किसान आंदोलन को किधर ले जाएंगे राकेश और नरेश टिकैत के बयान

अपने आंसूओं से किसान आंदोलन में नई जान फूंकने वाले भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत सरकार को लगातार चुनौतियां दे रहे हैं। अब राकेश टिकैत ने 40 लाख ट्रैक्टरों के साथ संसद घेराव की चेतावनी दी है। जबकि उनके भाई भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताते हुए सरकार को उनके जरिये सुलह का रास्ता सुझाया है। सुलह और चेतावनी के इन दो सुरों के बीच किसान आंदोलन की भावी रणनीति और असमंजस के संकेत देखे जा सकते हैं।

मंगलवार को संयुक्त किसान मोर्चा ने राजस्थान के सीकर में किसान महापंचायत बुलाई थी। इसमें राकेश टिकैत के अलावा स्वराज इंडिया के नेता योगेंद्र यादव और अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमरा राम भी मौजूद थे। सीकर महापंचायत में मंच से किसानों को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत कहा

“कान खोलकर सुन लो दिल्ली। ये ट्रैक्टर भी वही है और ये किसान भी वही है। अबकी कॉल पार्लियामेंट की होगी। और कह के जाएंगे। पार्लियामेंट पर जाएंगे। इस बार चार लाख ट्रैक्टर नहीं होंगे, चालीस लाख ट्रैक्टर जाएंगे। अबकी बार हल क्रांति होगी।”

किसान आंदोलन में राकेश टिकैत की एंट्री थोड़ी देरी से हुई थी। वे संयुक्त किसान मोर्चा के 26 नवंबर को दिल्ली कूच से एक दिन बाद आंदोलन में शामिल हुए थे। लेकिन तब से वे संयुक्त किसान मोर्चा के साथ हैं और किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं। किसानोंं के बीच उनकी बढ़ती लोकप्रियता के पीछे उनके ठेठ अंदाज का बड़ा हाथ है। हालांकि, उन पर किसान आंदोलन को भड़काने के आरोप भी लग रहे हैं।

26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च का ऐलान भी सबसे पहले राकेश टिकैत ने किया था। “एक तरफ जवान चलेगा, दूसरी तरफ किसान चलेगा।” और “उधर टैंक चलेगा, इधर ट्रैक्टर चलेगा” इस तरह के बयानों ने 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्च का माहौल बनाया था। बाद में इसे संयुक्त किसान मोर्चा ने अपना कार्यक्रम बना लिया। इसी तर्ज पर अब राकेश टिकैत लाखों ट्रैक्टरों के साथ संसद कूच की बात कह रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंने लाल किले पर जाने से साफ इंकार किया है। सीकर में राकेश टिकैत ने हुंकार भरी

“तिरंगा भी फैलेगा और पार्लियामेंट पर फैलेगा, कान खोलकर सुन लो। ये ट्रैक्टर जाएंगे और हल के साथ जाएंगे। पार्लियामेंट के बाहर जिन पार्कों में आज से 32 साल पहले 1988 में आंदोलन हुआ था, वहां ट्रैक्टर चलेगा, वहां खेती होगी। इंडिया गेट पर जो पार्क है उसमें ट्रैक्टर चलेगा, जुताई होगी। सरकार या तो बिल वापस ले, एमएसपी पर कानून बनाये, नहीं तो दिल्ली की घेराबंदी पक्की होगी। तारीख कौनसी होगा? यह संयुक्त मोर्चा बताएगा। हमारे पंच भी यही हैं और हमारा मंच भी वही है।”

कभी आक्रामक तो कभी चुटीली बयानबाजी से आंदोलन में जोश भरना राकेश टिकैत की रणनीति का हिस्सा है। इससे वे मीडिया की सुर्खियों में बने रहते हैं। 26 जनवरी को लालकिले की घटना के बाद जब किसानों का मनोबल और संख्याबल दोनों टूटने लगे थे, तब राकेश टिकैत ने “किसान सीने पर गोली खाएगा, किसान कहीं नहीं जाएगा” और “जब तक गांव से पानी नहीं आएगा, जल ग्रहण करूंगा” जैसी बातों से किसानों को भावुक कर दिया था।

हालांकि, कई बार अपने बयानों पर खुद राकेश टिकैत को भी सफाई देनी पड़ती है। तब वे बड़ी मासूमियत से बात टाल देते हैं। आंदोलन को 2024 तक जारी रखने, फसलों को आग लगाने और लाखों ट्रैक्टरों के साथ संसद घेरने के ऐलान पर उन्हें सफाई देनी पड़ी। लेकिन गाजीपुर बॉर्डर पर टिकैत जिस मजबूती से डटे रहे। उससे उनकी छवि धाकड़ नेता की बनी है। सरकार को ललकारने वाले उनके बयान इस छवि को पुख्ता करते हैं। इसलिए भी वे रोजाना कुछ न कुछ सुर्खियां बटोरने वाला कह डालते हैं। ऐसा करते हुए टिकैत की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि वे हरियाणा और राजस्थान में बड़ी-बड़ी किसान पंचायतें कर रहे हैं।  

अब जबकि दिल्ली की सीमाओं पर किसान आंदोलन को तीन महीने बीत चुके हैं। सरकार के साथ आखिरी वार्ता हुए भी एक महीने से ज्यादा गुजर चुका है तो किसान आंदोलन की धार बनाये रखना बड़ी चुनौती है। यहां टिकैत काम आते हैं। यह बात संयुक्त किसान मोर्चा भी समझता है। शायद इसीलिए टिकैत के बयानों पर संयुक्त किसान मोर्चा कोई प्रतिकूल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि उन्हें अपनी सभाओं और प्रेस वार्ताओं में बुलाता है।

किसान आंदोलन को हरियाणा-पंजाब से बाहर फैलाने में टिकैत अहम भूमिका निभा रहे हैं। महेंद्र सिंह टिकैत की विरासत और भाकियू के बड़े संगठन से उन्हें मदद मिल रही है। खासतौर पर सरदार वीएम सिंह के संयुक्त किसान मोर्चा से अलग होने के बाद किसान आंदोलन को व्यापक और एकजुट बनाये रखने के लिए टिकैत बंधुओं की जरूरत है। यही वजह है कि किसान आंदोलन के बाकी नेता आंदोलन में उभरते नये शक्ति केंद्र और राकेश टिकैत की बयानबाजी से असहज होने के बावजूद इस पर कुछ बोलने से बचते हैं।

संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 23 मार्च को शहीद भगत सिंह के शहादत दिवस पर दिल्ली कूच या संसद घेराव की रणनीति का ऐलान हो सकता है। इसकी रूपरेखा तय होनी बाकी है। संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल ऑल इंडिया किसान सभा के राजस्थान में संयुक्त सचिव संजय माधव का कहना है कि संसद मार्च की योजना पहले एक फरवरी को बनी थी, जिसे 26 जनवरी की घटना के बाद स्थगित कर दिया गया था। राकेश टिकैत ने संसद घेराव की जो बात कही है, उस पर भी विचार किया जाएगा। आंदोलन की भावी रणनीति का ऐलान 28 फरवरी को होगा।

