उत्तर प्रदेश : जहाँ स्वतंत्र पत्रकारिता करना अपराध है

ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर को 27 जून के दिन एक ट्वीट के लिए गिरफ्तार किया गया। पुलिस का आरोप था कि इस ट्वीट से कथित तौर पर धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 20 जुलाई को मामले की सुनवाई करते हुए 39 वर्षीय पत्रकार को सभी छह मामलों में जमानत दे दी। ये सभी मामले उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनके खिलाफ दायर किये थे। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जुबैर के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसके आधार पर उन्हें उनकी “स्वतंत्रता से वंचित” रखा जाए। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया, कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स, इंटरनेशनल प्रेस इंस्टीट्यूट जैसे सिविल सोसाइटी ग्रुप्स और कई अन्य लोगों ने ज़ुबैर की गिरफ्तारी को प्रेस की स्वतंत्रता दबाने के नज़रिए से देखा।

2014 के आम चुनावों के बाद, भारत में दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और निरंकुश तरीकों से विपक्ष को दबाने का प्रयास किया है। जिस तरीके से पत्रकारों को रेड, प्रतिबंधित कानूनों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। उन्हें मनमाने ढंग से गिरफ्तार किया जा रहा है। इससे उनमें भय और सेल्फ सेंसरशिप का पैटर्न फैल रहा है।

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स द्वारा जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान 180 देशों में से 150वां  है। सूचकांक की रैंकिग को मोदी सरकार ने “पश्चिमी पूर्वाग्रह” का आरोप लगाते हुए खारिज कर दिया। सरकार ने घटती प्रेस स्वतंत्रता की जांच के लिए एक सूचकांक निगरानी प्रकोष्ठ की भी स्थापना की। इस समिति ने प्रेस की स्वतंत्रता के गिरते स्तर पर ध्यान देने के बजाय आरोपों का प्रतिकार करने में जुटी रही। मंत्रालय ने रिपोर्ट की कार्यप्रणाली को “संदिग्ध और गैर-पारदर्शी” बताया। यह दावा भी किया कि भारत सरकार नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की पूरी गारंटी देती है। मंत्रालय ने कहा, “सरकार प्रेस के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करती है।” हालांकि स्वतंत्र संगठनों ने मंत्रालय द्वारा किए इन बचावों का खंडन किया और सूचकांक निगरानी प्रकोष्ठ के एक सदस्य ने सूचकांक की प्रकिया और निष्कर्षों पर तीखा प्रहार करते हुए लेख भी लिखा।

उत्तर प्रदेश सरकार बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा और मीडिया को निशाने पर लेने की अपनी आदतों के कारण चर्चा में रही  है। हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के सत्ता में आने के बाद से मुस्लिम समुदाय को हाशिए पर रखा गया है और समुदाय विशेष हमलों में भी बढ़ोत्तरी हुई है। मोदी सरकार ने प्रेस को चुप कराने के लिए जिन तरीकों का इस्तेमाल किया, उनमें से एक गैरकानूनी अत्याचार (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) भी है। इस कानून को 1967 में पेश किया गया था। इस अधिनियम में कई बार कड़े नियमों के साथ बदलाव किए जा चुके है। साल 2019 में किए गए संशोधन ने अधिकारियों को यह अधिकार दे दिया कि वह किसी व्यक्ति को बिना सबूत के आतंकवादी मानने और आरोपी को सात साल तक की जेल की सजा दे सकते हैं। इस कानून को कई अधिवक्ताओं और अंतर्राष्ट्रीय अधिकार समूहों ने “कठोर” बताया है। भारत सरकार के अनुसार, 2020 में यूपी में यूएपीए के तहत 361 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें से 54 आरोपियों को दोषी ठहराया गया। उदाहरण के तौर पर,  इसी साल 42 वर्षीय मुस्लिम पत्रकार कप्पन सिद्दकी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। वे हाथरस के एक दलित समुदाय की 19 वर्षीय लड़की के कथित सामूहिक बलात्कार और हत्या के मामले को कवर करने गये थे। आरोप था कि उस लड़की के साथ  उच्च जाति के युवकों ने दुष्कर्म किया था। कप्पन आज भी जेल में बंद हैं।

उत्तर प्रदेश को पत्रकारों के लिए देश में दूसरा सबसे खतरनाक राज्य बताया गया है। पहले स्थान पर जम्मू और कश्मीर क्षेत्र है। यह इलाका दशकों से संघर्ष का क्षेत्र रहा है। कमिटी अगेंस्ट असॉल्ट्स ऑन जर्नलिस्टस की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2017 के बाद से यूपी में पत्रकारों के उत्पीड़न के कुल 138 मामले आए हैं। इनमें 48 पत्रकारों पर शारीरिक हमला किया गया, 66 पत्रकारों पर मामला दर्ज किया गया या गिरफ्तार किया गया और 12 पत्रकार मारे गए।

मीडिया काअपराधीकरण

साल 2020 में उत्तर प्रदेश के मेरठ में सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार जाकिर अली त्यागी को दर्जनों पुलिसकर्मियों ने आधी रात को उनके घर से उठा लिया। उन्हें बिना वारंट के कथित गोहत्या मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। यह मामला उत्तर प्रदेश गोहत्या रोकथाम अधिनियम, 1955 के तहत दर्ज किया गया। इसमें 10 साल जेल की सजा का प्रावधान है। जाकिर का कहना था कि उन पर लगे आरोप मनमाने थे। बीते महीने एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “मुझे एक मुस्लिम पत्रकार होने और सत्ताधीन भाजपा सरकार की आलोचना करने के लिए निशाना बनाया गया है।”

यह पहली बार नहीं था जब जाकिर को धमकाया गया था। उन्हें 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम और अन्य अधिकारों के लिए विरोध प्रदर्शन में भाग लेने पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। यूपी पुलिस ने उन्हें 2021 में उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत गिरफ्तार किया। इस कानून के अनुसार, किसी व्यक्ति को आतंकवादी माना जाता है और कानून उस व्यक्ति को एक साल तक के लिए हिरासत में रखने की अनुमति भी देता है।

23 वर्षीय जाकिर अली त्यागी ने कहा, “पत्रकारों को सलाखों के पीछे रखने के लिए प्रशासन किसी भी हद तक जा सकता है, यहां तक कि झूठी एफआईआर तक दर्ज की जा सकती है।” जाकिर आगे कहते हैं, “सभी उत्पीड़न के बावजूद, मैं यहां (यूपी में) काम कर रहा हूं, लेकिन हो सकता कि आने वाले नए पत्रकार इसे न चुनें। वे पहले से ही दहशत में जी रहे हैं। यूपी में पत्रकार के तौर पर काम करना बर्फ पर चलने जैसा है, अगर आप पत्रकारिता करेंगे तो आप मारे जाएंगे।”

एक अन्य उदाहरण “पेपर लीक मामला” है। मार्च के अंत में अजीत ओझा, दिग्विजय सिंह और मनोज गुप्ता नाम के तीन पत्रकारों को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुए 12वीं कक्षा के परीक्षा पेपर लीक घोटाले का पर्दाफाश करने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया।

अजीत ओझा एक स्थानीय माध्यमिक विद्यालय में प्रोफेसर हैं और हिंदी भाषा के दैनिक अमर उजाला के संवाददाता हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें एक अपराधी की तरह पकड़ लिया और एक एफआईआर दर्ज की, जिसमें उन्हें मामले का आरोपी घोषित किया गया। अजीत ओझा ने द वायर को बताया, “मुझे अपने कार्यालय से दोपहर 12 बजे गिरफ्तार किया गया था, लेकिन एफआईआर शाम 4:30 बजे दर्ज की गई थी। गिरफ्तारी की जगह को शहर का चौराहा और समय शाम 6:30 बताया गया। एफआईआर में ये भी कहा कि जब मुझे पकड़ा गया तो मैं भाग रहा था”। उन्होंने आगे कहा “मुझे फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने का डर है।” इसके अगले ही दिन दिग्विजय सिंह और मनोज गुप्ता को जेल में डाल दिया गया। सिंह ने कहा कि उनके खिलाफ कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं थी, लेकिन “कुछ अज्ञात अराजक तत्वों और शिक्षा माफिया” में उन्होंने अपना नाम शामिल पाया। हिरासत में लिए गए पत्रकारों के सहयोगियों ने कई दिनों तक विरोध किया। आखिरकार पुलिस को उन्हें रिहा करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

65 वर्षीय दिग्विजय सिंह ने द वायर से कहा, “योगी सरकार सच्चाई से नफरत करती है। जब पेपर लीक की खबर फैली, तो पत्रकारों को वास्तविक कहानी के कवर-अप के लिए बलि का बकरा बनाया गया। जब उत्तर प्रदेश पुलिस पत्रकारों के खिलाफ सबूत पेश करने में विफल रही तब उन्हें लगभग चार सप्ताह बाद रिहा कर दिया ।

