देवीलाल तेरी नेक कमाई, दुष्यंत ने मिट्टी में मिलाई!

24 अक्टूबर को हरियाणा विधानसभा के चुनावों का परिणाम आया तो राज्य में किसान कमेरे वर्ग में एक ख़ुशी का माहौल था। हो भी क्यों ना, दुष्यंत को इस वर्ग ने 10 सीटें जीता कर सत्ता की ’चाबी’ हाथ में देकर 5 साल में अपने ख़िलाफ़ हो रही ज़्यादतियों एवं अत्याचारों को दूर करने लिए, उससे भी ऊपर अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिए, और अपने खेत में खड़ी फ़सलों के सम्मानजनक मूल्यों के लिए; खट्टर की मरोड़ जो निकाल दी थी। सिर्फ़ खट्टर ही क्यों किसान-कमेरे वर्ग ने तो ’मोदी-शाह’ की जोड़ी को भी पानी पिला दिया था; जिन्होंने भारत के प्रधान मंत्री और गृह मंत्री होते हुए भी छोटे से हरियाणा में खट्टर को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाने के लिए इतनी रैलियाँ की थी।

अबकी बार 75 पार’ का नारा देने वालों के लिए, बहुमत का आँकड़ा छूने भर के लिए भी निर्दलियों का हाथ पकड़ने की नौबत आ गयी। ‘बेटी बचाओ- बेटी पढ़ाओ’ का नारा देने वाले, गोपाल कांडा के ‘गीतिका शर्मा कांड’ को भी भूलते दिखाई दिए। जिस गोपाल कांडा की गिरफ़्तारी के लिए भाजपा के नेताओं ने दिल्ली में 2012 में धरने प्रदर्शन किए, उसी कांडा का समर्थन लेने के लिए अब सिरसा से भाजपा की सांसद सुनीता दुग्गल, गोपाल कांडा को चार्टेड प्लेन में दिल्ली लेकर आईं।

लोकलाज के ऊपर लोकराज को तरज़ीह
किसान कमेरे वर्ग के मसीहा, ताऊ देवी लाल ने हमेशा लोकलाज की बात की। किसान, मज़दूर, दलित, पिछड़ों के इज़्ज़त और मान सम्मान की लड़ाई लड़ी। अपनी ज़बान के पक्के रहे। यहाँ तक कि अपनी ज़बान की लाज रखने के लिए ही प्रधानमंत्री तक कि कुर्सी ठुकराते और लोकलाज को ऊपर करते हुए कहा कि ‘लोग मुझे प्यार से ताऊ बोलते हैं, मुझे ताऊ ही रहने दो। प्रधानमंत्री वी॰पी॰ सिंह को बना दो’। वहीं दूसरी और दुष्यंत ने अपनी ही ज़ुबान से मुकरते हुए भाजपा से हाथ मिला लिया। यूँ तो ताऊ ने भी 90 के दशक में भाजपा के साथ मिल कर चुनाव लड़ा, परंतु वो चुनाव, कोंग्रेस की किसानों एवं मज़दूरों की दमनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ लड़ा था। चौधरी ताऊ देवी लाल कभी शोषण कर्ताओं के साथ जाकर चुनाव नहीं लड़े। उनका मानना था कि लोकराज, लोकलाज़ से चलता है। लेकिन वहीं दूसरी और दुष्यंत चौटाला ने लोकलाज के ऊपर लोकराज को तरज़ीह दी। उन्होंने लोगों की भावनाओं की भी लाज़ नहीं रखी।
दुष्यंत चौटाला, उस पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने चले हैं, जिनकी शोषणकारी नीतियों से किसान, मज़दूर एवं ज़मींदार पिछले पाँच साल से दुःखी हैं। मज़दूरों के बेहतर भविष्य के लिए मज़बूत नहीं, मजबूर सरकार देनी चाहिए थी। इसलिए सरकार से बाहर रहकर मज़दूरों के हित में आवाज़ उठानी चाहिए थी।

किसान कमेरे वर्ग ही नहीं, छात्रों एवं आरक्षित वर्ग से भी छल
चौधरी ताऊ देवी लाल हमेशा ही दमनकारी सरकारों, मुख्यतः कांग्रेस मुक्त राज्यों की परिकल्पना करते थे। इसी कड़ी में उन्होंने 1987 में हरियाणा की 90 में से 85 सीटें जीतकर कोंग्रेस को हरियाणा में मात्र 5 सीटों पर लाकर खड़ा कर दिया था। यही नहीं, किसान-मज़दूरों को दमनकारी सरकारों के विरुद्ध एक नया विकल्प भी दिया था। वहीं दूसरी और दुष्यंत चौटाला ने दमनकारी सरकार के साथ हाथ मिलाकर न केवल किसान-मज़दूरों एवं ज़मीनदार वर्ग के साथ छल करने का काम किया है। अपितु हाल ही में ग्रूप डी॰ की नौकरी परीक्षा मात्र के लिए पूरे हरियाणा में इधर से उधर दौड़ाये गये, एवम् करनाल आई॰टी॰आई॰ के प्रदर्शनकारी छात्रों को भी ठगने का काम किया है। जिन्होंने रोष में, सरकार के विरोध में वोट किया था। यहीं नहीं, दुष्यंत चौटाला ने आरक्षित वर्ग को भी नहीं बक्शा, जिसने दुष्यंत को 10 सीटें जितवाने में न केवल जी तोड़ मेहनत करी बल्कि 10 में से गुहला, नरवाना, शाहबाद एवं उकलाना की 4 आरक्षित सीटें जितवा कर भी दी। इस वर्ग ने भी अच्छी ख़ासी तादाद में दिल्ली में रविदास मंदिर और लखनऊ में महर्षि वाल्मीकि के मंदिर के तोड़े जाने की वजह से, सरकार के विरोध में वोट किया था।

अपने कौन से बुरे थे?
ख़बरों की माने तो भाजपा का साथ देने की एवज़ में दुष्यंत चौटाला ने उपमुख्यमंत्री, 2 कैबिनेट मंत्री और एक राज्यसभा पद माँगा है। अगर उपमुख्यमंत्री पद से ही संतुष्ट होना था तो अपने दादा ओम् प्रकाश चौटाला और चाचा अभय चौटाला कौन से बुरे थे? उनसे भी माँग सकता था। जबकि चौटाला परिवार के धर्मभाई पंजाब के बादल परिवार में, प्रकाश सिंह बादल और सुखबिर सिंह बादल के बीच तो यह होता भी आया है। सुखबिर सिंह बादल तो 2014 में हिसार के पुराना सरकारी कॉलेज मैदान में दुष्यंत के चुनावी प्रचार के लिए आए थे। जब अभय चौटाला ने भी पूरी जान लगा दी थी अपने परिवार के नयी पीढ़ी के चुनावी सफ़र की शानदार शुरुआत करवाने के लिए। यही नहीं पिछले साल बी॰एस॰पी॰ और आई॰एन॰एल॰डी॰ के बीच हुआ गठबंधन तो इतना मजबूत था कि सरकार बनाने के बाद जितने चाहे मंत्री बन सकते थे। 1996 के आम चुनावों में ताऊ देवीलाल और साहब कांशीराम की जोड़ी ने 10 में से 5 सीटें जीतकर गठबंधन की मज़बूती दिखा भी दी थी। हरियाणा की राजनीति पर अच्छे से नज़र रखने वाले पत्रकार मंदीप पूनिया ने भी अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि आरएसएस के इशारों पर चलकर दुष्यंत एवं दिग्विजय चौटाला ने गौहाणा में न केवल अपने दादा चौधरी ओम् प्रकाश चौटाला और चाचा अभय चौटाला के ख़िलाफ़ रैली में हूटिंग करवाई, अपितु परिवार एवं पार्टी तोड़कर नई पार्टी भी बना ली।

