विमुक्त-घुमंतू जनजातियों ने मनाया 70वां आजादी दिवस!

31 अगस्त को करनाल के समाना बाहू गांव में विमुक्त घुमंतू जनजातियों ने अपना 70वां आजादी दिवस मनाया. 70वें आजादी दिवस समारोह में आस-पास की विमुक्त घुमंतू जनजातियों के लोगों ने हिस्सा लिया. आजादी उत्सव समारोह में बच्चों और बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल रहीं. आजादी दिवस समारोह में मंगता, मरासी, भेजकूट, सपेरा, जंगम, सांसी, गाड़िया लौहार जनजातियों के लोग शामिल हुए. 

अम्बाला से विमुक्ति दिवस समारोह में शामिल होने के लिए आए मंगत समाज के राम गोपाली ने बताया, “आज विमुक्ति दिवस के अवसर पर हम बहुत खुश हैं. आज का दिन हमारे लिए आजादी का दिन है वहीं दुख इस बात का है कि आज भी हमारे लोगों की आथिक और सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है. आज भी हमारे मंगत समाज के लोग तिरपाल के घरों में रह रहे हैं हमारे पास बिजली-पानी तक की व्यव्स्था नहीं है.”    

लंबे समय से डिनोटिफाइड ट्राइब्स के बीच काम करते आ रहे समाजसेवी बालक राम सान्सी ने मंच से डिनोटिफाइड ट्राइब्स का इतिहास बताते हुए कहा, “देश में अलग-अलग समय पर अलग-अलग आक्रमणकारियों का शासन रहा लेकिन इन जनजातियों ने कभी किसी के सामने समर्पण नहीं किया. 1871 में अग्रेजों ने हमारी जनजातियों पर क्रिमिनल ट्राइब एक्ट लगाकर कमजोर करने का काम किया उसके बाद भी ये जनजतियां अपनी कला और संस्कृति से जुड़े रहे. ये जनजातियां आज भी अपने पहनावे अपनी भाषा को जीवित रखे हुए हैं.” उन्होंने कहा, “ इन जनजातियों से जुड़े लोगों को बाहर आने-जाने के लिए एक पास दिया जाता था. जो देश के आजाद होने के 5 साल 16 दिनों तक भी जारी रहा. इस तरह ये जनजातियां आजाद होने के 5 साल 16 दिनों तक भी गुलाम बनी रहीं.”  

वहीं जंगम समाज के तीन कलाकार भी अपनी प्रस्तुति देने के लिए आजादी समारोह में पहुंचे. जंगम समाज के लोग शिव-शंकर के भजन गाने का काम करते हैं. ये लोग अलग-अलग राज्यों में घूम-घूमकर अपनो वाद्य यंत्रों के साथ शिव के भजन गाकर अपना गुजारा कर रहे हैं. जंगम समाज के अध्यक्ष रामकुमार ने बताया, “हमारी जाति को पिछले साल ही घुमंतू जाति का दर्जा दिया गया है. हम लंबे समय से घुमंतू जातियों में शामिल करने की मांग कर रहे थे क्योंकि हमारे पूर्वज भी घुमंतू जीवन व्यतीत करते थे और उसी तर्ज पर आज हमारे लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते हुए शिव-शंकर पुराण गाते हैं.”

सपेरा जनजाति के कलाकारों ने अपनी बीन के लहरे समेत अन्य वाद्य यत्रों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी. सपेरा जनजाति के कलाकारों के बीन के लहरे पर कार्यक्रम में शामिल लोग झुमते हुए दिखाई दिए.

वहीं दिल्ली में भांतू समाज के बीच काम करने वाले गुरुदत्त भाना भांतू ने डिनोटिफाइड समाज के लोगों को 70वें विमुक्ति दिवस की बधाई देते हुए कहा, “कितना अजीब लगता है कि आज से 15 दिन पहले पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा था और हम सब उनके साथ खड़े जन-गण-मन अधिनायक गा रहे थे और आज हम बिना सरकारी मदद के अपने पैसे से अपना विमुक्ति दिवस मना रहे हैं और हमारे साथ जन-गण-मन गाने वालों में से शायद ही कोई साथ खड़ा है.”  

कलंकित अतीत और धुँधला भविष्य: न्याय की तलाश में विमुक्त जन

शायद यह मेरी मजबूरी है या आत्मप्रशिक्षण का परिणाम, मुझे भारत का संविधान बहुत अच्छा लगता है। इसने एक ऐसे देश को बदलने का बीड़ा उठाया हुआ है जो अन्याय, हिंसा, बहिष्करण की हजार-हजार परतों को अपने ऊपर चढ़ाए हुए आगे बढ़ना चाहता है। यह कभी आगे बढ़ता है तो कभी मुँह के बल गिर पड़ता है। फिर भी अच्छी बात यह है कि यह देश चल रहा है- भविष्य की ओर।

व्यक्तियों, समुदायों, नेताओं, अधिकारियों और सेठों के साथ कमजोर, गरीब, सताये और संतप्त लोग, अस्पृश्य और अपराधी करार दिए गए समूह लोकतंत्र के एक विशाल जुलूस में अपनी-अपनी गति से जा रहे हैं- एक दूसरे को धकियाते हुए, एक दूसरे से जगह माँगते हुए, अपनी जगह बनाते हुए। कुछ को जगह मिल जा रही है, कुछ को आवाज उठाने का मौका और वे लोकतंत्र से उपजी सत्ता में थोड़ी सी भागीदारी पा जा रहे हैं। कुछ को यह मौका नहीं मिल पा रहा है।

भारत का लोकतांत्रीकरण कई तरीके से हुआ है। आज़ादी की लड़ाई की विरासत से निकले विभिन्न दलों, व्यक्तियों, विचारों ने इसका लोकतांत्रीकरण किया है। आज़ादी के बाद उन समूहों ने अपनी आवाज़ बुलंद की है जो पीछे छूटते गए थे जैसे महिलाएं, आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों के समुदाय। उनकी पार्टियाँ बनीं, नेता उपजे, कुछ आगे गए, कुछ बिला गए, लेकिन एक ऐसा समूह भी है जो अपनी आवाज़ लोकतंत्र की रंगशाला में प्रस्तुत नहीं कर पाया। उसके पास राजनीति को ‘परफ़ॉर्म’ करने वाला कोई बड़ा दल और नेता नहीं हुआ।

उन्हें आजकल विमुक्तसमुदाय कहते हैं। विमुक्तसमुदाय के यह लोग कौन हैं?

यह वे लोग हैं जिनकी संख्या 1946 में एक करोड़ थी और जो जन्मजात आपराधी माने जाते थे। जब देश आज़ाद नहीं हुआ था, उसके ठीक पहले भारत की संविधान सभा में जो बहस हो रही थी, उसमें सेंट्रल प्रोविंस और बरार से आए एच. जे. खांडेकर ने बड़ी ही व्यग्रता से उनकी बात रखी। 21 जनवरी 1947 को उन्होंने उन ‘एक करोड़ लोगों की बात उठायी जो जो जन्म लेते ही बिना किसी जुल्म के जरायमपेशा मान लिए जाते हैं’। उन्होंने इस समुदाय के लिए सुरक्षात्मक उपाय लागू करने की अपील की।

तब जवाहरलाल नेहरू के ‘उद्देश्यों के प्रस्ताव’ पर बहस हो रही थी। 21 नवम्बर 1949 को एक बार फिर उन्होंने इस मुद्दे की तरफ संविधान सभा का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि इस संविधान के अधीन बोलने की आजादी और कहीं भी आने-जाने की आजादी तो दी जा रही है लेकिन देश के एक करोड़ अभागे नागरिकों को आने-जाने की आजादी नहीं है। यहां के अपराधी जनजातियों को कहीं भी आने-जाने की सुविधा अभी प्राप्त नहीं है। इस संविधान में इनके बारे में कुछ नहीं कहा गया है। क्या शासन ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ को हटाकर उन लोगों को स्वतंत्रता प्रदान करेगा?

