मानसून को कैसे गड़बड़ा सकती है भू-अभियांत्रिकी? क्या होनी चाहिए भारत की रणनीति?

संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में विभिन्न देशों के बीच होने वाली जलवायु वार्ताओं के परिणाम निराशाजनक रहे हैं। यही वजह है कि जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाले कई वैज्ञानिक जीओ-इंजीनियरिंग यानी भू-अभियांत्रिकी के नफे-नुकसान के आकलन पर जोर दे रहे हैं। भू-अभियांत्रिकी एक नया और जटिल विषय है। सरल शब्दों में कहें तो इसका अभिप्राय वैश्विक तापवृद्धि के कुछ प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए पृथ्वी की जलवायु व्यवस्था में बड़े पैमाने पर तकनीकी हस्तक्षेप से है। भारतीय वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और आम जनता के लिए इस मुद्दे को समझना जरूरी है, क्योंकि सौर भू-अभियांत्रिकी दक्षिण एशिया में मानसून को गड़बड़ा सकती है।

इस सिलसिले में भू-अभियांत्रिकी की व्यापक शब्दावली को समझना भी जरूरी है। इसमें दो तरह की तकनीकें शामिल हैं – कार्बन भू-अभियांत्रिकी और सौर भू-अभियांत्रिकी। इन दोनों तकनीकियोंं कों से जुड़े मुद्दे भी अलग-अलग हैं।

कार्बन भू-अभियांत्रिकी वातावरण से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की तकनीक है। इसके लिए जो तरीके अपनाये जाते हैं, उनमें बायो एनर्जी कार्बन कैप्चर और स्टोरेज (BECCS) शामिल है। इसके लिए वर्ष 2100 तक भारत के क्षेत्रफल से पांच गुना बड़े क्षेत्र में जैव ऊर्जा वाली फसलें उगानी पड़ेंगी। जाहिर है कि इतने बड़े पैमाने पर भूमि-उपयोग परिवर्तन से विश्व की खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। करोड़ों लोगों के भूमि, वन और जल से जुड़े अधिकारों का हनन हो सकता है।

भू-अभियांत्रिकी का दूसरा तरीका सौर भू-अभियांत्रिकी है। इसमें सौर विकिरण प्रबंधन (SRM) जैसे उपाय शामिल हैं, जो सूर्य के प्रकाश के कुछ हिस्से को वापस अंतरिक्ष में परावर्तित कर पृथ्वी के तापमान को कम करने का प्रयास करते हैं। उदाहरण के तौर पर, समताप मंडल (स्ट्रेटोस्फीयर) में सल्फर डाइऑक्साइड का छिड़काव कर सूर्य की किरणों को कुछ हद तक पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने से रोका जा सकता है। इस तरह सौर भू-अभियांत्रिकी की मदद से धरती के वातावरण का तापमान कम किया जा सकता है। लेकिन दिक्कत यह है कि जब भू-अभियांत्रिकी जैसे उपाय उपलब्ध होते हैं तो जीवाश्म ईंधन से मुनाफा बनाने वाली कंपनियों पर उत्सर्जन घटाने का दबाव कम हो जाता है। सामाजिक वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि भू-अभियांत्रिकी जैसे तरीके उत्सर्जन कटौती में निवेश से वैश्विक समुदाय का ध्यान भटका सकते हैं। नीति-निर्माता ऐसी चेतावनियों को अक्सर अनसुना कर देते हैं।

सौर भू-अभियांत्रिकी का यह तरीका जलवायु परिवर्तन के कई गंभीर प्रभावों से बचने में मददगार हो सकता है, लेकिन यह वातावरण में पहले से मौजूद कार्बन को छूता भी नहीं है। इसका मतलब यह है कि सौर भू-अभियांत्रिकी अगर सफल हो भी जाये, तब भी उत्सर्जन कम करने की सुचारू योजनाओं के अभाव में वायु प्रदूषण जैसी समस्याएं जस की तस बनी रहेंगी। इसकी सबसे बड़ी कीमत समाज के सबसे गरीब तबके को उठानी पड़ेगी। दूसरी तरफ, भू-अभियांत्रिकी के कारण वातावरण के तापमान में हेरफेर से पृथ्वी का जल चक्र गड़बड़ा सकता है और मानसून प्रभावित हो सकता है। इसकी वजह से भारत समेत एशिया के अन्य देशों और पूर्वी अफ्रीका के कम से कम 200 करोड़ लोग प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए मानसून में कम से कम खलल डालने के पक्षधर भारत को भू-अभियांत्रिकी के शोध एवं विकास पर निगरानी के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था विकसित करने पर जोर देना चाहिए।

इससे पहले कि हम मामले की बारीकी में जाएं, एक अहम सवाल पूछना जरूरी है। एक तर्क यह भी है कि भू-अभियांत्रिकी अभी सिर्फ कंप्यूटर मॉडलिंग की स्टेज पर ही है, फिर भी विश्व समुदाय को जलवायु इंजीनियरिंग के तौर-तरीकों के बारे में क्यों फिक्रमंद होना चाहिए

इसके कई कारण हैं:

पहला, वैश्विक तापवृद्धि में 1.5 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी के प्रभावों के बारे में आईपीसीसी की रिपोर्ट वर्ष 2050 तक पेरिस समझौते के लक्ष्य पूरा होने का भरोसा जताती है। ये लक्ष्य सामाजिक, व्यावसायिक और तकनीकी संभावनाओं पर आधारित हैं और इसके लिए भू-अभियांत्रिकी जैसे जलवायु से जुड़े गंभीर जोखिम उठाने और विकासशील देशों में गरीबी हटाने के लिए जरूरी सुधारों को खतरे में डालने की आवश्यकता नहीं है।

पर्यावरण कार्यकर्ताओं और छात्र समूहों के वैश्विक आंदोलन के चलते दुनिया भर में निवेशकों और बड़े संस्थानों ने 15 अरब डॉलर के निवेश को जीवाश्म ईंधन के विकास की बजाय दूसरे कामों में लगाने की प्रतिबद्धता घोषित की है। यह इस बात का सबूत है कि जीवाश्म ईंधन आधारित अर्थतंत्र में बदलाव लाना मुमकिन है। हालांकि, कुछ साल पहले तक इसे राजनीतिक रूप से अव्यवहारिक माना जाता था।

दूसरा, हालिया शोध बताते हैं कि भू-अभियांत्रिकी से जुड़ी कई तकनीकें पर्यावरण और आर्थिक रूप से किफायती उपायों पर प्रतिकूल असर डाल सकती हैं।

तीसरा, हाल के वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद भू-अभियांत्रिकी के चाहे-अनचाहे प्रभावों के पूर्ण मूल्यांकन के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक जानकारियों का अभाव है। कई सवाल ऐसे हैं जिनके उत्तर भू-अभियांत्रिकी को आजमाने के बाद ही मिल सकेेंगे। इसलिए इस मामले में बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है।

जलवायु इंजीनियरिंग के कई पैरोकार बाकी उपायों की बजाय भू-अभियांत्रिकी को एक खास तरीके से आगे बढ़ाना चाहते हैं। इस कोशिश में सेनाओं और पूंजीपतियों द्वारा भू-अभियांत्रिकी के दुरुपयोग की आशंकाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो बाकी पक्षों की गैर-मौजूदगी में उच्च-स्तरीय वैज्ञानिक समूह और बिल गेट्स जैसे पूंजीपति भू-अभियांत्रिकी के कर्ताधर्ता बनते जा रहे हैं। जबकि ऐसे तकनीकी तौर-तरीकों को व्यापक सामाजिक या राजनीतिक वैधता नहीं मिली है। इस तरह जल्दबाजी में तय की गई प्राथमिकताएं और इस विषय पर प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्थाओं के आकलन एक अघोषित व्यवस्था खड़ी कर रहे हैं, जिसका असर इस क्षेत्र में शोध और विकास की भावी रणनीति पर पड़ सकता है।

उदाहरण के लिए, निजी अनुसंधान समूहों (जैसे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का सोलर जीओ-इंजीनियरिंग रिसर्च प्रोग्राम) ने खुद को सार्वजनिक निगरानी के लिए खोल दिया है। वे सौर भू-अभियांत्रिकी के व्यवसायीकरण का समर्थन नहीं करते हैं। उन्होंने अपनी प्रयोगशालाओं में विकसित होने वाली तकनीकों का पेटेंट नहीं कराने का भी फैसला किया है। यह कदम सराहनीय है, लेकिन इस तरह की निजी पहल राजनीतिक रूप से वैध अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं की जगह नहीं ले सकती हैं। भू-अभियांत्रिकी से जुड़े किन सवालों पर शोध करने के लिए सार्वजनिक निवेश किया जाये, इस मुद्दे को केवल वैज्ञानिकों और गिने-चुने वैश्विक नीति-निर्माताओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है।

भारतीय मानसून पर संभावित प्रभाव के विश्लेषण से इन चुनौतियों को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। जीओ-इंजीनियरिंग मॉडल इंटरकम्पेरिसन प्रोजेक्ट के विभिन्न मॉडलों से पता चला है कि सौर भू-अभियांत्रिकी के कारण ग्रीष्म मानसून की बारिश में कमी आएगी। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये अनुमान वायुमंडलीय तापमान में औसत परिवर्तन पर आधारित हैं, यानी भारत के विभिन्न हिस्सों में इससे कई गुना ज्यादा भिन्नताएं हो सकती हैं।

इस तरह के परिणामों की संभावनाओं के चलते जलवायु परिवर्तन के वैश्विक उपायों के लिए राजनीतिक रूप से मान्य अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

साल 2016 से 14 विशेषज्ञों का एक अकादमिक कार्यदल (AWG), जिसमें लेखक भी शामिल है, भू-अभियांत्रिकी के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श करता रहा है। अक्टूबर, 2018 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में इन विशेषज्ञों ने भू-अभियांत्रिकी के लिए एक व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया था। ऐसे नियम-कायदे अक्सर ऊपर से नीचे की ओर लागू होते हैं, लेकिन गवर्नेंस की नई सोच में विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी पक्षों के द्वारा नियमन और स्वैच्छिक रणनीतियों को भी शामिल किया जाता है।