किसान-ज़मींदार के नेता से आधे परिवार का नेता
जहाँ, ताऊ देवीलाल ने किसान मज़दूर और ज़मींदारों को एक किया। उनके नेता कहलवाये। वहीं दूसरी ओर पार्टी और परिवार ही नहीं, किसान-कमेरे और ज़मींदार वर्ग को भी आई॰एन॰एल॰डी॰ और जे॰जे॰पी॰ के बीच में बाँटने का काम दुष्यंत का ही कहा जा सकता है। अपने चुनावी प्रचार में भी जो दुष्यंत चौटाला ने चुनावी गाने इस्तेमाल किए उनके बोल “यो तो रूप दूसरा ताऊ का दुष्यंत चौटाला रै”, में भी ताऊ की साफ़ छवि को भुनाने की कोशिश की गयी। ऐसा नेता जो कुर्सी के लालच में लोकसभा चुनावों में ‘ऐनक’ के शीशे तो फोड़ ही गया; बल्कि विधान सभा चुनावों में तो किसान-कमेरे वर्ग की आँखे ही फोड़ गया। जो ताऊ देवीलाल जैसा किसानों का नेता तो बन नहीं पाया, बल्कि चौधरी ओम् प्रकाश चौटाला के जेल में चले जाने के बाद जाट नेता बनने के चक्कर में एक परिवार का नेता बन के रह गया, वो भी आधे चौटाला परिवार का।

(लेखक जेएनयू के रिसर्च स्कॉलर हैं)

रामदेव का शर्तिया इलाज और डॉक्टरों की आहत भावनाएं

कोरोना कुप्रबंधन में मोदी और योगी सरकार की खूब फजीहत हुई। इस कलंक को पब्लिक मेमोरी से मिटाने के लिए बहस का रुख मोड़ना जरूरी है। रामदेव यही कर रहे हैं। सरकार की नाकामी पर चर्चा की बजाय देश में एलोपैथी बनाम आयुर्वेद की बहस छिड़ गई। इस बहस में रामदेव ने खुद को आयुर्वेद के प्रतिनिधि के तौर पर स्थापित कर लिया है। जबकि वे आयुर्वेद के डॉक्टर भी नहीं हैं। फिर भी लगभग हर बीमारी का शर्तिया इलाज उनके पास है। क्योंकि उन्हें सत्ता का संरक्षण और मीडिया का समर्थन हासिल है।

पिछले 20 साल से रामदेव यही करते आ रहे हैं। उनका पूरा कारोबार एलोपैथी और निजी अस्पतालों से त्रस्त लोगों की सहानुभूति पर टिका है। शुरुआत में मेडिकल व फार्मा इंडस्ट्री को रामदेव के दावों से कोई फर्क नहीं पड़ा। लेकिन अंग्रेजी दवाओं के खिलाफ प्रवचन देते-देते रामदेव खुद दवा कंपनी के मालिक बन चुके हैं। अब फार्मा इंडस्ट्री को उनसे फर्क पड़ता है। इसलिए जब रामदेव ने अंग्रेजी दवा खाने से लोगों के मरने की बात कही तो मेडिकल बिरादरी तिलमिला उठी। जबकि हाल के वर्षों में ज्ञान-विज्ञान और तर्कशील सोच पर इतने हमले हुए, तब चिकित्सा समुदाय चुप्पी साधे रहा। यह चुप्पी डॉक्टरों को अब भारी पड़ रही है।

रामदेव के सवालों का मुकाबला डॉक्टर आहत भावनाओं से नहीं कर सकते हैं। क्योंकि विज्ञान सवाल उठाने की छूट देता है। विज्ञान हर बीमारी के इलाज का दावा नहीं करता। ना ही अपनी नाकामियों को छिपाने में यकीन रखता है। चमत्कार और विज्ञान में यही तो फर्क है। इसलिए जब रामदेव एलोपैथी का मजाक उड़ाते हैं या उस पर सवाल उठाते हैं तो उसका जवाब कोरी भावुकता की बजाय वैज्ञानिक तथ्यों और तर्कसंगत तरीके से देना चाहिए। इसके लिए आयुर्वेद का मजाक उड़ाने या उसे कमतर साबित करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है।

“हम तो मानवता की सेवा कर रहे हैं। रामदेव हम पर सवाल उठा रहे हैं?” इस तरह की भावुकता भरी दलीलों से डॉक्टर विज्ञान का पक्ष कमजोर ही करेंगे। जबकि जरूरत रामदेव के दावों को वैज्ञानिक और कानूनी कसौटियों पर कसने की है। लेकिन इस काम में देश के चिकित्सा समुदाय ने कभी दिलचस्पी नहीं दिखायी। वरना एक इम्युनिटी बूस्टर कोरोना की दवा के तौर पर लॉन्च न हो पाता। हालिया विवाद के बाद भी कोरोनिल की मांग बढ़नी तय है।

रामदेव ने सिर्फ डॉक्टरों पर ही नहीं बल्कि समूचे मेडिकल साइंस पर सवाल उठाये हैं। रामदेव के मन की बात को न्यूज चैनल मेडिकल साइंस के विकल्प के तौर पर पेश कर रहे हैं। क्योंकि प्रमुख विज्ञापनदाता के तौर पर रामदेव मीडिया के साथ हैं। रामदेव का कुछ ऐसा ही रिश्ता सत्ताधारी भाजपा के साथ है। लेकिन जिन राज्यों में गैर-भाजपाई सरकारें हैं वहां भी रामदेव को कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है। यह रामदेव की आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक ताकत है जो उन्होंने योग, आयुर्वेद, स्वदेशी और हिंदुत्व के घालमेल से हासिल की है।