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने पत्रकारों की गिरफ्तारी की निंदा की और कहा, “हाल ही में यह देखा गया है कि उत्तर प्रदेश सरकार उन मीडियाकर्मियों को धमकाने और गिरफ्तार करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है जो नीतिगत उपायों पर सरकार की सोच का समर्थन नहीं करते हैं। चापलूस और अति-उत्सुक उत्तर प्रदेश पुलिस और नौकरशाह मीडियाकर्मियों को गिरफ्तार करने में बिल्कुल भी हर्ज नहीं करते ताकि वे सत्ता को खुश कर सकें।

लगातार हो रहा उत्पीड़न 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार की आलोचना करने वाले और राज्य में हाशिए पर पड़े लोगों की पीड़ा को उजागर करने वाले कई पत्रकारों को लगातार उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। वरिष्ठ पत्रकार विजय विनीत बताते हैं कि कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान, प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में मुसहर समुदाय के बच्चे जीवित रहने के लिए घास खा रहे थे।उन्होंने निराशा से भरी ये तस्वीरें साझा कीं, जो पूरे सोशल मीडिया पर फैली हुई हैं।

एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, “सरकार की ओर से बहुत दबाव था। जैसे ही मेरा लेख प्रकाशित हुआ, दर्जनों पुलिसकर्मी मेरे कार्यालय में आ धमके। वे स्थानीय प्रशासन से नोटिस लाए थे।उनका दावा था कि रिपोर्ट मनगढ़ंत है और बच्चे घास नहीं बल्कि दाल खा रहे हैं।” स्थानीय प्रशासन ने हमारे संगठन को लेख में बदलाव करने के लिए कहा लेकिन मैंने मना कर दिया। उन्होंने ऐसा करने पर मेरे खिलाफ मामला दर्ज करने की धमकी दी। चूंकि मेरे पास एक मंच था इसलिए मैं लड़ता रहा। बाद में जिला मजिस्ट्रेट ने यह साबित करने के लिए एक जांच दल का गठन किया कि घास वास्तव में दाल थी और लेख ने कथित तौर पर “एक तुच्छ मुद्दे को सनसनीखेज बना दिया है।”

इन सबके बावजूद विनीत विजय अपनी बात पर अड़े रहे। फिर उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कृषि विभाग के कई विशेषज्ञों का साक्षात्कार लिया और घास के पोषण मूल्य और इसे खाने से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों बताते हुए एक लेख प्रकाशित किया। विजय उस समय एक स्थानीय हिंदी समाचार पत्र जनसंदेश टाइम्स के संपादक के रूप में काम कर रहे थे। वे अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक आरोपों और हमलों के बारे में बोलने के लिए पत्रकार संगठनों के पास पहुँचे। 

विजय कहते हैं,“कई बार हम अत्यधिक दबाव की वजह से सुन्न हो जाते हैं। यहां (यूपी में) स्थिति अघोषित आपातकाल जैसी है।” जनवरी 2021 में, विजय को नौकरी से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा और कई महीनों तक उन्हें दूसरी नौकरी नहीं मिली। इसे लेकर उन्होंने कहा, “राज्य में मुख्यधारा का कोई भी मीडिया संस्थान मुझे नौकरी देने के लिए तैयार नहीं था क्योंकि मैंने सच लिखा था।” 

एक अन्य उदाहरण, 4PM समाचार पत्र के प्रधान संपादक और सह-संस्थापक संजय शर्मा का है। 4PM यूपी की राजधानी लखनऊ में स्थित एकमात्र स्वतंत्र दैनिक मीडिया है। अखबार राज्य सरकार की तीखी आलोचना के लिए जाना जाता है। संजय शर्मा ने मीडिया के खिलाफ बढ़ते दबाव की ओर इशारा किया। अखबार हमेशा  से ही सत्तारूढ़ सरकार की ओर आलोचनात्मक दृष्टिकोण पेश करता रहा है। वे कहते हैं कि पिछली सपा सरकार ने कभी काम में हस्तक्षेप नहीं किया।

राज्य में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से पत्रकारों को डराने-धमकाने की घटनाएं बढ़ गई हैं। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स और कई अन्य अधिकार समूहों का कहना है,”अधिकारी कार्रवाई करने की धमकी देकर पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं। इतना ही नहीं, भारत सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को कई हिंदू राष्ट्रवादी ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों तरह से धमका रहे हैं। वे उन्हें परेशान कर रहे हैं और उनके साथ दुर्व्यवहार  कर रहे हैं।”

संजय शर्मा कहते हैं, “भाजपा सरकार बनने के तीन महीनों के भीतर मेरे कार्यालय में तोड़फोड़ की गई। मुझे एक अधिकारी का फोन आया कि अगर अखबार के लिए सालभर सरकारी विज्ञापन पाने हैं तो सरकार विरोधी सामग्री को सेंसर करें। मैंने इनकार किया तो मेरे खिलाफ आर्थिक अपराध शाखा ने जांच की। उन्होंने मेरे परिवार के बैंक खातों की जांच की और कई बार कार्यालय पर छापा मारा।”

उत्पीड़न के बावजूद संजय शर्मा ने उन आलोचनात्मक कहानियों पर काम करना जारी रखा जो उनका अखबार प्रकाशित करता है। उन्होंने कहा, “मुझे अक्सर जान से मारने की धमकी मिलती है क्योंकि मैं सत्ता विरोधी खबरें लिखता हूं।”राज्य में चुनाव के दौरान उनके यूट्यूब चैनल 4PM न्यूज नेटवर्क को रातों-रात हटा दिया गया। यूट्यूब को कई ईमेल लिखने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद चैनल को तीन दिनों के बाद फिर से शुरू किया गया था। कमिटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्टस, रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स, एमनेस्टी इंटरनेशनल, ह्यूमन राइट्स वॉच सहित कई अधिकार समूहों ने पत्रकारों को उनके काम के लिए लगातार उत्पीड़न का सामना करने की निष्पक्ष जांच के लिए कहा है। संजय कहते हैं, “उत्तर प्रदेश के नौकरशाहों ने राज्य को आतंकित किया है।”

खत्म हुई लोकतांत्रिक स्वतंत्रता

मार्च 2017 में राज्य में भाजपा की जीत के बाद मुख्यमंत्री योगी ने एक भाषण में सभी अपराधियों को उत्तर प्रदेश छोड़ने के लिए कहा था। इस भाषण के जवाब में जाकिर ने योगी के आपराधिक रिकॉर्ड का मजाक उड़ाते हुए फेसबुक पर पोस्ट किया। उन्होंने लिखा, “योगी ने (एक भाषण में) गोरखपुर में कहा कि सभी अपराधी यूपी छोड़ दें। मेरे पास योगी को उनके खिलाफ दर्ज कुल 28 मामलों की याद दिलाने का दुस्साहस नहीं है, जिनमें से 22 गंभीर प्रकृति के हैं।

इसी अवधि के दौरान, उत्तराखंड सरकार ने गंगा और यमुना नदियों को “जीवित संस्थाओं” के रूप में मान्यता दी और उन्हें मानव समान कानूनी दर्जा दिया। हालांकि बाद में इस फैसले पर रोक लगा दी गई। खबर फैलने के बाद जाकिर ने फेसबुक पर एक स्टेटस पोस्ट किया, जिसमें लिखा था, “गंगा को एक जीवित इकाई घोषित कर दिया गया है, क्या इसमें किसी के डूबने पर भी आपराधिक मुकदमे लगाए जाएंगे?” इसके कुछ दिनों के बाद उन्हें पुलिसकर्मियों ने उनके घर से जबरदस्ती उठा लिया और दोनों फेसबुक पोस्ट के लिए उसके खिलाफ सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और राजद्रोह कानून के तहत मुकदमा चलाया गया।

सूचना प्रौद्योगिकी नियम भी एक तरीका है जिसका उपयोग सरकार प्रेस को दबाने के लिए करती है। उन्हें साल 2021 में अप्रत्यक्ष रूप से डिजिटल समाचार मीडिया को विनियमित करने के लिए पेश किया गया था। जाकिर पर लगे आरोपों  के आधार पर उन्हें तीन साल की जेल हो सकती थी, लेकिन 42 दिन जेल में बिताने के बाद वे जमानत पर बाहर आ गये। जाकिर ने एक साक्षात्कार में कहा, “जेल से लौटने के बाद से मैंने और अधिक मुखर होने की कोशिश की है, यही वजह है कि प्रशासन ने कई बार अवैध रूप से मेरे घर की तलाशी ली और मेरा लैपटॉप भी जब्त कर लिया।”

एक अन्य मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस ने पत्रकार प्रशांत कनौजिया को दो साल में दो बार सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के लिए गिरफ्तार किया है। ये पोस्ट कथित तौर पर “सांप्रदायिक सद्भाव” को बाधित करते थे। इन गिरफ्तारियों ने सामूहिक रूप से नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीरता से सवाल उठाया है। जानकारों और पत्रकारों द्वारा कई विरोध प्रदर्शनों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कनौजिया को यह कहते हुए जमानत दिया कि “एक नागरिक के स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन किया गया है।” 

