किसान आंदोलन: निर्णायक संघर्ष या एक नई शुरुआत?

भारत में तीन नए कृषि कानून लगभग 20 करोड़ छोटे किसानों और उनके परिवारों के लिए निर्णायक संघर्ष साबित हो रहे हैं। अपनी आजीविका के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से खेती पर निर्भर लगभग 80 करोड़ की ग्रामीण आबादी के लिए भी इसके गंभीर निहितार्थ हैं। इसके अलावा, 135 करोड़ की आबादी वाले देश की खाद्य सुरक्षा को लेकर भी कई चिंताएं जताई ज रही हैं। भारत सरकार का कहना है कि ये कानून संकटग्रस्त कृषि क्षेत्र में एक नई आर्थिक क्रांति की शुरूआत करेंगे। जबकि किसान इनका विरोध कर रहे हैं क्योंकि कॉरपोरेट को बढ़ावा दिये जाने से उन्हें सरकारी मंडियों के खत्म होने और अपनी जमीन खोने का खतरा है।

फिलहाल, भारत सरकार 22 प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का ऐलान कर कृषि उपज मंडियों के जरिये इन्हें किसानों से खरीदने की व्यवस्था करती है। असल में यह व्यवस्था केवल 2-4 फसलों और देश के कुछ ही हिस्सों खासकर पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और तेलंगाना आदि में लागू है। बाकी फसलों पर किसानों को एमएसपी नहीं मिल पाता है क्योंकि उनकी सरकारी खरीद की कोई व्यवस्था नहीं है।

मौटे तौर पर सरकार केवल धान और गेहूं की एमएसपी पर खरीद करती है, जिसका इस्तेमाल दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक वितरण प्रणाली (टीपीडीएस) के जरिये आबादी के बड़े हिस्से विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों को सस्ता अनाज मुहैया कराने के लिए किया जाता है। इस प्रकार एमएसपी पर खरीद सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा मामला भी है।

इस प्रणाली का फायदा यह है कि किसानों को उनकी उपज का सुनिश्चित दाम मिलता है। जबकि गरीब उपभोक्ताओं को बहुत ही रियायती दरों पर अनाज मुहैया कराया जाता है। लेकिन इसकी कमी यह है कि एमएसपी केवल दो मुख्य फसलों और मुख्यत: उत्तर भारत के राज्यों में मिलता है। इसलिए किसान साल-दर-साल गेहूं और धान ही उगाते रहते हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य के रूप में धान और गेहूं को सरकारी प्रोत्साहन ने प्राकृतिक संसाधनों पर बुरा असर डाला है। इससे मिट्टी की सेहत खराब हुई है, भूजल स्तर गिर गया है और फसल विविधता घटकर दो फसलों तक सीमित रह गई है।

कृषि कानूनों पर सरकार समर्थक पक्ष का तर्क है कि एमएसपी के परिणामस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हुआ है, इसलिए एमएसपी को खत्म कर देना चाहिए। बाजार के दरवाजे सभी खरीदारों के लिए खुले होने चाहिए। दूसरी तरफ किसानों की मांग है कि एमएसपी सभी फसलों के लिए होना चाहिए और सभी फसलों की एमएसपी पर खरीद होनी चाहिए। तभी किसान बाकी फसलें उगाएंगे और फसल विविधता को बढ़ावा मिल सकेगा।

इस प्रकार किसान प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और फसल विविधता को बनाये रखने में सक्षम हो पाएंगे। यह खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण सुरक्षा दोनों के लिए कारगर रहेगा। इतना ही नहीं सरकारी मंडियों के जरिये एमएसपी पर खरीद की व्यवस्था को पूरे देश में लागू करने की जरूरत है, ताकि पूरे देश में किसानों को उपज का उचित दाम मिल सके और उनकी आमदनी बढ़े।

इसके विपरीत, भारत सरकार किसानों को भरोसे में लिए बगैर धीरे-धीरे एमएसपी से हाथ खींचने वाले कृषि कानून लेकर आई। छोटे किसानों को बड़े कॉरपोरेट के साथ अनुबंध का रास्ता दिखाया जा रहा है, जबकि किसानों के पास न तो कॉरपोरेट से मोलभाव की ताकत है और न ही कानून और मार्केटिंग के विशेषज्ञों की टीम। इसलिए किसानों को डर है कि कृषि कानून लागू हो गये तो उनकी आजीविका का एकमात्र सहारा उनकी जमीन छिन जाएगी।

संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों की सामाजिक-आर्थिक खुशहाली और आजीविका में सुधार की वकालत करते हैं। इनका जोर सबको पोषणयुक्त आहार उपलब्ध कराने पर है। इन लक्ष्यों को पूरा करने में छोटे किसानों की भूमिका को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की अगुवाई वाले ‘इकोसिस्टम एंड इकोनॉमिक्स फॉर बायोडायवर्सिटी फॉर एग्रीकल्चर एंड फूड’ (TEEBAgriFood) जैसे प्रयासों ने मान्यता दी है।