एलोपैथी से निराश और निजी अस्पतालों से लूटे-पिटे लोगों का बड़ा तबका रामदेव पर भरोसा करता है। भले ही तबीयत बिगड़ने पर एलोपैथी का ही सहारा लेना पड़े। यह बात रामदेव भी जानते होंगे। इसलिए उनका टारगेट संभवत: कम गंभीर रोगी हैं जो डॉक्टर के पास जाए बिना सीधे दुकान से दवा खरीद सकते हैं। कोरोना काल में ऐसे लोगों की तादाद काफी बढ़ी है। बाकी तर्कसंगत और वैज्ञानिक सोच रखने वाले लोग रामदेव के बारे में क्या सोचते हैं, इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है देश की आम जनता से। यह आम जनता ही रामदेव की श्रोता, पतंजलि की उपभोक्ता और भाजपा की मतदाता है। सुबह-सुबह रामदेव उन्हीं को संबोधित करते हैं। हर घर में बिना डिग्री के डॉक्टर तैयार करने का उनका अभियान दवा कंपनियों को डराने लगा है। यह खुद लोगों के लिए भी खतरनाक है।

डॉक्टरों के लिए सोचने वाली बात यह है कि महामारी में इतनी सेवा करने के बावजूद समाज में उनके प्रति कोई खास सहानुभूति क्यों नहीं उमड़ी? जिन डॉक्टरों को पिछले साल कोरोना योद्धा बताकर फूल बरसाये जा रहे थे, इस बार वे आईटी सेल के निशाने पर क्यों हैं? इसके दो कारण हैं। पहला, मरीजों की जेब काटने वाले अस्पतालों और डॉक्टरों के प्रति लोगों में रोष है। दूसरा, जब से डॉक्टरों ने ऑक्सीजन की किल्लत के बारे में खुलकर बोलना शुरू किया है, तब से वे भाजपा समर्थकों के निशाने पर आ गये हैं। रामदेव ने डॉक्टरों पर हमला बोलकर आईटी सेल वालों को टारगेट दिखा दिया। इससे सरकार को बड़ी राहत मिली होगी। क्योंकि जिन लोगों को इलाज नहीं मिला, उन्हें समझाया जा सकता है कि वह इलाज ठीक नहीं था। इसलिए तो सोशल मीडिया के दौर में हकीकत से ज्यादा नैरेटिव की अहमियत है।

मुख्यमठी

एक मूडी शख्स ने बचपन चय्याशी की नज़्र कर दी. बड़ा हुआ शादी हुई पर भाग खड़ा हुआ. उस महिला का जीवन कितना दर्दनाक होगा जिसे जन्म जन्म के बंधन में बांध दिया गया और एक भी जन्म का साथ और सुख नहीं दिया गया . कयामत से कम नहीं कि उसे तलाक़ भी मयस्सर न हुई कि वो अपनी नई ज़िंदगी शुरू कर सके…


पांच जून 1972 को अजय सिंह बिष्ट का जन्म उत्तराखंड में हुआ. वो भाग्य का धनी था उसने 5 फरवरी 1994 को नाथ संप्रदाय के सबसे प्रमुख मठ गोरखनाथ मंदिर के उत्तराधिकारी के रूप में अपने गुरु महंत अवैद्यनाथ से दीक्षा पायी. इस मठ को कुमारिल भट्ट के उसी आंदोलन से जोड़ कर देखा जाना चाहिए जो सनातन कर्मकांड के खिलाफ मूवमेंट खड़ा करने वाले गौतम बुद्ध के भिक्षुओं को कुचलने के लिए चलाई गयी थी. अयोध्या बौद्ध और जैन का केंद्र था. जिस नरक (ब्रह्मणवाद) से गौतम बुद्ध ने भारत को निकालने की कोशिश की थी उसी नरक में दोबारा उसे ठेल दिया गया.

बिष्ट को जो मिला क़िस्मत से मिला. बिष्ट की क्वालिफिकेशन जानने की क़तई ज़रूरत नहीं. धर्म, अंधों के ज़रिए, अंधों के लिए और अंधों का होता है. कभी धार्मिक गुरु बड़े विद्वान हुआ करते थे लेकिन अब सिर्फ दूसरी कम्युनिटी (फ़र्ज़ी दुश्मन) के खिलाफ हद दर्जा नफरती होना काफी है… वरना आप ही सोचो कि बाल बिष्ट का उच्चारण तक ठीक नहीं है मगर वो छत्रिय होने के बावजूद मठाधीश है तो है.
मठाधीश ही की तरह राजनीति भी उसे क़िस्मत से मिल गयी. गोरखपुर सीट से उसके गुरु संसद चुने जाते रहे हैं और गुरु ने शिष्य को राजनीतिक उत्तराधिकारी भी बना दिया. दुनिया के किसी धर्म में चुनाव नहीं होता जो थोड़ा बहुत था उसे भी ख़त्म कर दिया गया है. 

राजनीतिक संघर्ष में कभी बिष्ट किसी पॉलिसी पर बात करते हुए नहीं सुने गए कि उनकी बुद्धिमत्ता और नेता वाली सूझ बूझ का पता चल सके।  उनके लिए सबसे अहम मुद्दा हिन्दू-मुस्लिम रहा है. वो दिन दूनी रत चौगनी इसी में लगे रहे और धीरे धीरे हिंदुत्व के फायरब्रांड नेता बन गए. राजनीति में लम्बी पारी खेलने के लिए उन्होंने हिन्दू युवा वाहिनी बनायी जिस पर गोरखपुर, देवरिया, महाराजगंज, कुशीनगर, सिद्धार्थनगर से लेकर मऊ, आज़मगढ़ तक मुसलमानों पर हमले और सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के दर्जनों मामले दर्ज हैं.ये वही संगठन है जिसने कुशीनगर और महराजगंज के इलाकों में मुस्लिम लड़कियों का हिंदूकरण जम कर किया। संगठन और उसके आकाओं को कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि सामने वाले पर क्या बीतेगी? हिंदुत्व के संरक्षण में संगठन ये काम निष्ठावान करता है। ये आरएसएस की तरह पुरखों (अतीत) में गौरव ढूंडने में लगा हुआ है। ये आज पर भविष्य की बुनियाद रखने में यकीन नहीं रखता। 
अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ योगी आदित्य नाथ के कुछ बयानों पर एक नज़र डालिए…
जून 2016: “जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से कोई नहीं रोक सका तो मंदिर बनाने से कौन रोकेगा.”
अक्टूबर 2016: “मूर्ति विसर्जन से होने वाला प्रदूषण दिखता है लेकिन बकरीद के दिन हज़ारों निरीह पशु काटे गए काशी में, उनका ख़ून सीधे गंगा जी में बहा है क्या वो प्रदूषण नहीं था?”
अक्टूबर 2015: दादरी हत्याकांड पर योगी ने कहा – “यूपी कैबिनेट के मंत्री आजम ख़ान ने जिस तरह यूएन जाने की बात कही है, उन्हें तुरंत बर्ख़ास्त किया जाना चाहिए. आज ही मैंने पढ़ा कि अख़लाक़ पाकिस्तान गया था और उसके बाद से उसकी गतिविधियां बदल गई थीं. क्या सरकार ने ये जानने की कभी कोशिश की कि ये व्यक्ति पाकिस्तान क्यों गया था? आज उसे महिमामंडित किया जा रहा है.”
जून 2015: “जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्‍हें भारत छोड़ देना चाहिए. जो लोग सूर्य नमस्‍कार को नहीं मानते उन्‍हें समुद्र में डूब जाना चाहिए.”
अगस्त 2015: “मुस्लिमों की जनसंख्या तेजी से बढ़ना खतरनाक रुझान है, यह एक चिंता का विषय है, इस पर केंद्र सरकार को कदम उठाते हुए मुसलमानों की आबादी को कम करने की कोशिश करनी चाहिए.”
फरवरी 2015: “अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश के सभी मस्जिदों के अंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे. आर्यावर्त ने आर्य बनाए, हिंदुस्तान में हम हिंदू बना देंगे. पूरी दुनिया में भगवा झंडा फहरा देंगे. मक्का में ग़ैर मुस्लिम नहीं जा सकता है, वैटिकन में ग़ैर ईसाई नहीं जा सकता है. हमारे यहां हर कोई आ सकता है.”
अगस्त 2014: लव जेहाद’ को लेकर योगी का एक वीडियो सामने आया था. इसमें वे अपने समर्थकों से कहते सुनाई दे रहे थे कि हमने फैसला किया है कि अगर वे एक हिंदू लड़की का धर्म परिवर्तन करवाते हैं तो हम 100 मुस्लिम लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाएंगे. बाद में योगी ने वीडियो के बारे में कहा कि मैं इस मुद्दे पर कोई सफ़ाई नहीं देना चाहता.*बीबीसी हिंदी

