यूरिया के नक्शेकदम पर डीएपी, खरीफ में उर्वरकों की खपत का असंतुलन तेजी से बढ़ा

पिछले कई दशकों से सरकार और उर्वरक उद्योग उर्वरकों के संतुलित उपयोग की वकालत के साथ ही उसे दुरूस्त करने की कोशिश में लगे हैं। लेकिन उसके बावजूद यूरिया का उपयोग अन्य उर्वरकों की तुलना में तेजी से बढ़ रहा है। अब यूरिया के साथ डाई अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) उसी दिशा में बढ़ रहा है। दूसरे कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की तुलना में कीमतों के अंतर के चलते डीएपी का उपयोग तेजी से बढ़ा है। चालू साल में अक्तूबर माह तक के उर्वरक खपत के आंकड़े इसे साबित कर रहे हैं। सरकार ने रबी सीजन (2022-23) के लिए न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना के तहत जो सब्सिडी दरें घोषित की हैं उनमें नाइट्रोजन पर सब्सिडी बढ़ाई गई है जबकि फॉस्फोरस (पी), पोटाश (के) और सल्फर (एस) पर सब्सिडी दरों में कमी की है। यह फैसला भी उर्वरकों के उपयोग के असंतुलन को बढ़ावा देगा। 

उर्वरक विभाग के आंकड़ों मुताबिक चालू साल में अप्रैल से अक्तूबर, 2022 के दौरान यूरिया की बिक्री में 3.7 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं इसी अवधि में डीएपी की बिक्री में 16.9 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। जबकि इसी अवधि के दौरान गैर यूरिया व गैर डीएपी उर्वरकों की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई है। इन उर्वरकों में म्यूरेट ऑफ पोटाश (एमओपी), सिंगल सुपर फॉस्फेट (एसएसपी) और दूसरे कॉम्प्लेक्स उर्वरक शामिल हैं। इन उर्वरकों में नाइट्रोजन (एन), फॉस्फोरस (पी), पोटाश (के) और सल्फर (एस) की मात्रा का अलग-अलग अनुपात होता है।

उर्वरकों की बिक्री लाख टन में 

अप्रैल-अक्तूबर 2021अप्रैल-अक्तूबर 2022वृद्धि दर (प्रतिशत)
यूरिया186.273193.1123.67
डीएपी55.61265.03216.94
एमओपी16.8778.792(-)47.91
एनपीकेएस71.87557.553(-)19.93
एसएसपी34.81531.678(-)9.01

चालू वित्त वर्ष के पहले सात माह के दौरान एमओपी की बिक्री  47.9 फीसदी कम रही है। वहीं एन, पी, के और एस विभिन्न अनुपात वाले कॉम्प्लेक्स उर्वरकों की बिक्री 19.9 फीसदी कम हो गई है। एसएसपी की बिक्री में  इस दौरान 19.9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। यूरिया और डीएपी की बिक्री के मुकाबले दूसरे उर्वरकों की बिक्री में गिरावट की वजह कीमतों के अंतर को माना जा रहा है। सब्सिडी के अलग स्तर की वजह से यह अंतर बना हुआ है। इस समय यूरिया का अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) 5628 रुपये प्रति टन है। उर्वरकों में यूरिया का दाम सरकार द्वारा नियंत्रित है। उर्वरक कंपनियां सरकार द्वारा तय कीमत पर यूरिया की बिक्री करती हैं। इसकी उत्पादन लागत और आयात पर आने वाली लागत व एमआरपी के बीच के अंतर की भरपाई सरकार उर्वरक कंपनियों को सब्सिडी देकर करती है।