शुरुआती कदम के तौर पर अकादमिक कार्यदल (AWG) ने अपनी रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र महासचिव द्वारा एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधि संस्था के गठन का सुझाव दिया है, जो सौर भू-अभियांत्रिकी से जुड़े शोध एवं अनुसंधान की व्यवस्था को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संवाद स्थापित करे। यह विश्व आयोग इस बात पर भी विचार-विमर्श कर सकता है कि सौर भू-अभियांत्रिकी से जुड़े शोध और विकास की दिशा क्या होगी और यह जलवायु परिवर्तन से निपटने की व्यापक रणनीति का हिस्सा होगा या नहीं।

सौर भू-अभियांत्रिकी पर विचार-विमर्श केवल वैश्विक संस्थाओं और आयोगों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसलिए अकादमिक कार्यदल ने विभिन्न पक्षों के बीच विचार-विमर्श को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र को एक वैश्विक मंच बनाने का सुझाव भी दिया है। इस तरह के फोरम में स्थानीय सरकारों, विभिन्न समुदायों, मूल निवासियों, युवाओं व महिला समूहों और जलवायु परिवर्तन से प्रभावित समूहों सहित विभिन्न पक्षों को शामिल किया जा सकता है। केवल इस तरह की प्रक्रिया से ही कृषि संकट की मार झेल रहे भारतीय किसानों को प्रतिनिधित्व मिल सकता है।

भू-अभियांत्रिकी की अंतराष्ट्रीय निगरानी के इन प्रस्तावों पर अमल के लिए कई पुराने उदाहरण मौजूद हैं। मिसाल के तौर पर, बड़े बांधों के विषय में बनाये गये विश्व आयोग ने 1990 के दशक से ही एक व्यापक और बहु-स्तरीय व्यवस्था की जरूरत और महत्व को रेखांकित किया है। अब नीति विशेषज्ञ भी मान चुके हैं कि जलवायु से जुड़ी वैश्विक व्यवस्था में आम जनता की चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए बेहतर होगा कि जलवायु भू-अभियांत्रिकी से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में पुरानी गलतियों को दोहराने से बचा जाये।

(डॉ. प्रकाश कसवां अमेरिका के कनेक्टिकट विश्वविद्यालय, स्टॉर्स में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। वह विश्वविद्यालय के मानव अधिकार संस्थान में आर्थिक व सामाजिक अधिकारों के शोध कार्यक्रम के सह-निदेशक भी हैं। उनकी किताब ‘डेमोक्रेसी इन द वुड्स’ का दक्षिण एशिया संस्करण 2018 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित हुआ है। यह लेख The Wire में प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का संपादित और संशोधित अनुवाद है)

दुग्ध उत्पादन में भी आत्मनिर्भर क्यों नहीं बन पाया उत्तराखंड?

9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड निर्माण के समय से ही उत्तराखंड सरकार नीतिगत दिशाहीनता का शिकार रही है। जिन्होंने राज्य निर्माण के लिए आंदोलन किया, वे नारे लगाते रह गए और जो राज्य विरोधी थे वे सत्ता में बैठ गए। जिस राज्य (उत्तरप्रदेश) की व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन किया, शहादतें दीं, उसी राज्य उत्तर प्रदेश की व्यवस्था को नए पर्वतीय राज्य में थोप दिया गया। नतीजतन राज्य निर्माण के 20 वर्ष बाद भी राज्य मूलभूत सुविधाओं के अभाव के साथ रोजमर्रा के जीवन उपयोगी सामग्री जैसे दूध, फल, सब्जी और अनाज के लिए भी उत्तर प्रदेश सहित बाहरी राज्यों पर निर्भर है। 

20 वर्षों के राज्य में आठ मुख्यमंत्री बन चुके हैं। राज्य के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के अलावा किसी भी मुख्यमंत्री के विकास का दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं हो सका। कुछ को समय नहीं मिला और कुछ को पता ही नहीं था कि करना क्या है? नारायण दत्त तिवारी ने नेहरूवादी विकास दृष्टिकोण को अपनाते हुए सिडकुल जैसे औद्योगिक केंद्र बनाये और इस उम्मीद में कि इनके द्वारा विकास की गंगा मैदानी क्षेत्र से पर्वतीय क्षेत्र तक बहेगी। लेकिन इस शहर केंद्रित नेहरूवादी विकास मॉडल के परिणामस्वरूप पर्वतीय क्षेत्र से पलायन लगातार बढ़ने लगा है। पलायन आयोग की रिपोर्ट और कम होती विधानसभा की सीटें इस तथ्य की पुष्टि करती हैं ।

राज्य निर्माण के समय अर्थात जनगणना 2001 के अनुसार, पर्वतीय जिलों पौड़ी (697078), उत्तरकाशी (295013), चमोली (370359), रुद्रप्रयाग (227439), टिहरी गढ़वाल (604747), पिथौरागढ़ (462289), चम्पावत (224542), अल्मोड़ा (630567), बागेश्वर (249462) अर्थात पूर्णरूप से पर्वतीय जिलों की कुल जनसंख्या सैंतीस लाख इकसठ हजार चार सौ छियानवें (3761496) थी। यह जनसंख्या बहुत ज्यादा नहीं थी, पर उत्पादन और बाजार के दृष्टिकोण से बहुत मामूली भी नहीं है।

राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड के अनुसार, वर्ष 2001-02 में देश में दूध की प्रति व्यक्ति उपलब्धता 225 ग्राम प्रतिदिन थी, जबकि उत्तराखंड में 344 ग्राम; जो कि वर्ष 2018 -19 में बढ़कर, राष्ट्रीय औसत 394 ग्राम के मुकाबले उत्तराखंड में 455 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन हो गई। दूध उपलब्धता के मामले में पंजाब (1181 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन), हरियाणा (1087 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन), राजस्थान (870 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन), गुजरात (626) ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन अग्रणी राज्यों में हैं। उत्तराखंड के पडोसी राज्य हिमाचल में 565 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दूध की उपलब्ध्ता है। प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता के मामले में उत्तराखंड की स्थिति राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार अल्मोड़ा (615), बागेश्वर (597), चमोली (478), चम्पावत (544), पौड़ी (452), पिथौरागढ़ (646), रुद्रप्रयाग (489), उत्तरकाशी (454), नैनीताल (417) ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन दूध की उपलब्धता है। जबकि देहरादून (227), हरिद्वार (381), उधमसिंह नगर (349) की स्थिति राज्य औसत 407 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के मुकाबले कम है।

उत्तराखंड के जिलों में सालाना दुग्ध उत्पादन

2001-022015-162017-18
जनपदहजार मीट्रिक टनहजार मीट्रिक टनहजार मीट्रिक टन
अल्मोड़ा113.4139149.26
बागेश्वर47.557.661.137
चमोली66.869.870.255
चम्पावत30.654.656.423
पौड़ी94.7112.8118.281
पिथौरागढ़83.1116128.847
रुद्रप्रयाग35.844.443.09
टिहरी गढ़वाल100.4110.8118.05
उत्तरकाशी49.357.263.741
कुल621.6762.2809.084
स्रोत: उत्तराखंड सरकार के पशुपालन विभाग की वेबसाइट
https://ahd.uk.gov.in/pages/display/125–statistics-and-census

राष्ट्रीय डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड और उत्तराखंड सरकार के पशुपालन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में सालाना दुग्ध उत्पादन 3 प्रतिशत की चक्रवृद्धि दर के साथ वर्ष 2001-02 के 10 लाख 66 हजार मीट्रिक टन से बढ़कर, 2016-17 में 16 लाख मीट्रिक टन और वर्ष 2017-18 में लगभग 17 लाख 42 हजार मीट्रिक टन हो गया था। हरिद्वार और उधमसिंह नगर में कुल दूध का 35 प्रतिशत उत्पादित होता है, हालांकि प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता के मामले में ये दोनों जिले राष्ट्रीय औसत से बहुत नीचे हैं।

उत्तराखंड में कृषि और पशुपाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं। दूग्ध उत्पादन और पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2001 में, उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन लिमिटेड की स्थापना की गई। इसके पीछे सहकारी ब्रांड अमूल की सफलता को उत्तराखंड में दोहराने की सोच रही होगी। यह सहकारी समिति, जिला स्तरीय दुग्ध सहकारी संघों का राज्य स्तरीय शीर्ष संघ है। इस फेडरेशन का मुख्य उद्देश्य ग्राम स्तर पर दुग्ध संघों का निर्माण करते हुए, दुग्ध उत्पादन को बढ़ाना, किसानों को उचित मूल्य दिलवाना और अंततः ग्रामीण विकास में सहयोग करना है। इस कार्य के लिए राज्य के 13 जिलों में कुल 11 दुग्ध संघ गठित किये गए हैं। रुद्रप्रयाग जिले को पौड़ी और बागेश्वर को अल्मोड़ा जिले के दुग्ध संघ के साथ सम्वद्ध किया गया है। इन दुग्ध संघों के पास नौ (9) दुग्ध प्रसंस्करण केंद्र हैं जिनकी कुल क्षमता 2.62 लाख लीटर प्रतिदिन है, और 44 शीतलन केंद्र हैं, जिनकी क्षमता 1.15 लाख लीटर प्रतिदिन है। जिला स्तर पर क्षमता का आंकड़ा नीचे की तालिका में दिया हुआ है। 

उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में सहकारी डेयरी संघ की क्षमता

 जनपदकुल धारण क्षमता
(लीटर प्रतिदिन)
शीतलन केंद्र की क्षमता
(लीटर प्रतिदिन)
औसत खरीद
(लीटर प्रतिदिन)
औसत बिक्री
(लीटर प्रतिदिन)
अल्मोड़ा2000010000834411730
चमोली5000100013201134
चम्पावत5000100013201134
पौड़ी 20000600026833833
पिथौरागढ़5000100052734600
टिहरी गढ़वाल5000100021641763
उत्तरकाशी20001000825891
देहरादून2000040001167418802
नैनीताल100000500007967971087
उधम सिंह नगर50000400004812428990
हरिद्वार300000110898316
 कुल262000115000172495152280
स्रोत: उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन लिमिटेड की वेबसाइट https://www.ucdfaanchal.org