1999 में महराजगंज के पचरुखिया में क़ब्रिस्तान और श्मशान की ज़मीन को लेकर होने वाले विवाद में फायरिंग के दौरान एक गार्ड और पुलिस कांस्टेबल की मौत हो गई है. इस मामले में बिष्ट के खिलाफ केस दर्ज हुआ।  

जनवरी 2007 में एक युवक की हत्या के बाद हिन्दू युवा वाहिनी कार्यकर्ताओं द्वारा सैयद मुराद अली शाह की मज़ार में आग लगाने की घटना के बाद हालात बिगड़ गए और प्रशासन को कर्फ़्यू लगाना पड़ा. रोक के बावजूद योगी द्वारा सभा करने और उत्तेजक भाषण देने के कारण उन्हें 28 जनवरी 2007 को गिरफ़्तार कर लिया गया. क़ाबिले ज़िक्र है कि उनको गिरफ़्तार करने वाले डीएम और एसपी को दो दिन बाद ही मुलायम सरकार ने सस्पेंड कर दिया. 
कुशीनगर ज़िले में साल 2002 में मोहन मुंडेरा कांड हुआ, जिसमें एक लड़की के साथ कथित बलात्कार की घटना को मुद्दा बनाकर गांव के 47 अल्पसंख्यकों के घर में आग लगा दी गई. ऐसी घटनाओं की एक लंबी फ़ेहरिस्त है लेकिन किसी में बिष्ट के ख़िलाफ़ न तो रिपोर्ट दर्ज हुई, न उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई.

प्रदेश में बसपा, सपा की सरकार रहते हुए भी उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि कोई भी न्याय नहीं करना चाहता बल्कि सब एक हथियार या मौके की तरह से योगी जैसे लोगों का इस्तेमाल इलेक्शन में करते रहते हैं। इस तरह आसानी ये रहती है कि लोग डर कर वोट करते हैं और कोई सवाल भी नहीं पूछता कि पिछले पांच सालों में तुम ने क्या किया है? इन दल्ले दलों को दलदल में समाधि देकर नयी कश्ती, नयी आंधी और नया तूफान पैदा करने की ज़रूरत है. 

दलाल मौलवी और मुल्लों को ख़बरदार किया जाता है कि वो रोज़ी रोटी के लिए कोई और काम ढूंढ लें वरना  जो वो करेंगे ۔۔۔खुद ही भरेंगे. 
लखनऊ में आयोजित सातवें कॉमनवेल्थ पार्लियामेंट्री एसोसिएशन इंडिया रीजन कॉन्फ्रेंस के सांस्कृतिक कार्यक्रम में प्रोग्राम रंग-ए-इश्क़ के दौरान म्यूज़िक अचानक बंद करके कव्वाली पर परफ़ॉर्म करने से रोक दिया गया. अधिकारियों ने बोलना शुरू कर दिया कि यहां कव्वाली नहीं चलेगी. ये सरकारी कार्यक्रम है. ये और बात है कि आर्टिस्ट मंजरी चतुर्वेदी ने स्टेज से ही पुर ज़ोर कहा कि ये उनके ये प्रोग्राम का हिस्सा है और वो गंगा जमुनी तहजीब की पक्षधर और प्रचारक हैं।

नफरत की इंतेहा देखिए कि वो म्यूज़िक में भी धर्म देखते हैं। दादरा, ठुमरी, यमन, दरबारी और कल्याणी आदि धुनें भी हिन्दू मुस्लिम होती हैं। काश इन्हें कोई बताए कि हिंदी और उर्दू जब जुबान बनने की प्रक्रिया में थे तो इन में शायरी की दाग बेल अमीर खुसरो ने ही डाली थी…ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ कि ताब-ए-हिज्राँ नदारम ऐ जाँ न लेहू काहे लगाए छतियाँ 
…तबला समेत कई साज़ और धुनें खुसरो ने ईजाद की थीं. इतनी ही अकड़ है तो हर जगह (मंदिर और भजनों  समेत) रागों और साज़ों पर प्रतिबंध लगाओ. 
हमें नहीं भूलना चाहिए कि बिष्ट वही हिंदुत्व के धर्मगुरु हैं जिन्होंने ने अल्पसंख्यकों की औरतों को क़ब्रों से निकाल कर ब्लातकार करने के लिए प्रेरणादायक बयान दिया था. 
बीजेपी में तरक़्क़ी पाने के लिए सिर्फ मुसलमानों से नफरत, उन्हें बड़ी तादाद में क़त्ल करना ही काफी है. आज भी बीजेपी के पास कोई अर्थशास्त्री नहीं है जो इन्फ्लेशन (मुद्रास्फीति) को कंट्रोल कर सके. इन्हें इकॉनमी से कुछ लेना देना है भी नहीं. रोटी कपड़ा और माकन ये अर्बन नक्सल का मुद्दा है. इन का मुद्दा सिर्फ एजंडा है. चंद लोगों का एजंडा जो भारत को मनुवादी हिन्दुस्थान बना दे. 

