अब होगा आर या पार, किसान दोबारा आंदोलन के लिए तैयार

12 सितम्बर 2022 को हरियाणा के किसानों ने चण्डीगढ़ में मुख्यमंत्री के आवास के घेराव किया था, जिसके बाद मुख्यमंत्री हरियाणा के साथ विभिन्न किसान संगठनों के साथ बातचीत हुई थी, जिसमें उन्होंने आश्वासन दिया था कि आगामी विधानसभा सत्र में जुमला मालकान, मुश्तरका मालकान, ढोलीदार, आबादकार व काश्तकारों के हकों के लिए कानून लेकर आएंगे.

अब हरियाणा विधानसभा का सत्र 22 दिसंबर से शुरू हो रहा है, इसलिए मुख्यमंत्री हरियाणा को उनके द्वारा किए गए वादे के अनुसार कानून लेकर आने की याद दिलाने के लिए आज चंडीगढ़ प्रेस क्लब में किसानों ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें उन्होंने 20 दिसम्बर 2022 को गुरुद्वारा श्री पंजोखरा साहिब से एक मार्च शुरू करने की घोषणा की है, जोकि 50 किलोमीटर की दूर तय करके 22 दिसंबर को हरियाणा विधानसभा तक पहुंचेगा और किसानों के मुद्दों पर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन देगा.

किसानों ने गन्ना किसानों के बकाया और गन्ने का उचित दाम दिए जाने के विषय पर और प्रदेश में किसानों को यूरिया खाद की कमी और उच्च क्वालिटी के बीजों की कमी जैसे मुद्दों को भी उठाया.

हरियाणा ने 2018 से ट्यूबवैल कनेक्शनों की रोक को हटाने तथा नये कनेक्शनों को जारी करने की व्यवस्था तथा 5 स्टार मोटर की कंडिशन को तुरन्त प्रभाव से हटाए जाने की मांग की.

प्रदेश में भारी बरसात, फिजी वायरस और घटिया बीजों से हुए नुकसान का मुआवजा दिए जाने की मांग पर अमल करने के लिए भी किसानों ने सरकार को उनके आंदोलन के मुद्दे याद करवाए.

हरियाणा के किसानों ने लखीमपुर खीरी की दुखद घटना के चश्मदीद गवाहों पर हमले की निंदा की. किसानों ने इस घटना को लोकतान्त्रिक व्यवस्था के माथे पर कलंक बताया और उसके बारे में सरकार से तुरन्त ध्यान देकर कार्यवाही करने की मांग की.

प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल किसान संगठन

BKMU – सुरेश कौथ

BKU शहीद भगत सिंह – अमरजीत सिंह मोहड़ी

BKU सर छोटू राम – जगदीप सिंह औलख

आजाद किसान यूनियन – करनैल सिंह

भारतीय इंकलाब मंच – धर्मवीर ढींढसा

पगड़ी सम्भाल जट्टा – मंदीप नथवाण

बारिश ने किसानों की नींद हराम की, सरकार अभी चैन की नींद सो रही

हरियाणा में लगातार हो रही बारिश ने सूबे के किसानों की चिंता बढ़ा दी है. धान की फसल पकने के समय इतनी अधिक बारिश होने से किसान काफी चिंतित हैं. किसानों ने कहा कि अगर बारिश ऐसे ही जारी रही तो वे बिल्कुल तबाह हो जाएंगे. नुकसान तो हो ही चुका है.

सोनीपत और पानीपत जिले के गोहाना, मुंडलाना और कथुरा ब्लॉक में खेतों में सबसे अधिक जलभराव देखने को मिला है और धान की खड़ी फसल चौपट हो गई है..

सोनीपत जिले के कथुरा ब्लॉक के भैंसवां खुर्द गांव के किसान भगत सिंह ने कहा , “हमारे इलाके में अधिकांश धान देर से बोया जाता है और यह फूल अवस्था में होता है. खेतों में करीब एक फुट दो फुट पानी है और धान की फसल चौपट हो गई है.”

कृषि विभाग के विषय विशेषज्ञ (एसएमएस) देवेंद्र कोहाड़ ने कहा कि सोनीपत में 2.25 लाख एकड़ में धान की फसल बोई गई थी और 90 प्रतिशत किसानों ने धान की देर से बुवाई की थी.

