करनाल घेराव: दैनिक जागरण के संपादकीय का दर्द और द हिंदू का सन्नाटा

 

हरियाणा के करनाल में 7 सितंबर को किसानों ने लाखों की संख्या में प्रदर्शन किया. किसान करनाल में 28 अगस्त को हुए लाठीचार्ज में मारे गए किसान सुशील काजल के परिवार को न्याय व मुआवजा दिलाने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे. साथ ही एसडीएम जिनका किसानों के सर फोड़ने के आदेश देने का बयान सामने आया था, उनपर कार्यवाही करने के लिए भी दबाव बना रहे थे. किसानों के इस प्रदर्शन से पहले ही हरियाणा सरकार ने 7 सितंबर की रात तक करनाल समेत पांच जिलों का इंटरनेट बंद करने का आदेश दिया था. करनाल में बाद में इंटरनेट बंदी को 24 घंटों के लिए और बढ़ा दिया गया.

दैनिक भास्कर के हरियाणा संस्करण ने इस प्रदर्शन को प्रमुखता से कवर किया और फ्रंट पेज पर जगह देने के साथ ही लीड़ खबर भी बनाया.

इसके साथ ही पेज दो पर भी आधा पन्ना किसान प्रदर्शन के बारे में था.

वहीं दैनिक जागरण ने भी इसे लीड़ खबर तो बनाया, पर मांग पर अड़े किसान, किसानों ने सरकार पर भड़ास निकाली जैसे शब्दों का प्रयोग किया.

जागरण ने एक संपादकीय भी छापा जिसमें किसान आंदोलनों को राजनैतिक धरने, जिससे जनता परेशान हो रही है बताया गया. साथ ही सुप्रीम कोर्ट को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार बताया गया.

जागरण के ही राजीव सचान ने संपादकीय पेज पर अपने कॉलम में किसान आंदोलन को लोगों की मुश्किलों को बढ़ाने वाला धरना बताया और इसे अन्याय की मिसाल बताया.

जागरण ने एक और संपादकीय में आंदोलनकारियों से अपील की कि वो ऐसे उपद्रव न करें जिससे पुलिस को विवशता में बलप्रयोग करना पड़े.

पंजाब केसरी के हरियाणा संस्करण ने किसान आंदोलन को पेज चार पर स्थान दिया.

दैनिक ट्रिब्यून ने भी इस खबर को लीड़ पर रखा.

एवं पेज तीन पर पर इसे स्थान दिया.

अमर उजाला ने इसे पहले पन्ने पर लीड़ खबर बनाया.

साथ ही भीतर दो पन्ने किसान आंदोलन को दिए.

वहीं, आइएएस बनने के सपने देखने वालों के प्रिय अंग्रेजी अखबार द हिंदू के दिल्ली संस्करण में करनाल मामले से जुड़ी खबर को कोई स्थान नहीं मिला.

हरिभूमि ने इसे पहले पन्ने पर स्थान दिया.

साथ ही पेज चार पर करनाल में जाम में फंसे लोगों को प्रमुखता से कवर किया.

चंड़ीगढ़ से छपने वाले अंग्रेजी अखबार द ट्रिब्यून ने करनाल प्रकरण को पहले पन्ने पर तालिबान सरकार बनने के बगल में स्थान दिया

इसके साथ-साथ पेज तीन पर भी स्थान दिया.

कलकत्ता से छपने वाले द टेलीग्राफ़ ने भी किसान आंदोलन को तालिबान की सरकार बनने की खबर के बाद पहले पन्ने पर जगह दी.