यूरिया के अलावा दूसरे उर्वरक विनियंत्रित उर्वरकों की श्रेणी में आते हैं। इनका एमआरपी तय करने का अधिकार कंपनियों के पास है। सरकार न्यूट्रिएंट आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना के तहत इन पर फिक्स्ड सब्सिडी देती है। हालांकि यह बात अलग है कि व्यवहारिक रूप में कंपनियां सरकार की हरी झंडी के बाद ही इनकी कीमतें तय करती हैं। पिछले करीब डेढ़ साल से और उसके बाद रूस और यूक्रेन युद्ध के बाद उर्वरकों और उनके कच्चे माल की कीमतों में आई भारी बढ़ोतरी के चलते सरकार को इन उर्वरकों पर अधिक सब्सिडी देनी पड़ी है। इनमें भी सबसे अधिक सब्सिडी डीएपी पर दी जा रही है। कंपनियों को हिदायत है कि वह डीएपी के लिए 1350 रुपये प्रति बैग (50 किलो) यानी 27 हजार रुपये प्रति टन की कीमत पर ही डीएपी की बिक्री करें। एमओपी के लिए एमआरपी 34 हजार रुपये प्रति टन है जबकि एनपीके और एस वाले कॉम्प्लेक्स वेरिएंट के लिए एमआरपी 29 हजार रुपये प्रति टन से 31 हजार रुपये प्रति टन के बीच है।  एसएसपी के लिए एमआरपी 11 हजार से साढ़े 11 हजार रुयपे प्रति टन के बीच है।  इस अनौपचारिक कीमत नियंत्रण के चलते डीएपी की कीमत एनपीके वेरिएंट वाले कॉम्प्लेक्स उर्वरकों से कम है। जबकि पहले डीएपी के दाम अधिकांश उर्वरकों से अधिक रहे हैं। लेकिन अन्य उर्वरकों के मुकाबले कम दाम में मिलने के चलते डीएपी की बिक्री तेजी से बढ़ी है।

इस समय डीएपी पर सब्सिडी का स्तर 48433 रुपये प्रति टन है। एमओपी पर सब्सिडी का स्तर 14188 रुपये प्रति टन है। एन, पी, के और एस वाले  10:26:26:0 वाले कॉम्प्लेक्स के लिए सब्सिडी 33353 रुपये प्रति टन और एसएसपी के लिए 7513 रुपये प्रति टन  है। उर्वरक उद्योग के एक पदाधिकारी ने रूरल वॉयस के साथ बातचीत में कहा कि ऐसे में किसान डीएपी और यूरिया के अलावा किसी दूसरे उर्वरक को क्यों खरीदेंगे। लेकिन यूरिया और डीएपी के अधिक उपयोग के चलते मिट्टी में उर्वर तत्वों का असंतुलन बढ़ रहा है जो अंततः फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल डालता है और यह स्थिति किसानों के लिए फायदेमंद नहीं है। फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन के.एस.राजू का कहना है कि उर्वरकों के उपयोग में एन, पी और के का आदर्श अनुपात 4:2:1 को माना जाता जाता है। जबकि 2020-21 में यह अनुपात 7.7 :3.1:1 रहा है। वहीं 2022 के खरीफ सीजन में इनका असंतुलन बढ़कर 12.8:5.1 :1 पर पहुंच गया।

इसलिए मिट्टी की जांच या मृदा कार्ड का कोई अर्थ नहीं है। किसान का उर्वरकों के उपयोग करने का फैसला उर्वरकों की कीमत के आधार पर ही तय होता है। 

साभार: रूरल वॉइस

वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमत 45 फीसदी तक घटी, मांग में गिरावट का असर

उर्वरकों की रिकॉर्ड बनाती कीमतों के चलते बढ़ते सब्सिडी बजट के मोर्चे पर सरकार को कुछ राहत मिलती दिख रही है. यह राहत यूरिया की कीमतों में आई भारी गिरावट के चलते मिलेगी. फरवरी के बाद से ऑफ सीजन और मांग में भारी कमी के कारण वैश्विक बाजार में यूरिया और इसके कच्चे माल अमोनिया की कीमतों में काफी गिरावट दर्ज की गई है. उद्योग सूत्रों के मुताबिक करीब एक हजार डॉलर तक पहुंची यूरिया की कीमतें घटकर 550 डॉलर प्रति टन पर आ गई हैं. वहीं यूरिया के कच्चे माल अमोनिया की कीमत भी 1100 डॉलर प्रति टन से घटकर 850 डॉलर प्रति टन रह गई है. ऊंची कीमतों के चलते भारत को 980 डॉलर प्रति टन की कीमत तक यूरिया खरीदना पड़ा था.