भारत में सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने और खाद्य व पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में किसानों की भूमिका को मजबूत करने की आवश्यकता है। अधिकांश शहरी आबादी और भारतीय नीति निर्माता यह पहचानने में विफल रहे हैं कि छोटे किसान भारत में 41 फीसदी श्रमबल को रोजगार देते हैं। जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों पर 20 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

वास्तव में, किसान भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं और लगभग 80 करोड़ की ग्रामीण आबादी को सहारा देते हैं। 2018 में भारत के किसानों ने लगभग 20 लाख करोड़ रुपये की कृषि उपज पैदा की, जिनमें से अधिकांश के पास 5 एकड़ से कम जमीन है। (भारत में कुल कृषि योग्य भूमि लगभग 40 करोड़ एकड़ है)। भारत में किसानों को मिलने वाली सब्सिडी ज्यादातर कीटनाशकों और उर्वरकों के लिए दी जाती है जो प्रति एकड़ लगभग 2070 रुपये बैठती है। यह न सिर्फ नाकाफी है बल्कि सभी किसानों को मिल भी नहीं पाती है।

सोचने वाली बात यह है कि यदि देश में छोटे किसान नहीं बचेंगे तो ग्रामीण क्षेत्रों के कामगार कहां जाएगा? गांवों से शहरी क्षेत्रों में पलायन के कारण शहरों पर पहले ही अत्यधिक बोझ है।

यह किसान आंदोलन विश्व समुदाय, वैज्ञानिकों, नेताओं, मशहूर हस्तियों और आम जनता का ध्यान खींचने में कामयाब रहा है। किसानों के विरोध-प्रदर्शन और दृढ़ता ने खेती-किसानी के मुद्दों पर चर्चा का अवसर दिया है जो एक नई शुरुआत का अवसर बन सकता है। अगर किसानों से बातचीत कर सही कदम उठाये जाएं तो छोटे किसानों की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है।


(डॉ हरपिंदर संधू कृषि अर्थशास्त्री और पर्यावरण विशेषज्ञ हैं जो दक्षिण ऑस्ट्रेलिया विश्वविद्यालय, एडिलेड में पढ़ाते हैं। यह लेख foodtank.comपर प्रकाशित उनके अंग्रेजी लेख का अनुवाद है। डॉ. संधू से उनके ट्विटर https://twitter.com/001harpinder पर संपर्क कर सकते हैं।)

खेतों तक पहुंचा किसान आंदोलन, किसान ने खड़ी फसल जोत डाली

केंद्र के तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान विरोध-प्रदर्शन के नए-नए तरीके आजमा रहे हैं। बिजनौर के एक किसान ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जताते हुए अपनी खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाकर दिया।

बिजनौर की चांदपुर तहसील के गांव कुल्चाना निवासी किसान सोहित ने छह बीघा खेत में खड़ी गेहूं की फसल जोत दी है। उसका कहना है कि सरकार किसान की सुनने को तैयार नहीं है। फसल मिट्टी में मिलाने के बाद किसान का कहना है कि वह आंदोलन के समर्थन में दिल्ली बॉर्डर पर जाएगा।

किसान सोहित ने बताया कि उसके पास 13 बीघे गेहूं की फसल थी। जिसमें से सात बीघा छोड़कर बाकी छह बीघा गेहूं को खेत में ही जोत दिया है। भाकियू युवा के प्रदेश अध्‍यक्ष दिगम्‍बर सिंह ने बताया कि किसान भाकियू का कार्यकर्ता है। वे किसानों को आवेश में इस तरह का कोई कदम न उठाने के लिए समझा रहे हैं।

गौरतलब है कि कल भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने किसानों को एक फसल की कुर्बानी देने के लिए तैयार रहने को कहा था। इससे पहले हरियाणा के खरक पुनिया में किसान महापंचायत को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत ने कहा था कि सरकार ऐसी गलतफहमी में न रहे कि किसान फसल काटने के लिए वापस चले जाएंगे। अगर सरकार ने दबाव बनाया तो हम अपनी फसल को आग लगा देंगे।

राकेश टिकैत ने शनिवार को फिर दोहराया कि जब तक बिल वापसी नहीं, तब तक घर वापसी नहीं। उन्होंने कहा कि खेतों में भी काम प्रभावित ना हो, इसके लिए रणनीति तैयार कर ली है। किसान बारी-बारी से आंदोलन स्थल पर आते-जाते रहेंगे। जो किसान आंदोलन में रहेगा, गांव वाले उसके खेत और काम का पूरा ध्यान रखेंगे। टिकैत ने किसानों से कहा है कि कृषि कार्य के दबाव में आंदोलन को ठंडा न होने दें।

