जंतर-मंतर पर मनरेगा मजूदरों ने किया आंदोलन तेज, मोदी सरकार पर लगाया फंड रोकने, भुगतान में देरी का आरोप

देश भर के महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) के तहत काम करने वाले हजारों मजदूरों को मजदूरी नहीं मिली है. मनरेगा के तहत काम के लिए नामांकित लोगों के वेतन का भुगतान करने में देरी, योजना के लिए अपर्याप्त धन आवंटन और उसमें भी देरी, वेतन वितरण में अनियमितता और वर्तमान में रोजगार योजना के कार्यान्वयन को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दों के खिलाफ देश भर के मनरेगा मजदूर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं. केंद्र सरकार पर मनरेगा मजदूरों का 6,800 करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया है.

दिल्ली के जंतर-मंतर पर मनरेगा मजदूरों का यह आंदोलन 2 अगस्त से शुरू हुआ. मनरेगा मजदूरों के संगठन ने बताया, “केंद्र सरकार चालू वित्त वर्ष 2022-23 में मनरेगा के लिए आवंटित धन का 66.44% पहले ही समाप्त कर चुकी है. इस वित्तीय वर्ष में आवंटित किए गए 73,000 करोड़ रुपये में से चालू वित्त वर्ष के चार महीनों के भीतर कुल व्यय 48,502 करोड़ रुपये है, जिसमें छह महीने से अधिक समय से बकाया भुगतान शामिल हैं.””

मजदूरी भुगतान में लगातार देरी के बारे में मनरेगा मजदूरों का कहना है कि जब उन्होंने काम की मांग की तो उन्हें काम नहीं मिला. उनमें से कई मजदूरों ने NMMS ऐप की शुरुआत के बारे में चिंता जताई, जिसे पिछले साल मई में मनरेगा योजनाओं की उचित निगरानी सुनिश्चित करने और साइटों पर श्रमिकों की वास्तविक समय उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए लॉन्च किया गया था. NMMS का मतलब राष्ट्रीय मोबाइल निगरानी प्रणाली है.

ऐप में तकनीकी खराबी के कारण कई श्रमिकों को मजदूरी का नुकसान हुआ है. ऐप का उपयोग करने की मजबूरी ने कई लोगों में निराशा पैदा की है. बहुतेरे मजदूरों को स्मार्टफोन खरीदने के लिए कर्ज लेना पड़ा है. साथ ही, उन्हें हर महीने मोबाइल इंटरनेट डेटा पैक के लिए भी पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं.

नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (एनएमएमएस) एप्लिकेशन का उपयोग करने से काम करने में अधिक बाधाएं पैदा हुई हैं. ऐप में तकनीकी खराबी की वजह से श्रमिकों को अपने वेतन के 50 प्रतिशत तक का नुकसान हुआ है. मजदूरों की मांग है कि एनएमएमएस आधारित मौजूदा व्यवस्था को तत्काल समाप्त किया जाए.

कई मजदूरों ने महंगाई के कारण एक दिन में दो बार भोजन करने में कठिनाइयों के बारे में भी बात की, यह कहते हुए कि एलपीजी सिलेंडर की कीमत 1,000 रुपये से अधिक हो गई है. प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को सार्वभौमिक बनाने की मांग की और कहा कि पीडीएस में दाल, बाजरा और तेल शामिल होना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि प्रधान मंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) को तब तक बढ़ाया जाना चाहिए जब तक हमारा खाद्य संकट टल नहीं जाता. वर्तमान में, अप्रैल 2020 से 21,850 करोड़ रुपये से अधिक मजदूरी लंबित है, जिसमें से 6,800 करोड़ रुपये का वेतन अकेले इस वर्ष के लिए लंबित है.

गौरतलब है कि देश में कोरोना संक्रमण के कारण केंद्र सरकार ने मनरेगा का बजट 70 हजार करोड़ से बढ़ाकर 1.11 लाख करोड़ कर दिया था. वहीं, इस साल 2022 के बजट में सरकार ने मनरेगा का बजट घटा दिया है. इसके अलावा गैर भाजपा शासित राज्यों जैसे झारखंड और पश्चिम बंगाल में मनरेगा में भ्रष्टाचार के मामले आए हैं, जिसके कारण केंद्र सरकार ने इन राज्यों को फंड ही नहीं जारी किया है. इसके कारण सीधे तौर पर इन राज्यों के करीबन एक करोड़ मजदूर प्रभावित हुए हैं.

विरोध प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे मनरेगा संघर्ष मोर्चा (एनएसएम) के प्रतिनिधियों ने 3 अगस्त को संसद सदस्यों से मुलाकात की और उन्हें अपनी लंबे समय से चली आ रही मांगों से अवगत कराया. ज्ञापन और मांगों का चार्टर आर कृष्णैया (वाईएसआरसीपी), उत्तम कुमार रेड्डी (कांग्रेस), धीरज साहू (कांग्रेस), दीया कुमारी (बीजेपी) और जगन्नाथ सरकार (बीजेपी) को सौंपा. दस्तावेजों को समाजवादी पार्टी के कार्यालय में भी भेजा गया है. इनमें से कुछ सांसदों ने अपना समर्थन व्यक्त किया और इस मुद्दे को संसद में उठाने का वादा किया.

