गायब मुद्दे: चुनावों में पर्यावरण चुनौतियों पर चुप्पी

2019 लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान जोरों पर है। सात चरणों में होने वाले लोकसभा चुनावों में से चार चरण के चुनाव हो गए हैं। तीन चरणों का चुनाव बाकी है। लेकिन पर्यावरण की समस्याएं कहीं भी चुनावी मुद्दा बनते नहीं दिख रही हैं। चुप्पी

जबकि सच्चाई यह है कि जलवायु परिवर्तन से लेकर वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, घटता जलस्तर, मिट्टी की खराब होती स्थिति से लेकर कई स्तर पर भारत को पर्यावरण की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे समय में जब भारत में लोकसभा चुनाव हो रहे हैं तो पर्यावरण से संबंधित ये समस्याओं न तो राजनीतिक दलों के लिए मुद्दा बन पा रही हैं और न ही आम लोगों के लिए।

लोकतंत्र के बारे में कहा जाता है कि इसमें जनता से जुड़े मसलों पर बातचीत होती है। लेकिन पर्यावरण के संकट से आम लोगों के हर दिन प्रभावित होने के बावजूद ये संकट चुनावी मुद्दा नहीं बन पा रहा है। कहीं भी वोट देने के निर्णयों को प्रभावित करने वाली वजहों में पर्यावरण संकट एक वजह नहीं है।

जबकि हकीकत यह है कि भारत के शहरों में वायु प्रदूषण कभी इतना नहीं रहा जितना आज है। दिल्ली जैसे शहरों में साफ हवा में सांस लेना एक तरह से बीते जमाने की बात हो गई है। खराब हवा की वजह से भारत मंे लोग कई तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि 2017 में भारत में जितने बच्चों की जान गई, उनमें से हर आठ में से एक की मौत वायु प्रदूषण की वजह से हुई। इसी तरह से दूषित जल की वजह से भी बच्चों और बड़ों को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।

देश की नदियों का हाल बुरा है। 2014 में भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी ने गंगा की साफ-सफाई को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था। लेकिन पांच साल में गंगा की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया है। इस वजह से न तो सत्ता पक्ष इस बार नदियों की साफ-सफाई को चुनावी मुद्दा बना रहा है और न ही इसमें विपक्षी खेमे की कोई दिलचस्पी दिख रही है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में यह जरूर कहा है कि अब वह 2022 तक गंगा को साफ-सुथरा बनाने का लक्ष्य हासिल करेगी।

भूजल का गिरता स्तर और भूजल प्रदूषण देश की बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है। आधिकारिक आंकड़े बता रहे हैं कि देश के 640 जिलों में से 276 जिलों के भूजल में फ्लुराइड प्रदूषण है। जबकि 387 जिलों का भूजल नाइट्रेट की वजह से प्रदूषित हुआ है। वहीं 113 जिलों के भूजल में कई भारी धातु पाए गए हैं और 61 जिलों के भूजल में यूरेनियम प्रदूषण पाया गया है। इस वजह से इन जिलों में रहने वाले लोगों को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है।

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण की वजह से देश में पलायन भी देखा जा रहा है। जहां सूखे की मार अधिक है और जहां प्रदूषण की वजह से जानलेवा बीमारियां हो रही हैं, वहां से लोग दूसरी जगहों का रुख कर रहे हैं। महाराष्ट्र और बुंदेलखंड से सूखाग्रस्त इलाकों से लोगों के पलायन की खबरें अक्सर आती रहती हैं।

जाहिर है कि इस स्तर पर अगर कोई समस्या लोगों को परेशान कर रही हो तो यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि यह चुनावी मुद्दा बनेगा। लेकिन फिर भी ये समस्याएं लोकसभा चुनावों में गायब दिख रही हैं। न तो कोई पार्टी अपनी ओर से ये मुद्दे उठाती दिख रही हैं और न ही प्रभावित लोगों द्वारा इन पार्टियों और स्थानीय उम्मीदवारों पर इन मुद्दों पर प्रतिबद्धता दिखाने और इनके समाधान की राह बताने के लिए कोई दबाव बनाया जा रहा है। न ही सिविल सोसाइटी की ओर से पार्टियों पर पर्यावरण को मुद्दा बनाने के लिए प्रभावी दबाव बनाया गया।