अभी सिर्फ तैयार रहे, फसल नष्ट न करें: राकेश टिकैत

बिजनौर में एक किसान द्वारा फसल नष्ट जाने के सवाल पर राकेश टिकैत ने कहा कि ऐसा करना ठीक नहीं है। हमने अभी केवल आह्वान किया है कि किसान आंदोलन के लिए अपनी एक फसल कुर्बान करने को तैयार रहें। इसका मतलब यह नहीं है कि फसल में आग लगा दें, नहीं। आंदोलन के लिए जरूरत पड़ी तो फसल का मोह छोड़ने को तैयार रहें। हालांकि, अभी आंदोलन उस स्थिति में नहीं है। यह आह्वान बहुत विपरीत स्थिति के लिए किया गया था। उन्होंने किसानों से अपील की है कि आवेश में आकर कोई आत्मघाती कदम न उठाएं।

रेल रोकी, यात्रियों पर फूल बरसायें और समय पर ट्रैक खाली कर दिये

आज किसानों के रेल रोको अभियान के साथ भी ऐसा ही हुआ। ज्यादातर रेलगाड़ियों की आवाजाही सामान्य रहने के दावे को प्रदर्शन की नाकामी के तौर पर पेश किया जा रहा है। जबकि पंजाब में कई महीनों तक रेल ठप रहने पर किसान आंदोलन की खूब आलोचना हुई थी। इस बार रेलगाड़ियों को लंबे समय तक नहीं रोका गया। न कोई तोड़फोड़ हुई और न ही यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। रेल रोकने का प्रयास करने वाले कई आंदोलनकारियों को बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में पुलिस ने हिरासत में जरूर लिया। लेकिन इस दौरान किसी हिसंक घटना की जानकारी नहीं है। कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर आंदोलन शांतिपूर्ण रहा।

आज संयुक्त किसान मोर्चा का रेल रोको आंदोलन कितना सफल या कितना असफल रहा, यह देखने के नजरिये पर निर्भर करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि आंदोलन का असर कई राज्यों में दिखा। कई जगह महिलाओं ने नेतृत्व किया। दिन भर रेल लाइनों पर किसानों के जमावड़े की तस्वीरें आती रही। कहीं रेल यात्रियों पर फूल बरसाये गये तो कहीं यात्रियों को चाय-पानी पिलाकर आंदोलनकारियों ने उन तक अपने मुद्दे पहुंचाने की कोशिश की। कहीं जलेबियां बंट रही थी, तो कहीं आंदोलन के गीतों पर किसान झूम रहे थे।

क्या यह सब सफल आंदोलन के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है? देश में सैकड़ों जगह कृषि कानूनों के विरोध में किसान इकट्ठा हुए। अपना विरोध व्यक्त किया और समय से ट्रैक खाली कर दिये। क्या किसी आंदोलन के सफल होने के लिए कुछ बड़ा होना जरूरी है? कोई बड़ा बवाल या हल्ला? तभी आंदोलन को सफल माना जाएगा?

आज के रेल रोको अभियान का सबसे ज्यादा असर पंजाब और हरियाणा में देखने को मिला। पंजाब के बठिंडा में हजारों की तादाद में किसानों ने रेल की पटरियों पर डेरा जमा लिया। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल थीं। लेकिन यह आंदोलन पंजाब तक सीमित नहीं था।

हरियाणा की जींद में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर रेल रोको अभियान में हिस्सा लिया। हरियाणा के अंबाला, कुरुक्षेत्र और चरखी दादरी में भी किसानों ने रेल की पटरियों पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया।

इस दौरान बिहार के पटना, झारखंड के रांची, यूपी के कानपुर, उरई, चित्रकूट, फर्रुखाबाद, मध्यप्रदेश के विदिशा, महाराष्ट्र के औरंगाबाद, बुलढाणा और कर्नाटक के रायचूर समेत कई जगहों से प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। यूपी के कई जिलों में आंदोलनकारियों को रोकने और नज़रबंद किये जाने की खबर है। कई जगह प्रदर्शनकारी रेल की पटरियों पर ही लेट गये, जिन्हें हटाने के लिए पुलिस को मशक्कत करनी पड़ी। इस रेल रोको आंदोलन में किसान यूनियनों के साथ विपक्षी दल भी शामिल थे।

रेल रोकने का कार्यक्रम सुबह 12 से 4 बजे तक था। चार बजते ही प्रदर्शनकारी रेलवे ट्रैक से हटने लगे थे। बेशक, रेल रोको अभियान का असर हरियाणा और पंजाब में सबसे ज्यादा दिखा। लेकिन देश के बाकी राज्यों खासकर पश्चिमी बंगाल, बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में भी किसानों ने अपने नजदीकी रेलवे स्टेशनों पर पहुंचकर विरोध-प्रदर्शन किया। इस लिहाज से इसे देशव्यापी कहा जा सकता है। दोपहर 12 बजते ही विभिन्न राज्यों से आंदोलनकारी किसानों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाने लगी थीं।