सुप्रीम कोर्ट पत्रकारों की रक्षा करती रही है लेकिन यह भी खतरे में है। नौ वर्षों से सत्ता में रहने वाली भाजपा सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के कई तबादले किए। न्यायिक मामलों को “राजनीतिक रूप से पक्षपाती” पीठों को आवंटित किया और सरकार की नीतियों का समर्थन करने वाले कई अधिकारियों को निर्णायक पदों पर रखा। भले ही सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र रूप से काम करता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन जिस राजनीतिक प्रभाव के तहत वह संचालित होता है, उसे बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले के फैसले, जम्मू और कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने, पूर्वोत्तर राज्य असम में एनआरसी के कार्यान्वयन सहित फैसलों में देखा जा चुका है।

उत्तर प्रदेश स्थित एक अधिकार समूह, रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव बताते हैं, “यूपी में पत्रकारों पर पहले भी हमले हुए थे, लेकिन आज ऐसी मानसिकता बन गई है कि भाजपा सरकार का विरोध करने का मतलब देश का विरोध करना और  उस व्यक्ति को आतंकवादी माना जाएगा।

पत्रकारिता के लिए मारे गए पत्रकार

कुछ पत्रकारों पर दुश्मनी के भाव से कार्रवाई की गई, जिससे उनकी मौत हुई। कमिटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्टस के अनुसार, पत्रकारों के खिलाफ हत्या के 20 मामले अभी भी अनसुलझे हैं। इसकी वजह से भारत को ऑर्गनाइजेशन ग्लोबल इम्प्यूनिटी इंडेक्स में 12वें स्थान पर रखा गया है।

साल 2020 में 25 वर्षीय पत्रकार शुभम मणि त्रिपाठी की उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में अवैध रेत खनन का पर्दाफाश करने के बाद दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। कम्पू मेल अखबार के लिए काम करने वाले पत्रकार ने ‘रेत माफियाओं’ पर आरोप लगाया था कि उनका लेख प्रकाशित होने के बाद से माफियाओं जिलाधिकारी के पास उनके खिलाफ फर्जी मामला दर्ज किया था।

राज्य के अधिकारियों को कई ईमेल भेजने और पुलिसकर्मियों को जान से मारने की धमकियों की सूचना देने के बावजूद, कोई त्वरित कार्रवाई नहीं की गई, जिसके बाद उनकी हत्या कर दी गई। यूनेस्को के महानिदेशक ऑड्रे अज़ोले ने त्रिपाठी की हत्या की निंदा करते हुए कहा था, “मैं अधिकारियों से इस अपराध के अपराधियों को न्याय दिलाने का आह्वान करता हूं, जो अन्य अपराधियों को बंदूक की नोक पर सेंसरशिप का अभ्यास करने से रोकने के लिए आवश्यक है।”

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर ने भी मामले की जांच करने के लिए एक बयान जारी किया। जिसमें कहा, “उत्तर भारत (यूपी) के इस क्षेत्र में, रेत माफिया मालिकों और स्थानीय पुलिस प्रमुखों के बीच संबंधों का मतलब है कि जब पत्रकारों की हत्या के बाद पुलिस जांच लगभग हमेशा आगे की कार्रवाई के बिना बंद कर दी जाती है। पत्रकारों की सुरक्षा की गारंटी देने वाले कानून के माध्यम से अपराध कर सजा न पाने वाले प्रणाली के दुष्चक्र को तोड़ा जाना चाहिए।”

एक साल बाद एक 42 वर्षीय पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव को उत्तर प्रदेश में स्थानीय शराब माफिया पर एक लेख को कवर करने के बाद पीटा गया और रहस्यमय तरीके से मृत पाया गया। वे प्रतिष्ठित समाचार चैनल एबीपी न्यूज़ के लिए काम करते थे। श्रीवास्तव ने कथित तौर पर अपनी मौत से एक दिन पहले माफियाओं से जान का खतरा महसूस करने के बाद पुलिस को एक पत्र लिखा था और सुरक्षा का अनुरोध किया था। हालांकि पुलिस ने पहले मौत की वजह मोटरसाइकिल दुर्घटना को बताया, लेकिन बाद में अधिकारियों ने मौत की आपराधिक जांच शुरू की। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स एशिया प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर स्टीवन बटलर ने अपने बयान में कहा, “उत्तर प्रदेश सरकार को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि पत्रकारों के लिए सभी खतरों की पूरी तरह से जांच की जाए और पत्रकारों द्वारा रिपोर्टिंग उनकी खुद की मौत की वजह न बन जाए।”

कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट के अनुसार, पिछले 10 वर्षों में दुनिया भर में पत्रकारों के हत्यारों में से 81 प्रतिशत को सजा नहीं मिली है। कमिटी फॉर प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट ने 1992 से 2022 की अवधि के बीच भारत में 89 पत्रकारों और मीडिया कर्मियों की हत्याओं को सूची दी है। इसमें ज्यादातर हत्या महत्वपूर्ण समाचार रिपोर्ट को कवर करने के कारण की गई है। भारत का स्वतंत्र प्रेस मुखर और सक्रिय होने के लिए जाना जाता है। भारतीय मीडिया ने पहले भी कई तनावपूर्ण परिस्थितियों में काम किया है, खासकर 1970 के दशक के मध्य में ऐतिहासिक आपातकाल के दौरान, जबकि वर्तमान संकट अभूतपूर्व है। 

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि आगामी भाजपा के फिर से चुनाव की अवधि पहले से ही भयावह स्थिति को बढ़ा सकती है। विजय विनीत समेत कई पत्रकार चिंतित हैं। उन्होंने कहा, “मैं आने वाले वर्षों में सरकार के निशाने पर हूं। यूपी में स्थिति समय के साथ और खराब हो सकती है.”

अनुवादविष्णु प्रकाश पांडेय

पत्रकारिता को बचाने की चुनौती

इसमें अब कोई शक-शुबहे की गुंजाइश नहीं रह गई है कि एक संस्था के रूप में भारतीय पत्रकारिता खासकर मुख्यधारा की कार्पोरेट स्वामित्ववाले न्यूज मीडिया संस्थानों में पत्रकारिता साख के एक बड़े संकट से गुजर रही है. संभव है कि आप अपने खुद के अनुभवों से भी यह महसूस करते होंगे कि मुख्यधारा के कार्पोरेट स्वामित्ववाले न्यूज मीडिया और उसमें हो रही पत्रकारिता कितने गंभीर नैतिक और राजनीतिक-सामाजिक-कारोबारी-सांस्थानिक विचलनों की शिकार हो चुकी है; मुनाफे और दूसरे निजी हितों की पूर्ति के लिए किस तरह अनैतिक समझौते, सत्ता और बड़े कार्पोरेट समूहों के पक्ष में चापलूसी, प्रोपेगंडा और नागरिकों के साथ धोखाधड़ी कर रही है.

आपसे यह भी नहीं छुपा है कि किस तरह यह प्रोपेगंडा मीडिया न सिर्फ ताकतवर-प्रभावशाली लोगों और सत्ता का भोंपू बन गया है, बिना किसी शर्म और लाज-लिहाज के उनके एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है, गरीबों-कमजोर वर्गों और उनकी जरूरतों और मुद्दों को अनदेखा कर रहा है. यही नहीं, वह सत्ता की पैरोकारी में सच पर पर्दा डालने, सच्चाई को तोड़ने-मरोड़ने, सच को झूठ और झूठ को सच बनाने से लेकर वास्तविक मुद्दों से देश-समाज का ध्यान बंटाने के लिए पीआर, प्रोपेगंडा और छल तक का सहारा ले रहा है.

लेकिन हद तो यह हो गई है कि पिछले कुछ सालों से एक तो करेला, दूसरे नीम चढ़ा की तर्ज पर यह प्रोपेगंडा न्यूज मीडिया समाज में जहरीले सांप्रदायिक-दक्षिणपंथी प्रोपेगंडा के जरिये बंटवारे और ध्रुवीकरण की राजनीति को आगे बढ़ा रहा है. वह खुलेआम नफरत बेच रहा है, सामाजिक सद्भाव को बिगाड़ रहा है, अल्पसंख्यक धार्मिक समुदायों और कमजोर वर्गों को निशाना बना रहा है और आम लोगों को जहरीले प्रोपेगंडा से मानसिक रूप से बीमार बना रहा है.

यही नहीं, न्यूज मीडिया समूहों खासकर न्यूज चैनलों और उनके स्टार एंकरों-संपादकों-रिपोर्टरों में जहरीले-नफरत भरे ‘हेट स्पीच’ और प्रोपेगंडा में एक-दूसरे को पछाड़ने और सबसे आगे निकलने की होड़ में हर दिन एक लक्ष्मण-रेखा टूट रही है. कल तक जिसे हेट स्पीच समझा जाता था और जिसे सार्वजनिक विमर्श में अस्वीकार्य, असहनीय और शर्मिंदगी का कारण माना जाता था, इन न्यूज चैनलों ने उस सांप्रदायिक नफरत, घृणा और हिंसा को न सिर्फ दैनिक सार्वजनिक विमर्श का स्वीकार्य हिस्सा बना दिया है बल्कि उसका पूरी तरह से सामान्यीकरण (नॉर्मलाइजेशन) कर दिया है.