पार्टियों के चुनावी घोषणापत्रों में भी पर्यावरण के मुद्दों पर खास गंभीरता नहीं दिखती है। जो बातें पहले भी इन घोषणापत्रों में कही गई हैं, उन्हीं बातों को कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों के घोषणापत्रों में दोहराया गया है। किसी निश्चित रोडमैप के साथ पर्यावरण की समस्या से निपटने ही राह भाजपा और कांग्रेस में से किसी भी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में नहीं सुझाई है।

सूखा क्यों नहीं बन पाया चुनावी मुद्दा?

लोकसभा चुनावों के चार चरण के मतदान हो गए हैं। तीन चरण के चुनाव अभी बाकी हैं। इस लिहाज से देखें तो अब भी देश के बड़े हिस्से में लोकसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक प्रचार जोर-शोर से चल रहा है। इसमें कई मुद्दे उठाए जा रहे हैं। लेकिन सूखे का मुद्दा नहीं उठ रहा है।

जबकि देश भयानक सूखे की ओर बढ़ रहा है। विभिन्न स्रोतों से जो जानकारी आ रही है, उससे पता चल रहा है कि देश का तकरीबन आधा हिस्सा सूखे की चपेट में आ गया है। इनमें से भी कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां सूखे की स्थिति बहुत बुरी है।

इंडियास्पेंड सूखे की स्थिति के बारे में बता रहा है कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, बिहार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और पूर्वोत्तर के कुछ राज्य सूखे से बुरी तरह से प्रभावित हैं। इंडियास्पेंड की रिपोर्ट में बताया गया है कि दक्षिण भारत के 31 जलाशयों में कुल क्षमता का सिर्फ 25 प्रतिशत ही पानी बचा हुआ है। जबकि नवंबर, 2018 में यह आंकड़ा 61 फीसदी था। इसका मतलब यह हुआ कि पिछले चार-पांच महीनों में इन जलाशयों के पानी में 36 फीसदी कमी आई।

आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र के चार जिलों अनंतपुर, कुरनुल, चित्तूर और वाईएसआर कड़प्पा में बेहद भयानक सूखा है। खबरों में यह बताया जा रहा है कि यहां लगातार नौवें साल सूखा पड़ा है। 2000 से लेकर 2018 के बीच इस क्षेत्र में 15 साल ऐसे रहे हैं जब यहां सूखा पड़ा है। बताया जाता है कि सूखे की वजह से यहां के लोगों को पलायन लगातार हो रहा है। 2018 में सिर्फ सात लाख लोगों का पलायन इस क्षेत्र के गांवों से हुआ है। कई गांव तो ऐसे हैं जहां सिर्फ बुजुर्ग लोग ही रह रहे हैं।

इसी तरह की खबर महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों के बारे में भी आ रही है। मराठवाड़ा क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित है। बीड़ जिले में तो लोग सूखे से बुरी तरह बेहाल हैं। तेलंगाना के कुछ क्षेत्र भी भयंकर सूखे की चपेट में हैं। इसके बावजूद इन राज्यों में सूखा चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है।

कुछ साल पहले इंडियन प्रीमियर लीग चल रहा था तो उस वक्त सूखे का मुद्दा बहुत जोर-शोर से उठा था। दबाव में मुंबई के मैच को कहीं और कराना पड़ा था। इस बार तो आईपीएल और लोकसभा चुनाव दोनों चल रहे हैं लेकिन सूखा कोई मुद्दा बनता हुआ नहीं दिख रहा है।

सूखा का चुनावी मुद्दा नहीं होना भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए किसी त्रासदी से कम नहीं है। भारत की कुल आबादी के 57 फीसदी लोग अब भी जीवनयापन के लिए कृषि पर निर्भर हैं। कृषि पानी पर निर्भर है। ऐसे में सूखे की समस्या हर तरह से एक राष्ट्रीय समस्या है लेकिन देश के सबसे बड़े चुनाव में यह कोई मुद्दा नहीं है।

सूखे की समस्या को कोई भी दल नहीं उठा रहा है। केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अगर इस मसले को नहीं उठा रही है तो समझ में आता है कि भला वह खुद अपनी नाकामी को कैसे चुनावी मुद्दा बनाए। लेकिन विपक्षी दल भी अगर सूखे की समस्या को चुनावी मुद्दा नहीं बना रहे हैं तो सवाल उठता है कि आखिर इसकी वजह क्या है?