राजस्थान के जयपुर में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी रेलवे ट्रैक पर जुटे और रेलगाड़ियों की आवाजाही बंद करा दी। बंगाल और ओडिशा में भी कई जगह प्रदर्शन हुए।

रेल रोको अभियान के कई रंग-ढंग काफी निराले रहे। लुधियाना में एक रेल यात्री को चाय पिलाते किसान की यह तस्वीर काफी वायरल हो रही है।

हरियाणा के चरखी दादरी स्टेशन पर आंदोलनकारी महिलाओं ने प्रदर्शन के दौरान जलेबी और पकौड़े का वितरण किया तो कहीं महिलाओं ने नाच-गाकर विरोध दर्ज कराया।

कई जगह आंदोलनकारियों ने ट्रेन के ड्राइवर और यात्रियों का फूल-मालाओं से स्वागत भी किया।

यूपी के शामिली में रेलवे ट्रैक पर डेरा जमाये किसान आंदोलन के गीतों पर थिरकते नजर आये।

भारतीय किसान यूनियन एकता उग्राहां का कहना है कि पंजाब के 15 जिलों में 20 जगहों पर रेल रोकी गई। जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। हरियाणा और पंजाब के विरोध-प्रदर्शनों में महिलाएं भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।

यूपी के मोदीनगर और हापुड़ में किसानों ने रेलवे स्टेशन पर पहुंचकर विरोध-प्रदर्शन किया। यूपी में मोदीनगर, मुजफ्फरनगर, गढ़ मुक्तेश्वर, हापुड़ और दनकौर में किसान यूनियन के कार्यकर्ताओं ने रेल की पटरियों पर बैठकर धरना दिया।

भारतीय रेल की ओर से आए बयान के अनुसार, रेल रोको अभियान का रेलगाड़ियों की आवाजाही पर बहुत कम असर पड़ा है। इस दौरान कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। कुछ इलाकों में रेलगाड़ियों को रोका गया था, लेकिन जल्द ही आवागमन सामान्य हो गया। विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए 25 ट्रेनों के समय या रुट में बदलाव किया गया था।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि राष्ट्रव्यापी रेल रोको आंदोलन के तहत देश भर के सैकड़ों स्थानों पर दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक ट्रेनों को रोका गया। देश भर में ये कार्यक्रम सफल रहे व कोई हिंसक गतिविधि नहीं हुई। देश भर के किसान एमएसपी की कानूनी गारंटी के लिए, तीन कृषि कानून, विद्युत विधेयक व प्रदूषण विधेयक के खिलाफ लगभग तीन महीने से आंदोलन कर रहे हैं। किसानों में गुस्सा तेज हो रहा है। केंद्र सरकार को कानून को रद्द करने होंगे।

कृषि कानूनों पर संसदीय परामर्श से ही निकलेगा सहमति का रास्ता

पिछले दिनों हुई एक सर्वदलीय बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कथित तौर पर तीन कृषि कानूनों को 18 महीने के लिए स्थगित रखने का प्रस्ताव दिया है। इस सुझाव पर अमल तभी करना चाहिए जब इस अवधि के दौरान कृषि कानूनों पर विचार-विमर्श करने का जिम्मा किसी संसदीय समिति को सौंपा जाए। सरकार ने इन कानूनों को लाने से पहले जो विधायी परामर्श नहीं किया था, उसके लिए पश्चाताप तो करना ही पड़ेगा। कृषि कानूनों पर पूर्णतः नए सिरे से विचार करने की जरुरत है, और ये काम केवल संसद ही कर सकती है। 

इस बात से कोई इंकार नहीं है कि कृषि क्षेत्र में सुधारों की जरूरत है। लेकिन किस तरह के सुधार से किसानों को फायदा होगा? यह बड़ा सवाल है। ये कानून महामारी के दौरान जल्दबाजी में पर्याप्त चर्चा और व्यापक स्वीकृति के बगैर लागू किये गये थे। जिसके परिणामस्वरूप किसानों को 75 दिनों से हाड़ कंपा देने वाली ठंड में दिल्ली की सीमाओं पर कंटीले तारों, कीलों, किले जैसी नाकेबंदी का सामना करना पड़ रहा है। किसानों की बिजली, पानी, इंटरनेट और शौचालय की सुविधाएं भी सरकार ने बंद कर दी। इस दौरान लगभग 150 को जान गंवानी पड़ी। किसी भी आंदोलन के लिए यह बहुत बड़ा बलिदान है। अब केंद्र सरकार ने इन कानूनों को 18 महीने के लिए स्थगित करने का प्रस्ताव दिया (जो किसानों को मंजूर नहीं) है, तो इन कृषि सुधारों पर नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। हमें भारत के कृषि क्षेत्र को नई क्षमता प्रदान करने की आवश्यकता है। इसके लिए तीन पहलू महत्वपूर्ण हैं।