एक तरफ जहां राकेश टिकैत संसद घेराव की चेतावनी दे रहे हैं, वहीं भाकियू के अध्यक्ष नरेश टिकैत ने सुलह का रास्ता सुझाया है। नरेश टिकैत ने कहा कि राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। उनकी बहुत शर्म-लिहाज है। हम भी उन पर विश्वास करते हैं। लेकिन उन्हें पिंजरे के तोते की तरह कैद कर रखा है। अगर उन्हें किसानों से बात करने की आजादी दी जाए तो एक दिन या एक घंटे में आंदोलन का फैसला हो जाएगा। लेकिन राजनाथ सिंह सरकार के शिकंजे में हैं। वे सरकार से बाहर नहीं बोल सकते।

लगता है बयानों से सुर्खियां बटोरने वाला फार्मूला नरेश टिकैत भी आजमाने लगे हैं। नरेश टिकैत का बयान खाप पंचायतों द्वारा आंदोलन का हल निकालने की कोशिशों के तौर पर भी देखा जा सकता है। इससे पहले भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में भी खाप पंचायतों से बातचीत के प्रयास किये थे, लेकिन तब खुद नरेश टिकैत ने भाजपा नेताओं से मिलने से इंकार कर दिया था। इसके बावजूद केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान खाप चौधरियों से मिलने पहुंचे तो उनकी खिलाफ नारेबाजी हुई जो अगले दिन हिंसक टकराव में बदल गई।

राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताकर नरेश टिकैत ने भाजपा की अंदरुनी राजनीति पर भी निशाना साधा है। साथ ही कृषि मंत्री से इतर किसी दूसरे नेता के जरिये सुलह का संकेत भी दिया है। वैसे, टिकैत बंधु राजनाथ सिंह के नजदीक माने जाते हैं और उनके साथ मंच साझा कर चुके हैं। लेकिन जिस अंदाज में नरेश टिकैत ने राजनाथ सिंह को पिंजरे का तोता बताया है, उससे यह सुझाव कम तंज ज्यादा हो गया है और सरकार शायद ही इसे स्वीकार करे।

संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े हरियाणा के बड़े किसान नेता गुरनाम सिंह चडूनी का कहना है कि राकेश टिकैत ने संसद घेराव की बात अपनी तरफ से कही है। इस बारे में संयुक्त किसान मोर्चा ने अभी कोई निर्णय नहीं लिया है। इसी तरह राजनाथ सिंह के जरिये सुलह का सुझाव भी नरेश टिकैत का व्यक्तिगत सुझाव है। चडूनी का कहना है कि टिकैत किसान आंदोलन में शामिल हैं, लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा का हिस्सा नहीं हैं।

राकेश टिकैत के सहयोगी और भाकियू के मीडिया प्रभारी धर्मेंद्र मलिक का कहना है कि आंदोलन को मजबूत भी करना है और बातचीत का रास्ता भी निकालना है। राकेश टिकैत और नरेश टिकैत के हालिया बयानों को इसी संदर्भ देख जाना चाहिए। लेकिन इस बारे में अंतिम निर्णय संयुक्त किसान मोर्चा लेगा। राकेश टिकैत ने भी अपना मंच और पंच संयुक्त किसान मोर्चा को ही बताया है।

सामूहिक नेतृत्व इस किसान आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत है तो एक बड़ी चुनौती भी। एक नई चुनौती किसान आंदोलन के प्रमुख चेहरे के तौर पर किसी एक नेता का उभरना भी है। संयुक्त किसान मोर्चा के अलावा भी आंदोलन में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसान संगठन शामिल हैं। 26 जनवरी के ट्रैक्टर मार्चा के दौरान हुई हिंसा के बाद सबसे ज्यादा गिरफ्तारियां पंजाब के आंदोलनकारियों की हुई थी। तब संयुक्त किसान मोर्चा ने दिल्ली हिंसा से किनारा करते हुए दीप सिद्धू के साथ-साथ सतनाम सिंह पन्नू के नेतृत्व वाली किसान मजदूर संघर्ष कमेटी से पल्ला झाड़ लिया था। आंदोलन की आगामी रणनीति पर इसका असर भी पड़ेगा।

पिछली बार ट्रैक्टर मार्च के दौरान जो कुछ हुआ, उसे देखते हुए संसद घेराव की चेतावनी पर सहमति बनाना आसान नहीं है। लेकिन जब तक मामला किसी निर्णायक स्थिति में पहुंचता है, तब तक टिकैत बंधु अपने बयानों से आंदोलन को चर्चाओं में जरूर बनाये रखेंगे।

आंदोलन को नया रुख दे सकती है उग्राहां की किसान-मजदूर महारैली

किसान आंदोलन की सबसे मजबूत ताकत भारतीय किसान यूनियन (एकता उग्राहां) ने पंजाब खेत मजदूर यूनियन के साथ मिलकर रविवार को पंजाब के बरनाला में एक बड़ी रैली बुलाई है। बरनाला अनाज मंडी में होने वाली यह महारैली किसान-मजदूर एकता की मिसाल बन सकती है। रैली की तैयार बहुत जोरशोर से हो रही हैं। आयोजकों का दावा है कि इसमें लाखों की तादाद में किसान और मजदूर जुटेंगे।

इससे पहले रेल रोको और चक्का जाम में भी बीकेयू (एकता उग्राहां) ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। संगठन के बैनर लगे हजारों महिलाओं कृषि कानूनों के खिलाफ कई महीनों से सड़कों पर हैं। दरअसल, पंजाब में किसान आंदोलन को मजबूती देकर हरियाणा और दिल्ली के रास्ते देश के कई राज्यों में पहुंचाने का बहुत बड़ा श्रेय उग्राहां को जाता है। अब संगठन किसान सभाओं के जरिये नए सिरे से आंदोलन की जड़ों को मजबूती देने में जुटा है।

अभिनेता सुशांत सिंह समेत कई लोग सोशल मीडिया पर किसान मजदूर एकता महारैली के समर्थन में आगे आए हैं।

इस महारैली के जरिये किसान-मजदूर एकता का प्रदर्शन तो होगा ही, साथ ही किसान आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किये गए लोगों की रिहाई के लिए आवाज उठायी जाएगी। आयोजकों का कहना है कि महारैली के लिए बरनाला की अनाज मंडी में 9 लाख वर्ग फीट का स्थान बनाया जा रहा है, जहां 2 लाख किसानों के पहुंचने की उम्मीद है।

ऐसे समय जब किसान आंदोलन को लगभग तीन महीने हो चुकी है और फसल कटाई का समय आ रहा है तो आंदोलन को लेकर भी कई तरह के कयास लग रहे हैं। इस बीच, दिल्ली बॉर्डर पर डटे किसानों की तादाद भी कम हुई है। ऐसे में यह रैली पंजाब में आंदोलन को नए सिरे से मजबूती दे सकती है, जिसका असर दिल्ली मोर्चों और देश के बाकी राज्यों में किसान आंदोलन के मूड पर भी पड़ेगा।