इससे थोड़ा पहले उसी साल, 28 सितम्बर 1949 को गृह मंत्रालय ने अनंतशयनम अयंगर की अध्यक्षता में एक ‘क्रिमिनल ट्राइब्स इनक्वायरी कमेटी’ का गठन किया और 1950 में जब इसकी रिपोर्ट आयी तो इन समुदायों का दुर्भाग्य देखिए कि एक बार फिर कहा गया कि यह समुदाय बस तो जाएंगे लेकिन अपराध करते रहेंगे। इसलिए उन्हें ‘आदतन अपराधी’ अधिनियम में पाबन्द किया जाय। साथ ही उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए ईमानदारी और कर्मठता के जीवन में लाने की बात की गयी। पूरे भारत में 31 अगस्त 1952 में क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट समाप्त कर दिया गया। इसी की याद में ‘विमुक्त दिवस’ मनाया जाता है।

 यह क्रिमिनल ट्राइब्स एक्टक्या था?

‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ 12 अक्टूबर 1871 को पास किया गया था। इस एक्ट से देश की एक बड़ी जनसंख्या को आपराधिक जनजाति घोषित कर दिया गया। आपराधिक जनजाति घोषित करने का काम प्रशासन को दिया गया था। जब उसके ‘पास पर्याप्त कारण’ हो जाते थे तो किसी जिले का जिलाधिकारी यह घोषणा कर देता था। इसके पहले थाने की रिपोर्ट जाती थी। अपराधी घोषित किए जाने वाले समुदाय के बालिग लोगों, यानि 14 वर्ष से ऊपर के लोगों की गिनती होती थी। उनके आपराधिक रिकार्डों की वर्गीकृत सूची तैयार करके किसी थाने के अधीन आने वाले समुदाय की घोषणा हो जाती थी।

1871 से लेकर 1921 के बीच कम से कम 190 के करीब समुदाय इस कानून की निगहबानी में ले आए गए। 1947 में जब देश आज़ाद हुआ तो केवल तब उत्तर प्रदेश में पूरे भारत की ‘क्रिमिनल ट्राइब’ की जनसंख्या का 40 प्रतिशत निवास कर रहा था। 1500,000 लोग उत्तर प्रदेश में इस श्रेणी मे चिन्हित किए गए थे। यह समुदाय ‘मुख्य धारा के समुदाय की संरचना में अवांछित’ करार दिए गए थे। जी. एन. देवी का मानना है कि इंग्लैण्ड और यूरोप में भी घुमंतुओं के प्रति एक अलग नजरिया काम कर रहा था। उन्हें कम प्रतिष्ठा प्राप्त थी, इसका कारण सत्रहवीं सदी में इंग्लैण्ड और फ्रांस के बीच जारी युद्धों में बड़ी संख्या में सैनिक रखने और उन्हें वेतन देने के लिए बहुत सारे धन की जरूरत थी। धन जुटाने के लिए उन्होंने कर संग्रह के प्रारूप में बदलाव किया। पहले उपजाऊ फसलों पर कर लेने का प्रावधान था लेकिन अब भूमि मापन के आधार पर कर आरोपण किया गया। जो कर अदा कर सकते थे समाज में उनकी इज्जत थी और जो भूमिहीन थे, कर नहीं अदा कर सकते थे, समाज में उनकी इज्जत कम होने लगी। भूमिहीन वैकल्पिक समुदायों की भी समाज में इज्जत इतनी कम हो गयी कि इन्हें संशय की दृष्टि से देखा जाने लगा।

यूरोप के जिप्सी समुदाय को वहां बहुत प्रताड़ना सहनी पड़ी। इस बात का असर औपनिवेशिक भारत में अंग्रेज प्रशासकों पर भी हुआ। उसके परिणामस्वरूप घुमन्तू जनों को आपराधिक जनजाति सूची में रख दिया गया। इस एक्ट को पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत, पंजाब और अवध में लागू किया गया।

इस एक्ट ने पुलिस को बहुत अधिकार दिए। समुदायों को पुलिस थाने में जाकर अपना पंजीकरण करवाना होता था। पुलिस उन्हें एक लाइसेंस देती थी। वे पुलिस की अनुमति के बिना जिले से बाहर नहीं जा सकते थे। यदि वे अपना स्थान बदलते तो इसकी सूचना पुलिस को देनी होती थी। बिना पुलिस की अनुमति से यदि समुदाय का कोई सदस्य एक से अधिक बार अपनी बस्ती या गाँव से अनुपस्थित रहता था तो उसे तीन वर्ष तक का कठोर कारावास का भागीदार होना पड़ता था।

उनके लिए स्पेशल रिफॉर्म कैंप की भी व्यवस्था की गयी जिसमें उन्हें सुधारा जाना होता था। उत्तर प्रदेश में इस प्रकार के रिफॉर्म कैम्प इलाहाबाद, खीरी, बाँदा और कानपुर में खोले गए। इन स्कूलों को खोलने में सॉल्वेशन आर्मी की भूमिका थी। इलाहाबाद के फूलपुर में ऐसा ही एक स्कूल खोला गया था जिसके बारे में 1937 में प्रकाशित शालिग्राम श्रीवास्तव की किताब बताती है कि वहां ‘चोरी-बदमाशी पेशावालों की लड़कियां’ सिलाई-कढ़ाई का काम सीखती थीं।

उत्तर प्रदेश में सॉल्वेशन आर्मी का मुख्य केंद्र बरेली जिले में था। उसका मुख्यालय मॉल रोड शिमला में था। सॉल्वेशन आर्मी यही काम श्रीलंका में भी करती थी। ब्रिटिश उपनिवेश द्वारा यह मानकर चला जा रहा था कि भारत के यह समुदाय पतित हो गए हैं और उन्हें एक नये किस्म के नैतिक शास्त्र की आवश्यकता है। सॉल्वेशन आर्मी इसमें ब्रिटिश उपनिवेश की सहायता कर रही थी। यह दोनों के लिए फायदे का सौदा होता था। सॉल्वेशन आर्मी को धर्म प्रचार में सहायता मिलती थी और उपनिवेश को बिना पैसा खर्च किए अपनी प्रजा में ‘ब्रिटिश नैतिक शास्त्र’ को बढ़ावा देने का अवसर मिल जाता था।

खीरी में खोले गए कैम्प में सॉल्वेशन आर्मी को ब्रिटिश सरकार की काफी सहायता मिली। मुरादाबाद के सांसी समुदाय के लोगों को खीरी लाया गया। इसी प्रकार एटा के भाटू काशीपुर में बसाए गए। सरकार भाटू जनों पर विशेष ध्यान दे रही थी क्योंकि वे ‘बेकाबू’ हो रहे थे। 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स  एक्ट से स्थानीय जमींदारों को भी जोड़ दिया गया। जमींदारों को न केवल पंजीकरण में पुलिस की सहायता करनी होती थी बल्कि वे पंजीकृत समुदायों के सदस्यों की खोज-खबर भी रखते थे। समुदाय की ‘पहचान’ निर्धारित करने का अधिकार उच्च अधिकारियों को दिया गया। 