पहला, कृषि राज्य का विषय है इसलिए राज्यों को कानून बनाने का पहला अधिकार होना चाहिए। अलग-अलग राज्यों को अलग-अलग से तरह प्रभावित करने वाले कानूनों को पूरे देश पर लागू करना केंद्र सरकार की हड़बड़ी और गलत अनुमान का नतीजा है। केंद्र सरकार को मॉडल एग्रीकल्चर लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 के कार्यान्वयन से सबक लेना चाहिए था, जिसे सत्तारूढ़ पार्टी शासित राज्यों ने भी लागू नहीं किया। कृषि मंत्रियों, वित्त मंत्रियों और सभी राज्यों के विशेषज्ञ प्रतिनिधियों से युक्त जीएसटी परिषद की तर्ज पर एक ‘कृषि सुधार परिषद’ का गठन करने की आवश्यकता है। यह राज्यों और केंद्र के बीच कई मुद्दों को भी हल करेगी। ‘कृषि सुधार परिषद’ के प्रस्ताव को कृषि कानूनों में शामिल किया जा सकता है और राज्यों को अपने हिसाब से बदलाव लाने के लिए पर्याप्त स्वतंत्रता दी जानी चाहिए। यही संघीय ढांचे और “टीम इंडिया” के अनुरुप होगा।   

दूसरा पहलू है – संसदीय प्रणाली की उपयोगिता। संसद में एक विधायिका के रूप में कानूनों में संशोधन करने की सर्वोच्च शक्ति है। कानूनों के पारित होने के बाद भी ऐसा करना संभव है। एक स्थायी समिति या संसद की एक प्रवर समिति तीनों कृषि कानूनों की जांच कर सकती है और किसान संगठनों को भी सदन में अपना पक्ष रखने का मौका मिल सकता है। संसदीय स्थायी समिति महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। ये विचार-विमर्श संसद के फर्श पर नारेबाजी और शोरगुल में नहीं हो सकता है, जहां नेता राजनीतिक बढ़त बनाने के लिए बहस में हिस्सा लेते हैं । केवल संसदीय समिति द्वारा कानूनों की सावधानीपूर्वक जांच-पड़ताल कर उपयुक्त संशोधनों के सुझाव दिए जा सकते हैं और सभी पक्षों की चिंताओं को दूर किया जा सकता है। 

कृषि कानूनों को संसद को पंगु बनाकर, हंगामे के बीच राज्यसभा में ध्वनि मत से पारित किया गया। आलोचकों का तर्क हो सकता है कि ध्वनि मत से किसी कानून को पारित करना संसदीय  प्रणाली का उल्लंघन नहीं है। यह बात अपनी जगह सही है। संविधान में भी ध्वनि मत पर कोई पाबंदी नहीं है। हालांकि, 17 वीं लोकसभा में बहुत अधिक विधेयकों को ध्वनि मत से पारित किया गया है। वोट का विभाजन संसद के रिकॉर्ड का हिस्सा बनाता है। क्या हमारे निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी ईवीएम की बजाय किसी सार्वजनिक रैली में ‘ध्वनि मत’ के माध्यम से चुना जा सकता है? 

तीसरा, प्राइवेट सेक्टर को कृषि बाजार में प्रवेश करने के लिए ‘खेत से प्लेट तक’ पूरी सप्लाई चेन इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत व्यवस्था की जरूरत है। भारतीय खाद्य निगम की सीमित भंडारण क्षमता और खाद्यान्न की बर्बादी को देखते हुए, सरकार को पहले हजारों छोटी मंडियों के लिए बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त करने की आवश्यकता थी। अकेले सरकार द्वारा मंडियों का निर्माण नहीं किया जा सकता है। इसमें निजी भागीदारी और निवेश की जरूरत है। इसे एक संस्थागत रूप दिए जाने की जरूरत है, जिसमें किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी मिले। भले ही कई नीति विशेषज्ञ एमएसपी को हटाने का समर्थन करते हैं, लेकिन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि एमएसपी है और आगे भी रहेगा।

एमएसपी के क्रियान्वयन में जो कमियां हैं, उन्हें दूर किया जा सकता है। वर्ष 2012 में तत्कालीन केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘दि फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2010’ को मंजूरी देते हुए इस तरह के एक समाधान को अपनाने का प्रयास किया था। इसमें खरीदारों और विक्रेताओं को जोखिम संभालने की सहूलियत दी गई थी और इसे रेगुलेट करने का प्रावधान भी था। कमोडिटी बाजार में ऑप्शंस के लिए रास्ता खोलने का प्रयास किया गया था, लेकिन तब एमएसपी खत्म की कोई भी कोशिश नहीं थी। जैसी इस बार दिख रही है।

ड्राफ्ट एपीएमसी रेगुलेशन, 2007 के जरिये भी कृषि व्यापार में सुधारों को लेकर कई सुझाव दिए गए थे। इसमें राज्यों को किसी भी बाजार को ‘स्पेशल कमोडिटी मार्केट’ घोषित करने का अधिकार दिया गया था। नए कृषि कानून राज्य सरकारों और मंडी समितियों (APMC) को प्राइवेट मंडियों से शुल्क वसूलने से रोकते हैं। इसलिए इन कानूनों में सुधार करना बेहद जरूरी है।