26 जनवरी को जिस प्रकार दिल्ली में उपद्रव हुआ। ट्रैक्टर मार्च निकालते हुए प्रदर्शनकारी आईटीओ व लाल किले तक पहुंचे, उसके बाद से ही आंदोलन के तौर-तरीकों और जनता में उसके मैसेज को लेकर काफी मंथन चल रहा है। इस बीच आंदोलनकारियों, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी से भी कहीं न कहीं आंदोलन के मनोबल पर असर पड़ा है। लेकिन जिस तरीके से 28 जनवरी को राकेश टिकैत की भावुक अपील ने आंदोलन में जान फूंक दी। उम्मीद की जा रही है कि वैसा ही कुछ करिश्मा उग्राहां की किसान-मजदूर एकता महारैली भी कर सकती है।

खेतों तक पहुंचा किसान आंदोलन, किसान ने खड़ी फसल जोत डाली

केंद्र के तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान विरोध-प्रदर्शन के नए-नए तरीके आजमा रहे हैं। बिजनौर के एक किसान ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जताते हुए अपनी खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलाकर दिया।

बिजनौर की चांदपुर तहसील के गांव कुल्चाना निवासी किसान सोहित ने छह बीघा खेत में खड़ी गेहूं की फसल जोत दी है। उसका कहना है कि सरकार किसान की सुनने को तैयार नहीं है। फसल मिट्टी में मिलाने के बाद किसान का कहना है कि वह आंदोलन के समर्थन में दिल्ली बॉर्डर पर जाएगा।

किसान सोहित ने बताया कि उसके पास 13 बीघे गेहूं की फसल थी। जिसमें से सात बीघा छोड़कर बाकी छह बीघा गेहूं को खेत में ही जोत दिया है। भाकियू युवा के प्रदेश अध्‍यक्ष दिगम्‍बर सिंह ने बताया कि किसान भाकियू का कार्यकर्ता है। वे किसानों को आवेश में इस तरह का कोई कदम न उठाने के लिए समझा रहे हैं।

गौरतलब है कि कल भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने किसानों को एक फसल की कुर्बानी देने के लिए तैयार रहने को कहा था। इससे पहले हरियाणा के खरक पुनिया में किसान महापंचायत को संबोधित करते हुए राकेश टिकैत ने कहा था कि सरकार ऐसी गलतफहमी में न रहे कि किसान फसल काटने के लिए वापस चले जाएंगे। अगर सरकार ने दबाव बनाया तो हम अपनी फसल को आग लगा देंगे।

राकेश टिकैत ने शनिवार को फिर दोहराया कि जब तक बिल वापसी नहीं, तब तक घर वापसी नहीं। उन्होंने कहा कि खेतों में भी काम प्रभावित ना हो, इसके लिए रणनीति तैयार कर ली है। किसान बारी-बारी से आंदोलन स्थल पर आते-जाते रहेंगे। जो किसान आंदोलन में रहेगा, गांव वाले उसके खेत और काम का पूरा ध्यान रखेंगे। टिकैत ने किसानों से कहा है कि कृषि कार्य के दबाव में आंदोलन को ठंडा न होने दें।

अभी सिर्फ तैयार रहे, फसल नष्ट न करें: राकेश टिकैत

बिजनौर में एक किसान द्वारा फसल नष्ट जाने के सवाल पर राकेश टिकैत ने कहा कि ऐसा करना ठीक नहीं है। हमने अभी केवल आह्वान किया है कि किसान आंदोलन के लिए अपनी एक फसल कुर्बान करने को तैयार रहें। इसका मतलब यह नहीं है कि फसल में आग लगा दें, नहीं। आंदोलन के लिए जरूरत पड़ी तो फसल का मोह छोड़ने को तैयार रहें। हालांकि, अभी आंदोलन उस स्थिति में नहीं है। यह आह्वान बहुत विपरीत स्थिति के लिए किया गया था। उन्होंने किसानों से अपील की है कि आवेश में आकर कोई आत्मघाती कदम न उठाएं।

टिकैत के आंसू निकले तो पीएम के होंठों पर हंसी थी: प्रियंका गांधी

कृषि कानूनों के खिलाफ तीन महीने से दिल्ली की सरहदों पर चल रहा किसान आंदोलन अब उत्तर भारत की राजनीति में हलचल मचा रहा है। किसान यूनियनों के साथ-साथ विपक्ष के नेता किसान पंचायतें को जरिये अपनी राजनीतिक जमीन को पुख्ता करने में जुटे हैं।

इसी क्रम में 20 फरवरी को मुजफ्फरनगर जिले के बघरा में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने एक किसान पंचायत को संबोधित किया। इस मौके पर प्रियंका गांधी को सुनने भारी संख्या में पहुंचे किसानों को देखकर कांग्रेसी गदगद थे। इससे पहले बिजनौर के चांदपुर और सहारनपुर के चिलकाना में भी प्रियंका गांधी की किसान पंचायतों में अच्छी खासी भीड़ जुटी थी।

प्रियंका गांधी ने किसानों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर जमकर प्रहार किये। उन्होने सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री जिन कानूनों को किसान हितैषी बता रहे हैं, वे किस किसान से पूछकर बनाये। कृषि कानूनों के खिलाफ जोरदार हुंकार भरते हुए प्रियंका गांधी ने किसानों का साथ देने का वादा किया।

किसान आंदोलन को लेकर सरकार के रवैये की आलोचना करते हुए प्रियंका गांधी ने कहा कि जो किसान अपने बेटे को देश की रखवाली करने भेजता है उसे देशद्रोही, आतंकवादी कहा गया। जब चौधरी टिकैत की आंखों में आंसू आते हैं तो हमारे प्रधानमंत्री जी के होठों पर मुस्कान आती है। उन्हें मजाक सूझता है। जो प्रधानमंत्री अमेरिका जा सकते थे, पाकिस्तान जा सकते थे, चीन जा सकते थे वो किसानों के आंसू पोंछने उन तक नहीं जा पाये।

आज प्रियंका गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना कहानियों के अहंकारी राजा से कर डाली जो किसी की नहीं सुनता। उन्होंने कहा कि हमारे प्रधानमंत्री की राजनीति सिर्फ अपने लिए और अपने खरबपति मित्रों के लिए है।

मुजफ्फरनगर किसान पंचायत में प्रियंका गांधी ने गन्ने के दाम और बकाया भुगतान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि पूरे देश में गन्ने का बकाया भुगतान 15 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। लेकिन सरकार ने पीएम के दुनिया घूमने के लिए दो हवाई जहाज खरीदे हैं, जिनकी कीमत 16 हजार करोड़ रुपये है।

किसानों की दुखती रग पर हाथ रखते हुए प्रियंका गांधी ने डीजल, खाद, बीज की महंगाई का मुद्दा उठाया। साथ ही नए कृषि कानूनों से मंडियों के खत्म होने और पूंजीपतियों की मनमानी का डर भी दिखाया। उन्होंने कहा कि आज किसानों के घरों से लूट हो रही है और प्रधानमंत्री के दो पूंजीपति मित्रों को पूरी छूट दी गई है।

इस किसान पंचायत में शामिल हुए लोगों का कहना है कि लंबे अरसे के बाद मुजफ्फरनगर में कांग्रेस की किसी सभा में इतनी भीड़ जुटी। प्रियंका गांधी की इन सभाओं से पश्चिमी यूपी में शिथिल पड़े कांग्रेस संगठन में नई जान आ सकती है। हालांकि, समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल भी किसान आंदोलन से उपजी लहर को भुनाने का प्रयास कर रहे हैं।

फसल बीमा के लिए ड्रोन उड़ाने की अनुमति, लेकिन क्यों लगे 5 साल?