किसी भी व्यापार की सफलता का प्रथम सूत्र है कि उसके उत्पाद की बाजार में मांग कितनी है। उसके पश्चात उत्पादन तथा आपूर्ति करने की क्षमता और आपूर्ति का तरीका अर्थात सप्लाई चेन पर नजर जाती है। भारत सरकार के जनगणना के अनुसार, वर्ष 2020 में उत्तराखंड की अनुमानित जनसंख्या एक करोड़ सत्रह लाख है। दूध की उपलब्धता के राष्ट्रीय औसत 455 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन के हिसाब से उत्तराखंड को रोजाना 53.24 लाख लीटर दूध की आवश्यकता होती है, जबकि राज्य के औसत 344 ग्राम प्रतिदिन के अनुसार 40.25 लाख लीटर दूध की जरूरत होती है। इसके मुकाबले उत्तराखंड सहकारी डेयरी फेडरेशन की रोजाना औसत बिक्री डेढ़ लाख लीटर के आसपास है, जो राज्य की अनुमानित मांग का 5 फीसदी भी नहीं है। यानी 95 फीसदी दूध की खपत सहकारी डेयरी के अलावा अन्य स्रोतों से पूरी हो रही है। इस दूध का बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों से आता है।

राज्य के 72 प्रतिशत हिस्से में वन भूमि है, अर्थात हरा चारा भी उपलब्ध है। पीने के पानी की समस्या भी नहीं है इसके बावजूद भी क्या कारण है कि राज्य की दुग्ध सहकारी समिति राज्य में दूध की मांग के आंकड़े के आसपास भी नहीं पहुंच पाती है। यह बहुत बड़ा प्रश्न है, जिसका उत्तर ढूंढने के लिए हमें देश के सफलतम दुग्ध संघ अमूल के साथ साथ राज्य की कृषि, वन और पशुपालन नीतियों की समीक्षा करनी होगी।

उत्तराखंड सहकारी दुग्ध संघ की स्थापना राज्य प्राप्ति के मात्र चार महीने बाद की मार्च 2001 में हो गई थी। इसके तहत आंचल नाम से एक नए ब्रांड पंजीकृत किया गया था। उत्तराखंड सहकारी दुग्ध संघ लिमिटेड की वेबसाइट में लिखा है कि यह उत्तर प्रदेश सहकारी दुग्ध संघ का ही उत्तराधिकारी है।  अर्थात उम्मीद की जा सकती है कि इसके काम करने का तरीका, प्रबंधन भी उत्तरप्रदेश सहकारी संघ जैसा ही होगा और सफलता-असफलता का पैमाना भी मिलता-जुलता ही रहेगा।  

उत्तराखंड के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ की बात करें या रुद्रप्रयाग – पौड़ी की, सब जगह आंचल डेरी की हालत एक जैसी ही है। इसी से पूरे राज्य की स्थिति का पता चल जाता है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, पिथौरागढ़ शहर की जनसंख्या 56044 थी। पिछले 10 वर्षों में शहर भी फैला है और जनसंख्या का घनत्व भी बड़ा है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि वर्ष 2020 में शहर की जनसंख्या लगभग एक लाख होगी। जिले की जनसंख्या 2011 में 4 लाख 83 हजार थी, जो वर्ष 2019 में आधारकार्डों के आधार पर लगभग 5 लाख 28 हजार हो गई है। अगर हम राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड के प्रति व्यक्ति दूध उपलब्धता के आंकड़ों को आधार मानें तो पिथौरागढ़ शहर को प्रतिदिन 45 हजार 500 लीटर दूध की आवश्यकता होती है। पिथौरागढ़ स्थित आंचल डेरी की क्षमता ही 10 हजार लीटर की है और प्रतिदिन का दूध संग्रहण मात्र 3000 लीटर का है। अर्थात शहर में राज्य औसत के हिसाब से प्रतिदिन 42 लीटर से अधिक दूध आंचल डेरी और सहकारिता के बाहर के स्रोतों से आ रहा है। यही स्थिति श्रीनगर स्थित आंचल डेरी की भी है। श्रीनगर डेरी के कार्यक्षेत्र में पौड़ी गढ़वाल और रुद्रप्रयाग जिले का कार्यभार है जबकि इसकी कुल क्षमता ही मात्र 3000 लीटर की है। कोटद्वार स्थित आंचल डेरी में भी मात्र 3000 लीटर दूध की संग्रहण क्षमता है। 

अगर राज्य में दूध की औसत उपलब्धता को आधार माना जाए तो प्रतिदिन राज्य को 53 लाख 25 हजार 500 लीटर दूध की आवश्यकता होती है। अमूल दूध जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त सहकारिता संघ है, उसका भी प्रतिदिन दूध संग्रहण 33 लाख लीटर ही है और क्षमता 50 लाख लीटर दूध की है। वर्ष 2018 -19 में इसकी बिक्री 6,966 करोड़ रूपये की थी। मतलब, उत्तराखंड राज्य सिर्फ दूध पर ही ध्यान केंद्रित करे तो इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। लेकिन आंकड़े और इतिहास तो इसके खिलाफ गवाही दे रहे हैं। पायनियर अखबार के दिनांक 17 जुलाई 2019 के अंक में सहकारिता मंत्री धनसिंह रावत के हवाले से छपी खबर के अनुसार, आंचल डेरी की कुल बिक्री 2 लाख 25 हजार लीटर प्रतिदिन है, और अगर इसे 40 रूपये प्रति लीटर के औसत से जोड़ा जाये तो यह एक साल में 328.5 करोड़ रुपये बैठता है। इसमें कुल तनख्वाह, संयंत्रों में बिजली की खपत, पेट्रोल डीजल की खपत, संयंत्रों का रखरखाव जोड़ देने के बाद क्या बचता होगा यह एक अलग अध्ययन का विषय है।      

उत्तराखंड में दुग्ध उत्पादन की इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या वन नीतियां जिम्मेदार हैं? या हमारा उद्यमिता के प्रति नकारात्मक और सुषुप्त रवैया इसका कारण हैं?

उत्तराखंड में कुल भूमि का लगभग 72 प्रतिशत वन भूमि है और अगर पर्वतीय जिलों की बात करें तो कुल क्षेत्रफल के 90 प्रतिशत में वन हैं। यह सच है कि वन कानून अनेक विकास कार्यो के आड़े आते हैं, पर क्या जंगल से चारा पत्ती लाना, जानवर चराना, नदी में ले जाकर जानवरों को पानी पिलाने पर भी रोक है या वन कानून आड़े आ रहे हैं? शायद कुछ हद तक, लेकिन गांव के आसपास बंजर पड़े खेत तो चारा उगाने में काम आ सकते हैं; तो फिर दूध उत्पादन में हम आत्मनिर्भर क्यों नहीं हो पा रहे हैं? 

पिथौरागढ़ जिला सहकारी दुग्ध संघ के पूर्व अध्यक्ष विनोद कार्की के अनुसार, उनके कार्यकाल में दूध संग्रहण 8000 लीटर प्रतिदिन तक पहुंच गया था जो अब फिर से 3000 लीटर पर पहुंच गया है। इसके अनेक कारण हैं। उनमें जो सबसे प्रमुख कारण है, वह है कि लोग दूध उत्पादन को व्यवसाय के रूप में नहीं ले रहे हैं। वे दूध के लिए एक दो गाय – भैस रखते तो हैं पर उसे पूर्ण व्यवसाय नहीं समझते। एक दो गाय – भैंस के कारण उनको उचित आमदनी नहीं हो पाती है, लेकिन वे पशुपालन में पूरी तरह बंध जाते हैं। जिस कारण दूध का उत्पादन गिर रहा है। अब तो ग्रामीण क्षेत्र में भी लोग दूध की थैलियों पर निर्भर हो रहे हैं।

पौड़ी जिला दुग्ध सहकारी संघ के अध्यक्ष हरेंद्र पाल सिंह नेगी के अनुसार दूध उत्पादन और आंचल डेरी की क्षमता बढ़ाने के लिए अनेक प्रयास किये जा रहे हैं। काश्तकारों को प्रेरित किया जा रहा है कि वे उन्नत किस्म के पशु खरीदें जिसे दूध उत्पादन की मात्रा बढ़ सके। इसके लिए सरकार की तरफ से  पांच और तीन गायों के हिसाब से क्रमश: 4 लाख और 2 लाख 46 हजार रूपये के ऋण की व्यवस्था का प्रावधान भी है, इस ऋण पर 50 प्रतिशत की छूट भी है। इसके अलावा आंचल डेरी के रुद्रपुर फार्म से उन्नत चारा भी रियायती दरों पर मिल रहा है। पशु चिकित्सक की सेवाएं भी मिलती हैं। 

पौड़ी गढ़वाल के संगलाकोटी के जागरूक काश्तकार और व्यवसायी भास्कर द्विवेदी बताते हैं कि यह ऋण और सब्सिडी ही सबसे बड़ी समस्या है। सरकार ऋण और सब्सिडी तो देती है पर पशु कहां से खरीदने हैं, कौन से खरीदने हैं, इस प्रकार के अनेक शर्ते लगा देती है। पैसा भी सीधे पशु विक्रेता के खाते में आता है और कभी-कभी तो डेरी के लोग स्वयं पशु खरीदकर भी दे देते हैं। इस सबमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है, और काश्तकार पूरी तरह ठगा महसूस करता है। पशु खरीदने के बाद दूध बेचने की शर्त और चारा खरीदने की अतिरिक्त शर्त भी लोगों को आंचल डेरी से दूर ले जाती है। दूध बेचने के बाद भी भुगतान समय पर नहीं मिलता है और न ही पशु के बीमार होने पर पशु चिकित्सक समय पर आता है। इस तरह की कई समस्याएं हैं।    

आंचल डेरी राज्य प्रबंधन समिति के सदस्य राम पाण्डे के अनुसार, दुग्ध सहकारिता समिति में प्रशासनिक दवाब, दखलंदाजी और लालफीताशाही के कारण निर्णय लेने में दिक्कतें आती हैं, जो इसकी दयनीय स्थिति का बड़ा कारण है। आंचल डेरी की व्यापारिक प्रतिस्पर्धा निजी दुग्ध व्यवसायियों के साथ होती है, जो स्थिति-परिस्थिति के अनुसार अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होते हैं। निजी व्यवसायी समय-समय पर बाजार की स्थिति और दूध की उपलब्धता के हिसाब से मूल्यों को घटा बढ़ाते रहते हैं। काश्तकारों को समय  पर पैसा देने के अलावा बीमारी के समय जरूरत पड़ने पर अग्रिम भुगतान भी कर देते हैं। इस कारण किसान का झुकाव निजी व्यवसायियों की तरफ रहता है।