उत्तर प्रदेश पुलिस का चरित्र हमेशा से ही छटे गुंडों की ही रही है लेकिन फ़िलहाल जो उत्तेजना लखनऊ और इटावा में देखने को मिल रही है वो बाबा योगी की वजह से ही है. पुलिस और बाबा को संविधान के बारे में कुछ भी बताने से कोई फायदा नहीं है मगर दोनों ये जान लें कि जो भी सैलेरी उन्हें मिल रही है वो जनता के टैक्स से आता है. उत्तर प्रदेश पुलिस क्या जनता से लड़ने पर उतारू है? क्या वो जनता से लड़ सकती है?? हमें याद रखना चाहिए कि जनरल डॉयर के साथ जो पुलिस थी वो भारतीय ही थी…इसी पुलिस ने अपने ही लोगों पर जलियान वाला बाग़ में गोलियां चलायी थीं. अगर सारे के सारे पुलिस वाले ‘न’ कह देते तो पुलिस वालों की इतनी बड़ी तादाद थी कि उन के खिलाफ कोई करवाई नहीं हो सकती थी. 
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ… 2016 के बाद डाटा ही जारी नहीं किया गया। इंडिया टुडे में छपे एक लेख के मुताबिक अब क्राइम रिकॉर्ड के डाटा में भी हेरा फेरी कर दी गई है। नेशनल  क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो गृह मंत्रालय केेे अंतर्गत  काम करता है। अब यहां भी बनियागीरी शुरू  हो चुकी है। अगर कोई घटना होती है जिसमें अपहरण, बलात्कार, मर्डर और लाश जलाया जाना (सबूत मिटाने की कोशिश) शामिल हैं तो ये चार केस बनते हैं मगर Principal Offence Rule (POR) के मुताबिक ये सब एक ही केस माना जाएगा। गृहमंत्री देेश का सबसे बड़ा बनिया है।
फिर भी एनसीआरबी के मुताबिक़ यूपी ने टॉप किया है। यहां महिलाओं के खिलाफ सबसे ज़्यादा क्राइम हुए हैं। 
बाबा बिष्ट उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश तो बना नहीं सकते कयोंकि उनमे ऐसा कुछ है ही नहीं फ़िलहाल हमारी उनसे यही अपील है कि वो यूपी को एक मठ की तरह नहीं बल्कि एक प्रदेश की तरह चलायें. आज वो जिस कुर्सी पर बैठे हैं वो किसी की बपौती नहीं है. कल वो नहीं तो …कोई और होगा. 
आखिरी बातअगर भगवा हटा कर सिर्फ एक आम आदमी के तौर पर अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ बाबा योगी आदित्य नाथ को देखें जिन पर हत्या समेत कई मुक़दमे दर्ज हैं तो आप को वो एक छटे हुए गुंडे (मुजरिम) की तरह नज़र आएंगे. बड़े फ्रेम में देखिये और मुझे बताइये कि तालबन और योगी में क्या फ़र्क़ है? इतिहास गवाह है…धर्म की आड़ में हमेशा से यही होता आया है और होता रहेगा।
एक बाबा होने के नाते बिष्ट जी को बीवी और बच्चों यानि परिवार का कोई तजुर्बा नहीं है. यही वजह है कि गोरखपुर और सहारनपुर में हज़ारों बच्चे मर गए मगर उनके माथे पर बल तक नहीं आया. घर-ग्रहस्ती चलाने में क्या दिक़्क़ते आती हैं इन्हे कुछ अंदाज़ा है न होगा. वो महिलाएं जो हिन्दू-हिन्दू की रट में लीन हैं उन्हें सोचना चाहिए कि हिन्दू-हिन्दू के बाद उन्हें दोबारा घरों में क़ैद होना पड़ेगा. उन्हें देवी तो माना जायेगा मगर इंसान हरगिज़ नहीं.
टॉप टेन VPN ने कहा है कि भारत, सूडान और इराक के साथ, दुनिया के उन तीन शीर्ष देशों में शामिल है जिन्होंने सबसे ज़्यादा इंटरनेट बैन किया है। हिन्दुस्तान ने 2019 में कुल चार हज़ार 196 घंटे इंटरनेट बंद रखा और जिसके कारण उसे 3.1  बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ. आज की बड़ी खबरों में है कि डेमोक्रेसी इंडेक्स में भारत 10 पॉइंट्स नीचे (41से 51पर) आ गया है. 

…साफ है कि बीजेपी-आरएसएस को हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा चाहिए कयोंकि अब राम मंदिर का रास्ता साफ हो गया है और इस बात से इन्हें सब से ज़्यादा नुकसान हो रहा है. हिन्दू का ‘ह’ और मुस्लिम का ‘म’ मिलाकर ‘हम’ होता है…हम भारत के लोग हैं. हमारी सभ्यता हर दौर के लिए प्रकाश का उत्सव है… CAA2019+NRC+NRP= Divide and Rule की क्रोनोलॉजी हर भारतीय समझ चुका है। अब कुछ नहीं हो सकता। सुप्रीम कोर्ट भी जन भावना को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता. लोकतंत्र में इलेक्शन और सिलेक्शन सब कुछ जनता के हिसाब से ही होता है और जनता CAA2019+NRC+NRP= Divide and Rule के खिलाफ है। 

हिन्दू-मुस्लिम एकता को नागपुर के नाग ने ऐसा डस लिया है कि ज़हर कम होता नज़र नहीं आता…बाद अज़ तमाम… इरफ़ान सिद्दीक़ी का ये शेर बहुत फिट बैठेगा …
अजब हरीफ़ था मेरे ही साथ डूब गया मिरे सफ़ीने को ग़र्क़ाब देखने के लिए_इरफ़ान सिद्दीक़ी

मोबीन भाई को उनके ब्लॉग http://abirti.blogspot.com पर भी पढ़ा जा सकता है।

सही निकली किसानों की आशंका, दालों की जमाखोरी ने बढ़ायी सरकारी की चिंता

तीन विवादित कृषि कानूनों में से एक आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 को लेकर किसानों की आशंका सही साबित हुई। केंद्र सरकार ने जिस कानून को बदलकर अनाज, दाल, खाद्य तेल, तिलहन, आलू और प्याज को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया था, अब जमाखोरी रोकने के लिए उसी पुराने कानून का सहारा लेना पड़ रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, गत वर्ष की तुलना में दालों के खुदरा दाम 33 फीसदी तक बढ़ चुके हैं। इसके पीछे जमाखोरी को वजह माना जा रहा है।  

सोमवार को भारत सरकार के उपभोक्ता मामलों के विभाग की सचिव लीना नंदन ने राज्यों के खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के प्रमुख सचिवों के साथ वीडियो कांफ्रेंस करते हुए देश में दालों की उपलब्धता और कीमतों की समीक्षा की। बैठक में दालों की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी के पीछे जमाखोरी की आशंका जतायी गई। केंद्र सरकार ने राज्यों को आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जरूरी चीजों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने को कहा है। इससे पहले 14 मई को केंद्र सरकार ने राज्यों को पत्र लिखकर व्यापारियों, निर्यातकों और मिलर्स से दालों के स्टॉक की जानकारी लेने को कहा था। राज्यों को साप्ताहिक आधार पर दालों की कीमतों पर नजर रखने के निर्देश दिए गये हैं।  

केंद्र सरकार ने पिछले साल आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन कर अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर दिया था। इसके लिए केंद्र सरकार लॉकडाउन के दौरान ही आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश, 2020 लेकर आई थी और सितंबर में इसका विधेयक संसद में पारित हुआ था। मगर किसान आंदोलन के चलते इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 समेत तीनों कृषि कानूनों पर रोक लगा दी। फिलहाल आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 लागू है, जिनका इस्तेमाल सरकार जमाखोरी पर अंकुश लगाने के लिए कर रही है।