सभी पक्षों के साथ व्यापक विचार-विमर्श के माध्यम से संसदीय स्थायी समिति कृषि कानूनों पर एक सही नजरिया पेश कर सकती है। इससे सरकार और किसानों के बीच गतिरोध को दूर करने में मदद मिलेगी। 

(लेखक बैंगलोर के तक्षशिला संस्थान में लोक नीति का अध्ययन कर रहे हैं। विचार उनके व्यक्तिगत हैं।)

सरकारी खरीद और मंडी सिस्टम से आगे सोचना क्यों जरूरी?

आज सभी मानते हैं कि कृषि के क्षेत्र में सुधार के लिए खेत से बाजार और बाजार से उपभोक्ता तक एक नई प्रणाली और तंत्र बनना बहुत जरूरी है। सारे देश में, मुख्य तौर पर कृषि आधारित पिछड़े राज्य जैसे बिहार में नई व्यवस्था की जरूरत है। इसके लिए पंजाब, हरियाणा जैसे जिन राज्यों में मंडी सिस्टम मजबूत है उसे बरकरार रखते हुए भी आगे बढ़ा जा सकता है। देखा जाए तो पंजाब और हरियाणा में अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी और मंडी प्रणाली को बचाये रखने के लिए भी खेती से जुड़े ये नए कानून जरूरी हैं।

इस बात को समझने के लिए हमें देखना होगा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य, मंडी प्रणाली और सरकारी खरीद किस तंत्र पर टिकी है। आज से करीब पांच दशक पहले सरकारी मंडी और एमएसपी सिस्टम की शुरुआत देश को भुखमरी से बचाने के लिए हुई थी। इस सिस्टम के तहत सरकार ने शुरुआत में पंजाब और हरियाणा, और बाद में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के किसानों को खूब गेहूं और धान उगाने के लिए प्रोत्साहित किया। इसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य का भरोसा अज्ञैर खरीद की गारंटी मुख्य प्रोत्साहन हैं। फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया अनाज उत्पादक राज्यों से एमएसपी पर अनाज खरीदकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये अन्य राज्यों तक पहुंचाती है। मतलब, हरियाणा-पंजाब का किसान बिहार, झारखंड और अन्य राज्यों के लिए अनाज उगाता है। पीडीएस के राशन की सस्ती दरों का असर इन राज्यों के अनाज बाजार और मार्केट दरों पर भी पड़ता है, जिसका नुकसान वहां के किसान उठाते हैं।

अक्सर हमें यह सुनने को मिलता है कि बिहार में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद क्यों नहीं होती है? बिहार में हरियाणा-पंजाब की तरह मंडी सिस्टम क्यों नहीं है? मान लीजिए कि बिहार भी न्यूनतम समर्थन मूल्य वाली मंडी प्रणाली लागू कर देता है। इससे क्या होगा? फूड कॉरपोरेशन को पंजाब और हरियाणा से कम अनाज खरीदना पड़ेगा। क्योंकि तब बिहार को दूसरे राज्यों से अनाज मंगाने की उतनी जरूरत नहीं रहेगी। इसीलिए भी फूड कॉरपोरेशन बिहार में अनाज की खरीद नहीं करता, ताकि हरियाणा-पंजाब में अनाज की सरकारी खरीद जारी रख सके।

फूड कॉरपोरेशन की समस्या यह है कि उसके पास हर साल जरूरत से ज्यादा अनाज जमा होता है, क्योंकि साल दर साल अनाज का उत्पाद और सरकारी खरीद बढ़ती गई। हम अनाज की कमी से अनाज के सरप्लस की स्थिति में आ पहुंचे हैं। अब सरकार चाहे भी तो पूरे देश के किसानों से सारा अनाज एमएसपी पर नहीं खरीद सकती है। एक तो सरकार के पास इतना पैसा नहीं है और दूसरा पीडीएस की खपत की एक सीमा है। फिर सरकारी खरीद के लिए हरियाणा-पंजाब, यूपी, मध्यप्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में भंडारण आदि की व्यवस्थाएं भी नहीं है। इसलिए एमएसपी पर सरकारी खरीद कुछ ही फसलों और कुछ ही राज्यों तक सीमित है।  

