शुक्रवार, 27 जनवरी 2023
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विमुक्त-घुमंतू जनजातियों ने मनाया 70वां आजादी दिवस!



"कितना अजीब लगता है कि आज से 15 दिन पहले पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा था और हम सब उनके साथ खड़े जन-गण-मन अधिनायक गा रहे थे और आज हम बिना सरकारी मदद के अपने पैसे से अपना विमुक्ति दिवस मना रहे हैं और हमारे साथ जन-गण-मन गाने वालों में से शायद ही कोई साथ खड़ा है"

31 अगस्त को करनाल के समाना बाहू गांव में विमुक्त घुमंतू जनजातियों ने अपना 70वां आजादी दिवस मनाया. 70वें आजादी दिवस समारोह में आस-पास की विमुक्त घुमंतू जनजातियों के लोगों ने हिस्सा लिया. आजादी उत्सव समारोह में बच्चों और बड़ी संख्या में महिलाएं भी शामिल रहीं. आजादी दिवस समारोह में मंगता, मरासी, भेजकूट, सपेरा, जंगम, सांसी, गाड़िया लौहार जनजातियों के लोग शामिल हुए. 

अम्बाला से विमुक्ति दिवस समारोह में शामिल होने के लिए आए मंगत समाज के राम गोपाली ने बताया, “आज विमुक्ति दिवस के अवसर पर हम बहुत खुश हैं. आज का दिन हमारे लिए आजादी का दिन है वहीं दुख इस बात का है कि आज भी हमारे लोगों की आथिक और सामाजिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है. आज भी हमारे मंगत समाज के लोग तिरपाल के घरों में रह रहे हैं हमारे पास बिजली-पानी तक की व्यव्स्था नहीं है.”    

लंबे समय से डिनोटिफाइड ट्राइब्स के बीच काम करते आ रहे समाजसेवी बालक राम सान्सी ने मंच से डिनोटिफाइड ट्राइब्स का इतिहास बताते हुए कहा, “देश में अलग-अलग समय पर अलग-अलग आक्रमणकारियों का शासन रहा लेकिन इन जनजातियों ने कभी किसी के सामने समर्पण नहीं किया. 1871 में अग्रेजों ने हमारी जनजातियों पर क्रिमिनल ट्राइब एक्ट लगाकर कमजोर करने का काम किया उसके बाद भी ये जनजतियां अपनी कला और संस्कृति से जुड़े रहे. ये जनजातियां आज भी अपने पहनावे अपनी भाषा को जीवित रखे हुए हैं.” उन्होंने कहा, “ इन जनजातियों से जुड़े लोगों को बाहर आने-जाने के लिए एक पास दिया जाता था. जो देश के आजाद होने के 5 साल 16 दिनों तक भी जारी रहा. इस तरह ये जनजातियां आजाद होने के 5 साल 16 दिनों तक भी गुलाम बनी रहीं.”  

वहीं जंगम समाज के तीन कलाकार भी अपनी प्रस्तुति देने के लिए आजादी समारोह में पहुंचे. जंगम समाज के लोग शिव-शंकर के भजन गाने का काम करते हैं. ये लोग अलग-अलग राज्यों में घूम-घूमकर अपनो वाद्य यंत्रों के साथ शिव के भजन गाकर अपना गुजारा कर रहे हैं. जंगम समाज के अध्यक्ष रामकुमार ने बताया, “हमारी जाति को पिछले साल ही घुमंतू जाति का दर्जा दिया गया है. हम लंबे समय से घुमंतू जातियों में शामिल करने की मांग कर रहे थे क्योंकि हमारे पूर्वज भी घुमंतू जीवन व्यतीत करते थे और उसी तर्ज पर आज हमारे लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते हुए शिव-शंकर पुराण गाते हैं.”

सपेरा जनजाति के कलाकारों ने अपनी बीन के लहरे समेत अन्य वाद्य यत्रों के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दी. सपेरा जनजाति के कलाकारों के बीन के लहरे पर कार्यक्रम में शामिल लोग झुमते हुए दिखाई दिए.

वहीं दिल्ली में भांतू समाज के बीच काम करने वाले गुरुदत्त भाना भांतू ने डिनोटिफाइड समाज के लोगों को 70वें विमुक्ति दिवस की बधाई देते हुए कहा, “कितना अजीब लगता है कि आज से 15 दिन पहले पूरा देश स्वतंत्रता दिवस मना रहा था और हम सब उनके साथ खड़े जन-गण-मन अधिनायक गा रहे थे और आज हम बिना सरकारी मदद के अपने पैसे से अपना विमुक्ति दिवस मना रहे हैं और हमारे साथ जन-गण-मन गाने वालों में से शायद ही कोई साथ खड़ा है.”