पांच साल पहले 2016 में जब प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना शुरू हुई तो इस योजना में ड्रोन के इस्तेमाल पर काफी जोर दिया गया था। कई वर्षों तक ड्रोन के इस्तेमाल को योजना की खूबियों में गिनाया गया। लेकिन ताज्जुब की बात है कि इस योजना के लिए ड्रोन के इस्तेमाल की अनुमति कृषि मंत्रालय को 18 फरवरी, 2021 को यानी पांच साल बाद मिली है। यह स्थिति तब है, जबकि अनुमति देने वाला और अनुमति लेने वाला मंत्रालय केंद्र सरकार के तहत काम करता है। इससे ड्रोन के उपयोग में आ रही कानूनी बाधाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है।

नागर विमानन मंत्रालय की ओर से जारी आदेश के अनुसार, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत ड्रोन के जरिये देश के 100 जिलों में ग्राम पंचायत स्तर पर उपज अनुमान के आंकड़े जुटाने के लिए एयरक्राफ्ट रूल्स, 1937 से सशर्त छूट दी गई है। इससे पहले 29 जनवरी को नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने कृषि मंत्रालय को फसल बीमा योजना के लिए सुदूर संचालित विमान प्रणाली (आरपीएएस) यानी ड्रोन के उपयोग की अनुमति दी थी। यह अनुमति फिलहाल एक साल के लिए और कई तरह की पाबंदियों के साथ दी गई है।

इस बारे में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने ट्वीट किया था कि गेहूं और धान उत्पादक 100 जिलों में ड्रोन उड़ाने की अनुमति मिलने से फसल बीमा केे दावों का समय से निस्तारण सुनिश्चित होगा। इसमें कोई दोराय नहीं है कि कृषि में ड्रोन के उपयोग की कई संभावनाएं हैं। लेकिन सवाल यह है कि फिलहाल कृषि में ड्रोन का कितना उपयोग हो रहा है और इससे उत्पादकता और किसानों की आय पर क्या असर पड़ा है।

क्या होता है ड्रोन?

वास्तव में ड्रोन एक रिमोट संचालित एयक्राफ्ट सिस्टम (आरपीएएस) है जिसे अन्मैन्ड एरियल सिस्टम (यूएएस) भी कहते हैं। इसका उपयोग कई वर्षों से डिफेंस, पुलिस और आपदा प्रबंंधन समेत क्षेत्रों में किया जा रहा है। इस तकनीक को कृषि के भविष्य के तौर पर देखा जा रहा है। कई स्टार्ट-अप कृषि में ड्रोन की संभावनाओं तलाश रहे हैं। इस लिहाज से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ड्रोन के इस्तेमाल की छूट मिलना एक अच्छी पहल है।

फसल बीमा योजना में ड्रोन का इस्तेमाल

सवाल यह है कि जिस योजना में पहले दिन से ड्रोन के इस्तेमाल की बात कही जा रही है, उसे हरी झंडी मिलने में पांच साल क्यों लग गये। कृषि मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव डॉ. आशीष कुमार भूटानी ने बताया कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में सेटैलाइट डेटा का इस्तेमाल किया जा रहा है। लेकिन खराब मौसम में सेटैलाइट की बजाय ड्रोन ज्यादा कारगर साबित हो सकते हैं, इसलिए 100 जिलों में ड्रोन के जरिये उपज उत्पादन और फसलों के नुकसान संबंधी आंकड़े जुटाए जाएंगे। कृषि मंत्रालय ने कुछ महीने पहले डीजीसीए को आवेदन किया था। इस प्रक्रिया में करीब तीन महीने का समय लगा है। क्योंकि नागर विमानन मंत्रालय और डीजीसीए के दिशानिर्देशों के अनुसार प्रस्ताव तैयार करना था।

नागर विमानन मंत्रालय में संयुक्त सचिव अंबर दुबे ने बताया कि सरकार कृषि, इन्फ्रास्ट्रक्चर, रूरल डेवलपमेंट और आपदा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में ड्रोन के इस्तेमाल को प्रोत्साहन दे रही है। कृषि से जुड़ी कई परियोजनाओं में ड्रोन के उपयोग की अनुमति दी गई है। गत वर्ष टिड्डी नियंत्रण में ड्रोन का बखूबी इस्तेमाल हुआ था। कृषि मंत्रालय का प्रस्ताव 100 जिलों से संबंधित था, फिर भी इसे प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी दी गई है। अंबर दुबे का कहना है कि ड्रोन से जुड़े अप्रूवल में लोगों की सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रीय सुरक्षा को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ड्रोन के इस्तेमाल के लिए कृषि मंत्रालय ने 6 नवंबर, 2020 को डीजीसीए को पत्र लिखा था। मतलब, फसल बीमा योजना भले ही 2016 में लांच हुई, लेकिन ड्रोन के प्रयोग के लिए मंत्रालय 2019-20 में जाकर सक्रिय हुआ। कृषि मंत्रालय ने 2019 में फसल बीमा योजना में रिमोट सेंसिंग डेटा के उपयोग के लिए देश के 64 जिलों में एक पायलट स्टडी करायी थी। इसके आधार पर ही 100 जिलों में रिमोट सेंसिंग डेटा और ड्रोन तकनीक की मदद लेना का फैसला लिया गया। हालांकि, इस दौरान कुछ फसल बीमा कंपनियों ने अपने स्तर पर ड्रोन के इस्तेमाल के प्रयास भी किये हैैं।

ड्रोन के सामने नियमन की बाधाएं

दरअसल, ड्रोन रेगुलेशन और नियमन प्रक्रिया में देरी की वजह से 2014 से 2018 तक इस क्षेत्र की प्रगति काफी धीमी रही है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में ड्रोन की मदद लेने में समय लगने के पीछे यह भी एक वजह है। इसके अलावा ड्रोन के मामले में नागर विमानन मंत्रालय, गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की एप्रोच में भी अंतर है। कई बार इस वजह से भी मंजूरी मिलने में समय लगता है।

ड्रोन इंडस्ट्री भारत में कई साल से नियम-कायदों और पाबंदियों में उलझी रही है। जबकि दूसरी तरफ ड्रोन का गैर-कानूनी इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। ड्रोन को लेकर कई साल तक नीतिगत अस्पष्टता भी रही है। साल 2014 में भारत सरकार ने ड्रोन के गैर-सरकारी इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी थी। हालांकि, इसके बावजूद चीन से आयातित हल्के ड्रोन की खरीद-बिक्री जारी रही। एक अनुमान के मुताबिक, देश में छोटे-बड़े करीब छह लाख ड्रोन हैं।