उन्होंने कहा, “जिले के तीन ब्लॉक- कथुरा, मुंडलाना और गोहाना में जलभराव की समस्या है, इसलिए हमने किसानों को सलाह दी है कि जब तक बारिश नहीं रुकती, तब तक क्षेत्र में कपास और बाजरा की कटाई बंद कर दें.”

पानीपत में कृषि विभाग के उप निदेशक वजीर सिंह ने कहा कि 95 प्रतिशत किसानों ने जिले में लगभग 1.80 लाख एकड़ में बासमती धान की किस्मों की बुवाई की थी, जबकि 5-7 प्रतिशत संकर फसल की थी. उन्होंने कहा कि क्षेत्र में पिछले तीन दिनों से लगातार बारिश के कारण संकर फसल को नुकसान हुआ है.

मूसलाधार बारिश ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है जिससे कई गांवों के किसान परेशान हैं. किसान विशेष गिरद्वारी (नुकसान सर्वेक्षण) की मांग भी उठा रहे हैं.

कृषि विभाग के सूत्रों ने कहा, “भारी बारिश के कारण जलभराव के कारण कपास, बाजरा, ज्वार और धान की खरीफ फसलों को नुकसान पहुंचा है.” हजारों हेक्टेयर से अधिक भूमि पर पानी 3 फीट से 4 फीट तक जमा हो गया है.

गुघेरा गांव के एक किसान राजकुमार ओहल्यान ने कहा कि बाजरे और धान जैसी फसलें, जो कटाई के लिए तैयार थीं, फसल के चपटे होने से बड़ा नुकसान हुआ था. कटाई में देरी अंततः कई क्षेत्रों में गेहूं की बुवाई में बाधा उत्पन्न कर सकती है. उन्होंने कहा कि किसान नुकसान को लेकर चिंतित हैं, इसलिए सरकार को एक सर्वेक्षण का आदेश देना चाहिए और प्रभावित गांवों में पानी की निकासी सुनिश्चित करने के अलावा राहत राशि जारी करनी चाहिए. बंचारी गांव के किसान अजीत कहते हैं, ”बारिश के कारण कई एकड़ में कपास की फसल बर्बाद हो गई है. यह मामला संबंधित अधिकारियों के संज्ञान में पहले ही लाया जा चुका है.”

आधिकारिक सूत्रों के अनुसार शनिवार सुबह तक पलवल खंड में 120 मिमी, होडल में 96 मिमी, हथीन में 52 मिमी और हसनपुर उपमंडल में 34 मिमी बारिश दर्ज की गई है. दावा किया गया है कि बारिश ने लगभग 61,000 हेक्टेयर में खड़ी फसलों को प्रभावित किया है. इसमें 18,140 हेक्टेयर में कपास, 25,183 हेक्टेयर में धान, 14,307 हेक्टेयर में ज्वार, 4,000 में बाजरा और 4,640 हेक्टेयर में गन्ना शामिल है. कृषि विशेषज्ञ डॉ महवीर मलिक कहते हैं, “लगभग सभी खरीफ फसलों को नुकसान के साथ, खेतों में खड़े पानी को जल्द से जल्द हटाने की जरूरत है ताकि आगे नुकसान से बचा जा सके.”

दक्षिण हरियाणा के अहिरवाल क्षेत्र में किसानों के बाजरे की फसल में भी काफी नुकसान हुआ है. बाजरे की खड़ी फसल तेज हवा के साथ हुई बारिश के कारण गिर भी गई है. रेवाड़ी के एक अधिकारी ने बताया कि कृषि विभाग ने अपनी फसल का बीमा करवाने वाले किसानों को 72 घंटे के भीतर नुकसान की सूचना विभाग को देने को कहा है. उन्होंने कहा कि किसान फार्म भरकर जमा करें, ताकि बीमा कंपनी को हुए नुकसान की जानकारी मिल सके.

हिसार में नहर में दरार

भारी बारिश के कारण भिवानी जिले के रोहनात गांव के पास नहर में दरार आने से ओवरफ्लो हो गया है. इससे कई हजार एकड़ में खड़ी फसल जलमग्न हो गई है. ग्रामीणों ने कहा कि सुंदर शाखा में दरार आ गई है. एक वरिष्ठ कृषि अधिकारी ने कहा कि बारिश से उन फसलों को नुकसान होगा जिनकी कटाई होने वाली थी.