इस आलेख में इसके कारणों में विस्तार से जाने की गुंजाइश या जरूरत नहीं है और शायद दोहराव का खतरा भी है. इस प्रोपेगंडा न्यूज मीडिया और उसके बारे में आलोचनात्मक आलेख और टिप्पणियां आपने खूब पढ़ी होंगी. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इसकी बुनियादी वजह बड़ी कार्पोरेट पूंजी के स्वामित्ववाले न्यूज मीडिया की संरचना में ही निहित है. जैसाकि वरिष्ठ पत्रकार पी. साईंनाथ कहते हैं कि कार्पोरेट न्यूज मीडिया की संरचना की यह अनिवार्यता है कि वह झूठ बोले.

इसके साथ ही कार्पोरेट न्यूज मीडिया का सामाजिक ढांचा अब भी बुनियादी तौर पर सवर्ण-पुरुष-शहरी-अभिजात्य तबके से आनेवाले गेटकीपरों (संपादकों/पत्रकारों) तक सीमित है और आतंरिक ढाँचे में लोकतंत्र के लिए कोई खास जगह नहीं है. कार्पोरेट न्यूज मीडिया के ज्यादातर समाचारकक्षों में माहौल न सिर्फ दमघोंटू है बल्कि सामाजिक रूप में प्रतिगामी और उत्पीड़क है.

कार्पोरेट न्यूज मीडिया की इन सच्चाइयों और उसकी सीमाओं को लोग धीरे-धीरे समझने लगे हैं. इन सब कारणों से कार्पोरेट स्वामित्ववाली न्यूज मीडिया और उसमें हो रही कथित पत्रकारिता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. यही नहीं, उसका बड़ा हिस्सा न सिर्फ अपनी साख खो चुका है बल्कि नागरिकों के एक छोटे हिस्से में ही सही लेकिन उसके खिलाफ गुस्सा बढ़ता जा रहा है.
यह गुस्सा कई रूपों में अभिव्यक्त भी हो रहा है. लोग विकल्प खोज रहे हैं. आखिर बिना स्वतंत्र, मुखर और सच्ची पत्रकारिता के लोकतंत्र भी नहीं चल सकता है और उसके कारण नागरिकों की आज़ादी और अधिकार भी खतरे में हैं. कहने की जरूरत नहीं है कि आमलोगों के सरोकारों से जुड़ी, स्वतंत्र और गैर-लाभकारी मीडिया उपक्रमों से संचालित वैकल्पिक पत्रकारिता की जरूरत आज पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है.

लेकिन सवाल यह है कि क्या वैकल्पिक पत्रकारिता मुख्यधारा की पत्रकारिता की जगह ले सकती है? क्या वैकल्पिक न्यूज मीडिया उपक्रमों और उसके विभिन्न प्लेटफार्मों में मुख्यधारा की कार्पोरेट न्यूज मीडिया कंपनियों के पैमाने पर समाचारों के संकलन और आमलोगों तक पहुँचने का सामर्थ्य है? सवाल यह भी है कि क्या मुख्यधारा की कार्पोरेट नियंत्रित पत्रकारिता में सुधार या बदलाव की सारी संभावनाएं खत्म हो चुकी हैं?

यह सही है कि कार्पोरेट नियंत्रित पत्रकारिता में बुनियादी बदलाव असंभव है और कार्पोरेट स्वामित्व के ढाँचे में बदलाव और विज्ञापन आधारित बिजनेस माडल की जगह नए बिजनेस माडल के बिना आदर्श पत्रकारिता की पुनर्बहाली मुश्किल है. लेकिन क्या वहां इन सीमाओं के बावजूद पत्रकारिता को दोबारा कम से कम इस स्थिति में नहीं लाया जा सकता है कि वह स्वतंत्र, तथ्यपूर्ण, साक्ष्यों पर आधारित और संतुलित रिपोर्टिंग कर सके, विचारों के मामले में वैचारिक विविधता और बहुलता का सम्मान करे और सत्ता और कार्पोरेट गठजोड़ के प्रोपेगंडा भोंपू की तरह जहरीला-सांप्रदायिक प्रचार न करे?

ये सवाल न्यूज मीडिया आलोचना के बीच इसलिए महत्वपूर्ण हो गए हैं क्योंकि कार्पोरेट नियंत्रित मुख्यधारा की पत्रकारिता के विचलनों/स्खलनों और कुछ मामलों में उसके पतन की आलोचना के बाद उसके विकल्पों या उसमें सुधार का सवाल आमतौर पर अधूरा छोड़ दिया जा जाता है या अनदेखा कर दिया जाता है. यही नहीं, इस प्रक्रिया में आम नागरिकों यानी पाठकों-दर्शकों-श्रोताओं की क्या भूमिका हो सकती है? क्या वे मौजूदा मीडिया परिदृश्य में हस्तक्षेप करने और पत्रकारिता जैसी जरूरी लोकतान्त्रिक संस्था की गरिमा और इयत्ता को बहाल करने में सक्षम हैं? क्या वे कार्पोरेट नियंत्रित न्यूज मीडिया पर सुधार का दबाव और वैकल्पिक न्यूज मीडिया को ताकतवर बनाने में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं?

महत्वपूर्ण है नागरिकों की भूमिका

सच यह है कि पत्रकारिता आज जिस गहरे संकट में है, उसमें एक बड़ा कारण उससे जुड़े मामलों में नागरिकों की आमतौर पर निष्क्रिय भूमिका भी है. आश्चर्य नहीं कि न्यूज मीडिया के जनतान्त्रिकीकरण और उसमें सुधार/बदलाव के मुद्दे न तो राजनीतिक दलों के एजेंडे पर हैं और न ही नागरिक समाज के एजेंडे पर. ऐसा लगता है जैसे यह कोई मुद्दा नहीं हो. इस तथ्य के बावजूद कि राष्ट्रीय मसलों और सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने, जनमत बनाने और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को निर्देशित करने और लोगों की आज़ादी और अधिकारों को फ़ैलाने या संकुचित करने में मीडिया की ताकत लगातार बढ़ती जा रही है, वह सार्वजनिक बहसों और चर्चाओं से बाहर है और कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कार्पोरेट नियंत्रित न्यूज मीडिया की जवाबदेही या उसके कामकाज में पारदर्शिता या उसके नियमन जैसे जरूरी मुद्दे पर कोई सार्वजनिक पहल, कार्रवाई और आन्दोलन भी नहीं दिखाई देता है.

ऐसे में, यहाँ कार्पोरेट नियंत्रित न्यूज मीडिया में सुधार और उसके जनतान्त्रिकीकरण के साथ वैकल्पिक न्यूज मीडिया को प्रभावी बनाने के मद्देनजर चर्चा के लिए कुछ प्रस्ताव पेश हैं. ये प्रस्ताव न तो पर्याप्त हैं और न ही इनका मकसद एकतरफा कार्रवाई को प्रोत्साहित करना है. इन प्रस्तावों का उद्देश्य कार्पोरेट न्यूज मीडिया में सुधार/बदलाव के साथ पत्रकारिता की साख को बहाल करने, उसे जवाबदेह और पारदर्शी बनाने और नागरिकों की अपने दायित्व के बाबत जागरूक बनाने के लिए सार्वजनिक चर्चा/बहस को प्रोत्साहित करना है.

मीडिया साक्षरता और उसके बारे में आलोचनात्मक समझ बढाने के लिए

1. देश में मीडिया साक्षरता और उसके बारे में आलोचनात्मक समझ बनाने के लिए एक बड़ा अभियान चलाने की जरूरत है. न्यूज मीडिया यानी अखबारों को पढने, टीवी देखने और डिजिटल माध्यमों को बरतने के लिए एक आलोचनात्मक दृष्टि और विवेक जरूरी है. न्यूज मीडिया कैसे काम करता है, संपादकों/पत्रकारों की क्या भूमिका होती है, वे कैसे समाचार चुनते और गढ़ते हैं, सम्पादकीय मूल्य क्या होते हैं और उनके काम करने के नैतिक मापदंड क्या है, समाचार कैसे संकलित, सम्पादित और प्रस्तुत किए जाते हैं, टीवी में विजुअल्स कैसे बनते हैं, उन्हें कैसे सम्पादित किया जाता है, कैमरा कैसे काम करता है जैसे अनेकों पहलुओं के बारे में स्पष्ट और आलोचनात्मक समझ होने पर पाठक-दर्शक-श्रोता न्यूज मीडिया के कंटेंट को ज्यादा सतर्क और सचेत रूप से ग्रहण करेंगे.