उत्तर प्रदेश में गोंडा जिले के बरवार समुदाय को 1 जुलाई 1884 को आपराधिक जनजाति घोषित किया गया। उनकी बस्तियों को चिन्हित किया गया और उनकी संख्या को दर्ज किया गया। उत्तर प्रदेश के इंस्पेक्टर जनरल की रिपोर्ट में लिखा गया कि यह ‘विश्वास करने के पर्याप्त कारण’ हैं कि गोंडा के बरवार, एटा के अहेरिया और ललितपुर के सुनरहिया समुदाय को अपराधी घोषित कर दिया जाए। क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट के घोषित होने के दो वर्ष बाद ही 1873 में ग्यारह गाँवों के 48 अहेरिया परिवारों को इसके अधीन अपराधी घोषित कर दिया गया। अलीग़ढ़ के अहेरिया समुदाय के लोगों के साथ भी यही हुआ। गोरखपुर के डोम 1880 के बाद इस कानून की जड़ में आए और उन्हें अपराधी घोषित किया गया। इसी प्रकार बस्ती जिले के पुलिस अधीक्षक ई. जे. डब्ल्यू. बेलेयर्स की 1913 की एक रिपोर्ट बताती है कि अगस्त 1911 में परसुरामपुर थाने के एक दर्जन के करीब गाँव अपराधी घोषित किए गए। इन गाँवों में खटिक समुदाय के लोग रहते थे।

अफ़ीम और सुधारगृह

दुनिया को नशेड़ी चलाते हैं। यह बात उन्हें पता रहती है इसलिए उन्हें नशा और तेजी से चढ़ता है। अगर यह नशा अफ़ीम का हो तो क्या कहने! जिन्होंने अमिताभ घोष का उपन्यास ‘सी ऑफ़ पॉपीज’ पढ़ी होगी या जिन्होंने वास्तव में अफ़ीम खायी होगी, वे इसे जानते होंगे। तो हुआ यह कि जब भारत के अंदर पैदा होने वाली अफ़ीम चीन के समाज की सेहत को बहुत तेजी से नष्ट करने लगी तो चीन और ब्रिटेन में खूब लड़ाई हुई। इसका कारण यह था कि भारत पर ब्रिटेन का कब्जा था। भारत के खेतों में अफ़ीम उगायी जाती और चीनी जनता अफ़ीम चाटती।

इन दोनों देशों के बीच युद्ध के कारण नयी अंतर्राष्ट्रीय आवश्यकताओं और सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों के कारण अफ़ीम का व्यपार ढीला पड़ने लगा। इसके कारण गोरखपुर, बनारस, फूलपुर,कानपुर और बांदा के अफ़ीम गोदाम खाली होने लगे, हालाँकि वे अभी इतने खाली भी नहीं हुए थे। (मैंने अभी उत्तर प्रदेश से बाहर के बारे में कोई अध्ययन नहीं किया है। हो सकता है कि यह कहानी बिहार और मध्य प्रदेश की भी हो!)

अब इन खाली गोदामों में सॉल्वेशन आर्मी के अनुरोध पर ‘सेंट्रल प्रोविंसेज’ के अधिकारी अफ़ीम एजेंटों से अनुरोध करने लगे कि वे अपने खाली गोदामों को ‘सुधार और औद्योगिक स्कूल’ चलाने के लिए दे दें। कुछ अफ़ीम एजेंटों ने मना कर दिया। कुछ नहीं कर सके। फूलपुर, कानपुर और बांदा के अफ़ीम गोदामों में ऐसे ‘सुधार और औद्योगिक स्कूल’ खोले गए जिनमें आपराधिक समुदायों के बालक-बालिकाओं को दाखिल किया जाने लगा।

जिस तरह से आस्ट्रेलिया में वहां के मूल निवासियों के बच्चों को जबरदस्ती आवासीय विद्यालयों में भर्ती किया गया था, वैसे ही भारत में किया गया। इन बच्चों और किशोरों को अपार कष्ट और सदमे को सहना पड़ा। आस्ट्रेलिया में तो वहां के नेता केविन रुड ने माफी माँग ली थी। भारत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। वास्तव में भारत में किसी को यह पता भी तो नहीं है कि ऐसा कुछ हुआ भी था। यह एक किस्म का चयनात्मक एमनीशिया है।   

हमारी आज़ादी कहां है?

यह सवाल शहरी भारत की महिलाएं, लेस्बियन, गे, ट्रांसजेंडर और वैकल्पिक सेक्सुअल अस्मिताओं के समूह, लिबरल, डेमोक्रेट, सेकुलर, राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट सभी आपस में पूछते रहते हैं और उसका आपस में जवाब भी ढूँढ लेते हैं। इस बार इन सभी समूहों से यही सवाल घुमंतू और विमुक्त जन पूछ रहे हैं कि हमारी आज़ादी कहां है? आखिर हमारी बात कब सुनी जाएगी?

क्रिमिनल ट्राइब एक्ट के लागू हुए 150 वर्ष हो गए हैं। उन पर कुछ चुनिंदा काम ही उपलब्ध आए हैं। एक अनुमान के मुताबिक 100 में से 6 लोग विमुक्त समुदायों से जुड़े हैं। इनकी बेहतरी के लिए गठित रेणके कमीशन और इदाते कमीशन दोनों ने माना है कि यह समुदाय गरीबों में भी सबसे गरीब हैं। इनकी ठीक-ठीक से जनसंख्या नहीं पता है। इनकी जनगणना होनी चाहिए। आजकल ‘कास्ट सेंसस’ की काफी चर्चा है। ओबीसी समूहों ने इसके लिए व्यापक लामबंदी की है, लेकिन यहां ध्यान रखना चाहिए कि इदाते कमीशन ने स्वयं माना है कि मुख्य जनसंख्या के साथ इन समुदायों की जनगणना कराने की आवश्यकता है। अब यह समूह राजनीति और लोकतंत्र के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। देश की 94 प्रतिशत जनसंख्या को इनकी आवाज सुनने की जरूरत है।

आज यानि 31 अगस्त 2021 को देश की जानी-मानी पत्रिका ‘इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ इन समुदायों के इतिहास, राजनीति और भविष्य पर एक ऑनलाइन विशेषांक लाने जा रही है। धीरे-धीरे ही सही, इन समुदायों पर बात हो रही है। आपको भी करनी चाहिए। इन समुदायों के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानिए। वे सब आपके भाई-बहन हैं, उनसे प्यार कीजिए। उनकी सहायता कीजिए। उनको हर तरह का न्याय मिले, इसमें मदद दीजिए।

लेखक इतिहास के अध्येता हैं, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में फ़ेलो रह चुके हैं और विमुक्त जन के विशेषज्ञ हैं।

भारत के इन करोड़ों लोगों के लिए 31 अगस्त है आजादी का दिन!

देश 15 अगस्त को आजादी का जश्न मना चुका है वहीं देश की करीबन 15 करोड़ की आबादी आज दूसरा आजादी दिवस मना रही है. भारत की आजादी की तारीख 15 अगस्त आपके लिए उत्साहवर्धक हो सकती है लेकिन हमारे बीच कुछ ऐसी जनजातियां भी हैं जिनके लिये 31 अगस्त असली आजादी का दिन है, क्योंकि जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा हुआ था तो ये लोग उस दौर में भी गुलामी का दंश झेल रहे थे.

पहले करीबन 82 साल तक अंग्रेजी हुकूमत ने क्रिमिनल ट्राइब एक्ट लगाकर विमुक्त घुमंतू जनजातियों की कमर तोड़ी इसके बाद ये जनजातियां आजाद भारत में 5 साल 16 दिनों तक गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी रही. विमुक्त घुमंतू जनजातियों को 31 अगस्त 1952  को इस कानून से विमुक्त किया गया तब से लेकर आज तक ये जनजातियां 31 अगस्त को ‘विमुक्ति दिवस’ के तौर पर मनाती हैं.