कॉटन बेल्ट सबसे ज्यादा प्रभावित, क्योंकि गुलाबी बॉलवॉर्म ने पहले कहर बरपाया था. हिसार में शुक्रवार से हो रही भारी बारिश से कपास, धान, बाजरा, ग्वार और मूंग की खरीफ फसलों को व्यापक नुकसान हुआ है.

कपास किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है क्योंकि पिछली बार बारिश और पिंक बॉलवर्म ने पहले ही फसल को काफी नुकसान पहुंचाया है. हिसार, भिवानी, फतेहाबाद और सिरसा वाले क्षेत्र को कपास की पट्टी के रूप में जाना जाता है. इसके अलावा, इस क्षेत्र में धान, बाजरा और ग्वार की फसलें भी उगाई जाती हैं. खरीफ की फसल की कटाई होने वाली है और बारिश ने फसलों को चोपट कर दिया है. हिसार में खेतों में पानी भर गया है.

पिछले पांच दिनों से हो रही भारी बारिश करनाल और कैथल जिलों के किसानों की रातों की नींद हराम कर रही है क्योंकि इससे उनकी खड़ी धान की फसल को ‘व्यापक’ नुकसान हुआ है. बारिश के कारण जिन खेतों में फसल पक चुकी है, वहां जलभराव हो गया है, जिसको निकालने के लिए किसान हाथ-पांव मार रहे हैं.

पके धान के रंगहीन दाने।

कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार करनाल जिले में करीब 90,000 एकड़ और कैथल जिले में करीब 4,000 एकड़ में जलभराव की सूचना है. अब तक, अधिकारी करनाल जिले में लगभग 10-15 प्रतिशत और कैथल जिले में 5 प्रतिशत नुकसान की उम्मीद कर रहे हैं. किसानों ने कहा कि मुख्य रूप से कम अवधि की पूसा-1509 और पीआर-126 जैसी किस्मों को नुकसान पहुंचा है. उन्होंने कहा कि नमी की मात्रा अधिक होने से भविष्य में बाजार में कीमतों में गिरावट आ सकती है.

नीलोखेड़ी ब्लॉक के किसान इंद्रजीत सिंह ने कहा, “मैंने 25 एकड़ में बासमती और पीआर किस्में अपने पांच किलों में उगाई थी. भारी बारिश ने न केवल मेरी फसल को चौपट कर दिया है, बल्कि खेतों में जलभराव भी कर दिया है. इससे फसल को नुकसान होगा, ”

जो लोग अपनी फसल काट कर अनाज मंडियों में पहुंच चुके हैं, वे आढ़तियों की जारी हड़ताल के कारण अपनी उपज नहीं बेच पा रहे हैं. करनाल के नरुखेड़ी गांव के किसान सुनील ने कहा कि वह अपनी उपज बेचने के लिए पांच दिनों से यहां अनाज मंडी में इंतजार कर रहे थे, लेकिन आढ़तियों की हड़ताल के कारण कोई भी इसे खरीदने के लिए आगे नहीं आया. इसके अलावा, बारिश ने उनकी उपज को नुकसान पहुंचाया है क्योंकि अनाज मंडी में अपर्याप्त व्यवस्था थी. करनाल के उप निदेशक कृषि (डीडीए) आदित्य डबास ने कहा कि 4.15 लाख एकड़ में धान की फसल की खेती की गई थी, जिसमें से 97,500 एकड़ में बासमती, 10,000 एकड़ में डुप्लीकेट बासमती (मुछल) और 3,07,500 एकड़ गैर-बासमती किस्मों की खेती की गई थी.

आदित्य डबास ने बताया, “पानी का ठहराव अनाज को फीका कर सकता है. ऐसी स्थितियों में कीड़े भी हमला करते हैं, ”

कैथल के डीडीए करम चंद ने कहा कि कैथल जिले में 4 लाख एकड़ में धान की खेती की गई थी, जिसमें 1.25 लाख एकड़ में बासमती, जबकि 2.75 लाख एकड़ में गैर-बासमती किस्मों की खेती की गई थी.

बीकेयू ने की किसानों के लिए राहत की मांग

भारतीय किसान संघ (सर छोटू राम) राज्य कोर कमेटी के सदस्य जगदीप सिंह औलख ने मांग की कि सरकार को एक विशेष गिरदावरी (सर्वेक्षण) करना चाहिए और किसानों को राज्य भर में पिछले दिनों हुई भारी बारिश के कारण हुई फसल के नुकसान की भरपाई करनी चाहिए.