हालाँकि मीडिया साक्षरता का यह अभियान चलाना इतना आसान नहीं है. इसके लिए न सिर्फ बड़े पैमाने पर संसाधनों और प्रशिक्षकों की जरूरत है बल्कि इसे एक साथ कई स्तरों पर चलाना होगा. इस अभियान को स्कूलों, कालेजों-विश्वविद्यालयों से लेकर कचहरियों, निजी-सरकारी दफ्तरों/कार्यस्थलों तक ले जाना होगा. यही नहीं, घरों के अन्दर ड्राइंगरूम से लेकर किचन तक और दफ्तरों समेत दूसरे सार्वजनिक जगहों पर इस बारे में चर्चा करनी होगी. एक नागरिक के बतौर हमें न्यूज मीडिया के कामकाज और उसके कंटेंट लेकर आलोचनात्मक चर्चा को ड्राइंग रूम और व्हाट्सएप्प समूहों से लेकर कार्यस्थलों और कैंटीन/कैफेटेरिया तक ले जाना होगा. उसे हर मंच पर उठाने, बोलने और लिखने की कोशिश करनी होगी. अब इसपर चुप रहने या उसे अनदेखा करने का विकल्प नहीं है.

2. मीडिया साक्षरता अभियान का एक और बहुत जरूरी हिस्सा है- न्यूज मीडिया से आ रहे कंटेंट में दिखनेवाली गड़बड़ियों, विचलनों और तोड़मरोड़ पर सार्वजनिक प्रतिकार करना. इसके लिए नागरिक समाज के संगठनों से लेकर आम नागरिकों को नियमित तौर पर संपादकों को प्रतिवाद चिट्ठियां और ईमेल लिखने से लेकर उस बारे में प्रेस काउन्सिल और न्यूज ब्राडकास्टिंग स्टैण्डर्ड अथारिटी को शिकायती पत्र लिखने चाहिए. उन्हें इस बारे में सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी अपनी बात दर्ज करवानी चाहिए. गंभीर विचलनों और जहरीले-सांप्रदायिक प्रोपेगंडा के मामलों में “नाम लेकर शर्मिंदा करना” (नेम एंड शेम) भी जरूरी है. याद रहे कि सार्वजनिक आलोचना का दोहरा असर होता है- एक, कार्पोरेट न्यूज मीडिया संस्थानों पर दबाव पड़ता है और दूसरे, इस बारे में आम नागरिकों की चेतना भी बढ़ती है.

आप जैसे आम पाठक-दर्शक-श्रोता ऐसे मामलों में सक्रिय दिलचस्पी लेकर अपने परिचितों के साथ बात कर सकते हैं, व्हाट्सएप्प समूहों में चर्चा शुरू कर सकते हैं और सोशल मीडिया पर टिप्पणियां लिख सकते हैं. संपादकों को चिट्ठी और ईमेल लिख सकते हैं.

3. मीडिया साक्षरता अभियान के तहत फैक्ट चेक करनेवाले संगठनों और प्लेटफार्म्स को मजबूत बनाना बहुत जरूरी है. औद्योगिक स्तर पर संगठित-संचालित सत्ता समर्थक प्रोपेगंडा और जहरीले-सांप्रदायिक प्रचार के मुकाबले में आल्ट-न्यूज, बूम-लाइव और इंडिया-स्पेंड जैसे फैक्ट चेकर्स की ताकत भले कम हो, उनके पास उस स्तर के संसाधन और पहुँच न हो लेकिन इन सबने संगठित फेक न्यूज और जहरीले प्रोपेगंडा के मुकाबले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसमें कोई शक नहीं है कि वे मीडिया साक्षरता यानी मीडिया के कामकाज और उसके कंटेंट के बारे में लोगों को जागरूक करने के साथ लोगों को तथ्यों और सच्चाई से अवगत कराने की जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे रहे हैं. वे कार्पोरेट मीडिया के लिए वास्तविक नियामक और अंकुश का काम कर रहे हैं.

हमें उनके साथ खड़ा होना होगा. उनकी रिपोर्टों को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने की कोशिश करनी होगी. एक नागरिक के रूप में कम से कम हम उनकी रिपोर्टों को सोशल मीडिया पर शेयर करने के साथ अपने परिचितों के व्हाट्सएप्प समूहों में भेजें तो झूठ और प्रोपेगंडा से लड़ने में मदद मिलेगी. हम अपने-अपने इलाकों में छोटे स्तर पर ही सही झूठी ख़बरों/प्रोपेगंडा की जांच-पड़ताल कर सकते हैं या फेक न्यूज/प्रोपेगंडा की जांच-पड़ताल के लिए फैक्ट चेकर्स के पास भेज सकते हैं.
हमें इन फैक्ट चेकर्स की हर तरह से मदद करनी चाहिए. अगर साल में एक बार अपनी आर्थिक सामर्थ्य के मुताबिक कम से कम 500 रूपये से लेकर 5000 रूपये तक मदद कर सकें तो उन्हें न सिर्फ अपना काम बढ़ाने, उसे स्थायित्व देने और अपनी पहुँच बढ़ाने में मदद मिलेगी बल्कि उनकी स्वतंत्रता भी सुनिश्चित हो सकेगी. फैक्ट चेकर्स कार्पोरेट या सरकारी पैसे के बजाय हम-आप जैसे लोगों के पैसे से चलें तो वे ज्यादा स्वतंत्र और निर्भीक होकर अपना काम कर पायेंगे.

कार्पोरेट न्यूज मीडिया में सुधार और उसके जन्तान्त्रिकीकरण के लिए

4. आज कार्पोरेट न्यूज मीडिया के स्वामित्व के नियमन की सख्त जरूरत है. इसकी शुरुआत न्यूज मीडिया कंपनियों के स्वामित्व और उसकी शेयर-होल्डिंग को सार्वजनिक किया जाना चाहिए. उसमें सिर्फ कंपनी नहीं बल्कि उसके असली मालिक का नाम भी होना चाहिए. अभी ज्यादातर न्यूज मीडिया कम्पनियाँ शेयर-होल्डर के रूप में कंपनियों के नाम घोषित कर देती हैं लेकिन उससे यह पता नहीं चलता कि उसके वास्तविक मालिक कौन हैं. यही नहीं, इस जानकारी को एक पब्लिक पोर्टल पर डाला जाना चाहिए.

इसके अलावा न्यूज मीडिया में न सिर्फ बड़ी पूंजी के प्रवेश को सीमित और नियंत्रित करने की जरूरत है बल्कि मुख्यधारा के मीडिया में क्रास मीडिया प्रतिबंधों को भी लागू करने की जरूरत है. इस संबंध में टेलीकाम नियामक- ट्राई और एएससीआई प्रस्ताव सरकार के पास है. उनपर सार्वजनिक चर्चा होनी चाहिए. नागरिक समाज को और कार्पोरेट न्यूज मीडिया की मौजूदा स्थिति से चिंतित हर नागरिक (पाठक-दर्शक-श्रोता) को भी राजनीतिक दलों पर इस बारे में अपना स्टैंड स्पष्ट करने के लिए दबाव बनाना चाहिए.

5. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कार्पोरेट न्यूज मीडिया के कंटेंट के स्व-नियमन की मौजूदा व्यवस्था नैतिक विचलनों, कंटेंट में तोड़मरोड़ और जहरीले-सांप्रदायिक प्रोपेगंडा को नियंत्रित करने में काफी हद तक नाकाम साबित हुई है. लेकिन इसका विकल्प सरकारी नियमन कतई नहीं है. सरकारी नियमन मर्ज को और बदतर बना देगा. इसलिए आज जरूरत है कि कंटेंट संबंधी शिकायतों को रिपोर्ट करने-सुनने और उसकी जांच-पड़ताल करने के लिए संसद में पारित कानून के जरिये एक स्वतंत्र नियामक का गठन हो. यह नियामक सरकार और कार्पोरेट न्यूज मीडिया उद्योग दोनों से स्वतंत्र होना चाहिए. उसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए संसद में विधेयक लाने से पहले उसके मसौदे पर व्यापक चर्चा और सभी भागीदारों से सलाह-मशविरा होना चाहिए. लेकिन उसे आर्थिक जुर्माना लगाने से लेकर गंभीर मामलों में लाइसेंस निलंबित करने तक का अधिकार होना चाहिए.

नागरिक समाज को इसकी मांग को लोकप्रिय बनाने और इसे स्वीकार करने के लिए राजनीतिक दलों पर दबाव बनाना चाहिए. आखिर खुद को लोकतंत्र का पहरेदार बतानेवाले न्यूज मीडिया अपने कामकाज और कंटेंट की निगरानी और जवाबदेही से कब तक बचता रहेगा.

6. कार्पोरेट न्यूज मीडिया कंपनियों और उनके न्यूजरूम के जनतान्त्रिकीकरण को प्राथमिकता देने की जरूरत है. इसके लिए कई स्तरों पर पहल होनी चाहिए. सबसे पहले पत्रकारों/संपादकों की सेवा-शर्तों को बेहतर बनाने और उनकी नौकरी की सुरक्षा के लिए श्रमजीवी पत्रकार कानून, 1955 को संशोधित करके अखबारों के साथ-साथ टीवी न्यूज चैनलों और डिजिटल प्लेटफार्मों पर भी लागू करने की व्यवस्था करनी होगी. अस्थाई ठेके या सालाना कान्ट्रेक्ट पर या बिना किसी नियुक्ति पत्र के नौकरी कराने की व्यवस्था पर रोक लगनी चाहिए. इस कानून के तहत गठित होनेवाले पत्रकारों के वेतन आयोग की सिफारिशों को कड़ाई से लागू कराया जाना चाहिए. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिका सबसे अहम है और उसपर निगरानी रखी जानी चाहिए.
इस कानून को पिछले कुछ दशकों में ताकतवर न्यूज मीडिया कंपनियों और सरकारों के गठजोड़ ने कमजोर और बेमानी बना दिया है. लेकिन आज इस कानून को और प्रभावी और सशक्त बनाने की जरूरत है. इसके साथ ही पत्रकारों को अपने संस्थानों में यूनियन बनाने का अधिकार होना चाहिए. इसके लिए न्यूज मीडिया कंपनियों में यूनियन बनाना अनिवार्य होना चाहिए. यूनियन को कानूनी संरक्षण मिलनी चाहिए और उसके नेतृत्व में शामिल पत्रकारों/संपादकों को कंपनियों की बदले की कार्रवाई से सुरक्षा देने का उपाय किया जाना चाहिए.