कौन हैं विमुक्त घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियां

2011 की जनगणना के अनुसार डीएनटी समुदाय की जनसंख्या 15 करोड़ के करीब थी. यूपीए सरकार में गठित ‘रेनके कमीशन 2008’ की रिपोर्ट  के अनुसार देशभर में विमुक्त घुमंतू जनजाति के 98 फीसदी लोग बिना मकान के रहते हैं वहीं इनमें से 70 फीसदी से ज्यादा लोगों के पास अपने पहचान पत्र तक नहीं हैं. इनमें ज्यादातर पशुपालक, शिकारी, खेल दिखाने वाले और मनोरंजन करने वाले समुदाय हैं. जैसे

बंजारे, जो पशुओं पर माल ढोने का काम करते हैं. गाड़िया-लोहार, जो जगह-जगह जाकर लोहे के औजार बनाकर बेचने का काम करते हैं. बावारिया, जो जानवरों का शिकार करने का काम करते थे. नट, नृत्य और करतब दिखाने का काम करने वाली जनजाति. कालबेलिया सांपों का खेल दिखाने वाली, शर्प दंश का इलाज करने वाली तथा जड़ी-बुटियां तैयार करने वाली जनजाति.

इसी तरह, भोपा– स्थानीय देवताओं के गीत गाने वाले. सिकलीगर– हथियारों में धार लगाने वाले. कलंदर– जानवरों से करतब दिखाने वाले. ओढ- नहर बनाने तथा जमीन की खुदाई करने वाले. बहरूपिये– लोगों का मनोरंजन करने वाले. सरकार के विकास के बड़े-बड़े दावों के बावजूद ये जनजातियों विकास की मुख्यधारा से गायब हैं.

विमुक्त घुमंतू जनजातियों ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया. लेकिन 1857 की क्रांति की हार के बाद इन जनजातियों को अंग्रेजों के खिलाफ चलाए गए अभियान का खामियाजा भुगतना पड़ा. जिसके चलते अंग्रेजी हुकूमत ने इन जनजातियों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया क्योंकि अंग्रेजी हुकूमत को खतरा था कि ये लोग आगे चलकर उनके लिए फिर से चुनौती बन सकते हैं. एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहने की वजह से ये लोग  अपनी और अपने पशुओं की सुरक्षा के लिए हथियार भी रखते थे. जंगलों में रहने के कारण ये जनजातियां जंगल बीहड़ों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ थीं. ये लोग गोरिल्ला युद्ध में माहिर थे. इन लोगों ने असंख्य अंग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतारा जिसकी वजह से अंग्रेजी हुकूमत इन जनजातियों से भयभीत और परेशान थी.

विमुक्त घुमंतू जनजातियों पर लगाम लगाने के लिए सरकार 1871 में क्रिमिनल ट्राईब एक्ट अर्थात आपराधिक जनजाति अधिनियम लेकर आई सबसे पहले इस एक्ट को उत्तर भारत में लागू किया गया. उसके बाद 1876 में इस कानून को बंगाल प्रांत पर भी लागू किया गया और 1924 तक आते-आते क्रिमिनल ट्राईब एक्ट को पूरे भारत में रहने वाली इन सभी जनजातियों पर थोप दिया गया. 1500 घुमंतू-अर्धघुमंतू और 191 विमुक्त जातियों पर इस कानून का सीधा असर पड़ा

इस एक्ट को लागू करने का मुख्य उद्देश्य इन जनजातियों पर पाबंदी लगाना था. कानून के तहत इन लोगों को गाँव व शहर से बाहर जाने के लिए स्थानीय मजिस्ट्रेट के यहां अपना नाम दर्ज करवाना यह अनिवार्य कर दिया गया ताकि पता रहे कि ये लोग कहाँ, क्यों और कितने दिनों के लिए जा रहे हैं. नाम दर्ज करवाकर जाने का यह सिलसिला 31 अगस्त 1952 तक जारी रहा.    

ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि कोई आपराधिक घटना होने पर जांच करने में आसानी रहे और साथ ही इन लोगों पर निगरानी भी रखी जा सके. इस तरह इन समुदायों पर अपराधी होने का तमगा चस्पा दिया गया. इस कानून ने इन जनजातियों की समाज में ऐसा छवी गढ़ दी कि जो भी बच्चा इन जनजातियों में जन्म लेता उसको जन्मजात अपराधी मान लिया गया यानी इन लोगों ने जन्मजात अपराधी होने का अमानवीय दंश झेला है और कुछ हद तक आज भी झेल रहे हैं.  

आजादी के बाद 1949 में अय्यंगर कमेटी का गठन किया गया. केंद्र सरकार ने अय्यंगर कमेटी के कुछ सुझावों को मानते हुए कईं सफारिशें लागू की. अय्यंगर कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर 31 अगस्त 1952 को इन जनजातियों को डिनोटिफाई किया गया तब से इन जनजातियों को डीएनटी (डिनोटिफाइड ट्राइब्स) के नाम से जाना जाता है.

इन जनजातियों को डिनोटिफाई तो किया गया लेकिन साथ ही 1959 में इनपर हेब्चुएल ऑफेंडर एक्ट यानी आदतन अपराधी एक्ट थोप दिया गया यानी इन समुदायों से अपराधी होने का दंश पूर्णरूप से नहीं हटा है अब तक भी इन जनजातियों से जुड़े लोगों को शक की निगाह से देखा जाता है. कोई भी अपराध होने पर पुलिस का संदेह आस-पास मौजूद इन डीएनटी समुदाय के लोगों पर ही जाता है. पुलिस और समाज के साथ मीडिया भी विमुक्त-घुमंतू जनजातियों को इसी दृष्टि से देखता है. आपराधिक मामलों में मीडिया इन जनजातियों को सीधा निशाना बनाता है.     

सबसे दुखद यह है कि देश आजाद होने के पांच साल बाद तक भी यही सिलसिला जारी रहा और इन लोगों को समाज द्वारा गढ़ी छवि के साथ रहना पड़ा. अंग्रेजों के चले जाने के बाद भी ये लोग गाँव में नम्बरदार या प्रशासन के रजिस्टर में नाम दर्ज करवा कर जाते थे ताकि इन लोगों पर नजर रखी जा सके.  

अधिनियम खत्म होने के बावजूद आज भी हमारा समाज इन जनजातियों को अपराधी मानता है. 2007 में मध्य प्रदेश के बैतूल जिला के चौथिया गांव में पारधी जनजाति  के घर इसी सोच की भेंट चढ़ गए. चौथिया गांव में पारधी जनजाति  के 350 परिवारों के घर जला दिए गए. समाज के साथ-साथ सरकारी व्यवस्था ने भी विमुक्त घुमंतू जनजातियों के साथ बुरा व्यवहार किया. पुलिस इन जनजातियों को जन्मजात अपराधी मानती है.

आज भी इन जनजातियों के लोग समाज और पुलिस के सबसे आसान शिकार होते हैं. लिहाजा इन्हें किसी भी मामले में गिरफ्तार कर लिया जाता है. जिनके पूर्वजों ने 1857 की क्रांति में इस उम्मीद के साथ अंग्रेजों से लोहा लिया था कि उनकी आने वाली पीढ़ियां खुली हवा में सांस ले सकेंगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका.

2018 की भीखूराम इदाते कमीशन की रिपोर्ट के मुताबिक पूरे देश में 500 से ज्यादा जनजातियां  हैं, जिनमें 313 नोमेडिक ट्राईब यानी घुमंतू और 198 विमुक्त (डिनोटिफाइड) जनजातियां हैं. आजादी के 74 साल बाद भी ये लोग बेघर है, शिक्षा का स्तर शून्य है, सात दशक बीत जाने के बाद भी देश की सरकारों ने इन जनजातियों के उत्थान को लेकर ठोस कदम नहीं उठाए. ये जनजातियां शिक्षा से कोसों दूर हैं. इन लोगों के पास घर नहीं है, राशन कार्ड नहीं है, इनकी अपनी कोई कागजी पहचान नहीं है. सरकार ने इन समुदायों के लिए बहुत बार आयोग बनाए पर किसी भी आयोग की रिपोर्ट पर कर्रवाई नहीं हुई. 