किसान संगठन पिछले साल से ही कृषि उत्पादों को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर कर जमाखोरी की खुली छूट दिए जाने का विरोध कर रहे हैं। अब कोराना संकट के बीच जैसे ही दालों की कीमतों में उछाल आया तो केंद्र सरकार को नेहरू दौर के उसी आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 की याद आई, जिसे बदलने के लिए उसने पूरी ताकत लगा दी थी। यह कानून उस समय का है जब आजादी के बाद देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था और जमाखोरी रोकना बड़ी चुनौती था। इस कानून की जरूरत बाद के वर्षों में भी बनी रही और 22 आवश्यक वस्तुओं को स्टॉक लिमिट के दायरे में लाया गया। इन पर स्टॉक लिमिट लगाने और जमाखोरों पर कार्रवाई करने का अधिकार राज्य सरकारों का दिया गया है।

पिछले साल कृषि सुधारों के तहत अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, आलू और प्याज को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर करते हुए सरकार ने तर्क दिया गया था कि इससे कृषि क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा। कृषि उपज के स्टॉक की पूरी छूट मिलने से कोल्ड स्टोरेज और फूड सप्लाई चेन में निवेश आकर्षित होगा। जरूरी वस्तुओं को केवल विशेष परिस्थितियों जैसे युद्ध, अकाल, प्राकृतिक आपदा या कीमतों में अत्यधिक बढ़ोतरी की स्थिति में ही रेगुलेट किया जाएगा। जबकि जमाखोरी पर अंकुश लगाने की जरूरत सामान्य परिस्थितियों में भी है। देश की खाद्य सुरक्षा को जमाखोरे के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। कृषि कानूनों के आलोचकों का यही तर्क है।

नए कानून में बागवानी उपज का खुदरा मूल्य 100 फीसदी और जल्द खराब न होने वाली कृषि उपज के खुदरा दाम 50 फीसदी बढ़ने पर ही स्टॉक लिमिट लगाने का प्रावधान किया गया है। लेकिन प्रोसेसर्स और एक्सपोर्टर्स को उनकी क्षमता और ऑर्डर के आधार पर स्टॉक लिमिट से छूट दी गई। यह लगातार दूसरा साल है जब केंद्र सरकार को जरूरी चीजों  की जमाखोरी रोकने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 का सहारा लेना पड़ रहा है। इससे कृषि उत्पादों से स्टॉक लिमिट हटाने की केंद्र सरकार की कोशिशों को झटका है। क्योंकि जमाखोरी रोकने के लिए आवश्यक वस्तुओं पर स्टॉक लिमिट लगाने जैसे उपायों की जरूरत लगातार महसूस की जा रही है।

काफी पुराना है वैक्सीन के विरोध का इतिहास, महात्मा गांधी भी रहे खिलाफ

एक ओर जहां कोविड-19 महामारी से बचने के लिए लगाए जाने वाले टीके (वैक्सीन) की किल्लत है वहीं दूसरी तरफ टीकाकरण के खिलाफ अफवाहें और पूर्वाग्रह भी कम नहीं हैं। यह विरोध देश के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के अलावा दुनिया के कई देशों में अलग-अलग आधार पर किया जा रहा है। जहां पढ़े-लिखे लोग इसका विरोध वैज्ञानिक खोज और व्यवस्थापूंजीपतियों के षड्यंत्र को आधार बनाकर कर रहे हैं वहीं ऐसे लोगों की कमी नहींं जो इसका विरोध र्म, नपुंसकता या भय आदि के आधार पर कर रहे हैं। 

किसी भी महामारी के खिलाफ अफवाह फैलने और फैलाने का इतिहास उतना ही पुराना है जितना महामारी का इतिहास है। यहां तक कि महात्मा गांधी ने भी कई दफा यूरोपियन इलाज पद्धति के तहत टीकाकरण का विरोध किया था। जून 1912 में जब गांधी दक्षिण अफ्रीका में थे तो वहाँ के एक स्थानीय अखबार ‘इंडियन ओपिनियन’ में गांधी लिखते हैं, “टीकाकरण एक बर्बर प्रथा है। यह आधुनिक काल का ऐसा जहरीला अंधविश्वास है जैसा आदि-काल में भी नहीं था। हमारे शरीर में एक संक्रमित गाय के शरीर से निकालकर टीका लगाया जा रहा है और इस अशुद्धिकरण का हमें हिस्सा बनाया जा रहा है।” 1929 में जब गांधी भारत आ चुके थे तो अपने बेटे मणिलाल और बेटी सुशीला गांधी के साथ-साथ आम जनता के लिए नवजीवन पत्रिका में लिखते हैं, “कोई भी शाकाहारी ये टीका कैसे ले सकता है, ये टीका लेना सूअर का मांस खाने के बराबर है।” इतना ही नहीं, जब वर्ष 1918 में हिंदुस्तान समेत पूरे विश्व में स्पैनिश इनफ़्लुएंज़ा महामारी फैल रही थी तो गांधी और सरदार पटेल खेड़ा सत्याग्रह के लिए गुजरात के किसानों को संगठित कर रहे थे और दूसरी तरफ उनका एक पोता (शांति), और एक बहू (चंचल) महामारी की चपेट में अपना जान गवां चुके थे। 

विभिन्न महामारियों के निवारण के लिए चलने वाले टीकाकरण अभियान और इसके विरोध का सिलसिला आजादी के बाद से आज तक जारी है। भारत में टीकाकरण की प्रक्रिया कितनी जटिल और चुनौतीपूर्ण हो सकती है इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि पोलिओ महामारी के खिलाफ भारत में टीकाकरण की शुरुआत वर्ष 1995 में होती है और देश को पोलियो मुक्त होने में पूरे 19 वर्ष लगते हैं। नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 के अनुसार भारत के बच्चों में टीकाकरण की सफलता मात्र 62% है। इसी रिपोर्ट में यह भी तथ्य सामने आया कि वर्ष 2005-06 और 2015-16 के बीच भारत में टीकाकरण में तकरीबन 20% की गिरावट आई है जो चिंताजनक है। पिछले कुछ वर्षों में केरल, गुजरात और मुंबई के कई क्षेत्रों में बच्चों के अभिभावकों और निजी विद्यालयों ने अपने बच्चों को एमएमआर का टीका लगवाने से इंकार कर दिया था। ऐसी खबरें टीकाकरण के दौरान खूब आती थींं।