नए रेगुलेशन आने में कई साल बीते

2014 में ड्रोन पर पाबंदी लगने के बाद ड्रोन संबंधी रेगुलेशन जारी करने में सरकार को चार साल लगे। 27 अगस्त, 2018 रिमोट संचालित एयरक्राफ्ट सिस्टम (आरपीएएस) के लिए सिविल एविएशन रेगुलेशन (सीएपी) बने। इसके तहत 250 ग्राम से कम वजन के नैनो ड्रोन उड़ाने की छूट दी गई, जबकि 250 ग्राम से ज्यादा वजनी ड्रोन पर “नो परमिशन-नो टेक ऑफ” की नीति लागू कर दी। एक दिसंबर, 2018 से ड्रोन संचालन के लिए डिजिटल स्काई प्लेटफार्म पर रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कर दिया गया है।

डिजिटल स्काई पोर्टल पर ड्रोन ऑपरेटर और डिवाइस दोनों का रजिस्ट्रेशन होता है। हरेक उड़ान से पहले ऑपरेटर को फ्लाइट प्लान देना पड़ता है। सुरक्षा के लिहाज से विभिन्न क्षेत्रों को ग्रीन, येलो और रेड जोन में बांटा गया है। ग्रीन जोन में सिर्फ उड़ान की सूचना पोर्टल पर देनी होती है जबकि येलो जोन में उड़ान के लिए अनुमति लेनी पड़ती है। रेड जोन में ड्रोन उड़ाने की अनुमति नहीं है। इसके अलावा ड्रोन के हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और संचालन संबंधी कई बाध्यताएं हैं।

कोरोना काल में काम आया ड्रोन

हालांकि, पिछले दो वर्षों में नागर विमानन मंत्रालय ने ड्रोन से जुड़े कई नीतिगत बदलाव किये हैं। डिजिटल स्काई पोर्टल के जरिये ड्रोन के रजिस्ट्रेशन और उड़ान अनुमति की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है। कोरोना संकट के दौरान राहत कार्यों के लिए सरकारी विभागों खासतौर पर पुलिस ने ड्रोन का खूब इस्तेमाल किया। ड्रोन के लिए मार्च, 2020 में डीजीसीए में भी एक गाइडेंस मैन्युअल जारी किया था। जिसके बाद जून में अन्मैन्ड एयरक्राफ्ट सिस्टम रूल्स, 2020 जारी किये गये। फिलहाल देश में ड्रोन का संचालन इन्हीं नियमों के तहत होता है।

ड्रोन और इससे जुड़ी सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनी आईओटेकवर्ल्ड एविगेशन प्राइवेट लिमिटेड के तकनीकी निदेशक अनूप कुमार उपध्याय का कहना है कि नागर विमानन मंत्रालय ड्रोन से जुड़े रेगुलेशन को बेहतर बनाने का प्रयास कर रहा है। जिस तेजी से ड्रोन इंडस्ट्री बढ़ रही है, उसे देखते हुए सरकार को अनुकूल माहौल बनाने की जरूरत है। अन्यथा ड्रोन का गैर-कानूनी इस्तेमाल बढ़ेगा।

कृषि में ड्रोन का इस्तेमाल

खेती में ड्रोन का इस्तेमाल फसलों की मॉनिटरिंग, फसल की तैयारी, उपज के अनुमान, आपदा प्रबंधन, कीट नियंत्रण और फसलों पर छिड़काव के लिए किया जाता है। सेंसर, कैमरा, स्प्रेयर और मानवरहित उड़ान भरने की क्षमता के चलते बहुत से कामों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

महाराष्ट्र समेत कई राज्य सरकारों ने कृषि में ड्रोन के इस्तेमाल के लिए प्रयास कर रही हैं। भारत सरकार ने हैदराबाद स्थित अंतर्राष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (इक्रीसेट) को ड्रोन के उपयोग की अनुमति दी है। स्काईमैट जैसी कई कंपनियां भी फसल और मौसम पूर्वानुमान के लिए ड्रोन की मदद ले रही हैं।

विशेष परिस्थितियों को छोड़कर भारत में ड्रोन के जरिये कीटनाशकों के छिड़काव की अनुमति नहीं है। यह कृषि के लिहाज से बड़ी बाधा है। इसके अलावा सख्त नियम-कायदे, महंगी कीमत, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और ट्रेनिंग संबंधी कई तरह की बाधाएं भी हैं। अब देखना है कि इन बाधाओं को पार कर कृषि क्षेत्र में ड्रोन कितने कारगर साबित हो पाते हैं।

रेल रोकी, यात्रियों पर फूल बरसायें और समय पर ट्रैक खाली कर दिये

आज किसानों के रेल रोको अभियान के साथ भी ऐसा ही हुआ। ज्यादातर रेलगाड़ियों की आवाजाही सामान्य रहने के दावे को प्रदर्शन की नाकामी के तौर पर पेश किया जा रहा है। जबकि पंजाब में कई महीनों तक रेल ठप रहने पर किसान आंदोलन की खूब आलोचना हुई थी। इस बार रेलगाड़ियों को लंबे समय तक नहीं रोका गया। न कोई तोड़फोड़ हुई और न ही यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ा। रेल रोकने का प्रयास करने वाले कई आंदोलनकारियों को बिहार, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में पुलिस ने हिरासत में जरूर लिया। लेकिन इस दौरान किसी हिसंक घटना की जानकारी नहीं है। कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर आंदोलन शांतिपूर्ण रहा।

आज संयुक्त किसान मोर्चा का रेल रोको आंदोलन कितना सफल या कितना असफल रहा, यह देखने के नजरिये पर निर्भर करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि आंदोलन का असर कई राज्यों में दिखा। कई जगह महिलाओं ने नेतृत्व किया। दिन भर रेल लाइनों पर किसानों के जमावड़े की तस्वीरें आती रही। कहीं रेल यात्रियों पर फूल बरसाये गये तो कहीं यात्रियों को चाय-पानी पिलाकर आंदोलनकारियों ने उन तक अपने मुद्दे पहुंचाने की कोशिश की। कहीं जलेबियां बंट रही थी, तो कहीं आंदोलन के गीतों पर किसान झूम रहे थे।

क्या यह सब सफल आंदोलन के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है? देश में सैकड़ों जगह कृषि कानूनों के विरोध में किसान इकट्ठा हुए। अपना विरोध व्यक्त किया और समय से ट्रैक खाली कर दिये। क्या किसी आंदोलन के सफल होने के लिए कुछ बड़ा होना जरूरी है? कोई बड़ा बवाल या हल्ला? तभी आंदोलन को सफल माना जाएगा?

