विभाजन के बाद भारत आए दलित सिख परिवारों के मकानों पर बुल्डोजर चलने का खतरा मंडरा रहा!

 

एक ओर देश के प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से आजादी के 75 साल पूरे होने पर अमृत महोत्सव मनाने का आह्वान कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर बंटवारे का दंश झेल चुके पूर्वी दिल्ली में रह रहे सैंकड़ों दलित सिख परिवार अपने आसियाने गिराये जाने के डर में जी रहे हैं. दरअसल डीडीए द्वारा शाहदरा के कस्तूरबा नगर में 2 अगस्त को 18 अगस्त तक 4 कॉलोनियों को ध्वस्त करने का नोटिस जारी किया गया. डीडीए का कहना हैं कि जिस जमीन पर ये लोग मकान बनाकर रह रहे हैं वह सरकारी जमीन है जिसपर अवैध कब्जा किया गया है. वहीं स्थानीय लोगों ने डीडीए पर राजनैतिक दबाव के चलते शहर की आंतरिक सड़कों को मुख्य सड़क से जोड़ने के लिए कॉलोनी की जमीन पर सड़क बनाने का आरोप लगाया है.

स्थानीय लोग और कुछ युवा संगठन डीडीए के इस आदेश का कड़ा विरोध कर रहे हैं. मकान तोड़े जाने के खिलाफ धरना-प्रदर्शन जारी हैं. कॉलोनी के निवासियों का मानना है कि सड़क निर्माण के लिए डीडीए के पास खाली जमीन है. जिसका इस्तेमाल शिवम एनक्लेव के लोग पार्किंग के लिए करते हैं. 2021 के नोटिस के मुताबिक डीडीए ने वहां सड़क निर्माण का कार्य भी शुरू कर दिया था परंतु शिवम एन्क्लेव के लोगों ने ‘स्टे-आर्डर’ ले लिया और यह केस जीत कर पार्किंग की जगह बनने वाली सड़क का निर्माण रुकवा दिया.

कस्तूरबा नगर में रहने वाले लोगों में ज्यादातर मजदूर, ऑटोचालक और छोटे-मोटे काम करके जीवन यापन करने वाले लोग हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपना एक घर खड़ा किया है और अब उनके घर के बाहर एक नोटिस लगा दिया गया है, जिसमें बस्ती को गिराने और केवल 15 दिन में मकान खाली करने के लिए कहा गया है.

डीडीए द्वारा जारी नोटिस.

दिल्ली यूनिवर्सिटी से जुड़े भगत सिंह छात्र एकता मंच संगठन की छात्रा संगीता जो स्थानीय लोगों के साथ डीडीए के विरोध में लगातार प्रदर्शन कर रही हैं, वह कहती हैं कि इस साल हम आजादी का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहे जिसमें हर घर तिरंगा अभियान चल रहा है मगर इन लोगों के घर ही तोड़े जा रहे हैं तो ये तिरंगा कहां लगाएंगे. संगीता कहती है कि, “उनके साथ पढ़ने वाले मित्र भी इसी बस्ती में रहते हैं जिनका घर भी टूटने की कगार पर है अगर उन्हें यहां से बेदखल किया जाएगा तो उनके आगे की पढ़ाई और भविष्य का क्या होगा. उनके मित्र की तरह ही इस बस्ती में बहुत सारे युवा है, जिनका भविष्य दांव पर लगा हुआ है.”

वहीं कस्तूरबा नगर में रहने वाले विक्की ने बताया, “यहां रहने वाले अधिकतर परिवार बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत लौटकर आए थे. इनमें ज्यादातर सिख दलित परिवार हैं. हम लोगों को पिछले 75 सालों से दिल्ली में कहीं भी बसने नहीं दिया जा रहा है. हमारे लोग जहां भी जाते हैं वहीं परेशान किया जाता है.”

घर न तोड़े जाने की अपील करते बच्चे

वहीं मेडिकल से बारहवीं की पढ़ाई पूरी कर चुकीं एक बच्ची ने बताया, “मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं. 12वीं पास करने के बाद अब नीट की तैयारी करना चाहती हूं लेकिन जब से डीडीए द्वारा हमारी बस्ती को गिराने का नोटिस जारी किया गया है तब से मुझे डर सता रहा है कि अगर हमारे घर तोड़ दिए गए तो हम सड़क पर आ जाएंगे और मेरी आगे की पढ़ाई कैसे होगी.”

डिनोटिफाइड ट्राइब्स से आने वाले सामाजिक कार्यकर्ता गुरुदत्त भांतू ने बताया कि, “यहां पर कुछ परिवार ऐसे हैं जो 1960 से रह रहे हैं जिनकी पांचवी पीढ़ी यहां रहती है और उन लोगों के पास सभी डाक्यूमेंट्स हैं उसके बावजूद भी उनके घरों को तोड़ा जा रहा है. गुरुदत्त कहते हैं, “सरकार की नोटिस के मुताबिक जो परिवार यहां पर 12 साल से ज्यादा रहे हैं उनके घरों को नहीं तोड़ा जाएगा लेकिन डीडीए इस फैसले को दरकिनार कर रहे हैं, यहां रह रहे ज्यादातर लोग शिक्षित नहीं हैं कि वह इस फैसले के खिलाफ खड़े हो पाए, स्थानीय लोग मदद मांगने के लिए जब अपने विधायक के पास गए तो, उन्होंने साफ-साफ इंकार कर दिया और कहा कि जल्द-से-जल्द अपना मकान खाली कर दो नहीं तो सरकारी काम में अड़चन बनने के लिए तुम्हें भुगतान करना पड़ेगा.