जब भी कोई महामारी आती है, तब-तब महामारी के साथ साथ टीकाकरण को लेकर कई तरह की अफवाहें फैलती है, जिसका इतिहास बहुत पुराना है। पिछले वर्ष जब कोरोना महामारी फैली उसके साथ साथ अफवाहें भी उतनी ही तेजी से फैलीं। कोरोना टीकाकरण से होने वाली नपुंसकता की अफवाह सिर्फ मुसलमानों में नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के हिंदू समाज के लोगों में भी धड़ल्ले से फैलाई जा रही है। जिस तरह से कोरोना के इलाज और दवा को लेकर रामदेव से लेकर कई जनप्रतिनिधियों द्वारा गैर-जिम्मेदाराना दावे किए गए, इन भ्रांतियों की वजह से भी कोरोना टीकाकरण को लेकर गलतफहमियां पैदा हो रही हैं। कई वैज्ञानिक शोधों ने तो इस बात की भी पुष्टि की कि कोई भी टीका करोना के खिलाफ पूर्ण सुरक्षा नहीं देता है। लेकिन फिलहाल इस महामारी के खिलाफ हमारे पास यही सबसे कारगर हथियार है। इन सब के बीच एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना महामारी के दौरान भारत में आयुर्वेदिक दवाओं की बिक्री तेजी से बढ़ी है।

करीब सवा सौ साल पहले वैक्सीन के खिलाफ इस प्रकार का दुष्प्रचार चला

टीकाकरण के प्रति अविश्वास विकासशील देशों से कहीं ज्यादा विकसित यूरोप और अमेरिका में हैं। हाल ही में लंदन स्थित संस्था वेल्कम ग्लोबल मॉनिटर के द्वारा दुनिया के 140 देशों में कराए गए एक सर्वे के अनुसार यूरोप और अमेरिका में 41% लोग टीकाकरण पर विश्वास नहीं करते हैं जबकि भारत जैसे विकासशील देशों में मात्र 20 % लोगों ने ही टीकाकरण पर अविश्वास जाहिर किया। यूरोप और अमेरिका में तो कई संस्थाएं बनी हुई है जिसका मूल मकसद टीकाकरण का विरोध करना रहा है। एंटी-वैक्सीनेशन सोसाइटी ओफ़ अमेरिका (न्यूयॉर्क) उन्नीसवीं सदी के आखिरी वर्षों से लेकर और बीसवीं सदी तक हर तरह के टीकाकरण का विरोध करती रही। इसी तरह अमेरिकन एंटी-वैक्सीनेशन लीग ने बीसवीं सदी के दौरान अमेरिका के अलावा इंग्लैंड में भी प्रखर रूप से टीकाकरण का विरोध किया। 

पिछले वर्ष जब कोरोना महामारी शुरू हुई थी तो अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने भी टीकाकरण का विरोध किया था। वॉल स्ट्रीट पत्रिका ने लिखा था कि कैसे टीकाकरण के विरोध में आवाजें अमेरिका से भारत तक सोशल मीडिया के माध्यम से तेज गति से पहुंच रही है। वहीं दूसरी तरफ एशिया और अफीका में कोरोना को पश्चिमी सभ्यता द्वारा षड्यंत्र के नजरिए से भी देखा जा रहा है। अफवाहों के बारे में एक प्रचलित कहावत है, “जितना मुँह उतनी बातें।” पर अगर इसमें प्रचलित व प्रभावशाली व्यक्तियों या संस्थाओं का मुँह शामिल हो जाए तो अफवाहें कई गुना प्रभावशाली हो जाती है। पिछले एक वर्ष में कोरोना को लेकर लोगों से थाली पिटवाने, दिया जलवाने के बारे में जिस तरह की भ्रामक बातें बोली गई, उससे भी अफवाहों को बल मिला है। महामारी के साथ-साथ इन अफवाहों से निपटने के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए। कोरोना के प्रति अफवाहों को बढ़ावा देने में प्रभावशाली लोगों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के बयान अहम भूमिका निभाते हैं।

(स्वीटी टिंड्डे अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन (श्रीनगर, गढ़वाल) में एसोसिएट के पद पर कार्यरत हैं। आप लेखक से [email protected] पर कर सकते हैं।)

गुम हो गई किसानों की एक मजबूत आवाज

आज सुबह वह खबर मिली जो शायद कई दिनों से टलती आ रही थी। राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष, पूर्व केंद्रीय मंत्री और देश में किसान राजनीति के एक बड़े स्तंभ चौधरी अजित सिंह कोरोना से जिंदगी की जंग हार गये। 20 अप्रैल को संक्रमित होने के बाद वे कई दिनों से आईसीयू में थे। फेफड़ों में इंफेक्शन बढ़ा तो कल डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था। चौधरी अजित सिंह 82 साल के होने के बाद भी काफी चुस्त-दुरुस्त और राजनीतिक रूप से सक्रिय थे। उतार-चढ़ाव वाला लंबा राजनीतिक जीवन जीने के बाद उन्होंने आज सुबह अंतिम सांस ली तो अपने पीछे किसान राजनीति की एक बड़ी विरासत छोड़ गये हैं। चौधरी चरण सिंह से जुड़ाव की एक कड़ी अब यादों का हिस्सा बन चुकी है।  

चौधरी अजित सिंह एक बार राज्यसभा और सात बार लोकसभा के लिए चुने गये। चार बार केंद्रीय मंत्री रहे। केंद्र और राज्य की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे। लेकिन पिछला एक दशक उनके लिए राजनीतिक शिकस्त से भरपूर रहा। लेकिन दो बार चुनाव हारकर भी उनका आचरण बेहद मर्यादित और शालीन बना रहा। उन्होंने बहुत धैर्य के साथ अपनी नाकामियों का सामना किया। तभी तो पद छूटने के बावजूद उनका कद छोटा नहीं हुआ। क्योंकि वे पद से बने हुए नेता नहीं थे, इसलिए बिना पद भी उनका कद बना रहा।

आईआईटी, खड़गपुर से कंप्यूटर साइंस में बीटेक और अमेरिका के इलिनॉय इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी से एमएस करने के बाद 60 के दशक में अजित सिंह आईबीएम में काम कर चुके थे। अपने कंप्यूटर इंजीनियर और आईआईटी से होने का उन्होंने कभी बखान नहीं किया। लेकिन तकनीकी मामलों की उनकी समझ उनके उद्योग, खाद्य, कृषि और विमानन मंत्री रहने के दौरान सामने आई। अस्सी के दशक में वे उस वक्त राजनीति में आए जब चौधरी चरण सिंह अस्वस्थ थे और लोकदल एक बड़ी ताकत हुआ करता था। वह राजनीतिक तौर पर बड़ी उथल-पुथल वाला दौर था। कांग्रेस के खिलाफ लोकदल, जनता पार्टी व कांग्रेस से टूटे धड़े एकजुट हो रहे थे, मगर उनमें आपसी खींचतान भी खूब थी। अजित सिंह इस राजनीति में एकदम नये चेहरे थे। वे जनता परिवार की अंदरुनी राजनीति से पार नहीं पा सके और अपने रास्ते अलग करते चले गये।  