आज के रेल रोको अभियान का सबसे ज्यादा असर पंजाब और हरियाणा में देखने को मिला। पंजाब के बठिंडा में हजारों की तादाद में किसानों ने रेल की पटरियों पर डेरा जमा लिया। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल थीं। लेकिन यह आंदोलन पंजाब तक सीमित नहीं था।

हरियाणा की जींद में भी महिलाओं ने बढ़-चढ़कर रेल रोको अभियान में हिस्सा लिया। हरियाणा के अंबाला, कुरुक्षेत्र और चरखी दादरी में भी किसानों ने रेल की पटरियों पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया।

इस दौरान बिहार के पटना, झारखंड के रांची, यूपी के कानपुर, उरई, चित्रकूट, फर्रुखाबाद, मध्यप्रदेश के विदिशा, महाराष्ट्र के औरंगाबाद, बुलढाणा और कर्नाटक के रायचूर समेत कई जगहों से प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। यूपी के कई जिलों में आंदोलनकारियों को रोकने और नज़रबंद किये जाने की खबर है। कई जगह प्रदर्शनकारी रेल की पटरियों पर ही लेट गये, जिन्हें हटाने के लिए पुलिस को मशक्कत करनी पड़ी। इस रेल रोको आंदोलन में किसान यूनियनों के साथ विपक्षी दल भी शामिल थे।

रेल रोकने का कार्यक्रम सुबह 12 से 4 बजे तक था। चार बजते ही प्रदर्शनकारी रेलवे ट्रैक से हटने लगे थे। बेशक, रेल रोको अभियान का असर हरियाणा और पंजाब में सबसे ज्यादा दिखा। लेकिन देश के बाकी राज्यों खासकर पश्चिमी बंगाल, बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान में भी किसानों ने अपने नजदीकी रेलवे स्टेशनों पर पहुंचकर विरोध-प्रदर्शन किया। इस लिहाज से इसे देशव्यापी कहा जा सकता है। दोपहर 12 बजते ही विभिन्न राज्यों से आंदोलनकारी किसानों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर छाने लगी थीं।

राजस्थान के जयपुर में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी रेलवे ट्रैक पर जुटे और रेलगाड़ियों की आवाजाही बंद करा दी। बंगाल और ओडिशा में भी कई जगह प्रदर्शन हुए।

रेल रोको अभियान के कई रंग-ढंग काफी निराले रहे। लुधियाना में एक रेल यात्री को चाय पिलाते किसान की यह तस्वीर काफी वायरल हो रही है।

हरियाणा के चरखी दादरी स्टेशन पर आंदोलनकारी महिलाओं ने प्रदर्शन के दौरान जलेबी और पकौड़े का वितरण किया तो कहीं महिलाओं ने नाच-गाकर विरोध दर्ज कराया।

कई जगह आंदोलनकारियों ने ट्रेन के ड्राइवर और यात्रियों का फूल-मालाओं से स्वागत भी किया।

यूपी के शामिली में रेलवे ट्रैक पर डेरा जमाये किसान आंदोलन के गीतों पर थिरकते नजर आये।

भारतीय किसान यूनियन एकता उग्राहां का कहना है कि पंजाब के 15 जिलों में 20 जगहों पर रेल रोकी गई। जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। हरियाणा और पंजाब के विरोध-प्रदर्शनों में महिलाएं भी बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रही हैं।

यूपी के मोदीनगर और हापुड़ में किसानों ने रेलवे स्टेशन पर पहुंचकर विरोध-प्रदर्शन किया। यूपी में मोदीनगर, मुजफ्फरनगर, गढ़ मुक्तेश्वर, हापुड़ और दनकौर में किसान यूनियन के कार्यकर्ताओं ने रेल की पटरियों पर बैठकर धरना दिया।

भारतीय रेल की ओर से आए बयान के अनुसार, रेल रोको अभियान का रेलगाड़ियों की आवाजाही पर बहुत कम असर पड़ा है। इस दौरान कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। कुछ इलाकों में रेलगाड़ियों को रोका गया था, लेकिन जल्द ही आवागमन सामान्य हो गया। विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए 25 ट्रेनों के समय या रुट में बदलाव किया गया था।

संयुक्त किसान मोर्चा का कहना है कि राष्ट्रव्यापी रेल रोको आंदोलन के तहत देश भर के सैकड़ों स्थानों पर दोपहर 12 बजे से शाम 4 बजे तक ट्रेनों को रोका गया। देश भर में ये कार्यक्रम सफल रहे व कोई हिंसक गतिविधि नहीं हुई। देश भर के किसान एमएसपी की कानूनी गारंटी के लिए, तीन कृषि कानून, विद्युत विधेयक व प्रदूषण विधेयक के खिलाफ लगभग तीन महीने से आंदोलन कर रहे हैं। किसानों में गुस्सा तेज हो रहा है। केंद्र सरकार को कानून को रद्द करने होंगे।

‘आत्मनिर्भर किसान’ पर केंद्रित पूसा कृषि मेला 25 से 27 फरवरी के बीच आयोजित होगा

देश भर के किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और नवाचारों को एक मंच पर लाने वाला भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) का विख्यात पूसा कृषि विज्ञान मेला इस साल 25 फरवरी से 27 फरवरी के बीच आयोजित किया जाएगा। नए बीजों, कृषि यंत्रों और खेती से जुड़ी नई विधियों को किसानों तक पहुंचाने में अहम भूमिका अदा करने वाले इस कृषि मेले के आयोजन को लेकर इस साल कई अटकलें लगाई जा रही थीं। लेकिन कोरोना संकट से उबरते हुए गत वर्ष की भांति इस साल भी पूसा कृषि मेले के आयोजन का निर्णय लिया गया है। मेला का उद्घाटन कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर करेंगे। इस साल की थीम ‘आत्मनिर्भर किसान’ रखी गई है।

मेले के मुख्य आकर्षण

कृषि मेले में आईएआरआई द्वारा विकसित बीजों की कई किस्में पेश की जाएंगे, जिनमें पूसा बासमती 1692 नाम की धान की नई किस्म भी शामिल है, जो केवल 115 दिनों के बीच तैयार हो जाती है। इसके अलावा कृषि, बागवानी, पशुपालन और फूड प्रोसिसिंग से जुड़ी नई तकनीक और नवाचारों का प्रदर्शन भी किया जाएगा। यह मेला देश के प्रगतिशील किसानों के लिए नई जानकारियों जुटाने और सीख लेने का एक अच्छा मौका है। यहां किसानों को कई उन्नत बीज भी उपलब्ध कराये जाते हैं।

कोविड-19 दिशानिर्देशों का होगा पालन

कोविड-19 महामारी को ध्यान में रखते हुए पूसा कृषि मेले में मास्क पहनने, शारीरिक दूरी बनाये रखने और महामारी संबंधी सुरक्षा नियमों का पालन किया जाएगा। इसी वजह से किसानों को रात्रि प्रवास की सुविधा नहीं दी जा रही है। इससे दूरदराज से आने वाले किसानों को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। हरेक दिन सीमित संख्या में ही किसानों को मेले में प्रवेश दिया जाएगा।

कोराना संकट के बावजूद चीनी उत्पादन में 23% की बढ़ोतरी

पिछले वर्ष से जारी कोविड-19 संकट के बावजूद गन्ना किसानों और चीनी मिलों बढ़-चढ़कर काम किया है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, पेराई सत्र 2020-21 में 15 फरवरी तक देश में 208.89 लाख टन चीनी उत्पादन हुआ। जबकि गत वर्ष इसी तारीख तक 170.01 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। इस तरह कोराना संकट के बावजूद चीनी उत्पादन में करीब 23 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। 