हरियाणा पुलिस ने किसान को थप्पड़ मार 2 ट्राली तूड़ी गौशाला में खाली करवाई, गोशालाओं में तूड़ी डालने के लिए धक्केशाही कर रहे अफसर

21 अप्रैल की रात हरियाणा के हिसार-फतेहाबाद रोड़ पर अपने पशुओं के लिए तूड़ी ले जा रहे एक किसान को गांव धांगड़ में पुलिसकर्मियों ने थप्पड़ मारकर तूड़ी से भरी दो ट्रालियों को 500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब में जबरदस्ती धांगड़ की गोशाला में खाली करवा लिया. यह मामला सिर्फ एक किसान का नहीं है. बल्कि पिछले तीन दिनों से सैंकड़ों किसान प्रशासन की इस जबरदस्ती की मार झेल रहे हैं.

तूड़ी एसोसिएशन के सदस्य रामपाल बिश्नोई ने हमें बताया, “फतेहाबाद जिले के अफसर और पुलिस उनकी ट्रालियों को जबरदस्ती रुकवा रहे हैं और किसानों के साथ हाथापाई कर जबरन 500 रुपये के हिसाब से तूड़ी गोशाला में डलवा दे रहे हैं. जो किसान मारपीट के बाद भी नहीं मान रहा, उसके व्हीकल का 50 हजार से लेकर डेढ लाख रुपए का चलान काट दे रहे हैं.”

फतेहाबाद और सिरसा जिले के प्रशासन ने किसानों को बाहर तूड़ी लाने-ले जाने पर रोक लगा रखी है और किसानों की धरपकड़ शुरू कर रखी है. गोशालाओं में तूड़े की कमी को पूरा करवने के लिए जिला प्रशासन, पुलिस और गोशालाओं की टीमें तूड़ी ढो रहे किसानों की ट्रालियों को रोक रहे हैं और किसानों के साथ बदसलूकी कर उनसे उनका तूड़ा छीन लिया जा रहा है.

बीते दिन, 22 अप्रैल को तूड़ी एसोसिएशन के सदस्यों की बैठक भी हुई, लेकिन न प्रशासन ने उनकी कोई बात मानी, न ही किसान झुके. बिश्नोई ने हमें बताया, “हम 800 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से तूड़ी खरीद रहे हैं, ढुलाई और भरवाई का खर्च रह गया वह अलग. ये अफसर जबरदस्ती 500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से खाली करवा रहे हैं. किसान तो अबके पहले ही कम पैदावार की मार झेल रहा है, ये और आ गए तंग करने. हमारे पशुओं का भूखा मारेंगे क्या?”

किसान संगठनों के सदस्य भी लगातार इस मामले में प्रशासन से मिलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बड़े अफसर नरारद हैं. किसान नेता मनदीप नथवान ने हमें बताया, “शुक्रवार को हम आला अधिकारियों से मिलने गए थे. लेकिन डीसी, एसडीएम और एसपी, तीनों बड़े अफसरों से मुलाकात नहीं हो पाई. आज हम 700-800 किसानों के साथ जिला सचिवालय जाएंगे. जिन किसानों से जबरन तूड़ा खाली करवाया है, उनके मुआवजे की भी बात करेंगे और जिन पुलिस अधिकारियों ने किसानों के साथ मारपीट की है उनपर केस दर्ज करवाएंगे.”

इस मामले को लेकर फतेहाबाद के डीसी प्रदीप कुमार ने गांव सवेरा को बताया, “गौशाला के पशुओं का पेट भी भरना जरूरी है, जो कुछ कमी-पेशी मिलेगी, उसको दूर कर देंगे. जिन किसानों को कम पैसे मिले हैं, उस गैप को पूरा करने की कोशिश करेंगे. किसान के साथ मारपीट की बात नहीं हो सकती. अधिकारी पुलिस के साथ होते हैं.”