7. न्यूज मीडिया संस्थानों के जनतान्त्रिकीकरण के लिए उनके न्यूजरूम की सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल को ज्यादा समावेशी और भागीदारीपूर्ण बनाने की जरूरत है. यह सचमुच अफ़सोस और चिंता की बात है कि लोकतंत्र का चौथा खम्भा होने का दावा करनेवाले न्यूज मीडिया संस्थान खुद बहुत अलोकतांत्रिक हैं. उनके न्यूजरूम में सवर्ण-पुरुष-शहरी और अभिजात्य/मध्यवर्गीय परिवारों से आनेवाले पत्रकारों/संपादकों का दबदबा है. उसमें दलितों-आदिवासियों-पिछड़े वर्गों-अल्पसंख्यकों-महिलाओं और गरीब/ग्रामीण पृष्ठभूमि के परिवारों से आनेवाले पत्रकारों की संख्या न के बराबर है. इसे बदले बिना न्यूज मीडिया खुद को लोकतान्त्रिक संस्था नहीं कह सकता.

नागरिक समाज से जुड़े संगठनों, पत्रकार यूनियनों और एडिटर्स गिल्ड जैसी संस्थाओं को न्यूज मीडिया कंपनियों और उनके न्यूजरूम को ज्यादा समावेशी और भागीदारीपूर्ण बनाने के लिए न सिर्फ इसे मुद्दा बनाना चाहिए बल्कि उनपर दबाव डालकर इस स्थिति को बदलने के लिए प्रेरित करना चाहिए. यहाँ आरक्षण की मांग नहीं की जा रही है लेकिन यह कानूनी प्रावधान किया जा सकता है कि न्यूज मीडिया कम्पनियाँ अपने सामाजिक प्रोफाइल की सालाना रिपोर्ट जारी करें. यही नहीं, उन न्यूज मीडिया कंपनियों को टैक्स में छूट और अन्य आर्थिक प्रोत्साहन (जैसे अन्य के मुकाबले 10 फीसदी ऊँचा एड रेट) देने चाहिए जो अपने न्यूजरूम में कम से कम 40 से 50 फीसदी समाचारकर्मी दलित-आदिवासी-पिछड़े-अल्पसंख्यक और महिला तबकों से भर्ती करें.

8. इन उपायों के बावजूद कार्पोरेट न्यूज मीडिया के उस हिस्से में सुधार की गुंजाइश कम दिखती है जो खुले तौर पर दक्षिणपंथी-सांप्रदायिक राजनीति खेमे में सम्बद्ध है और उसके एजेंडे के मुताबिक जहरीले-सांप्रदायिक प्रोपेगंडा में जुटा हुआ है. इससे निपटने के लिए सत्याग्रह और शांतिपूर्ण असहयोग के अलावा कोई रास्ता नहीं है. ऐसे समाचारपत्रों/पत्रिकाओं के साथ न्यूज चैनलों को चिन्हित करना चाहिए. उनके कामकाज के तरीकों और कंटेंट पर बारीक निगाह रखी जानी चाहिए. उनके गंभीर विचलनों को अनदेखा करने के बजाय उसे सोशल मीडिया पर “नाम लो, शर्मिंदा करो” के तहत चर्चा करनी चाहिए.
इसके साथ ही उनके आर्थिक बहिष्कार जैसे सब्सक्रिप्शन रद्द करने पर भी विचार करना चाहिए. उन कार्पोरेट्स पर भी निगाह रखनी चाहिए जो ऐसे जहरीले प्रोपेगंडा को स्पांसर कर रहे हैं. आखिर जहरीले प्रोपेगंडा को सबस्क्राइब करना या उसके स्पांसर्स की वस्तुएं/सेवाएँ खरीदना क्या उन्हें परोक्ष प्रोत्साहन देना नहीं है?

लोक प्रसारण के लिए प्रस्ताव

9. भारत में जब भी न्यूज मीडिया में सुधार और बदलाव और पत्रकारिता की साख को बहाल करने की बात होती है, उसमें आमतौर पर लोक प्रसारणकर्ता (पब्लिक ब्राडकास्टर) यानी दूरदर्शन और आकाशवाणी की चर्चा नहीं होती है. हालाँकि 80 के दशक तक दूरदर्शन/आकाशवाणी की स्वायत्तता और आज़ादी का मुद्दा सार्वजनिक बहसों और राजनीतिक दलों के एजेंडे पर रहता था लेकिन 90 के दशक के उत्तरार्ध से यह मुद्दा सार्वजनिक बहसों से गायब हो गया है. जैसे यह मान लिया गया हो कि दूरदर्शन/आकाशवाणी सरकारी चैनल हैं और उनका काम सरकारी प्रचार करना है.

मजे की बात यह है कि दूरदर्शन/आकाशवाणी आज कानूनी रूप से एक स्वायत्त निगम- प्रसार भारती के तहत काम कर रहे हैं जो संसद को जवाबदेह है लेकिन इसके बावजूद उनके कामकाज की वैसी सार्वजनिक पड़ताल या संसदीय छानबीन नहीं होती दिखती है, जैसी दुनिया के बहुतेरे देशों में लोक प्रसारकों की होती है. उदाहरण के लिए बीबीसी के कामकाज की संसदीय और सार्वजनिक पड़ताल होती रहती है और वह अक्सर सार्वजनिक आलोचनाओं के केंद्र में रहती है.

भारत में भी प्रसार भारती के कामकाज पर निगरानी रखने की जरूरत है. यह हमारे-आपके टैक्स के पैसे से चलता है. लोक प्रसारक को आम लोगों लोगों की सूचना-समाचार की जरूरतों को पूरा करनेवाला होना चाहिए. वह सरकार का भोंपू कतई नहीं है और न होना चाहिए. नागरिक समाज के संगठनों को उसके कामकाज और कंटेंट पर सार्वजनिक चर्चा करनी चाहिए और राजनीतिक दलों को संसद में उसकी निगरानी और जवाबदेही तय करनी चाहिए ताकि वह वास्तव में लोक प्रसारक की तरह काम करे.

वैकल्पिक मीडिया के लिए प्रस्ताव

10. इसमें कोई शक नहीं है कि मौजूदा दौर में जब दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी “मीडिया कैप्चर” एक सार्वजनिक सच्चाई है, वैकल्पिक न्यूज मीडिया को मजबूत बनाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. वैकल्पिक न्यूज मीडिया को मजबूत और प्रभावी बनाने की यह जिम्मेदारी हर उस आम नागरिक की है जो लोकतंत्र में सच्ची, स्वतंत्र, तथ्यपूर्ण, वस्तुनिष्ठ और संतुलित सूचनाओं/समाचारों के अबाध प्रवाह को बुनियादी जरूरत समझता है और जो खोजी-आलोचनात्मक-प्रतिपक्षी न्यूज मीडिया को अपनी आज़ादी और अधिकारों की गारंटी और पहरेदार मानता है.

वैकल्पिक न्यूज मीडिया को मजबूत बनाने के लिए यह जरूरी है कि ऐसे सभी स्वतंत्र-आलोचनात्मक मीडिया उपक्रमों की आर्थिक मदद की जाए जिन्होंने सरोकारी पत्रकारिता की है, सत्ता-कार्पोरेट से सवाल पूछने का साहस दिखाया है और सार्वजनिक विमर्श में आमलोगों के मुद्दों को उठाने की कोशिश की है. सभी सचेत नागरिकों को जो कार्पोरेट न्यूज मीडिया के अखबारों/न्यूज चैनलों के लिए हर महीने आठ सौ से हजार रूपये खर्च करते हैं, उन्हें इन वैकल्पिक न्यूज मीडिया उपक्रमों पर भी हर महीने 200-500 रूपये खर्च करने पर जरूर विचार करना चाहिए. हमारे-आपके पैसे पर चलनेवाला न्यूज मीडिया ही हमारे हितों की रखवाली कर सकता है, सत्ता-कार्पोरेट के दबावों को झेल सकता है और अपनी स्वतंत्रता सुरक्षित रख सकता है.
असल में, आज दुनिया भर में खासकर विकसित और उदार पूंजीवादी लोकतान्त्रिक पश्चिमी देशों में कार्पोरेट न्यूज मीडिया का मौजूदा विज्ञापन और बड़ी पूंजी आधारित बिजनेस माडल साख के संकट का सामना कर रहा है. ज्यादातर मीडिया विश्लेषक मान रहे हैं कि यह बिजनेस माडल संकट में है और टिकाऊ नहीं है, इसमें पत्रकारीय स्वतंत्रता संभव नहीं है, नैतिक विचलनों और समझौतों को रोकना मुश्किल है और इसलिए इसका विकल्प खोजना जरूरी है. इसका विकल्प पत्रकारों के कोआपरेटिव/ट्रस्ट पर आधारित स्वामित्ववाली कंपनियों और आम पाठकों/दर्शकों के सब्सक्रिप्शन पर जोर देने में देखा जा रहा है. कहने का आशय यह है कि आम पाठकों/दर्शकों की मदद के बिना वैकल्पिक पत्रकारिता का खड़ा होना न सिर्फ मुश्किल है बल्कि उसकी स्वतंत्रता की गारंटी के लिए भी जरूरी है.