न्यूनतम मजदूरी से भी कम पैसे में काम कर रहे हैं मनरेगा मजदूर

ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने में सक्षम महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत मजदूरों को काफी कम पैसे मिल रहे हैं
2005 में जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून पारित हुआ था तो लगा था यह योजना ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल देगी। 2006 में यह योजना लागू हुई और लागू होने के कुछ ही समय के अंदर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसने गहरी छाप छोड़ी।
बाद में इस योजना के आगे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का नाम जोड़ दिया गया। उसके बाद से आम बोलचाल की भाषा में इसे मनरेगा कहा जाता है। मनरेगा ने न सिर्फ आम लोगों को अपने गांवों और अपने इलाके में रोजगार दिया बल्कि इसने दूसरे कई क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों की मजदूरी में बढ़ोतरी और उनकी कामकाजी परिस्थितियों में सुधार में भी योगदान दिया।
मनरेगा की वजह से ग्रामीण भारत में बुनियादी ढांचे का भी विकास हुआ। इसके तहत सौ दिन का निश्चित रोजगार मिलने की वजह से गांवों में बहुत सारे उत्पादों की मांग बढ़ी और इससे पूरी भारतीय अर्थव्यवस्था में मांग और आपूर्ति के पहिये को गतिमान बनाए रखने में मदद मिली।
लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि मनरेगा का प्रभाव धीरे-धीरे कम करने की दिशा में काम हो रहा है। केंद्र सरकार ने इस योजना के तहत मजदूरी की दर में काफी कम बढ़ोतरी की है। हर राज्य का औसत निकाला जाए तो यह बढ़ोतरी सिर्फ 2.6 फीसदी की है।
कुछ राज्य ऐसे भी हैं जहां मनरेगा की मजदूरी में सिर्फ एक रुपये की बढ़ोतरी की गई है। पंजाब और हिमाचल प्रदेश ऐसे राज्यों में शामिल हैं। जबकि मिजोरम में यह बढ़ोतरी 17 रुपये की है।
कुल मिलाकर छह राज्य ऐसे हैं जहां मनरेगा की मजदूरी में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। इन राज्यों में गोवा, कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। इनके अलवा अंडमान द्वीपसमूह और लक्षद्वीप में भी मनरेगा की मजदूरी में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है।
इस वजह से आज स्थिति यह है कि देश के कुल 33 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा के तहत मजदूरी कर रहे श्रमिकों की मजदूरी कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी से भी कम के स्तर पर है। यह बात नरेगा संघर्ष मोर्चा के एक विश्लेषण में सामने आई है।
मोर्चा के विश्लेषण से पता चलता है कि कुछ राज्य ऐसे हैं जहां कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी और मनरेगा की मजदूरी में काफी फर्क है। गोवा में कृषि क्षेत्र की जो न्यूनतम मजदूरी है, उसके मुकाबले मनरेगा मजदूरों को सिर्फ 62 फीसदी मजदूरी ही मिल रही है।
60 से 70 फीसदी के दायरे में आने वाले राज्यों में गुजरात, बिहार और ओडिशा शामिल हैं। दूसरे कई प्रमुख राज्यों में स्थिति थोड़ी ही ठीक है। सिर्फ छह राज्य ऐसे हैं जहां मनरेगा की मजदूरी कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी के 90 फीसदी से थोड़ा अधिक है।
इस अध्ययन से यह बात भी निकलकर सामने आई कि मनरेगा के तहत सिर्फ नगालैंड ही ऐसा एकमात्र राज्य है जहां मनरेगा के मजदूरों को कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी से अधिक पैसे मिल रहे हैं। नगालैंड में कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी 115 रुपये है। जबकि मनरेगा के मजदूरों को 192 रुपये की मजदूरी मिल रही है।
मनरेगा के तहत अभी सबसे अधिक मजदूरी गोवा में दी जा रही है। गोवा में मनरेगा के तहत काम करने वाले एक श्रमिक को एक दिन की मजदूरी 254 रुपये दी जा रही है। लेकिन गोवा में कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी 405 रुपये प्रति दिन है। मनरेगा के तहत सबसे कम मजदूरी बिहार में 176 रुपये प्रति दिन दी जा रही है।
एक तथ्य यह भी है कि लगातार मनरेगा के तहत मजदूरी बढ़ाने की मांग उठी है। कई समितियों ने भी यह सिफारिश की है कि मनरेगा की मजदूरी बढ़नी चाहिए। अनूप सतपथी समिति ने यह सिफारिश की थी कि मनरेगा की न्यूनतम मजदूरी 375 रुपये तय की जानी चाहिए। लेकिन अब तक इन सिफारिशों पर ध्यान नहीं दिया गया है।
पहले से ही मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूर भुगतान में देरी की समस्या का सामना कर रहे हैं। ऐसे में मजदूरी में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं करके सरकार ने एक तरह से संकेत दिया है कि मनरेगा मजदूरों के हकों और हितों को लेकर वह कितनी गंभीर है।
कहां तो मनरेगा पर संघर्ष करने वाले संगठन 600 रुपये प्रति दिन की मजदूरी मांग रहे हैं और कहां उन्हें कृषि क्षेत्र की न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर काम करने को बाध्य होना पड़ रहा है। ऐसे में इस महत्वकांक्षी योजना का भविष्य क्या होगा, इसे लेकर तरह-तरह के सवाल पैदा हो रहे हैं।