वैश्विक बाजार में यूरिया और अमोनिया की कीमतों में आई इस कमी की मुख्य वजह यूरिया उत्पादन की क्षमता, खपत से अधिक होना है. वहीं फरवरी से मई तक चार माह के ऑफ सीजन ने उत्पादक कंपनियों पर अतिरिक्त स्टॉक का दबाव बना दिया है. ब्राजील में सूखा होने के चलते वहां आयात भी कम हुआ है. ब्राजील ने सूखे के चलते यूरिया आयात के एडवांस सौदे भी नहीं किये हैं. उर्वरक उद्योग से जुड़े एक अधिकारी का कहना है कि फरवरी के बाद यूरिया का उपयोग लगभग बंद हो जाता है. केवल चीन में कुछ उपयोग होता है. अधिकांश देशों में फरवरी से मई तक के चार महीनों को ऑफ सीजन माना जाता है. इस दौरान उर्वरक कंपनियां यूरिया और अमोनिया का जो उत्पादन कर रही थीं उसकी स्टॉकिंग भी बड़ी समस्या उनके सामने खड़ी हो गई. इसके चलते कीमतों में यह गिरावट देखने को मिली है.

भारत सरकार द्वारा जुलाई के पहले सप्ताह में यूरिया आयात का टेंडर जारी करने की उम्मीद है. भारत को 540 डॉलर प्रति टन की कीमत में आयात सौदे मिलने की संभावना है. सरकार 5900 रुपये प्रति टन की कीमत पर किसानों को यूरिया बेचती है. 970 और 980 डॉलर प्रति टन की कीमत पर आयातित यूरिया के चलते सब्सिडी में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. उद्योग सूत्रों के मुताबिक 540 डॉलर प्रति टन की कीमत पर होने वाले सौदों पर पांच फीसदी का आयात शुल्क और 1500 रुपये प्रति टन का हैंडलिंग और बैगिंग खर्च जोड़ने पर यह कीमत करीब 42 हजार रुपये प्रति टन पड़ेगी. यह एक समय करीब 75 हजार रुपये प्रति टन पर पहुंच गई थी. कीमतों में आई गिरावट के चलते सरकार को सब्सिडी के मोर्चे पर उच्चतम स्तर पर गई कीमत के मुकाबले करीब 30 हजार रुपये प्रति टन की बचत होगी.

देश में करीब 350 लाख टन यूरिया की खपत होती है. इसके बड़े हिस्से की आपूर्ति देश में उत्पादित 260 लाख टन यूरिया से होती है. हमें हर साल करीब 100 लाख टन यूरिया का आयात करना होता है. लेकिन रामागुंडम और गोरखपुर उर्वरक संयंत्रों में उत्पादन शुरू हो जाने के चलते घरेलू उत्पादन क्षमता में करीब 10 लाख टन का इजाफा होगा. इसके चलते आयात में कमी आएगी.

साभार- Rural Voice

(हरवीर सिंह रूरल वॉइस के एडिटर हैं. उनका भारत की खेतीबाड़ी और ग्रामीण पत्रकारिता में महत्वपूर्ण स्थान है)

नीम कोटेड यूरिया पर कैसे हुआ मिलावट का लेप?