हालांकि आंचल डेरी भी किसानों के साथ बेहतर भागीदारी के लिए अनेक प्रयास करती है। आंचल डेरी के पास अपने पशु चिकित्सक भी हैं जो समय समय पर किसानों के पशुओं की देखभाल और इलाज करते हैं। लेकिन प्रशासनिक स्तर पर अत्यधिक दखलंदाजी और केंद्रीकृत संरचना आंचल डेरी को एक स्वतंत्र और पेशेवर संस्था बनाने की दिशा में बाधक बन रही है। राम पाण्डे स्वेत क्रांति के पुरोधा स्वर्गीय वर्गीज कुरियन के उस वक्तव्य को याद करते हैं जो उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री को दिया था।

किस्सा है कि अमूल की सफलता से प्रसन्न होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री ने वर्गीज कुरियन से कहा कि अमूल के मॉडल को देश के अन्य हिस्सों में भी फैलाया जाए और इसके लिए वे (वर्गीज कुरियन) राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड का नेतृत्व करें। प्रधानमंत्री के आग्रह पर वर्गीज कुरियन ने कहा कि वे तैयार हैं लेकिन शर्त यह है कि राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड को प्रशासनिक हस्तक्षेप और लाल फीताशाही से बचाते हुए इसके मुख्यालय को दिल्ली से दूर किसानों के बीच बनाया जाये। इस पर प्रधानमंत्री ने हामी भरी और नतीजतन देश में स्वेत क्रांति का आगाज हुआ। यही स्वायत्ता और पेशेवर नेतृत्व आंचल डेरी को भी चाहिए, तभी इसका विकास संभव है।    

इसके अलावा उत्तराखंड के मामले में दो अन्य बिंदु भी महत्वपूर्ण हैं, जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। पहला है राज्य के विभिन्न हिस्सों की सांस्कृतिक, धार्मिक और भौगोलिक परिस्थितियों में बहुत बड़ा अंतर है। उधम सिंह नगर के खटीमा की दुग्ध सहकारी समिति और उत्तरकाशी के मोरी – रवाईं घाटी की समिति के दूध की मात्रा, गुणवत्ता, उत्पादन लागत के साथ-साथ सामाजिक सोच में भी बहुत अंतर है। यह अंतर हजारों सालों के मानव विकास की यात्रा के कारण पनपा है, इसे समाप्त करना आसान नहीं है। इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए विभिन्न क्षेत्रों के लिए स्वायत्त संस्थायें बनाई जानी चाहिए, जो एक-दूसरे से पूरी तरह अलग हों। और एक दूसरे के निर्णय को प्रभावित न करती हों।

दूसरा महत्वपूर्ण विषय है गोवंश के चयन का। अभी वर्तमान में जो नीति चल रही है उसके अनुसार किसानों को उन्नत श्रेणी के पशु खरीदने के लिए प्रेरित किया जाता है, जबकि पशु विशेषज्ञों का मानना है कि स्थानीय प्रजाति की बद्री गाय जो सैकड़ों वर्षों से हर परिस्थिति से सफलतापूर्वक जूझती हुई, स्वयं को बचाये हुए है, वही यहां के लिए सर्वश्रेष्ठ है। यह गाय जंगलों में चरने जा सकती है, जहां पर वो पौष्टिक चारे के अलावा बेशकीमती जड़ी-बूटी भी खाती है। शुद्ध वातावरण, शुद्ध चारे और साफ पानी के कारण दूध की मात्रा भले ही कम हो पर गुणवत्ता सर्वोत्तम होती है। जिसको अगर अलग तरीके से बाजार में उतारा जाए तो उसका मूल्य भी अधिक मिलेगा। इन बद्री गायों के मुकाबले उन्नत और क्रॉस ब्रीड पशुओं को लाने के कई और भी नुकसान भी हैं। जिसमें सबसे प्रमुख है कि धीरे-धीरे स्थानीय पशुओं की नस्ल खत्म हो जाएगी। यह कोई काल्पनिक बयान नहीं है बल्कि इसका खामियाजा उड़ीसा के कालाहांडी ने झेला है। नतीजतन, यह जिला भुखमरी के कगार पर पहुंच गया। इस पूरे मामले को वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने अपनी पुस्तक ‘एव्रीबडी लव्स ए गुड ड्रॉट में समझाया है।   

उत्तराखंड इस स्थिति में न पहुंचे इसके लिए अभी से प्रयास किये जाने की जरूरत है। अधिक उत्पादन, बड़ी इकाई, बड़े बाजार की मानसिकता से हटकर हमें इस तथ्य को स्वीकारना पड़ेगा कि जैसे-जैसे हम पहाड़ में चढ़ते हैं, वहां की सभी चीजें इंसान से लेकर पशु तक छोटे होते जाते हैं। इसलिए हमारा विकास मॉडल भी छोटा होना चाहिए। दूध के मामले में भी जिला स्तर पर स्वायत संस्थायें  बनानी चाहिए। दूध के विपणन को एक पेशेवर चुनौती के रूप में लेना चाहिए। अगर हम सिर्फ दूध को ही प्राथमिकता दे दें तो यही उत्तराखंड को विकास की उंचाईयों में ले जाने में सक्षम है। लेकिन उसके लिए सही नजरिये और नीति की जरूरत है।

(लेखक समाजशास्त्री और नीतिगत मामलों के जानकार हैं)        


विश्व जल दिवस: कैसे दूर हो सकता है ग्रामीण भारत का जल संकट

कल्पना कीजिये। हर दिन आपको सिर पर 30-40 लीटर पानी लेकर 6-9 घंटे ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलना पड़े तो कैसा लगेगा। पानी के वजन के नीचे पीठ दब जाएगी। भीषण गर्मी में रोजाना 5-7 किलोमीटर पैदल चलने का असर आपके स्वास्थ पर भी पड़ेगा। यह मेहनत पैसा कमाने के लिए नहीं बल्कि खुद को जिंदा रखने के लिए करनी पड़ती है। भारत में 82% ग्रामीण परिवारों को पानी इसी तरह नसीब होता है। जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले 18 करोड़ लोगों के पास पाईप से पानी नहीं पहुंच पा रहा है।

जल स्रोतों के कई किलोमीटर दूर होने के कारण ग्रामीण भारत की महिलाओं को रोजाना ये जद्दोजहद करनी पड़ती है । स्रोत में पानी अक्सर गंदा होता है और गर्मियों के महीनों में अधिकतर स्रोत सूख जाते हैं, जिसके चलते नए और दूर से पानी ढ़ोकर लाना पड़ता है। महिलाएं रोजाना पानी लाने का यह काम करती हैं, जिसे करने की हिम्मत शहरी भारत में रह रहे विशिष्ट परिवार शायद ही कर सकें।

ग्रामीण भारत में स्वच्छ पेयजल तक पहुंच एक बड़ी चुनौती है। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारत का 70 फीसद सतही जल – नदियां, झीलें, तालाब और नम भूमि (wetlands) आदि प्रदूषित हैं। इससे साफ पानी की उपलब्धता एक गंभीर समस्या बन जाती है। हमारी सरकारें, सार्वजनिक नीति-निर्माता, गैर-सरकारी संगठन और समाज के सभी हितधारक समस्या के विभिन्न समाधान सुझाते हैं। पानी एक ऐसा विषय है जो राज्य सरकारों के अंतर्गत आता है। लेकिन केंद्र सरकार ने ‘जल जीवन मिशन’ नामक एक बड़ी एकीकृत योजना की घोषणा की है। इस परियोजना पर 3.6 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जाने हैं, जिसका उद्देश्य 2024 तक प्रत्येक ग्रामीण परिवार तक पाइप से पानी पहुंचाना है।

पानी की व्यवस्था को समझने के लिए उसकी विशालता और जटिलताओं को समझना जरूरी है। पहली बात तो यह है कि किसी भी विकासशील देश में जल संरचना का निर्माण और प्रबंधन एक विशाल सामाजिक उद्यम है। पाइप से पानी का नेटवर्क बनाने के लिए बड़े पूंजीगत व्यय की आवश्यकता है। प्रस्तावित जल जीवन मिशन भी इसी का प्रमाण है। दूसरा, पानी का भंडारण आसान और सुविधाजनक है लेकिन पानी का वितरण मुश्किल और महंगा है। जैसे कि बिजली का वितरण तो आसान है लेकिन इसे जमा करना मुश्किल है। इसलिए आश्चर्य नहीं है कि भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में बिजली पानी से पहले पहुंच गई है। क्योंकि बिजली पहुंचाना पानी पहुंचाने के मुकाबले आसान काम है ।

तीसरा, दूषित पानी हमारी थाली में भोजन के रूप में लौटता है। हमारी अधिकांश नदियां भारी प्रदूषण और दोहन के कारण गंदे नालों में तब्दील हो चुकी हैं और खत्म होने के कगार पर हैं। कृषि में रसायनों के इस्तेमाल के कारण खेतों से होने वाली जल निकासी नदियों के लिए हानिकारक है। नदियों के तटों पर उपजी कोई भी फसल विषाक्त पदार्थों और रसायनों से भरपूर होती है। यह बात सही है कि सरकार की तरफ से नीतिगत हस्तक्षेप सरल होने चाहिए। सरकारों को व्यक्तियों के जीवन में न्यूनतम हस्तक्षेप करना चाहिए। ग्रामीण भारत में पानी की समस्या के कई समाधान हो सकते हैं। लेकिन इस समस्या का सबसे सरल समाधान क्या है?