इन जनजातियों को घर, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सुविधाएं भी नहीं मिली हैं. रेनके कमीशन-2008 और इदाते कमीशन-2018 की रिपोर्ट आज तक चर्चा के लिए सदन के पटल पर भी नहीं रखी गई है. 15 करोड़ की आबादी वाली डीएनटी जनजातियों के पास संगठन की ताकत नहीं है ये लोग बिखरे हुए हैं. इसलिए राजनीतिक पार्टियों के पैमाने पर ये एक संयुक्त वोट बैंक के तौर पर नहीं बैठते हैं. यही वजह है कि देश की कुल आबादी का करीबन 10 फीसदी होते हुए भी पिछले सात दशक से इन लोगों की अनदेखी होती रही है.

मृतक किसान सुशील के परिवार का आरोप, ‘पुलिस लाठीचार्ज के कारण हुई उनकी मौत’

करनाल जिले के गांव रायपुर जाटान के किसान सुशील काजल जब 28 अगस्त की रात अपने घर पहुंचे तो उनके कपड़े खून और मिट्टी से धंसे हुए थे. उस दिन करनाल पुलिस ने जिन किसानों पर लाठीचार्ज किया, उनमें वह भी एक थे. अगली सुबह यानी 29 अगस्त को वह अपनी खाट पर मृत पाए गए.

30 अगस्त की सुबह जब हम सुशील काजल के घर पहुंचे तो उनकी पत्नी सुदेश घर के आंगन में गुमसुम बैठी हुई थीं. गांव की अनेकों औरतें उनको घेरे हुए थीं और उनको सांत्वना दे रही थीं.

घर के बगड़ में गांव और आसपास के किसान जमा थे, उनके बेटे साहिल भी वहां जमा किसानों के बीच शांत, अडोल और नज़र झुकाए बैठे थे.

साहिल से वहां जमा एक किसान ने पूछा, “उस रात क्या हुआ था.”

साहिल ने बहुत धीमी आवाज़ में जवाब दिया, “जब वह आये तो मैं उनको खाना देने गया. उन्होंने खाना नहीं खाया. मैंने उनकी हालत देखी तो उनको अस्पताल चलने के लिए कहा. लेकिन उन्होंने ये कहकर मना कर दिया कि वह दूसरे किसानों के साथ अस्पताल जाने के लिए करनाल गए थे लेकिन पुलिस ने पूरे करनाल शहर को जाम कर रखा था. पुलिस किसानों को देखते ही मारने दौड़ती थी इसलिए वह वापस घर आ गए.”

साहिल इतना कहकर एकदम शांत पड़ गए. एक किसान ने उनके कंधे पर हाथ रखा. चुप्पी तोड़ते हुए साहिल ने बताया, “उनकी गर्दन और शरीर पर डंडों के निशान थे. इस जिद्द में वह सो गए कि सुबह डॉक्टर को दिखा लेंगे. सुबह जब देखा तो वह बुरी तरह अकड़े पड़े थे और उनका पेट फुला हुआ था.”

सुशील सिर्फ डेढ़ एकड़ के किसान थे और इस आंदोलन में पिछले दस महीने से सक्रिय थे. वह करनाल के बसताड़ा टोल पर हर दिन जाते थे.

उनकी पत्नी सुदेश ने हमें बताया, “पुलिस ने उन किसानों की पहचान पहले ही कर रखी थी जो इस आंदोलन में ज्यादा सक्रिय थे. लाठीचार्ज हुआ तो वह ठोकर खाकर गिर गए थे. पुलिस ने उस वक्त उनको बहुत मारा.”

सुदेश के पास बैठी गांव की अन्य औरतें भी बार-बार पुलिस पर गंभीर आरोप लगा रही थीं.

करनाल जिले की भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष जगदीप औलख से भी हमने इस मामले में बातचीत की. जगदीप उस समय बसताड़ा टोल टैक्स पर ही थे जब पुलिस ने किसानों पर लाठीचार्ज किया.

जगदीप ने हमें बताया, “सुशील की मौत पुलिस लाठीचार्ज की वजह से हुई है. जिस दिन पुलिस ने हम किसानों पर लाठीचार्ज किया, उस दिन पुलिस ने किसानों को अस्पतालों तक भी नहीं पहुंचने दिया. करीब 300 किसानों पर पुलिस ने चार बार लाठीचार्ज किया था. पुलिस के डर की वजह से सिर्फ 50-60 किसानों ने मेडिकल चेकअप करवाया है और वो भी लाठीचार्ज के अगले दिन यानी 29 अगस्त को करवाया है. अगर पुलिस उसी दिन मेडिकल चेकअप करवाने देती तो शायद सुशील को बचाया जा सकता था.”

हमने जगदीप से मृतक किसान का पोस्टमार्टम करवाए जाने को लेकर भी सवाल किया. जिसके जवाब में जगदीप ने बताया, “29 अगस्त को हम लोग किसानों के मेडिकल चेकअप करवाने में उलझ गए. हम वहां पहुंच पाते उससे पहले ही प्रशासन के लोगों ने बिना पोस्टमार्टम करवाए अंतिम संस्कार करवा दिया. इतनी तानाशाही चल रही है कि किसानों को पहले बुरी तरह पीटा, फिर मेडिकल चेकअप नहीं करवाने दिया और जब एक किसान मर गया तो उसका पोस्टमार्टम तक नहीं होने दिया.”

इस मामले को लेकर हमने करनाल के डीसी निशांत यादव से भी बात करने की कोशिश की है, लेकिन अभी तक उनका कोई जवाब नहीं आया है.

हालांकि, करनाल पुलिस ने लाठीचार्ज के दौरान लगी चोटों के कारण सुशील काजल की मौत के दावे का खंडन किया है. करनाल के एसपी गंगा राम पुनिया ने एएनआई को बताया, “वह किसी अस्पताल नहीं गया. वह घर गया तो बिल्कुल सही था और उसकी नींद में मृत्यु हुई है. कुछ लोग कह रहे हैं कि उनका निधन दिल का दौरा पड़ने से हुआ है. पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए गए बल के दौरान लगी चोटों के कारण उनकी मौत की खबरें झूठी हैं.”

करनाल में हुए लाठीचार्ज के विरोध में आज घरौंडा की अनाज मंडी में किसान पंचायत अयोजिय की गई है. हरियाणा और पंजाब के करीब दस हज़ार किसान इस पंचायत में जमा हुए हैं.

पंचायत में स्टेज से किसान नेताओं ने निम्नलिखित प्रस्ताव पास किए गए हैं.

  1. एसडीएम आयुष सिन्हा को तुरंत बर्खास्त किया जाए, लाठीचार्ज से शहीद हुए किसान सुशील काजल की मौत के लिए 302 का मुकदमा दर्ज हो.
  2. किसानों पर लाठीचार्ज करने वाले हरेक अधिकारी के खिलाफ केस दर्ज किए जाएं.
  3. 3. शहीद किसान के परिवार को 25 लाख रुपये और परिवार में एक नौकरी दी जाए.
  4. 4 छह सितंबर तक मांग न माने जाने पर 7 सितंबर को करनाल में अनिश्चितकालीन धरना दिया जाएगा.
  5. जिन-जिन पुलिस वालों ने किसानों पर लाठियां चलाई हैं उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाए.

