भारत में बंधुआ मजदूरी का सच: 100% श्रमिक दलित-आदिवासी-ओबीसी, 80% मामलों में FIR तक नहीं!
नेशनल कैम्पेन कमेटी फॉर इरेडिकेशन ऑफ बॉन्डेड लेबर (एनसीसीईबीएल) द्वारा शुक्रवार (28 नवंबर) को दिल्ली के प्रेस क्लब में जारी की गई नई रिपोर्ट में भारत में प्रवासी बंधुआ मजदूरों की भयावह स्थिति को उजागर किया गया.
यह रिपोर्ट, जो 950 मुक्त किए गए श्रमिकों के सर्वेक्षण और 19 राज्यों के लगभग 1000 मजदूरों के साथ आयोजित चर्चाओं पर आधारित है, बंधुआ मजदूरी प्रणाली उन्मूलन अधिनियम 1976 और पुनर्वास योजना 2016 के कार्यान्वयन में गंभीर खामियों को उजागर करती है.
रिपोर्ट जारी करने के कार्यक्रम में बंधुआ मज़दूरों की सशक्त गवाही सुनाई गई. एनसीसीईबीएल के संयोजक निर्मल गोराना और कानून, शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र के कई विशेषज्ञों ने कार्यक्रम को संबोधित किया.
गोराना ने कहा, ‘आज़ाद भारत में भी लोग पूरी ज़िंदगी गुलामों की तरह काम कर रहे हैं. कानून है, लेकिन यह रिपोर्ट दिखाती है कि सरकार इस कानून को लागू करने और कामगारों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा करने में पूरी तरह विफल रही है.’
जाति और लैंगिक भेदभाव: शोषण की गहरी जड़ें
रिपोर्ट के सबसे चौंकाने वाले निष्कर्षों में से एक यह है कि सर्वेक्षण में शामिल सभी 950 श्रमिक ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहने वाले सामाजिक समूहों से संबंधित हैं. इनमें से 63 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 13 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और 24 प्रतिशत अन्य पिछड़ा वर्ग के हैं.
बचाए गए श्रमिकों में सामान्य वर्ग का एक भी व्यक्ति नहीं पाया गया, जो यह दर्शाता है कि बंधुआ मजदूरी केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि जाति व्यवस्था का संरचनात्मक परिणाम है.
लैंगिक आधार पर देखें तो इन श्रमिकों में 54 प्रतिशत पुरुष और 46 प्रतिशत महिलाएं थीं. महिला श्रमिकों को विशेष रूप से गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसमें यौन उत्पीड़न, प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल से वंचित होना और प्रमुख राज्य सहायता सेवाओं से बहिष्कार शामिल है.
महाराष्ट्र की गन्ना पट्टी में दलित और ओबीसी महिला श्रमिकों के साथ जबरन गर्भाशय निकालने जैसी हिंसक प्रथाओं की सूचना मिली है, जो उत्पादकता बढ़ाने के नाम पर मासिक धर्म को रोकने के उद्देश्य से की जाती है. बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस पर संज्ञान लेते हुए कहा है कि ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं के श्रम को बंधुआ मजदूरी का रूप माना जाना चाहिए.

डेटा से पता चलता है कि ज़्यादातर बंधुआ मज़दूर दूसरे राज्यों में जाकर काम करने वाले प्रवासी मज़दूर थे. केवल 1.16% लोग अपने ही राज्य के भीतर काम के लिए गए थे. यह दिखाता है कि गरीबी, ज़मीन न होना, कर्ज, जाति आधारित भेदभाव और स्थानीय रोज़गार की कमी जैसी मजबूरियां लोगों को अपने राज्य से बाहर जाकर काम करने के लिए धकेलती हैं.
बच्चों का शोषण: एक पीढ़ीगत संकट
रिपोर्ट में 55 बच्चे शामिल हैं, जिनमें से 56 प्रतिशत ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा. यह आंकड़ा दर्शाता है कि बंधुआ मजदूरी कैसे पीढ़ियों में स्थानांतरित होती रहती है. 15 से 17 वर्ष की आयु के बच्चों में आधे के पास शिक्षा तक पहुंच नहीं थी, जबकि अन्य ने गरीबी, प्रवासन या संस्थागत समर्थन की कमी के कारण जल्दी स्कूल छोड़ दिया.