हमें भू-पृष्ठ जल को साफ रखने की जरूरत है। नीति आयोग ने जिन 70 फीसदी प्रदूषित भू-पृष्ठ जल स्रोतों की पहचान की है, उनमें प्रमुख नदियों की 35 सहायक नदियों के अलावा 13 हजार झीलें, तालाब और नम भूमि शामिल हैं। अगर हम इन 13 हजार जल स्रोतों को साफ कर लें तो इस गंभीर समस्या का केवल एक हिस्सा ही हल होगा। फिर भी हमें कहीं से तो शुरुआत करनी होगी। जल जीवन मिशन के ढांचे के भीतर एक ‘स्वच्छ जल मिशन’ शुरू किया जाना चाहिए, जिसे यदि सही ढंग से लागू किया जाता है तो इन 13 हजार भू-पृष्ठ जल निकायों को साफ किया जा सकता है। डी-सिल्टिंग मशीनरी और सफाई करने वाली मशीनों के द्वारा यह काम आसानी से किया जा सकता है।

आलोचक तर्क दे सकते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई नमामि गंगे योजना के तहत इसी तरह का तंत्र पहले से मौजूद है, जिसके कोई खास परिणाम नहीं दिख रहे हैं। इसकी वजह यह है कि गंगा सफाई मिशन में इस तंत्र की निगरानी पर जोर नहीं है। हर जिले में स्वच्छ जल केंद्र होना चाहिए जो जल निकायों में प्रदूषण स्तर की निगरानी के लिए तकनीक का इस्तेमाल कर सके। पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए स्वतंत्र ऑडिट होने चाहिए।

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ जल निकायों के लिए एक जागरूकता अभियान शुरू करने की जरूरत है। अनुमानित 15 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जल निकायों को साफ करना होगा और यदि ऐसा हो पाया तो 2.33 करोड़ अतिरिक्त परिवारों को स्वच्छ जल उपलब्ध कराया जा सकता है। इससे करीब 13% परिवारों को लाभ होगा। इस प्रकार जिन 82 फीसदी परिवारों के पास पाईप द्वारा पानी नहीं पहुंचता है उनकी संख्या घटकर 68 फीसदी रह जाएगी। अनुमानित गणना के अनुसार, यदि एक सरल तंत्र के जरिये 13 हजार जल निकायों को स्वच्छ करने की प्रणाली अपनाई जाये तो इस पर तीन साल में 7,000 करोड़ रुपये का खर्च आएगा। स्वच्छ जलापूर्ति के लिए सरकार जो खर्च करना चाहती है, उसकी तुलना में यह बहुत छोटा आंकड़ा है ।

जल हमारे अस्तित्व की जीवन रेखा है। यह सिर्फ एक आर्थिक द्रव्य नहीं है, बल्कि इसका सांस्कृतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय महत्व है। सभ्यताएं जल से जन्मी और नष्ट होती हैं। भारत में हमारे कुओं और बावड़ियों के माध्यम से जल संरक्षण की समृद्ध संस्कृति रही है। पानी की सफाई करना और इसे आर्थिक परिसंपत्ति के रूप में इस्तेमाल करना समय की मांग है। प्रकृतिः रक्षति रक्षितः – हम प्रकृति की रक्षा करेंगे तो प्रकृति हमारी रक्षा करेेगी।

(लेखक बेंगलुरु के तक्षशिला संस्थान में लोकनीति के अध्येता हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

अफ्रीकी दाल खाएगा इंडिया, मोजांबिक से 2 लाख टन अरहर आयात को मंजूरी

आत्मनिर्भरता के दावों के बीच भारत सरकार ने अफ्रीकी देश मोजांबिक से दो लाख टन अरहर दाल के आयात की अनुमति दी है। यह आयात किस प्रकार और किन बंदरगाहों के जरिये होगी यह भी निर्धारित किया गया है।

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत काम करने वाले विदेश व्यापार महानिदेशक (डीजीएफटी) ने मोजांबिक से अरहर दाल के आयात की अनुमति का पब्लिक नोटिस जारी किया है। 19 मार्च, 2021 को जारी इस नोटिस के अनुसार, भारत सरकार ने वर्ष 2021-22 में मोजांबिक से 2 लाख टन अरहर दाल के आयात की अनुमति देने का फैसला किया है। यह निर्णय भारत और मोजांबिक के बीच हुए समझौते के तहत लिया गया है। अरहर का आयात केवल 5 बंदरगाहों – मुंबई, तूतीकोरिन, चेन्नई, कोलकाता और हजीरा के जरिये हो सकेगा।   

केंद्र सरकार ने मोजांबिक से 2 लाख टन अरहर के आयात को मंजूरी देने का फैसला ऐसे समय लिया है जब देश में किसान आंदोलन चल रहा है और न्यूनतम समर्थनम मूल्य (एमएसपी) के कानूनी अधिकार की मांग उठ रही है। कृषि जिंसों से जुड़े व्यापार के जानकार आरएस राणा का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अरहर की कीमतों को देखते हुए भारतीय बंदरगाहों तक अरहर का आयात 6,000 रुपये प्रति कुंतल के एमएसपी से कम नहीं बैठेगा। जबकि देश के कई इलाकों में किसानों को अरहर का एमएसपी भी नहीं मिल पा रहा है।

योगेंद्र यादव के नेतृत्व में जय किसान आंदोलन किसानों से एमएसपी पर खरीद नहीं होने का मुद्दा उठा रहा है। इसे एमएसपी लूट कैटकुलेटर का नाम दिया है, जिसमेें एमएसपी न मिलने से किसानों को होने वाले नुकसान का अनुमान लगाया जाता है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि लाखों टन दालों का आयात करने वाले देश अपने किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य क्यों नहीं दिला पा रहा है।

आरएस राणा का मानना है कि अगर देश के किसानों को एमएसपी की गारंटी दी जाए तो दालों का आयात करने की बजाय देश में ही दलहन उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकता है। लेकिन भारत सरकार ने देश में दालों की कमी दूर करने के लिए पांच साल तक मोजांबिक से अरहर के आयात का समझौता कर लिया है।  

अरहर के आयात की अनुमति के संबंध में डीजीएफटी की ओर से जारी पब्लिक नोटिस

बृज में किसान महापंचायत कर गठबंधन की मजबूती पर अखिलेश-जयंत का जोर

कई महीनों से चल रहा किसान आंदोलन दिल्ली की सरहदों से निकलकर सियासी हलचलों तक पहुंच गया है। किसान आंदोलन से बनी सत्ता विरोधी लहर को भुनाने के लिए विपक्षी दल लगातार किसान महापंचायतें कर रहे हैं तो किसान यूनियनों के नेता भाजपा के खिलाफ प्रचार करते घूम रहे हैं। शुक्रवार को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने एक मंच पर आकर चौधरी चरण सिंह के विचारों को आगे बढ़ाने का दावा किया। दोनों युवा नेताओं को सुनने के लिए मथुरा के बाजना में बड़ी तादाद में लोग जुटे।

बृज में हुई इस किसान महापंचायत के कई सियासी मायने हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में शिकस्त खाने के बाद सपा और रालोद के नेता पहली बार एक साथ आये हैं। इसी के साथ दोनों दलों ने किसानों के मुद्दे पर संघर्ष करने और गठबंधन जारी रखने का इरादा साफ जाहिर कर दिया। दोनों नेता एक साथ ट्रैक्टर पर सवार होकर मंच तक पहुंचे। एक-दूसरे के दलों और नेताओं के प्रति काफी सम्मान जाहिर किया और किसानों के मुद्दोंं पर साथ मिलकर संघर्ष करने की बात कही। आज यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार चार साल पूरे होने का जश्न मना रही है। इस दिन राज्य के दो प्रमुख विपक्षी दलों के साथ आने को विधानसभा चुनाव की तैयारियों का बिगुल माना जा रहा है।

मथुरा राष्ट्रीय लोकदल का गढ़ रहा है और जयंत चौधरी यहां से सांसद रह चुके हैं। समाजवादी पार्टी रालोद के परंपरागत जनाधार के बूते पश्चिमी यूपी की राजनीति में अपनी खोयी जमीन तलाश रही है तो रालोद के सामने अपना वजूद बचाने की चुनौती है। जिस प्रकार किसान आंदोलन ने व्यापक रूप लिया और किसानों के मुद्दोंं को राष्ट्रीय राजनीति में जगह दिलायी, उसका फायदा राष्ट्रीय लोकदल को मिलने की उम्मीद है। इसी आस में रालोद की ओर से लगातार किसान महापंचायतें कराई जा रही हैं, जिसमें अच्छी खासी भीड़ जुट रही है।

मथुरा में किसान महापंचायत को संबोधित करते हुए अखिलेश यादव ने दोनों दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं का जिक्र कर गठबंधन को पुख्ता करने का संकेत दिया। साथ ही उन्होंने चौधरी चरण सिंह का नाम लेकर किसानों के मुद्दों पर संघर्ष करने का दावा भी किया। भाजपा पर निशाना साधते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा ने हमेेेेेशा लोगों को बांटकर और साजिशें कर सत्ता पाई है। हम किसानों को जगाने का काम कर रहे हैं। उन्होंने किसानों से आह्वान किया कि अगली बार जब मतदान करने जाएं तो भाजपा को सबक सिखाने का काम करें।

कृषि कानूनों की आलोचना करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि अगर खेती को बाजार के हाल पर छोड़ दिया तो किसानों को बर्बाद होने से कोई नहीं रोक सकता। किसान जब तक खुशहाल नहीं हो सकता, जब तक किसानों की बात करने वाले दल सत्ता में नहीं होंगे। भाजपा पर हमला बोलते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि किसान आंदोलन से कोई घबराया हो या नहीं, लेकिन भाजपा जरूर घबरा रही है। भाजपा को पता चल गया है कि अब किसान नहीं रुकने वाला है। जब तक काले कानून वापस नहीं होंगे, यह लड़ाई चलती रहेगी।

किसान महापंचायत को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय लोकदल के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने किसान आंदोलन को एक जाति से जोड़ने की कोशिशों पर प्रहार करते हुए कहा कि यह किसी एक जाति या समाज का मुद्दा नहीं है। इसलिए सभी किसानों को एकजुट होकर एक-दूसरे का साथ देना चाहिए। भाजपा पर दंगों के जरिये राजनीति करने का आरोप लगाते हुए जयंत चौधरी ने कहा कि भाजपा की राजनीति दंगों पर शुरू होती है और दंगों पर खत्म होती है। इस राजनीति का विरोध करना जरूरी है। जयंत चौधरी ने कहा कि आंदोलन के दौरान 300 से ज्यादा किसान शहीद हो गये, लेकिन उनके प्रति संवेदना व्यक्ता करना तो दूर उन्हें आंदोलनजीवी और आंतकवादी बताया जा रहा है।

चौधरी चरण सिंह को याद करते हुए जयंत चौधरी ने कहा कि आज किसान दोबारा से अपनी उस ताकत को पहचान रहा हैं जो उसने चौधरी चरण सिंह जी के समय में प्राप्त की थी। जयंत चौधरी ने कहा कि जिस प्रकार चौधरी चरण सिंह जी को वोट देते हुए कोई जाति देख कर वोट नही देता था। मैं दोबारा से वही दिन देखना चाहता हूंं। वह दिन देखना चाहता हूंं जब अखिलेश यादव मथुरा से चुनाव लड़े और मैं गाजीपुर से। 