एक वजह यह समझ में आती है कि प्रमुख विपक्षी दलों की सरकारें जिन राज्यों में हैं, वे राज्य भी कम या ज्यादा सूखे से प्रभावित हैं। इसलिए इन्हें लगता है कि अगर ये सूखा को चुनावी मुद्दा बनाते हैं तो इसकी आंच इन तक भी आएगी और इन्हें भी चुनावों में नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए सभी दलों में एक तरह से यह आम सहमति दिखती है कि लोकसभा चुनाव 2019 में सूखा को चुनावी मुद्दा नहीं बनने देना है।

चुनावों में कहां गायब है किसान आंदोलनों की आवाज?

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार यह दावा करते हुए नहीं थकती है कि उसने पिछले पांच सालों में किसानों के कल्याण के लिए काफी काम किए हैं। भारतीय जनता पार्टी की यह सरकार ये भी कहती है कि पहली बार किसानों की आय दोगुनी करने का एक लक्ष्य तय किया गया। किसानों के लिए उठाए गए कई कदमों का उल्लेख नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार करती आई है।

लेकिन एक तथ्य यह भी है कि पिछले पांच सालों में पूरे देश में सबसे अधिक किसान आंदोलन हुए। ये आंदोलन किसी एक राज्य या कुछ खास राज्यों तक सीमित नहीं रहे हैं। बल्कि उन सभी राज्यों में किसान आंदोलन पिछले पांच सालों में हुए हैं, जिन राज्यों को सामान्य तौर पर कृषि प्रधान राज्य माना जाता है। महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों को आम तौर पर औद्योगिक केंद्र माना जाता है लेकिन इन राज्यों में भी किसानों ने बीते सालों में आंदोलन किए।

किसान आंदोलनों के लेकर कुछ ऐसा माहौल बना कि देश भर में काम करने वाले कई अलग-अलग किसान संगठन एक मंच पर आए। इन सभी ने मिलकर संयुक्त तौर पर संघर्ष करने का निर्णय लिया। इन लोगों ने अपनी मांगों में एकरूपता लाई। सभी जगह के किसान आंदोलनों में उचित मूल्य, कर्ज माफी और लागत में कमी की बात समान रूप से आई।

इसके बावजूद किसान आंदोलनों की गूंज लोकसभा चुनावों में सुनाई नहीं दे रही है। इसकी वजहों के बारे में पता लगाने के लिए जब कृषि के जानकारों, इन आंदोलनों में शरीक रहे लोगों और राजनीतिक विशेषज्ञों से बात करें तो कई बातें उभरकर सामने आती हैं।

सबसे पहली बात तो यह बताई जा रही है कि आजादी के बाद से अब तक जितने भी लोकसभा चुनाव हुए हैं, उनमें से किसी भी चुनाव में कृषि और किसान के मुद्दे केंद्र में नहीं रहे हैं। खेती-किसानी एक मुद्दा तो रहा है लेकिन यह मूल मुद्दा कभी नहीं रहा। राजनीतिक जानकार बताते हैं कि यह कभी ऐसा मुद्दा नहीं रहा है जिस पर वोटों का धु्रवीकरण किया जा सके।

कृषि विशेषज्ञ और समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसान एक वर्ग के तौर पर भारत में एकजुट नहीं रहा है। इन लोगों का कहना है कि अगर किसान को एक वर्ग मानें तो इसके अंदर कई उपवर्ग हैं। जाति का उपवर्ग है, धर्म का उपवर्ग, भाषा का उपवर्ग है और क्षेत्र का उपवर्ग है। लेकिन इन लोगों का ये कहना है कि ये उपवर्ग चुनावों में किसानों के मुख्य वर्ग बन जाते हैं और किसान वर्ग खुद उपवर्ग बनकर पीछे छूट जाता है।