नीमच में आदिवासी को चोरी के शक में पीटा और फिर ट्रक के पीछे बांधकर घसीटा, दर्दनाक मौत

मध्यप्रदेश में मॉब लिंचिंग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। अब नीमच जिले में एक आदिवासी युवक के साथ हुई बर्बरता के बाद उसकी मौत हो गई है। इस घटना का वीडियो बेहद डराने वाला है।

इस घटना में गरीब आदिवासी युवक को चोरी के शक में पीटा गया और फिर उसे बीच सड़क पर ले जाकर एक पिकअप वाहन के पीछे बांधकर घसीटा गया। इसके बाद युवक गंभीर रूप से घायल हो गया और उसकी मौत हो गई। घटना का वीडियो वायरल होने के काफी देर बाद पुलिस हरकत में आई और चार लोगों को गिरफ्तार किया गया।

नीमच के सिंगोली थाना क्षेत्र में हुई यह घटना 26 अगस्त की बताई जा रही है जिसका वीडियो अब वायरल हो रहा है। आरोपियों ने आदिवासी युवक कन्हैयालाल भील को चोरी का लगा कर पहले तो जमकर पीटा फिर पिकअप वाहन में बांधकर उसे घसीटा। गंभीर अवस्था में कन्हैयालाल भील को इलाज़ के लिए ले जाया गया जहां उसने दम तोड़ दिया।

मृतक कन्हैया लाल उर्फ़ कान्हा बाणदा का रहने वाला था और गुरुवार सुबह अपने दोस्त के साथ पत्नी को खोजने के लिए निकला था। इस दौरान वह आते-जाते लोगों से अपनी पत्नी के बारे में जानकारी ले रहा था। इसी दौरान उसे दूध बेचने जा रहे छीतर गुर्जर ने उसे देखा और चोर समझा।

छीतर ने उसे टक्कर मारकर गिरा दिया और पीटना शुरु कर दिया। इसके बाद मौके पर कुछ गांव वालों को बुला लिया और कान्हा को बुरी तरह पीटना शुरु कर दिया। इसके बाद उसे ट्रक में बांधकर करीब सौ मीटर तक घसीटा और बाद में अधमरी हालत में उसे छोड़कर भाग गए।

इस मामले में पुलिस ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया है। इनमें 32 साल का छीतर, 40 वर्षीय महेंद्र सिंह, गोपाल (40), लोकेश (21) और लक्ष्मण को गिरफ्तार कर उन पर हत्या का मामला दर्ज किया है।

हालांकि इस एक और घटना के सामने आने के बाद मध्यप्रदेश में कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और इसे लेकर कोई ठोस हल प्रदेश सरकार के पास फिलहाल नजर नहीं आ रहा है। इसे लेकर अब कांग्रेस पार्टी भी मुखर है

इससे पहले इंदौर में एक चूड़ी वाले की पिटाई, देवास में एक कबाड़ खरीदने वाले की पिटाई भी की गई थी।

साभार: देशगांव

करनाल में किसानों के सिर फटे तो दिल्ली में संपादकों की आत्मा मर गयी!

शनिवार को करनाल में किसानों पर बर्बर लाठीचार्ज हुआ तो सोशल मीडिया पर चोट खाये किसानों की तस्वीरें तैरने लगीं। देखते-देखते मामला पूरे देश में फैल गया। पूरे राष्ट्र से एक स्वर में आवाजें आ रही थीं, लेकिन जिनको हम राष्ट्रीय न्यूज चैनल मानते हैं, उन पर यह खबर सिरे से गायब थी। इक्का-दुक्का न्यूज चैनलों को छोड़ दें तो कल ज्‍यादातर न्यूज चैनल पर यह लीड खबर नहीं थी।

मुझे लगा कि टीवी के एडिटरों की आत्मा मर गयी होगी, लेकिन सुबह राष्‍ट्रीय दैनिक कहे जाने वाले बड़े अखबारों के संपादकीय पृष्ठ खोले तो लगा कि टीवी के संपादकों के साथ अखबार के संपादक भी दिवंगत हो चुके हैं। दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, हरिभूमि, जनसत्ता, दैनिक भास्कर, अमर उजाला, पायनियर समेत बड़े हिंदी अखबारों की समूची मंडली ने किसानों के फूटे हुए सिर और जनरल डायर की तर्ज पर सिर फोड़ने के आदेश देते एक एसडीएम को ऐसे अनदेखा कर दिया जैसे राजधानी दिल्ली से महज 100 किलोमीटर दूर करनाल जिले में कल किसानों पर प्रशासन ने लाठियां नहीं, फूल बरसाये हों।

हिंदुस्तान टाइम्स, न्यू इंडियन एक्सप्रेस, इंडियन एक्सप्रेस, फाइनेंसियल एक्सप्रेस, द एशियन ऐज, द हिंदू, द इकनॉमिक टाइम्स, द पायनियर जैसे किसी भी बड़े अंग्रेजी अखबार की संपादक मंडली को किसान नजर नहीं आए। बेशक, इनके डिजिटल मंचों पर करनाल की खबर अलग-अलग रूपों में दिखायी दे रही है। कई बार यह समझ नहीं आता कि ऐसी क्या मजबूरी है कि ग्रामीण भारत की इतनी बड़ी खबरों पर ऐसी भयंकर चुप्पी सारे संपादक क्यों साध लेते हैं।

दैनिक जागरण, राष्ट्रीय संस्करण

दैनिक ट्रिब्यून ने किसानों पर हुए लाठीचार्ज को मुख्य लीड बनाया है और अंदर भी कई खबरें छापी हैं। वैसे पंजाबी और हिंदी ट्रिब्यून को खेती-बाड़ी ट्रिब्यून कहा जा सकता है क्योंकि दोनों अखबार किसान आंदोलन के शुरूआती दिनों से ही अच्छी कवरेज कर रहे हैं। अंग्रेजी ट्रिब्यून में यह खबर मुख्य लीड नहीं है, पर ठीक-ठाक कवरेज की गयी है। पंजाबी और हिंदी ट्रिब्यून के मुकाबले अंग्रेजी ट्रिब्यून ग्रामीण कवरेज पर अपने दूसरे अंग्रेजी अखबारों जैसा ही रुख़ रखता है।

हिंदी अखबारों की बात करें तो दैनिक भास्कर के हिसार संस्करण ने लीड खबर छापी है। हिंदी पायनियर ने सेकेंड लीड बनाया है। जनसत्ता ने सेकेंड लीड बनाया है, अमर उजाला ने हरियाणा संस्करण में लीड और राष्ट्रीय संस्करण में फ्रंट पेज पर छोटी सी खबर छापी है। राष्ट्रीय सहारा तो खबर छापना ही भूल गया है। हरिभूमि ने सातवें पेज पर खबर छापी है और खबर की शुरुआत में ही किसानों को ‘तांडवकारी’ लिखा है।

दैनिक जागरण ने फ्रंट पेज पर किसानों को हमलावर, बर्बर और आम लोगों को परेशान करने वाला बतलाया है। किसान आंदोलन से रिलेटेड हर खबर में जागरण भाजपा की आइटी सेल का प्रोपेगेंडा ही छापता है। पंजाब केसरी ने चौथे पेज पर खबर छापी है। विज्ञापनों से अटे पड़े नवभारत टाइम्स ने अपने अखबार की जैकेट में मुख्य लीड बनाकर खबर छापी है।

The Telegraph की लीड खबर

अंग्रेजी अखबारों के बीच सबसे अधिक हिम्मत द टेलीग्राफ ने दिखायी है और सिर फोड़ने के आदेश देने वाले एसडीएम को सीधा जनरल डायर लिखते हुए खबर मुख्य लीड के रूप में छापी है। दि हिंदू के चंडीगढ़ एडिशन ने छठे पेज पर छोटी सी खबर छापी है। 38 पेज के वाले टाइम्स ऑफ इंडिया के सातवें पेज पर छोटी सी दो कॉलम की खबर छपी है, हालांकि वह अखबार का मुख्य पन्ना है। यही हाल हिंदुस्तान टाइम्स का है। अखबार के कई पन्ने विज्ञापनों में खर्च करने के बाद खुलने वाले जैकेट में खबर को प्रमुखता से छापा है।