11. वैकल्पिक न्यूज मीडिया के सहयोग/समर्थन के लिए उनके कंटेंट को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी आम नागरिकों और नागरिक समाज के संगठनों को उठानी पड़ेगी. इसके लिए प्रस्ताव है कि देश के जिलों/कस्बों और यहाँ तक कि गांवों में भी वैकल्पिक मीडिया को लेकर चिंतित सचेत, सक्रिय और उदार नागरिकों के समूह बनें जिनका नाम “वैकल्पिक मीडिया मित्र मंडली” जैसा हो सकता है. ये समूह समय-समय पर न सिर्फ इन वैकल्पिक न्यूज मीडिया प्लेटफार्मों के लेखों/रिपोर्टों पर चर्चा आयोजित करें, उसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए अपने सोशल मीडिया पर शेयर करने से लेकर व्हाट्सएप्प समूहों के जरिये और लोगों तक पहुंचाएं बल्कि उनकी आर्थिक मदद के लिए अभियान भी चलायें.

12. इसके साथ ही सचेत और सक्रिय नागरिकों और उनके समूहों को वैकल्पिक न्यूज मीडिया प्लेटफार्मों की निरंतर निगरानी भी करनी चाहिए. उनके सहयोग और समर्थन का मतलब यह कतई नहीं है कि वे आलोचना से परे हैं या गलतियाँ नहीं कर सकते हैं. दूसरी ओर, उन्हें भी ऐसी आलोचनाओं को न सिर्फ धैर्य से सुनना चाहिए बल्कि गंभीर आलोचनाओं को अपने मंचों पर जगह देनी चाहिए. उन आलोचनाओं पर बहस और चर्चा को प्रोत्साहित करना चाहिए. कहने की जरूरत नहीं है कि वैकल्पिक न्यूज मीडिया प्लेटफार्मों को न सिर्फ अधिक लोकतान्त्रिक और उदार होना चाहिए बल्कि नैतिक मानदंडों के मामले में कार्पोरेट न्यूज मीडिया के बरक्स आदर्श पेश करना चाहिए. उन्हें अपने न्यूजरूम में अधिक समावेशी और सामाजिक विविधता और भागीदारी को प्रोत्साहित करनेवाला होना चाहिए. उन्हें अपने व्यावसायिक लेनदेन और आय-व्यय का लेखा-जोखा पेश करने में पारदर्शी और जिम्मेदार होना चाहिए. उन्हें अपने कामकाज की नागरिक समाज से निगरानी के लिए तैयार रहना चाहिए.

नागरिकों यानी पाठकों/दर्शकों के लिए कुछ प्रस्ताव

13. पत्रकारिता की साख को बहाल करने और उसे उसकी भूमिका में वापस लाने की कोई पहल तब तक कामयाब नहीं हो सकती है जब तक आम नागरिक में सचेत, सतर्क और आलोचनात्मक समझ से लैस न हों. यह आसान प्रोजेक्ट नहीं है. लेकिन इसके बिना कोई विकल्प भी नहीं है. असल में, आज जिस नियोजित तरीके से औद्योगिक स्तर पर झूठ, प्रोपेगंडा और जहरीला-सांप्रदायिक प्रचार चल रहा है, उसका मुकाबला नागरिकों को ही करना पड़ेगा. इसके लिए जरूरी है कि नागरिकों का सचेत हिस्सा और नागरिक समाज के संगठन यह जिम्मेदारी लें कि वे अपने परिवारों से लेकर कार्यस्थलों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर अपने परिवारजनों, सहकर्मियों और मित्रों में आलोचनात्मक सोच-समझ विकसित करने के लिए काम करेंगे.
यह सच है कि एक सचेत और आलोचनात्मक नागरिक तैयार करने में क्रिटिकल न्यूज मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका होती है लेकिन आज एक क्रिटिकल और सचेत न्यूज मीडिया खड़ा करने की जिम्मेदारी सचेत और क्रिटिकल नागरिकों को उठानी पड़ेगी.

यहाँ एक बार फिर से दोहराना जरूरी है कि ये सिर्फ कुछ प्रस्ताव हैं जिनपर चर्चा की जरूरत है. यह कोई न्यूज मीडिया में सुधार, पत्रकारिता की साख बहाली और झूठ-प्रोपेगंडा से लड़ने की मुकम्मल योजना या घोषणापत्र नहीं है. इसमें कई मुद्दे छूट गए या छोड़ दिए गए हैं. वजह चर्चा और बहस के लिए गुंजाइश छोड़ना और इसे व्यापक और समावेशी बनाना है. लेकिन इतना तय है कि कार्पोरेट न्यूज मीडिया में सुधार से लेकर वैकल्पिक न्यूज मीडिया को मजबूत बनाने के एजेंडे को नागरिक समाज और राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में लाया जाना जरूरी हो गया है. यह देश में लोकतंत्र की सेहत और नागरिकों के अधिकारों से अभिन्न रूप से जुड़ा मुद्दा है. न्यूज मीडिया और पत्रकारिता से जुड़े इन सवालों और मुद्दों को उठाये बिना लोकतंत्र बचाने की कोई मुहिम सफल नहीं हो सकती है. इसे और अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए.

लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में पत्रकारिता के प्रोफ़ेसर हैं. उनका ट्विटर हैंडल है: @apradhan1968

 उत्तर प्रदेश में पांच साल में मारे गए 12 पत्रकार, कानूनी नोटिसों और मुकदमों की भरमार

पत्रकारों पर हमले के विरुद्ध समिति (CAAJ) ने उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए पहले मतदान की पूर्व संध्‍या पर ‍बुधवार को चौंकाने वाले आंकड़े जारी किये हैं। अपनी रिपोर्ट ”मीडिया की घेराबंदी” में समिति ने उद्घाटन किया है कि प्रदेश में पिछले पांच साल में पत्रकारों पर हमले के कुल 138 मामले दर्ज किये गये जिनमें पचहत्‍तर फीसद से ज्‍यादा मामले 2020 और 2021 के दौरान कोरोनाकाल में हुए।

समिति के मुताबिक 2017 से लेकर जनवरी 2022 के बीच उत्‍तर प्रदेश में कुल 12 पत्रकारों की हत्‍या हुई है। ये मामले वास्‍तविक संख्‍या से काफी कम हो सकते हैं। इनमें भी जो मामले ज़मीनी स्‍तर पर जांच जा सके हैं उन्‍हीं का विवरण रिपोर्ट में दर्ज है। जिनके विवरण दर्ज नहीं हैं उनको रिपोर्ट में जोड़े जाने का आधार मीडिया और सोशल मीडिया में आयी सूचनाएं हैं।

हमले की प्रकृतिहत्‍याशारीरिक हमलामुकदमा/गिरफ्तारीधमकी/हिरासत/जासूसीकुल
वर्ष     
201720002
201801102
2019039719
202071132252
202122923357
202214106
कुल12486612138

जैसा कि ऊपर दी हुई तालिका से स्पष्ट है, हमलों की प्रकृति के आधार पर देखें तो सबसे ज्यादा हमले राज्य और प्रशासन की ओर से किए गए हैं। ये हमले कानूनी नोटिस, एफआइआर, गिरफ़्तारी, हिरासत, जासूसी, धमकी और हिंसा के रूप में सामने आए हैं।