अधिकांश बच्चों को एनजीओ की मदद से स्कूल भेजा गया, सरकार की ओर से न्यूनतम प्रोत्साहन या समर्थन मिला. बचाए गए बच्चों में से केवल 14 (25 प्रतिशत) को स्कूल में भर्ती कराया गया, जबकि 20 बच्चों (36.4 प्रतिशत) को फिर से शोषणकारी श्रम में धकेल दिया गया.
यह बाल पुनर्वास और संरक्षण प्रणालियों में एक खतरनाक विफलता को इंगित करता है.
मजदूरी की चोरी और ऋण का जाल
रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण खुलासा यह है कि बंधुआ मजदूरी में शोषण केवल ऋण बंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्जित मजदूरी को रोकना भी इसका प्रमुख हिस्सा है. 950 बचाए गए श्रमिकों में से 53 प्रतिशत ने अवैतनिक मजदूरी की बात कही.
औसतन प्रति श्रमिक 32,514 रुपये की मजदूरी बकाया पाई गई. महत्वपूर्ण बात यह है कि बचाए गए श्रमिकों का औसत ऋण 5,283.14 रुपये था, जो औसत अवैतनिक मजदूरी राशि 32,514 रुपये से छह गुना कम है. यानी मजदूर नियोक्ता से कर्ज लेने की वजह से ही बंधुआ नहीं बनाए जाते, कई बार उनकी मेहनत की कमाई जब्त कर भी उन्हें बंधुआ बना लिया जाता है.
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बचाव (रेस्क्यू) के समय 55% मज़दूरों पर अपने नियोक्ताओं का कोई कर्ज ही नहीं था.
यह उस आम नीति और कानूनी समझ को चुनौती देता है, जो बंधुआ मज़दूरी को हमेशा कर्ज से जोड़कर देखती है. जिन मज़दूरों पर कर्ज था, उनमें से 25% का कर्ज 10,000 रुपये से कम था और सिर्फ 1% पर ही 50,000 रुपये से ज़्यादा का कर्ज था.
पुनर्वास योजना का पूर्ण पतन
हालांकि, 2016 में पुनर्वास योजना को नकद सहायता बढ़ाने के लिए संशोधित किया गया था, लेकिन कार्यान्वयन अत्यंत कमजोर बना हुआ है. 2016 के बाद बचाए गए अधिकांश श्रमिकों (63 प्रतिशत) को बचाव के तुरंत बाद अनिवार्य सहायता भी नहीं मिली.
दरअसल, बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार की योजना है, जिसके तहत बचाए गए बंधुआ मज़दूर को तत्काल 30,000 रुपये की सहायता देने का प्रावधान है. पुनर्वास के लिए 1 लाख रुपये, 2 लाख रुपये और 3 लाख रुपये तक की सहायता दी जाती है, जो मज़दूर की श्रेणी और उसके शोषण की गंभीरता के आधार पर दी जाती है, बशर्ते बंधुआ मज़दूरी प्रमाणित हो.
बच्चों और महिलाओं के लिए मुआवजे की स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है. 2 लाख रुपये के लिए पात्र होने के बावजूद बचाए गए बच्चों में से आधे से अधिक (53.8 प्रतिशत) और बचाई गई महिलाओं में से एक तिहाई (33 प्रतिशत) को कोई मुआवजा नहीं मिला. केवल एक महिला को 1-2 लाख रुपये के बीच की राशि प्राप्त हुई.
सर्वेक्षण में शामिल एक भी पुरुष को 1 लाख रुपये का मुआवजा नहीं मिला, जिसके लिए वे पात्र थे.
जन-कल्याणकारी योजनाओं तक सीमित पहुंच और भी चिंताजनक है. सर्वेक्षण किए गए 85 प्रतिशत से अधिक श्रमिकों को मनरेगा के तहत रोजगार नहीं मिला. 2 प्रतिशत से कम को बचाव के बाद आवास या कृषि के लिए भूमि प्रदान की गई. लगभग 70 प्रतिशत को आयुष्मान भारत स्वास्थ्य कार्ड जारी नहीं किया गया था.
