सोमवार, 03 अक्टूबर 2022
खेत-खलिहान

फसल अवशेष जलाने से रोकने के लिए खर्च किये 693 करोड़, कृषि विशेषज्ञों ने जताई घोटाले की आशंका!



हरियाणा सरकार द्वारा पिछले चार साल में फसल अवशेष प्रबंधन के नाम पर खेतों में लगाई जाने वाली आग को रोकने के लिए 693.25 करोड़ रुपये खर्च कर दिये हैं. सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत किसानों को सब्सिडी देते हुए 31,466 कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) स्थापित करने और 41,331 किसानों को धान की पुआल के निपटान के लिए वैकल्पिक तरीके अपनाने के लिए मशीनरी देने का दावा किया है.

एक तरफ सरकार फसल के अवशेष को जलाने से रोकने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा कर रही थी वहीं कृषि विभाग के आंकड़े कुछ और ही तस्वीर बया कर रहे हैं. कृषि विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 2021 में 14.63 लाख हेक्टेयर में हुई धान की खेती में से 3.54 लाख हेक्टेयर में फसल के जले हुए अवशेष की बात सामने आई है. इसके साथ ही फसल के अवशेष जलाने का क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है. पिछले चार वर्षों में फसल के अवशेष जलाए जाने का रकबा 2021 में सबसे ज्यादा रहा है. 2018 में 2.45 लाख हेक्टेयर, 2019 में 2.37 लाख हेक्टेयर और 2020 में 2.16 लाख हेक्टेयर में फसल के अवशेष जलाए गए थे.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय से आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी से पता चला है कि केंद्र ने 2018-19 में 137.84 करोड़ रुपये जारी किए, जिसमें से 132.86 करोड़ रुपये खर्च किये गए. इसी तरह, 2019-20 में 192.06 करोड़ रुपये जारी किए गए, जिसमें से 101.49 करोड़ रुपये खर्च किये गए. अगले साल 2020-21 में केंद्र ने 170 करोड़ रुपये जारी किए, जबकि 205.75 रुपये खर्च किए गए. 2021-22 में 193.35 करोड़ रुपये जारी किए गए और 151.39 करोड़ रुपये खर्च किए गए. 2018-19 में 132.86 करोड़, 2019-20 में 101.49 करोड़, 2020-21 में 205.75 करोड़ और 2021-22 में 151.39 करोड़ यानी पिछले चार साल में कुल 693 करोड़ रुपए खर्च किये जा चुके हैं. लेकिन जमीनी असर नहीं दिखाई दे रहा है.

वहीं कृषि विशेषज्ञों डॉ.राम कुमार ने पंजाब की तरह हरियाणा में भी घोटाले की आशंका जताई है. उन्होंने कहा कि इससे पहले पंजाब में फसल अवशेष प्रबंधन के लिए सीएचसी को जारी की गई सब्सिडी के नाम पर बड़ा घोटाला सामने आया है. चौंकाने वाली बात यह है कि इन सीएचसी (कस्टम हायरिंग सेंटर) और सब्सिडी का कोई ऑडिट नहीं होता है. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पराली जलाना न केवल हरियाणा में बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र के विभिन्न हिस्सों के लिए भी चिंता का विषय है.