पशुपालकों के प्रधान राजकुमार ने पत्रकारों का बताया, “वीरवार रात दो ट्राली धांगड़ गोशाला में धक्के से डलवाकर किसानों का चालान भी काटा है. इस समय प्रशासन ने 50 से ज्यादा ट्रालियां अपने कब्जे में ले रखी हैं जिसकी वजह से किसानों को 20 लाख रुपये तक का नुकसान हो सकता है. कई किसान प्रशासन को तूड़ी नहीं लेने दे रहे हैं, उन किसानों को अफसर क्रेन से ट्राली उठा ले जाने की धमकी दे रहे हैं, जिसे हम सहन नहीं करेंगे.”

फतेहाबाद पुलिस गश्त कर लगातार किसानों की ट्रॉलियां जब्त कर रही है. रतिया के थाना प्रभारी रुपेश चौधरी की टीम ने फतेहाबाद से राजस्थान तूड़ी ले जा रहे किसानों की ट्रालियों को भी जब्त किया है. ओवरलोडेड और ओवर हाइट का मामला बनाकर पुलिस ने तीन ट्रैक्टर ट्राली को नंदीशाला में खाली करवा लिया है और दो अभी जब्त करके रखा है.”

राजस्थान के भादरा से विधायक बलवान पूनिया ने पशुपालकों की गाड़ियां सीज करने के फैसले की निंदा की है और फौरन यह प्रतिबंध हटाए जाने की मांग की है.

गेहूं की कम पैदावार की मार झेल रहे हरियाणा के किसान, कर रहे 500 रुपए बोनस की मांग

हार्वेस्टर से गेंहू की कटाई के बाद अपने खेत में रिप्पर से फसल अवशेषों को पशुओं के चारे में तब्दील करने में जुटे किसान अमित पुनिया के चेहरे का वह नूर गायब है, जो आमतौर पर फसल कटाई के बाद किसानों के चेहरे पर पसरता है. हरियाणा के झज्जर जिले के खुड़ण गांव के 24 वर्षीय इस नौजवान किसान ने 28 एकड़ में गेंहू लगाया था. 8 एकड़ खुद के और 20 एकड़ पट्टे पर.

अमित से उसकी पैदावार के बारे में पूछा तो एक दुख भरी हंसी के साथ उन्होंने बताया, “दोसर कर दिया रामजी नै, इसबार (मौसम की दोहरी मार पड़ी है.)” इतना कहकर वह पास के ही अपने खेत की ओर इशारा करके बताते हैं, “ये जो खेत देख रहे हैं, इसकी पैदावार को जनवरी में हुई बेहिसाब बारिश लील गई, क्योंकि इसमें कई दिनों तक बारिश का पानी खड़ा रहा. जो खेत बारिश झेल गए, वे मार्च की गर्मी में दम तोड़ गए. भाई जी, पिछले साल 60-65 मण (24-25 क्विंटल प्रति एकड़, 1 मण-40 किलो) तक पैदावार थी, अबके बस 35-40 मण (14-15 क्विंटल) गेंहू निकल रहे.”

खेत में अमित का हाथ बंटा रहे 52 वर्षीय उनके पिताजी चांद सिंह ने बताया, “अबके हमारी लागत पूरी होनी मुश्किल है. 40 हजार रुपए के हिसाब से हमने खेत किराए पर लिए थे. डीजल, खाद, बीज स्प्रे.. सब कुछ इतना महंगा था. किसान यूनियनों ने बोनस की मांग करते हुए प्रदर्शन किया तो मैं भी गया था. क्या पता सरकार कुछ सुन ही ले और थोड़ी राहत दे दे.”

अपने खेत में अमित पुनिया

चांद सिंह की तरह करनाल के बल्ला गांव के किसान संदीप सिंह भी बीती 9 अप्रैल को उन किसानों में शामिल थे, जिन्होंने गेंहू की कम पैदावार के कारण सरकार से बोनस की मांग करते हुए दिल्ली-चंडीगढ़ हाइवे पर स्थित बसताड़ा टोल फ्री करवाया.
37 वर्षीय संदीप ने मुझे बताया, “अबके किसानों की पैदावार 20 से 30 प्रतिशत तक कम हुई है. इसीलिए हमने सरकार से गेंहू पर 500 रुपए प्रति क्विंटल बोनस देने के लिए प्रदर्शन किया था.”