कृषि कानूनों के फायदे समझाने पहुंचे भाजपा के पूर्व सांसद का विरोध, काफिले पर पथराव

कृषि कानूनों के फायदे समझाने में जुटे भाजपा नेताओं को किसानों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। गुरुवार को मथुरा जिले के पटलौनी (बलदेव) में एक किसान चौपाल में पहुंचे यूपी कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन और पूर्व सांसद तेजवीर सिंह को किसानों के आक्रोश का सामना करना पड़ा। प्रदर्शनकारियों ने गांव से बाहर ही उनका रास्ता रोक लिया और जमकर विरोध किया। इस दौरान पूर्व सांसद के काफिले पर पथराव भी हुआ, जिसमें कई कार्यकतार् घायल हो गये हैं। कुछ दिनों पहले मथुरा के गोवर्धन विधानसभा क्षेत्र में भी भाजपा विधायक कारिंदा सिंह को किसानों की नाराजगी और विरोध का सामना करना पड़ा था।

मिली जानकारी के अनुसार, पूर्व सांसद तेजवीर सिंह गुरुवार को जब पटलौनी गांव की किसान चौपाल में शामिल होने जा रहे थे तो गांव के बाहर ही किसानों ने उनका रास्ता रोक लिया और जमकर नारेबाजी करने लगे। इन प्रदर्शनकारियों में महिलाएं भी शामिल थीं। जब तेजवीर सिंह ने प्रदर्शनकारियों को समझाने का प्रयास किया तो उनके खिलाफ वापस जाओ के नारे लगने लगे और धक्कामुक्की शुरू हो गई।

इस दौरान कुछ लोगों ने पथराव शुरू कर दिया, जिससे भगदड़ मच गई। कई ग्रामीणों ने पथराव कर रहे लोगों को समझाने का प्रयास भी किया, लेकिन हालात पुलिस फोर्स के पहुंचने के बाद ही काबू में आये। माहौल भांपकर तेजवीर सिंह ने निर्धारित स्थल की ओर न जाकर गांव में दूसरे स्थान पर पहुंच चौपाल की। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जब तक तीनों कृषि कानून वापस नहीं लिये जाते वे, गांव में भाजपा नेताओं को नहीं घुसने देंगे।

पूर्व सांसद तेजवीर सिंह का कहना है कि प्रदर्शनकारियों में चार-छह लोग थे जो किसान यूनियन की टोपी पहने हुए थे, उनके हाथ में किसान यूनियन के झंडे थे। लेकिन ये लोग किसान यूनियन के नहीं हो सकते। किसान यूनियन के लोगों का आचरण ऐसा नहीं होता है। यह हमला पूरी प्लानिंग के तहत किया गया। तेजवीर सिंह का कहना है कि किसान आंदोलन की जिस रास्ते पर जा रहा है, वह देश के लिए घातक है। देश की जनता मोदी और योगी जी के कामों से पूरी तरह संतुष्ट है। सरकार ने किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई हैं, जिनकी जानकारी किसानों तक पहुंचाने के प्रयास किये जा रहे हैं।

कृषि मंत्रालय ने प्राइवेट कंपनियों को सौंपी फसल बीमा की अहम जिम्मेदारी

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने प्राइवेट कंपनियों को प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से जुड़ी एक अहम जिम्मेदारी सौंपी है। यह पहल उपज की पैदावार के सही अनुमानों और समय पर बीमा दावों के निस्तारण के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से जुड़ी है। इसके लिए कृषि मंत्रालय ने तीन प्राइवेट कंपनियों की सेवाएं लेने का फैसला किया है जो राज्य सरकारों द्वारा किये गये फसल कटाई प्रयोग (सीसीई) का निरीक्षण करेंगी और खुद भी ऐसे प्रयोग कर सकती हैं।  

कृषि मंत्रालय की ओर 8 मार्च को राज्य सरकारों को भेज गये एक पत्र के अनुसार, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 13 राज्यों के 100 जिलों में ग्राम पंचायत स्तर पर तकनीक आधारित उपज अनुमानों के लिए प्रायोगिक अध्ययन कराये जा रहे हैं। इन अनुमानों की पुष्टि स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा कराने का निर्णय लिया गया है। इसके लिए तीन एजेंसियों – इंडियन एग्रीबिजनेस सिस्ट्म्स-एग्रीवॉच, आईएआर इंश्योरेंस सर्वेयर्स एंड लॉस असेसर्स प्राइवेट लिमिटेड और लीड्सकनेक्ट सविर्सेज प्राइवेट लिमिटेड को चुना गया है।

इस चयन का क्या आधार था? और इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनायी गई? इसकी जानकारी फिलहाल नहीं है। लेकिन ये एजेंसियां राज्य सरकार द्वारा किये गये फसल कटाई प्रयोगों का निरीक्षण करेंगी। इसके अतिरिक्त अपनी तरफ से भी ऐसे प्रयोग करेंगी। इन प्रयोगों के आधार पर फसल की पैदावार और जोखिम का आकलन किया जाता है। इस समूची प्रक्रिया में डेटा कलेक्शन की अहम भूमिका है, जिसके लिए रिमोट सेंसिंग, जीआईएस और डेटा एनालिटिक्स से जुड़ी तकनीक का इस्तेमाल होता है। इस तरह की टेक्नोलॉजी को कृषि के भविष्य के तौर पर भी देखा जा रहा है।      

स्वतंत्र एजेंसियों के चयन के बारे में कृषि मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों को लिखा पत्र

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में शुरुआत से ही निजी क्षेत्र की भागीदारी रही है, इसलिए फसल कटाई प्रयोगों के निरीक्षण और अध्ययन में निजी क्षेत्र की भागीदारी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। कृषि मंत्रालय ने राज्य सरकारों से इन एजेंसियों को पूरा सहयोग देने का अनुरोध किया है। यह कदम कृषि मंत्रालय की उन कोशिशों का हिस्सा है जिसके तहत फसल बीमा दावों के समय पर निस्तारण के लिए आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है।

फसल कटाई प्रयोगों के लिए चुनी गई एजेंसियों में से एक लीड्स कनेक्ट सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, कंपनी रिमोट सेंसिंग, जीआईएस, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और डेटा एनालिटिक्स जैसी अत्याधुनिक तकनीकों के माध्यम से राज्य सरकार द्वारा किये गये क्रॉप कटिंग एक्सपेरीमेंट्स का सह-निरीक्षण करेगी। इसके अलावा कंपनी उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के कुल 25 जिलों की ग्राम पंचायतों में फसल कटाई प्रयोग करेगी। लीड्स कनेक्ट के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक नवनीत रविकर का कहना है कि यह पारंपरिक डेटा कलेक्शन और रिमोट सेंसिंग तकनीक आधारित स्मार्ट सेंपलिंग कार्यप्रणाली का स्मार्ट सम्मिश्रण होगा। प्रबल संभावना है कि भविष्य में यह नई कार्यप्रणाली पारंपरिक विधि की जगह ले लेगी।

फसल बीमा के लिए उपज की पैदावार और नुकसान से जुड़े सही आंकड़े जुटाना बेहद महत्वपूर्ण है। आंकड़ों के आधार पर ही बीमा के जोखिम और सरकार द्वारा बीमा कंपनियों को होने वाले प्रीमियम के भुगतान का आकलन होता है। कृषि मंत्रालय की यह पहल डेटा कलेक्शन के इन्हीं प्रयासों से जुड़ी है।

गौर करने वाली बात यह भी है कृषि मंत्रालय ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और कृषि विश्वविद्यालयों के विशाल तंत्र की बजाय निजी क्षेत्र की कंपनियों पर भरोसा किया है। यह आईसीएआर और उसके संस्थानों की प्रासंगिकता पर भी एक सवालिया निशान है।

समाजसेवा या सजा? नए नियमों से बदलेगा कंपनियों के दायित्व का नजरिया

सामाजिक मापदंड समय के साथ नियमों में तब्दील हो जाते हैं और कानूनों का रूप ले लेते हैं। कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के नियम भी ऐसे ही विकसित हो रहे हैं। आठ साल पहले, जब देश में पहली बार सीएसआर के नियम बने तो कॉरपोरेट्स को अपनी योजनाएं बनाने और नवाचार की काफी छूट दी गई थी। हालांकि, बहुत-सी कंपनियों ने जन कल्याण से जुड़े कदम उठाये, लेकिन सीएसआर उनके संगठन का अहम हिस्सा नहीं बन पाया।   

कई कंपनियों में सीएसआर मानव संसाधन विभाग का हिस्सा था तो कई कंपनियों में इसे मार्केटिंग, कम्यूनिकेशसं या पब्लिक रिलेशंस से जोड़ दिया। सामाजिक कार्यों पर बड़ा बजट खर्च करने वाले कॉरपोरेशन का जोर भी सीएसआर की बजाय दूसरे उद्देश्यों को पूरा करने पर था। छह साल पहले मैंने सीएसआर को कन्फ्यूज्ड सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी करार दिया था। उस समय सीएसआर को लेकर स्पष्टता और स्पष्ट एजेंडा का अभाव था। सीएसआर का पैसा ब्रांड प्रमोशन, कंपनी के मौजूदा कार्यक्रमों या फिर कर्मचारियों पर खर्च होता था। बीते वर्षों में कई प्रमोटर्स ने मुझसे कंपनी की सीएसआर समितियों में शामिल होने का आग्रह किया, लेकिन संगठन स्तर पर स्पष्टता की कमी के कारण मैं बचता रहा। मेरा मानना है कि किसी पहल का प्रभाव उसकी व्यापकता यानी स्केल पर निर्भर करता है।

सीएसआर की भूमिका ऐसे उदाहरण पेश करना है जिन्हें सरकार अपना सके और विस्तार दे सके। अगर सीएसआर की पहल सही असर पैदा कर सकती है और इसे विस्तार दिया जा सकता है तो सरकार या बाजार को इसे अपनाकर व्यापक बनाना चाहिए। यह काम पहले के मुकाबले अब ज्यादा हो रहा है, क्योंकि सीएसआर कानून सामाजिक प्रभाव को दर्शाने के लिए ज्यादा स्पष्टता, फोकस और डेटा पर जोर दे रहा है।    