इसमें कोई दोराय नहीं है कि पंजाब और हरियाणा के किसानों ने देश को भुखमरी से बचाया है। इन राज्यों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद की व्यवस्था बनी रही, इसके लिए बिहार जैसे राज्यों में गेहूं और धान की खरीद की बजाय अन्य फसलों को बढ़ावा देने की जरूरत है। इसके लिए बेहतर बाजार और खरीद तंत्र बनाने की जरूरत है। यह नई व्यवस्था प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी के बिना संभव नहीं है। और इस व्यवस्था को सिर्फ सरकारी खरीद और एमएसपी के बूते नहीं चलाया जा सकता है। क्योंकि अनाज तो पीडीएस में बंट सकता है, इसलिए सरकारी खरीद संभव है। लेकिन बाकी उपज और फल-सब्जियों को एमएसपी पर खरीदने की न तो सरकार की क्षमता है और न ही इतने संसाधन हैं। इसलिए कृषि व्यापार की ऐसी व्यवस्थाएं बनानी होंगी, जिसमें सरकारी खरीद के बगैर भी किसानों के हितों और लाभ को सुनिश्चित किया जा सके। इसमें किसान को बाजार के उतार-चढ़ाव और जोखिम से बचाना और कृषि क्षेत्र में नई तकनीक, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश लाना भी शामिल है।

आज जगह-जगह सुपर मार्केट के जरिये खाने की चीज़ें, फल, सब्जियों इत्यादि बिकने की संभावनाएं बढ़ रही हैं। इस क्षेत्र की  कंपनियों को किसान से भागीदारी करने की जरूरत है। यहां सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकार का काम है कि इस भागीदारी में किसान के अधिकार और हितों को मजबूत करे। जिस तरह सरकारी खरीद में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया अनाज के दाम और खरीद की गारंटी देता है, उसी तरह किसान के साथ कॉन्ट्रैक्ट में खरीद और दाम को सुनिश्चित करना होगा। नए कृषि  कानून उस दिशा में एक कदम हैं। लेकिन अभी उसमें किसानों के लिए और भी सुरक्षा प्रावधानों को जरूरत है।

केंद्र सरकार ने किसान और खेती के लिए जो नए कानून बनाये हैं, उनमें किसानों के अधिकारों को और भी मजबूत किया जाना चाहिए। लेकिन सरकार पर किसानों का विश्वास न होना मोदी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इसके लिए खुद मोदी सरकार जिम्मेदार है। इसके लिए किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

(अनूप कुमार अमेरिका की क्लीवलैंड स्टेट यूनिवर्सिटी में जनसंचार के प्रोफेसर हैं)

समझाने की बजाय किसानों पर नीतियां थोपने के दुष्परिणाम

अभी कुछ महीनों पहले मैं प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से जुडी विसंगतियों को लेकर सभी किसानों के हकों के लिए लड़ रही थी। इसके लिए मुझे मीडिया, संसदीय समिति, राज्य कृषि विभाग, केंद्रीय कृषि विभाग, बीमा कंपनी, भारतीय स्टेट बैंक, राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति, रिजर्व बैंक से होते हुए बैंकिंग लोकपाल तक जाना पड़ा, तब कहीं जाकर भारत सरकार थोडा सक्रिय हुई और बंद हो चुकी क्लेम प्रक्रिया को राजस्थान के लिये पुनः चालू करवाया। अगर यह निर्णय नहीं होता तो मैं इस प्रक्रिया को उपभोक्ता अदालत में चैलेंज करती या क़ानूनी प्रक्रिया अपनाती। मैं ऐसा इसलिए कर सकती थी क्योंकि मुझे इन सबके बारे में थोड़ी बहुत जानकारी पहले से है या फिर मैं वह जानकारी हासिल करने की स्थिति में हूँ। लेकिन किसी आम आदमी या साधारण किसान के पास न तो इतनी जानकारियां हैं और न ही इतनी जागरूरकता है कि वह सरकारी नियम-कानूनों की पेचीदगियों से जूझ सके।

जब मैंने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के बारे में कृषि विभाग के जिला स्तरीय अधिकारियों से योजना के बारे में जानकारी लेनी चाही, तब उन्हें यह भी नहीं पता नहीं था कि मैं उनसे क्या पूछ रही हूँ। जो योजना उन्हें अपने जिले में लागू करवानी थी, उसके  दस्तावेज हिंदी में भी उपलब्ध थे। मैं उन्हें हर एक क्लॉज के तहत उनकी जिम्मेदारियां और भूमिकाएँ बताती जा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे यह सब वे पहली बार ही सुन रहे हो। मैं अपने साथ एक कॉपी ले गई थी जो उन्होंने फोटोकॉपी करवा कर अपनी फाइल में लगाई।

मैंने ऐसे प्रशासनिक अधिकारी भी देखे हैं जो कागजों को पढ़े बिना ही सिर्फ चिड़ियाँ बिठा दिया करते हैं। बहुत कम ही ऐसे होते हैं जो सब कुछ पढ़ लिख कर अपना निर्णय फाइल पर लिखते हैं। यह सन्दर्भ इसलिये रखने जरुरी है कि जब प्रक्रियाएं व तंत्र की कार्यप्रणाली ऐसी होती है तो किसानों से सरकारें ऐसी उम्मीद कैसे कर लेती है कि उन तक सारे कानून और योजनाएं पहुँच जायेगी और वे उन्हें ठीक से पढ़-समझ लेंगे।