इसके अलावा, 99.67 प्रतिशत को कोई कौशल विकास या प्रशिक्षण अवसर नहीं मिला, जो दीर्घकालिक पुनर्वास और आजीविका बहाली में एक महत्वपूर्ण अंतर को दर्शाता है.
कानूनी और संस्थागत जवाबदेही का अभाव
रिपोर्ट कानूनी प्रणाली में गंभीर विफलता को भी उजागर करती है. बचाए गए 80 प्रतिशत से अधिक श्रमिकों के संबंध में कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई. इसका मतलब है कि अधिकांश बचाए गए श्रमिकों को बंधुआ मजदूरी प्रणाली उन्मूलन अधिनियम के तहत अपनी शिकायतों की कोई आधिकारिक मान्यता नहीं मिली.
रिपोर्ट जारी किए जाने के दौरान सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय परिहक ने कहा, ‘बिना कार्रवाई कानून बेकार है. एफआईआर दर्ज करना पहला और सबसे जरूरी कदम है. वही बंधुआ मजदूरी की सही पहचान करता है, ‘रिलीज़ सर्टिफिकेट’ को वैध बनाता है और पुनर्वास की पूरी प्रक्रिया शुरू करता है. जब एफआईआर दर्ज ही नहीं होती, तो कानून सिर्फ कागज़ पर रह जाता है और न्याय पूरी तरह खत्म हो जाता है.’
सजा की दर भी चौंकाने वाली है. 2016 से पहले बचाए गए श्रमिकों से जुड़े किसी भी मामले में किसी को सजा नहीं हुई, और 2016 के बाद केवल 3.6 प्रतिशत मामलों में सजा हुई.
इसके अलावा, किसी भी नियोक्ताओं से श्रमिकों की मजदूरी की वसूली नहीं की गई. रिपोर्ट में इसे कानून का मजाक बताया गया है.
बचाव के बाद का जीवन: शोषण का चक्र जारी
रिपोर्ट बताती है कि किस तरह बंधुआ मजदूरी से बचाए जाने के बाद भी श्रमिकों का जीवन नहीं बदलता है. रिपोर्ट में शामिल 950 मज़दूरों में से 94 प्रतिशत ने बताया कि उन्हें ईंट भट्टों की बंधुआ मजदूरी से बचाया गया. बचाव के बाद अधिकांश श्रमिक कृषि कार्य (38 प्रतिशत) में चले गए.
लेकिन बचाए गए 950 में से 140 श्रमिक बेरोजगार रह गए, जो उन्हें नए शोषण के जोखिम में डालता है.
बंधुआ मजदूरी से बचाए जाने के बाद दैनिक मजदूरी पर काम करने वाले लगभग 50 प्रतिशत श्रमिकों को वैधानिक न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिलती है. दैनिक मजदूरी के आधार पर लगे लगभग आधे श्रमिक प्रति दिन 200 रुपये से कम पाते हैं. कुछ श्रमिकों को तो काम के बदले नकद नहीं, बल्कि चावल दिया जाता है, जो आर्थिक निर्भरता के गहरे जड़ें जमाए रूप को दर्शाता है.
प्रशासनिक उदासीनता और संरचनात्मक विफलता
रिपोर्ट के केस स्टडी के रूप में 20 मामलों का विस्तृत विवरण दिया गया है, जो सभी एक ही पैटर्न दिखाते हैं: प्रशासनिक उदासीनता, रिलीज सर्टिफिकेट जारी करने में देरी या विफलता, एफआईआर दर्ज नहीं करना, सुरक्षित प्रत्यावर्तन की कमी और पुनर्वास सहायता का पूर्ण अभाव.
एक मामले में 2018 में छत्तीसगढ़ से राजस्थान के धौलपुर में लाए गए 50 व्यक्तियों को मुक्त किया गया था, लेकिन औपचारिक रिलीज आदेश या प्रमाणपत्र के बिना रेलवे स्टेशन पर छोड़ दिया गया. उन्हें न भोजन, न यात्रा खर्च, न ही पुलिस सुरक्षा प्रदान की गई.
साभार: द वायर
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