अजित सिंह करीब 47 साल के थे जब राजनीति में आए। चौधरी चरण सिंह ने उन्हें काफी बरसों तक राजनीतिक से दूर ही रखा। आते ही उन्हें लोकदल और फिर जनता दल की अंदरुनी खींचतान का सामना करना पड़ा। शायद इसी वजह से उनका रुझान पहले कांग्रेस और फिर भाजपा की तरफ गया। लेकिन जल्द ही उन्होंने एकला चलो की राह पकड़ ली और अंतिम सांस तक किसान और विपक्षी राजनीति के साथ मजबूती से खड़े रहे। जब धर्म और नफरत की राजनीति सत्ता में आने का फार्मूला बन चुकी थी, तब भी उन्होंने किसान राजनीति का पाला थामे रखा। विपक्ष को लामबंद करने की मुहिम का साथ निभाते रहे। तब भी जब विपक्ष में होने का जोखिम बहुत ज्यादा था।

विपक्ष की एकजुटता वाले मंचों पर चौधरी अजित सिंह लगातार नजर आये

जिस दौर में सुर्खियां बटोरने के लिए भड़काऊ भाषण और ओछी हरकतों का सहारा लेना आम बात है, उन्होंने कभी बेतुकी बयानबाजी, अनर्गल आरोप और पब्लिसिटी स्टंट का सहारा नहीं लिया। इस मामले में वे एकदम चौधरी चरण सिंह जैसे थे। जब बहुत जरूरी होता तभी बोलते और एकदम नपा-तुला बोलते थे। मीडिया को कभी सिर पर नहीं चढ़ाया। बल्कि उचित दूरी ही बनाये रखी, जिसका उन्हें नुकसान भी हुआ। लोग उनके खिलाफ कुछ भी छाप देते थे, खंडन तो दूर वे संज्ञान भी नहीं लेते थे। विरोधियों पर हमले बोलने में भी उन्होंने हमेशा संयम बरता। टीवी की तू-तू, मैं-मैं से तो हमेशा दूर ही रहे। भारतीय राजनीति में ऐसी गरिमापूर्ण उपस्थिति अपने सरल स्वभाव के कारण ही लोगों की नजरों से ओझल रही। बहुत-से लोग इसे उनकी कमजोरी मानते थे। लेकिन वे ऐसे ही थे।  

पश्चिमी यूपी में गन्ना किसानों का गुरूर है क्योंकि वहां कदम-कदम पर चीनी मिलें हैं। ऐसा इसलिए भी हो पाया क्योंकि अजित सिंह ने केंद्रीय मंत्री रहते हुए चीनी मिलों का फासला कम करवाकर नई चीनी मिलों को खूब लाइसेंस दिलवाये। इस नीतिगत पहल ने गन्ना किसानों की खुशहाली के रास्ते खोल दिये, क्योंकि चीनी मिलों में दाम की गारंटी थी। हालांकि, गन्ना भुगतान में देरी बड़ी समस्या है। इस मुद्दे को भी उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल खूब उठाती रही है।

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के समय से ही अजित सिंह ने किसान आंदोलनों का खूब साथ दिया। दिल्ली में 26 जनवरी की घटना के बाद जब गाजीपुर बॉर्डर से किसानों का धरने हटाने की कोशिश की गई और राकेश टिकैत के आंसू छलके तब अजित सिंह का फोन पहुंचाने से पूरा माहौल बदल गया। उनके निधन से किसानों की एक मजबूत आवाज गुम हो गई है। यह दर्द आज उनके समर्थकों की आंखों में झलक रहा है।   

किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के साथ अजित सिंह

इसमें कोई दोराय नहीं कि चौधरी चरण सिंह की विरासत संभालने वाले अजित सिंह राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष तक नहीं पहुंच सके। लेकिन उनके रहते किसान और जाट समुदाय में एक अहसास था कि “दिल्ली में म्हारा कोई है।” यह अहसास उनके चुनाव हारने के बाद भी बना रहा। आज इस अहसास ने दम तोड़ दिया। देश की किसान राजनीति में एक खालीपन पैदा हुआ है, जिसे भरने का दारोमदार राष्ट्रीय लोकदल और उनके पुत्र जयंत चौधरी के कंधों पर है। किसानों के मुद्दों पर राष्ट्रीय लोकदल लगातार सक्रिय है और हाल के जिला पंचायत चुनावों में अच्छी खासी मौजूदगी दर्ज करा चुकी है। ऐसे में चौधरी अजित सिंह की कमी राष्ट्रीय लोकदल के साथ-साथ देश की किसान राजनीति को भी खलेगी। खासकर गठबंधन को आकार देने में उनकी वरिष्ठता और अनुभव काम आता।

जाट नेता की पहचान के बावजूद चौधरी अजित सिंह ने कभी जाति-धर्म के नाम पर लोगों को भड़काने और लड़वाने का काम नहीं किया। चाहते तो 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों की आग में अपने लिए सियासी अवसर तलाश सकते थे। लेकिन दोनों पक्षों की नाराजगी और अपने वोट बैंक का नुकसान उठाकर भी वे भाईचारे की कोशिशों में जुटे रहे। उनकी जगह कोई खांटी नेता होता तो साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की लहर पर सवार होकर सत्ता में रहने का जुगाड़ कर लेता। लेकिन अजित सिंह के 35 साल के राजनीतिक जीवन में धार्मिक भावनाएं या जातीय द्वेष भड़काने वाला उनका कोई बयान आपको ढूंढे नहीं मिलेगा।

किसान आंदोलन के दौरान मुजफ्फरनगर के सोरम गांव में चौधरी अजित सिंह

ऐसे समय जब देश भीषण महामारी और बदइंतजामी से जूझ रहा है। तब चौधरी अजित सिंह के परिजनों ने लोगों से घर पर ही रहकर उन्हें श्रद्धाजंलि देने की अपील की है। यह फैसला अजित सिंह के विचारों और जीवनशैली से एकदम मेल खाता है। केंद्र में नागर विमानन मंत्री बनने से पहले और बाद में चौधरी अजित सिंह से मेरी कई बार मुलाकात हुई। दिल्ली में 12, तुगलक रोड स्थिति उनके आवास पर गांव से आए किसानों का जमावड़ा लगा रहता था। लेकिन उन्होंने कभी बड़ा नेता होने का अहंकार नहीं दिखाया। ना कभी सस्ती लोकप्रियता बटोरने की कोशिश की। बहुत चुपके से जाट आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण फैसले करवाने में अहम भूमिका निभा गये।

व्यक्तिगत रूप से चौधरी साहब सादगी से जीने वाले, हंसमुख और नेकदिल इंसान थे। भाषा और व्यवहार की गरिमा उन्होंने अपने सबसे बुरे दौर में भी बनाए रखी। जबकि कई बार उनके खासमखास रहे लोगों ने उनका साथ छोड़ दिया। मुझे आज भी याद है 2014 में जब उनके सचिव रहे आईपीएस अधिकारी उनके खिलाफ बागपत से मैदान में उतरे, तब भी उन्होंने बहुत अफसोस या क्रोध जाहिर नहीं किया। उनके पास हर मुश्किल का सामना मुस्कुराकर करने का हुनर था। गिरते राजनीतिक मूल्यों के बीच भारतीय राजनीति में इस मुस्कुराहट की कमी खलती रहेगी।

साभार: आउटलुक