केंद्र की मोदी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में खेती-किसानी के मामले में एक चीज पर काफी जोर दिया है। नीम कोटेड यूरिया! प्रधानमंत्री के तमाम भाषाणों और सरकारी दावों में नीम कोटेड यूरिया के फायदे गिनाए गए।

दरअसल, यूरिया के लिए सरकार किसानों को सब्सिडी देती है। लेकिन किसानों का तो बस नाम है। यह सब्सिडी असल में मिलती है फर्टीलाइजर कंपनियों को। हर साल करीब 65-70 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी फर्टीलाइजर कंपनियों को दी जाती है। यह रकम देश के कृषि बजट से भी बड़ी है तो घपले-घोटाले भी बड़े ही होंगे। सरकारी सब्सिडी से बने यूरिया का गैर-कृषि कार्यों जैसे नकली दूध बनाने, कैमिकल बनाने आदि में डायवर्ट होना और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में तस्करी आम बात हो गई।

देश पर यह दोहरी मार थी। एक तरफ, सब्सिडी का यूरिया देश से बाहर जाने लगा। तो दूसरी तरफ, किसानों के लिए यूरिया की किल्लत होने लगी। यूरिया की तस्करी और कालाबाजारी की यह समस्या काफी पुरानी है। लेकिन केंद्र में मोदी सरकार ने आते ही इसका तोड़ निकाल लिया। ये तोड़ था नीम कोटेड यूरिया। हालांकि,  नीम कोटेड यूरिया की शुरुआत यूपीए सरकार के समय हो गई थी, लेकिन मोदी सरकार ने यूरिया को 100 फीसदी नीम कोटेड करने का फैसला किया। जो बड़ा कदम था।

साल 2015 में सरकार ने देश में यूरिया के संपूर्ण उत्पादन को नीम लेपित करना अनिवार्य कर दिया। आयात होने वाले यूरिया पर भी निंबोलियों के तेल यानी नीम तेल का स्प्रे करना जरूरी था। नीम के इतने ज्यादा अच्छे दिन कभी नहीं आए थे। सरकार का दावा था कि नीम कोटेड यूरिया से मिट्टी की सेहत सुधरेगी और फसल की पैदावार बढ़ेगी। क्योंकि नीम लेपित यूरिया धीमी गति से प्रसारित होता है जिसके कारण फसलों की जरूरत के हिसाब से नाइट्रोजन की खुराक मिलती रहती है। नीम कोटिंग से यूरिया के औद्याेगिक इस्तेमाल और कालाबाजारी पर अंकुश लगने का दावा भी किया गया।

सरकार का मानना है कि नीम कोटिंग के जरिए यूरिया की कालाबाजारी रुकने से सालाना करीब 20,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। बेशक, आइडिया अच्छा था। लागू भी 100 परसेंट हुआ। लेकिन एक नई समस्या खड़ी हो गई।

विज्ञान और पर्यावरण की जानी-मानी पत्रिका डाउन टू अर्थ ने हिसाब-किताब लगाया है कि देश में यूरिया की जितनी खपत है उसे नीम कोटेड करने के लिए जितना नीम तेल चाहिए उतना तो देश में उत्पादन ही नहीं है। जबकि सरकार का दावा है कि आजकल 100 फीसदी यूरिया नीम कोटेड है।

अगर सरकार की बात सही मानें तो सवाल उठता है कि जब देश में यूरिया के समूचे उत्पादन और आयातित यूरिया की कोटिंग के लिए पर्याप्त नीम तेल ही उपलब्ध नहीं है तो फिर नीम कोटिंग हो कैसे रही है? अब या तो यूरिया की 100 फीसदी नीम कोटिंग का सरकारी दावा गलत है या फिर नीम कोटिंग के लिए मिलावटी नीम तेल का इस्तेमाल हो रहा है।

सरकार ने जब यूरिया की नीम कोटिंग का फैसला किया, ये सवाल कुछ लोगों ने तब भी उठाया था कि यूरिया की इतनी बड़ी मात्रा पर नीम स्प्रे के लिए नीम तेल कहां से आएगा? तब सिर्फ संदेह था, अब हमारे सामने डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट है। वो भी पूरी कैलकुलेशन के साथ!

https://www.downtoearth.org.in/news/governance/towards-a-bitter-end-india-s-neem-shortage-63978

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में नीम ऑयल इंडस्ट्री से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर बताया गया है कि भारत में यूरिया की जितनी खपत है, उसकी कोटिंग के लिए करीब 20,000 टन नीम तेल की जरूरत है। जबकि उपलब्धता सिर्फ 3,000 टन नीम तेल की है। मतलब, जरूरत के मुकाबले मुश्किल से 15 फीसदी नीम का तेल देश में बनता है। सवाल फिर वही है। जब देश में इतना नीम तेल ही नहीं है तो फिर नीम कोटिंग कैसे हो रही है? बाकी का 85 फीसदी नीम तेल कहां से आ रहा है?