इसका मतलब यह हुआ कि एक किसान जब वोट देने जाता है तो उस वक्त वह बतौर किसान नहीं वोट देता है बल्कि चुनावी राजनीति में वोट देने का उसका निर्णय उसकी जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र से अधिक प्रभावित होती है। ऐसे में खेती-किसानी के मुद्दे उठते तो रहते हैं लेकिन चुनावों के मूल मुद्दे नहीं बन पाते।

राजनीतिक विशेषज्ञ कहते हैं कि देश के राजनीतिक दलों को यह मालूम है कि किसान खुद को किसानों का एक वर्ग मानकर मतदान नहीं करता। इसलिए वे किसानी के मुद्दों को मूल मुद्दा नहीं बनाते हैं। क्योंकि अगर खेती-किसानी के मुद्दे मूल मुद्दे बन गए तो उन्हें नुकसान अधिक होगा।

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि खुद राजनीतिक दल कभी नहीं चाहते कि किसान एक वर्ग के तौर पर उभरे। इसकी वजह बताते हुए ये लोग कहते हैं कि देश के 57 फीसदी लोग अब भी कृषि पर जीवनयापन के लिए निर्भर हैं। अगर किसी तरह से इन 57 फीसदी लोगों का एक वर्ग बन गया और ये एक वोट बैंक की तरह वोट देने लगे तो फिर ये होगा कि किसान जैसी सरकार चाहेंगे, वैसी सरकार बनेगी। सारी नीतियां किसानों के हिसाब से बनेगी।

इसका एक असर यह भी होगा कि जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र की दीवार भी टूटेगी। इससे वोट बैंक की मौजूदा राजनीति को झटका लगेगा और राजनीतिक दलों को नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार करनी पड़ेगी।

इन लोगों का यह भी कहना है कि यह उद्योग जगत भी नहीं चाहता कि किसान एक वर्ग के तौर पर एकजुट हो जाएं। क्योंकि इन्हें लगता है कि अगर ऐसा हो गया तो फिर सरकारी नीतियों को जिस तरह से वे अपने फायदे के लिए प्रभावित कर पा रहे हैं, उस तरह से वे प्रभावित नहीं कर पाएंगे और किसानों के हिसाब से सारी सरकारी नीतियां बनने लगेंगी।

ऐसे में स्थिति ये दिखती है कि किसानी के सवालों को मूल चुनावी मुद्दा बनाने के पक्ष में चुनाव प्रक्रिया में अधिकांश हितधारक नहीं हैं। इसलिए हाल के सालों में किसान आंदोलनों की देशव्यापी गूंज के बावजूद लोकसभा चुनावों में इनकी धमक नहीं सुनाई दे रही है।

किसानों को लेकर भाजपा और कांग्रेस के दावों में कितना दम?

देश की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर अपने घोषणापत्र जारी कर दिए हैं। आम तौर पर यह माना जा रहा था कि दोनों पार्टियां अपने घोषणापत्र में इस बार किसानों को लेकर बड़े वादे करेंगी। ऐसा इसलिए माना जा रहा था क्योंकि पिछले दो सालों में देश के अलग-अलग हिस्सों में कई बड़े किसान आंदोलन हुए और किसानों की बुरी स्थिति बार-बार सामने आई।

उम्मीद के मुताबिक दोनों दलों ने अपने घोषणापत्र में किसानों के लिए कई वादे किए हैं। इन वादों की हकीकत क्या है, उसे जानना जरूरी है। यह भी जानना जरूरी है कि अगर पूरे भी हुए तो इससे किसानों की स्थिति में क्या सुधार होगा।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि वह किसानों को ‘कर्ज माफी’ से ‘कर्ज मुक्ति’ की राह पर ले जाएगी। इसके लिए पार्टी ने कहा है कि वह किसानों को उपज के बदले लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करेगी। साथ ही कांग्रेस ने यह भी कहा कि कांग्रेस की सरकार अगर बनी तो लागत में कमी लाया जाएगा और किसानों को संस्थागत कर्ज मिले, यह सुनिश्चित किया जाएगा। इस लिहाज से देखें तो कांग्रेस की कर्ज मुक्ति की बात को पूरा करने के लिए पार्टी ने सांकेतिक तौर पर ही सही, एक रोडमैप बताया है। हालांकि, लाभकारी मूल्य कैसे सुनिश्चित होगा और लागत में कैसे कमी आएगी, इस पर कांग्रेस ने स्थितियों को साफ नहीं किया है।