संदीप सिंह ने इस बार 23 एकड़ में गेंहू और 2 एकड़ में सरसों की बुगाई की थी. 5 एकड़ उनकी खुद की थी और 20 एकड़ जमीन 55 हजार प्रति एकड़ के हिसाब से पट्टे पर ली थी. संदीप अपनी सारी फसल काटकर गांव की ही मंडी में बेच चुके हैं. अपनी फसल का ब्यौरा देते हुए उन्होंने मुझे बताया, “इस बार गेंहू 15-16 क्विंटल ही निकला है. सीधा दस क्विंटल का नुकसान है. मार्च महीने में गर्मी पड़ने के कारण दाना हल्का रह गया.”

संदीप ने गेंहू ही नहीं सरसों की कम पैदावार की भी बात कही. उन्होंने बताया, “पिछले साल भी मैंने 2 एकड़ में सरसों लगाई थी, इस बार भी दो एकड़ में लगाई. पिछले साल पैदावार 11 क्विंटल प्रति एकड़ थी. इस बार सिर्फ 6 क्विंटल प्रति एकड़ हुई है, क्योंकि जनवरी और फरवरी में कई बारिश हुई. सरसों के साथ दिक्कत यह है कि जितनी बार उसपर बारिश पड़ती है, उतनी बार ही उस पर नया फूल आ जाता है. बार-बार फूल आने से पौधा कमजोर पड़ गया और वह फल में तब्दील सही से नहीं हो सका.”

संदीप ने जिस अनाज मंडी (बला गांव) में अपना गेंहू बेचा, उसके सुपरवाइजर ने मुझे बताय, “1 अप्रैल से खरीद सीजन चालू होता है. इस साल 1 से लेकर 17 अप्रैल तक 74 हजार क्विंटल गेंहू खरीदा जा चुका है, जोकि पिछले साल के मुकाबले कम है. पिछले साल 17 अप्रैल तक हम 89 हजार क्विंटल गेंहू की खरीद कर चुके थे.”

लगभग सभी किसानों के अनुसार, गेहूं की कम पैदावार का कारण मार्च महीने में पड़ने वाली गर्मी है. यही कारण मुझे हिसार एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के कृषि विज्ञानी डॉ सुरेन्द्र धनखड़ ने भी बतलाया, “सामान्य तौर पर हरियाणा में गेंहू का फसलचक्र 150 से 160 दिनों का है. हरियाणा के किसान नवंबर में गेहूं लगाना चालू करते हैं. फसल अप्रैल के पहले सप्ताह के बाद पकनी शुरू हो जाती है और बैशाखी (13 अप्रैल) के बाद कटनी शुरू हो जाती है. मौसम के लिहाज से अप्रैल के पहले सप्ताह के बाद गर्मी के मौसम की शुरूआत होती है, लेकिन इसबार मार्च महीने के दूसरे सप्ताह से ही गर्मी पड़नी शुरू हो गई थी, और 5-6 डिग्री तक तापमान बढ़ गया था. इस स्थिति को हम अपनी भाषा में ट्रमिनल हीट स्ट्रैस बोलते है, जिसकी वजह से फसल समय से पहले ही पक जाती है और उसका दाना हल्का या पतला रह जाता है, पूरी तरह से अपना साइज नही ले पाता. गेंहू की बाली में दाने को सही ढंग से बनने के लिए 30 डिग्री तक का तापमान चाहिए होता है, लेकिन आधा मार्च महीना बीतते ही तापमान 35 डिग्री से उपर पहुंच चुका था, जोकि गेंहू की कम पैदावार का मुख्य कारण बना.”

गेंहू की कम पैदावार से प्रभावित हुई किसान परिवारों की आय के कारण हरियाणा के किसान सरकार से लगातार बोनस दिए जाने की मांग कर रहे हैं. किसान यूनियनों के संयुक्त संगठन एसकेएम ने 18 अप्रैल को प्रति क्विंटल 500 रुपए बोनस दिए जाने के लिए जिलेवार डीसी को ज्ञापन भी सौंपे हैं और बीती 9 अप्रैल को बोनस की मांग करते हुए प्रदेश के टोल टैक्स 3 घंटे के लिए बंद भी किए हैं.