पहली अक्टूबर से शुरू मौजूदा पेराई सत्र में 497 चीनी मिलें काम कर रही थीं, जिनमें से 33 चीनी मिलें गन्ना उपलब्ध नहीं होने के कारण पेराई रोक चुकी हैं। चीनी मिलों का यह आंकड़ा भी गत वर्ष से अधिक है जब कुल 447 चीनी मिलों ने पेराई शुरू की थी जिनमें से इस समय तक 20 मिलें बंद हो चुकी थी।

चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र नंबर वन

चीनी उत्पादन के मामले में इस साल महाराष्ट्र ने फिर बाजी मार ली है। 15 फरवरी तक महाराष्ट्र की 183 चीनी मिलों ने कुल 75.46 लाख टन चीनी उत्पादन किया है। उत्तर प्रदेश 116 चीनी मिलों में 65.13 लाख टन चीनी उत्पादन के साथ दूसरे स्थान पर है। गत वर्ष के मुकाबले इस साल महाराष्ट्र में चीनी उत्पादन 43.38 लाख टन से बढ़कर 75.46 लाख टन पहुंचा है जबकि यूपी में चीनी उत्पादन गत वर्ष 66.43 लाख टन से घटकर 65.13 लाख टन रहा है। महाराष्ट्र और यूपी के बाद कर्नाटक चीनी उत्पादन में तीसरे स्थान पर है जहां 15 फरवरी तक 39.07 लाख टन चीनी उत्पादन हुआ। यहां भी गत वर्ष की अपेक्षा चीनी उत्पादन बढ़ा है।

चीनी निर्यात बढ़ने की उम्मीद

इस्मा से मिली जानकारी के अनुसार, चालू पेराई सत्र में 31 जनवरी, 2021 तक करीब 7 लाख टन चीनी का निर्यात हो चुका है। इसके अलावा करीब 25 लाख टन चीनी निर्यात के सौदे होने की जानकारी मिली है। केंद्र सरकार ने 31 दिसंबर, 2020 को चीनी के निर्यात कोटे का ऐलान किया था। अगर केंद्र सरकार ईरान को चीनी निर्यात में आ रही अड़चनें दूर कर देती है तो निर्यात और बढ़ सकता है।

किसान आंदोलन के बावजूद लगातार तीसरे साल गन्ना मूल्य नहीं बढ़ा

तीसरे महीने में प्रवेश कर चुके किसान आंदोलन के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने लगातार तीसरे साल गन्ने के राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) में कोई बढ़ोतरी नहीं की है। रविवार देर शाम मिली सूचना के अनुसार, यूपी मंत्रिमंडल ने गन्ना मूल्य पिछले साल के बराबर रखने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। पेराई सत्र 2020-21 में भी अस्वीकृत प्रजाति के गन्ने का भाव 310 रुपये प्रति कुंतल, सामान्य प्रजाति के गन्ने का भाव 315 रुपये प्रति कुंतल और अगेती प्रजाति के गन्ने का भाव 325 रुपये प्रति कुंतल रहेगा। यह लगातार तीसरा साल है जब गन्ने का दाम नहीं बढ़ाया गया है। 

उत्तर प्रदेश सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों ने बताया कि इस साल गन्ने का दाम पिछले साल के बराबर रखने का फैसला मंत्रिमंडल ने लिया है, जिसकी अधिसूचना एक-दो दिन में जारी कर दी जाएगी। सरकार की प्राथमिकता इस समय ज्यादा से ज्यादा गन्ना खरीदने और भुगतान कराने पर है। इसलिए कोरोना संकट के बावजूद चीनी मिलें चलवाई गईं।

साल 2017 में उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने के बाद भारतीय जनता पार्टी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने 2017-18 में गन्ने का दाम 10 रुपये प्रति कुंतल बढ़ाते हुए अस्वीकृत, सामान्य और अगेती प्रजाति के गन्ने का दाम 310, 315 और 325 रुपये प्रति कुंतल तय किया था। इसे बाद 2018-19, 2019-20 और 2020-21 में गन्ने के दाम में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। इसे लेकर गन्ना किसानों में काफी नाराजगी है। पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन के फैलने के पीछे गन्ने का दाम न बढ़ना और बकाया भुगतान में देरी प्रमुख वजह हैं।

गन्ना किसानों में नाराजगी 

किसान आंदोलन में जोर पकड़ रहे गन्ना किसानों के मुद्दे को देखते हुए इस साल गन्ना मूल्य में बढ़ोतरी की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन पेराई सत्र शुरू होने के चार महीने बाद घोषित भाव से किसानों को निराशा हाथ लगी है। भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत का कहना है कि यह सरकार की हठधर्मिता और किसान विरोधी रवैये का प्रमाण है कि इतने बड़े आंदोलन के बावजूद गन्ने का दाम नहीं बढ़ा है। इस मुद्दे पर आंदोलन तेज किया जाएगा। राष्ट्रीय लोकदल के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने गन्ने के दाम को लेकर राज्य सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।

चार महीने देरी से फैसलानतीजा जीरो

गन्ना पेराई सीजन की शुरुआत अक्टूबर में होती है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी तक गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य तय नहीं किया था। जिन पर्चियों के आधार पर किसान चीनी मिलों को गन्ना बेच रहे हैं, उन पर भाव की जगह शून्य लिखा है। यह मुद्दा किसान आंदोलन में भी खूब उठ रहा है। किसान नेता यह सवाल उठा रहे हैं कि जब गन्ने के दाम में कोई इजाफा नहीं करना था तो घोषणा करने में चार महीने क्यों लगा दिये।

गन्ने दाम बढ़ाने में मायावती का मुकाबला नहीं 

माना जा रहा है कि योगी सरकार अगले वर्ष चुनावी साल में गन्ने का दाम बढ़ाएगी। अखिलेश यादव की सरकार में भी पहले और आखिरी साल में गन्ने का दाम बढ़ाया गया था। हालांकि, अखिलेश यादव के समय गन्ना मूल्य में कुल 65 रुपये प्रति कुंतल की बढ़ोतरी हुई थी। योगी सरकार के चार वर्षों में गन्ना मूल्य सिर्फ 10 रुपये प्रति कुंतल बढ़ा है।

गन्ना मूल्य बढ़ाने के मामले में यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का रिकॉर्ड अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ की सरकारों से बेहतर है। मायावती के कार्यकाल में गन्ना मूल्य में कुल 115 रुपये कुंतल की बढ़ोतरी हुई थी। 

उत्तराखंड आपदा: लोगों के प्राणों से ज्यादा पावर प्रोजेक्ट की चिंता?