अकेले 2020 में कुल सात पत्रकार राज्‍य में मारे गये- राकेश सिंह, सूरज पांडे, उदय पासवान, रतन सिंह, विक्रम जोशी, फराज़ असलम और शुभम मणि त्रिपाठी। राकेश सिंह का केस कई जगह राकेश सिंह ‘निर्भीक’ के नाम से भी रिपोर्ट हुआ है। बलरामपुर में उन्‍हें घर में आग लगाकर दबंगों ने मार डाला। रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की पड़ताल बताती है कि भ्रष्‍टाचार को उजागर करने के चलते उनकी जान ली गयी। राकेश सिंह राष्‍ट्रीय स्‍वरूप अखबार से जुड़े थे। उन्‍नाव के शुभम मणि त्रिपाठी भी रेत माफिया के खिलाफ लिख रहे थे और उन्‍हें धमकियां मिली थीं। उन्‍होंने पुलिस में सुरक्षा की गुहार भी लगायी थी लेकिन उन्‍हें गोली मार दी गयी। गाजियाबाद में पत्रकार विक्रम जोशी को भी दिनदहाड़े गोली मारी गयी। इसी साल बलिया के फेफना में टीवी पत्रकार रतन सिंह को भी गोली मारी गयी। सोनभद्र के बरवाडीह गांव में पत्रकार उदय पासवान और उनकी पत्‍नी की हत्‍या पीट-पीट के दबंगों ने कर दी। उन्‍नाव में अंग्रेजी के पत्रकार सूरज पांडे की लाश रेल की पटरी पर संदिग्‍ध परिस्थितियों में बरामद हुई थी। पुलिस ने इसे खुदकुशी बताया लेकिन परिवार ने हत्‍या बताते हुए एक महिला सब-इंस्‍पेक्‍टर और एक पुरुष कांस्‍टेबल पर आरोप लगाया, जिसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई। कौशांबी में फराज असलम की हत्या 7 अक्टूबर 2020 को हुई। फराज़ पैगाम-ए-दिल में संवाददाता थे। इस मामले में पुलिस को मुखबिरी के शक में हत्या की आशंका जतायी गयी है क्योंकि असलम पत्रकार होने के साथ-साथ पुलिस मित्र भी थे। इस हत्या के ज्यादा विवरण उपलब्ध नहीं हैं। पुलिस ने जिस शख्स को गिरफ्तार किया था उसने अपना जुर्म कुबूल कर लिया जिसके मुताबिक उसने असलम को इसलिए मारा क्योंकि वह उसके अवैध धंधों की सूचना पुलिस तक पहुंचाते थे। ज्यादातर मामलों में हुई गिरफ्तारियां इस बात की पुष्टि करती हैं कि मामला हत्‍या का था।

शरीरिक हमलों की सूची बहुत लंबी है। कम से कम 50 पत्रकारों पर पांच साल के दौरान शारीरिक हमला किया गया, जो इस रिपोर्ट में दर्ज है। हत्‍या के बाद यदि संख्‍या और गंभीरता के मामले में देखें तो कानूनी मुकदमों और नोटिस के मामले 2020 और 2021 में खासकर सबसे संगीन रहे हैं। उत्‍तर प्रदेश का ऐसा कोई जिला नहीं बचा होगा जहां पत्रकारों को खबर करने के बदले मुकदमा न झेलना पड़ा हो।

खबर को सरकारी काम में दखल और षडयंत्र मानने से लेकर अब पत्रकार को पत्रकार न मानने तक बात आ पहुंची है। यह परिघटना भी केवल स्‍थानीय पत्रकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्‍तर प्रदेश में बीबीसी और हिंदू जैसे प्रतिष्ठित संस्‍थानों के पत्रकारों के साथ भी यही बरताव किया जाता है। थाने में बुलाकर पूछताछ, हिरासत, आदि की घटनाएं भी इस रिपोर्ट में दर्ज हैं। जासूसी के मामले में उत्‍तर प्रदेश से जो पत्रकार पेगासस की जद में आये हैं, उनमें डीएनए लखनऊ के पूर्व पत्रकार दीपक गिडवानी और इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका ‘दस्‍तक नये समय की’ की संपादक सीमा आज़ाद हैं। 

न सिर्फ एडिटर्स गिल्‍ड बल्कि प्रेस क्‍लब ऑफ इंडिया से लेकर सीपीजे, आरएसएफ और प्रादेशिक पत्रकार संगठनों की चिंताओं के केंद्र में उत्‍तर प्रदेश की घटनाओं का होना बताता है कि चारों ओर से पत्रकारों की यहां घेराबंदी की जा रही है।

अपने निष्‍कर्ष में रिपोर्ट कहती है कि महामारी के बहाने निर्मित किये गये एक भयाक्रान्‍त वातावरण के भीतर मुकदमों, नोटिसों, धमकियों के रास्‍ते खबरनवीसी के पेशेवर काम को सरकार चलाने के संवैधानिक काम के खिलाफ जिस तरह खड़ा किया गया है, पत्रकारों की घेरेबंदी अब पूरी होती जान पड़ती है।

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हरियाणा में पत्रकार ने दंगों की साजिश से आगाह किया तो उल्टा उसी पर केस दर्ज

हरियाणा के हिसार जिले में मीडिया पोर्टल ‘द इंक’ के पत्रकार राजेश कुंडू पर धारा 66f, 153-A और 153-B के तहत मुकदमा दर्ज किया है। यह मुकदमा हिसार पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी विकास लोहचब ने दर्ज करवाया है।

कुंडू शुरु से ही किसान आंदोलन कवर कर रहे हैं और उन्होंने कुछ समय पहले ही आंदोलन से ध्यान भटकाने के लिए तैयार की गई जातीय दंगों की कथित साजिश का भंडाफोड़ करने के लिए एक रिपोर्ट की थी और लोगों को आगाह करते हुए एक फेसबुक पोस्ट भी लिखी थी। लेकिन हरियाणा पुलिस ने उल्टे उनके ऊपर ही मुकदमा दर्ज किया गया है।

पत्रकार राजेश कुंडू ने बताया, “मैंने हाल ही में एक रिपोर्ट की थी, जिसमें मैंने बताया था कि कैसे सत्तापक्ष किसान आंदोलन के दौरान गुरू जम्भेश्वर यूनिवर्सिटी में मूर्ति स्थापना करवाने के पीछे जातीय दंगे करवाना चाहता है। ताकि किसान आंदोलन को तोड़ा जा सके और उससे ध्यान हटाया जा सके। उसी से संबंधित मैंने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर लोगों को यह जानकारी दी थी। अब आप बताइए कि जातीय दंगों को लेकर आगाह करते हुए रिपोर्ट करना और फेसबुक पोस्ट लिखना गुनाह कैसे हो गया।”

इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों ने आपत्ति जतानी शुरू कर दी है। पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर राजेश कुंडू के समर्थन में लिखना शुरू कर दिया है और पत्रकारों की संस्थाएं थी उनके समर्थन में आई हैं। “हरियाणा यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट” ने बयान जारी करते हुए कहा है, “राजेश कुंडू पर पुलिस द्वारा किया गया झूठा आपराधिक मामला दर्ज करने की हरियाणा के सारे पत्रकार कड़े शब्दों में निंदा करते हैं और सरकार से मांग करते हैं कि दर्ज मुकदमा वापस लिया जाए, नहीं तो पूरे प्रदेश में पत्रकार आंदोलन करेंगे।”

यूनियन के प्रधान अजय मल्होत्रा ने इस बारे में यूनियन की बैठक भी बुलाई है। यूनियन के प्रदेश वरिष्ठ उपप्रधान अनिल शर्मा ने बताया कि इस मामले को लेकर रोहतक के पत्रकार संकेतिक धरना देंगे और जब तक मामला वापस नहीं हो जाता, आंदोलन जारी रहेगा। हरियाणा के जिला प्रेस क्लबों ने भी राजेश कुंडू पर दर्ज मुकदमे को लेकर निष्पक्ष जांच कर मामला वापस लेने की मांग की है। रोहतक जिला प्रेस क्लब ने कहा है कि अगर इस मामले में जरुरत पड़ी तो पत्रकार मुख्यमंत्री से भी मुलाकात करने जाएंगे।

पत्रकार राजेश कुंडू के खिलाफ दर्ज एफआईआर के अंश

राजेश कुंडु पर लगाई गई धाराओं पर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट के वकील रविन्द्र सिंह ढुल्ल ने बताया, “उन पर आईपीसी की धारा 66F, 153 A, 153 B के तहत केस दर्ज किया है। उनके मामले में सबसे खतरनाक धारा जो लगाई है वो है 66F यानी साइबर टेररिज्म। हरियाणा पुलिस के अनुसार राजेश आतंकवादी है और इस पोस्ट के लिए राजेश को उम्र कैद मिलनी चाहिए। हम भी इस धारा को देखकर हैरान हैं।”

कुंडू के समर्थन में किसान यूनियनों ने भी बयान जारी किये हैं। भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) ने बयान जारी कर कहा है, “किसानों की आवाज को बुलंद करने वाले जाबांज पत्रकार राजेश कुण्डू पर मुकदमा दर्ज करना बीजेपी सरकार की घिनौनी हरकत है। सरकार न्याय के लिए उठती हर आवाज को दबाना चाहती है। भारतीय किसान यूनियन राजेश कुण्डू के साथ खड़ी है और तानाशाही हरकतों पर रोष प्रकट करती है। जातीय दंगों की स्क्रिप्ट का भंडाफोड़ कर राजेश कुंडू ने समाज का भला किया है। सारे किसान और समाज उनके साथ खड़ा है।”

इस मामले में शिकायतकर्ता हिसार पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी विकास लोहचब हैं। उन्होंने बताया, “हमने उनपर शिकायत उनकी फेसबुक पोस्ट की वजह से की है। उनके फेसबुक पेज पर जाकर देखिए उन्होंने क्या लिखा है।” इतना बताकर लोहचब ने फोन काट दिया।