इंडियन एक्सप्रेस ने यह खबर बतौर सेकेंड लीड छापी है। एशियन ऐज ने फ्रंट पेज पर छोटी सी खबर छापी है। फाइनेंशिएल एक्सप्रेस ने कोई खबर नहीं छापी है। जाहिर है, यह अखबार उनके लिए छपता है जिनके फयदे के लिए कृषि कानून बनाये गये हैं, किसानों के लिए नहीं।


मनदीप पुनिया स्वतंत्र पत्रकार हैं 

किसानों का सर फोड़ने के आदेश देने वाले एसडीएम आयुश सिंहा को तुरंत बर्खास्त करे सरकार: संयुक्त किसान मोर्चा

संयुक्त किसान मोर्चा आज मुख्यमंत्री खट्टर के विधानसभा क्षेत्र करनाल में प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस की बर्बरता की कड़ी निंदा करता है और कैमरे पर पुलिस को आदेश देने वाले एसडीएम आयुश सिंहा को तत्काल बर्खास्त करने की मांग करता है।

संयुक्त किसान मोर्चा आज करनाल में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हरियाणा के भाजपा-जजपा सरकार द्वारा की गई क्रूर हिंसा की कड़ी निंदा करता है। किसानों के खिलाफ यह हिंसा मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर के निर्वाचन क्षेत्र में हुआ, जब मुख्यमंत्री के एक कार्यक्रम के संदर्भ में स्थानीय किसानों द्वारा काले झंडे से विरोध किया जा रहा था। सरकार की क्रूर कार्रवाई, और करनाल में तैनात पुलिस बल को प्रदर्शनकारियों के “सिर तोड़ने“ के लिए एसडीएम का आदेश पूरी तरह से अस्वीकार्य और असहनीय है और हमारे लोकतंत्र के लिए अपमान और शर्म की बात है। पीएम मोदी जब जलियांवालाबाग वर्चुअल रैली कर रहे थे, वहीं करनाल में हुआ जलियांवालाबाग दोगुना शर्मनाक है। एसकेएम ने खट्टर-चौटाला सरकार को चेतावनी दी है कि किसान पीछे नहीं हटेंगे और वर्तमान ऐतिहासिक आंदोलन को जनविरोधी सरकार के इस बर्बर कृत्यों से दबाया नहीं जा सकता है। दमन के सरकार के प्रयास ही किसानों के संकल्प और शांतिपूर्ण आंदोलन को मजबूत करेंगे। आने वाले दिनों में संघर्ष और तेज होगा।

संयुक्त किसान मोर्चा ने हरियाणा के लोगों से हर जगह सड़क जाम करने का आह्वान किया है। एसकेएम ने एसडीएम आयुश सिंहा को तत्काल बर्खास्त करने की भी मांग की, जिन्होंने प्रदर्शनकारियों के सिर तोड़ने का आदेश दिया था, जिसके सबूत के रूप में एक वीडियो वायरल हो चुका है।

दमनकारी पुलिस कार्रवाई के जवाब में राज्य में कई जगह विरोध हुआ जहां किसानों ने कुरुक्षेत्र, अंबाला, जींद, रेवाड़ी, नरवाना, फतेहाबाद, सिरसा, किटलाना टोल, गोहाना, रोहतक, भिवानी, केएमपी आदि जैसे कई स्थानों के अलावा उत्तराखंड के विभिन्न स्थानों पर भी राजमार्ग जाम किया गया। यह रोड जाम अब भी विभिन्न स्थानों पर जारी है।

एसकेएम अमृतसर में किसानों पर लाठीचार्ज की भी निंदा करता है, जहां किसान जलियांवाला बाग के आधुनिकीकरण के उद्घाटन में पीएम के आभासी भाषण का विरोध कर रहे थे। जलियांवालाबाग हत्याकांड स्थल पर जाने की चाह में हजारों युवा जमा हो गए थे। लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया। युवाओं ने इस आयोजन में शामिल होने के श्री नरेंद्र मोदी के नैतिक अधिकार का विरोध किया।

एसकेएम मोदी सरकार के 3 किसान विरोधी, कॉर्पोरेट समर्थक काले कानूनों के खिलाफ तमिलनाडु राज्य विधानमंडल द्वारा एक प्रस्ताव पारित करने का स्वागत करता है। कई राज्य सरकारों ने इन कानूनों का विरोध किया है, और किसान आंदोलन को अब तक विभिन्न तरीकों से अपना समर्थन दिया है।

एसकेएम भारत भर के सभी किसान संगठनों से 5 सितंबर को मुजफ्फरनगर महापंचायत के लिए और अधिक लोगों को जुटाने के लिए ट्रेड यूनियनों, महिला संगठनों, छात्र और युवा संगठनों और अन्य प्रगतिशील नागरिक समूहों के साथ समन्वय बैठकें आयोजित करने और 25 सितंबर को भारत बंद को एक बड़ी सफलता बनाने का अपील करता है।

RSS ने यूपी चुनाव से पहले बनाई किसान आंदोलन के काट की रणनीति!

एक तरफ तीन नये कृषि कानूनों को रद्द करवाने की मांग को लेकर पिछले 9 महीनों से किसान दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन कर रहे हैं वहीं दूसरी ओर संघ किसान आंदोलन की काट निकालने में जुटा है. उत्तरप्रदेश चुनाव से पहले किसान आन्दोलन की धार कमजोर करने के लिए आरएसएस के संगठन ‘भारतीय किसान संघ’ ने इंदौर में दो दिवसीय बैठक की. बैठक में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसान आंदोलन का असर कम करने पर रणनीति बनाई गई. किसान संघ ने किसान आंदोलन के बरअक्स 8 सितंबर को देशभर के जिला मुख्यालयों पर एक दिवसीय धरने का एलान किया.

इंदौर में हुई भारतीय किसान संघ की बैठक में आरएसएस के करीबन 15 पदाधिकारियों ने हिस्सा लिया. किसान संघ ने नये कृषि कानूनों में सुधार और एमएसपी लागू करने के साथ संगठन को मजबूत करने के लिए देशभर में करीब सवा करोड़ सदस्य जोड़ने की बात कही.  

किसान आंदोलन की शुरुआत में ‘भारतीय किसान संघ’ ने केंद्र सरकार से नये कृषि कानूनों में सुधार की मांग की थी लेकिन जैसे-जैसे किसान आंदोलन आगे बढ़ा, किसान संघ ने भी कृषि कानूनों में सुधार की मांग से किनारा कर लिया.

लेकिन अब यूपी विधानसभा चुनाव से पहले किसान आंदोलन की काट के लिए संघ ने भी आंदोलन करने की रणनीति बनाई है. इंदौर में बैठक के बाद ‘भारतीय किसान संघ’ ने जन आंदोलन खड़ा करने की बात कही.

किसान संघ ने 31 अगस्त तक सरकार की ओर से किसानों के लिए लाभकारी मूल्य की घोषणा करने की मांग की. मांग पूरी नहीं होने पर 8 सितंबर से देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की बात कही. भारतीय किसान संघ 8 सितंबर को देशभर के जिला मुख्यालयों पर एक दिवसीय धरने के साथ आंदोलन की घोषणा करेगा. साथ ही संघ की ओर से प्रधानमंत्री को ज्ञापन देकर लाभकारी मूल्य देने का आग्रह किया जाएगा.

इंदौर में चली दो दिवसीय बैठक के बाद संघ के राष्ट्रीय महामंत्री बद्रीनारायण ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “आजादी के बाद लगातार किसानों का शोषण हुआ है, इसलिए किसान संघ लाभकारी मूल्य मांगता है. वर्तमान में फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी छलावा है. एक तो इसकी गणना ठीक से नहीं होती और देश के केवल नौ फीसदी किसानों को ही न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल रहा है. सरकार ने 23 वस्तुओं का समर्थन मूल्य घोषित कर रखा है, लेकिन एमएसपी पर केवल सात-आठ वस्तुओं की ही खरीदी होती है. फिर ऐसी योजना का क्या औचित्य है.”