कांग्रेस ने देश के किसानों से यह वादा भी किया है कि केंद्र की सत्ता में आने के बाद उसकी सरकार हर साल अलग से ‘किसान बजट’ पेश करेगी। इसके जरिए कृषि क्षेत्र पर उसकी जरूरतों के हिसाब से विशेष जोर दिया जा सकेगा। इससे किसानों के मुद्दों पर लोगों का ध्यान तो जाएगा लेकिन अलग बजट किसान और खेती की समस्याओं का समाधान नहीं है। रेलवे के लिए आजादी से लेकर हाल तक अलग बजट पेश किया जाता था लेकिन इससे रेलवे की सेहत में कोई खास सुधार नहीं हुआ। न ही अब इसका विलय आम बजट में करने से हो रहा है। इसका मतलब यह है कि अलग बजट भर कर देने से किसी समस्या के समाधान की कोई गारंटी नहीं है। असल जरूरत समस्या के समाधान को लेकर नीयत की है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में यह भी वादा किया सरकार बनाने के बाद वह एक कृषि के लिए एक स्थायी आयोग बनाएगी। पार्टी ने इसे राष्ट्रीय कृषि विकास एवं योजना आयोग नाम दिया है। कांग्रेस ने कहा है कि इस आयोग में किसान, कृषि वैज्ञानिक और कृषि अर्थशास्त्रियों को शामिल किया जाएगा। ये आयोग सरकार को बताएगी कि कृषि को कैसे फायदेमंद बनाया जाए। घोषणापत्र में यह कहा गया है कि इस आयोग की सिफारिशें सरकार के लिए बाध्यकारी होंगी। कांग्रेस ने यह प्रस्ताव भी दिया है कि यही आयोग न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय करेगा।

यह एक सांस्थानिक हस्तक्षेप होगा। अगर कांग्रेस की सरकार बनती है और अगर वह यह काम कर देती है तो इससे दीर्घकालिक तौर पर कृषि और किसानों की समस्याओं के समाधान में मदद मिलेगी। यह प्रस्ताव तो ऐसा है जिस पर किसी भी सरकार को अमल करना चाहिए। दरअसल, देश में किसानों की स्थिति सुधारने के लिए जो उपाय हुए हैं, उनमें अधिकांश तात्कालिक ही रहे हैं। ऐसे में अगर इस आयोग को बनाने का सांस्थानिक काम होता है तो इससे किसानों का लंबे समय तक लाभ मिलेगा और इससे कृषि को जो मजबूती मिलेगी, उसका लाभ देश की अर्थव्यवस्था को होगा। ऐसे ही सीमांत किसानों के लिए एक नया आयोग बनाने का कांग्रेस का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी सरकार द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को भी संशोधित करने की बात कही है। पार्टी ने कहा है कि अभी यह योजना किसानों की कीमत पर बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचा रही है। इस बीमा योजना के क्रियान्वयन में खामी का संकेत भाजपा के घोषणापत्र से भी मिलता है। भाजपा ने भी कहा है कि वह इस योजना को स्वैच्छिक बनाएगी। इसके बाद से कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जिन खामियों की ओर वे लगातार संकेत कर रहे थे, अब उसे खुद इस योजना को लागू करने वाली पार्टी ने मान लिया है।

भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का जो लक्ष्य रखा है उसे पूरा करने के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे। पहली बार इसकी घोषणा 2016-17 के बजट में हुई थी। लेकिन तब से लेकर हाल में भाजपा के घोषणापत्र जारी करने तक, कभी भी यह रोडमैप देश के सामने नहीं रखा गया जिस पर चलकर इस लक्ष्य को हासिल किया जाना है। इस वजह से अब तो आम लोगों को भी 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य पर संदेह होने लगा है।