अब कृषि कानूनों को ही देखें तो क्या देश के सभी किसानों तक ये कानून पहुंचे हैं? जब मैंने इन कानूनों को पढ़ना चाहा तो सोचा कि कृषि विभाग की वेबसाइट पर तो ये होंगे ही। वेबसाइट पर जा कर देखा तो तीन में से दो ही कानूनों की जानकारी वहां दिखाई दी और वह भी अंग्रेजी में। देश के किसानों से यह उम्मीद करना कि वे वेबसाइट का पता लगाकर कानून खोज भी लेंगे और अंग्रेजी में पढ़-समझ भी लेंगे, यह मेरी नजर में किसानों के साथ-साथ सरकार को भी अंधेरे में रखने के बराबर है। कृषि संबंधी तीसरा कानून तो किसी और ही विभाग का मामला है अतः वो उस विभाग की वेबसाइट पर जा कर खोजना पड़ेगा। कुल मिलाकर बात यह है कि लोगों तक कानूनों की कॉपी पहुंचेगी तभी तो वे उनका विश्लेषण कर अपना निर्णय ले पाएंगे।

अब रही बात कानूनों की भाषा की! अगर किसी ने प्रयास करके इन कृषि कानूनों को खोज भी लिया तो इनकी भाषा इतनी क्लिष्ट है कि समझना मुश्किल है। कोरोना संकट के काल में जब संसद चल भी नहीं पा रही थी, तब भारत सरकार इन कानूनों को अध्यादेश के रूप में लाती है और कुछ महीनों बाद संसद में ध्वनिमत से इन्हें पास कराया जाता है। इस दौरान संसदीय समिति के स्तर पर विचार-विमर्श और आम सहमति बनाने की कोशिश भी नहीं की गई। यहां तक कि संसद में बहस के दौरान विपक्षी दलों को इन बिलों पर बोलने का बहुत कम मौका मिला।  

अध्यादेश सरकार के लिए एक विशेषाधिकार है। इसकी जरूरत तब पड़ती है, जब सरकार किसी बेहद खास विषय पर कानून बनाने के लिए बिल लाना चाहे, लेकिन संसद के दोनों सदन या कोई एक सदन का सत्र न चल रहा हो। संविधान का अनुच्छेद-123 राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति देता है। संविधान कहता है कि अगर कोई ऐसा मुद्दा है, जिस पर तत्काल प्रभाव से कानून लाने की जरूरत हो, तो संसद के सत्र का इंतजार करने की बजाय सरकार अध्यादेश के जरिए उस कानून को लागू कर सकती है। लेकिन इस अनुच्छेद में यह भी स्पष्ट है कि अध्यादेश को बेहद जरूरी या आपात स्थितियों में ही लाया जाना चाहिए। जब देश और पूरी दुनियां एक भयावह महामारी से जूझ रही है तो कृषि व्यापार में बदलाव के लिए अध्यादेश लाने की क्या हड़बड़ी थी? सरकार के इस कदम से यह संदेश गया कि कृषि सुधारों पर आम सहमति बनाने की बजाय सरकार किसानों पर ये कानून थोपना चाहती है। किसानों को आंदोलन के रास्ते पर ले जाने के पीछे यह एक बड़ी वजह है।  

सूचना का अधिकार के तहत सरकारी कार्यालयों को आम जन से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में सूचना का पूर्व-प्रकटीकरण (Predisclosure) करना होता है। कृषि कानूनों के मामले में बिलों के मझौदों पर आम जनता के सुझाव/आपत्तियां भी नहीं ली गईं।

हैरानी की बात है कि नए कृषि कानूनों के तहत किसान अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ सिविल कोर्ट भी नहीं जा सकते। उन्हें सिर्फ प्रशासनिक अधिकारियों (SDM) से ही न्याय की गुहार लगानी पड़ेगी। जो सरकार पूंजीपतियों के दबाव में कृषि कानून लागू करके पीछे हटने को तैयार नहीं है तो किसी विवाद की स्थिति में SDM बड़ी कंपनियों के खिलाफ फैसले दे पाएंगे, इस पर संदेह होता है। और फिर ब्यूरोक्रेसी तक पहुंच और उसे प्रभावित करने की क्षमता किसकी ज्यादा है? किसान की या बड़ी कंपनियों की? आर्बिट्रेशन के नाम पर किसानों को अधिकारियों के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे, इसकी क्या गारंटी है?

नए कृषि कानूनों के तहत व्यापार या कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए कंपनियों के साथ होने वाले एग्रीमेंट इतने जटिल हैं कि कोई वकील या सीए ही समझ सकता है। बड़ी कंपनियां अपने साथ क़ानूनी सलाहकार ले कर चलती हैं जो किसानों के लिए संभव नहीं हैं। फसल बीमा के कानूनी दांव-पेंच में प्राइवेट कंपनियों किसानों को कैसे चक्कर कटवाती हैं, यह सबके सामने हैं।