किसान सभा के उपप्रधान इंद्रजीत सिंह ने मुझे बताया, “हाल के दशकों में ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप होने वाले जलवायु परिवर्तन कृषि क्षेत्र के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन रहे हैं, जिसके कारण किसान बेमौसम बारिश, सूखा, तापमान में अत्यधिक वृद्धि, बाढ़, ओलावृष्टि आदि की मार झेल रहा है. इस बार तापमान में हुई बढ़ोतरी के कारण गेहूं का दाना सामान्य आकार का नहीं हो पाया और आकार में छोटा और सिकुड़ा हुआ रह गया, जिससे प्रति एकड़ उपज की मात्रा और साथ ही गुणवत्ता प्रभावित हुई है. महंगाई के कारण इस बार किसानों की लागत भी  ज्यादा आई है. ऐसे में सरकार से हम किसान संगठनों की बोनस की मांग जायज है और किसान को राहत देने के लिए सरकार को यह करना ही चाहिए.”  

(यह रिपोर्ट पहले डाउन टू अर्थ हिंदी में प्रकाशित हो चुकी है.)

चिलचिलाती धूम में सड़कों पर क्यों निकला किसानों का रेला?

मई की चिलचिलाती धूप में हरियाणा के किसानों का पार चढ़ गया है। राज्य के कई इलाकों में धान की खेती पर पाबंदियों के खिलाफ किसानों का गुस्सा सड़कों पर नजर आने लगा है। सोमवार को 45 डिग्री सेल्सियस  की गरमी में फतेहाबाद जिले के रतिया ब्लॉक में बड़ी संख्या में किसानों ने ट्रैक्टर मार्च निकाला। ट्रैक्टर पर काले झंड़े लगाकर निकले किसान धान की खेती पर आंशिक रोक का विरोध कर रहे थे।

इसी मुद्दे पर कांग्रेस ने भी किसानों को लामबंद करना शुरू कर दिया है। सोमवार को गुहला (कैथल) में कांग्रेस के मीडिया प्रभारी रणदीप सिंह सुरजेवाला इसी मुद्दे पर किसानों के धरने में शामिल हुए। सुरजेवाला का कहना है कि खट्टर सरकार ने कुरुक्षेत्र और कैथल के किसानों की खेती उजाड़ने और आढ़ती व दुकानदार का धंधा बंद का फैसला कर लिया है। तानाशाही रवैया अपनाते हुए सरकार ने राज्य के 19 ब्लॉकों में धान की खेती पर पाबंदियां लगा दी हैं।

धान की खेती पर कहां-कितनी रोक?

हरियाणा सरकार ने भूजल स्तर में कमी वाले विकास खंडों में धान की बजाय मक्का, कपास, बाजरा और दलहन की खेती को बढ़ावा देने का फैसला किया है। इसके लिए गत 9 मई को मेरा पानी, मेरी विरासत” नाम की योजना शुरू की गई है। इस योजना के जरिए जिन ब्लॉकों में जलस्तर 40 मीटर से भी नीचे है, वहां एक लाख हेक्टेअर भूमि में धान की बजाय मक्का, कपास, बाजरा और दलहन की खेती करवाने का लक्ष्य रखा गया है।

मतलब, जल संकट को देखते हुए राज्य सरकार ने तय कर लिया कि किन इलाकों में पानी बचाना है और धान की खेती कुछ पाबंदियां लगानी पड़ेगी। मगर किसानों के साथ कोई राय-मशविरा किए बगैर!

40 मीटर से नीचे जलस्तर वाले ब्लॉक 

कैथल जिले के गुहला चीकासीवन ब्लॉक में किसान अपनी 50 फीसदी से ज्यादा भूमि में धान की खेती नहीं कर सकेंगे। यही पाबंदी कुरुक्षेत्र जिले के शाहबाद, पीपली, बबैन, इस्माईलाबाद, फतेहाबाद जिले के रतिया और सिरसा जिले के सिरसा ब्लॉक में भी लगाई गई है।

40 मीटर से नीचे जलस्तर वाले 19 ब्लॉकों में किसान 50 फीसदी से ज्यादा भूमि में धान की खेती नहीं कर सकेंगे। यानी पिछले साल जितनी भूमि में धान बोया था, इस साल उससे आधी जमीन में ही धान की खेती कर सकते हैं। इन ब्लॉकों में अगर किसानों ने 50 फीसदी से ज्यादा भूमि में धान बोया तो कृषि विभाग से मिलने वाली कोई सब्सिडी नहीं मिलेगी और न ही उनके धान की समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद होगी। जबकि धान की जगह मक्का, बाजरा और दलहन उगाने के लिए सरकार एमएसपी पर खरीद की गारंटी दे रही है।