चुनावों से ठीक पहले मोदी सरकार ने दो हेक्टेयर तक जमीन वाले किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत की थी। इसके तहत हर परिवार को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता मिलनी है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि जीतने के बाद वह इस योजना का दायरा बढ़ाकर इसे देश के सभी किसानों के लिए लागू करेगी। भाजपा लगातार कांग्रेस की प्रस्तावित ‘न्याय’ योजना पर सवाल उठा रही जिसके तहत देश के सबसे गरीब परिवारों को 72,000 सालाना की आर्थिक मदद करने का प्रस्ताव है। भाजपा की ओर से कहा जा रहा है कि इसके लिए पैसे कहां हैं। लेकिन भाजपा खुद यह जवाब नहीं दे रही है कि पीएम-किसान के तहत हर किसान परिवार को प्रति वर्ष वह 6,000 रुपये कहां से देगी।

भाजपा ने यह घोषणा भी की है कि वह छोटे और सीमांत किसानों के लिए पेंशन की योजना लाएगी जिससे उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इस पेंशन के लिए किसानों को एक निश्चित अंश दान करना होगा या फिर उन्हें कोई आर्थिक योगदान नहीं देना होगा और यह काम खुद सरकार करेगी। क्योंकि इस सरकार ने कई पेंशन योजनाएं ऐसी लाई हैं जिनमें लाभार्थियों को भी अंशदान करना है। इसलिए किसानों के लिए प्रस्तावित पेंशन योजना पर भााजपा और स्पष्टता रखती तो ज्यादा ठीक रहता।

भाजपा ने घोषणापत्र में किसानों से यह वादा भी किया है कि वह यह सुनिश्चित करेगी कि किफायती दरों पर बेहतर बीज किसानों को समय पर उपलब्ध हो सकें और घर के पास ही उनकी जांच की सुविधा उपलब्ध हो। लेकिन बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के बढ़ते दबदबे के बीच यह काम कैसे किया जाएगा, इस बारे में स्पष्टता नहीं है।

तिलहन के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के मकसद से भाजपा ने नए तिलहन मिशन की शुरुआत करने का वादा भी किया है। इसे लागू करने का रोडमैप तो नहीं बताया गया है लेकिन अगर यह मिशन ठीक से लागू हो तो इससे देश का काफी भला होगा। क्योंकि खाद्य तेल के मामले में आयात पर निर्भरता की वजह से देश को कई स्तर पर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

इसके अलावा भाजपा ने पूरे देश में कृषि भंडारण की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए यह वादा किया है कि वह पूरे देश में वेयरहाउस का नेटवर्क विकसित करेगी। भाजपा ने इस संदर्भ में अपने संकल्प पत्र में कहा है, ‘किसानों को अपनी उपज का भंडारण अपने गांव के निकट करने तथा उचित समय पर उसे लाभकारी मूल्य पर बेचने के लिए सक्षम करने के उद्देश्य से हम कृषि उत्पादों के लिए नई ग्राम भंडारण योजना आरंभ करेंगे। हम कृषि उत्पादों की भंडारण रसीद के आधार पर किसानों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराएंगे।’ अगर सही ढंग से इसे लागू कर दिया जाए तो यह भी कृषि में दीर्घकालिक बदलाव लाने वाला कदम साबित होगा। क्योंकि गांवों के स्तर पर भंडारण एक बहुत बड़ी समस्या बनी हुई है।

देखा जाए तो देश की दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में किसानों के लिए कई उपयोगी घोषणाएं हैं। लेकिन अधिकांश घोषणाओं के साथ यह नहीं बताया गया है कि इसे कैसे पूरा किया जाएगा। इस वजह से इन चुनावी घोषणाओं पर किसानों को बहुत भरोसा नहीं हो रहा है। अच्छा तो यह होता कि हर घोषणा के साथ ये पार्टियां उसे लागू करने की कार्ययोजना भी बतातीं। इससे लोगों में इन बातों को लेकर विश्वास भी आता और फिर इस आधार पर लोग उन्हें वोट भी देते।

भाजपा के घोषणापत्र में किसानों के लिए क्या है?

