्ञापन दिए जा चुके हैं.

28 जुलाई को राज्यसभा में कांग्रेस के सांसद जी सी चंद्रशेखर ने सवाल पूछा कि सरकार द्वारा वर्ष 2017 से आज तक, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक विज्ञापनों पर व्यय का वर्षवार और मंत्रालय वार आंकड़ा क्या है?

सरकार की ओर से इसका जवाब केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिया. उनके जवाब के मुताबिक 2017 से 2022 के बीच प्रिंट मीडिया पर 1736 करोड़ और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर 1569 करोड़ रुपए विज्ञापन पर खर्च हुए. वहीं वित्त वर्ष 2022-23 में 12 जुलाई तक प्रिंट को 19.26 करोड़ तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को 13.6 करोड़ के विज्ञापन दिए गए हैं. ये सभी विज्ञापन केंद्रीय संचार ब्यूरो (सीबीसी) के माध्यम से दिए गए.

इस खर्च को अगर वर्षवार देखें तो 2017-18 में प्रिंट मीडिया को 636.36 करोड़ तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को 468.92 करोड़, 2018-19 में प्रिंट मीडिया को 429.55 करोड़ और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को 514.28 करोड़, 2019-20 में प्रिंट मीडिया को 295.05 करोड़ और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को 317.11 करोड़, 2020-21 में प्रिंट को 197.49 करोड़ और इलेक्ट्रॉनिक को 167.86 करोड़ तथा 2021-22 में प्रिंट को 179.04 करोड़ रुपए और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को 101.24 करोड़ रुपए विज्ञापनों के लिए दिए गए.

वहीं वित्त वर्ष 2022-23 में 12 जुलाई तक, प्रिंट मीडिया के विज्ञापनों पर 19.26 करोड़ रुपए और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विज्ञापनों पर 13.6 करोड़ रुपए सरकार के द्वारा खर्च किए गए.

अनुराग ठाकुर ने मंत्रालय वार खर्च के आंकड़े भी दिए हैं. 2017 से 12 जुलाई 2022 तक के आंकड़ों के मुताबिक 615.07 करोड़ रुपए के साथ विज्ञापनों पर सबसे ज्यादा खर्च वित्त मंत्रालय द्वारा किया गया. इस मामले में दूसरे नंबर पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय है. जिसने इस अवधि में 506 करोड़ रुपए विज्ञापन पर खर्च किए. तीसरे नंबर पर स्वास्थ्य मंत्रालय रहा, जिसकी ओर से 411 करोड़ रुपए विज्ञापन पर खर्च किए गए.

वहीं रक्षा मंत्रालय ने 244 करोड़, महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने 195 करोड़, ग्रामीण विकास मंत्रालय ने लगभग 176 करोड़ और कृषि मंत्रालय ने 66.36 करोड़ रुपए विज्ञापनों पर खर्च किए. रोजगार एवं श्रम मंत्रालय ने भी लगभग 42 करोड़ खर्च किए. हालांकि इसी दौरान कोरोना के कारण लाखों की संख्या में मज़दूरों का पलायन भी हुआ था.

जी सी चंद्रशेखर ने सरकार द्वारा विदेशी मीडिया में विज्ञापन पर किए गए खर्च की जानकारी भी मांगी. इसके जवाब में अनुराग ठाकुर ने बताया कि भारत सरकार के किसी विभाग या मंत्रालय द्वारा, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के माध्यम से विदेशी मीडिया में विज्ञापन पर कोई व्यय नहीं किया गया है.

साभार- न्यूजलॉंड्री

टिकैत के आंसू निकले तो पीएम के होंठों पर हंसी थी: प्रियंका गांधी

कृषि कानूनों के खिलाफ तीन महीने से दिल्ली की सरहदों पर चल रहा किसान आंदोलन अब उत्तर भारत की राजनीति में हलचल मचा रहा है। किसान यूनियनों के साथ-साथ विपक्ष के नेता किसान पंचायतें को जरिये अपनी राजनीतिक जमीन को पुख्ता करने में जुटे हैं।

इसी क्रम में 20 फरवरी को मुजफ्फरनगर जिले के बघरा में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने एक किसान पंचायत को संबोधित किया। इस मौके पर प्रियंका गांधी को सुनने भारी संख्या में पहुंचे किसानों को देखकर कांग्रेसी गदगद थे। इससे पहले बिजनौर के चांदपुर और सहारनपुर के चिलकाना में भी प्रियंका गांधी की किसान पंचायतों में अच्छी खासी भीड़ जुटी थी।

प्रियंका गांधी ने किसानों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर जमकर प्रहार किये। उन्होने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री जिन कानूनों को किसान हितैषी बता रहे हैं, वे किस किसान से पूछकर बनाये। कृषि कानूनों के खिलाफ जोरदार हुंकार भरते हुए प्रियंका गांधी ने किसानों का साथ देने का वादा किया।

किसान आंदोलन को लेकर सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा कि जो किसान अपने बेटे को देश की रखवाली करने भेजता है उसे देशद्रोही, आतंकवादी कहा गया। जब चौधरी टिकैत की आंखों में आंसू आते हैं तो हमारे प्रधानमंत्री जी के होठों पर मुस्कान आती है। उन्हें मजाक सूझता है। जो प्रधानमंत्री अमेरिका जा सकते थे, पाकिस्तान जा सकते थे, चीन जा सकते थे वो किसानों के आंसू पोंछने उन तक नहीं जा पाये।

आज प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना कहानियों के अहंकारी राजा से कर डाली जो किसी की नहीं सुनता। उन्होंने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री की राजनीति सिर्फ अपने लिए और अपने खरबपति मित्रों के लिए है।

मुजफ्फरनगर किसान पंचायत में प्रियंका गांधी ने गन्ने के दाम और बकाया भुगतान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि पूरे देश में गन्ने का बकाया भुगतान 15 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। लेकिन सरकार ने पीएम के दुनिया घूमने के लिए दो हवाई जहाज खरीदे हैं, जिनकी कीमत 16 हजार करोड़ रुपये है।

किसानों की दुखती रग पर हाथ रखते हुए प्रियंका गांधी ने डीजल, खाद, बीज की महंगाई का मुद्दा उठाया। साथ ही नए कृषि कानूनों से मंडियों के खत्म होने और पूंजीपतियों की मनमानी का डर भी दिखाया। उन्होंने कहा कि आज किसानों के घरों से लूट हो रही है और प्रधानमंत्री के दो पूंजीपति मित्रों को पूरी छूट दी गई है।

इस किसान पंचायत में शामिल हुए लोगों का कहना है कि लंबे अरसे के बाद मुजफ्फरनगर में कांग्रेस की किसी सभा में इतनी भीड़ जुटी। प्रियंका गांधी की इन सभाओं से पश्चिमी यूपी में शिथिल पड़े कांग्रेस संगठन में नई जान आ सकती है। हालांकि, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल भी किसान आंदोलन से उपजी लहर को भुनाने का प्रयास कर रहे हैं।