शुक्रवार, 27 जनवरी 2023
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विमुक्त-घुमंतू जनजातियों का आजादी दिवस और अखबारों का सन्नाटा!



अंग्रेजी के एक भी अखबार में डिनोटिफाइड ट्राइब्स के आजादी दिवस समारोह को लेकर कोई खबर नहीं है. अंग्रेजी के जिन अखबारों को हमारी टीम ने टटोला उनमें द हिंदू, द इंडियन एक्सप्रेस, द टाइम्स ऑफ इंडिया, द पायनियर, हिंदुस्तान टाइम्स अखबार शामिल रहे. वहीं हिंदी के अखबारों का भी यही हाल रहा.

कल 31 अगस्त को विमुक्त-घुमंतू जनजातियों या डिनोटिफाइड ट्राइब्स (डीएनटी) ने अपना 70वां आजादी दिवस मनाया. हिंदी और अंग्रेजी के सभी राष्ट्रीय और स्थानीय अखबारों से डीएनटी समुदाय के आजादी दिवस समारोह की कवरेज गायब रही. अंग्रेजी के किसी भी अखबार ने 20 करोड़ की आबादी से जुड़े आजादी दिवस को कवर करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई.

अंग्रेजी हुकूमत ने 1871 में क्रिमिनल ट्राईब एक्ट अर्थात आपराधिक जनजाति अधिनियम  के द्वारा बहुत-सी जनजातियों को अपराधी घोषित कर दिया था. कानून के तहत इन लोगों को गाँव व शहर से बाहर जाने के लिए स्थानीय मजिस्ट्रेट के यहां अपना नाम दर्ज करवाना यह अनिवार्य कर दिया गया ताकि पता रहे कि ये लोग कहाँ, क्यों और कितने दिनों के लिए जा रहे हैं. सबसे पहले इस कानून को उत्तर भारत में लागू किया गया. उसके बाद 1876 में इस कानून को बंगाल प्रांत पर भी लागू किया गया और 1924 तक आते-आते क्रिमिनल ट्राईब एक्ट को पूरे भारत में रहने वाली इन सभी जनजातियों पर थोप दिया गया.

नाम दर्ज करवाकर जाने का यह सिलसिला 31 अगस्त 1952 तक जारी रहा.  ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि कोई आपराधिक घटना होने पर जांच करने में आसानी रहे और साथ ही इन लोगों पर निगरानी भी रखी जा सके. इस तरह इन समुदायों पर अपराधी होने का तमगा चस्पा दिया गया. इस कानून ने इन जनजातियों की समाज में ऐसा छवी गढ़ दी कि जो भी बच्चा इन जनजातियों में जन्म लेता उसको जन्मजात अपराधी मान लिया गया. 

आजादी के बाद 1949 में अय्यंगर कमेटी का गठन किया गया. केंद्र सरकार ने अय्यंगर कमेटी के कुछ सुझावों को मानते हुए कईं सफारिशें लागू की. अय्यंगर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर 31 अगस्त 1952 को इन जनजातियों को डिनोटिफाई किया गया तब से इन जनजातियों को डीएनटी (डिनोटिफाइड ट्राइब्स) के नाम से जाना जाता है.

2011 की जनगणना के अनुसार डीएनटी समुदाय की जनसंख्या 15 करोड़ के करीब है.  . इनमें ज्यादातर पशुपालक, शिकारी, खेल दिखाने वाले और मनोरंजन करने वाले समुदाय हैं. जैसे बंजारे, जो पशुओं पर माल ढोने का काम करते हैं. गाड़िया-लोहार, जो जगह-जगह जाकर लोहे के औजार बनाकर बेचने का काम करते हैं. बावारिया, जो जानवरों का शिकार करने का काम करते थे. नट, नृत्य और करतब दिखाने का काम करने वाली जनजाति. कालबेलिया सांपों का खेल दिखाने वाली, शर्प दंश का इलाज करने वाली तथा जड़ी-बुटियां तैयार करने वाली जनजाति.

इसी तरह, भोपा– स्थानीय देवताओं के गीत गाने वाले. सिकलीगर– हथियारों में धार लगाने वाले. कलंदर– जानवरों से करतब दिखाने वाले. ओढ- नहर बनाने तथा जमीन की खुदाई करने वाले. बहरूपिये– लोगों का मनोरंजन करने वाले.

31  अगस्त 1952 को इन समुदायों को क्रिमिनल ट्राईब एक्ट से आजादी मिली तो यह दिन विमुक्ति दिवस के रुप में मनाया जाने लगा. इस अवसर पर देश के विभिन्न स्थानों पर कार्यक्रम भी किए गए, जिनमें नेताओं से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया. पर 1 सितंबर के अखबारों को टटोलने पर डीएनटी समुदाय के विमुक्ति समारोह से संबंधित कुछ भी दिखाई नहीं दिया.

अंग्रेजी के एक भी अखबार में विमुक्त घुमंतू जनजातियों के आजादी दिवस समारोह को लेकर एक कॉलम तक की खबर नहीं है. अंग्रेजी के जिन अखबारों को हमारी टीम ने टटोला उनमें द हिंदू, द इंडियन एक्सप्रेस, द टाइम्स ऑफ इंडिया, द पायनियर, हिंदुस्तान टाइम्स अखबार शामिल रहे. वहीं हिंदी के अखबारों में जनसत्ता, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला, पत्रिका, हरि भूमि जैसे अखबारों ने भी विमुक्ति दिवस समारोह की कोई कवरेज नहीं की. 2011 की जनगणना के अनुसार देश में इन जनजातियों की कुल जनसख्यां 15 करोड़ रही यानी आज के हिसाब से करीबन 20 करोड़ की जनसंख्या के लिए भारतीय अखबारों में कोई जगह नहीं है.

केवल दैनिक ट्रिब्यून के स्थानीय अखबार में छटे पेज पर बिना फोटो के दो कॉलम की खबर है.

दैनिक ट्रिब्यून में छपी दो कॉलम की खबर

वहीं हिंदी अखबार नवभारत टाइम्स में डीएनटी समुदाय के आजादी दिवस को कवर करना तो दूर उल्टा डीएनटी समुदाय से जुड़़ी बावरिया जनजाति को निशाना बनाने की खबर छपी है.

एनबीटी में छपी खबर

डिनोटिफाइड ट्राइब्स के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता बालक राम ने मीडिया की कवरेज पर कहा, “ मीडिया ने हमेशा से विमुक्त घुमंतू जनजातियों की अनदेखी की है. मीडिया से हम लोगों को कोई उम्मीद नहीं रह गई है. मीडिया को केवल चटकारे वाली खबरों से मतलब है और हम चटकारे देने वाले मेटिरियल नहीं हैं. भारतीय मीडिया को पीड़ित, दुखी, असहाय और हाशिए के समाज से कोई लेना देना नहीं है इसके उलट मीडिया तो हमारी जनजातियों को निशाना बनाने की खबरें छापता है. यह बहुत दुख की बात है कि करीबन 20 करोड़ की आबादी की बात आती है तो इस देश के मीडिया घरानों के अखबारों की स्याही सूख जाती है.”