पिछले दिनों केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए अपना घोषणापत्र जारी किया। पार्टी इसे संकल्प पत्र कहती है। इस घोषणा-पत्र में हर क्षेत्र के लिए बड़े-बड़े वादे किए गए हैं। आम तौर पर हर पार्टी चुनावों के पहले बड़ी घोषणाएं करती है। भाजपा भी इसका अपवाद नहीं है।

भाजपा के संकल्प पत्र में किसानों के लिए भी बड़ी-बड़ी घोषणाएं की गई हैं। इसमें सबसे पहले तो यही कहा गया है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का जो लक्ष्य रखा है उसे पूरा करने के लिए सभी प्रयास किए जाएंगे।

चुनावों से ठीक पहले मोदी सरकार ने दो हेक्टेयर तक जमीन वाले किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना की शुरुआत की थी. इसके तहत हर परिवार को प्रति वर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता मिलनी है. भाजपा ने अपने घोषणापत्र में वादा किया है कि जीतने के बाद वह इस योजना का दायरा बढ़ाकर इसे देश के सभी किसानों के लिए लागू करेगी।

भाजपा ने यह घोषणा भी की है कि वह छोटे और सीमांत किसानों के लिए पेंशन की योजना लाएगी जिससे उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। कृषि क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाने के मकसद से भाजपा ने इस क्षेत्र में 25 लाख करोड़ रुपये के निवेश का वादा भी किया है।

भाजपा के घोषणापत्र में किसानों के लिए एक बड़ा वादा यह है कि एक से पांच साल तक के लिए किसानों को एक लाख रुपये की अधिकतम सीमा वाले किसान क्रेडिट कार्ड जारी किए जाएंगे। कृषि निर्यात को बढ़ावा देने और कृषि आयात को कम करने के लिए जरूरी नीतियां बनाने की बात भी भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में की है।

भाजपा ने घोषणापत्र में किसानों से यह वादा भी किया है कि वह यह सुनिश्चित करेगी कि किफायती दरों पर बेहतर बीज किसानों को समय पर उपलब्ध हो सकें और घर के पास ही उनकी जांच की सुविधा उपलब्ध हो। तिलहन के मामले में आत्मनिर्भरता हासिल करने के मकसद से भाजपा ने नए तिलहन मिशन की शुरुआत करने का वादा भी किया है।

इसके अलावा भाजपा ने पूरे देश में कृषि भंडारण की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए यह वादा किया है कि वह पूरे देश में वेयरहाउस का नेटवर्क विकसित करेगी। भाजपा ने इस संदर्भ में अपने संकल्प पत्र में कहा है, ‘किसानों को अपनी उपज का भंडारण अपने गांव के निकट करने तथा उचित समय पर उसे लाभकारी मूल्य पर बेचने के लिए सक्षम करने के उद्देश्य से हम कृषि उत्पादों के लिए नई ग्राम भंडारण योजना आरंभ करेंगे। हम कृषि उत्पादों की भंडारण रसीद के आधार पर किसानों को सस्ती दरों पर ऋण उपलब्ध कराएंगे।’

भाजपा ने संकल्प पत्र में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए भी कई कदम उठाने का वादा अपने घोषणापत्र में किया है। भाजपा ने वादा किया है कि अगले पांच सालों में वह पहाड़ी, आदिवासी एवं वर्षा सिंचिंत क्षेत्रा में 20 लाख हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन पर रसायन मुक्त जैविक खेती को प्रोत्साहित करेगी।

भाजपा ने अपतने घोषणापत्र में राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन एवं शहद मिशन शुरू करने की बात भी कही है। साथ ही सिंचाई का मिशन मोड पर विस्तार करने का वादा भी भाजपा ने किया है। सहकारी संस्थाओं के प्रोत्साहन के साथ-साथ कृषि और प्रौद्योगिकी का मेल कराने की बात भी भाजपा ने अपने घोषणापत्र में की है।

भूमि रिकाॅर्ड का डिजिटलीकरण के साथ पशुपालन और मछली पालन के लिए भी कुछ वादे भाजपा ने अपने घोषणापत्र में किए हैं। लेकिन इन घोषणाओं को कैसे जमीनी स्तर पर लागू किया जाएगा, इस सवाल पर कोई संतोषजनक जवाब भाजपा घोषणापत्र जारी करते हुए पार्टी के शीर्ष नेताओं ने नहीं दिया।