सीएम खट्टर और बीजेपी नेताओं के खिलाफ प्रदर्शन करने पर करनाल में किसानों पर लाठीचार्ज

हरियाणा के करनाल टोल टैक्स पर शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने बुरी तरह लाठीचार्ज किया है. पुलिस ने किसानों को गंदी गंदी गालियां दीं और कई किसानों का सर फोड़ दिया है.

बतसाड़ा टोल पर धरनारत किसान आज करनाल में आयोजित की गई हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और भाजपा नेताओं की बैठक का विरोध कर रहे थे.

बतसाड़ा टोल से जब बीजेपी नेताओं का काफिला गुजरा तो वहां मौजूद किसानों ने काफिले को काले झंडे दिखाए. जिसके बाद हरियाणा पुलिस ने किसानों पर बर्बर लाठीचार्ज कर दिया. इस दौरान वहां मौजूद दर्जनों किसान घायल हो गए.

किसान रविन्द्र सिंह ने हमें बताया, “आज करनाल में होटल प्रेम प्लाजा में मुख्यमंत्री खट्टर और बीजेपी नेताओं की बैठक थी, जिसका हम किसानों ने शांतिपूर्ण विरोध करने की घोषणा की थी. जब हमने भाजपा नेताओं को काले झंडे दिखाए तो पुलिस ने हमारे ऊपर लाठियों से हमला कर दिया और अनेक किसानों के सर फोड़ दिए.”

किसानों पर हुए लाठीचार्ज पर किसान नेता गुरनाम चढूनी ने सड़के जाम करने का आह्वान किया है. उन्होंने एक वीडियो जारी करते हुए कहा है, “करनाल में प्रशासन द्वारा भयंकर लाठी चार्ज किया गया सभी किसान साथियों ने अनुरोध है बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक सभी सड़कों पर उतर आएँ अपने नज़दीक लगते टोल प्लाज़ा और सभी रोड़ जाम कर दे”

बता दें कि मामले के बाद करनाल प्रशासन के एक उच्च अधिकारी का वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें वह कह रहे हैं, “सिर फोड़ देना खुले आर्डर हैं.”

डीएनटी समुदाय की आजादी और संघर्ष की घटनाओं पर प्रकाश डालती किताब ‘विमुक्त’!

देश में करीबन 15 करोड़ की आबादी वाली विमुक्त घुमंतू जनजातियां हर साल 31 अगस्त को ‘विमुक्ति’ दिवस के तौर पर मनाते हैं. इस बार विमुक्ति दिवस के मौके पर 31 अगस्त को डीएनटी से जुड़ी कहानियों के संकलन ‘विमुक्त’ का विमोचन होगा. ‘विमुक्ता’ का संपादन प्रोफेसर हेनरी श्वार्ज और दक्षिण छारा ने किया है. अहमदाबाद के छारानगर के रहने वाले दक्षिण छारा डिनोटिफाइड ट्राइब से आते हैं. यह किताब विमुक्त घुमंतू जनजातियों की आजादी की कहानियों का संकलन है.

दक्षिण छारा सोशल एक्टिविस्ट के साथ-साथ अहमदाबाद में छारा डिनोटिफाइड जनजाति से आने वाले पहले फिल्म निर्देशक हैं. दक्षिण छारा बॉलीवुड हिंदी फिल्म ‘समीर’ का निर्देशन कर चुके हैं. विमुक्त घुमंतू जनजातियों के संघर्ष की कहानियों के संकलन ‘विमुक्त’ के दूसरे संपादक प्रोफेसर हेनरी श्वार्ज है. प्रोफेसर हेनरी श्वार्ज जॉर्ज टाउन विश्वविद्यालय से जुड़े रहे हैं और प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी के समय से डीएनटी समुदायों पर काम कर रहे हैं.

किताब में डिनोटिफाइड ट्राइब्स से आने वाले लोगों के संघर्ष की कहानियां हैं. यह किताब देश के अलग-अलग हिस्सों, संस्कृति और भाषा से आने वाले डीएनटी समुदाय के लोगों की कहानियों का संकलन है. यह डीएनटी समुदाय से जुड़े लोगों के जीवन के व्यक्तिगत अनुभवों, रोजमर्रा के संघर्षों, नाटकों और केस स्टडी का अपनी तरह का पहला संकलन है.

किताब के लेखक दक्षिण छारा ने गांव-सवेरा को बताया, “इस किताब में केवल कहानियां नहीं बल्कि असल जीवन की घटनाएं भी शामिल हैं. हमारे समुदाय में लिखने वाले बहुत कम लोग हैं. ऐसे में हमारी जनजातियों पर जो भी अत्याचार होता है उसको दूसरे समुदाय के लोग लिखते हैं. उस लिखे हुए में वो दर्द और असलियत सामने नहीं आती है इसलिए जिस समुदाय ने जिन घटनाओं का सामना किया है वो जब लिखता है तो वह घटनाओं का असली रूप होता है. इसलिए मुझे महसूस हुआ कि हमें लिखना चाहिए.”

आगे उन्होंने बताया कि किताब में डीएनटी समुदाय से आने वाले पेशे से वकील सुब्बा राव की लिखी कहानी है. सुब्बा राव ने डीएनटी जोड़े की कहानी लिखी है. जिसमें जिक्र है कि डीएनटी जोड़े के सामने किस तरह की चुनौतियां आती हैं और इन चुनौतियों के बीच वो कैसे अपना जीवन यापन करते हैं. साथ ही डीएनटी समुदाय से आने वाले महाराष्ट्र के भीमराव जाधव के जीवन की घटनाओं पर आधारित किस्सा है. भीमराव जाधव का जन्म सोलापुर के सेटलमेंट में हुआ था. किताब में भीमराव जाधव के सेटलमेंट में रहने से लेकर उनकी गांधी और अंबेडकर से मुलाकात का जिक्र है. यह किताब नवयाना पब्लिकेशन से आ रही है. प्रोफेसर गणेश देवी और प्रो हेनरी और एस आनंद पुस्तक के विमोचन में शामिल रहेंगे.

दक्षिण छारा अहमदाबाद में डीएनटी समुदाय के युवा कलाकारों के साथ मिलकर बुद्धन थिेएटर ग्रूप भी चलाते हैं जिसमें डीएनटी समुदाय से जुड़े युवा कलाकार नाटक के जरिए लोगों को डीएनटी समुदाय से जुड़े मुद्दों को लेकर जागरुक करने का काम करते हैं. पुस्तक के प्रमोशन के लिए बुद्धन थिएटर के कलाकार अनिश गार्गे, चेतन और विकास ने एक वीडियो तैयार है. वीडियो में पुस्तक का प्रमोशनल गीत डीएनटी समुदाय की अपनी ‘भांतू’ भाषा में गाया गया है.


कौन हैं डीएनटी?

1871 में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लगाए गए क्रिमीनल ट्राइब एक्ट (सीटीए) के तहत सरकारी दमन का शिकार हुईं ऐसी जनजातियां जो अंग्रेजों के खिलाफ गोरिल्ला युद्ध लड़ने के लिए जाने जाती थीं. क्रिमीनल ट्राईब एक्ट लागू करके अंग्रेजी सरकार ने इन जनजातियों पर जन्मजात अपराधी होने के ठप्पा लगा दिया. 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ लेकिन ये जनजातियां 31 अगस्त 1952 तक आजाद देश में गुलामी का दंश झेलती रहीं. यानी ये जनजातियां देश आजाद होने के पांच साल बाद तक भी गुलाम रहीं. इन जनजातियों को 31 अगस्त 1952 को डिनोटीफाई किया गया. तब से इन जनजातियों को डिनोटिफाईड ट्राईब्स के नाम से जाना जाता है. यह जनजातियां हर साल 31 अगस्त को विमुक्ती दिवस के तौर पर मनाते हैं.