ऐसी बहुत कम गैर-सरकारी संस्थाएं (एनजीओ) दिखायी पड़ती हैं जो सीएसआर से जुड़ी पहल को कैसे विस्तार देना है, इसे स्पष्ट करते हुए कायदे से परियोजना के दस्तावेज तैयार करती हैं। ऐसी कोशिशों में एटीई फाउंडेशन का जलाशयों के पुनरुद्धार का काम शामिल है। यह काम निर्माण, सुधार और दूर बैठे डिजिटल निगरानी के मॉडल पर आधारित है ताकि सरकार इसे विस्तार दे सके या कहीं दोहरा सके। तालाब खोदने वाली जेसीबी मशीनों के समय से लेकर हरेक काम और एक-एक पैसे का हिसाब रखा जाता है ताकि परियोजना के कुल खर्च पर नजर रखी जा सके। पूरे प्रयास को इस तरीके से डॉक्यूमेंट किया गया है कि केंद्र या राज्य सरकारें इस मॉडल को आसानी से अपना सकें और जलाशयों के पुनरुद्धार की योजना बना सकें। इस तरह परियोजना शुरू करने के साथ ही नीतिगत विकास का मॉडल तैयार करने और उसकी पैरवी को ध्यान में रखना चाहिए।

सीएसआर नियमों में अहम बदलाव

22 जनवरी, 2021 को एक अधिसूचना के जरिया कंपनी (सामाजिक उत्तरदायित्व नीति) नियम, 2014 में नये बदलाव किये गये हैं जो सीएसआर कानून को खर्च करो और बताओ की बजाय खर्च करो वरना सजा पाओ की तरफ ले जाते हैं। सीएसआर कानूनों से स्वेच्छा का पहलू खत्म कर दंड के प्रावधान को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

ये नये बदलाव सीएसआर के नियमों को पालन करो और खुश हो जाओ की बजाय भागीदारी और विस्तार की तरफ ले जाते हैं। कॉरपोरेट में सीएसआर के पैसे को ब्रांडिंग पर खर्च करने की प्रवृत्ति थी। बहुत-से म्यूचुअल फंड्स ने तो सीएसआर की आड़ में टेलीविजन पर वित्तीय जागरुकता के विज्ञापन चलवा दिये थे। इससे कुछ जागरुकता तो बढ़ी होगी, लेकिन कई म्यूचुअल फंड्स ने गलत रिपोर्टिंग की या फिर अपने उत्पादों को गलत ढंग से बेचा। फंड का दुरुपयोग कर कईयों ने तो अपनी कथित सीएसआर योजनाओं को ही खत्म कर दिया। यानी वित्तीय सुरक्षा की जो सलाह उन्होंने अपने विज्ञापनों में दी, खुद उनके नेतृत्व ने उस पर अमल नहीं किया।

कंपनियों के प्रशासन को कहीं ना कहीं सीएसआर प्राथमिकताओं से जोड़ने की आवश्यकता है। इन दो पहलूओं के बीच तालमेल बैठाने के लिए ही सीएसआर के नियमों में बदलाव किये गये हैं, जो इन चार बातों पर जोर देते हैं:

पुनः परिभाषित: सीएसआर नियमों में हुए हालिया बदलाव कॉरपोरेट्स को उनकी सीएसआर नीति पर पुनर्विचार करने को कहते हैं। मतलब, कॉरपोरेट्स को उनकी सीएसआर नीति लघु और दीर्घ अवधि को ध्यान में रखते हुए तैयार करनी होगी। साथ ही यह भी ध्यान में रखना होगा कि सीएसआर के प्रभाव का आकलन समूची प्रक्रिया का अहम हिस्सा है। इसलिए अधिकांश कॉरपोरेट्स को उनकी सीएसआर नीति के दृष्टिकोण, दिशा और कार्य योजना को नए सिरे से परिभाषित करना होगा।

मूल्यांकन: सरकार चाहती है कि सीएसआर के प्रभाव मूल्यांकन से जुड़ी गतिविधियां ज्यादा से ज्यादा डेटा आधारित हों। वे दिन लद गये जब सीएसआर के परिणाम और प्रभाव को खुशनुमा तस्वीरों से प्रदर्शित किया जा सकता था। अपने लक्ष्यों को पुन: परिभाषित करते हुए कॉरपोरेट्स को इस पर भी विचार करना चाहिए कि उनकी पहल के असर का मूल्यांकन कैसे होगा? इसके लिए डेटा कैसे जुटाया जाएगा? इससे नवाचार और निर्णय-प्रक्रिया में हाथ थोड़े बंध सकते हैं, लेकिन बेहतर यही होगा कि सीएसआर के असर का मूल्यांकन आंकड़ों से किया जाये। इसके अलावा सीएसआर से जुड़ी परियोजनाओं की अधिक जानकारी प्रकाशित करनी होगी, जिससे कामों पर जनता की नजर रहेगी।

अब सीएसआर के जरिये निर्मित पूंजीगत परिसंपत्तियों की जानकारी अलग से देनी होगा। इसकी अधिकतम सीमा 5 फीसदी तय की गई है। प्रशासनिक खर्चों को साफ तौर पर परिभाषित किया गया है, जिससे सीएसआर खर्चों की निगरानी और प्रबंधन में आसानी होगी।

विश्वसनीयता: जब स्व-प्रमाणन या स्व-निगरानी कारगर नहीं होते तो ऑडिट और अनुपालन अनिवार्य हो जाता है। सीएसआर की धनराशि का दुरुपयोग रोकने और सालाना खर्च सुनिश्चित करने के लिए कंपनी के सीएफओ की जिम्मेदारी तय की गई है। सीएफओ धनराशि के उपयोग संबंधी दस्तावेजों को प्रमाणित करेगा। इसका मतलब यह है कि सीएसआर के खर्चों के लिए अलग से ऑडिट होगा, जिसे सीएफओ प्रमाणित कर सकता है। जाहिर है कि सीएफओ के लिए हरेक खर्च और उपयोग पर खुद नजर रखना संभव नहीं होगा, इसलिए नियमों की अनुपालना पर खर्च बढ़ेगा। हालांकि, यह कोई बड़ा खर्च नहीं है, लेकिन इसकी कटौती सीएसआर के आवंटन से होगी।

रणनीति: नये बदलाव कॉरपोरेट ब्रांडिंग और कर्मचारियों के कल्याण पर सीएसआर का पैसा खर्च करने की छूट नहीं देते हैं। इन पर साफ तौर पर पाबंदी लगायी गई है। कॉरपोरेट्स और एनजीओ दोनों को ही सीएसआर के नए नियमों के हिसाब से खुद को ढालना होगा। इसके लिए एनजीओ को अपने संगठन के स्वरूप और लोगों में बदलाव लाने होंगे। जबकि कॉरपोरेट्स को भी अपने सीएसआर रणनीति पर पुनर्विचार कर कम से कम अगले तीन साल की रणनीति बनानी चाहिए।

(लेखक नीतिगत मामलों के विशेषज्ञ हैं। उनका ट्विटर पता है @yatishrajawat)

कृषि सुधारों को लागू करने से पहले किसानों को भरोसे में लेना जरूरी

कृषि क्षेत्र में मार्केटिंग सुधारों की जरूरत है क्योंकि देश की 50 फीसदी से अधिक आबादी के लिए खेती को फायदेमंद बनाना इन सुधारों के बिना संभव नहीं है। लेकिन सुधारों के लिए संबंधित पक्षों और खासतौर से किसानों की भागीदारी और विचार-विमर्श की लंबी और पारदर्शी प्रक्रिया की जरूरत है। सरकार ने पिछले साल जो कृषि सुधार किये हैं, उनके जरिये किसानों में जो संदेश गया, वह ठीक नहीं था। यही वजह है कि किसान तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ कई महीनों से आंदोलन कर रहे हैं। इसके साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का मुद्दा भी चर्चा का मुख्य बिंदु बन गया है।

किसानों की मांग है कि सभी फसलों के लिए एमएसपी पर खरीद की कानूनी गारंटी मिलनी चाहिए। किसान को कम से कम उसकी उपज का लागत मूल्य और उस पर उचित मुनाफा तो मिलना ही चाहिए। असल में कृषि बाजार की शर्तें किसानों के लिए प्रतिकूल हैं और उसमें बदलाव किये बिना किसानों और कृषि क्षेत्र की हालत को नहीं सुधारा जा सकता है। इसलिए सरकार को कृषि क्षेत्र के लिए एक व्यापक और समग्र नीति बनानी चाहिए।

ये विचार बिंदु सेंटर फॉर एग्रीकल्चर पॉलिसी (कैप) डायलॉग द्वारा आयोजित एक परिचर्चा में सामने आए। इसमें शिरकत करने वाले लोगों में कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के पूर्व चेयरमैन डॉ. टी. हक, स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक प्रोफेसर अश्विनी महाजन, भारत कृषक समाज के चेयरमैन और पंजाब स्टेट फार्मर्स एंड फार्म वर्कर्स कमीशन के चेयरमैन अजय वीर जाखड़, भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही, जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर बिश्वजीत धर, काउंसिल फॉर सोशल डेवलपमेंट (सीएसडी) के डायरेक्टर प्रोफेसर नित्या नंद, जनता दल (यूनाइटेड) के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्य सभा सांसद के.सी. त्यागी, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (एनसीडीसी) के पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर डॉ. डी.एन. ठाकुर समेत तमाम दूसरे कृषि विशेषज्ञ शामिल थे।

कार्यक्रम की शुरुआत में कैप डायलॉग के चेयरमैन डॉ. टी. हक ने कहा कि देश के मौजूदा कृषि मार्केटिंग सिस्टम की तमाम खामियों को देखते हुए कृषि मार्केटिंग सुधारों की जरूरत महसूस की जाती रही है। नये केंद्रीय कृषि मार्केटिंग सुधार कानूनों का मकसद किसानों को उनके उत्पादों के बेहतर मूल्य दिलाने के लिए बाजार पहुंच बढ़ाने और मौजूदा खामियों को दूर करना रहा है। हालांकि इन कानूनों में सुधार की काफी गुंजाइश है। इसलिए बेहतर होगा कि सरकार को खुद ही सुधारों की जरूरत का संज्ञान लेते हुए इन कानूनों में बदलाव कर दे। सरकार का इस तरह का कदम इस समय देश में चल रहे किसान आंदोलन को समाप्त करने में मददगार साबित होगा। इन सुधारों के तहत देश भर में कृषि उत्पाद मंडी समिति कानून (एपीएमसी) तहत चलने वाली मंडियों और उसके बाहर ट्रेड एरिया दोनों के लिए एक समान नियामक व्यवस्था बनानी चाहिए। इसके साथ ही एक मजबूत नियामक प्रणाली बनाने की जरूरत जो विवाद निस्तारण के लिए प्रभावी साबित हो।