उत्तराखंड में जोशीमठ क्षेत्र में 7 फरवरी को आई आपदा को हफ्ता भर पूरा हो चुका है। इन सात दिनों में देश और उत्तराखंड की भाजपा सरकार की तेजी, मुस्तैदी का काफी महिमागान हुआ। उस महिमागान को देखें तो लगता है कि यही वो डबल इंजन है, जिसका वायदा मोदी जी करते रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत देखें तो मालूम पड़ता है कि सात दिनों में एक सुरंग के भीतर फंसे 35 लोगों तक पहुंचना अभी भी दूर की कौड़ी मालूम पड़ रहा है। उस सुरंग के साथ की बैराज साइट पर लोगों की तलाश का काम भी अभी नहीं हो सका है।

दो दिन पहले उत्तराखंड की राज्यपाल श्रीमति बेबी रानी मौर्य जायज़ा लेने तपोवन में उस सुरंग के पास पहुंची, जहां 35 लोग फंसे हैं। उनसे जब एक लापता व्यक्ति के परिजन ने कहा कि सुरंग से मलबा बाहर फेंकने के लिए दस जेसीबी लगवाई जाएं तो राज्यपाल महोदया ने कहा कि दस जेसीबी कहाँ से आएंगी? राज्यपाल ने यहां तक कह दिया कि मशीनें मुंबई और हिमाचल प्रदेश से आ रही हैं। राज्यपाल महोदया प्रदेश की संवैधानिक मुखिया हैं। बद्रीनाथ भी घूमने गयी होंगी। लेकिन न वे जान सकीं, न ही कोई लायक सरकारी अफसर उनके इर्दगिर्द था जो उन्हें बता पाता कि जोशीमठ के इलाके में तो कदम तो कदम पर जलविद्युत परियोजनाएं हैं, जहां जेसीबी और लोडर जैसी मशीनें फावड़े, गैंती, बेलचे से अधिक संख्या में हैं!

इस तरह देखें तो दिल्ली और देहरादून की डबल इंजन सरकार का मैनेज्ड मीडिया महिमागान अपनी जगह है और जमीन पर डबल इंजन की कच्छप गति अपनी जगह। यह अलग बात है कि महिमागान प्राण नहीं बचा सकता और हर बीतते हुए पल के साथ डबल इंजन की यह कच्छप गति सुरंग में कैद लोगों के जीवित होने की संभावना को निरंतर क्षीण कर रही है।

सात दिनों में प्राथमिकताएं भी स्पष्ट हुई। स्थानीय लोग और देश के विभिन्न हिस्सों से जोशीमठ पहुंचे लोग चाहते हैं कि किसी तरह भी उनके परिजनों की तलाश की जाये। लेकिन हुक्मरान चाहते हैं कि बाकी जो भी हो जलविद्युत परियोजनाओं और उनकी खामियों पर कोई बात न हो। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने घटना के अगले ही दिन यानि 8 फरवरी को ट्वीट किया कि इस “हादसे को विकास के खिलाफ प्रोपेगैंडा का कारण न बनाएं।” केन्द्रीय ऊर्जा मंत्री आरके सिंह ने तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना को जल्द से जल्द शुरू करने का इरादा जताया है।

इन दोनों बयानों को जोड़ कर देखें तो स्पष्ट है कि जिस त्रासदी में 200 लोग एक हफ्ते बाद भी नहीं खोजे जा सके, उससे सरकारी तंत्र कोई सबक लेने को तैयार नहीं है। यह समीक्षा करने को भी सरकारें तैयार नहीं हैं कि 2013 की भीषण आपदा के बावजूद इस तरह की हादसे से निपटने की कोई पूर्व तैयारी क्यूं नहीं थी?

रैणी गांव देश और दुनिया में चिपको आंदोलन और उसकी नेता गौरादेवी के गांव के रूप में जाना जाता है। यहीं पर 13 मेगावाट की परियोजना ऋषिगंगा नदी पर स्थित थी, जो पूरी तरह बह गयी है। यह नंदा देवी बायोस्फेयर रिजर्व का इलाका है, जो यूनेस्को द्वारा भी संरक्षित क्षेत्र की सूची में रखा गया है। बायोस्फेयर रिजर्व के प्रतिबंधों के चलते इस क्षेत्र में स्थानीय लोगों को एक लकड़ी का टुकड़ा या फिर घास तक उठाने की अनुमति नहीं है। लेकिन ऐसी पाबंदियों वाले क्षेत्र में परियोजना निर्माण के लिए स्थानीय निवासियों के विरोध के बावजूद बड़े पैमाने पर पेड़ों का कटान और डाइनामाइट के विस्फोट किए गए।

दूसरी परियोजना जो इस जल प्रलय की चपेट में आई है वो है – एनटीपीसी की निर्माणाधीन 530 मेगावाट की तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना। 2003-04 में इस परियोजना की शुरुआत से इस परियोजना के खिलाफ लोग मुखर रहे। विरोध प्रदर्शन इतना तीव्र था कि दो-तीन बार परियोजना निर्माण के उद्घाटन कार्यक्रम को रद्द करना पड़ा। अंततः तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने जोशीमठ से 300 किलोमीटर दूर देहारादून में तत्कालीन केन्द्रीय ऊर्जा मंत्री पीएम सईद के हाथों इस परियोजना का उद्घाटन करवाया। उस समय से इस परियोजना के खिलाफ निरंतर संघर्ष की अगुवाई करने वाले भाकपा (माले) के राज्य कमेटी सदस्य अतुल सती के अनुसार इस परियोजना के निर्माण में जोशीमठ की भौगलिक स्थितियों पर हुए वैज्ञानिक अध्ययनों की घनघोर उपेक्षा की गयी और भूगर्भीय जटिलताओं को भी अनदेखा किया गया।

इस परियोजना में तपोवन में बैराज स्थल से 12 किलोमीटर लंबी सुरंग जोशीमठ शहर के नीचे से पावर हाउस स्थल अणिमठ तक नदी का पानी ले जाने के लिए खोदी जानी थी। 2011 में पावर हाउस वाली तरफ से टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) द्वारा सुरंग खोदने का काम शुरु किया गया और कुछ ही दूर जाकर मशीन द्वारा खोदने से एक बड़ा पानी का झरना फूट पड़ा और मशीन वहीं अटक गयी। उस स्थल से आज भी वो पानी का झरना बह रहा है। शुरू में बताया गया कि वहां से 600 लीटर प्रति सेकेंड पानी बह रहा है, बाद में बताया गया कि उसकी रफ्तार कम हो कर 200 लीटर प्रति सेकेंड हो गयी है। एक भूगर्भीय जल स्रोत को अवैज्ञानिक तरीके से छेड़ कर उससे हर सेकेंड सैकड़ों लीटर पानी बहने के लिए छोड़ दिया गया और बीते एक दशक से किसी को उसकी चिंता तक नहीं है। अब बैराज वाली तरफ से सुरंग खोदी जा रही थी,जो 7 फरवरी को मलबे से पट गयी है।

निरंतर प्राकृतिक आपदाओं की मार झेलते हुए भी न तो प्रकृति का लिहाज किया जा रहा है न इन आपदाओं का शिकार होने वालों के जीवन का कोई मोल समझा जा रहा है। मुख्यमंत्री जब “हादसे को विकास के खिलाफ प्रोपेगैंडा न” बनाने की अपील का ट्वीट करते हैं और सुरंग में फंसे मजदूरों को निकालने के बजाय केंद्रीय ऊर्जा मंत्री परियोजना शुरू करने पर जोर देते हैं तो इसका स्पष्ट अर्थ है कि प्राकृतिक तबाही और मनुष्यों के प्राण उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं। परियोजना से होने वाला मुनाफा ही उनके लिए सबकुछ है।

(लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) से जुड़े हैं और चमोली जिले के आपदा प्रभावित क्षेत्र में मौजूद हैं)