भारत में खेती के लिए बड़े पैमाने पर यूरिया का इस्तेमाल होता है। देश में यूरिया की सालाना खपत तकरीबन 3.15 करोड़ टन है जिसमें से 76 लाख टन यूरिया आयात होता है। नीम कोटिंग से यूरिया की खपत घटने की बात कही गई थी लेकिन हाल के वर्षों में यूरिया की खपत बढ़ी है। लिहाजा आयात भी बढ़ा है।

नीम कोटिंग में मिलावट?

नीम तेल के उत्पादन और खपत में भारी अंतर से संदेह पैदा होता है कि कहीं नकली नीम तेल का इस्तेमाल तो यूरिया में नहीं हो रहा है। यह आशंका अप्रैल, 2017 में उर्वरक मंत्रालय की ओर से जारी एक नोटिफिकेशन से पुख्ता होती है जिसमें कहा गया है कि कई नीम तेल सप्लायर यूरिया कंपनियों को नीम तेल की इतनी आपूर्ति कर रहे हैं जितनी उनकी उत्पादन क्षमता भी नहीं है। मंत्रालय ने नीम तेल सप्लायरों को ऐसा नहीं करने की चेतावनी भी दी थी। लेकिनडाउन टू अर्थ की रिपोर्ट का दावा है कि सरकार के इस नोटिस के बावजूद नीम तेल में मिलावट बदस्तूर जारी है।

यह हाल तब है जबकि एक टन यूरिया में सिर्फ 600 ग्राम नीम तेल स्प्रे का मानक तय किया गया है जिसे कई विशेषज्ञ बहुत कम मानते हैं। इस मात्रा को बढ़ाकर 2 किलोग्राम करने की मांग भी उठ रही है। कहा जा रहा है है कि एक टन यूरिया में 2 किलोग्राम से कम नीम तेल के स्प्रे से मिट्टी या फसलों पर कोई खास फायदा नहीं पहुंचेगा। खैर, ये कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की बहस का मुद्दा हो सकता है कि लेकिन असली सवाल नकली नीम तेल की मिलावट और सरकारी दावे की असलियत का है। नीम तेल में मिलावट के पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर क्या दुष्प्रभाव होंगे, यह भी अभी बहुत स्पष्ट नहीं है। इस मिलावट को रोकने की कोई मजबूत नियामक व्यवस्था भी नहीं है।

नीम तेल आयात की तैयारी

लेकिन एक बात साफ है कि देश में नीम तेल की कमी है। जिसे दूर करने के लिए नीम तेल के आयात की सुगबुगाहट चल रही है। बहुत जल्द हम चीन या म्यांमार से नीम तेल आयात कर रहे होंगे। मतलब, चीन का विरोध करने के लिए चीनी फुलझंडी और पिचकारी के अलावा नीम तेल का भी बहिष्कार करना पड़ेगा।

उपाय क्या है?

बात ये है कि देश में जितने नीम के पेड़ हैं, उस हिसाब से नीम तेल का बाजार संगठित नहीं है। इसलिए इसे संगठित करने की जरूरत है। साथ ही नीम के पेड़ लगाने को भी प्रोत्साहन देना पड़ेगा। भारत का सबसे बड़े उर्वरक निर्माता इफको ने इस दिशा में पहल की है। इफको ने देश भर में निंबोली खरीद केंद्र बनाए हैं। गुजरात और राजस्थान में कहीं जगह निंबोली संग्रह जोर पकड़ रहा है। लेकिन नीम तेल में मिलावट के के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। अन्यथा,यूरिया की कालाबाजारी रोकने के चक्कर में नकली नीम तेल का कारोबार चमकने लगेगा।