भारत कृषक समाज के चेयरमैन और पंजाब स्टेट फार्मर्स एंड फार्म वर्कर्स कमीशन के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ ने कहा कि हमें कृषि नीतियां बनाने की प्रक्रिया की व्याख्या करने की जरूरत और उसमें व्यापक बदलाव की दरकार है, जिसमें सभी संबंधित पक्षों और खासतौर के किसानों की भागीदारी हो। संबंधित पक्षों की भागीदारी के बिना जो नीतियां बनेंगी उनको हमेशा शक की  निगाह से देखा जाता है। तीन केंद्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का मौजूदा आंदोलन इसी वजह से खड़ा हुआ है क्योंकि इन कानूनों पर किसानों के साथ व्यापक विचार-विमर्श नहीं किया गया। इसके साथ जाखड़ का कहना है कि हमें एमएसपी के मुद्दे पर एक व्यापक विचार-विमर्श शुरू करने की जरूरत है। जिसके केंद्र में इसकी भावी व्यवस्था और किसानों के हितों के टिकाउपन को ध्यान में रखते हुए नीति निर्धारण किया जाए।

स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक प्रोफेसर अश्विनी महाजन ने कहा कि जहां तक नये कानूनों की बात है तो उनके बिना भी और अब उनके आने से भी कोई बड़ा फर्क कृषि और किसानों पर नहीं पड़ रहा है। हमें इस बात पर जोर देने की जरूरत है कि किसानों को उनके उत्पादों का बेहतर दाम कैसे मिले। इसके लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की व्यवस्था को कैसे बेहतर किया जाए। वहीं तकनीक का उपयोग कर किसानों को कैसे बेहतर दाम सुनिश्चित किया जा सकता है। इसके लिए बीमा, तनीक और वेयरहाउस रसीद जैसे विकल्पों पर गौर करना चाहिए। जिस तरह से स्टॉक मार्केट में शेयरों पर अपर और लोअर सर्किट लगता है क्या इस तरह की व्यवस्था कृषि उत्पादों के मामले में लागू नहीं हो सकती है। उन्होंने कहा कि हर तरफ तकनीक की बात हो रही है लेकिन तीनों नये कृषि कानूनों में कहीं भी टेक्नोलॉजी का जिक्र नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नरेश सिरोही का कहना था कि मौजूदा किसान आंदोलन पिछले लंबे समय से किसानों के वित्तीय संकट में फंसे होने और व्यापार की शर्तों के कृषि के प्रतिकूल होने के कारण किसानों की बढ़ती तकलीफ का नतीजा है। इसलिए  सरकार को किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी देने के साथ ही इसे तय करने के लिए लागत पर 50 फीसदी मुनाफे को शामिल करना चाहिए। ऐसा करने से ही मौजूदा किसान आंदोलन का हल निकल सकता है।

प्रोफेसर बिश्वजीत धर ने कहा कि दुनिया के तमाम देश और खासतौर से अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के देश किसानों की वित्तीय मदद करते हैं। भारत जैसे देश में जहां 50 फीसदी से ज्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है वहां और अधिक मदद की जरूरत है। केवल मार्केटिंग सुधारों से किसानों के संकट का हल नहीं है और यह समस्या के केवल एक हिस्से को छूता है। हमें एक समग्र और व्यापक कृषि नीति की जरूरत और उसी के अनुरूप सुधारों को लागू किया जाना चाहिए। अमेरिका जैसे देश में हर चार साल में 500 पेज के दस्तावेज के रूप में कृषि नीति आती है जबकि वहां केवल दो फीसदी आबादी ही खेती पर निर्भर करती है। ऐसे में हमें इसकी कितनी जरूरत है उसे समझा जा सकता है।

डॉ डी.एन. ठाकुर ने किसानों के संगठन खड़े कर उनको मजबूत करने पर जोर देतु हुए कहा कि देश में कृषि क्षेत्र और किसानों के संकट को हल करने का यह सबसे बेहतर विकल्प है। हमें स्वायत्त सहकारी समितियों के गठन को बढ़ावा देना चाहिए जो संगठित रूप में किसानों के लिए मार्केट हासिल करने और उनके उत्पादों के बेहतर दाम सुनिश्चित करने का कारगर तरीका है। इन संगठनों को किसी भी रूप में सरकार और राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त होना चाहिए और इनका संचालन कुशल पेशेवरों के जरिये होना चाहिए।

रुरल वॉयस के संपादक हरवीर सिंह ने कहा कि किसानों को उनके उत्पादों के एमएसपी की कानूनी गारंटी मिलनी चाहिए और इसके लिए कारपेरेट जगत को भी आगे आना चाहिए। खाद्य उत्पादों का कारोबार करने वाली कंपनियों को उपभोक्ता मूल्य का बड़ा हिस्सा किसानों के साथ साझा करना चाहिए। डेयरी क्षेत्र में काम करने वाली सहकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियां उपभोक्ता मूल्य का 70 फीसदी तक की हिस्सेदारी किसानो के साथ साझा करती हैं। यह काम दूसरी खाद्य उत्पाद कंपनियां क्यों नहीं कर सकती हैं, यह खुद एक बड़ा सवाल है।

हरवीर सिंह का कहना था कि किसानों को एमएसपी का गारंटी का मतलब यह नहीं कि सरकार को अपने संसाधनों के जरिये खुद बाजार में आने वाले सरप्लस कृषि उत्पादों को खरीदना होगा। इस धारणा को बदलने की जरूरत है क्योंकि खाद्य उत्पादों के बड़े हिस्से पर निजी कारोबार का कब्जा है और उसे बाजार में अपनी भागीदारी बढ़ानी होगी। कृषि को मुनाफे में लाने की नीतियों पर काम करने की जरूरत है। ऐसा होने से अर्थव्यस्था के दूसरे क्षेत्रों को भी फायदा होगा क्योंकि कृषि  क्षेत्र खुद में एक बड़ा बाजार है तो दूसरे क्षेत्रों की वृद्धि दर को बढ़ाने का काम करता है। इसके एक व्यवहारिक और समग्र कृषि नीति बनाकर उसे अमल में लाने की जरूरत है। केवल मार्केटिंग सुधारों को लागू करने से कृषि संकट को हल करना संभव नहीं है।

बंगाल में भाजपा के खिलाफ उतरा किसान मोर्चा, कोलकाता में जोरदार स्वागत

कृषि कानूनों के खिलाफ कई महीनों से आंदोलन कर रहे किसान नेता अब पश्चिम बंगाल और असम की चुनावी रणभूमि में उतर चुके हैं। संयुक्त किसान मोर्चा अगले तीन दिनों के दौरान पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में किसान पंचायतें कर भाजपा को वोट न देने की अपील करेगा। नंदीग्राम में 13 मार्च को होने वाली किसान महापंचायत में राकेश टिकैत, बलबीर सिंह राजेवाल, गुरनाम सिंह चढूनी, डॉ. दर्शनपाल और योगेंद्र यादव शामिल होंगे। नंदीग्राम किसान आंदोलन का पुराना गढ़ रहा है। यहीं से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव लड़ रही हैं। नंदीग्राम में किसान नेताओं का जमावड़ा ममता बनर्जी के लिए मददगार साबित हो सकता है।

कोलकाता में किसान नेताओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो चुका है। गुरुवार को कोलकता हवाई अड्डे पर किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल और गुरनाम सिंह चढूनी का जोरदार स्वागत किया गया। एयरपोर्ट पर किसान नेताओं के स्वागत के लिए बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।  

इससे पहले 10 मार्च को पंजाब और हरियाणा के किसान नेताओं ने कोलकाता में एक जनसभा कर भाजपा को वोट न देने की अपील की थी। संयुक्त किसान मोर्चा के अलावा भी पंजाब, हरियाणा और देश के अन्य राज्यों से किसानों के अलग-अलग जत्थे बंगाल और असम पहुंच रहे हैं। आज कोलकाता पहुंचे संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी रणनीति के बारे में विस्तार से बताया।

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत आज राजस्थान में हैं। वे कल बंगाल पहुंचेंगे। राकेश टिकैत का कहना है कि वे बंगाल के किसानों से जाकर पूछेंगे कि उन्हें एमएसपी मिला या नहीं। बंगाल में भी बहुत किसान हैं, उन्हें कृषि कानूनों की हकीकत बताएंगे। किसान यूनियनों के राजनीति में उतरने के सवाल पर टिकैत का कहना है कि वे किसी पार्टी के लिए वोट नहीं मांग रहे हैं, बल्कि किसानों को भाजपा सरकार की असलियत बताने जा रहे हैं।

28 जनवरी को दिल्ली बॉर्डर से किसानों के धरने हटाने की कोशिशों के बाद किसान आंदोलन एक नये दौर में प्रवेश कर चुका है। कई राज्यों में किसान पंचायतें हो रही हैं, जिनमें राजनीतिक दल बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश में किसान पंचायतें करने के बाद संयुक्त किसान मोर्चा ने बंगाल समेत उन पांचों राज्यों में जाने का फैसला किया है, जहां विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं।

संयुक्त किसान मोर्चा से मिली जानकारी के अनुसार, आज कोलकाता के प्रेस क्लब में किसान नेताओं की प्रेस वार्ता के बाद एक वाहन रैली निकाली जाएगी। दोपहर बाद रामलीला मैदान में किसान-मजदूर महापंचायत होगी। कल 13 मार्च को नंदीग्राम और 14 मार्च को सिंगूर और आसनसोल में किसान महापंचायतें होंगी। इन कार्यक्रमों के आयोजन के लिए पश्चिम बंगाल किसान कॉर्डिनेशन कमेटी गठित की गई है।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि उसके नेता भाजपा और उसके सहयोगी दलों के खिलाफ मतदान करने की अपील करेंगे। बंगाल के अलावा किसानों के जत्थे असम भी पहुंच रहे हैं। 26 मार्च को किसान आंदोलन के चार महीने पूरे होने के मौके पर भारत बंद का ऐलान किया गया है। इस बार होली पर कृषि कानूनों की प्रतियां जलाई जाएंगी। इस तरह यह पूरा महीना किसान आंदोलन की हलचल से भरपूर रहेगा।