35 मीटर से नीचे जलस्तर वाले ब्लॉक

हरियाणा के जिन 26 ब्लॉकों में पानी 35 मीटर से नीचे है, वहां पंचायती जमीन पर धान की खेती की अनुमति नहीं मिलेगी। इनमें छह ब्लॉक कुरुक्षेत्र, तीन फतेहाबाद और दो कैथल जिले में हैं।

इतना ही नहीं, जिस भूमि पर पिछले साल धान की खेती नहीं हुई थी, वहां इस साल धान बोने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके अलावा जो किसान 50 हार्स पावर इलेक्ट्रिक मोटर से ट्यूबवैल चलाते हैं, वे भी धान की खेती नहीं कर सकेंगे।

पंचायती जमीन पट्टे पर लेने वाले जींद, कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला, यमुनानगर और सोनीपत के 8 ब्लॉकों के किसान भी धान की खेती नहीं कर सकेंगे।

धान छोड़ने पर प्रति एकड़ 7,000 रुपये का अनुदान  

धान छोड़कर अन्य फसलें उगाने के लिए हरियाणा सरकार किसानों को 7,000 रुपये प्रति एकड़ का अनुदान देगी। लेकिन यह अनुदान केवल उन किसानों को मिलेगा जो 50 फीसदी से कम क्षेत्र में धान की खेती करेंगे। अगर अन्य ब्लॉक के किसान भी धान की खेती छोडऩा चाहते हैं तो वे इसके लिए आवेदन कर सकते हैं। उन्हें भी अनुदान मिलेगा। लेकिन 50 फीसदी से ज्यादा भूमि में धान छोड़कर कुछ और उगाना होगा। इसके लिए सरकार ड्रिप इरीगेशन सिस्टम पर 85 फीसद सब्सिडी दे रही है।

पिछले साल ही फेल हो चुकी है योजना- सुरजेवाला

कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि ऐसी जालिम तो अंग्रेज सल्तनत भी नही थी जैसी BJP-JJP सरकार बन गई है। एक तरफ खट्टर सरकार दादूपुर नलवी रिचार्ज नहर परियोजना को बंद करती है, तो दूसरी ओर गिरते भूजल की दुहाई देकर उत्तरी हरियाणा खासकर कुरुक्षेत्र और कैथल के किसानों की खेती और चावल उद्योग को उजाड़ना चाहती है।

हरियाणा सरकार की योजना पर सवाल उठाते हुए सुरजेवाला कहते हैं कि पिछले साल भी धान की फसल की जगह मक्का उगाने की योजना 7 ब्लॉकों में शुरू की थी। इसके लिए प्रति एकड़ 2000 रुपये अनुदान, 766 रुपये बीमा प्रीमियम और हाईब्रिड सीड देने का वादा किया था। परंतु न तो किसान को मुआवज़ा मिला, न बीमा हुआ बल्कि हाईब्रिड सीड फेल हो गया।

अनुदान और भरोसा दोनों ही कम

उधर, फतेहाबाद जिले में उपायुक्त कार्यालय पर धरना देने पहुंचे किसानों का आरोप है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने के बावजूद सरकार ने धान की खेती पर रोक का फरमान जारी कर दिया है। धान की बजाय सरकार मक्का उगाने पर जोर दे रही है जबकि इन क्षेत्रों की मिट्टी और जलवायु मक्का के अनुकूल नहीं है। साथ ही राज्य सरकार ने 7,000 रुपये के अनुदान का ऐलान किया है जो बेहद कम है। भारतीय किसान यूनियन (अम्बावता) के अध्यक्ष ऋषिपाल अम्बावता का कहना है कि राज्य सरकार यह आदेश वापस ले नहीं तो बड़े आंदोलन के लिए तैयार रहे।

पिछले साल के अनुभवों की वजह से ही किसान धान की खेती छोड़ने को तैयार नहीं है जबकि राज्य सरकार का दावा है कि मक्का उगाने में प्रति एकड़ 5450 रुपये का फायदा है। किसानों की नाराजगी की एक वजह यह भी है कि हरियाणा सरकार ने किसानों के साथ विचार-विमर्श किए बिना ही धान पर पाबंदियां लगाने का निर्णय ले लिया। किसानों की इस नाराजगी को भुनाने के लिए कांग्रेस के नेता इस मुद्दे को जोरशोर से उठ रहे हैं।